✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

लिच्छवि

  • ६. महालिसुत्तं

    ६. महालिसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।

  • ७. जालियसुत्तं

    ७. जालियसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या जीव और शरीर एक ही है, अथवा भिन्न-भिन्न हैं? परिव्राजक के द्वारा पूछे जाने पर भगवान अनुपूर्वीशिक्षा के माध्यम से उस प्रश्न की निरर्थकता सिद्ध करते हैं।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • २४. पाथिक सुत्त

    २४. पाथिक सुत्त

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    सुनक्खत भिक्षु को तमाशेबाज निर्वस्त्र तपस्वियों से आकर्षण है। किन्तु, तप का ऐसा तमाशा न भगवान करते है, न ही उनका भिक्षुसंघ। उसके भिक्षुत्व छोड़ने की बात पर, भगवान उसकी अक्ल ठिकाने लगाने की नाकाम कोशिश करते है।