✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

— दुक्खा पटिपदा —
असुभ सञ्ञा | आहारे पटिकुलसञ्ञा | पटिकुल मनसिकार | नवसिवथिक | मरणसञ्ञा | आदीनव सञ्ञा | सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञा | धातु मनसिकार | सब्बसङखारेसु अनिच्चानुसञ्ञा | अनत्त सञ्ञा

अन्य ध्यान

प्रतिकूल चिंतन

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ३ मिनट

“अच्छा होगा, यदि साधक ‘घिनौनी परिस्थिति’ में रहकर भी, सही समय पर घिनरहित पक्ष को देखते हुए विहार करें।

अच्छा होगा, यदि साधक ‘घिनरहित परिस्थिति’ में रहकर भी, सही समय पर घिनौने पक्ष को देखते हुए विहार करें।

अच्छा होगा, यदि साधक, ‘घिनौनी और घिनरहित’, दोनों ही परिस्थितियों में रहकर भी, सही समय पर —

  • मात्र ‘घिनौने पक्ष’ को देखते हुए विहार करें,
  • मात्र ‘घिनरहित पक्ष’ को देखते हुए विहार करें,
  • या दोनों हटाकर, तटस्थ, सचेत, और स्मरणशील होकर विहार करें।

ऐसा क्यों करें?

• ‘कहीं मुझे द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में द्वेष न जाग जाए’ — इस ध्येय से साधक को घिनौनी परिस्थिति में रहकर भी, सही समय पर ‘घिनरहित पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।

• ‘कहीं मुझे दिलचस्पी जगाने वाली परिस्थिति में दिलचस्पी न जाग जाए’ — इस ध्येय से साधक को घिनरहित परिस्थिति में रहकर भी, सही समय पर ‘घिनौने पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।

• ‘कहीं मुझे द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में द्वेष न जाग जाए, और दिलचस्पी जगाने वाली परिस्थिति में दिलचस्पी न जाग जाए’ — इस ध्येय से साधक को, घिनौनी और घिनरहित, दोनों की परिस्थितियों में रहकर भी, सही समय पर मात्र ‘घिनरहित पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।

• ‘कहीं मुझे दिलचस्पी जगाने वाली परिस्थिति में दिलचस्पी न जाग जाए, और द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में द्वेष न जाग जाए’ — इस ध्येय से साधक को, घिनौनी व घिनरहित, दोनों की परिस्थिति में रहकर भी, सही समय पर मात्र ‘घिनौना पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।

  • ‘कहीं मुझे दिलचस्पी जगाने वाली परिस्थिति में रहकर, किसी भी आलंबन में, थोड़ी-सी भी दिलचस्पी न जाग जाए,
  • और द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में रहकर, किसी भी आलंबन में, थोड़ा-सा भी द्वेष न जाग जाए,
  • और भ्रम जगाने वाली परिस्थिति में रहकर, किसी भी आलंबन में, थोड़ा-सा भी भ्रम न जाग जाए’

— इस ध्येय से साधक को, घिनौनी और घिनरहित, दोनों की परिस्थितियों में रहकर भी, सही समय पर दोनों को हटाकर, ‘तटस्थ, सचेत, और स्मरणशील’ होकर विहार करना चाहिए।”

— अंगुत्तरनिकाय ५:१४४



अगली साधना