
पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे भगवान ने ६० अर्हंतों की अपनी ‘धम्म-सेना’ को बिना किसी शस्त्र के, मात्र करुणा और प्रज्ञा के बल पर दुनिया को जीतने के लिए चारों दिशाओं में विदा कर दिया।
विचरण करों, भिक्षुओं—बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित और सुख के लिए!
अपने सभी शिष्यों को विदा करने के बाद, भगवान वाराणसी से उरुवेला (बोधगया) के मार्ग पर निकल पड़े। एक तरफ ६० शिष्य दुनिया में धम्म की वर्षा कर रहे थे, और दूसरी तरफ ‘धम्मराज’ स्वयं एक शांत वनखंड की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ नियति उनका इंतज़ार कर रही थी.
रास्ते में एक शांत वनखंड था, जहाँ ३० रईस युवाओं का एक समूह—जिसे इतिहास ‘भद्दवर्गीय’ के नाम से जानता है—अपनी पत्नियों के संग जीवन के मदमस्त जश्न (पिकनिक) में डूबा था। लेकिन जब अचानक उस जश्न में खलल पड़ा, तब उनकी भेंट उस महाश्रमण से हुई, जिसने उन्हें बाहर भटकने के बजाय ‘भीतर’ खोजने का एक अनूठा निमंत्रण दिया।
तब भगवान वाराणसी में जितना रुकना चाहते थे, उतना रुके, और फिर उरुवेला के भ्रमण पर अकेले निकल पड़े।
उन्होंने एक विशेष स्थान पर आकर मार्ग को छोड़ दिया और उपवन में प्रवेश किया, और एक वृक्ष के नीचे बैठ गए।
उस समय उपवन में तीस मित्र और उनकी पत्नियों का एक भला समूह (‘भद्रवर्गीय’) पिकनिक मना रहा था। उनमें से एक की पत्नी नहीं थी, तो उसके लिए एक वेश्या को बुलाया गया था।
जब वे मदमस्त होकर मजा कर रहे थे, तब वेश्या उसकी वस्तुएँ उठाकर भाग गयी। तब सभी मित्र अपने उस मित्र की सहायता करते हुए उस वेश्या को ढूँढने निकले।
उपवन में घूमते-भटकते हुए उन्होंने भगवान को वृक्ष के नीचे बैठा देखा। तब वे भगवान के पास गए और कहा:
“भंते, क्या भगवान ने एक स्त्री को देखा?”
“किन्तु, कुमारों! भला एक स्त्री को क्यों देखना था?”
“भंते, हम तीस लोग मित्र हैं। हम अपनी पत्नियों के साथ एक समूह बनाकर उपवन में पिकनिक मना रहे थे। उनमें से एक की पत्नी नहीं थी, तो उसके लिए एक वेश्या को बुलाया गया था। जब वे मदमस्त होकर मजा कर रहे थे, तब वेश्या उसकी वस्तुएँ उठाकर भाग गयी। अब हम अपने उस मित्र की सहायता करते हुए उस वेश्या को ढूँढ रहे हैं।”
“क्या लगता है, कुमारों? तुम्हारे लिए क्या बेहतर है—उस स्त्री की खोज करना या आत्म-खोज करना?”
“भंते, हमारे लिए आत्म-खोज करना बेहतर है।”
“ऐसा हो, कुमारों, तो बैठो। मैं तुम्हें धम्म बताता हूँ।”
“ठीक है, भंते।”
तब, भगवान ने उन्हें अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि उनका तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।
जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह उन तीस मित्रों को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव का है, सब निरोध-स्वभाव का है!”
तब धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके तीस मित्र संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।
तब उन्होंने भगवान से कहा, “भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
“आओ, भिक्षु!” कह कर, भगवान ने उत्तर दिया, “यह स्पष्ट बताया धम्म है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।” और इस तरह, उन आयुष्मानो की उपसंपदा संपन्न हुई।
तीस रईस युवाओं को दीक्षा देने के बाद, अब भगवान का सामना उस समय के सबसे बड़े और प्रभावशाली सामुदायिक ‘गढ़’ से होने वाला था। उरुवेला में तीन प्रसिद्ध जटाधारी भाई रहते थे—उरुवेल कश्यप, नदी कश्यप और गया कश्यप। ये अग्नि-पूजक थे और १,००० शिष्यों की विशाल जटाधारियों का नेतृत्व करते थे।
उरुवेल कश्यप को अपने तथाकथित अरहंतपद पर घमंड था। भगवान जानते थे कि शब्दों के उपदेश से यह ‘पहाड़’ नहीं टूटेगा। इनकी भाषा ‘चमत्कार’ और ‘ऋद्धि’ है, इसलिए इन्हें उसी भाषा में जवाब देना होगा।
भगवान सीधे ‘शेर की मांद’ में घुसते हैं। वे कश्यप के आश्रम में जाकर रहने के लिए ऐसी जगह माँगते हैं जहाँ मौत का साया था—‘अग्निगार’, जहाँ एक भयानक नागराज रहता था। कश्यप ने चेतावनी दी, लेकिन भगवान की योजना कुछ और ही थी।
तब भगवान क्रमशः भ्रमण करते हुए अंततः उरुवेला पहुँच गए।
उस समय उरुवेला में तीन जटाधारी भाई रहते थे—उरुवेल कश्यप, नदी कश्यप, और गया कश्यप। उनमें उरुवेल कश्यप पाँच सौ जटाधारी साधुओं का नायक था, मार्गदर्शक था, अग्र था, प्रमुख था, मुखिया था। नदी कश्यप तीन सौ जटाधारी साधुओं का… जबकि गया कश्यप दो सौ जटाधारी साधुओं का नायक था, मार्गदर्शक था, अग्र था, प्रमुख था, मुखिया था।
भगवान जटाधारी उरुवेल कश्यप के आश्रम गए, और जाकर जटाधारी उरुवेल कश्यप से कहा:
“तुम्हारे लिए बड़ी बात न हो, कश्यप, तो क्या मैं एक रात के लिए तुम्हारे अग्निगार में रुक सकता हूँ?”
“यह मेरे लिए बड़ी बात नहीं है, महाश्रमण। किन्तु वहाँ एक चन्ड-स्वभाव का ऋद्धिमानी नागराज रहता है, जो अत्यंत घोर विषैला नाग है। वह कहीं तुम्हें आहत न कर दे।”
भगवान ने दो-तीन बार उससे आग्रह किया, किन्तु उसने वही जवाब दिया। तब भगवान ने कहा:
“वह शायद मुझे आहत नहीं करेगा। अब चलो भी, कश्यप! मुझे तुम्हारे अग्निगार में रुकने दो।”
“ठीक है, महाश्रमण! जहाँ सुखद लगे, वहाँ रहो!”
तब भगवान ने अग्निगार में प्रवेश किया और घास का आसन लगाकर, उस पर पालथी मार, काया सीधी रख, स्मृतिमान होकर बैठ गए।
जब नाग ने भगवान को बैठा देखा, तो उसने नाखुश होकर धुआँ ऊगला। तब भगवान ने सोचा, “मुझे इस नाग को वश करने के लिए अग्नि विरुद्ध अग्नि का उपयोग करना चाहिए, ताकि उसकी त्वचा, माँस, नसें, हड्डी या अस्थिमज्जा आहत न हो।”
तब भगवान ने उस तरह के ऋद्धिबल की रचना की और धुआँ उगला। तब नाग को अहंकार के मारे सहन नहीं हुआ, और उसने ज्वालाएँ उगलना शुरू किया। भगवान ने भी अग्निधातु में प्रवेश कर ज्वालाएँ उगली। दोनों के द्वारा इस तरह ज्वालाएँ उगलने पर ऐसा लग रहा था, मानो अग्निगार को बड़ी लपटों की आग लग कर, सब कुछ धधक रहा हो।
तब जटाधारी साधूगण अग्निगार के आसपास जमा हो गए, कहते हुए, “नाग उस अत्यंत रूपवान महाश्रमण को आहत कर रहा है!”
रात बीतने तक भगवान ने अग्नि विरुद्ध अग्नि का उपयोग कर, उस नाग को वश में कर लिया था, बिना उसकी त्वचा, माँस, नसें, हड्डी या अस्थिमज्जा को आहत किए।
उन्होंने उसे अपने भिक्षापात्र में डाला और जटाधारी उरुवेल कश्यप को दिखाया, “यह रहा, कश्यप, तुम्हारा नाग! उसकी अग्नि, मेरी अग्नि से शान्त हो गयी।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। इसने इस चन्ड-स्वभाव के ऋद्धिमानी नागराज, जो अत्यंत घोर विषैला नाग है, उसे अपनी अग्नि से वश कर लिया। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
किन्तु जटाधारी उरुवेल कश्यप को भगवान का ऋद्धि चमत्कार देखकर आस्था जड़ गयी। उसने भगवान से कहा, “यही रहो, महाश्रमण! मैं तुम्हारे भोजन की व्यवस्था करूँगा।”
नागराज का तो दमन हो गया, किन्तु किसी अज्ञानी मनुष्य के अहंकार का दमन करना उससे कहीं अधिक दुष्कर है। नाग का विष तो उतर सकता है, लेकिन अहंकार का विष ‘अंधा’ और ‘सख्त’ होता है।
कश्यप उस चमत्कार को देखकर स्तब्ध था, लेकिन भीतर ही भीतर असुरक्षित भी हो गया था। अपनी श्रेष्ठता को खतरे में देख, उसने अपनी इस गहरी असुरक्षा और अज्ञान को छिपाने के लिए ‘तथाकथित अरहंत’ होने का लबादा ओढ़ लिया।
अगले कुछ दिनों तक आश्रम में एक बड़ा ही विचित्र सिलसिला चला। यह किसी ‘मनोवैज्ञानिक कॉमेडी’ से कम नहीं था। जितनी बार भगवान अपने प्रताप से उसे उसकी सीमाओं का अहसास कराते, उतनी बार उसका बावला अहंकार एक ही रट लगाकर खुद को झूठी तसल्ली देता।
उरुवेला में चमत्कार #२
जल्द ही, भगवान, जटाधारी उरुवेल कश्यप के आश्रम के समीप उपवन में विहार करने लगे।
तब देर रात, चार महाराज देवतागण अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उपवन को रौशन करते हुए, भगवान के पास गए और अभिवादन कर भगवान की चार दिशाओं में खड़े हुए—अग्नि के चार महापिंड की तरह दिखते हुए।
तब रात बीतने पर, जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण! और कल रात तुमसे कौन मिलने आए थे? जो अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उपवन को रौशन करते हुए तुम्हारे पास गए और तुम्हें अभिवादन कर तुम्हारी चार दिशाओं में खड़े हो गए—अग्नि के चार महापिंड की तरह दिखते हुए?”
“वे तो, कश्यप, चार महाराज देवतागण थे, जो मेरे पास धम्म सुनने के लिए आए थे।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। इसके पास चार महाराज देवतागण धम्म सुनने के लिए आते हैं। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।

उरुवेला में चमत्कार #३
तब देर रात, देवराज इन्द्र सक्क (=सक्षम) अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उपवन को रौशन करते हुए भगवान के पास गया, और अभिवादन कर भगवान की एक-ओर खड़ा हुआ, किसी महाअग्निपिंड की तरह दिखता हुआ-सा, जो पिछले रात की कान्ति से अधिक तेजस्वी, उत्तम और उत्कृष्ठतम थी।
तब रात बीतने पर जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण! और कल रात तुमसे मिलने कौन आया था? जो अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उपवन को रौशन करते हुए तुम्हारे पास गया, और तुम्हें अभिवादन कर तुम्हारी एक-ओर खड़ा हुआ, किसी महाअग्निपिंड की तरह दिखता हुआ-सा, जो पिछले रात की कान्ति से अधिक तेजस्वी, उत्तम और उत्कृष्ठतम थी?”
“वह तो, कश्यप, देवराज इन्द्र सक्क था, जो मेरे पास धम्म सुनने के लिए आया था।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। इसके पास देवराज इन्द्र सक्क धम्म सुनने के लिए आता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।
उरुवेला में चमत्कार #४
तब देर रात, सहम्पति ब्रह्मा अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उपवन को रौशन करते हुए भगवान के पास गया, और अभिवादन कर भगवान की एक-ओर खड़ा हुआ, किसी महाअग्निपिंड की तरह दिखता हुआ-सा, जो पिछले रात की कान्ति से अधिक तेजस्वी, उत्तम और उत्कृष्ठतम थी।
तब रात बीतने पर जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण! और कल रात भी तुमसे मिलने कौन आया था? जो अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उपवन को रौशन करते हुए तुम्हारे पास गया, और तुम्हें अभिवादन कर तुम्हारी एक-ओर खड़ा हुआ, किसी महाअग्निपिंड की तरह दिखता हुआ-सा, जो पिछले रात की कान्ति से अधिक तेजस्वी, उत्तम और उत्कृष्ठतम थी?”
“वह तो, कश्यप, सहम्पति ब्रह्मा था, जो मेरे पास धम्म सुनने के लिए आया था।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। इसके पास सहम्पति ब्रह्मा धम्म सुनने के लिए आता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।
नाग के दमन और देवताओं के आगमन से भी उरुवेल कश्यप नहीं पिघला। लेकिन अब भगवान ने उनकी सबसे कमजोर नस दबाई—‘लोक-लाज’।
कश्यप ने एक विशाल ‘महायज्ञ’ का आयोजन किया था। अंग और मगध देश की सारी जनता उमड़ पड़ी थी। कश्यप की असुरक्षा की भावना बढ़ गयी, सोचते हुए, “अगर कल इतनी भीड़ के सामने इस महाश्रमण ने कोई चमत्कार दिखा दिया, तो… सारा सत्कार इसे मिलेगा और मैं कोने में खड़ा रह जाऊंगा। काश! यह कल न आए!”
भगवान ने उसके मन की यह ‘ओछी’ बात पढ़ ली। वे जानते थे कि कश्यप अभी अपनी ही ईर्ष्या में जल रहा है। इसलिए, उसे शर्मिंदा न करने के उद्देश्य से, भगवान ने उस दिन पृथ्वी से दूर जाने का निर्णय लिया।
वे उत्तरकुरु की ओर निकल गए। यह कोई साधारण मानवीय स्थान नहीं, बल्कि जम्बूद्वीप के उत्तर में स्थित यक्षों का देश है, जहाँ के राजा स्वयं महाराज वेस्सवण (कुबेर) हैं और जिसकी राजधानी ‘आलकमंदा’ के वैभव की कहानियाँ देवताओं में भी प्रचलित हैं। वहां से भिक्षाटन कर, भगवान विश्राम के लिए हिमालय की उन गहराइयों में गए जहाँ साधारण मनुष्य नहीं पहुँच सकते—अनोतत्त झील।
बौद्ध मान्यताओं के अनुसार, यह वह पवित्र झील है जो कैलाश, चित्रकूट और गन्धामादन जैसे पाँच महान पर्वत-शिखरों से घिरी हुई है। जहाँ सूर्य की सीधी किरणें कभी नहीं पड़तीं और जिसका जल अमृत समान शीतल है। यह वही स्थान है जहाँ युगों-युगों से सम्यक-सम्बुद्ध और अर्हंत स्नान और ध्यान करते आए हैं।
भगवान ने पूरा दिन उस दिव्य झील के किनारे शांति में बिताया, ताकि कश्यप असहज न हो। और चमत्कारों का सिलसिला कई दिन चलता रहा।
उस समय जटाधारी उरुवेल कश्यप ने महायज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें अङ्ग और मगध की सम्पूर्ण जनता उत्तम खाद्य और भोजन के साथ आकर उपस्थित होना चाह रही थी।
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप ने सोचा, “मैंने इस महायज्ञ का आयोजन किया है, जिसमें अङ्ग और मगध की सम्पूर्ण जनता उत्तम खाद्य और भोजन के साथ आकर उपस्थित होना चाह रही है। किन्तु यदि इस महाश्रमण ने महाजनता के सामने अपनी ऋद्धियाँ दिखा दी, तो सारा लाभ-सत्कार उसी को मिलेगा, और मुझे थोड़ा-सा मिलेगा। काश, वह कल न आए!”
तब भगवान ने अपने चित्त से जटाधारी उरुवेल कश्यप के चित्त के विचार जान लिए, और जाकर उत्तरकुरु में भिक्षाटन किया और उसे अनोतत्त झील में जाकर ग्रहण कर, वही दिन भर ध्यान-साधना की।
तब रात बीतने पर जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण! और, महाश्रमण, तुम कल क्यों नहीं आएँ? हमने तुम्हारे बारे में सोचा कि महाश्रमण क्यों नहीं आ रहा है? हमने तुम्हारे लिए उत्तम खाद्य और भोजन अलग रख दिया था।”
“किन्तु, कश्यप, क्या तुमने ऐसा नहीं सोचा था कि “मैंने इस महायज्ञ का आयोजन किया है, जिसमें अङ्ग और मगध की सम्पूर्ण जनता उत्तम खाद्य और भोजन के साथ आकर उपस्थित होना चाह रही है। किन्तु यदि इस महाश्रमण ने महाजनता के सामने अपनी ऋद्धियाँ दिखा दी, तो सारा लाभ-सत्कार उसी को मिलेगा, और मुझे थोड़ा-सा मिलेगा। काश, वह कल न आए!” तब मैंने अपने चित्त से तुम्हारे चित्त के विचार जान लिए, तब जाकर उत्तरकुरु में भिक्षाटन किया और उसे अनोतत्त झील में जाकर ग्रहण कर, वही दिन भर ध्यान-साधना की।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह अपने चित्त से दूसरों का चित्त जान लेता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।
उरुवेला में चमत्कार #६
उस समय भगवान को पंसुकूल (=त्यागे वस्त्र का चीथड़ा) प्राप्त हुआ था। तब भगवान को लगा, “मैं इस पंसुकूल को कहाँ धोऊँ?”
तब देवराज इन्द्र सक्क ने भगवान के चित्त के विचार जान लिए, और उसने आकर अपने हाथों से तालाब खोदकर, भगवान से कहा, “यहाँ, भंते, भगवान अपने पंसुकूल को धोएँ!”
तब भगवान को लगा, “मैं इस पंसुकूल को कहाँ पीटते हुए धोऊँ??”
तब देवराज इन्द्र सक्क ने भगवान के चित्त के विचार जान लिए, और उसने एक विशाल चट्टान रखकर, भगवान से कहा, “यहाँ, भंते, भगवान अपने पंसुकूल को पीटते हुए धोएँ!”
तब भगवान को लगा, “मैं क्या (आधार) पकड़ कर तालाब से बाहर आऊँ?”
तब अर्जुन वृक्ष के देवता ने भगवान के चित्त के विचार जान लिए, और उसने एक टहनी को झुकाते हुए कहा, “इसे, भंते, भगवान पकड़ कर तालाब से बाहर आएँ!”
तब भगवान को लगा, “मैं इस पंसुकूल को कहाँ सुखाऊँ?”
तब देवराज इन्द्र सक्क ने भगवान के चित्त के विचार जान लिए, और उसने एक विशाल चट्टान रखकर, भगवान से कहा, “यहाँ, भंते, भगवान अपने पंसुकूल को सुखाने के लिए डाले!”
तब रात बीतने पर जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण! किन्तु, महाश्रमण, ये सब क्या हुआ? पहले यहाँ कोई तालाब नहीं था, किन्तु अब यहाँ तालाब है। पहले यहाँ बड़ी चट्टाने नहीं थी। किसने इन चट्टानों को यहाँ रखा? पहले अर्जुन वृक्ष की टहनी इस तरह झुकी नहीं थी, किन्तु अब झुकी है?”
भगवान ने घटित हुआ सब बता दिया… तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। इसकी सेवा में तो देवराज इन्द्र सक्क तक हाजिर होता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।
उरुवेला में चमत्कार #७
तब रात बीतने पर जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण!”
भगवान ने कहा, “तुम जाओ, कश्यप। मैं आता हूँ।”
जटाधारी उरुवेल कश्यप को भेजकर, भगवान ने जाकर उसी जम्बूवृक्ष से जम्बूफल (=जामुन का फल) लिया, जिससे (भारतीय उपमहाद्वीप का नाम) ‘जम्बूद्वीप’ नाम पड़ा है, और पहले जाकर अग्निगार में बैठ गए।
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप ने आकर भगवान को देखा, तो उसने कहा, “महाश्रमण, तुम किस मार्ग से आएँ? मैं वहाँ से पहले निकला और तुम यहाँ पहले पहुँच गए।”
“कश्यप, मैंने जाकर उसी जम्बूवृक्ष से जम्बूफल लिया, जिससे ‘जम्बूद्वीप’ नाम पड़ा है, और आकर अग्निगार में बैठ गया। यह जम्बूफल, कश्यप, वर्णसंपन्न है, गंधसंपन्न है, रससंपन्न है। तुम्हें चाहिए तो खाओ!”
“नहीं चाहिए, महाश्रमण! तुम ही इसे खाने के काबिल (=अर्हंत) हो। तुम्हें ही इसे खाना चाहिए।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह जाकर उसी जम्बूवृक्ष से जम्बूफल ले आया, जिससे ‘जम्बूद्वीप’ नाम पड़ा है, और पहले आकर अग्निगार में बैठ गया। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।
उरुवेला में चमत्कार #८
तब रात बीतने पर जटाधारी उरुवेल कश्यप भगवान के पास गया और उनसे कहा, “भोजन का समय हुआ, महाश्रमण!”
भगवान ने कहा, “तुम जाओ, कश्यप। मैं आता हूँ।”
जटाधारी उरुवेल कश्यप को भेजकर, भगवान ने जाकर उसी जम्बूवृक्ष के कुछ दूरी पर आमवृक्ष से आम लिया… आमवृक्ष के कुछ दूरी पर आँवलावृक्ष से आँवला लिया… आँवलावृक्ष के कुछ दूरी पर हरड़वृक्ष से हरड़ लिया… तैतीस देवलोक जाकर (नन्दनवन में लगा) मूँगे का पुष्प लिया, और, पहले जाकर अग्निगार में बैठ गए।
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप ने आकर भगवान को देखा, तो उसने कहा, “महाश्रमण, आज तुम किस मार्ग से आएँ? मैं वहाँ से पहले निकला और तुम पुनः यहाँ पहले पहुँच गए।”
“कश्यप, मैंने तैतीस देवलोक जाकर मूँगे का पुष्प लिया, और आकर अग्निगार में बैठ गया। यह पुष्प, कश्यप, वर्णसंपन्न है, गंधसंपन्न है। तुम्हें चाहिए तो लो!”
“नहीं चाहिए, महाश्रमण! तुम ही इसे लेने के काबिल हो। तुम्हें ही इसे रखना चाहिए।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह तैतीस देवलोक जाकर मूँगे का पुष्प ले आया, और पहले आकर अग्निगार में बैठ गया। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप का दिया भोजन ग्रहण किया और उसी उपवन में विहार करते रहे।
उरुवेला में चमत्कार #९
उस समय जटाधारी साधूगण लकड़ियों को चीर न पाने से अग्निसेवा नहीं कर पा रहे थे।
तब उन जटाधारी साधूगण को लगा, “निश्चित, यह महाश्रमण की ऋद्धिप्रताप से है कि हम लकड़ियों को चीर न पाने से अग्निसेवा नहीं कर पा रहे हैं।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप को संबोधित किया, “कश्यप, फट जाएँ लकड़ियाँ?”
“हाँ फट जाएँ, महाश्रमण!”
और अचानक पाँच सौ लकड़ियाँ एक साथ फट गयी।
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह इस तरह लकड़ियों को फाड़ देता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
उस समय जटाधारी साधूगण अग्नि जला न पाने से अग्निसेवा नहीं कर पा रहे थे।
तब उन जटाधारी साधूगण को लगा, “निश्चित ही, यह महाश्रमण की ऋद्धिप्रताप से है कि हम अग्नि जला न पाने से अग्निसेवा नहीं कर पा रहे हैं।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप को संबोधित किया, “कश्यप, अग्नि जल जाएँ?”
“हाँ जल जाएँ, महाश्रमण!”
और अचानक पाँच सौ अग्नि एक साथ जल उठी।

तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह इस तरह अग्नि को जला देता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
उस समय जटाधारी साधूगण अग्निसेवा पूर्ण कर अग्नि को बुझा नहीं पा रहे थे।
तब उन जटाधारी साधूगण को लगा, “निश्चित ही, यह महाश्रमण की ऋद्धिप्रताप से है कि हम अग्निसेवा पूर्ण कर अग्नि को बुझा नहीं पा रहे हैं।”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप को संबोधित किया, “कश्यप, अग्नि बुझ जाएँ?”
“हाँ बुझ जाएँ, महाश्रमण!”
और अचानक पाँच सौ अग्नि एक साथ बुझ गयी।
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह इस तरह अग्नि को बुझा भी देता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
उस समय शीतऋतु के मध्य की ठंडी रात में, हिमपात के समय जटाधारी साधूगण नेरञ्जरा नदी में बार-बार डुबकियाँ लगाकर उठ रहे थे।
तब भगवान ने ऋद्धिरचना से पाँच सौ गरम तवे रख दिए, ताकि जल से निकलते ही जटाधारी स्वयं को ऊष्ण कर पाए।
तब उन जटाधारी साधूगण को लगा, “निश्चित ही, यह महाश्रमण की ऋद्धिप्रताप है कि यहाँ पाँच सौ गरम तवे रखे हैं, जो ऋद्धिरचना से बने हैं।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह इस तरह इतने सारे गरम तवे ऋद्धिरचना से बनाकर रख देता हैं। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
इस तरह, भगवान ने कुल साढ़े तीन हज़ार चमत्कार किए!
सोचिए, दस, बारह नहीं, भगवान ने उरुवेला में कुल साढ़े तीन हज़ार चमत्कार किए!
और हर चमत्कार के साथ, कश्यप की आँखों के सामने सत्य चमकता, लेकिन उसका अहंकार उसे ढक देता। लेकिन आश्रम का माहौल बदल रहा था। कश्यप के पाँच सौ शिष्य अंधे नहीं थे। वे रोज देख रहे थे कि कैसे प्रकृति और देवता, सब उस महाश्रमण के इशारों पर चलते हैं, जबकि उनके अपने गुरु की शक्तियाँ फीकी पड़ चुकी हैं। एक मूक तनाव हवा में तैर रहा था।
भगवान जानते थे कि अब समय आ गया है। ‘नरम’ चमत्कारों का समय बीत चुका था। अब एक जोरदार झटके की जरूरत थी—एक ऐसा ‘सत्य का आईना’, जो कश्यप के भ्रम को चकनाचूर कर दे।
और, एक दिन बेमौसम एक महामेघ ने महावृष्ठी करायी और बड़ी बाढ़ आयी। जिस स्थान पर भगवान रहते थे, वह स्थान पूर्णतः जल में समा गया।
तब भगवान ने अपनी ऋद्धि से जल को सभी दिशाओं में पीछे धकेल दिया, और बीच में सूखे भूमि पर चक्रमण करने लगे।
दूसरी ओर, जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “कही महाश्रमण बाढ़ में न बह जाएँ!”
वह बहुत से जटाधारियों के साथ नाँव लेकर भगवान के स्थान पर आया। और उसने देखा कि भगवान ने जल को सभी दिशाओं में पीछे धकेल दिया है, और बीच में सूखे भूमि पर चक्रमण कर रहे है।
तब उसने भगवान से कहा, “तुम ही हो, महाश्रमण?”
“हाँ, मैं हूँ, कश्यप!”
तब भगवान हवा में उड़कर नाँव में आ गए।

तब जटाधारी उरुवेल कश्यप को लगा, “यह महाश्रमण तो महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है। यह इस तरह जल को पीछे धकेल सकता है। किन्तु, खैर! वह मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।”
तब भगवान को लगा, “बहुत समय से यह निकम्मा पुरुष यही सोचता है कि ‘महाश्रमण महाऋद्धिमानी, महाप्रतापी है, किन्तु मेरे जैसा अर्हंत नहीं है।’ क्यों न अब इस जटाधारी में संवेग जगाऊँ!”
तब भगवान ने जटाधारी उरुवेल कश्यप से कहा, “तुम अर्हंत नहीं हो, कश्यप, और न ही अर्हंतमार्ग पर स्थित हो। तुम्हारे पास कोई साधनामार्ग नहीं है, जो तुम्हें अर्हंत बनाएँ या अर्हंतमार्ग पर स्थित करे।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप ने भगवान के चरणों में अपना सिर रख दिया और कहा:
“भंते, मुझे भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
“कश्यप, तुम पाँच सौ जटाधारी साधुओं के नायक हो, मार्गदर्शक हो, अग्र हो, प्रमुख हो, मुखिया हो। उन्हें पहले सूचित करो, ताकि उन्हें जैसा उचित लगे, वे करें।”
तब जटाधारी उरुवेल कश्यप उन जटाधारी साधुगण के पास गया, और कहा, “श्रीमानो! मेरी इच्छा है कि मैं महाश्रमण के ब्रह्मचर्य धारण करूँ। आप श्रीमानो को जैसा उचित लगे, वैसा करें।”
(उन्होंने उत्तर दिया,) “श्रीमान, हमें चिरकाल से उस महाश्रमण पर आस्था जड़ चुकी है। यदि आप महाश्रमण का ब्रह्मचर्य धारण करेंगे, तो हम सभी महाश्रमण का ब्रह्मचर्य धारण करेंगे!”
तब उन जटाधारियों ने अपने केशमिश्रण, जटामिश्रण, डंडा-बोरी और अग्निपुजा-सामान को नदी में बहा दिया, और भगवान के पास आएँ। भगवान के चरणों में सिर रखकर उन्होंने भगवान से याचना की:
“भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
“आओ, भिक्षु!” भगवान ने कहा, “यह स्पष्ट बताया धम्म है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।”
और इस तरह, उन सभी आयुष्मानों की उपसंपदा संपन्न हुई।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। नेरञ्जरा नदी अब केवल पानी नहीं, बल्कि एक क्रांति का संदेश लेकर बह रही थी।
उरुवेल कश्यप और उनके ५०० शिष्यों ने अपने सिर मुंडा लिए थे और अपनी वर्षों पुरानी जटाओं (केश), डंडों और अग्नि-पूजा के बर्तनों को नदी में बहा दिया था। नदी की धारा में बहती हुई ये चीजें जब निचले इलाके में पहुँचीं, तो वहाँ हड़कंप मच गया।

तब जटाधारी नदी कश्यप ने केशमिश्रण, जटामिश्रण, डंडा-बोरी और अग्निपुजा-सामान को नदी में बहते देखा।
उसने कहा, “मेरा भाई ठीक तो है?”
उसने जटाधारियों को भेजा, “जाओ, मेरे भाई का पता लगाओ।”
तब (पता चलने पर) वह तीन सौ जटाधारियों के साथ उरुवेल कश्यप के पास गया, और आयुष्मान उरुवेल कश्यप से कहा,
“क्या ये श्रेष्ठ (बेहतर) है, कश्यप?”
“हाँ, मित्र, ये श्रेष्ठ है।”
तब उन जटाधारियों ने अपने केशमिश्रण, जटामिश्रण, डंडा-बोरी और अग्निपुजा-सामान को नदी में बहा दिया, और भगवान के पास आएँ। भगवान के चरणों में सिर रखकर उन्होंने भगवान से याचना की:
“भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
“आओ, भिक्षु!” भगवान ने कहा, “यह स्पष्ट बताया धम्म है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।”
और इस तरह, उन सभी आयुष्मानों की उपसंपदा संपन्न हुई।
गया कश्यप
तब जटाधारी गया कश्यप ने केशमिश्रण, जटामिश्रण, डंडा-बोरी और अग्निपुजा-सामान को नदी में बहते देखा।
उसने कहा, “मेरे भाई ठीक तो हैं?”
उसने जटाधारियों को भेजा, “जाओ, मेरे भाइयों का पता लगाओ।”
तब (पता चलने पर) वह दो सौ जटाधारियों के साथ उरुवेल कश्यप के पास गया, और आयुष्मान उरुवेल कश्यप से कहा, “क्या ये श्रेष्ठ है, कश्यप?”
“हाँ मित्र, ये श्रेष्ठ है।”
तब उन जटाधारियों ने अपने केशमिश्रण, जटामिश्रण, डंडा-बोरी और अग्निपुजा-सामान को नदी में बहा दिया, और भगवान के पास आएँ। भगवान के चरणों में सिर रखकर उन्होंने भगवान से याचना की:
“भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
“आओ, भिक्षु!” भगवान ने कहा, “यह स्पष्ट बताया धम्म है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।”
और इस तरह, उन सभी आयुष्मानों की उपसंपदा संपन्न हुई।
अब दृश्य बदल चुका था। उरुवेला के वे १००० जटाधारी, जो कल तक ‘अग्नि’ को ही मुक्ति का साधन मानते थे, अब शांत भिक्षु बन चुके थे।
भगवान जानते थे कि इन लोगों ने अपना पूरा जीवन अग्नि की पूजा और सेवा में बिताया है; अग्नि से इनका नाता बहुत पुराना और गहरा है। इसलिए, एक कुशल वैद्य की तरह, भगवान ने उसी ‘अग्नि’ को माध्यम बनाया जो कल तक उनका बंधन थी, ताकि आज वही उनकी मुक्ति का द्वार बन सके।
भगवान उन्हें गया-शीर्ष पहाड़ी पर ले गए। और वहाँ ऐसा ऐतिहासिक उपदेश दिया, जिसे दुनिया ‘आदित्य-परियाय सुत्त’ के नाम से जानती है। भगवान ने उनके पुराने ‘अग्नि-निमित्त’ का ही उपयोग करते हुए बताया कि कैसे वे राग, द्वेष और मोह की अदृश्य आग में जल रहे हैं।
तब भगवान ने उन भिक्षुओं को संबोधित किया—
“भिक्षुओं, सब कुछ धधक रहा हैं। क्या सब कुछ धधक रहा हैं?
- आँखे धधक रही है, रूप धधक रहे हैं, आँखों का विज्ञान धधक रहा है, आँखों पर संस्पर्श धधक रहा है, और आँखों पर संस्पर्श से जो वेदना होती है—सुखद, दुःखद या अदुःखदसुखद—वह भी धधक रहा है। किससे धधक रहा है?
मैं कहता हूँ राग-अग्नि से धधक रहा है, द्वेष-अग्नि से धधक रहा है, मोह-अग्नि से धधक रहा है; जन्म, बुढ़ापा और मौत से, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा से धधक रहा है।
- कान धधक रहा है, आवाज धधक रही हैं…
- नाक धधक रहा है, गन्ध धधक रहे हैं…
- जीभ धधक रही है, स्वाद धधक रहे हैं…
- काया धधक रही है, संस्पर्श धधक रहे हैं…
- मन धधक रहा है, धम्म धधक रहे हैं, मन का विज्ञान धधक रहा है, मन पर संस्पर्श धधक रहा है, और मन पर संस्पर्श से जो वेदना होती है—सुखद, दुःखद या अदुःखदसुखद—वह भी धधक रहा है। किससे धधक रहा है?
मैं कहता हूँ राग-अग्नि से धधक रहा है, द्वेष-अग्नि से धधक रहा है, मोह-अग्नि से धधक रहा है; जन्म, बुढ़ापा और मौत से, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा से धधक रहा है।
ऐसा देखकर, भिक्षुओं, धम्म सुने आर्यश्रावक का—
- आँखों से मोहभंग होता है, रूपों से मोहभंग होता है, आँखों के विज्ञान से मोहभंग होता है, आँखों पर होते संस्पर्श से मोहभंग होता है, और आँखों पर संस्पर्श से जो वेदना होती है—सुखद, दुःखद या अदुःखदसुखद—उससे भी मोहभंग होता है।
- कान से मोहभंग होता है, आवाज से मोहभंग होता है…
- नाक से मोहभंग होता है, गन्ध से मोहभंग होता है…
- जीभ से मोहभंग होता है, स्वाद से मोहभंग होता है…
- काया से मोहभंग होता है, संस्पर्श से मोहभंग होता है…
- मन से मोहभंग होता है, धम्म से मोहभंग होता है, मन के विज्ञान से मोहभंग होता है, मन पर होते संस्पर्श से मोहभंग होता है, और मन पर संस्पर्श से जो वेदना होती है—सुखद, दुःखद या अदुःखदसुखद—उससे भी मोहभंग होता है।
मोहभंग होने से विराग होता है। विराग होने से विमुक्त होता है। विमुक्ति से ज्ञात होता है, ‘विमुक्त हुआ!’ और पता चलता है, ‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’"
और जब यह स्पष्टीकरण दिया जा रहा था, तब सभी एक हजार भिक्षुओं का चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ।
इतिहास में ऐसा क्षण न कभी आया था, न शायद कभी आएगा। कल्पना कीजिए गया-शीर्ष की वह पहाड़ी… जहाँ एक ही उपदेश से एक साथ एक ही समय १००० भिक्षुओं के चित्त के सारे बंधन टूट गए।
यह कोई साधारण घटना नहीं थी। यह उस ‘सम्यक-सम्बुद्ध’ के वचनों का प्रताप था, जिनका इस लोक में उत्पन्न होना ही ‘दुर्लभ’ है (“दुल्लभो बुद्धुप्पादो”)।
जब भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध अपने महाप्रभाव से बोलते हैं, तो शब्द केवल कानों तक नहीं जाते, बल्कि वे सीधे हृदय के अतल में उतरकर अविद्या की जड़ों को काट देते हैं। एक ही झटके में एक हजार दीयों का जल उठना—यह आध्यात्मिक जगत का सबसे ‘अनसुना’ और महाविस्मयकारी चमत्कार था।
अब उरुवेला में १००० ‘क्षिणास्रव’ (जिनके सारे आस्रव क्षीण हो गए हैं) अर्हंतों की एक विशाल, शांत और तेजस्वी सेना तैयार थी। भगवान ने अपनी इस ‘आर्य-सेना’ के साथ मगध की राजधानी राजगृह की ओर प्रस्थान किया।
जब यह काफिला राजगृह के ‘लट्ठवन’ में पहुँचा, तो पूरे मगध में हलचल मच गई। हवाओं में बस एक ही चर्चा थी—“सुना है? उरुवेल कश्यप आ गए हैं! लेकिन… वे तो अपने जटाधारी शिष्यों के साथ मुंडित-मस्तक श्रमण बन गए हैं!”
यह खबर जंगल की आग की तरह राजमहल तक पहुँची। मगधराज सेनिय बिम्बिसार, जो वर्षों से ऐसे ही किसी महापुरुष की प्रतीक्षा में थे, अपने एक लाख बीस हजार ब्राह्मणों और गृहपतियों की विशाल भीड़ के साथ दर्शन को उमड़ पड़े। और वहाँ ऐसी विस्मयकारी घटना घटी, जिसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता।
तब भगवान को गया शीर्ष में जितना रुकना था, उतना रुके, और फिर एक हजार भिक्षुओं, जो पहले जटाधारी साधू थे, के विशाल संघ के साथ (मगध की राजधानी) राजगृह की ओर चल पड़े।
अंततः वे क्रमशः भ्रमणचर्या करते हुए राजगृह तक पहुँच गए। तब भगवान ने राजगृह के लट्ठवन में सुप्रतिष्ठित चेतिय में विहार किया।
मगध के महाराज सेनिय बिम्बिसार को सूचित किया गया—“श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रज्यित हैं, राजगृह में पहुँच कर लट्ठवन के सुप्रतिष्ठित चेतिय में विहार कर रहे है। और उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान! वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो। और ऐसे अर्हन्तों का दर्शन वाकई शुभ होता है।’
तब मगधराज सेनिय बिम्बिसार मगध के एक लाख बीस हजार ब्राह्मणों और (वैश्य) गृहस्थों को लेकर भगवान के पास गया, और भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया।
मगध के एक लाख बीस हजार ब्राह्मणों और गृहस्थों में से कुछ ने भगवान को अभिवादन किया, और एक-ओर बैठ गए। कुछ ब्राह्मणों और गृहस्थों ने भगवान से नम्रतापूर्ण वार्तालाप किया, और एक-ओर बैठ गए। कुछ ब्राह्मणों और गृहस्थों ने हाथ जोड़कर अंजलिबद्ध वंदन किया, और एक-ओर बैठ गए। कोई ब्राह्मणों और गृहस्थों ने भगवान को अपना नाम-गोत्र बताया, और एक-ओर बैठ गए। और कोई ब्राह्मण और गृहस्थ चुपचाप ही एक-ओर बैठ गए।
और, मगध के एक लाख बीस हजार ब्राह्मण और गृहस्थ (अचरज में) सोचने लगे:
“यह महाश्रमण उरुवेल कश्यप का ब्रह्मचर्य पालन कर रहा है, अथवा उरुवेल कश्यप महाश्रमण का ब्रह्मचर्य पालन कर रहा है?”…
… तब आयुष्मान उरुवेल कश्यप अपने आसन से उठा, और एक कन्धे पर चीवर कर भगवान के चरणों में अपना सिर लगाते हुए कहा, “भंते, भगवान मेरे शास्ता है! मैं भगवान का शिष्य हूँ! भगवान मेरे शास्ता है! मैं भगवान का शिष्य हूँ!”
तब, मगध के उन एक लाख बीस हजार ब्राह्मणों और गृहस्थों को पता चला कि ‘दरअसल उरुवेल कश्यप, महाश्रमण का ब्रह्मचर्य पालन कर रहा है।’
तब भगवान ने अपने चित्त से मगध के उन एक लाख बीस हजार ब्राह्मणों और गृहस्थों के चित्त के विचार जान लिए, और उन्हें अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि उनका तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।
जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह मगधराज सेनिय बिम्बिसार के साथ मगध के एक लाख दस हजार ब्राह्मणों और गृहस्थों को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”
और बचे दस हजार (जिन्हें धम्मचक्षु उत्पन्न न हुआ) ने उपासकत्व की घोषणा की।
जरा रुकिए और उस क्षण की विशालता को महसूस कीजिए। एक हजार नहीं, दस हजार नहीं, बल्कि एक लाख दस हजार (१,१०,०००) लोग एक साथ, एक ही समय, एक ही स्थान पर अविद्या की नींद से जाग उठे!
यह कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह ‘बुद्ध-बल’ का वह अचिन्त्य और अनंत प्रभाव था, जिसकी कल्पना करना भी हम जैसों के लिए कठिन है। कैसे एक व्यक्ति की वाणी इतने सारे हृदयों के अंधकार को एक साथ चीर सकती है? यह इस बात का प्रमाण था कि जब सूर्य उगता है, तो अंधेरा यह नहीं पूछता कि मैं कहाँ जाऊँ—वह बस मिट जाता है। उसी तरह, भगवान की उपस्थिति मात्र से मगध के एक लाख से अधिक लोगों को ‘धम्मचक्षु’ प्राप्त हुआ—यानी वे ‘श्रोतापन्न’ बन गए, मुक्ति की धारा में उतर गए।
और उन भाग्यशाली लोगों में सबसे आगे खड़े थे—मगधराज सेनिय बिम्बिसार।
तब धम्म देख चुका, धम्म पा चुका, धम्म जान चुका, धम्म में गहरे उतर चुका मगधराज सेनिय बिम्बिसार संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए। तब उसने भगवान से कहा:
“भंते, जब पहले मैं राजकुमार था, तब मेरी पाँच इच्छाएँ थी, जो अब पूर्ण हो चुकी हैं। जब मैं पहले राजकुमार था, तो सोचता था:
- ‘अरे! काश, मेरा राजतिलक कर मुझे राजा बना दिया जाए!’ यह मेरी पहली इच्छा थी, जो अब पूर्ण हो चुकी है।
- ‘मेरे साम्राज्य में ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ आएँ!’ यह मेरी दूसरी इच्छा थी, जो अब पूर्ण हो चुकी है।
- ‘मैं उस भगवान का दर्शन ले सकूँ!’ यह मेरी तीसरी इच्छा थी, जो अब पूर्ण हो चुकी है।
- ‘वे भगवान मुझे धम्म उपदेश करें!’ यह मेरी चौथी इच्छा थी, जो अब पूर्ण हो चुकी है।
- ‘मैं भगवान के धम्म उपदेश को समझ जाऊँ!’ यह मेरी पाँचवी इच्छा थी, जो अब पूर्ण हो चुकी है।
अतिउत्तम, गुरु गौतम! अतिउत्तम, गुरु गौतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! भगवान मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!
और, भंते, भगवान कल भिक्षुसंघ के साथ मेरा भोजन स्वीकार करें।”
भगवान ने मौन रहकर स्वीकृति दी।
तब भगवान की स्वीकृति जान कर, मगधराज सेनिय बिम्बिसार आसन से उठकर भगवान को अभिवादन करते हुए, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया।
यह केवल एक राजा का बुद्ध के धम्म को अपनाना नहीं था, बल्कि इतिहास के सबसे महान और समर्पित ‘उपासक’ का जन्म था।
बिम्बिसार ने अपना शेष जीवन भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। वे केवल स्वयं बौद्ध नहीं बने, बल्कि उन्होंने अपने प्रभाव से कई अन्य राजाओं और साम्राज्यों को भी भगवान के चरणों तक पहुँचाया। उनका समर्पण इतना गहरा था कि वे अक्सर भगवान के सुख-दुःख की चिंता एक सेवक की तरह करते थे।
और अपनी इसी भक्ति का पहला प्रमाण उन्होंने अगले ही दिन दिया।
बिम्बिसार का दान
रात बीतने पर मगधराज सेनिय बिम्बिसार ने अपने राजमहल पर उत्तम खाद्य और भोजन बनाकर, भगवान से विनंती की, “उचित समय है, हे गौतम! भोजन तैयार है।”
तब सुबह होने पर भगवान ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर, एक हजार भिक्षुओं, जो पूर्व जटाधारी थे, के विशाल संघ के साथ राजगृह में प्रवेश किया।
तब, देवराज इन्द्र सक्क ने अपनी ऋद्धिरचना से युवा-ब्राह्मण का रूप लिया, और बुद्ध के नेतृत्व में चल रहे भिक्षुसंघ के आगे-आगे चलते हुए ये गाथाएँ गाने लगा:
"सभ्य, पूर्व-जटाधारी सभ्यों के साथ,
विमुक्त, विमुक्तों के साथ,
स्वर्णिम वर्ण के भगवान ने,
राजगृह में प्रवेश किया।
मुक्त, पूर्व-जटाधारी मुक्तों के साथ,
विमुक्त, विमुक्तों के साथ,
स्वर्णिम वर्ण के भगवान ने
राजगृह में प्रवेश किया।
सन्त, पूर्व-जटाधारी संतों के साथ,
विमुक्त, विमुक्तों के साथ,
स्वर्णिम वर्ण के भगवान ने
राजगृह में प्रवेश किया।
दस-वासी, दस-बल,
दस-धम्मों के जानकार,
दस-गुणों से युक्त,
दस-सौ के परिवार सहित,
राजगृह में प्रवेश किया।"
लोगों ने देवराज इन्द्र सक्क को देखकर कहने लगे, “कितना रूपवान है यह युवा-ब्राह्मण! कितना दर्शनीय है यह युवा-ब्राह्मण! कितना विश्वसनीय है यह युवा-ब्राह्मण! कौन है यह युवा-ब्राह्मण?”
ऐसा कहे जाने पर, देवराज इन्द्र सक्क ने उन लोगों से गाथाओं में कहा —
"जो ज्ञानी हैं, सभ्य सभी तरह से,
शुद्ध, अद्वितीय, सुगत, अर्हंत इस लोक में,
मैं उनका ही सेवक हूँ!"
तब भगवान मगधराज सेनिय बिम्बिसार के राजमहल गए और विशाल भिक्षुसंघ के साथ बिछे आसन पर बैठ गये।
तब मगधराज सेनिय बिम्बिसार ने भगवान और भिक्षुसंघ को स्वयं अपने हाथों से उत्तम खाद्य और भोजन परोस कर संतृप्त किया, संतुष्ट किया। भगवान के भोजन कर पात्र से हाथ हटाने के पश्चात, मगधराज सेनिय बिम्बिसार ने स्वयं का आसन नीचे लगाया और एक ओर बैठ गया।
एक ओर बैठकर मगधराज सेनिय बिम्बिसार ने सोचा, “भगवान कहाँ विहार करेंगे? ऐसी जगह, जो गाँव से बहुत दूर न रहे, बहुत पास भी न रहे, जो जाने-आने में सुविधाजनक हो, जो भगवान के दर्शनार्थ लोगों के लिए भी सुलभ हो, जहाँ दिन में कम लोग, और रात में कम आवाज, कम शोर, शान्तिमय हो, लोगों से वीरान, एकांतवास के लिए उपयुक्त हो।”
तब मगधराज सेनिय बिम्बिसार को लगा, “मेरा वेणुवन उद्यान ऐसी ही जगह है, जो गाँव से बहुत दूर है, न बहुत पास है, जो जाने-आने में सुविधाजनक है, जो भगवान के दर्शनार्थ लोगों के लिए भी सुलभ होगा, जहाँ दिन में कम लोग, और रात में कम आवाज, कम शोर, शान्तिमय है, जो लोगों से वीरान, एकांतवास के लिए उपयुक्त है।
क्यों न मैं अपने वेणुवन उद्यान को बुद्ध के नेतृत्व में भिक्षुसंघ को दे दूँ?”
तब मगधराज सेनिय बिम्बिसार ने अपनी राजसी स्वर्ण-थाली को लेकर भगवान को अर्पण करते हुए कहा:
“भंते, मैं वेणुवन उद्यान को बुद्ध के नेतृत्व में भिक्षुसंघ को देता हूँ!”
भगवान ने उस उद्यान का स्वीकार किया।
और, भगवान ने मगधराज सेनिय बिम्बिसार को धम्म-चर्चा से निर्देशित किया, उत्प्रेरित किया, उत्साहित किया, हर्षित किया, और आसन से उठकर चले गए।
तब इस कारण, इस प्रकरण से भगवान ने भिक्षुओं को धम्मकथा प्रदान की और संबोधित करते हुए कहा, “भिक्षुओं, मैं विहार की अनुमति देता हूँ!”
वेणुवन का यह दान केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं था; यह बौद्ध संघ के इतिहास में एक ‘क्रांति’ थी।
इस पल से पहले, भिक्षु संघ का कोई ठिकाना नहीं था। वे सच्चे अर्थों में ‘अनागारिक’ (बेघर) थे—कभी घने वनों में, तो कभी खुले आकाश के नीचे रात बिताते थे। धूप, बारिश और ठंड सहते हुए वे धर्म का आचरण करते थे। लेकिन राजा बिम्बिसार की दूरदर्शिता और श्रद्धा ने संघ के लिए एक ‘स्थायी आश्रय’ (विहार) का द्वार खोल दिया।
राजा बिम्बिसार द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज २६०० साल बाद भी जीवित है। आज भी, जब कोई पुण्यशाली उपासक या उपासिका संघ के लिए विहार, कुटी या मठ का निर्माण करवाता है, तो वे अनजाने में ही सही, लेकिन मगधराज बिम्बिसार के उसी ऐतिहासिक कदम को दोहरा रहे होते हैं। यह एक ऐसा पुण्य है जो ईंट-पत्थरों से परे, धर्म की नींव को मजबूत करता है।
उधर राजा बिम्बिसार ने अपनी संपत्ति दान की, और इधर उनकी राजधानी राजगृह की गलियों में दो ऐसे तपस्वी घूम रहे थे जो अपना ‘जीवन’ दान करने को तैयार थे। ये थे—उपतिस्स (जो बाद में सारिपुत्त बने) और कोलित (जो बाद में महामोग्गलान बने)।
ये दोनों बचपन के मित्र थे, कुलीन ब्राह्मण परिवारों से थे, और उस समय के प्रसिद्ध संशयवादी गुरु संजय बेलट्ठिपुत्त के शिष्य थे। लेकिन इनके भीतर सत्य की प्यास इतनी गहरी थी कि इन्हें न तो धन रोक पाया, न ही गुरु का अधूरा ज्ञान। इन्होंने आपस में एक समझौता किया था—“हम दोनों में से जिसे भी पहले ‘अमृत’ मिलेगा, वह दूसरे को तुरंत बताएगा!”
अब यहाँ एक गहरा विरोधाभास देखिए।
अभी हमने उरुवेल कश्यप को देखा था। कश्यप को झुकाने के लिए भगवान को ३,५०० चमत्कार दिखाने पड़े, नागों का दमन करना पड़ा और अंत में कठोर शब्दों में फटकारना पड़ा। क्योंकि कश्यप के भीतर अहंकार की एक मोटी दीवार थी।
लेकिन सारिपुत्त और मोग्गल्लान? उनका चित्त उस सूखी लकड़ी की तरह था, जिसे जलने के लिए बस एक चिंगारी काफी थी। न कोई चमत्कार, न कोई लंबी बहस, न कोई अहंकार। मानो वे सहजता और विनम्रता की मूर्ति हो।
एक सुबह, उपतिस्स (सारिपुत्त) ने राजगृह की सड़क पर एक भिक्षु को भिक्षाटन करते देखा। वे भिक्षु और कोई नहीं, बल्कि पञ्चवर्गीय भिक्षुओं में से एक—आयुष्मान अस्सजि थे।
अस्सजि की चाल में गजब की शांति थी। सारिपुत्त, जो स्वयं एक विद्वान थे, उस भिक्षु को देखते ही समझ गए कि यह व्यक्ति साधारण नहीं है।
उस समय, परिव्राजक सञ्चय अपने ढ़ाई-सौ के विशाल परिव्राजक-परिषद के साथ राजगृह में रहता था।
उस समय, सारिपुत्त और मोग्गल्लान परिव्राजक सञ्चय का ब्रह्मचर्य पालन करते थे। उन दोनों ने आपस में सहमति बना रखी थी, “जिसे पहले अमृत मिले, वह दूसरे को बताएँ।”
उस समय सुबह होने पर आयुष्मान अस्सजि चीवर ओढ़, पात्र लेकर भिक्षाटन के लिए राजगृह में प्रवेश किया। उनका आचरण आस्था जगाने वाला था—आगे बढ़ते और लौट आते हुए, नज़र टिकाते और नज़र हटाते हुए, (अंग) सिकोड़ते और पसारते हुए, झुकी आँखें और बेहतरीन काया-संचालन (ईर्यापथ) संपन्न।
तब, परिव्राजक सारिपुत्त ने आयुष्मान अस्सजि को भिक्षाटन के लिए राजगृह में भटकते देखा। उनका आचरण आस्था जगा रहा था—आगे बढ़ते और लौट आते हुए, नज़र टिकाते और नज़र हटाते हुए, सिकोड़ते और पसारते हुए, झुकी आँखें और बेहतरीन काया-संचालन संपन्न।
ऐसा देखकर उसे लगा, “इस लोक में जो अर्हंत हैं या अर्हंतमार्ग पर स्थित हैं, हो न हो, यह भिक्षु उनमें से एक हैं। क्यों न मैं इस भिक्षु के पास जाऊँ और पुछूँ, ‘तुम किसे उद्देश्य कर प्रव्रज्यित हुए हो, मित्र? कौन हैं तुम्हारे शास्ता? तुम्हें किसके धम्म में रुचि है?’”
किन्तु परिव्राजक सारिपुत्त को लगा, “भिक्षु को पुछने का यह समय उचित नहीं है, जब वह बस्ती में भिक्षाटन के लिए भटक रहा हो। क्यों न मैं इस भिक्षु के पीछे-पीछे चलते रहूँ? मार्ग ढूँढने वाले को राह मिल जाएगी!”
तब आयुष्मान अस्सजि राजगृह से भिक्षाटन करने पर भिक्षा लेकर लौट गए।
तब परिव्राजक सारिपुत्त आयुष्मान अस्सजि के पास गया, और मैत्रीपूर्ण वार्तालाप किया। प्रसन्न वार्तालाप कर, एक-ओर खड़ा होकर उसने आयुष्मान अस्सजि से कहा:
“मित्र, तुम्हारे इंद्रिय प्रसन्न हैं। तुम्हारी त्वचा परिशुद्ध और तेजस्वी है। तुम किसे उद्देश्य कर प्रव्रज्यित हुए हो, मित्र? कौन हैं तुम्हारे शास्ता? तुम्हें किसके धम्म में रुचि है?”
“शाक्यपुत्र महाश्रमण, जो शाक्य-कुल से प्रव्रज्यित है, मैं उन भगवान को उद्देश्य कर प्रव्रज्यित हुआ हूँ। वही भगवान मेरे शास्ता है। और मुझे उस भगवान के धम्म में रुचि है।”
“किन्तु, उस शास्ता का वाद (सीख, सिद्धान्त) क्या है? वे क्या उपदेश करते है?”
“मित्र, मैं नया हूँ। मुझे प्रव्रज्या लिए अधिक समय नहीं हुआ। इस धम्म-विनय में नया-नया आया हूँ, इसलिए मैं तुम्हें विस्तार से धम्म नहीं बता पाऊँगा। किन्तु, मैं तुम्हें संक्षिप्त में धम्म बता सकता हूँ।”
तब, परिव्राजक सारिपुत्त ने आयुष्मान अस्सजि से कहा, “होगा, मित्र:
थोड़े में बताओ या विस्तार से,
बस, मुझे अर्थ बताओ!
मेरा अर्थ से ही अर्थ है।
लंबे विवरण से क्या होगा?”
तब, आयुष्मान अस्सजि ने परिव्राजक सारिपुत्त को यह धम्म-सूत्र बताया:
“जो धम्म कारण से उत्पन्न हैं,
तथागत उनका कारण बताते हैं,
साथ ही, उनका निरोध बताते हैं।
बस, यही महाश्रमण का वाद है!”
जैसे ही ये शब्द सारिपुत्त के कानों में पड़े, उनके भीतर एक विस्फोट हुआ। यह कोई साधारण कविता नहीं थी; यह ब्रह्मांड के संचालन का सबसे गुप्त सूत्र था।
सारिपुत्त अब तक जिस गुरु (संजय वेलट्ठिपुत्त) के पास रहे थे, वे कहते थे कि “सत्य को जाना नहीं जा सकता” (संशयवाद) या यह कि “सुख-दुःख भाग्य से मिलते हैं, हम कुछ नहीं कर सकते” (नियतिवाद)।
लेकिन इस गाथा ने घोषणा कर दी कि जीवन कोई ‘जुआ’ या ‘भाग्य’ नहीं है। इसने बताया कि जो कुछ भी हम अनुभव कर रहे हैं—सुख, दुःख, अस्तित्व—वह ‘हेतु’ (कारण) से उत्पन्न हुआ है। और सबसे बड़ी क्रांतिकारी बात यह थी—यदि किसी चीज़ का ‘कारण’ है, तो उस कारण को हटाकर उसे ‘रोका’ (निरोध) भी जा सकता है!
यही वह चाबी थी जिसे सारिपुत्त जन्मों से ढूँढ रहे थे। इसका अर्थ था कि मुक्ति संभव है और वह हमारे हाथ में है। न कोई ईश्वर, न कोई भाग्य, न कोई अमर आत्मा—बस कारण और परिणाम की शृंखला। यदि अविद्या का कारण मिटा दिया जाए, तो दुखों का चक्र टूट जाएगा।
परिव्राजक सारिपुत्त को यह धम्म-सूत्र सुनते ही धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”
यही धम्म है, बस इतना ही!
पर्याप्त है अ-शोक पद पाने के लिए!
किन्तु, जो अदृश्य बना रहता है,
असंख्य कल्प बीत जाते हैं।
सारिपुत्त ने अमृत चख लिया था। इस ‘अमृत-पान’ से उनका रूप ही बदल गया—चेहरे पर एक अलौकिक तेज और इंद्रियों में परम शांति आ गई।
फिर क्या था? उन्हें अपने दोस्त को किया वादा निभाना था। वे बिना एक पल गँवाए निकल पड़े।
तब, परिव्राजक सारिपुत्त परिव्राजक मोग्गल्लान के पास गया। परिव्राजक मोग्गल्लान ने परिव्राजक सारिपुत्त को दूर से आते देखा, और कह पड़ा:
“तुम्हारे इंद्रिय प्रसन्न हैं, मित्र, और तुम्हारी त्वचा परिशुद्ध और तेजस्वी है। कही ऐसा तो नहीं कि तुमने अमृत पा लिया हो?”
“हाँ, मित्र! मैंने अमृत पा लिया है!”
“किन्तु, मित्र, तुमने अमृत को कैसे पा लिया?”
(तब, परिव्राजक सारिपुत्त ने परिव्राजक मोग्गल्लान को सारी घटनाएँ विवरण से बतायी… और जब ये कहा,)
"जो धम्म कारण से उत्पन्न हैं,
तथागत उनका कारण बताते है,
साथ ही, उनका निरोध बताते है,
बस, यही महाश्रमण का वाद है!"
परिव्राजक मोग्गल्लान को (भी) यह धम्म-सूत्र सुनते ही धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”
यही धम्म है, बस इतना ही!
पर्याप्त है अ-शोक पद पाने के लिए!
किन्तु, जो अदृश्य बना रहता है,
असंख्य कल्प बीत जाते हैं।
सत्य मिल चुका था। अब पुराने गुरु (संजय) के पास रहने का कोई अर्थ नहीं था। लेकिन सारिपुत्त और मोग्गलान अकेले नहीं जाना चाहते थे।
अब बारी थी अपने पुराने गुरु, संजय बेलट्ठिपुत्त, को सूचित करने की। यह एक बहुत ही भावुक और तनावपूर्ण क्षण था।
संजय के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी। उसके दो सबसे अनमोल रत्न, जो उसके संघ की शोभा थे, उसे छोड़कर जा रहे थे। उसने उन्हें रोकने के लिए आखिरी दांव खेला, लेकिन जिन्होंने ‘अमृत’ चख लिया हो, उन्हें ‘कांच के टुकड़ों’ का लालच कैसे रोक सकता था?
यह आघात इतना प्रचंड था कि संजय का शरीर और मन इसे झेल नहीं पाया।
तब, परिव्राजक मोग्गल्लान ने परिव्राजक सारिपुत्त से कहा, “चलो, मित्र, उस भगवान के पास! वे ही हमारे शास्ता है!”
“किन्तु, मित्र, जो ढ़ाई-सौ परिव्राजक निश्रय के लिए हमारी ओर देखकर रहते हैं, उन्हें भी बताना चाहिए। ताकि उन्हें जो उचित लगे, वे करें।”
तब सारिपुत्त और मोग्गल्लान उन परिव्राजकों के पास गए, और उन्हें कहा, “हम दोनों भगवान के पास जा रहे हैं! वे ही हमारे शास्ता है!”
(उन्होंने जवाब दिया:) “किन्तु, हम निश्रय के लिए आप आयुष्मान की ओर देखकर रहते हैं। यदि आप दोनों आयुष्मान महाश्रमण का ब्रह्मचर्य पालन करेंगे, तो हम सभी महाश्रमण का ब्रह्मचर्य पालन करेंगे।”
तब सारिपुत्त और मोग्गल्लान परिव्राजक सञ्चय के पास गए, और उसे कहा, “हम दोनों भगवान के पास जा रहे हैं! वे ही हमारे शास्ता है!”
(उसने कहा:) “मत जाओ, मित्रों! हम तीनों इस सभा को मिलकर चलाएँगे!”
दूसरी बार… और तीसरी बार सारिपुत्त और मोग्गल्लान ने परिव्राजक सञ्चय से कहा, “हम दोनों भगवान के पास जा रहे हैं! वे ही हमारे शास्ता है!”
(तीसरी बार उसने कहा:) “मत जाओ, मित्रों! हम तीनों इस सभा को मिलकर चलाएँगे!”
तब सारिपुत्त और मोग्गल्लान उन ढ़ाई-सौ परिव्राजकों को लेकर वेणुवन की ओर चल पड़े। वही परिव्राजक सञ्चय ने गर्म रक्त की उल्टी की।
‘गर्म रक्त की उल्टी होना’—बौद्ध साहित्य में यह वाक्यांश अनेक बार आता है। हम निश्चित रूप से नहीं जानते कि क्या लोगों को वास्तव में खून की उल्टियाँ होती थीं, अथवा यह उन व्यक्तियों के लिए एक मुहावरे के रूप में उपयोग किया गया है, जो किसी हानिकारक घटना से बुरी तरह चौंक गए हों या जिनका दिल बुरी तरह टूट गया हो।
जो भी हो, यह घटना हमें संजय के ऊपर पड़े प्रभाव की तीव्रता और उसके हृदय-विदारक वेदना की प्रचंडता को स्पष्ट रूप से समझाती है। जहाँ एक तरफ वेणुवन में ‘स्वागत’ की बहार थी, वहीं संजय के आश्रम में केवल ‘शून्य’ और ‘रक्त’ शेष रह गया था।
जब भगवान ने सारिपुत्त और मोग्गल्लान को दूर से आते देखा, तो उन्होंने भिक्षुओं से कहा:
“भिक्षुओं, ये दो मित्र कोलित और उपतिस्स आ रहे हैं। मेरी यह शिष्यों की जोड़ी अग्र बनेगी, भद्र बनेगी।”
… तब सारिपुत्त और मोग्गल्लान भगवान के पास गए, और भगवान के चरणों में सिर रखते हुए, भगवान से कहा, “भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
“आओ, भिक्षु!” कह कर, भगवान ने उत्तर दिया, “यह स्पष्ट बताया धम्म है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।” और इस तरह, उन आयुष्मानों की उपसंपदा संपन्न हुई।
अब दृश्य बदलता है। सारिपुत्त और मोग्गलान जैसे दिग्गजों के संघ में शामिल होते ही मगध में भूचाल आ गया।
ढाई सौ शिष्यों के साथ संजय के आश्रम का खाली हो जाना और १००० जटाधारियों का बौद्ध बन जाना—यह सब इतनी तेजी से हुआ कि समाज इसे पचा नहीं पाया।
उस समय, मगध के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध कुलपुत्र भगवान का ब्रह्मचर्य पालन कर रहे थे।
लोगों ने भर्त्सना, आलोचना और दुष्प्रचार किया—“श्रमण गौतम हमें अपुत्रक बना रहे हैं! स्त्रियों को पतिहीन बना रहे हैं! कुल-परिवारों को तोड़ रहे हैं! वहाँ एक हजार जटाधारीयों ने प्रव्रज्या ले ली! और यहाँ परिव्राजक सञ्चय के ढ़ाई-सौ ने प्रव्रज्या ले ली! मगध के सभी प्रसिद्ध - प्रसिद्ध कुलपुत्र अब भगवान का ब्रह्मचर्य पालन कर रहे हैं!”
भिक्षुओं को देखकर, वे लोग गाथाओं में फटकार लगाते:
“हुआ आगमन महाश्रमण का,
मगध के गिरिब्बज में।
सञ्चय के सभी ले गया,
अब किसे ले जाएगा?”
भिक्षुओं ने उन लोगों की भर्त्सना, आलोचना और दुष्प्रचार को सुना, और जाकर भगवान से सब कह दिया।
तब भगवान ने कहा, “ये बातें लंबे समय तक नहीं चलेगी, भिक्षुओं। एक सप्ताह तक चलेगी, और एक सप्ताह होते-होते विलुप्त हो जाएगी। फिर भी, भिक्षुओं, जब वे लोग तुम्हें इन गाथाओं में फटकार लगाएँ, तब तुम इन गाथाओं से उनका प्रतिउत्तर दों:
“सद्धम्म से ले जाते हैं,
वे 'महावीर' तथागत है!
धम्म से जब ले जाते हैं,
तो तुम्हें क्यों ईर्ष्या होती है?”
तत्पश्चात, जब लोग भिक्षुओं को देखकर गाथाओं में फटकार लगाते:
“हुआ आगमन महाश्रमण का,
मगध के गिरिब्बज में।
सञ्चय के सभी ले गया,
अब किसे ले जाएगा?”
तब भिक्षु इन गाथाओं से उनका प्रतिउत्तर देते:
“सद्धम्म से ले जाते हैं,
वे 'महावीर' तथागत है!
धम्म से जब ले जाते हैं,
तो तुम्हें क्यों ईर्ष्या होती है?”
लोगों को लगा, “लगता है कि शाक्यपुत्र श्रमण धम्म से ही ले जा रहा है, अधम्म से नहीं।”
और वाकई ये बातें केवल एक सप्ताह तक चली। एक सप्ताह होते-होते विलुप्त हो गयी।
— विनयपिटक : महावग्ग : ०१. महाक्खंदक
इस प्रकार, एक अकेले ‘तथागत’ से शुरू हुई यह यात्रा, देखते ही देखते एक विशाल ‘महासमुद्र’ बन गई।
भगवान ने वाराणसी में धर्मचक्र-प्रवर्तन किया और कुछ ही दिनों में जम्बूद्वीप की धूल भरी गलियों में हजारों अर्हंत भिक्षा माँगते नजर आने लगे, जिनके पावन चरण जिस धरती पर पड़े, वह धन्य हो गई।
कुछ ही महीनों बाद, करुणा की यह लहर भगवान के गृह-नगर कपिलवस्तु पहुँची। वहाँ शाक्यवंशीय महलों में एक अद्भुत क्रांति हुई। भगवान ने अपने सात-वर्षीय पुत्र राहुल को विरासत के रूप में कोई राज्य नहीं, बल्कि ‘अर्हंत-पद’ दिया। और इतिहास ने वह दिन भी देखा जब महा-उपकारी मौसी महाप्रजापति गौतमी और पूर्व-पत्नी यशोधरा के त्याग को सम्मान मिला—भिक्षुणी संघ का द्वार खुला, और स्त्रियाँ भी निर्वाण की अधिकारी बनीं।
भगवान के इस ‘धर्म-बल’ के सामने अहंकारी और वर्ण-विभाजित समाज की नींव हिल गई। सदियों से दबे-कुचले लोगों को पहली बार ‘मनुष्य’ होने का अहसास हुआ। जातिवाद और रूढ़िवाद के किले ढहने लगे। पुरानी व्यवस्था ने खुद को बचाने के लिए कई रूप बदले, बौद्ध सूत्रों की नकल की, नए अध्याय जोड़े, लेकिन सत्य की शीतलता को कौन रोक सकता था? एक समय ऐसा आया जब १६ महाजनपदों से बना पूरा जम्बूद्वीप बुद्ध की करुणा में समाहित हो गया।
हालाँकि, अनित्यता—जो बुद्ध की शिक्षा का सार है—संघ पर भी लागू होती है। भगवान के महापरिनिर्वाण के बाद शताब्दियों के थपेड़ों ने संघ में भी मतभेद उत्पन्न किए। समय के साथ संघ भौगोलिक और वैचारिक आधार पर विभाजित हुआ।
एक तरफ उत्तर की परंपराओं (महायान आदि) ने संस्कृत भाषा अपनाकर नई व्याख्याएँ और आदर्श जोड़े, तो दूसरी तरफ दक्षिण की परंपरा (थेरवाद) ने पालि भाषा को आधार बनाया। ऐतिहासिक सत्य यह है कि समय के साथ दोनों ही धाराओं में बाद के आचार्यों ने अपने-अपने विचार, टीकाएँ और नई मान्यताएँ जोड़ीं, जिससे बुद्ध का मूल ‘विमुक्ति-मार्ग’ परतों के नीचे दबता चला गया। मूल संरचना और उद्देश्य दोनों ही धाराओं में समय के साथ धुंधले पड़ते गए।
किन्तु, आज के इस आधुनिक युग में एक नई क्रांति हो रही है। आधुनिक विद्वानों और जिज्ञासुओं ने तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Studies) की तकनीक से इन परतों को हटाना शुरू किया है। अलग-अलग संप्रदायों (जैसे पालि निकाय और चीनी आगम) के ग्रंथों की तुलना करके, आज हम उन साझा और प्राचीनतम वचनों तक वापस पहुँच पा रहे हैं, जो संप्रदायों के विभाजन से पहले के हैं। इसे ही आज “मूल बुद्ध वचन” (Early Buddhist Texts - EBT) कहा जाता है।
२६०० वर्षों के बाद, इतिहास का पहिया फिर घूमा है। आज दुनिया भर के साधक—चाहे वे किसी भी संप्रदाय के हों—वापस उसी ‘शुद्ध और मिलावट रहित’ धम्म की ओर लौट रहे हैं, जो भगवान ने स्वयं उपदेशित किया था।
कहानी के अंत में, आइए एक ऐसी गहरी बात का साक्षी बनें जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम ‘किनारे’ पर क्या कर रहे हैं?
अल्प ही मानव हैं,
जो पार चले जाते हैं।
बाकी जनता तो बस,
तट पर ही दौड़ती रहती है।
—धम्मपद पण्डितवग्ग ८५