
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान कोसल देश में विशाल भिक्षुसंघ के साथ भ्रमण कर रहे थे। उस समय धनञ्जानी नामक ब्राह्मणी (=ब्राह्मण स्त्री) चञ्चलिकप्प में निवास करती थी, जो बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति आस्थापूर्ण थी। एक बार धनञ्जानी ब्राह्मणी ने लड़खड़ाने पर तीन बार सहज उद्गार किया—
“नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।
नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।
नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।"
उस समय सङ्गारव युवा-ब्राह्मण 1 चञ्चलिकप्प में निवास करता था, जो तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों का निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ का भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, पदों का वक्ता, व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत था। उस सङ्गारव युवा-ब्राह्मण ने धनञ्जानी ब्राह्मणी को इस तरह उद्गार करते हुए सुना। सुनकर धनञ्जानी ब्राह्मणी से कहा—
“गिर चुकी है यह धनञ्जानी ब्राह्मणी! हार चुकी है ये धनञ्जानी ब्राह्मणी, जो ब्राह्मणों के होते उस मथमुंडे, उस नीच श्रमण की प्रशंसा करती है!” 2
“ओ प्यारे पुत्र, तुम उस भगवान के शील और प्रज्ञा को नहीं जानते! यदि तुम जानते तो उन भगवान को गाली-गलौच और अपमानित करने का सोचते नहीं।”
“ठीक है, श्रीमति, जब श्रमण गोतम चञ्चलिकप्प में पहुँचे, तो मुझे बताना।”
“ठीक है, प्यारे पुत्र!” धनञ्जानी ब्राह्मणी ने सङ्गारव युवा-ब्राह्मण से कहा।
तब भगवान कोसल देश में अनुक्रम से भ्रमण करते हुए अंततः चञ्चलिकप्प पहुँचे। वहाँ भगवान ने चञ्चलिकप्प में तोदेय्य ब्राह्मण के आम्रवन में विहार किया।
और धनञ्जानी ब्राह्मणी ने सुना “भगवान चञ्चलिकप्प में पहुँचे हैं, जहाँ चञ्चलिकप्प में तोदेय्य ब्राह्मण के आम्रवन में विहार कर रहे हैं।”
तब धनञ्जानी ब्राह्मणी सङ्गारव युवा-ब्राह्मण के पास गयी, और जाकर सङ्गारव युवा-ब्राह्मण से कहा, “ओ प्यारे पुत्र, भगवान चञ्चलिकप्प में पहुँचे हैं, जहाँ चञ्चलिकप्प में तोदेय्य ब्राह्मण के आम्रवन में विहार कर रहे हैं। तब, प्यारे पुत्र, जो समय तुम उचित समझो।”
“ठीक है, श्रीमति!” सङ्गारव युवा-ब्राह्मण ने धनञ्जानी ब्राह्मणी को उत्तर देकर भगवान के पास गया। जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप करने पर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर सङ्गारव युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा—
“श्रीमान गोतम, कुछ श्रमण-ब्राह्मण हैं जो वर्तमान जीवन में ब्रह्मचर्य का मूल ध्येय और प्रत्यक्ष ज्ञान (=अभिज्ञा) में संपन्नता और परमता प्राप्त करने का दावा करते हैं। 3 उनमें श्रमण-ब्राह्मणों में श्रीमान गोतम कहाँ हैं?”
“भारद्वाज, जो वर्तमान जीवन में ब्रह्मचर्य का मूल ध्येय और प्रत्यक्ष ज्ञान में संपन्नता और परमता प्राप्त करने का दावा करते हैं, मैं उनमें अंतर्भेद बताता हूँ।
(१) भारद्वाज, कोई श्रमण-ब्राह्मण परंपरागत श्रुति (=पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनते आना) करने वाले होते हैं। वे परंपरागत श्रुति कर वर्तमान जीवन में ब्रह्मचर्य का मूल ध्येय और प्रत्यक्ष ज्ञान में संपन्नता और परमता प्राप्त करने का दावा करते हैं, जैसे त्रिवेदी ब्राह्मण।
(२) आगे, भारद्वाज, कोई श्रमण-ब्राह्मण केवल थोड़ी मात्रा में श्रद्धा कर, वर्तमान जीवन में ब्रह्मचर्य का मूल ध्येय और प्रत्यक्ष ज्ञान में संपन्नता और परमता प्राप्त करने का दावा करते हैं, जैसे तर्क करने वाले विवेकशील (लोग)। 4
(३) आगे, भारद्वाज, कोई श्रमण-ब्राह्मण पहले कभी न सुने गए धम्म को स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, वर्तमान जीवन में ब्रह्मचर्य का मूल ध्येय और प्रत्यक्ष ज्ञान में संपन्नता और परमता प्राप्त करने का दावा करते हैं। उन श्रमण-ब्राह्मणों… में मैं एक हूँ।
और, भारद्वाज, ये इस प्रकार से समझा जा सकता है कि उन श्रमण-ब्राह्मणों में… मैं एक हूँ। जब मैं संबोधि से पहले अभी सम्बुद्ध न बना केवल एक बोधिसत्व था, मुझे लगा, ‘गृहस्थ जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु प्रवज्या, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य निभाना कठिन है, जो शुद्ध शंख जैसा उज्ज्वल हो! क्यों न मैं सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो जाऊँ?’
तब कुछ समय बीतने पर, भारद्वाज, जब मैं युवा ही था—घने काले केश वाला, यौवन वरदान से युक्त, जीवन के प्रथम चरण में—तब मैंने अपने माता-पिता के इच्छा विरुद्ध, उन्हें आँसू भरे चेहरे से रोते-बिलखते छोड़ कर, सिर और दाढ़ी मुंडवा कर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित हुआ।
इस तरह प्रव्रज्यित होकर—कुशलता की खोज में, अनुत्तर शांति की अद्वितीय अवस्था की खोज में—मैं आळार कालाम के पास गया। और जाकर, आळार कालाम से कहा, ‘मित्र कालाम, मुझे इस धम्म-विनय में ब्रह्मचर्य पालन करने की इच्छा है।’
ऐसा कहे जाने पर, भारद्वाज, आळार कालाम ने कहा, ‘यहीं रहिए, आयुष्मान। यह ऐसा धम्म है कि कोई समझदार पुरुष जल्द ही अपने आचार्य के ज्ञान का स्वयं प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर विहार कर सकता है।’
तब, भारद्वाज, बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का अध्ययन कर लिया। जहाँ तक होठों से पठन और रटकर दोहराने की बात थी, मैं और दूसरे भी ऐसे ज्ञान के सिद्धान्त (ञाणवाद), और वरिष्ठों के सिद्धान्त (“थेरवाद”) को ‘जानता हूँ, देखता हूँ’ का दावा करते थे।
किन्तु, भारद्वाज, तब मुझे लगा, ‘यह आळार कालाम इस धम्म के प्रति केवल श्रद्धा मात्र से ही प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा नहीं करता। अवश्य ही आळार कालाम वाकई इस धम्म को जानते हुए और देखते हुए विहार करता है।’
तब, भारद्वाज, मैं आळार कालाम के पास गया, और जाकर आळार कालाम से कहा, ‘मित्र कालाम, तुम इस धम्म में कहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार कर घोषणा करते हो?’
ऐसा कहे जाने पर, भारद्वाज, आळार कालाम ने सूने आयाम (“आकिञ्चञ्ञायतन”) की घोषणा की।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘केवल आळार कालाम में ही श्रद्धा नहीं, मुझमें भी श्रद्धा है। केवल आळार कालाम में ही वीर्य नहीं, मुझमें भी वीर्य है। केवल आळार कालाम में ही स्मृति नहीं, मुझमें भी स्मृति है। केवल आळार कालाम में ही समाधि नहीं, मुझमें भी समाधि है। केवल आळार कालाम में ही प्रज्ञा नहीं, मुझमें भी प्रज्ञा है। क्यों न मैं भी उस धम्म का साक्षात्कार करने का प्रयास करूँ, जिस धम्म को आळार कालाम प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता है।’
और, भारद्वाज, बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने लगा। तब, भारद्वाज, मैं आळार कालाम के पास गया, और जाकर आळार कालाम से कहा, ‘मित्र कालाम, क्या तुम इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो? मैं भी, मित्र कालाम, इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ।’
‘हम भाग्यशाली हैं, मित्र! हम सौभाग्यशाली हैं, मित्र! जो मैंने तुम जैसे आयुष्मान सब्रह्मचारी को देखा! जिस तरह मैं इस धम्म में प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ, उसी तरह तुम भी इस धम्म में प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो। मैं इस धम्म को जिस तरह जानता हूँ, तुम भी उस धम्म को उसी तरह जानते हो। तुम इस धम्म को जिस तरह जानते हो, मैं भी उस धम्म को उसी तरह जानता हूँ। जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम हो। और जैसे तुम हो, वैसा ही मैं हूँ। आओ, मेरे मित्र, हम दोनों अब इस समुदाय को चलाएँ।’
इस तरह, भारद्वाज, मेरे आचार्य आळार कालाम ने मुझे, अपने शिष्य को, अपने स्वयं के स्तर पर रखा और अत्याधिक सम्मानित करते हुए पूजा।
किन्तु, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘यह धम्म न मोहभंग, न विराग, न निरोध, न प्रशांति, न प्रत्यक्ष ज्ञान, न संबोधि, और न ही निर्वाण की ओर ले जाता है। बल्कि वह केवल ‘सूने आयाम में पुनरुत्पत्ति’ की ओर ले जाता है।’ इस तरह, भारद्वाज, उस धम्म को अनुपयुक्त पाकर, उस धम्म से मोहभंग होने पर, मैं चला गया।
इस तरह, कुशलता की खोज में, अनुत्तर शांति की अद्वितीय अवस्था की खोज में—मैं उदक रामपुत्त के पास गया। और जाकर, उदक रामपुत्त से कहा, ‘मित्र राम, मुझे इस धम्म-विनय में ब्रह्मचर्य पालन करने की इच्छा है।’
ऐसा कहे जाने पर, भारद्वाज, उदक रामपुत्त ने कहा, ‘यहीं रहिए, आयुष्मान। यह ऐसा धम्म है कि कोई समझदार पुरुष जल्द ही अपने आचार्य के ज्ञान का स्वयं प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर विहार कर सकता है।’
तब, भारद्वाज, बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का अध्ययन कर लिया। जहाँ तक होठों से पठन और रटकर दोहराने की बात थी, मैं और दूसरे भी ऐसे ज्ञान के सिद्धान्त, और वरिष्ठों के सिद्धान्त को ‘जानता हूँ, देखता हूँ’ का दावा करते थे।
किन्तु, भारद्वाज, तब मुझे लगा, ‘यह उदक रामपुत्त इस धम्म के प्रति केवल श्रद्धा मात्र से ही प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा नहीं करता। अवश्य ही उदक रामपुत्त वाकई इस धम्म को जानते हुए और देखते हुए विहार करता है।’
तब, भारद्वाज, मैं उदक रामपुत्त के पास गया, और जाकर उदक रामपुत्त से कहा, ‘मित्र राम, तुम इस धम्म में कहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार कर घोषणा करते हो?’
ऐसा कहे जाने पर, भारद्वाज, उदक रामपुत्त ने न संज्ञा न ही असंज्ञा आयाम (“नेवसञ्ञानासञ्ञायतन”) की घोषणा की।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘केवल उदक रामपुत्त में ही श्रद्धा नहीं, मुझमें भी श्रद्धा है। केवल उदक रामपुत्त में ही वीर्य नहीं, मुझमें भी वीर्य है। केवल उदक रामपुत्त में ही स्मृति नहीं, मुझमें भी स्मृति है। केवल उदक रामपुत्त में ही समाधि नहीं, मुझमें भी समाधि है। केवल उदक रामपुत्त में ही प्रज्ञा नहीं, मुझमें भी प्रज्ञा है। क्यों न मैं भी उस धम्म का साक्षात्कार करने का प्रयास करूँ, जिस धम्म को उदक रामपुत्त प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता है।’
और, भारद्वाज, बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने लगा। तब, भारद्वाज, मैं उदक रामपुत्त के पास गया, और जाकर उदक रामपुत्त से कहा, ‘मित्र राम, क्या तुम इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो? मैं भी, मित्र राम, इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ।’
‘हम भाग्यशाली हैं, मित्र! हम सौभाग्यशाली हैं, मित्र! जो मैंने तुम जैसे आयुष्मान सब्रह्मचारी को देखा! जिस तरह मैं इस धम्म में प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ, उसी तरह तुम भी इस धम्म में प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो। मैं इस धम्म को जिस तरह जानता हूँ, तुम भी उस धम्म को उसी तरह जानते हो। तुम इस धम्म को जिस तरह जानते हो, मैं भी उस धम्म को उसी तरह जानता हूँ। जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम हो। और जैसे तुम हो, वैसा ही मैं हूँ। आओ, मेरे मित्र, हम दोनों अब इस समुदाय को चलाएँ।’
इस तरह, भारद्वाज, मेरे आचार्य उदक रामपुत्त ने मुझे, अपने शिष्य को, अपने स्वयं के स्तर पर रखा और अत्याधिक सम्मानित करते हुए पूजा।
किन्तु, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘यह धम्म न मोहभंग, न विराग, न निरोध, न प्रशांति, न प्रत्यक्ष ज्ञान, न संबोधि, और न ही निर्वाण की ओर ले जाता है। बल्कि वह केवल ‘न संज्ञा न ही असंज्ञा आयाम में पुनरुत्पत्ति’ की ओर ले जाता है।’ इस तरह, भारद्वाज, उस धम्म को अनुपयुक्त पाकर, उस धम्म से मोहभंग होने पर, मैं चला गया।
इस तरह, कुशलता की खोज में, अनुत्तर शांति की अद्वितीय अवस्था की खोज में, मगध देश में अनुक्रम से भ्रमण करते हुए—मैं उरुवेला सैन्य नगर में पहुँचा। वहाँ मुझे रमणीय क्षेत्र देखा, जहाँ एक प्रेरणादायी जंगली इलाका, रमणीय और स्वच्छ किनारों वाली (नेरञ्जरा) नदी बहती थी, और भिक्षाटन के लिए सभी ओर गाँव बसे थे।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘यहाँ, श्रीमान, अच्छा रमणीय क्षेत्र है, एक प्रेरणादायी जंगली इलाका, रमणीय और स्वच्छ किनारों वाली नदी बहती है, और भिक्षाटन के लिए सभी ओर गाँव बसे हैं। किसी कुलपुत्र के उद्यम करने के ध्येय से यह बिलकुल ठीक है।’
तब, भारद्वाज, मैं बस वहीं बैठ गया—‘यहीं उद्यम करने के लिए ठीक है।’
तब, भारद्वाज, ये तीन उपमाएँ मेरे आगे प्रकट हुई, जो पहले कभी न सुनी गयी, अनाश्चर्यकारी थी। 5
(१) जैसे, भारद्वाज, एक गीली रसदार लकड़ी जल में पड़ी हो। तब एक पुरुष माचिस की तीली 6 लेकर आए, ‘मैं इसे जला दूँगा, अग्नि प्रकट करूँगा।’ तुम्हें क्या लगता है, भारद्वाज? क्या वह पुरुष माचिस की तीली से जल में पड़ी उस गीली रसदार लकड़ी को जला देगा, अग्नि प्रकट करेगा?”
“नहीं, श्रीमान गौतम।”
“क्यों नहीं?”
“क्योंकि, श्रीमान गौतम, वह लकड़ी गीली रसदार है, और ऊपर से जल में पड़ी है। अंततः वह पुरुष थकान और परेशानी का भागी होगा।”
उसी तरह, भारद्वाज, कोई श्रमण-ब्राह्मण—काया और चित्त से—कामुकता से निर्लिप्त होकर नहीं रहते हैं। उनके भीतर कामुकता के प्रति चाहत, स्नेह, मोहकता, प्यास और ताप का अच्छे से परित्याग नहीं होता, अच्छे से शांत होकर नहीं रुकता। तब वे श्रमण-ब्राह्मण (संबोधि पाने के लिए) भले ही खूब प्रयास करते हुए दर्द और तीव्र, कटु, और भेदक पीड़ाओं की वेदना करे, किंतु वे ज्ञान-दर्शन और अनुत्तर सम्बोधि प्राप्त नहीं कर सकते।
—यह प्रथम उपमा, भारद्वाज, मेरे आगे प्रकट हुई, जो पहले कभी न सुनी गयी, अनाश्चर्यकारी थी।
(२) कुछ समय के पश्चात, भारद्वाज, मेरे आगे दूसरी उपमा प्रकट हुई, जो पहले कभी न सुनी गयी, अनाश्चर्यकारी थी।
जैसे, भारद्वाज, एक गीली रसदार लकड़ी, जल से दूर, थल पर पड़ी हो। तब एक पुरुष माचिस की तीली लेकर आए, ‘मैं इसे जला दूँगा, अग्नि प्रकट करूँगा।’ तुम्हें क्या लगता है, भारद्वाज? क्या वह पुरुष माचिस की तीली से जल से दूर थल पर पड़ी उस गीली रसदार लकड़ी को जला देगा, अग्नि प्रकट करेगा?”
“नहीं, श्रीमान गौतम।"
“क्यों नहीं?”
“क्योंकि, श्रीमान गौतम, वह लकड़ी गीली रसदार है, भले ही वह जल से दूर, थल पर पड़ी हो। अंततः वह पुरुष थकान और परेशानी का भागी होगा।”
उसी तरह, भारद्वाज, कोई श्रमण-ब्राह्मण—काया और चित्त से—कामुकता से निर्लिप्त होकर रहते हैं। किन्तु उनके भीतर कामुकता के प्रति चाहत, स्नेह, मोहकता, प्यास और ताप का अच्छे से परित्याग नहीं होता, अच्छे से शांत होकर नहीं रुकता। तब वे श्रमण-ब्राह्मण भले ही खूब प्रयास करते हुए दर्द और तीव्र, कटु, और भेदक पीड़ाओं की वेदना करे, किंतु वे ज्ञान-दर्शन और अनुत्तर सम्बोधि प्राप्त नहीं कर सकते।
—यह द्वितीय उपमा, भारद्वाज, मेरे आगे प्रकट हुई, जो पहले कभी न सुनी गयी, अनाश्चर्यकारी थी।
(३) कुछ समय के पश्चात, भारद्वाज, मेरे आगे तीसरी उपमा प्रकट हुई, जो पहले कभी न सुनी गयी, अनाश्चर्यकारी थी।
जैसे, भारद्वाज, एक सूखी निरस लकड़ी, जल से दूर, थल पर पड़ी हो। तब एक पुरुष माचिस की तीली लेकर आए, ‘मैं इसे जला दूँगा, अग्नि प्रकट करूँगा।’ तुम्हें क्या लगता है, भारद्वाज? क्या वह पुरुष माचिस की तीली से जल से दूर थल पर पड़ी उस सूखी निरस लकड़ी को जला देगा, अग्नि प्रकट करेगा?”
“हाँ, श्रीमान गौतम।"
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि, श्रीमान गौतम, वह लकड़ी सूखी और निरस है, और जल से दूर, थल पर भी पड़ी हो।”
उसी तरह, भारद्वाज, कोई श्रमण-ब्राह्मण—काया और चित्त से—कामुकता से निर्लिप्त होकर रहते हैं। और साथ ही, उनके भीतर कामुकता के प्रति चाहत, स्नेह, मोहकता, प्यास और ताप का अच्छे से परित्याग भी होता है, अच्छे से शांत होकर रुकता भी है। तब वे श्रमण-ब्राह्मण भले ही खूब प्रयास करते हुए, कोई दर्द और तीव्र, कटु, और भेदक पीड़ाओं की वेदना न भी करे, तब भी वे ज्ञान-दर्शन और अनुत्तर सम्बोधि प्राप्त कर सकते हैं।
—यह तृतीय उपमा, भारद्वाज, मेरे आगे प्रकट हुई, जो पहले कभी न सुनी गयी, अनाश्चर्यकारी थी।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, “क्यों न मैं दाँत भींचकर, जीभ को तालु पर लगाकर, अपने मानस से चित्त को खींच-पकड़ कर, दबा कर, कुचल दूँ?”
तब, मैंने दाँत भींचकर, जीभ को तालु पर लगाकर, अपने मानस से चित्त को खींच-पकड़ कर, इतना दबाया और कुचला कि मेरी बगल से पसीना बहने लगा।
जैसे कोई बलवान पुरुष किसी दुर्बल पुरुष को सिर से, गले से, या कंधे से खींच-पकड़ कर, दबा कर, कुचल देता है। उसी तरह, मैंने दाँत भींचकर, जीभ को तालु पर लगाकर, अपने मानस से चित्त को खींच-पकड़ कर, इतना दबाया और कुचला कि मेरी बगल से पसीना बहने लगा।
मेरी वीर्य जागृत और अथक थी, भारद्वाज, मेरी स्मृति उपस्थित और स्पष्ट थी। किन्तु उस दर्दभरे उद्यम के कारण मेरी काया प्रताड़ित होते हुए उत्तेजित और अशांत हुई। तब भी, भारद्वाज, उस तरह का उत्पन्न हुई दुखद वेदना मेरे चित्त पर न हावी हुई, न ही बनी रही।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, “क्यों न मैं साँस रोक कर ध्यान लगाऊँ?’
तब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास (=साँस लेना-छोड़ना) रोक दिया। किन्तु, भारद्वाज, जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया, तो कान से वायु निकलकर गर्जना सी होने लगी। जैसे, लोहार की धौंकनी से वायु निकलते हुए गर्जना होती है। उसी तरह, जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया, तो कान से वायु निकलकर गर्जना सी होने लगी।
मेरी वीर्य जागृत और अथक थी, भारद्वाज, मेरी स्मृति उपस्थित और स्पष्ट थी। किन्तु उस दर्दभरे उद्यम के कारण मेरी काया प्रताड़ित होते हुए उत्तेजित और अशांत हुई। तब भी, भारद्वाज, उस तरह उत्पन्न हुई दुखद वेदना मेरे चित्त पर न हावी हुई, न ही बनी रही।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, “क्यों न मैं साँस रोक कर ही ध्यान लगाते रहूँ?’
तब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोके रखा। किन्तु, भारद्वाज, जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोके रखा, तो—
—उसी तरह, जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया, तो मेरे शरीर में बहुत जलन होने लगी।
मेरी वीर्य जागृत और अथक थी, भारद्वाज, मेरी स्मृति उपस्थित और स्पष्ट थी। किन्तु उस दर्दभरे उद्यम के कारण मेरी काया प्रताड़ित होते हुए उत्तेजित और अशांत हुई। तब भी, भारद्वाज, उस तरह उत्पन्न हुई दुखद वेदना मेरे चित्त पर न हावी हुई, न ही बनी रही।
तब मुझे देखकर, भारद्वाज, देवता कहने लगे, ‘श्रमण गौतम मर गया!’ दूसरे देवता कहने लगे, ‘श्रमण गौतम अभी मरा नहीं, किन्तु मर रहा है!’ तीसरे देवता कहने लगे, ‘श्रमण गौतम न मर गया, न ही मर रहा है, बल्कि श्रमण गौतम अरहंत हो गया! क्योंकि अरहंत इसी तरह जीते हैं!’
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, “क्यों न मैं आहार को पूरी तरह त्याग देने की साधना करूँ?’
किन्तु, भारद्वाज, तब देवतागण मेरे पास आकर कहने लगे, ‘महाशय, आहार को पूरी तरह न त्यागे। यदि आप आहार को पूरी तरह त्याग देंगे, तो हम आपके रोमछिद्रों से दिव्य ओज (=पोषण) को भीतर डालेंगे और उसी पर आप जीवित रहेंगे।’ 7
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘यदि मैं पूरी तरह उपवास करने का दावा करूँ, जबकि ये देवता मेरे रोमछिद्रों से दिव्य ओज को भीतर डाल रहे हो, तब मेरी ओर से झूठ होगा!’
तब, भारद्वाज, मैंने उन देवताओं को भेज दिया, कहते हुए, ‘रहने दीजिए!’
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘क्यों न मैं थोड़ा-थोड़ा आहार लेते रहूँ—एक बार में एक मुट्ठी दाल, या एक मुट्ठी दाल का पानी, या एक मुट्ठी मूँग दाल, या एक मुट्ठी मटर दाल?’
तब, भारद्वाज, मैं थोड़ा-थोड़ा आहार लेने लगा—एक बार में एक मुट्ठी दाल, या एक मुट्ठी दाल का पानी, या एक मुट्ठी मूँग दाल, या एक मुट्ठी मटर दाल? तब थोड़ा-थोड़ा ही आहार लेने से मेरी काया कुपोषित हो गयी।
तब मुझे देखकर, भारद्वाज, मनुष्य कहने लगे, ‘श्रमण गौतम काला है!’ दूसरे मनुष्य कहने लगे, ‘श्रमण गौतम काला नहीं, गेहूँआं है!’ तीसरे मनुष्य कहने लगे, ‘श्रमण गौतम न काला है, न ही गेहूँआं, बल्कि श्रमण गौतम की छवि पीली है!’ इस स्तर तक, भारद्वाज, मेरी परिशुद्ध त्वचा की चमक बर्बाद हो गयी थी, मात्र अल्प आहार लेने से।
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘अतीत में जितने भी श्रमण-ब्राह्मणों ने खूब प्रयास करते हुए, दर्द और तीव्र, कटु, भेदक पीड़ाओं की वेदना की हो, उसमें यह परम है, इससे बड़ी कोई पीड़ा नहीं है। भविष्य में जितने भी श्रमण-ब्राह्मण खूब प्रयास करते हुए, दर्द और तीव्र, कटु, भेदक पीड़ाओं की वेदना करेंगे, उसमें यह परम है, इससे बड़ी कोई पीड़ा नहीं है। वर्तमान में जितने भी श्रमण-ब्राह्मण खूब प्रयास करते हुए, दर्द और तीव्र, कटु, भेदक पीड़ाओं की वेदना कर रहे हो, उसमें यह परम है, इससे बड़ी कोई पीड़ा नहीं है। किन्तु, इतनी कड़ी दुष्करचर्या से भी मैंने कोई अलौकिक अवस्था, कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन प्राप्त नहीं किया। तब क्या बोधि का कोई अन्य मार्ग हो सकता है?’
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘मुझे याद है कि जब मेरे शाक्य पिता काम कर रहे थे, और मैं जामुन के पेड़ की शीतल छाया में बैठा हुआ था, तब मैं कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त — वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार किया था। क्या वह बोधि का मार्ग हो सकता है?’
तब उसी स्मृति के पीछे-पीछे, भारद्वाज, विज्ञान हुआ—‘यही बोधि का मार्ग है!’
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘मैं क्यों उस सुख से डरता हूँ, जब उसका कामुकता से कोई लेनदेन नहीं है, अकुशल-स्वभाव से कोई लेनदेन नहीं है?’
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘मैं उस सुख से नहीं डरूँगा, जब उसका कामुकता से कोई लेनदेन नहीं है, अकुशल-स्वभाव से कोई लेनदेन नहीं है।’
तब, भारद्वाज, मुझे लगा, ‘उस सुख को ऐसी कुपोषित काया से प्राप्त करना सरल नहीं है। क्यों न मैं कुछ ठोस आहार लूँ, कुछ दाल-भात?’
और तब, भारद्वाज, मैंने कुछ ठोस आहार लिया, कुछ दाल-भात।
तब उस समय, भारद्वाज, पाँच भिक्षु मेरी सेवा में थे, (सोचते हुए,) ‘श्रमण गौतम को धम्म प्राप्त हो जाए, तो वे हमें बताएँगे।’ जब मैंने कुछ ठोस आहार लिया, कुछ दाल-भात, तब वे निराश होकर चले गए, (सोचते हुए,) ‘श्रमण गौतम विलासी हो गए, तपस्या से भटक कर विलासी जीवन में लौट गए।’
और तब, भारद्वाज, मैंने ठोस आहार लेकर बल ग्रहण करने पर, कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त — वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते विहार किया।
आगे वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
आगे प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करते रहा। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं, ऐसे तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
और आगे, सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
जब मेरा चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो गया, तब मैंने उस चित्त को पूर्वजन्मों का अनुस्मरण करने की ओर झुकाया। तो मुझे विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण होने लगे—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त (=ब्रह्मांडिय सिकुड़न), कई कल्पों का लोक-विवर्त (=ब्रह्मांडिय विस्तार), कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह मैंने अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण किए।
मुझे इस प्रथम-ज्ञान का साक्षात्कार रात के प्रथम-पहर में हुआ। अविद्या नष्ट हुई, ज्ञान उत्पन्न हुआ! अँधेरा नष्ट हुआ, उजाला उत्पन्न हुआ! जैसे किसी अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी के साथ होता है।
तब मैंने अपने समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल चित्त को सत्वों की गति जानने की ओर झुकाया। तब मुझे अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखा। और मुझे पता चला कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं। कैसे ये सत्व—काया दुराचार में संपन्न, वाणी दुराचार में संपन्न, एवं मन दुराचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की, और मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजे।’ किन्तु कैसे ये सत्व—काया सदाचार में संपन्न, वाणी सदाचार में संपन्न, एवं मन सदाचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, सम्यक-दृष्टि धारण की, और सम्यक-दृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजे। इस तरह, मैंने अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए देखा।
मुझे इस द्वितीय-ज्ञान का साक्षात्कार रात के मध्यम-पहर में हुआ। अविद्या नष्ट हुई, ज्ञान उत्पन्न हुआ! अँधेरा नष्ट हुआ, उजाला उत्पन्न हुआ! जैसे किसी अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी के साथ होता है।
जब मेरा चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो गया, तब मैंने उस चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाया। तब ‘यह दुःख है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘यह दुःख की उत्पत्ति है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘यह दुःख का निरोध है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘यह दुःख का निरोधकर्ता मार्ग है’, मुझे यथास्वरूप पता चला।
‘ये आस्रव हैं’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘यह आस्रव की उत्पत्ति है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘यह आस्रव का निरोध है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘यह आस्रव का निरोधकर्ता मार्ग है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। इस तरह जानने से, इस तरह देखने से, मेरा चित्त काम-आस्रव से विमुक्त हुआ, भव-आस्रव से विमुक्त हुआ, अविद्या-आस्रव से विमुक्त हुआ। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न हुआ, ‘विमुक्त हुआ!’ मुझे पता चला, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’
मुझे इस तृतीय-ज्ञान का साक्षात्कार रात के अंतिम-पहर में हुआ। अविद्या नष्ट हुई, ज्ञान उत्पन्न हुआ! अँधेरा नष्ट हुआ, उजाला उत्पन्न हुआ! जैसे किसी अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी के साथ होता है।”
जब ऐसा कहा गया, तब सङ्गारव युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “वाकई, दृढ़निश्चय के साथ श्रीमान गोतम का परिश्रम हुआ! वाकई, सत्पुरुष के जैसा श्रीमान गोतम का परिश्रम हुआ! वाकई, जैसे कोई अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हो!
किन्तु, श्रीमान गोतम, क्या (वाकई) देवता होते हैं?” 8
“भारद्वाज, मैं देवताओं (के अस्तित्व) को कारण के साथ जानता हूँ।”
“क्यों, श्रीमान गोतम, जब मैंने पूछा कि ‘क्या देवता होते हैं’, तो आप ऐसा क्यों कहते हैं कि ‘भारद्वाज, मैं देवताओं को कारण के साथ जानता हूँ’? यदि ऐसा हो, तो क्या वह बात तुच्छ और झूठी नहीं हो जाती?”
“भारद्वाज, ऐसा पूछा जाने पर कि ‘क्या देवता होते हैं?’—कोई कहे कि ‘देवता होते हैं’, अथवा कोई कहे कि ‘मैं देवताओं को कारण के साथ जानता हूँ’—कोई भी समझदार पुरुष इस एक सीधे निष्कर्ष पर अवश्य आएगा कि ‘देवता होते हैं।’”
“किन्तु श्रीमान गोतम ने पहले ऐसे क्यों नहीं कहा?”
“भारद्वाज, इस लोक के प्रतिष्ठित लोगों की इस बात पर आम-सहमति हैं कि ‘देवता होते हैं।’”
जब ऐसा कहा गया, तब सङ्गारव युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह श्रीमान गोतम ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं श्रीमान गोतम की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! श्रीमान गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
श्रावस्ती का “ब्राह्मण” सङ्गारव कई सूत्रों में मिलता है, और उसके आध्यात्मिक विकास की एक क्रमबद्ध झलक उभरती है। प्रारम्भ में (संयुक्तनिकाय ७.२१ में) वह जल से शुद्धि मानता था । इसके बाद (अङ्गुत्तरनिकाय ३.६० में) उसने बुद्ध से यज्ञ के विषय में प्रश्न किया। आगे चलकर (संयुक्तनिकाय ४६.५५, अङ्गुत्तरनिकाय ५.१९३ में) उसने यह भी पूछा कि मन्त्र किस प्रकार याद रखे जाते हैं। इन सभी सूत्रों में, इस सूत्र की ही तरह, अन्त में उसके शरण जाने का उल्लेख मिलता है।
अन्ततः (अङ्गुत्तरनिकाय १०.११७, अङ्गुत्तरनिकाय १०.१६९ में) वह एक सार्थक और आध्यात्मिक प्रश्न पूछता है—इस पार और उस पार के अर्थ में मुक्ति का मार्ग। सम्भव है कि चञ्चलिकप्प में रहने वाला युवा-ब्राह्मण सङ्गारव ही आगे चलकर ब्राह्मणी शिक्षा पूरी करने पर पास के श्रावस्ती पहुँचा हो, और वहाँ सङ्गारव “ब्राह्मण” के रूप में जाना जाने लगा हो। पर यह सम्भावना तभी बैठती है जब हम सूत्रों में बार-बार आए उसके शरण-गमन के उल्लेखों की अनदेखी करें, क्योंकि वास्तविकता में वह लम्बे समय तक ब्राह्मण परम्परा का ही अनुयायी बना रहा। ↩︎
सङ्गारव और धनञ्जानी के आपसी संबंध का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वह उसके ब्राह्मण-आचार्य की पत्नी रही होगी। ↩︎
यहाँ पारमि शब्द का दुर्लभ प्रयोग किया गया है—“अभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता” के संदर्भ में, अर्थात “अरहत्व अवस्था” के संदर्भ में। पारमि या “पूर्णता”, प्रारंभिक बौद्ध साहित्य के चार मुख्य निकायों में केवल तीन सूत्रों में मिलता है—मज्झिमनिकाय १११, अंगुत्तरनिकाय ५.११, और मज्झिमनिकाय ७७ के साथ यहाँ। इन तीनों संदर्भों में, इसका अर्थ किसी गुण के पूर्ण रूप से विकसित होने से है, और यह उन “दस पारमियों” का संदर्भ नहीं देता, जिन्हें भगवान के परिनिर्वाण के कई शताब्दियों बाद सूचीबद्ध किया गया। पारमि के बारे में जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें, और यह मार्गदर्शिका भी। ↩︎
मज्झिमनिकाय ९५ में श्रद्धा, परंपरागत श्रुति, और तर्क को अलग-अलग रखा गया है। किन्तु, यहाँ हैरानी की बात है कि “श्रद्धा” का उदाहरण देने के लिए “तर्क करने वाले विवेकशील” लोगों का उल्लेख हुआ, जो पूरी तरह एक दूसरे के विरुद्ध माने जाते हैं। ऐसा लगता है, जैसे पश्चात सूत्र का संपादन करते हुए यह भूल हुई हो। हो सकता है कि यहाँ भगवान ने श्रद्धा और तर्क को अलग-अलग रखा हो। ↩︎
अनाश्चर्यकारक का यहाँ अर्थ है, जो किसी दिव्यशक्ति से प्राप्त न हो। विद्वानों का मानना है कि ऐसी गाथाएँ सूझ पड़ना, जो पहले सुनी न गयी हो, और जब उनका स्त्रोत या माध्यम दिव्य हो, तब उन्हें “आश्चर्यकारक गाथाएँ” कहते हैं। वैदिक परंपरा के अनुसार, ऐसी आश्चर्यकारक गाथाएँ, जिन्हें ‘श्रुति’ भी कहते हैं, वे ईश्वर या देवताओं के माध्यम से प्राप्त होती हैं। ठीक उसी तरह, जैसे पैगंबरों को कोई दिव्यशक्ति आकर गाथाओं में धम्म बताती है। लेकिन यहाँ भगवान कहते हैं कि उन्हें ये गाथाएँ, जो पहले सुनी न गयी थी, वे “अनाश्चर्यकारक” थी, जो उन्हें साधारण रूप से सूझ पड़ी। ↩︎
मैंने आज की माचिस की तीली का उदाहरण दिया है, लेकिन असल में जो उपमा दी गई है, वह प्राचीन अग्नि-संयोग—अरणि मंथन—की प्रक्रिया से है। यानी वह प्रयास जिसमें कोई व्यक्ति दो लकड़ियों को रगड़कर अग्नि उत्पन्न करने की कोशिश करता है। यह स्पष्ट है कि यदि लकड़ी गीली और रसदार हो, तो चाहे जितनी कोशिश की जाए, उससे आग नहीं जलाई जा सकती।
परंतु चूंकि आज के आधुनिक लोग शायद इस पारंपरिक प्रक्रिया को एक शब्द में नहीं समझ पाते, इसलिए मैंने उन्हें उनकी ‘आधुनिक भाषा’ में समझाने के लिए माचिस की तीली का उदाहरण दिया, और शायद जाने-अनजाने में उन्हें और भी अधिक आलसी बना दिया। ↩︎
देवताओं के इस हस्तक्षेप का स्पष्ट विवरण कहीं नहीं मिलता। लेकिन मैं व्यक्तिगत दृष्टिकोण से दो संभावित (लेकिन अनिश्चित) व्याख्याएँ प्रस्तुत करता हूँ।
सूत्र के इस अंतिम ‘अराजक’ हिस्से को लेकर कई गलतफ़हमियाँ हैं। के. आर. नॉर्मन ने अपनी पुस्तक (“The Buddha’s View of Devas”) में इसे पालि का भ्रष्ट अंश कहा है, और भिक्षु बोधि भी उनसे सहमत दिखाई देते हैं। इसके बावजूद, थोड़ा विचित्र होने पर भी इसका कुछ अर्थ उभरता है।
सूत्र की शुरुआत में ही सङ्गारव युवा-ब्राह्मण का स्वभाव—जल्दी भड़क उठना और अपनी धारणाओं में अटक जाना—स्पष्ट है, और यहाँ विषय बदलने तथा बात न पकड़ पाने से यह और उभर आता है। अंगुत्तरनिकाय ३.६० में भी उसका यही रूखा, टालमटोल भरा रूप मिलता है।
संभव है कि यह बस तेज़, उलझी बातचीत का परिणाम हो, और अंतिम खंड में कुछ गड़बड़ी भी हो सकती है। दिलचस्प यह है कि संस्कृत समानांतर संस्करणों में यही विचित्र प्रश्नोत्तर सूत्र के प्रारंभ में रखे गए हैं, और भिक्षु अनालयो, सुजातो आदि मानते हैं कि वे अपेक्षाकृत अधिक सुसंगत लगते हैं। ↩︎
४७३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा कोसलेसु चारिकं चरति महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं. तेन खो पन समयेन धनञ्जानी [धानञ्जानी (सी. पी.)] नाम ब्राह्मणी चञ्चलिकप्पे [मण्डलकप्पे (सी.), पच्चलकप्पे (स्या. कं.), चण्डलकप्पे (पी.)] पटिवसति अभिप्पसन्ना बुद्धे च धम्मे च सङ्घे च. अथ खो धनञ्जानी ब्राह्मणी उपक्खलित्वा तिक्खत्तुं उदानं उदानेसि – ‘‘नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स. नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स. नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्सा’’ति .
तेन खो पन समयेन सङ्गारवो नाम माणवो चञ्चलिकप्पे पटिवसति तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं , पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो. अस्सोसि खो सङ्गारवो माणवो धनञ्जानिया ब्राह्मणिया एवं वाचं भासमानाय. सुत्वा धनञ्जानिं ब्राह्मणिं एतदवोच – ‘‘अवभूताव अयं [अवभूता चयं (सी. स्या. कं. पी.)] धनञ्जानी ब्राह्मणी, परभूताव अयं [पराभूता चयं (सी. स्या. कं. पी.)] धनञ्जानी ब्राह्मणी, विज्जमानानं (तेविज्जानं) [() सी. स्या. कं. पी. पोत्थकेसु नत्थि] ब्राह्मणानं, अथ च पन तस्स मुण्डकस्स समणकस्स वण्णं भासिस्सती’’ति [भासतीति (सी. स्या. कं. पी)]. ‘‘न हि पन त्वं, तात भद्रमुख, तस्स भगवतो सीलपञ्ञाणं जानासि. सचे त्वं, तात भद्रमुख, तस्स भगवतो सीलपञ्ञाणं जानेय्यासि, न त्वं, तात भद्रमुख, तं भगवन्तं अक्कोसितब्बं परिभासितब्बं मञ्ञेय्यासी’’ति. ‘‘तेन हि, भोति, यदा समणो गोतमो चञ्चलिकप्पं अनुप्पत्तो होति अथ मे आरोचेय्यासी’’ति. ‘‘एवं, भद्रमुखा’’ति खो धनञ्जानी ब्राह्मणी सङ्गारवस्स माणवस्स पच्चस्सोसि.
अथ खो भगवा कोसलेसु अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन चञ्चलिकप्पं तदवसरि. तत्र सुदं भगवा चञ्चलिकप्पे विहरति तोदेय्यानं ब्राह्मणानं अम्बवने. अस्सोसि खो धनञ्जानी ब्राह्मणी – ‘‘भगवा किर चञ्चलिकप्पं अनुप्पत्तो, चञ्चलिकप्पे विहरति तोदेय्यानं ब्राह्मणानं अम्बवने’’ति. अथ खो धनञ्जानी ब्राह्मणी येन सङ्गारवो माणवो तेनुपसङ्कमि ; उपसङ्कमित्वा सङ्गारवं माणवं एतदवोच – ‘‘अयं, तात भद्रमुख, सो भगवा चञ्चलिकप्पं अनुप्पत्तो, चञ्चलिकप्पे विहरति तोदेय्यानं ब्राह्मणानं अम्बवने. यस्सदानि, तात भद्रमुख, कालं मञ्ञसी’’ति.
४७४. ‘‘एवं, भो’’ति खो सङ्गारवो माणवो धनञ्जानिया ब्राह्मणिया पटिस्सुत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो सङ्गारवो माणवो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सन्ति खो, भो गोतम, एके समणब्राह्मणा दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति. तत्र, भो गोतम, ये ते समणब्राह्मणा दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति, तेसं भवं गोतमो कतमो’’ति? ‘‘दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्तानं, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्तानम्पि खो अहं, भारद्वाज, वेमत्तं वदामि. सन्ति, भारद्वाज, एके समणब्राह्मणा अनुस्सविका. ते अनुस्सवेन दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति; सेय्यथापि ब्राह्मणा तेविज्जा. सन्ति पन, भारद्वाज, एके समणब्राह्मणा केवलं सद्धामत्तकेन दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति; सेय्यथापि तक्की वीमंसी. सन्ति, भारद्वाज, एके समणब्राह्मणा पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु सामंयेव धम्मं अभिञ्ञाय दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति. तत्र, भारद्वाज, ये ते समणब्राह्मणा पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु सामंयेव धम्मं अभिञ्ञाय दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति, तेसाहमस्मि. तदमिनापेतं, भारद्वाज, परियायेन वेदितब्बं, यथा ये ते समणब्राह्मणा पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु सामंयेव धम्मं अभिञ्ञाय दिट्ठधम्माभिञ्ञावोसानपारमिप्पत्ता, आदिब्रह्मचरियं पटिजानन्ति, तेसाहमस्मि.
४७५. ‘‘इध मे, भारद्वाज, पुब्बेव सम्बोधा अनभिसम्बुद्धस्स बोधिसत्तस्सेव सतो एतदहोसि – ‘सम्बाधो घरावासो रजापथो, अब्भोकासो पब्बज्जा. नयिदं सुकरं अगारं अज्झावसता एकन्तपरिपुण्णं एकन्तपरिसुद्धं सङ्खलिखितं ब्रह्मचरियं चरितुं. यंनूनाहं केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, अपरेन समयेन दहरोव समानो सुसुकाळकेसो भद्रेन योब्बनेन समन्नागतो पठमेन वयसा अकामकानं मातापितूनं अस्सुमुखानं रुदन्तानं केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजिं. सो एवं पब्बजितो समानो किंकुसलगवेसी अनुत्तरं सन्तिवरपदं परियेसमानो येन आळारो कालामो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा आळारं कालामं एतदवोचं – ‘इच्छामहं, आवुसो कालाम, इमस्मिं धम्मविनये ब्रह्मचरियं चरितु’न्ति. एवं वुत्ते, भारद्वाज, आळारो कालामो मं एतदवोच – ‘विहरतायस्मा. तादिसो अयं धम्मो यत्थ विञ्ञू पुरिसो नचिरस्सेव सकं आचरियकं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरेय्या’ति. सो खो अहं, भारद्वाज, नचिरस्सेव खिप्पमेव तं धम्मं परियापुणिं. सो खो अहं, भारद्वाज, तावतकेनेव ओट्ठपहतमत्तेन लपितलापनमत्तेन ‘ञाणवादञ्च वदामि, थेरवादञ्च जानामि, पस्सामी’ति च पटिजानामि, अहञ्चेव अञ्ञे च. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘न खो आळारो कालामो इमं धम्मं केवलं सद्धामत्तकेन सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामीति पवेदेति; अद्धा आळारो कालामो इमं धम्मं जानं पस्सं विहरती’ति.
‘‘अथ ख्वाहं, भारद्वाज, येन आळारो कालामो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा आळारं कालामं एतदवोचं – ‘कित्तावता नो, आवुसो कालाम, इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामीति पवेदेसी’ति? एवं वुत्ते, भारद्वाज, आळारो कालामो आकिञ्चञ्ञायतनं पवेदेसि. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘न खो आळारस्सेव कालामस्स अत्थि सद्धा, मय्हंपत्थि सद्धा; न खो आळारस्सेव कालामस्स अत्थि वीरियं…पे… सति… समाधि… पञ्ञा, मय्हंपत्थि पञ्ञा. यंनूनाहं यं धम्मं आळारो कालामो सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामीति पवेदेति तस्स धम्मस्स सच्छिकिरियाय पदहेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, नचिरस्सेव खिप्पमेव तं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहासिं. अथ ख्वाहं, भारद्वाज, येन आळारो कालामो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा आळारं कालामं एतदवोचं – ‘एत्तावता नो, आवुसो कालाम, इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेसी’ति? ‘एत्तावता खो अहं, आवुसो, इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेमी’ति. ‘अहम्पि खो, आवुसो, एत्तावता इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामी’ति. ‘लाभा नो, आवुसो, सुलद्धं नो, आवुसो, ये मयं आयस्मन्तं तादिसं सब्रह्मचारिं पस्साम. इति याहं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेमि तं त्वं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरसि; यं त्वं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरसि तमहं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेमि. इति याहं धम्मं जानामि तं त्वं धम्मं जानासि, यं त्वं धम्मं जानासि तमहं धम्मं जानामि . इति यादिसो अहं तादिसो तुवं, यादिसो तुवं तादिसो अहं. एहि दानि, आवुसो, उभोव सन्ता इमं गणं परिहरामा’ति. इति खो, भारद्वाज, आळारो कालामो आचरियो मे समानो अत्तनो अन्तेवासिं मं समानं अत्तना समसमं ठपेसि, उळाराय च मं पूजाय पूजेसि. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘नायं धम्मो निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तति, यावदेव आकिञ्चञ्ञायतनूपपत्तिया’ति. सो खो अहं, भारद्वाज, तं धम्मं अनलङ्करित्वा तस्मा धम्मा निब्बिज्ज अपक्कमिं.
४७६. ‘‘सो खो अहं, भारद्वाज, किंकुसलगवेसी अनुत्तरं सन्तिवरपदं परियेसमानो येन उदको रामपुत्तो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा उदकं रामपुत्तं एतदवोचं – ‘इच्छामहं, आवुसो [पस्स म. नि. १.२७८ पासरासिसुत्ते], इमस्मिं धम्मविनये ब्रह्मचरियं चरितु’न्ति. एवं वुत्ते, भारद्वाज, उदको रामपुत्तो मं एतदवोच – ‘विहरतायस्मा. तादिसो अयं धम्मो यत्थ विञ्ञू पुरिसो नचिरस्सेव सकं आचरियकं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरेय्या’ति. सो खो अहं, भारद्वाज, नचिरस्सेव खिप्पमेव तं धम्मं परियापुणिं. सो खो अहं, भारद्वाज, तावतकेनेव ओट्ठपहतमत्तेन लपितलापनमत्तेन ‘ञाणवादञ्च वदामि, थेरवादञ्च जानामि, पस्सामी’ति च पटिजानामि, अहञ्चेव अञ्ञे च . तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘न खो रामो इमं धम्मं केवलं सद्धामत्तकेन सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामीति पवेदेसि; अद्धा रामो इमं धम्मं जानं पस्सं विहासी’ति. अथ ख्वाहं, भारद्वाज, येन उदको रामपुत्तो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा उदकं रामपुत्तं एतदवोचं – ‘कित्तावता नो, आवुसो, रामो इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामीति पवेदेसी’ति? एवं वुत्ते, भारद्वाज, उदको रामपुत्तो नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं पवेदेसि. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘न खो रामस्सेव अहोसि सद्धा, मय्हंपत्थि सद्धा; न खो रामस्सेव अहोसि वीरियं…पे… सति… समाधि… पञ्ञा, मय्हंपत्थि पञ्ञा. यंनूनाहं यं धम्मं रामो सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामीति पवेदेसि तस्स धम्मस्स सच्छिकिरियाय पदहेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, नचिरस्सेव खिप्पमेव तं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहासिं.
‘‘अथ ख्वाहं, भारद्वाज, येन उदको रामपुत्तो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा उदकं रामपुत्तं एतदवोचं – ‘एत्तावता नो, आवुसो, रामो इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेसी’ति? ‘एत्तावता खो, आवुसो, रामो इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेसी’ति. ‘अहम्पि खो, आवुसो, एत्तावता इमं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामी’ति. ‘लाभा नो, आवुसो, सुलद्धं नो, आवुसो, ये मयं आयस्मन्तं तादिसं सब्रह्मचारिं पस्साम. इति यं धम्मं रामो सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेसि तं त्वं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरसि; यं त्वं धम्मं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरसि तं धम्मं रामो सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज पवेदेसि. इति यं धम्मं रामो अभिञ्ञासि तं त्वं धम्मं जानासि, यं त्वं धम्मं जानासि तं धम्मं रामो अभिञ्ञासि. इति यादिसो रामो अहोसि तादिसो तुवं, यादिसो तुवं तादिसो रामो अहोसि. एहि दानि, आवुसो, तुवं इमं गणं परिहरा’ति. इति खो, भारद्वाज, उदको रामपुत्तो सब्रह्मचारी मे समानो आचरियट्ठाने मं ठपेसि, उळाराय च मं पूजाय पूजेसि. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘नायं धम्मो निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तति, यावदेव नेवसञ्ञानासञ्ञायतनूपपत्तिया’ति. सो खो अहं, भारद्वाज, तं धम्मं अनलङ्करित्वा तस्मा धम्मा निब्बिज्ज अपक्कमिं.
४७७. ‘‘सो खो अहं, भारद्वाज, किंकुसलगवेसी अनुत्तरं सन्तिवरपदं परियेसमानो मगधेसु अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन उरुवेळा सेनानिगमो तदवसरिं. तत्थद्दसं रमणीयं भूमिभागं, पासादिकञ्च वनसण्डं, नदिञ्च सन्दन्तिं सेतकं सुपतित्थं रमणीयं, समन्ता च गोचरगामं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘रमणीयो वत, भो, भूमिभागो, पासादिको च वनसण्डो, नदी च सन्दति सेतका सुपतित्था रमणीया, समन्ता च गोचरगामो. अलं वतिदं कुलपुत्तस्स पधानत्थिकस्स पधानाया’ति . सो खो अहं, भारद्वाज, तत्थेव निसीदिं – ‘अलमिदं पधानाया’ति. अपिस्सु मं, भारद्वाज, तिस्सो उपमा पटिभंसु अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा.
‘‘सेय्यथापि, भारद्वाज, अल्लं कट्ठं सस्नेहं उदके निक्खित्तं. अथ पुरिसो आगच्छेय्य उत्तरारणिं आदाय – ‘अग्गिं अभिनिब्बत्तेस्सामि, तेजो पातुकरिस्सामी’ति. तं किं मञ्ञसि, भारद्वाज, अपि नु सो पुरिसो अमुं अल्लं कट्ठं सस्नेहं उदके निक्खित्तं उत्तरारणिं आदाय अभिमन्थेन्तो अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्या’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम. तं किस्स हेतु? अदुञ्हि, भो गोतम, अल्लं कट्ठं सस्नेहं, तञ्च पन उदके निक्खित्तं; यावदेव च पन सो पुरिसो किलमथस्स विघातस्स भागी अस्सा’’ति. ‘‘एवमेव खो, भारद्वाज, ये हि केचि समणा वा ब्राह्मणा वा कायेन चेव चित्तेन च कामेहि अवूपकट्ठा विहरन्ति, यो च नेसं कामेसु कामच्छन्दो कामस्नेहो काममुच्छा कामपिपासा कामपरिळाहो सो च अज्झत्तं न सुप्पहीनो होति न सुप्पटिप्पस्सद्धो, ओपक्कमिका चेपि ते भोन्तो समणब्राह्मणा दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति, अभब्बाव ते ञाणाय दस्सनाय अनुत्तराय सम्बोधाय. नो चपि ते भोन्तो समणब्राह्मणा ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति अभब्बाव ते ञाणाय दस्सनाय अनुत्तराय सम्बोधाय. अयं खो मं, भारद्वाज, पठमा उपमा पटिभासि अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा.
४७८. ‘‘अपरापि खो मं, भारद्वाज, दुतिया उपमा पटिभासि अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा. सेय्यथापि, भारद्वाज, अल्लं कट्ठं सस्नेहं आरका उदका थले निक्खित्तं. अथ पुरिसो आगच्छेय्य उत्तरारणिं आदाय – ‘अग्गिं अभिनिब्बत्तेस्सामि, तेजो पातुकरिस्सामी’ति. तं किं मञ्ञसि, भारद्वाज, अपि नु सो पुरिसो अमुं अल्लं कट्ठं सस्नेहं आरका उदका थले निक्खित्तं उत्तरारणिं आदाय अभिमन्थेन्तो अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य तेजो पातुकरेय्या’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम. तं किस्स हेतु? अदुञ्हि, भो गोतम, अल्लं कट्ठं सस्नेहं, किञ्चापि आरका उदका थले निक्खित्तं; यावदेव च पन सो पुरिसो किलमथस्स विघातस्स भागी अस्सा’’ति. ‘‘एवमेव खो, भारद्वाज, ये हि केचि समणा वा ब्राह्मणा वा कायेन चेव चित्तेन च कामेहि वूपकट्ठा विहरन्ति, यो च नेसं कामेसु कामच्छन्दो कामस्नेहो काममुच्छा कामपिपासा कामपरिळाहो सो च अज्झत्तं न सुप्पहीनो होति न सुप्पटिप्पस्सद्धो, ओपक्कमिका चेपि ते भोन्तो समणब्राह्मणा दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति, अभब्बाव ते ञाणाय दस्सनाय अनुत्तराय सम्बोधाय. नो चेपि ते भोन्तो समणब्राह्मणा ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति, अभब्बाव ते ञाणाय दस्सनाय अनुत्तराय सम्बोधाय. अयं खो मं, भारद्वाज, दुतिया उपमा पटिभासि अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा.
४७९. ‘‘अपरापि खो मं, भारद्वाज, ततिया उपमा पटिभासि अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा. सेय्यथापि, भारद्वाज, सुक्खं कट्ठं कोळापं आरका उदका थले निक्खित्तं. अथ पुरिसो आगच्छेय्य उत्तरारणिं आदाय – ‘अग्गिं अभिनिब्बत्तेस्सामि, तेजो पातुकरिस्सामी’ति. तं किं मञ्ञसि, भारद्वाज, अपि नु सो पुरिसो अमुं सुक्खं कट्ठं कोळापं आरका उदका थले निक्खित्तं उत्तरारणिं आदाय अभिमन्थेन्तो अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्या’’ति? ‘‘एवं भो गोतम. तं किस्स हेतु? अदुञ्हि, भो गोतम, सुक्खं कट्ठं कोळापं, तञ्च पन आरका उदका थले निक्खित्त’’न्ति. ‘‘एवमेव खो, भारद्वाज, ये हि केचि समणा वा ब्राह्मणा वा कायेन चेव चित्तेन च कामेहि वूपकट्ठा विहरन्ति, यो च नेसं कामेसु कामच्छन्दो कामस्नेहो काममुच्छा कामपिपासा कामपरिळाहो सो च अज्झत्तं सुप्पहीनो होति सुप्पटिप्पस्सद्धो, ओपक्कमिका चेपि ते भोन्तो समणब्राह्मणा दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति, भब्बाव ते ञाणाय दस्सनाय अनुत्तराय सम्बोधाय. नो चेपि ते भोन्तो समणब्राह्मणा ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति, भब्बाव ते ञाणाय दस्सनाय अनुत्तराय सम्बोधाय. अयं खो मं, भारद्वाज, ततिया उपमा पटिभासि अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा. इमा खो मं, भारद्वाज, तिस्सो उपमा पटिभंसु अनच्छरिया पुब्बे अस्सुतपुब्बा.
४८०. ‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं दन्तेभिदन्तमाधाय, जिव्हाय तालुं आहच्च, चेतसा चित्तं अभिनिग्गण्हेय्यं अभिनिप्पीळेय्यं अभिसन्तापेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, दन्तेभिदन्तमाधाय, जिव्हाय तालुं आहच्च, चेतसा चित्तं अभिनिग्गण्हामि अभिनिप्पीळेमि अभिसन्तापेमि. तस्स मय्हं, भारद्वाज, दन्तेभिदन्तमाधाय, जिव्हाय तालुं आहच्च, चेतसा चित्तं अभिनिग्गण्हतो अभिनिप्पीळयतो अभिसन्तापयतो कच्छेहि सेदा मुच्चन्ति. सेय्यथापि, भारद्वाज, बलवा पुरिसो दुब्बलतरं पुरिसं सीसे वा गहेत्वा खन्धे वा गहेत्वा अभिनिग्गण्हेय्य अभिनिप्पीळेय्य अभिसन्तापेय्य, एवमेव खो मे, भारद्वाज, दन्तेभिदन्तमाधाय, जिव्हाय तालुं आहच्च, चेतसा चित्तं अभिनिग्गण्हतो अभिनिप्पीळयतो अभिसन्तापयतो कच्छेहि सेदा मुच्चन्ति. आरद्धं खो पन मे, भारद्वाज, वीरियं होति असल्लीनं, उपट्ठिता सति असम्मुट्ठा; सारद्धो च पन मे कायो होति अप्पटिप्पस्सद्धो, तेनेव दुक्खप्पधानेन पधानाभितुन्नस्स सतो.
४८१. ‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं अप्पाणकंयेव झानं झायेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च अस्सासपस्सासे उपरुन्धिं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु कण्णसोतेहि वातानं निक्खमन्तानं अधिमत्तो सद्दो होति. सेय्यथापि नाम कम्मारगग्गरिया धममानाय अधिमत्तो सद्दो होति, एवमेव खो मे, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु कण्णसोतेहि वातानं निक्खमन्तानं अधिमत्तो सद्दो होति. आरद्धं खो पन मे, भारद्वाज, वीरियं होति असल्लीनं, उपट्ठिता सति असम्मुट्ठा; सारद्धो च पन मे कायो होति अप्पटिप्पस्सद्धो, तेनेव दुक्खप्पधानेन पधानाभितुन्नस्स सतो.
‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं अप्पाणकंयेव झानं झायेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासे उपरुन्धिं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्ता वाता मुद्धनि ऊहनन्ति. सेय्यथापि, भारद्वाज, बलवा पुरिसो, तिण्हेन सिखरेन मुद्धनि अभिमत्थेय्य, एवमेव खो मे, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्ता वाता मुद्धनि ऊहनन्ति. आरद्धं खो पन मे, भारद्वाज, वीरियं होति असल्लीनं , उपट्ठिता सति असम्मुट्ठा; सारद्धो च पन मे कायो होति अप्पटिप्पस्सद्धो, तेनेव दुक्खप्पधानेन पधानाभितुन्नस्स सतो.
‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं अप्पाणकंयेव झानं झायेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासे उपरुन्धिं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्ता सीसे सीसवेदना होन्ति. सेय्यथापि, भारद्वाज, बलवा पुरिसो दळ्हेन वरत्तक्खण्डेन सीसे सीसवेठं ददेय्य, एवमेव खो, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्ता सीसे सीसवेदना होन्ति. आरद्धं खो पन मे, भारद्वाज, वीरियं होति असल्लीनं, उपट्ठिता सति असम्मुट्ठा; सारद्धो च पन मे कायो होति अप्पटिप्पस्सद्धो, तेनेव दुक्खप्पधानेन पधानाभितुन्नस्स सतो.
‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं अप्पाणकंयेव झानं झायेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासे उपरुन्धिं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्ता वाता कुच्छिं परिकन्तन्ति. सेय्यथापि , भारद्वाज, दक्खो गोघातको वा गोघातकन्तेवासी वा तिण्हेन गोविकन्तनेन कुच्छिं परिकन्तेय्य, एवमेव खो मे, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्ता वाता कुच्छिं परिकन्तन्ति. आरद्धं खो पन मे, भारद्वाज, वीरियं होति असल्लीनं उपट्ठिता सति असम्मुट्ठा; सारद्धो च पन मे कायो होति अप्पटिप्पस्सद्धो, तेनेव दुक्खप्पधानेन पधानाभितुन्नस्स सतो.
‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं अप्पाणकंयेव झानं झायेय्य’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासे उपरुन्धिं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्तो कायस्मिं डाहो होति. सेय्यथापि, भारद्वाज, द्वे बलवन्तो पुरिसा दुब्बलतरं पुरिसं नानाबाहासु गहेत्वा अङ्गारकासुया सन्तापेय्युं सम्परितापेय्युं, एवमेव खो मे, भारद्वाज, मुखतो च नासतो च कण्णतो च अस्सासपस्सासेसु उपरुद्धेसु अधिमत्तो कायस्मिं डाहो होति. आरद्धं खो पन मे, भारद्वाज, वीरियं होति असल्लीनं, उपट्ठिता सति असम्मुट्ठा, सारद्धो च पन मे कायो होति अप्पटिप्पस्सद्धो, तेनेव दुक्खप्पधानेन पधानाभितुन्नस्स सतो. अपिस्सु मं, भारद्वाज, देवता दिस्वा एवमाहंसु – ‘कालङ्कतो समणो गोतमो’ति. एकच्चा देवता एवमाहंसु – ‘न कालङ्कतो समणो गोतमो, अपि च कालङ्करोती’ति. एकच्चा देवता एवमाहंसु – ‘न कालङ्कतो समणो गोतमो, नापि कालङ्करोति; अरहं समणो गोतमो, विहारोत्वेव सो अरहतो एवरूपो होती’ति.
‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं सब्बसो आहारुपच्छेदाय पटिपज्जेय्य’न्ति. अथ खो मं, भारद्वाज, देवता उपसङ्कमित्वा एतदवोचुं – ‘मा खो त्वं, मारिस, सब्बसो आहारुपच्छेदाय पटिपज्जि. सचे खो त्वं, मारिस, सब्बसो आहारुपच्छेदाय पटिपज्जिस्ससि, तस्स ते मयं दिब्बं ओजं लोमकूपेहि अज्झोहारेस्साम. ताय त्वं यापेस्ससी’ति. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘अहञ्चेव खो पन सब्बसो अजज्जितं पटिजानेय्यं, इमा च मे देवता दिब्बं ओजं लोमकूपेहि अज्झोहारेय्युं, ताय चाहं यापेय्यं. तं ममस्स मुसा’ति. सो खो अहं, भारद्वाज, ता देवता पच्चाचिक्खामि, ‘हल’न्ति वदामि.
‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘यंनूनाहं थोकं थोकं आहारं आहारेय्यं पसतं पसतं , यदि वा मुग्गयूसं, यदि वा कुलत्थयूसं, यदि वा कळाययूसं, यदि वा हरेणुकयूस’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, थोकं थोकं आहारं आहारेसिं पसतं पसतं, यदि वा मुग्गयूसं , यदि वा कुलत्थयूसं, यदि वा कळाययूसं, यदि वा हरेणुकयूसं. तस्स मय्हं, भारद्वाज, थोकं थोकं आहारं आहारयतो पसतं पसतं, यदि वा मुग्गयूसं, यदि वा कुलत्थयूसं, यदि वा कळाययूसं, यदि वा हरेणुकयूसं, अधिमत्तकसिमानं पत्तो कायो होति. सेय्यथापि नाम आसीतिकपब्बानि वा काळपब्बानि वा, एवमेवस्सु मे अङ्गपच्चङ्गानि भवन्ति तायेवप्पाहारताय; सेय्यथापि नाम ओट्ठपदं, एवमेवस्सु मे आनिसदं होति तायेवप्पाहारताय; सेय्यथापि नाम वट्टनावळी, एवमेवस्सु मे पिट्ठिकण्टको उण्णतावनतो होति तायेवप्पाहारताय; सेय्यथापि नाम जरसालाय गोपानसियो ओलुग्गविलुग्गा भवन्ति, एवमेवस्सु मे फासुळियो ओलुग्गविलुग्गा भवन्ति तायेवप्पाहारताय; सेय्यथापि नाम गम्भीरे उदपाने उदकतारका गम्भीरगता ओक्खायिका दिस्सन्ति, एवमेवस्सु मे अक्खिकूपेसु अक्खितारका गम्भीरगता ओक्खायिका दिस्सन्ति तायेवप्पाहारताय; सेय्यथापि नाम तित्तकालाबु आमकच्छिन्नो वातातपेन संफुटितो होति सम्मिलातो, एवमेवस्सु मे सीसच्छवि संफुटिता होति सम्मिलाता तायेवप्पाहारताय. सो खो अहं, भारद्वाज, ‘उदरच्छविं परिमसिस्सामी’ति पिट्ठिकण्टकंयेव परिग्गण्हामि, ‘पिट्ठिकण्टकं परिमसिस्सामी’ति उदरच्छविंयेव परिग्गण्हामि; यावस्सु मे, भारद्वाज, उदरच्छवि पिट्ठिकण्टकं अल्लीना होति तायेवप्पाहारताय. सो खो अहं, भारद्वाज , ‘वच्चं वा मुत्तं वा करिस्सामी’ति तत्थेव अवकुज्जो पपतामि तायेवप्पाहारताय. सो खो अहं, भारद्वाज, इममेव कायं अस्सासेन्तो पाणिना गत्तानि अनुमज्जामि. तस्स मय्हं, भारद्वाज, पाणिना गत्तानि अनुमज्जतो पूतिमूलानि लोमानि कायस्मा पपतन्ति तायेवप्पाहारताय. अपिस्सु मं, भारद्वाज, मनुस्सा दिस्वा एवमाहंसु – ‘काळो समणो गोतमो’ति. एकच्चे मनुस्सा एवमाहंसु – ‘न काळो समणो गोतमो, सामो समणो गोतमो’ति. एकच्चे मनुस्सा एवमाहंसु – ‘न काळो समणो गोतमो नपि सामो, मङ्गुरच्छवि समणो गोतमो’ति; यावस्सु मे, भारद्वाज, ताव परिसुद्धो छविवण्णो परियोदातो उपहतो होति तायेवप्पाहारताय.
४८२. ‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘ये खो केचि अतीतमद्धानं समणा वा ब्राह्मणा वा ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयिंसु , एतावपरमं, नयितो भिय्यो; येपि हि केचि अनागतमद्धानं समणा वा ब्राह्मणा वा ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयिस्सन्ति, एतावपरमं, नयितो भिय्यो; येपि हि केचि एतरहि समणा वा ब्राह्मणा वा ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति, एतावपरमं, नयितो भिय्यो. न खो पनाहं इमाय कटुकाय दुक्करकारिकाय अधिगच्छामि उत्तरि मनुस्सधम्मा अलमरियञाणदस्सनविसेसं. सिया नु खो अञ्ञो मग्गो बोधाया’ति ? तस्स मय्हं भारद्वाज, एतदहोसि – ‘अभिजानामि खो पनाहं पितु सक्कस्स कम्मन्ते सीताय जम्बुच्छायाय निसिन्नो विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरिता. सिया नु खो एसो मग्गो बोधाया’ति? तस्स मय्हं, भारद्वाज, सतानुसारि विञ्ञाणं अहोसि – ‘एसेव मग्गो बोधाया’ति. तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘किं नु खो अहं तस्स सुखस्स भायामि यं तं सुखं अञ्ञत्रेव कामेहि अञ्ञत्र अकुसलेहि धम्मेही’ति? तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘न खो अहं तस्स सुखस्स भायामि यं तं सुखं अञ्ञत्रेव कामेहि अञ्ञत्र अकुसलेहि धम्मेही’ति.
४८३. ‘‘तस्स मय्हं, भारद्वाज, एतदहोसि – ‘न खो तं सुकरं सुखं अधिगन्तुं एवं अधिमत्तकसिमानं पत्तकायेन. यंनूनाहं ओळारिकं आहारं आहारेय्यं ओदनकुम्मास’न्ति. सो खो अहं, भारद्वाज, ओळारिकं आहारं आहारेसिं ओदनकुम्मासं. तेन खो पन मं, भारद्वाज, समयेन पञ्चवग्गिया भिक्खू पच्चुपट्ठिता होन्ति – ‘यं खो समणो गोतमो धम्मं अधिगमिस्सति तं नो आरोचेस्सती’ति. यतो खो अहं, भारद्वाज, ओळारिकं आहारं आहारेसिं ओदनकुम्मासं, अथ मे ते पञ्चवग्गिया भिक्खू निब्बिज्ज पक्कमिंसु – ‘बाहुल्लिको समणो गोतमो पधानविब्भन्तो आवत्तो बाहुल्लाया’ति.
‘‘सो खो अहं, भारद्वाज, ओळारिकं आहारं आहारेत्वा बलं गहेत्वा विविच्चेव कामेहि…पे… पठमं झानं उपसम्पज्ज विहासिं. वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं… ततियं झानं… चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहासिं.
‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते पुब्बेनिवासानुस्सतिञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेसिं. सो अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरामि, सेय्यथिदं – एकम्पि जातिं द्वेपि जातियो…पे… इति साकारं सउद्देसं अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरामि. अयं खो मे, भारद्वाज, रत्तिया पठमे यामे पठमा विज्जा अधिगता, अविज्जा विहता, विज्जा उप्पन्ना; तमो विहतो, आलोको उप्पन्नो; यथा तं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो.
४८४. ‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते सत्तानं चुतूपपातञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेसिं. सो दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सामि चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानामि…पे… अयं खो मे, भारद्वाज, रत्तिया मज्झिमे यामे दुतिया विज्जा अधिगता, अविज्जा विहता, विज्जा उप्पन्ना; तमो विहतो, आलोको उप्पन्नो; यथा तं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो.
‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते आसवानं खयञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेसिं. सो ‘इदं दुक्ख’न्ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, ‘अयं दुक्खसमुदयो’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, ‘अयं दुक्खनिरोधो’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, ‘अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं; ‘इमे आसवा’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, ‘अयं आसवसमुदयो’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, ‘अयं आसवनिरोधो’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, ‘अयं आसवनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं. तस्स मे एवं जानतो एवं पस्सतो कामासवापि चित्तं विमुच्चित्थ, भवासवापि चित्तं विमुच्चित्थ, अविज्जासवापि चित्तं विमुच्चित्थ. विमुत्तस्मिं विमुत्तमिति ञाणं अहोसि. ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति अब्भञ्ञासिं. अयं खो मे, भारद्वाज, रत्तिया पच्छिमे यामे ततिया विज्जा अधिगता, अविज्जा विहता, विज्जा उप्पन्ना; तमो विहतो, आलोको उप्पन्नो; यथा तं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो’’ति.
४८५. एवं वुत्ते, सङ्गारवो माणवो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अट्ठितवतं [अट्ठित वत (सी. स्या. कं. पी.)] भोतो गोतमस्स पधानं अहोसि, सप्पुरिसवतं [सप्पुरिस वत (सी. स्या. कं. पी.)] भोतो गोतमस्स पधानं अहोसि; यथा तं अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स. किं नु खो, भो गोतम, अत्थि देवा’’ति [अधिदेवाति (क.) एवं सब्बेसु ‘अत्थि देवा’तिपदेसु]? ‘‘ठानसो मेतं [खो पनेतं (स्या. कं. क.)], भारद्वाज, विदितं यदिदं – अधिदेवा’’ति [अत्थि देवाति (सी. स्या. कं. पी.), अतिदेवाति (?) एवं सब्बेसु ‘अधिदेवा’तिपदेसु]. ‘‘किं नु खो, भो गोतम, ‘अत्थि देवा’ति पुट्ठो समानो ‘ठानसो मेतं, भारद्वाज , विदितं यदिदं अधिदेवा’ति वदेसि. ननु, भो गोतम, एवं सन्ते तुच्छा मुसा होती’’ति? ‘‘‘अत्थि देवा’ति, भारद्वाज, पुट्ठो समानो ‘अत्थि देवा’ति यो वदेय्य, ‘ठानसो मे विदिता’ति [ठानसो विदिता मे विदिताति (सी. स्या. कं. पी.), ठानसो मे विदिता अतिदेवाति (?)] यो वदेय्य; अथ ख्वेत्थ विञ्ञुना पुरिसेन एकंसेन निट्ठं गन्तब्बं [गन्तुं (क.), गन्तुं वा (स्या. कं.)] यदिदं – ‘अत्थि देवा’’’ति. ‘‘किस्स पन मे भवं गोतमो आदिकेनेव न ब्याकासी’’ति [गोतमो आदिकेनेव ब्याकासीति (क.), गोतमो अत्थि देवाति न ब्याकासीति (?)]? ‘‘उच्चेन सम्मतं खो एतं, भारद्वाज, लोकस्मिं यदिदं – ‘अत्थि देवा’’’ति.
४८६. एवं वुत्ते, सङ्गारवो माणवो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम! सेय्यथापि, भो गोतम, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्तीति – एवमेवं भोता गोतमेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो. एसाहं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति.
सङ्गारवसुत्तं निट्ठितं दसमं.
ब्राह्मणवग्गो निट्ठितो पञ्चमो.