
यह धारणा कि सभी वेदना केवल पिछले कर्मों के कारण होते हैं, प्रारंभिक सूत्रों (जैसे अंगुत्तरनिकाय ३.६१, संयुक्तनिकाय ३६.२१ आदि) से लेकर अट्ठकथाओं तक निरंतर खारिज होते रही है। इसके बावजूद आज अनेक बौद्धों में यही धारणा प्रचलित है, और कभी-कभी सहायक आचार्य भी इसे दोहरा देते हैं।
किसी विशेष जन्म की प्राप्ति अवश्य कर्म के प्रभाव से होती है; इस अर्थ में कर्म जीवन की पृष्ठभूमि तैयार करता है। लेकिन उस जीवन में उत्पन्न होने वाली सुख-दुःख की वेदना केवल कर्म पर निर्भर नहीं होतीं। वे तत्कालिक मानसिक दशा, भावनात्मक प्रतिक्रिया, शारीरिक स्वास्थ्य, वातावरण, ऋतु, आहार-विहार, और शरीर में वात-पित्त-कफ के संतुलन जैसे अनेक कारणों से निर्मित होती हैं। सूत्रों में वेदना को बार-बार ऐसे बहुविध कारणों की संयुक्त उपज बताया गया है।
यदि हर वेदना को केवल कर्म का फल मान लिया जाए, तो वर्तमान क्षण में ध्यान-साधना और कुशलता को विकसित करने का महत्व फीका पड़ जाता है। लेकिन प्रारंभिक सूत्रों में भगवान स्पष्ट करते हैं कि मुक्ति के लिए परिवर्तन वहीं संभव है जहाँ व्यक्ति अपनी तत्कालिक प्रतिक्रियाओं को समझकर उन्हें कुशलता की ओर मोड़े। यही दृष्टि इस धम्म को ‘भाग्यवाद’ बनने से रोकती है।
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान शाक्यों के देश में देवदह नामक शाक्य नगर 1 में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”
“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“भिक्षुओं, कुछ श्रमण-ब्राह्मणों की ऐसा कहना हैं, ऐसी धारणा हैं कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद (वेदना), वह सब पूर्व कृत्यों से होता है। इसलिए, तप करके पुराने कर्मों को मिटाने और नए कर्मों को न करने से भविष्य की ओर बहाव नहीं होता। 2 भविष्य में न आने पर कर्म का क्षय होता है। कर्म के क्षय से दुःख का क्षय होता है। दुःख के क्षय से वेदना (“वेदना”) का क्षय होता है। वेदना के क्षय से सभी दुःखों की निर्जरा (=नष्टिकरण) होती हैं।’
—ऐसा निगण्ठ (=जैन) कहते हैं, भिक्षुओं।
मैं ऐसा कहने वाले निगण्ठों के पास गया और कहा, ‘मित्र निगण्ठों, क्या वाकई तुम्हारा ऐसा कहना है, ऐसी धारणा है कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’?
मेरे पूछने पर, भिक्षुओं, उन निगण्ठों ने ‘हाँ’ उत्तर दिया।
तब मैंने उनसे कहा, ‘किन्तु, मित्र निगण्ठों, क्या तुम (निश्चित) जानते हो—‘हम पहले (अस्तित्व में) अवश्य थे। नहीं थे, ऐसा नहीं है’?
‘नहीं, मित्र।’
‘और क्या तुम जानते हो—‘हमने पहले अवश्य पाप किया है। नहीं किया, ऐसा नहीं है’?
‘नहीं, मित्र।’
‘और क्या तुम जानते हो—‘हमने इस-इस प्रकार का पाप किया है’?
‘नहीं, मित्र।’
‘और क्या तुम जानते हो—‘हमने (अब तक) इतने दुःखों की निर्जरा की, इतने दुःखों की निर्जरा बची है, और इतने दुःखों की निर्जरा करने पर सभी दुःखों की निर्जरा हो जाएगी’?
‘नहीं, मित्र।’
‘और क्या तुम जानते हो—‘इसी वर्तमान जीवन में अकुशल स्वभावों का त्याग करना, और कुशल स्वभाव को आत्मसात करना (क्या होता है)’?
‘नहीं, मित्र।’
‘तो ऐसा लगता है, मित्र निगण्ठों, कि तुम नहीं जानते—‘हम पहले थे, या नहीं’, ‘पहले पाप किया हैं, या नहीं’, ‘किस प्रकार का पाप किया’, ‘कितने दुःखों की निर्जरा की, कितने दुःखों की निर्जरा बची है, और कितने दुःखों की निर्जरा करने पर सभी दुःखों की निर्जरा हो जाएगी’, और ‘वर्तमान जीवन में अकुशल स्वभावों का त्याग, कुशल स्वभाव को आत्मसात करना क्या होता है’।
यदि ऐसा हो, तो आयुष्मान निगण्ठों के लिए ऐसी घोषणा करना उचित नहीं है कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है। इसलिए, तप करके पुराने कर्मों को मिटाने और नए कर्मों को न करने से भविष्य की ओर बहाव नहीं होता। भविष्य में न आने पर कर्म का क्षय होता है। कर्म के क्षय से दुःख का क्षय होता है। दुःख के क्षय से वेदना का क्षय होता है। वेदना के क्षय से सभी दुःखों की निर्जरा होती हैं।’
किन्तु, मित्र निगण्ठों, यदि तुम वाकई जानते—‘हम पहले थे, या नहीं’, ‘पहले पाप किया हैं, या नहीं’… तब आयुष्मान निगण्ठों के लिए ऐसी घोषणा करना उचित होता कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’
जैसे, मित्र निगण्ठों, किसी पुरुष में ऐसा तीर बिंध जाता है, जो गाढ़े विष में डूबाया गया हो। तब उसे तीर के बींधने के कारण दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना होती है। तब उसके मित्र-सहचारी, नाति-रिश्तेदार उसके लिए शल्य-चिकित्सक वैद्य की व्यवस्था करते हैं।
वह शल्य-चिकित्सक वैद्य शस्त्र से उसके घाव-मुख को खोलता है। तब शस्त्र से घाव-मुख को खोलने के कारण, उसे दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना होती है।
तब वह शल्य-चिकित्सक वैद्य उसके तीर को टटोलता है। तीर के टटोले जाने के कारण, उसे दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना होती है।
तब वह शल्य-चिकित्सक वैद्य उसके तीर को खींचकर निकालता है। तीर के खींचकर निकाले जाने के कारण, उसे दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना होती है।
तब वह शल्य-चिकित्सक वैद्य उसके घावमुख पर जलन पैदा करने वाली औषधि लगाता है। घावमुख पर जलन पैदा करने वाली औषधि लगाने के कारण, उसे दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना होती है।
तब कुछ समय बीतने पर, उसका घाव भरता है, और त्वचा उबरती है। तब वह स्वस्थ, सुखी, स्वतंत्र, स्वयं के वश में होकर, जहाँ जाना चाहे वहाँ जाता है।
तब उसे याद आता है, “पहले मुझे ऐसा तीर बिंध गया था… तब दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना… शल्य-चिकित्सक वैद्य ने शस्त्र से मेरे घाव-मुख को खोला… तब दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना… तीर को टटोला… तब दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना… तीर को खींचकर निकाला… तब दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना… घावमुख पर जलन पैदा करने वाली औषधि लगाया… तब दर्दभरी तीव्र और कटु पीड़ाओं की वेदना… तब समय बीतने पर, मेरा घाव भर गया… अब मैं स्वस्थ, सुखी, स्वतंत्र, स्वयं के वश में होकर, जहाँ जाना चाहूँ वहाँ जाता हूँ।”
उसी तरह, मित्र निगण्ठों, यदि तुम वाकई जानते—‘हम पहले थे, या नहीं’, ‘पहले पाप किया हैं, या नहीं’… तब आयुष्मान निगण्ठों के लिए ऐसी घोषणा करना उचित होता कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’
किन्तु, जब तुम नहीं जानते हो—‘हम पहले थे, या नहीं’, ‘पहले पाप किया हैं, या नहीं’… तब आयुष्मान निगण्ठों के लिए ऐसी घोषणा करना उचित नहीं है कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’
जब ऐसा कहा गया, भिक्षुओं, तब निगण्ठों ने मुझसे कहा, ‘मित्र, निगण्ठ नाटपुत्त (=महावीर जैन) सर्वज्ञ और सर्वदर्शी, और निरंतर (=बिना चुके) ज्ञान-दर्शन होने का दावा करते हैं, “मुझे चलते-खड़े-सोते-जागते हुए, हमेशा और निरंतर ज्ञान-दर्शन उपस्थित होता है।”
वे कहते हैं, “मित्र निगण्ठों, तुमने पहले पाप कर्म किए हैं। उसे कटुकारी दुष्कर-चर्या से नष्ट करो। जब तुम वर्तमान में काया से संयमित, वाणी से संयमित, और मन से संयमित रहते हो, तब तुम भविष्य के लिए पाप कर्म नहीं करते। इसलिए, तप करके पुराने कर्मों को मिटाने और नए कर्मों को न करने से भविष्य की ओर बहाव नहीं होता। भविष्य में न आने पर कर्म का क्षय होता है। कर्म के क्षय से दुःख का क्षय होता है। दुःख के क्षय से वेदना का क्षय होता है। वेदना के क्षय से सभी दुःखों की निर्जरा होती हैं।”
हमें यही (शिक्षा) पसंद है, स्वीकार है, उसी में हम हर्षित हैं।’
जब ऐसा कहा गया, भिक्षुओं, तब मैंने निगण्ठों से कहा, ‘पाँच बातें हैं, मित्र निगण्ठों, जो वर्तमान जीवन में दो तरह से फलश्रुत हो सकती हैं। कौन-सी पाँच?
—ये पाँच बातें हैं, मित्र निगण्ठों, जो वर्तमान जीवन में दो तरह से फलश्रुत हो सकती हैं।
जब ऐसा हो, तो आयुष्मान निगण्ठों को अतीत के बारे में शास्ता के प्रति किस प्रकार की श्रद्धा है, किस प्रकार की पसंद है, किस प्रकार की परंपरागत श्रुति है, किस प्रकार का तर्कसंगत विचार है, किस प्रकार मान्यता का सोच-समझकर स्वीकार है?’
जब मैंने ऐसा कहा, भिक्षुओं, तब मैंने निगण्ठों से किसी प्रकार का धम्मपूर्ण प्रतिवाद (=प्रत्युत्तर) प्रकट होते नहीं देखा।
तब, भिक्षुओं, पुनः मैंने निगण्ठों से कहा, ‘क्या लगता है, मित्र नि? जिस समय अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम होता है, क्या उस समय तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति होती है? और जिस समय अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम नहीं होता, क्या उस समय तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति नहीं होती?’
‘हाँ, मित्र गोतम, जिस समय अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम होता है, उस समय हमें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति होती है। और जिस समय अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम नहीं होता, उस समय हमें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति नहीं होती।’
‘तो ऐसा लगता है, मित्र निगण्ठों, कि अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम होने पर तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति होती है। किन्तु, अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम न होने पर तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति नहीं होती। तब आयुष्मान निगण्ठों के लिए ऐसी घोषणा करना उचित नहीं है कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’
क्योंकि, यदि अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम होने पर भी तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति न होती; बल्कि अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम न होने पर भी तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति होती; तब आयुष्मान निगण्ठों के लिए ऐसी घोषणा करना उचित होता कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’
मित्र निगण्ठों, अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम होने पर तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति होती है। किन्तु, अत्याधिक मेहनत, तीव्र परिश्रम न होने पर तुम्हें तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति नहीं होती। क्या तब तुम्हें स्वयं के ही (आत्म-यातनापूर्ण) परिश्रम से तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति नहीं हो रही, जिसे अविद्या, अज्ञान और भ्रम से उलटा समझ रहे हो कि—‘जो कुछ व्यक्ति को महसूस होता है, सुखद, दुःखद, या अदुखद-असुखद, वह सब पूर्व कृत्यों से होता है…’
जब मैंने ऐसा कहा, भिक्षुओं, तब मैंने निगण्ठों से किसी प्रकार का धम्मपूर्ण प्रतिवाद प्रकट होते नहीं देखा।
तब, भिक्षुओं, पुनः मैंने निगण्ठों से कहा, ‘क्या लगता है, मित्र नि? यदि कोई कर्म वर्तमान जीवन में अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से (धकेल कर) अगले जीवन में अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, यदि कोई कर्म अगले जीवन में अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से (खींच कर) इसी वर्तमान जीवन में अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, क्या लगता है, मित्र नि? यदि कोई कर्म सुखद अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से दुखद अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, यदि कोई कर्म दुखद अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से सुखद अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, क्या लगता है, मित्र नि? यदि कोई कर्म परिपक्व होकर अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से अपरिपक्व ही अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, यदि कोई कर्म अपरिपक्व ही अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से परिपक्व होकर अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, क्या लगता है, मित्र नि? यदि कोई कर्म बहुत (प्रबलता से) अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से अल्प अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, यदि कोई कर्म अल्प अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, परिश्रम से बहुत (प्रबलता से) अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, क्या लगता है, मित्र नि? यदि कोई कर्म (किसी रूप में) अनुभव होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, बिना अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘और, यदि कोई कर्म अनुभव न होने वाला हो। तब क्या उसे मेहनत से, अनुभव होने वाला बनाया जा सकता है?’
‘नहीं, मित्र।’
‘तो ऐसा लगता है, मित्र निगण्ठों, कि मेहनत से और परिश्रम से—
ऐसा हो, तो आयुष्मान निगण्ठों की मेहनत निष्फल है, परिश्रम निष्फल है।’
निगण्ठ ऐसा कहते हैं, भिक्षुओं। और ऐसा कहने वाले निगण्ठों का धम्मानुसार दस प्रकार से खण्डन और आलोचना होती है—
(१) यदि सत्व पूर्वकृत्यों के कारण ही सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि निगण्ठों ने पहले दुष्कर्म किए होंगे, जिसके कारण वे तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति करते हैं।
(२) यदि सत्व ईश्वर से निर्मित होने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि निगण्ठों को किसी पापी ईश्वर ने निर्मित किया होगा, जिसके कारण वे तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति करते हैं।
(३) यदि सत्व भाग्यवश सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि निगण्ठों का भाग्य खराब होगा, जिसके कारण वे तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति करते हैं।
(४) यदि सत्व जाति (में जन्म लेने) के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि निगण्ठों की जाति खराब होगी, जिसके कारण वे तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति करते हैं।
(५) यदि सत्व इसी जीवन में परिश्रम करने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि निगण्ठों उस (बेकार) प्रकार का परिश्रम कर रहे होंगे, जिसके कारण वे तीव्र व कटुकारी दुखद वेदना की अनुभूति करते हैं।
(६) यदि सत्व पूर्वकृत्यों के कारण ही सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो निगण्ठों निंदनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी निगण्ठों निंदनीय हैं।
(७) यदि सत्व ईश्वर से निर्मित होने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो निगण्ठों निंदनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी निगण्ठों निंदनीय हैं।
(८) यदि सत्व भाग्यवश सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो निगण्ठों निंदनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी निगण्ठों निंदनीय हैं।
(९) यदि सत्व जाति (में जन्म लेने) के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो निगण्ठों निंदनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी निगण्ठों निंदनीय हैं।
(१०) यदि सत्व इसी जीवन में परिश्रम करने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो निगण्ठों निंदनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी निगण्ठों निंदनीय हैं।
निगण्ठ ऐसा कहते हैं, भिक्षुओं। और ऐसा कहने वाले निगण्ठों का धम्मानुसार दस प्रकार से खण्डन और आलोचना होती है। और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत निष्फल होती है, परिश्रम निष्फल होता है।
और, भिक्षुओं, मेहनत सफल कैसे होती है, परिश्रम सफल कैसे होता है?
भिक्षुओं, जो भिक्षु दुःख में न पड़ा हो, वह (जबर्दस्ती) स्वयं को दुःख से अभिभूत नहीं करता, न ही धार्मिक सुख ठुकराता है, किन्तु उस सुख में मदहोश भी नहीं होता।
बल्कि, वह समझता है कि—(१) ‘जब मैं परिश्रम करते हुए दुःख के स्त्रोत (=तृष्णा) के विरुद्ध संस्कार (=शारीरिक/शाब्दिक/चैतसिक संस्कार) करता हूँ, तब उस परिश्रमपूर्ण संस्कार के सहारे (उस तृष्णा का) विराग होता है। (२) और, जब मैं दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध तटस्थ-भाव विकसित करता हूँ, तब उस तटस्थ-भाव के सहारे विराग होता है।’
तब, वह परिश्रम करते हुए दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध संस्कार करता है—इस प्रकार दुःखों की निर्जरा होती है। और, वह दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध तटस्थ-भाव विकसित करता है—इस प्रकार दुःखों की निर्जरा होती है।
जैसे, भिक्षुओं, कोई पुरुष किसी स्त्री के प्रति प्रेमासक्त हो—समर्पित हृदय, तीव्र चाहत, तीव्र अपेक्षा के साथ। तब वह उस स्त्री को किसी अन्य पुरुष के साथ खड़े देखता है—गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए।
क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या उस स्त्री को किसी अन्य पुरुष के साथ खड़े होकर गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए देख—उस पुरुष को शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, या निराशा होगी?”
“हाँ, भन्ते!”
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि, भन्ते, वह पुरुष उस स्त्री के प्रति प्रेमासक्त है—समर्पित हृदय, तीव्र चाहत, तीव्र अपेक्षा के साथ। इसलिए उसे उस स्त्री को अन्य पुरुष के साथ खड़े होकर गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए देख—शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, या निराशा होगी।”
“तब, भिक्षुओं, उस पुरुष को लगता है, ‘मैं इस स्त्री के प्रति प्रेमासक्त है—समर्पित हृदय, तीव्र चाहत, तीव्र अपेक्षा के साथ। इसलिए उस स्त्री को अन्य पुरुष के साथ खड़े होकर गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए देख—मुझे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, या निराशा होटी है। क्यों न मैं उस स्त्री के प्रति जो चाहत और दिलचस्पी (“छन्दराग”) है, उसे त्याग दूँ?’
तब वह उस स्त्री के प्रति जो चाहत और दिलचस्पी होती है, उसे त्याग देता है। और, फिर कुछ समय पश्चात उस स्त्री को किसी अन्य पुरुष के साथ खड़े देखता है—गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए।
क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या अब उस स्त्री को किसी अन्य पुरुष के साथ खड़े होकर गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए देख—उस पुरुष को शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, या निराशा होगी?”
“नहीं, भन्ते!”
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि, भन्ते, अब उस पुरुष का उस स्त्री के प्रति विराग हो चुका है। इसलिए अब उसे स्त्री को अन्य पुरुष के साथ खड़े होकर गपशप करते हुए, मस्ती करते हुए, हँसते हुए देख—शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, या निराशा नहीं होगी।”
“उसी तरह, भिक्षुओं, जो भिक्षु दुःख में न पड़ा हो, वह (जबर्दस्ती) स्वयं को दुःख से अभिभूत नहीं करता, न ही धार्मिक सुख ठुकराता है, किन्तु उस सुख में मदहोश भी नहीं होता। बल्कि, वह समझता है कि—‘जब मैं परिश्रम करते हुए दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध संस्कार करता हूँ, तब उस परिश्रमपूर्ण संस्कार के सहारे विराग होता है। और, जब मैं दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध तटस्थ-भाव विकसित करता हूँ, तब उस तटस्थ-भाव के सहारे विराग होता है।’
तब, वह परिश्रम करते हुए दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध संस्कार करता है—इस प्रकार दुःखों की निर्जरा होती है। और, दुःख के स्त्रोत के विरुद्ध तटस्थ-भाव विकसित करता है—इस प्रकार (भी) दुःखों की निर्जरा होती है।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु इस तरह चिंतन-मनन करता है, ‘मेरे सुख-सुविधानुसार विहार करने पर अकुशल स्वभाव बढ़ते हैं, कुशल घटते हैं। किंतु, मेरे स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम करने पर अकुशल स्वभाव घटते हैं, कुशल बढ़ते हैं। क्यों न मैं स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम करूँ?’
तब, वह दुःखपूर्ण परिश्रम करता है। तब उसके स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम करने पर अकुशल स्वभाव घटते हैं, कुशल बढ़ते हैं। तब, कुछ समय पश्चात, वह स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम नहीं करेगा। ऐसा क्यों?
क्योंकि, भिक्षुओं, जिस ध्येय से वह भिक्षु स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम कर रहा था, उस ध्येय को उसने साध लिया। इसलिए, कुछ समय पश्चात, वह स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम नहीं करेगा।
जैसे, भिक्षुओं, कोई तीर बनाने वाला हो—जो तीर को दो (ओर से) जलती लकड़ी के बीच पकड़कर, उसे जलाते हुए, तपाते हुए, सीधा और उपयोगी बनाता हो। तब, कुछ समय पश्चात, वह उस तीर को दो जलती लकड़ी के बीच पकड़कर, जलाते हुए, तपाते हुए सीधा और उपयोगी नहीं बनाता। ऐसा क्यों?
क्योंकि, भिक्षुओं, जिस ध्येय से वह उस तीर को दो जलती लकड़ी के बीच पकड़कर, उसे जलाते हुए, तपाते हुए, सीधा और उपयोगी बना रहा था, उस ध्येय को उसने साध लिया। इसलिए, (पुनः) कुछ समय पश्चात, वह उस तीर को दो जलती लकड़ी के बीच पकड़कर, जलाते हुए, तपाते हुए सीधा और उपयोगी नहीं बनाता।
उसी तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु इस तरह चिंतन-मनन करता है, ‘मेरे सुख-सुविधानुसार विहार करने पर अकुशल स्वभाव बढ़ते हैं, कुशल घटते हैं। किंतु, मेरे स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम करने पर अकुशल स्वभाव घटते हैं, कुशल बढ़ते हैं। क्यों न मैं स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम करूँ?’
तब, वह दुःखपूर्ण परिश्रम करता है। तब उसके स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम करने पर अकुशल स्वभाव घटते हैं, कुशल बढ़ते हैं। तब, कुछ समय पश्चात, वह स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम नहीं करेगा। ऐसा क्यों? क्योंकि, भिक्षुओं, जिस ध्येय से वह भिक्षु स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम कर रहा था, उस ध्येय को उसने साध लिया। इसलिए, कुछ समय पश्चात, वह स्वयं दुःखपूर्ण परिश्रम नहीं करेगा।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
आगे, भिक्षुओं, यहाँ कभी इस लोक में ‘तथागत अरहंत सम्यकसम्बुद्ध’ प्रकट होते हैं—जो विद्या और आचरण से संपन्न होते हैं, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, भिक्षुओं, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो।
ऐसा धम्म सुनकर किसी गृहस्थ या कुलपुत्र को तथागत के प्रति श्रद्धा जागती है। उसे लगता है, “गृहस्थ जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु प्रवज्या, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य निभाना कठिन है, जो शुद्ध शंख जैसा उज्ज्वल हो! क्यों न मैं सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो जाऊँ?’
फिर वह समय पाकर, थोड़ी या अधिक धन-संपत्ति त्यागकर, छोटा या बड़ा परिवार त्यागकर, सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रजित होता है।
[expand]
• प्रव्रजित होकर ऐसा भिक्षु शिक्षा और आजीविका से संपन्न होकर हिंसा त्यागकर जीवहत्या से विरत रहता है—डंडा और शस्त्र फेंक चुका, शर्मिला और दयावान, समस्त जीवहित के प्रति करुणामयी।
• वह ‘न सौपी चीज़ें’ त्यागकर चोरी से विरत रहता है—मात्र सौपी चीज़ें ही उठाता, स्वीकारता है। पावन जीवन जीता है, चोरी-चुपके नहीं।
• वह ब्रह्मचर्य धारणकर अब्रह्मचर्य से विरत रहता है—‘देहाती’ मैथुनधम्म से विरत!
• वह झूठ बोलना त्यागकर असत्यवचन से विरत रहता है। वह सत्यवादी, सत्य का पक्षधर, दृढ़ और भरोसेमंद बनता है; दुनिया को ठगता नहीं।
• वह विभाजित करनेवाली बातें त्यागकर फूट डालनेवाले वचन से विरत रहता है। यहाँ सुनकर वहाँ नहीं बताता, ताकि वहाँ दरार पड़े। वहाँ सुनकर यहाँ नहीं बताता, ताकि यहाँ दरार पड़े। बल्कि वह बटे हुए लोगों का मेल कराता है, साथ रहते लोगों को जोड़ता है, एकता चाहता है, आपसी भाईचारे में प्रसन्न और ख़ुश होता है; ‘सामंजस्यता बढ़े’ ऐसे बोल बोलता है।
• वह तीखा बोलना त्यागकर कटु वचन से विरत रहता है। वह ऐसे मीठे बोल बोलता है—जो राहत दे, कर्णमधुर लगे, हृदय छू ले, स्नेहपूर्ण हो, सौम्य हो, अधिकांश लोगों को अनुकूल और स्वीकार्य लगे।
• वह बक़वास त्यागकर व्यर्थ वचन से विरत रहता है। वह समयानुकूल बोलता है, तथ्यात्मक बोलता है, अर्थपूर्ण बोलता है, धम्मानुकूल बोलता है, विनयानुकूल बोलता है; ‘बहुमूल्य लगे’ ऐसे सटीक वचन वह बोलता है—तर्क के साथ, नपे-तुले शब्दों में, सही समय पर, सही दिशा में, ध्येय के साथ।
• वह बीज और पौधों का जीवनाश करना त्यागता है।…
• वह दिन में एक-बार भोजन करता है—रात्रिभोज व विकालभोज से विरत।…
• वह नृत्य, गीत, वाद्यसंगीत तथा मनोरंजन से विरत रहता है।…
• वह मालाएँ, गन्ध, लेप, सुडौलता-लानेवाले तथा अन्य सौंदर्य-प्रसाधन से विरत रहता है।…
• वह बड़े विलासी आसन और पलंग का उपयोग करने से विरत रहता है।…
• वह स्वर्ण व रुपये स्वीकारने से विरत रहते है।…
• वह कच्चा अनाज… कच्चा माँस… स्त्री व कुमारी… दासी व दास… भेड़ व बकरी… मुर्गी व सूवर… हाथी, गाय, घोड़ा, खच्चर… ख़ेत व संपत्ति स्वीकारने से विरत रहता है।…
• वह दूत [=संदेशवाहक] का काम… ख़रीद-बिक्री… भ्रामक तराज़ू, नाप, मानदंडों द्वारा ठगना… घूसख़ोरी, ठगना, ज़ाली काम, छलकपट… हाथपैर काटने, पीटने बाँधने, लूट डाका व हिंसा करने से विरत रहता है।
वह शरीर ढकने के लिए चीवर और पेट भरने के लिए भिक्षा पर संतुष्ट रहता है। वह जहाँ भी जाता है, अपनी सभी मूल आवश्यकताओं को साथ लेकर जाता है। जैसे पक्षी जहाँ भी जाता है, मात्र अपने पंखों को लेकर उड़ता है। उसी तरह, कोई भिक्षु शरीर ढकने के लिए चीवर और पेट भरने के लिए भिक्षा पर संतुष्ट रहता है। वह ऐसे आर्य शीलस्कन्ध से संपन्न होकर भीतर निष्पाप सुख का अनुभव करता है।
वह ऐसे आर्यसँवर से संपन्न होकर भीतर निष्पाप सुख का अनुभव करता है।
वह आगे बढ़ते और लौट आते सचेत होता है। वह नज़र टिकाते और नज़र हटाते सचेत होता है। वह [अंग] सिकोड़ते और पसारते हुए सचेत होता है। वह संघाटी, पात्र और चीवर धारण करते हुए सचेत होता है। वह खाते, पीते, चबाते, स्वाद लेते हुए सचेत होता है। वह पेशाब और शौच करते हुए सचेत होता है। वह चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, मौन होते हुए सचेत होता है।
इस तरह वह आर्य शीलस्कन्ध से संपन्न होकर, आर्य संतुष्टि से संपन्न होकर, इंद्रियों पर आर्य सँवर से संपन्न होकर, आर्य स्मृति और सचेतता से संपन्न होकर एकांतवास ढूँढता है—जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर। भिक्षाटन से लौटकर भोजन के पश्चात, वह पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठता है और स्मृति आगे लाता है।
वह इन पाँच व्यवधानों (“नीवरण”) को हटाता है, ऐसे चित्त के उपक्लेश जो प्रज्ञा को दुर्बल बनाते हैं।
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(१) तब, भिक्षुओं, वह कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
(२) आगे, भिक्षुओं, वह वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
(३) आगे, भिक्षुओं, वह प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—वह उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
(४) आगे, भिक्षुओं, वह सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
आगे, भिक्षुओं, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को पूर्वजन्मों का अनुस्मरण करने की ओर झुकाता है। तो उसे विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण होने लगते है—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त [=ब्रह्मांडिय सिकुड़न], कई कल्पों का लोक-विवर्त [=ब्रह्मांडिय विस्तार], कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
आगे, भिक्षुओं, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को सत्वों की गति जानने [“चुतूपपात ञाण”] की ओर झुकाता है। तब विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं। कैसे ये सत्व—काया दुराचार में संपन्न, वाणी दुराचार में संपन्न, एवं मन दुराचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की, और मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजे।’ किन्तु कैसे ये सत्व—काया सदाचार में संपन्न, वाणी सदाचार में संपन्न, एवं मन सदाचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, सम्यक-दृष्टि धारण की, और सम्यक-दृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजे। इस तरह विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
आगे, भिक्षुओं, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाता है। तब ‘दुःख ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख की उत्पत्ति ऐसी है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख का निरोध ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख का निरोध-मार्ग ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव की उत्पत्ति ऐसी है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव का निरोध ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव का निरोध-मार्ग ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है।
इस तरह जानने से, देखने से, उसका चित्त काम-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, भव-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, अविद्या-आस्रव से विमुक्त हो जाता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है, ‘विमुक्त हुआ!’ उसे पता चलता है, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’
और इस प्रकार, भिक्षुओं, मेहनत सफल होती है, परिश्रम सफल होता है।
तथागत ऐसा कहते हैं, भिक्षुओं। और ऐसा कहने वाले तथागत की धम्मानुसार दस प्रकार से प्रशंसा होती है—
(१) यदि सत्व पूर्वकृत्यों के कारण ही सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि तथागत ने पहले सत्कर्म किए होंगे, जिस कारण वे इस प्रकार की अनास्रव सुखद वेदना महसूस करते हैं।
(२) यदि सत्व ईश्वर से निर्मित होने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि तथागत को किसी भले ईश्वर ने निर्मित किया होगा, जिस कारण वे इस प्रकार की अनास्रव सुखद वेदना महसूस करते हैं।
(३) यदि सत्व भाग्यवश सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि तथागत का भाग्य कल्याणकारी होगा, जिस कारण वे इस प्रकार की अनास्रव सुखद वेदना महसूस करते हैं।
(४) यदि सत्व जाति (में जन्म लेने) के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि तथागत की जाति कल्याणकारी होगी, जिस कारण वे इस प्रकार की अनास्रव सुखद वेदना महसूस करते हैं।
(५) यदि सत्व इसी जीवन में परिश्रम करने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो स्पष्ट है कि तथागत का परिश्रम कल्याणकारी होगा, जिस कारण वे इस प्रकार की अनास्रव सुखद वेदना महसूस करते हैं।
(६) यदि सत्व पूर्वकृत्यों के कारण ही सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो तथागत प्रशंसनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी तथागत प्रशंसनीय हैं।
(७) यदि सत्व ईश्वर से निर्मित होने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो तथागत प्रशंसनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी तथागत प्रशंसनीय हैं।
(८) यदि सत्व भाग्यवश सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो तथागत प्रशंसनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी तथागत प्रशंसनीय हैं।
(९) यदि सत्व जाति (में जन्म लेने) के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो तथागत प्रशंसनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी तथागत प्रशंसनीय हैं।
(१०) यदि सत्व इसी जीवन में परिश्रम करने के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, तो तथागत प्रशंसनीय हैं। यदि ऐसा न हो, तब भी तथागत प्रशंसनीय हैं।
तथागत ऐसा कहते हैं, भिक्षुओं। और ऐसा कहने वाले तथागत की धम्मानुसार दस प्रकार से प्रशंसा होती है।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
देवदह का उल्लेख संयुक्तनिकाय २२.२ और ३५.१३४ में भी मिलता है। अट्ठकथा में इसके नाम की व्याख्या “राजसी सरोवर” के रूप में की गई है। बाद के बौद्ध साहित्य में यह स्थान कोलिय वंश की दो बहनों, माता महामाया और महाप्रजापती, का जन्मस्थान होने के कारण विख्यात हुआ, जो क्रमशः बुद्ध की जन्म-माता और पालक-माता थीं। हालांकि, इस सूत्र के जैसे अन्य प्रारम्भिक सूत्रों में इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता; बल्कि वहाँ इस नगर को ‘कोलिय नगर’ नहीं, बल्कि ‘शाक्य नगर’ बताया गया है, जो अट्ठकथा की बात के विपरीत जाती है। खैर, आधुनिक पहचान इसे नेपाल के रूपन्देही ज़िले में स्थित देवदह से जोड़ती है। ↩︎
जैनों का मानना हैं कि कर्म सूक्ष्म कणों से बना एक भौतिक पदार्थ है। आत्मपीड़ा वाली कठोर तपस्या (“तपस”) से शरीर में तीव्र ताप उत्पन्न होता है, और यही ताप उन कर्मकणों को जला देता है। जब ये कण नष्ट होते हैं, तो जीव (“जीवा”) अपनी स्वाभाविक निर्मलता में स्वयं चमकने लगता है। ↩︎
१. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सक्केसु विहरति देवदहं नाम सक्यानं निगमो। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘सन्ति, भिक्खवे, एके समणब्राह्मणा एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’ति। एवंवादिनो, भिक्खवे, निगण्ठा।
‘‘एवंवादाहं , भिक्खवे, निगण्ठे उपसङ्कमित्वा एवं वदामि – ‘सच्चं किर तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’ति? ते च मे, भिक्खवे, निगण्ठा एवं पुट्ठा ‘आमा’ति पटिजानन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ – अहुवम्हेव मयं पुब्बे, न नाहुवम्हा’ति? ‘नो हिदं, आवुसो’।
‘‘‘किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ – अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं, न नाकरम्हा’ति? ‘नो हिदं, आवुसो’।
‘‘‘किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ – एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हा’ति? ‘नो हिदं, आवुसो’।
‘‘‘किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ – एत्तकं वा दुक्खं निज्जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्जीरेतब्बं, एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’ति? ‘नो हिदं, आवुसो’।
‘‘‘किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ – दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पद’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’।
२. ‘‘इति किर तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, न जानाथ – अहुवम्हेव मयं पुब्बे, न नाहुवम्हाति , न जानाथ – अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं, न नाकरम्हाति, न जानाथ – एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हाति, न जानाथ – एत्तकं वा दुक्खं निज्जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्जीरेतब्बं, एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सतीति, न जानाथ – दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदं; एवं सन्ते आयस्मन्तानं निगण्ठानं न कल्लमस्स वेय्याकरणाय – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’’ति।
‘‘सचे पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानेय्याथ – अहुवम्हेव मयं पुब्बे, न नाहुवम्हाति, जानेय्याथ – अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं, न नाकरम्हाति, जानेय्याथ – एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हाति, जानेय्याथ – एत्तकं वा दुक्खं निज्जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्जीरेतब्बं, एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सतीति, जानेय्याथ – दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदं; एवं सन्ते आयस्मन्तानं निगण्ठानं कल्लमस्स वेय्याकरणाय – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’’ति।
३. ‘‘सेय्यथापि, आवुसो निगण्ठा, पुरिसो सल्लेन विद्धो अस्स सविसेन गाळ्हूपलेपनेन गाळ्हपलेपनेन (क॰); सो सल्लस्सपि वेधनहेतु वेदनाहेतु (सी॰ पी॰ क॰) दुक्खा तिब्बा तिप्पा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) कटुका वेदना वेदियेय्य। तस्स मित्तामच्चा ञातिसालोहिता भिसक्कं सल्लकत्तं उपट्ठापेय्युं। तस्स सो भिसक्को सल्लकत्तो सत्थेन वणमुखं परिकन्तेय्य; सो सत्थेनपि वणमुखस्स परिकन्तनहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेय्य। तस्स सो भिसक्को सल्लकत्तो एसनिया सल्लं एसेय्य; सो एसनियापि सल्लस्स एसनाहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेय्य । तस्स सो भिसक्को सल्लकत्तो सल्लं अब्बुहेय्य अब्बुय्हेय्य (सी॰), अब्भूण्हेय्य (स्या॰ कं॰); सो सल्लस्सपि अब्बुहनहेतु अब्बुय्हनहेतु (सी॰), अब्भूण्हनहेतु (स्या॰ कं॰) दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेय्य। तस्स सो भिसक्को सल्लकत्तो अगदङ्गारं वणमुखे ओदहेय्य; सो अगदङ्गारस्सपि वणमुखे ओदहनहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेय्य। सो अपरेन समयेन रूळ्हेन वणेन सञ्छविना अरोगो अस्स सुखी सेरी सयंवसी येन कामङ्गमो। तस्स एवमस्स – अहं खो पुब्बे सल्लेन विद्धो अहोसिं सविसेन गाळ्हूपलेपनेन। सोहं सल्लस्सपि वेधनहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियिं। तस्स मे मित्तामच्चा ञातिसालोहिता भिसक्कं सल्लकत्तं उपट्ठपेसुं। तस्स मे सो भिसक्को सल्लकत्तो सत्थेन वणमुखं परिकन्ति; सोहं सत्थेनपि वणमुखस्स परिकन्तनहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियिं। तस्स मे सो भिसक्को सल्लकत्तो एसनिया सल्लं एसि; सो अहं एसनियापि सल्लस्स एसनाहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियिं। तस्स मे सो भिसक्को सल्लकत्तो सल्लं अब्बुहि अब्बुय्हि (सी॰), अब्भूण्हि (स्या॰ कं॰); सोहं सल्लस्सपि अब्बुहनहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियिं। तस्स मे सो भिसक्को सल्लकत्तो अगदङ्गारं वणमुखे ओदहि; सोहं अगदङ्गारस्सपि वणमुखे ओदहनहेतु दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियिं। सोम्हि एतरहि रूळ्हेन वणेन सञ्छविना अरोगो सुखी सेरी सयंवसी येन कामङ्गमो’’ति।
‘‘एवमेव खो, आवुसो निगण्ठा, सचे तुम्हे जानेय्याथ – अहुवम्हेव मयं पुब्बे, न नाहुवम्हाति, जानेय्याथ – अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं, न नाकरम्हाति, जानेय्याथ – एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हाति, जानेय्याथ – एत्तकं वा दुक्खं निज्जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्जीरेतब्बं, एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सतीति, जानेय्याथ – दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदं; एवं सन्ते आयस्मन्तानं निगण्ठानं कल्लमस्स वेय्याकरणाय – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’’ति।
‘‘यस्मा च खो तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, न जानाथ – अहुवम्हेव मयं पुब्बे, न नाहुवम्हाति, न जानाथ – अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं, न नाकरम्हाति, न जानाथ – एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हाति, न जानाथ – एत्तकं वा दुक्खं निज्जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्जीरेतब्बं, एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सतीति, न जानाथ – दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदं; तस्मा आयस्मन्तानं निगण्ठानं न कल्लमस्स वेय्याकरणाय – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’’ति।
४. ‘‘एवं वुत्ते, भिक्खवे, ते निगण्ठा मं एतदवोचुं – ‘निगण्ठो , आवुसो, नाटपुत्तो नाथपुत्तो (सी॰) सब्बञ्ञू सब्बदस्सावी, अपरिसेसं ञाणदस्सनं पटिजानाति । चरतो च मे तिट्ठतो च सुत्तस्स च जागरस्स च सततं समितं ञाणदस्सनं पच्चुपट्ठित’न्ति। सो एवमाह – ‘अत्थि खो वो, आवुसो निगण्ठा, पुब्बेव पापकम्मं कतं, तं इमाय कटुकाय दुक्करकारिकाय निज्जीरेथ, यं पनेत्थ एतरहि कायेन संवुता वाचाय संवुता मनसा संवुता तं आयतिं पापकम्मस्स अकरणं। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’ति। तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च, तेन चम्हा अत्तमना’’ति।
५. ‘‘एवं वुत्ते अहं, भिक्खवे, ते निगण्ठे एतदवोचं – ‘पञ्च खो इमे, आवुसो निगण्ठा, धम्मा दिट्ठेव धम्मे द्विधाविपाका। कतमे पञ्च? सद्धा, रुचि, अनुस्सवो, आकारपरिवितक्को, दिट्ठिनिज्झानक्खन्ति – इमे खो, आवुसो निगण्ठा, पञ्च धम्मा दिट्ठेव धम्मे द्विधाविपाका। तत्रायस्मन्तानं निगण्ठानं का अतीतंसे सत्थरि सद्धा, का रुचि, को अनुस्सवो, को आकारपरिवितक्को, का दिट्ठिनिज्झानक्खन्ती’ति। एवंवादी एवंवादीसु (क॰) खो अहं, भिक्खवे, निगण्ठेसु न कञ्चि किञ्चि (सी॰ पी॰ क॰) सहधम्मिकं वादपटिहारं समनुपस्सामि।
‘‘पुन चपराहं पुन च पनाहं (सी॰ पी॰ क॰), भिक्खवे, ते निगण्ठे एवं वदामि – ‘तं किं मञ्ञथ, आवुसो निगण्ठा। यस्मिं वो समये तिब्बो तिप्पो (पी॰) उपक्कमो होति तिब्बं पधानं, तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ; यस्मिं पन वो समये न तिब्बो उपक्कमो होति न तिब्बं पधानं, न तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथा’ति? ‘यस्मिं नो, आवुसो गोतम, समये तिब्बो उपक्कमो होति तिब्बं पधानं, तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियाम; यस्मिं पन नो समये न तिब्बो उपक्कमो होति न तिब्बं पधानं, न तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियामा’’’ति।
६. ‘‘इति किर, आवुसो निगण्ठा, यस्मिं वो समये तिब्बो उपक्कमो होति तिब्बं पधानं, तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ; यस्मिं पन वो समये न तिब्बो उपक्कमो होति न तिब्बं पधानं, न तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ। एवं सन्ते आयस्मन्तानं निगण्ठानं न कल्लमस्स वेय्याकरणाय – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो ; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सतीति। सचे, आवुसो निगण्ठा, यस्मिं वो समये तिब्बो उपक्कमो होति तिब्बं पधानं, न तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ; यस्मिं पन वो समये न तिब्बो उपक्कमो होति न तिब्बं पधानं, तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ पधानं, तिट्ठेय्येव तस्मिं समये… वेदना (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰); एवं सन्ते आयस्मन्तानं निगण्ठानं कल्लमस्स वेय्याकरणाय – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’’ति।
‘‘‘यस्मा च खो, आवुसो निगण्ठा, यस्मिं वो समये तिब्बो उपक्कमो होति तिब्बं पधानं, तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ; यस्मिं पन वो समये न तिब्बो उपक्कमो होति न तिब्बं पधानं, न तिब्बा तस्मिं समये ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियेथ; ते तुम्हे सामंयेव ओपक्कमिका दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदयमाना अविज्जा अञ्ञाणा सम्मोहा विपच्चेथ – यं किञ्चायं पुरिसपुग्गलो पटिसंवेदेति सुखं वा दुक्खं वा अदुक्खमसुखं वा, सब्बं तं पुब्बेकतहेतु। इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तीभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो; कम्मक्खया दुक्खक्खयो; दुक्खक्खया वेदनाक्खयो ; वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्जिण्णं भविस्सती’ति। एवंवादीपि एवंवादीसुपि (क॰) खो अहं, भिक्खवे, निगण्ठेसु न कञ्चि सहधम्मिकं वादपटिहारं समनुपस्सामि।
७. ‘‘पुन चपराहं, भिक्खवे, ते निगण्ठे एवं वदामि – ‘तं किं मञ्ञथावुसो निगण्ठा, यमिदं कम्मं दिट्ठधम्मवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा सम्परायवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘यं पनिदं कम्मं सम्परायवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा दिट्ठधम्मवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘तं किं मञ्ञथावुसो निगण्ठा, यमिदं कम्मं सुखवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा दुक्खवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘यं पनिदं कम्मं दुक्खवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा सुखवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘तं किं मञ्ञथावुसो निगण्ठा, यमिदं कम्मं परिपक्कवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा अपरिपक्कवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘यं पनिदं कम्मं अपरिपक्कवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा परिपक्कवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘तं किं मञ्ञथावुसो निगण्ठा, यमिदं कम्मं बहुवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा अप्पवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘यं पनिदं कम्मं अप्पवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा बहुवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘तं किं मञ्ञथावुसो निगण्ठा, यमिदं कम्मं सवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा अवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’। ‘यं पनिदं कम्मं अवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा सवेदनीयं होतूति लब्भमेत’न्ति? ‘नो हिदं, आवुसो’।
८. ‘‘इति किर, आवुसो निगण्ठा, यमिदं कम्मं दिट्ठधम्मवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा सम्परायवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यं पनिदं कम्मं सम्परायवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा दिट्ठधम्मवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं सुखवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा दुक्खवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं दुक्खवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा सुखवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं परिपक्कवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा अपरिपक्कवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं अपरिपक्कवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा परिपक्कवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं बहुवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा अप्पवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं अप्पवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा बहुवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं सवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा अवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं, यमिदं कम्मं अवेदनीयं तं उपक्कमेन वा पधानेन वा सवेदनीयं होतूति अलब्भमेतं; एवं सन्ते आयस्मन्तानं निगण्ठानं अफलो उपक्कमो होति, अफलं पधानं’’।
‘‘एवंवादी, भिक्खवे, निगण्ठा। एवंवादीनं, भिक्खवे, निगण्ठानं दस सहधम्मिका वादानुवादा गारय्हं ठानं आगच्छन्ति।
९. ‘‘सचे, भिक्खवे, सत्ता पुब्बेकतहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, निगण्ठा पुब्बे दुक्कटकम्मकारिनो यं एतरहि एवरूपा दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियन्ति। सचे, भिक्खवे, सत्ता इस्सरनिम्मानहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, निगण्ठा पापकेन इस्सरेन निम्मिता यं एतरहि एवरूपा दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियन्ति। सचे, भिक्खवे, सत्ता सङ्गतिभावहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, निगण्ठा पापसङ्गतिका यं एतरहि एवरूपा दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियन्ति। सचे, भिक्खवे, सत्ता अभिजातिहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, निगण्ठा पापाभिजातिका यं एतरहि एवरूपा दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियन्ति। सचे, भिक्खवे, सत्ता दिट्ठधम्मूपक्कमहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, निगण्ठा एवरूपा दिट्ठधम्मूपक्कमा यं एतरहि एवरूपा दुक्खा तिब्बा कटुका वेदना वेदियन्ति।
‘‘सचे, भिक्खवे, सत्ता पुब्बेकतहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा; नो चे सत्ता पुब्बेकतहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा। सचे, भिक्खवे, सत्ता इस्सरनिम्मानहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा; नो चे सत्ता इस्सरनिम्मानहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा। सचे, भिक्खवे, सत्ता सङ्गतिभावहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा; नो चे सत्ता सङ्गतिभावहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा। सचे, भिक्खवे, सत्ता अभिजातिहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा; नो चे सत्ता अभिजातिहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा। सचे, भिक्खवे, सत्ता दिट्ठधम्मूपक्कमहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा; नो चे सत्ता दिट्ठधम्मूपक्कमहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, गारय्हा निगण्ठा। एवंवादी, भिक्खवे, निगण्ठा। एवंवादीनं, भिक्खवे, निगण्ठानं इमे दस सहधम्मिका वादानुवादा गारय्हं ठानं आगच्छन्ति। एवं खो, भिक्खवे, अफलो उपक्कमो होति, अफलं पधानं।
१०. ‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं? इध, भिक्खवे, भिक्खु न हेव अनद्धभूतं अत्तानं दुक्खेन अद्धभावेति, धम्मिकञ्च सुखं न परिच्चजति, तस्मिञ्च सुखे अनधिमुच्छितो होति। सो एवं पजानाति – ‘इमस्स खो मे दुक्खनिदानस्स सङ्खारं पदहतो सङ्खारप्पधाना विरागो होति, इमस्स पन मे दुक्खनिदानस्स अज्झुपेक्खतो उपेक्खं भावयतो विरागो होती’ति। सो यस्स हि ख्वास्स यस्स खो पनस्स (सी॰), यस्स ख्वास्स (पी॰) दुक्खनिदानस्स सङ्खारं पदहतो सङ्खारप्पधाना विरागो होति, सङ्खारं तत्थ पदहति। यस्स पनस्स दुक्खनिदानस्स अज्झुपेक्खतो उपेक्खं भावयतो विरागो होति, उपेक्खं तत्थ भावेति। तस्स तस्स दुक्खनिदानस्स सङ्खारं पदहतो सङ्खारप्पधाना विरागो होति – एवम्पिस्स तं दुक्खं निज्जिण्णं होति। तस्स तस्स दुक्खनिदानस्स अज्झुपेक्खतो उपेक्खं भावयतो विरागो होति – एवम्पिस्स तं दुक्खं निज्जिण्णं होति।
११. ‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, पुरिसो इत्थिया सारत्तो पटिबद्धचित्तो तिब्बच्छन्दो तिब्बापेक्खो। सो तं इत्थिं पस्सेय्य अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं। तं किं मञ्ञथ, भिक्खवे, अपि नु तस्स पुरिसस्स अमुं इत्थिं दिस्वा अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा’’ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘तं किस्स हेतु’’? ‘‘अमु हि, भन्ते, पुरिसो अमुस्सा इत्थिया सारत्तो पटिबद्धचित्तो तिब्बच्छन्दो तिब्बापेक्खो । तस्मा तं इत्थिं दिस्वा अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा’’ति। ‘‘अथ खो, भिक्खवे, तस्स पुरिसस्स एवमस्स – ‘अहं खो अमुस्सा इत्थिया सारत्तो पटिबद्धचित्तो तिब्बच्छन्दो तिब्बापेक्खो। तस्स मे अमुं इत्थिं दिस्वा अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं उप्पज्जन्ति सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा। यंनूनाहं यो मे अमुस्सा इत्थिया छन्दरागो तं पजहेय्य’न्ति। सो यो अमुस्सा इत्थिया छन्दरागो तं पजहेय्य। सो तं इत्थिं पस्सेय्य अपरेन समयेन अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं। तं किं मञ्ञथ, भिक्खवे, अपि नु तस्स पुरिसस्स अमुं इत्थिं दिस्वा अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा’’ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘तं किस्स हेतु’’? ‘‘अमु हि, भन्ते, पुरिसो अमुस्सा इत्थिया विरागो। तस्मा तं इत्थिं दिस्वा अञ्ञेन पुरिसेन सद्धिं सन्तिट्ठन्तिं सल्लपन्तिं सञ्जग्घन्तिं संहसन्तिं न उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा’’ति।
‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु न हेव अनद्धभूतं अत्तानं दुक्खेन अद्धभावेति, धम्मिकञ्च सुखं न परिच्चजति, तस्मिञ्च सुखे अनधिमुच्छितो होति। सो एवं पजानाति – ‘इमस्स खो मे दुक्खनिदानस्स सङ्खारं पदहतो सङ्खारप्पधाना विरागो होति, इमस्स पन मे दुक्खनिदानस्स अज्झुपेक्खतो उपेक्खं भावयतो विरागो होती’ति। सो यस्स हि ख्वास्स दुक्खनिदानस्स सङ्खारं पदहतो सङ्खारप्पधाना विरागो होति, सङ्खारं तत्थ पदहति; यस्स पनस्स दुक्खनिदानस्स अज्झुपेक्खतो उपेक्खं भावयतो विरागो होति, उपेक्खं तत्थ भावेति। तस्स तस्स दुक्खनिदानस्स सङ्खारं पदहतो सङ्खारप्पधाना विरागो होति – एवम्पिस्स तं दुक्खं निज्जिण्णं होति । तस्स तस्स दुक्खनिदानस्स अज्झुपेक्खतो उपेक्खं भावयतो विरागो होति – एवम्पिस्स तं दुक्खं निज्जिण्णं होति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
१२. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु इति पटिसञ्चिक्खति – ‘यथासुखं खो मे विहरतो अकुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति, कुसला धम्मा परिहायन्ति; दुक्खाय पन मे अत्तानं पदहतो अकुसला धम्मा परिहायन्ति, कुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति। यंनूनाहं दुक्खाय अत्तानं पदहेय्य’न्ति। सो दुक्खाय अत्तानं पदहति। तस्स दुक्खाय अत्तानं पदहतो अकुसला धम्मा परिहायन्ति कुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति। सो न अपरेन समयेन दुक्खाय अत्तानं पदहति। तं किस्स हेतु? यस्स हि सो, भिक्खवे, भिक्खु अत्थाय दुक्खाय अत्तानं पदहेय्य स्वास्स अत्थो अभिनिप्फन्नो होति। तस्मा न अपरेन समयेन दुक्खाय अत्तानं पदहति। सेय्यथापि, भिक्खवे, उसुकारो तेजनं द्वीसु अलातेसु आतापेति परितापेति उजुं करोति कम्मनियं। यतो खो, भिक्खवे, उसुकारस्स तेजनं द्वीसु अलातेसु आतापितं होति परितापितं उजुं कतं उजुं कतं होति (सी॰) कम्मनियं, न सो तं अपरेन समयेन उसुकारो तेजनं द्वीसु अलातेसु आतापेति परितापेति उजुं करोति कम्मनियं। तं किस्स हेतु? यस्स हि सो, भिक्खवे, अत्थाय उसुकारो तेजनं द्वीसु अलातेसु आतापेय्य परितापेय्य उजुं करेय्य कम्मनियं स्वास्स अत्थो अभिनिप्फन्नो होति। तस्मा न अपरेन समयेन उसुकारो तेजनं द्वीसु अलातेसु आतापेति परितापेति उजुं करोति कम्मनियं। एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इति पटिसञ्चिक्खति – ‘यथासुखं खो मे विहरतो अकुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति, कुसला धम्मा परिहायन्ति; दुक्खाय पन मे अत्तानं पदहतो अकुसला धम्मा परिहायन्ति, कुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति। यंनूनाहं दुक्खाय अत्तानं पदहेय्य’न्ति। सो दुक्खाय अत्तानं पदहति। तस्स दुक्खाय अत्तानं पदहतो अकुसला धम्मा परिहायन्ति, कुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति। सो न अपरेन समयेन दुक्खाय अत्तानं पदहति। तं किस्स हेतु? यस्स हि सो, भिक्खवे, भिक्खु अत्थाय दुक्खाय अत्तानं पदहेय्य स्वास्स अत्थो अभिनिप्फन्नो होति। तस्मा न अपरेन समयेन दुक्खाय अत्तानं पदहति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
१३. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, इध तथागतो लोके उप्पज्जति अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा। सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति। सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं, केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति। तं धम्मं सुणाति गहपति वा गहपतिपुत्तो वा अञ्ञतरस्मिं वा कुले पच्चाजातो। सो तं धम्मं सुत्वा तथागते सद्धं पटिलभति। सो तेन सद्धापटिलाभेन समन्नागतो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘सम्बाधो घरावासो रजापथो, अब्भोकासो पब्बज्जा। नयिदं सुकरं अगारं अज्झावसता एकन्तपरिपुण्णं एकन्तपरिसुद्धं सङ्खलिखितं ब्रह्मचरियं चरितुं। यंनूनाहं केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजेय्य’न्ति। सो अपरेन समयेन अप्पं वा भोगक्खन्धं पहाय महन्तं वा भोगक्खन्धं पहाय, अप्पं वा ञातिपरिवट्टं पहाय महन्तं वा ञातिपरिवट्टं पहाय केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजति।
१४. ‘‘सो एवं पब्बजितो समानो भिक्खूनं सिक्खासाजीवसमापन्नो पाणातिपातं पहाय पाणातिपाता पटिविरतो होति निहितदण्डो निहितसत्थो, लज्जी दयापन्नो सब्बपाणभूतहितानुकम्पी विहरति। अदिन्नादानं पहाय अदिन्नादाना पटिविरतो होति दिन्नादायी दिन्नपाटिकङ्खी, अथेनेन सुचिभूतेन अत्तना विहरति। अब्रह्मचरियं पहाय ब्रह्मचारी होति आराचारी विरतो मेथुना गामधम्मा। मुसावादं पहाय मुसावादा पटिविरतो होति सच्चवादी सच्चसन्धो थेतो पच्चयिको अविसंवादको लोकस्स। पिसुणं वाचं पहाय पिसुणाय वाचाय पटिविरतो होति; इतो सुत्वा न अमुत्र अक्खाता इमेसं भेदाय, अमुत्र वा सुत्वा न इमेसं अक्खाता अमूसं भेदाय – इति भिन्नानं वा सन्धाता सहितानं वा अनुप्पदाता समग्गारामो समग्गरतो समग्गनन्दी समग्गकरणिं वाचं भासिता होति। फरुसं वाचं पहाय फरुसाय वाचाय पटिविरतो होति; या सा वाचा नेला कण्णसुखा पेमनीया हदयङ्गमा पोरी बहुजनकन्ता बहुजनमनापा तथारूपिं वाचं भासिता होति। सम्फप्पलापं पहाय सम्फप्पलापा पटिविरतो होति कालवादी भूतवादी अत्थवादी धम्मवादी विनयवादी, निधानवतिं वाचं भासिता कालेन सापदेसं परियन्तवतिं अत्थसंहितं। सो बीजगामभूतगामसमारम्भा पटिविरतो होति। एकभत्तिको होति रत्तूपरतो विरतो विकालभोजना। नच्चगीतवादितविसूकदस्सना पटिविरतो होति। मालागन्धविलेपनधारणमण्डनविभूसनट्ठाना पटिविरतो होति। उच्चासयनमहासयना पटिविरतो होति। जातरूपरजतपटिग्गहणा पटिविरतो होति। आमकधञ्ञपटिग्गहणा पटिविरतो होति। आमकमंसपटिग्गहणा पटिविरतो होति। इत्थिकुमारिकपटिग्गहणा पटिविरतो होति। दासिदासपटिग्गहणा पटिविरतो होति। अजेळकपटिग्गहणा पटिविरतो होति। कुक्कुटसूकरपटिग्गहणा पटिविरतो होति। हत्थिगवस्सवळवपटिग्गहणा पटिविरतो होति। खेत्तवत्थुपटिग्गहणा पटिविरतो होति। दूतेय्यपहिणगमनानुयोगा पटिविरतो होति। कयविक्कया पटिविरतो होति। तुलाकूटकंसकूटमानकूटा पटिविरतो होति। उक्कोटनवञ्चननिकतिसाचियोगा सावियोगा (स्या॰ कं॰ क॰) एत्थ साचिसद्दो कुटिलपरियायो पटिविरतो होति। छेदनवधबन्धनविपरामोसआलोपसहसाकारा पटिविरतो होति पस्स म॰ नि॰ १.२९३ चूळहत्थिपदोपमे।
‘‘सो सन्तुट्ठो होति कायपरिहारिकेन चीवरेन, कुच्छिपरिहारिकेन पिण्डपातेन। सो येन येनेव पक्कमति समादायेव पक्कमति। सेय्यथापि नाम पक्खी सकुणो येन येनेव डेति सपत्तभारोव डेति, एवमेव भिक्खु सन्तुट्ठो होति कायपरिहारिकेन चीवरेन, कुच्छिपरिहारिकेन पिण्डपातेन; सो येन येनेव पक्कमति समादायेव पक्कमति। सो इमिना अरियेन सीलक्खन्धेन समन्नागतो अज्झत्तं अनवज्जसुखं पटिसंवेदेति।
१५. ‘‘सो चक्खुना रूपं दिस्वा न निमित्तग्गाही होति नानुब्यञ्जनग्गाही। यत्वाधिकरणमेनं चक्खुन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं तस्स संवराय पटिपज्जति, रक्खति चक्खुन्द्रियं, चक्खुन्द्रिये संवरं आपज्जति। सोतेन सद्दं सुत्वा…पे॰… घानेन गन्धं घायित्वा…पे॰… जिव्हाय रसं सायित्वा…पे॰… कायेन फोट्ठब्बं फुसित्वा…पे॰… मनसा धम्मं विञ्ञाय न निमित्तग्गाही होति नानुब्यञ्जनग्गाही। यत्वाधिकरणमेनं मनिन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं तस्स संवराय पटिपज्जति, रक्खति मनिन्द्रियं, मनिन्द्रिये संवरं आपज्जति। सो इमिना अरियेन इन्द्रियसंवरेन समन्नागतो अज्झत्तं अब्यासेकसुखं पटिसंवेदेति।
‘‘सो अभिक्कन्ते पटिक्कन्ते सम्पजानकारी होति, आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होति, समिञ्जिते सम्मिञ्जिते (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) पसारिते सम्पजानकारी होति, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी होति , असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी होति, उच्चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी होति, गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी होति।
१६. ‘‘सो इमिना च अरियेन सीलक्खन्धेन समन्नागतो, (इमाय च अरियाय सन्तुट्ठिया समन्नागतो,) पस्स म॰ नि॰ १.२९६ चूळहत्थिपदोपमे इमिना च अरियेन इन्द्रियसंवरेन समन्नागतो, इमिना च अरियेन सतिसम्पजञ्ञेन समन्नागतो विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। सो पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो निसीदति पल्लङ्कं आभुजित्वा, उजुं कायं पणिधाय, परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। सो अभिज्झं लोके पहाय विगताभिज्झेन चेतसा विहरति, अभिज्झाय चित्तं परिसोधेति। ब्यापादपदोसं पहाय अब्यापन्नचित्तो विहरति सब्बपाणभूतहितानुकम्पी, ब्यापादपदोसा चित्तं परिसोधेति। थिनमिद्धं पहाय विगतथिनमिद्धो विहरति आलोकसञ्ञी सतो सम्पजानो, थिनमिद्धा चित्तं परिसोधेति। उद्धच्चकुक्कुच्चं पहाय अनुद्धतो विहरति अज्झत्तं वूपसन्तचित्तो , उद्धच्चकुक्कुच्चा चित्तं परिसोधेति। विचिकिच्छं पहाय तिण्णविचिकिच्छो विहरति अकथंकथी कुसलेसु धम्मेसु, विचिकिच्छाय चित्तं परिसोधेति।
‘‘सो इमे पञ्च नीवरणे पहाय चेतसो उपक्किलेसे पञ्ञाय दुब्बलीकरणे विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति। एवम्पि , भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं उपसम्पज्ज विहरति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु पीतिया च विरागा उपेक्खको च विहरति सतो च सम्पजानो, सुखञ्च कायेन पटिसंवेदेति। यं तं अरिया आचिक्खन्ति – ‘उपेक्खको सतिमा सुखविहारी’ति ततियं झानं उपसम्पज्ज विहरति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सुखस्स च पहाना दुक्खस्स च पहाना, पुब्बेव सोमनस्सदोमनस्सानं अत्थङ्गमा, अदुक्खमसुखं उपेक्खासतिपारिसुद्धिं चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
१७. ‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते पुब्बेनिवासानुस्सतिञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेति। सो अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति, सेय्यथिदं सेय्यथीदं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) – एकम्पि जातिं द्वेपि जातियो तिस्सोपि जातियो चतस्सोपि जातियो पञ्चपि जातियो दसपि जातियो वीसम्पि जातियो तिंसम्पि जातियो चत्तालीसम्पि जातियो पञ्ञासम्पि जातियो जातिसतम्पि जातिसहस्सम्पि जातिसतसहस्सम्पि अनेकेपि संवट्टकप्पे अनेकेपि विवट्टकप्पे अनेकेपि संवट्टविवट्टकप्पे – ‘अमुत्रासिं एवंनामो एवंगोत्तो एवंवण्णो एवमाहारो एवंसुखदुक्खप्पटिसंवेदी एवमायुपरियन्तो, सो ततो चुतो अमुत्र उदपादिं; तत्रापासिं एवंनामो एवंगोत्तो एवंवण्णो एवमाहारो एवंसुखदुक्खप्पटिसंवेदी एवमायुपरियन्तो, सो ततो चुतो इधूपपन्नो’ति। इति साकारं सउद्देसं अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
१८. ‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते सत्तानं चुतूपपातञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेति। सो दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे, सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति – ‘इमे वत भोन्तो सत्ता कायदुच्चरितेन समन्नागता वचीदुच्चरितेन समन्नागता मनोदुच्चरितेन समन्नागता अरियानं उपवादका मिच्छादिट्ठिका मिच्छादिट्ठिकम्मसमादाना, ते कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपन्ना। इमे वा पन भोन्तो सत्ता कायसुचरितेन समन्नागता वचीसुचरितेन समन्नागता मनोसुचरितेन समन्नागता अरियानं अनुपवादका सम्मादिट्ठिका सम्मादिट्ठिकम्मसमादाना, ते कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपन्ना’ति। इति दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे, सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति। एवम्पि, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं।
१९. ‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते आसवानं खयञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेति। सो ‘इदं दुक्ख’न्ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खसमुदयो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खनिरोधो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं पजानाति; ‘इमे आसवा’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं आसवसमुदयो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं आसवनिरोधो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं आसवनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं पजानाति। तस्स एवं जानतो एवं पस्सतो कामासवापि चित्तं विमुच्चति, भवासवापि चित्तं विमुच्चति, अविज्जासवापि चित्तं विमुच्चति। विमुत्तस्मिं विमुत्तमिति ञाणं होति। ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानाति। एवम्पि खो, भिक्खवे, सफलो उपक्कमो होति, सफलं पधानं। एवंवादी, भिक्खवे, तथागता। एवंवादीनं, भिक्खवे, तथागतानं तथागतो, एवंवादिं भिक्खवे तथागतं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) दस सहधम्मिका पासंसट्ठाना आगच्छन्ति।
२०. ‘‘सचे , भिक्खवे, सत्ता पुब्बेकतहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, तथागतो पुब्बे सुकतकम्मकारी यं एतरहि एवरूपा अनासवा सुखा वेदना वेदेति। सचे, भिक्खवे, सत्ता इस्सरनिम्मानहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, तथागतो भद्दकेन इस्सरेन निम्मितो यं एतरहि एवरूपा अनासवा सुखा वेदना वेदेति। सचे, भिक्खवे, सत्ता सङ्गतिभावहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, तथागतो कल्याणसङ्गतिको यं एतरहि एवरूपा अनासवा सुखा वेदना वेदेति। सचे, भिक्खवे, सत्ता अभिजातिहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, तथागतो कल्याणाभिजातिको यं एतरहि एवरूपा अनासवा सुखा वेदना वेदेति। सचे, भिक्खवे, सत्ता दिट्ठधम्मूपक्कमहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति; अद्धा, भिक्खवे, तथागतो कल्याणदिट्ठधम्मूपक्कमो यं एतरहि एवरूपा अनासवा सुखा वेदना वेदेति।
‘‘सचे, भिक्खवे, सत्ता पुब्बेकतहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो; नो चे सत्ता पुब्बेकतहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो। सचे, भिक्खवे, सत्ता इस्सरनिम्मानहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो; नो चे सत्ता इस्सरनिम्मानहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो। सचे, भिक्खवे, सत्ता सङ्गतिभावहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो; नो चे सत्ता सङ्गतिभावहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो। सचे, भिक्खवे, सत्ता अभिजातिहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो; नो चे सत्ता अभिजातिहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो। सचे, भिक्खवे, सत्ता दिट्ठधम्मूपक्कमहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो; नो चे सत्ता दिट्ठधम्मूपक्कमहेतु सुखदुक्खं पटिसंवेदेन्ति, पासंसो तथागतो। एवंवादी, भिक्खवे, तथागता। एवंवादीनं, भिक्खवे, तथागतानं इमे दस सहधम्मिका पासंसट्ठाना आगच्छन्ती’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
देवदहसुत्तं निट्ठितं पठमं।