
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान पिसिनारा (=कुसिनारा) के बलिहरण वनक्षेत्र में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”
“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“भिक्षुओं, तुम्हें मेरे बारे में क्या लगता है—‘श्रमण गोतम चीवर पाने के हेतु से धम्म बताते हैं। श्रमण गोतम भिक्षा पाने के हेतु से धम्म बताते हैं। श्रमण गोतम आवास पाने के हेतु से धम्म बताते हैं। श्रमण गोतम यहाँ-वहाँ पुनर्जन्म पाने के हेतु से धम्म बताते हैं’?”
“नहीं, भन्ते। हमें भगवान के बारे में ऐसा नहीं लगता है कि—‘श्रमण गोतम चीवर… भिक्षा… आवास… यहाँ-वहाँ पुनर्जन्म पाने के हेतु से धम्म बताते हैं।’”
“तब, भिक्षुओं, भला तुम्हें मेरे बारे में क्या लगता है?”
“भन्ते, हमें भगवान के बारे में लगता है कि—‘भगवान कृपालु और हितैषी हैं। वे उपकार कर हमें धम्म बताते हैं।’”
“तो लगता है, भिक्षुओं, कि तुम्हें मेरे बारे में लगता है कि—‘भगवान कृपालु और हितैषी हैं। वे उपकार कर हमें धम्म बताते हैं।’ ऐसा हो, भिक्षुओं, तब मैंने प्रत्यक्ष-ज्ञान से जो धम्म बताए हैं, जैसे—
—उन्हें तुम सभी को मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखना चाहिए।
और हो सकता है, भिक्षुओं, उन्हें तुम सभी को मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए दो भिक्षुओं में उन ऊँचे धम्मों (“अभिधम्म”) 1 के प्रति अलग-अलग राय हो।
कभी तुम्हें लगेगा, ‘इन दो आयुष्मानों में अर्थ को लेकर भिन्न राय हैं, और वाक्यों को लेकर भी भिन्न राय हैं।’ 2
तब, तुम जिसे अधिक सुवचो (=जिसे कहना सरल हो) मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आप आयुष्मानों में अर्थ को लेकर भिन्न राय हैं, और वाक्यों को लेकर भी भिन्न राय हैं। आयुष्मान जान लें कि इस तरह अर्थ को लेकर भिन्न राय होना स्वाभाविक है, वाक्यों को लेकर भिन्न राय होना स्वाभाविक है। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
तब, दूसरे भिक्षु के पक्ष के भिक्षुओं में से जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आयुष्मानों में अर्थ को लेकर भिन्न राय हैं, और वाक्यों को लेकर भी भिन्न राय हैं। आयुष्मान जान लें कि इस तरह अर्थ को लेकर भिन्न राय होना स्वाभाविक है, वाक्यों को लेकर भिन्न राय होना स्वाभाविक है। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
और तब, दुर्ग्रहित (=गलत तरह से पकड़े, याद रखे, समझे) को दुर्ग्रहित धारण करना चाहिए, और सुग्रहीत को सुग्रहीत। दुर्ग्रहित को दुर्ग्रहित धारण कर, सुग्रहीत को सुग्रहीत धारण कर, फिर धम्म या विनय पर बोलना चाहिए। 3
कभी तुम्हें ऐसा लगेगा, ‘ये दो आयुष्मानों में अर्थ को लेकर भिन्न राय हैं, किन्तु वाक्यों को लेकर सहमति है।’
तब, तुम जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आप आयुष्मानों में अर्थ को लेकर भिन्न राय हैं, किन्तु वाक्यों को लेकर सहमति है। आयुष्मान जान लें कि इस तरह अर्थ को लेकर भिन्न राय होना स्वाभाविक है, भले ही वाक्यों को लेकर सहमति हो। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
तब, दूसरे भिक्षु के पक्ष के भिक्षुओं में से जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आयुष्मानों में अर्थ को लेकर भिन्न राय हैं, किन्तु वाक्यों को लेकर सहमति है। आयुष्मान जान लें कि इस तरह अर्थ को लेकर भिन्न राय होना स्वाभाविक है, भले ही वाक्यों को लेकर सहमति हो। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
और तब, दुर्ग्रहित को दुर्ग्रहित धारण करना चाहिए, और सुग्रहीत को सुग्रहीत। दुर्ग्रहित को दुर्ग्रहित धारण कर, सुग्रहीत को सुग्रहीत धारण कर, फिर धम्म या विनय पर बोलना चाहिए।
कभी तुम्हें ऐसा लगेगा, ‘ये दो आयुष्मानों में अर्थ को लेकर सहमति है, किन्तु वाक्यों को लेकर भिन्न राय हैं।’
तब, तुम जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आप आयुष्मानों में अर्थ को लेकर सहमति है, किन्तु वाक्यों को लेकर भिन्न राय हैं। किन्तु यह तो छोटी-सी बात है, केवल वाक्य-संस्कार। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
तब, दूसरे भिक्षु के पक्ष के भिक्षुओं में से जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आयुष्मानों में अर्थ को लेकर सहमति है, किन्तु वाक्यों को लेकर भिन्न राय हैं। किन्तु यह तो छोटी-सी बात है, केवल वाक्य-संस्कार। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
और तब, दुर्ग्रहित को दुर्ग्रहित धारण करना चाहिए, और सुग्रहीत को सुग्रहीत। दुर्ग्रहित को दुर्ग्रहित धारण कर, सुग्रहीत को सुग्रहीत धारण कर, फिर धम्म या विनय पर बोलना चाहिए।
कभी तुम्हें ऐसा लगेगा, ‘ये दो आयुष्मानों में अर्थ को लेकर सहमति है, वाक्यों को लेकर भी सहमति है।’
तब, तुम जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आप आयुष्मानों में अर्थ को लेकर सहमति है, वाक्यों को लेकर भी सहमति है। आयुष्मान जान लें कि इस तरह अर्थ और वाक्य को लेकर सहमत होना स्वाभाविक है। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
तब, दूसरे भिक्षु के पक्ष के भिक्षुओं में से जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘आयुष्मानों में अर्थ को लेकर सहमति है, वाक्यों को लेकर भी सहमति है। आयुष्मान जान लें कि इस तरह अर्थ और वाक्य को लेकर सहमत होना स्वाभाविक है। आप आयुष्मान विवाद न करें।’
और तब, सुग्रहीत को सुग्रहीत धारण करना चाहिए। सुग्रहीत को सुग्रहीत धारण कर, फिर धम्म या विनय पर बोलना चाहिए।
और हो सकता है, भिक्षुओं, उन्हें तुम सभी को मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए, किसी भिक्षु से (विनय में) आपत्ति या उल्लंघन हो जाए।
तब, भिक्षुओं, उसे तत्काल फटकारना नहीं चाहिए। बल्कि उस व्यक्ति पर चिंतन करना चाहिए, ‘मैं परेशान नहीं हो जाऊँगा, और अगला व्यक्ति आहत भी नहीं होगा। वह अगला व्यक्ति न क्रोधी है, न बदलेखोर है, न अपनी सोच पर अड़ा है (=अकड़ू) है। बल्कि, वह सरलता से त्याग देता है। (अवश्य) मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ।’
यदि, भिक्षुओं, ऐसा हो, तब उसे बोलना उचित है।
और, भिक्षुओं, यदि तुम्हें लगता है कि ‘मैं परेशान हो जाऊँगा, और अगला व्यक्ति आहत भी होगा। क्योंकि वह अगला व्यक्ति क्रोधी है, बदलेखोर है। किन्तु, वह अपनी सोच पर अड़ा नहीं है, और सरलता से त्यागता है। मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ। क्योंकि, अगले व्यक्ति को आहत करना, यह तो छोटी-सी बात है। किन्तु, यह अधिक महत्वपूर्ण है कि ‘मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ।’
यदि, भिक्षुओं, ऐसा हो, तब भी उसे बोलना उचित है।
और, भिक्षुओं, यदि तुम्हें लगता है कि ‘मैं परेशान हो जाऊँगा, किन्तु अगला व्यक्ति आहत नहीं होगा। क्योंकि वह अगला व्यक्ति क्रोधी नहीं है, बदलेखोर नहीं है। किन्तु, वह अपनी सोच पर अड़ा (=अकड़ू) है, और सरलता से नहीं त्यागता। मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ। क्योंकि, मेरा परेशान होना, यह तो छोटी-सी बात है। किन्तु, यह अधिक महत्वपूर्ण है कि ‘मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ।’
यदि, भिक्षुओं, ऐसा हो, तब भी उसे बोलना उचित है।
और, भिक्षुओं, यदि तुम्हें लगता है कि ‘मैं परेशान हो जाऊँगा, और अगला व्यक्ति आहत भी होगा। क्योंकि वह अगला व्यक्ति क्रोधी है, बदलेखोर है, अपनी सोच पर अड़ता है, सरलता से भी नहीं त्यागता। किन्तु, मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ। क्योंकि, मेरा परेशान होना और अगले व्यक्ति का आहत होना, यह तो छोटी-सी बात है। किन्तु, यह अधिक महत्वपूर्ण है कि ‘मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित कर सकता हूँ।’
यदि, भिक्षुओं, ऐसा हो, तब भी उसे बोलना उचित है।
और, भिक्षुओं, यदि तुम्हें लगता है कि ‘मैं परेशान हो जाऊँगा, और अगला व्यक्ति आहत भी होगा। क्योंकि वह अगला व्यक्ति क्रोधी है, बदलेखोर है, अपनी सोच पर अड़ता है, सरलता से भी नहीं त्यागता। मैं ऐसे व्यक्ति को अकुशलता से हटाकर कुशलता में स्थापित नहीं कर सकता।’
इस प्रकार के व्यक्ति के लिए, भिक्षुओं, तटस्थ-भाव को कम नहीं आँकना चाहिए।
जब, भिक्षुओं, मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए, एक दूसरे की बातें इकट्ठा होती हैं, दृष्टियों में टकराव होता है, चित्त आहत होता है, कड़वाहट होती है, खीज (=चिड़चिड़) होती है।
तब, एक पक्ष के भिक्षुओं में से जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘मित्र, हम मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए, एक दूसरे की बातें इकट्ठा होती हैं, दृष्टियों में टकराव होता है, चित्त आहत होता है, कड़वाहट होती है, खीज होती है। ऐसा जानने पर श्रमण आलोचना करेंगे।’
तब, भिक्षुओं, सही तरह से उत्तर देते हुए वह भिक्षु उत्तर देगा, ‘हाँ, मित्र। हम मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए, एक दूसरे की बातें इकट्ठा होती हैं, दृष्टियों में टकराव होता है, चित्त आहत होता है, कड़वाहट होती है, खीज होती है। ऐसा जानने पर श्रमण आलोचना करेंगे।’
‘किन्तु, मित्र, क्या उस स्वभाव को बिना त्यागे, निर्वाण का साक्षात्कार हो सकता है?’
तब, भिक्षुओं, सही तरह से उत्तर देते हुए भिक्षु उत्तर देगा, ‘नहीं, मित्र। उस स्वभाव को बिना त्यागे, निर्वाण का साक्षात्कार नहीं हो सकता।’
तब, दूसरे पक्ष के भिक्षुओं में से जिसे अधिक सुवचो मानते हो, उसके पास जाकर कहना चाहिए, ‘मित्र, हम मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए, एक दूसरे की बातें इकट्ठा होती हैं, दृष्टियों में टकराव होता है, चित्त आहत होता है, कड़वाहट होती है, खीज होती है। ऐसा जानने पर श्रमण आलोचना करेंगे।’
तब, भिक्षुओं, सही तरह से उत्तर देते हुए वह भिक्षु उत्तर देगा, ‘हाँ, मित्र। हम मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखते हुए, एक दूसरे की बातें इकट्ठा होती हैं, दृष्टियों में टकराव होता है, चित्त आहत होता है, कड़वाहट होती है, खीज होती है। ऐसा जानने पर श्रमण आलोचना करेंगे।’
‘किन्तु, मित्र, क्या उस स्वभाव को बिना त्यागे, निर्वाण का साक्षात्कार हो सकता है?’
तब, भिक्षुओं, सही तरह से उत्तर देते हुए भिक्षु उत्तर देगा, ‘नहीं, मित्र। उस स्वभाव को बिना त्यागे, निर्वाण का साक्षात्कार नहीं हो सकता।’
तब भिक्षुओं, उस दूसरे भिक्षु से ऐसा पूछना चाहिए, ‘क्या आप आयुष्मान ने उन भिक्षुओं को अकुशल से हटाकर कुशलता में स्थापित किया था?’
सही तरह से उत्तर देते हुए भिक्षु उत्तर देगा, ‘ऐसा है, मित्र, मैं भगवान के पास गया, तब भगवान ने मुझे धम्म बताया। उस धम्म को सुनकर मैंने उन भिक्षुओं को बता दिया। तब वे भिक्षुगण उस धम्म को सुनकर अकुशल से हटकर कुशलता में स्थापित हुए।’
इस तरह उत्तर देने पर, भिक्षुओं, भिक्षु न स्वयं को ऊँचा दिखाता है, न पराए को नीचा। बल्कि, वह धम्म के अनुसार धम्म बताता है, ताकि किसी सहधार्मिक व्यक्ति के पास आलोचना की गुंजाइश न रहे।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
यहाँ अभिधम्म शब्द का इस्तेमाल बिल्कुल स्पष्ट रूप से बोधिपक्खिय धम्म के संदर्भ में हुआ है। इनके बारे में जानने के लिए हमारी शब्दावली देखें—अभिधम्म और बोधिपक्खिय धम्म। ↩︎
अर्थ और वाक्य-संस्कार (“अत्थ-ब्यञ्जन”) एक दूसरे का आधार लेकर बात का सटीक संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। एक ही अर्थ को अलग-अलग वाक्यों में कहा जा सकता है, लेकिन एक ही वाक्य के कई अर्थ भी निकल सकते हैं। ↩︎
भगवान ने परिनिर्वाण से कुछ समय पहले ही भिक्षुओं को भविष्य में होने वाली ऐसी असहमतियों से निपटने के लिए कुछ स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे, जिनका उल्लेख पासादिक सुत्त में भी मिलता है। ↩︎
३४. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा पिसिनारायं कुसिनारायं (सी॰) विहरति बलिहरणे वनसण्डे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘किन्ति वो , भिक्खवे, मयि होति – ‘चीवरहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति, पिण्डपातहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति, सेनासनहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति, इतिभवाभवहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेती’’’ति? ‘‘न खो नो, भन्ते, भगवति एवं होति – ‘चीवरहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति, पिण्डपातहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति, सेनासनहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति, इतिभवाभवहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेती’’’ति।
‘‘न च किर वो, भिक्खवे, मयि एवं होति – ‘चीवरहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेति…पे॰… इतिभवाभवहेतु वा समणो गोतमो धम्मं देसेती’ति; अथ किन्ति चरहि वो अथ किन्ति वो (सी॰ पी॰), अथ किञ्चरहि वो (क॰), भिक्खवे, मयि होती’’ति? ‘‘एवं खो नो, भन्ते, भगवति होति – ‘अनुकम्पको भगवा हितेसी; अनुकम्पं उपादाय धम्मं देसेती’’’ति। ‘‘एवञ्च एवं (सी॰ पी॰) किर वो, भिक्खवे, मयि होति – ‘अनुकम्पको भगवा हितेसी; अनुकम्पं उपादाय धम्मं देसेती’’’ति।
३५. ‘‘तस्मातिह, भिक्खवे, ये वो ये ते (क॰) मया धम्मा अभिञ्ञा देसिता, सेय्यथिदं – चत्तारो सतिपट्ठाना चत्तारो सम्मप्पधाना चत्तारो इद्धिपादा पञ्चिन्द्रियानि पञ्च बलानि सत्त बोज्झङ्गा अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो, तत्थ सब्बेहेव समग्गेहि सम्मोदमानेहि अविवदमानेहि सिक्खितब्बं। तेसञ्च वो, भिक्खवे, समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं सियंसु सियुं (सी॰ स्या॰ कं॰) सद्दनीति ओलोकेतब्बा द्वे भिक्खू अभिधम्मे नानावादा। तत्र चे तुम्हाकं एवमस्स – ‘इमेसं खो आयस्मन्तानं अत्थतो चेव नानं ब्यञ्जनतो च नान’न्ति, तत्थ यं भिक्खुं सुवचतरं सुब्बचतरं (क॰) मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो चेव नानं, ब्यञ्जनतो च नानं। तदमिनापेतं तदिमिनापेतं (स्या॰ कं॰) आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो चेव नानं, ब्यञ्जनतो च नानं। मायस्मन्तो विवादं आपज्जित्था’ति। अथापरेसं एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो चेव नानं, ब्यञ्जनतो च नानं। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो चेव नानं, ब्यञ्जनतो च नानं। मायस्मन्तो विवादं आपज्जित्था’ति। इति दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेतब्बं, सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेतब्बं। दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेत्वा सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेत्वा इति दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेतब्बं, दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेत्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अनन्तरवारत्तये पन इदं पाठनानत्तं नत्थि यो धम्मो यो विनयो सो भासितब्बो।
३६. ‘‘तत्र चे तुम्हाकं एवमस्स – ‘इमेसं खो आयस्मन्तानं अत्थतो हि खो नानं, ब्यञ्जनतो समेती’ति, तत्थ यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो हि नानं, ब्यञ्जनतो समेति। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो हि खो नानं, ब्यञ्जनतो समेति। मायस्मन्तो विवादं आपज्जित्था’ति। अथापरेसं एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो हि खो नानं, ब्यञ्जनतो समेति। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो हि खो नानं, ब्यञ्जनतो समेति। मायस्मन्तो विवादं आपज्जित्था’ति । इति दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेतब्बं, सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेतब्बं। दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेत्वा सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेत्वा यो धम्मो यो विनयो सो भासितब्बो।
३७. ‘‘तत्र चे तुम्हाकं एवमस्स – ‘इमेसं खो आयस्मन्तानं अत्थतो हि खो समेति, ब्यञ्जनतो नान’न्ति, तत्थ यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो हि समेति, ब्यञ्जनतो नानं। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो हि खो समेति, ब्यञ्जनतो नानं। अप्पमत्तकं खो पनेतं यदिदं – ब्यञ्जनं। मायस्मन्तो अप्पमत्तके विवादं आपज्जित्था’ति। अथापरेसं एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो हि समेति, ब्यञ्जनतो नानं। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो हि खो समेति, ब्यञ्जनतो नानं। अप्पमत्तकं खो पनेतं यदिदं – ब्यञ्जनं। मायस्मन्तो अप्पमत्तके अप्पमत्तकेहि (सी॰ पी॰) विवादं आपज्जित्था’ति। इति सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेतब्बं, दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेतब्बं। सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेत्वा दुग्गहितं दुग्गहिततो धारेत्वा यो धम्मो यो विनयो सो भासितब्बो।
३८. ‘‘तत्र चे तुम्हाकं एवमस्स – ‘इमेसं खो आयस्मन्तानं अत्थतो चेव समेति ब्यञ्जनतो च समेती’ति, तत्थ यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो चेव समेति, ब्यञ्जनतो च समेति। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो चेव समेति ब्यञ्जनतो च समेति। मायस्मन्तो विवादं आपज्जित्था’ति। अथापरेसं एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘आयस्मन्तानं खो अत्थतो चेव समेति ब्यञ्जनतो च समेति। तदमिनापेतं आयस्मन्तो जानाथ – यथा अत्थतो चेव समेति ब्यञ्जनतो च समेति। मायस्मन्तो विवादं आपज्जित्था’ति। इति सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेतब्बं। सुग्गहितं सुग्गहिततो धारेत्वा यो धम्मो यो विनयो सो भासितब्बो।
३९. ‘‘तेसञ्च वो, भिक्खवे, समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं सिया अञ्ञतरस्स भिक्खुनो आपत्ति सिया वीतिक्कमो, तत्र, भिक्खवे, न चोदनाय तरितब्बं चोदितब्बं (स्या॰ कं॰ क॰) तुरितब्बं (?)। पुग्गलो उपपरिक्खितब्बो – ‘इति मय्हञ्च अविहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स अनुपघातो, परो हि पुग्गलो अक्कोधनो अनुपनाही अदळ्हदिट्ठी सुप्पटिनिस्सग्गी, सक्कोमि चाहं एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतु’न्ति। सचे, भिक्खवे, एवमस्स, कल्लं वचनाय।
‘‘सचे पन, भिक्खवे, एवमस्स – ‘मय्हं खो अविहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स उपघातो, परो हि पुग्गलो कोधनो उपनाही अदळ्हदिट्ठी सुप्पटिनिस्सग्गी, सक्कोमि चाहं एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतुं। अप्पमत्तकं खो पनेतं यदिदं – परस्स यदिदं मय्हञ्च विहेसा भविस्सति परस्स च (क॰) पुग्गलस्स उपघातो। अथ खो एतदेव बहुतरं – स्वाहं सक्कोमि एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतु’न्ति । सचे, भिक्खवे, एवमस्स, कल्लं वचनाय।
‘‘सचे पन, भिक्खवे, एवमस्स – ‘मय्हं खो विहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स अनुपघातो। परो हि पुग्गलो अक्कोधनो अनुपनाही दळ्हदिट्ठी दुप्पटिनिस्सग्गी, सक्कोमि चाहं एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतुं। अप्पमत्तकं खो पनेतं यदिदं – मय्हं विहेसा मय्हञ्च विहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स उपघातो (क॰)। अथ खो एतदेव बहुतरं – स्वाहं सक्कोमि एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतु’न्ति। सचे, भिक्खवे, एवमस्स, कल्लं वचनाय।
‘‘सचे पन, भिक्खवे, एवमस्स – ‘मय्हञ्च खो विहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स उपघातो। परो हि पुग्गलो कोधनो उपनाही दळ्हदिट्ठी दुप्पटिनिस्सग्गी, सक्कोमि चाहं एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतुं। अप्पमत्तकं खो पनेतं यदिदं – मय्हञ्च विहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स उपघातो। अथ खो एतदेव बहुतरं – स्वाहं सक्कोमि एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतु’न्ति। सचे, भिक्खवे, एवमस्स, कल्लं वचनाय।
‘‘सचे पन, भिक्खवे, एवमस्स – ‘मय्हञ्च खो विहेसा भविस्सति परस्स च पुग्गलस्स उपघातो। परो हि पुग्गलो कोधनो उपनाही दळ्हदिट्ठी दुप्पटिनिस्सग्गी, न चाहं सक्कोमि एतं पुग्गलं अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापेतु’न्ति। एवरूपे, भिक्खवे, पुग्गले उपेक्खा नातिमञ्ञितब्बा।
४०. ‘‘तेसञ्च वो, भिक्खवे, समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं अञ्ञमञ्ञस्स वचीसंहारो वचीसङ्खारो (सी॰ पी॰) उप्पज्जेय्य दिट्ठिपळासो दिट्ठिपलासो (सी॰ क॰) चेतसो आघातो अप्पच्चयो अनभिरद्धि। तत्थ एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘यं नो, आवुसो, अम्हाकं समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं अञ्ञमञ्ञस्स वचीसंहारो उप्पन्नो दिट्ठिपळासो चेतसो आघातो अप्पच्चयो अनभिरद्धि, तं जानमानो समणो गरहेय्या’ति समानो (सी॰ क॰)। सम्मा ब्याकरमानो, भिक्खवे, भिक्खु एवं ब्याकरेय्य – ‘यं नो, आवुसो, अम्हाकं समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं अञ्ञमञ्ञस्स वचीसंहारो उप्पन्नो दिट्ठिपळासो चेतसो आघातो अप्पच्चयो अनभिरद्धि, तं जानमानो समणो गरहेय्याति। एतं पनावुसो, धम्मं अप्पहाय निब्बानं सच्छिकरेय्या’ति। सम्मा ब्याकरमानो, भिक्खवे, भिक्खु एवं ब्याकरेय्य – ‘एतं, आवुसो, धम्मं अप्पहाय न निब्बानं सच्छिकरेय्या’ति।
‘‘अथापरेसं एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं यं भिक्खुं सुवचतरं मञ्ञेय्याथ, सो उपसङ्कमित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘यं नो, आवुसो, अम्हाकं समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं अञ्ञमञ्ञस्स वचीसंहारो उप्पन्नो दिट्ठिपळासो चेतसो आघातो अप्पच्चयो अनभिरद्धि, तं जानमानो समणो गरहेय्या’ति। सम्मा ब्याकरमानो, भिक्खवे, भिक्खु एवं ब्याकरेय्य – ‘यं नो, आवुसो, अम्हाकं समग्गानं सम्मोदमानानं अविवदमानानं सिक्खतं अञ्ञमञ्ञस्स वचीसंहारो उप्पन्नो दिट्ठिपळासो चेतसो आघातो अप्पच्चयो अनभिरद्धि तं जानमानो समणो गरहेय्याति। एतं पनावुसो, धम्मं अप्पहाय निब्बानं सच्छिकरेय्या’ति। सम्मा ब्याकरमानो, भिक्खवे, भिक्खु एवं ब्याकरेय्य – ‘एतं खो, आवुसो, धम्मं अप्पहाय न निब्बानं सच्छिकरेय्या’’’ति।
‘‘तं चे, भिक्खवे, भिक्खुं परे एवं पुच्छेय्युं – ‘आयस्मता नो एते भिक्खू अकुसला वुट्ठापेत्वा कुसले पतिट्ठापिता’ति? सम्मा ब्याकरमानो, भिक्खवे, भिक्खु एवं ब्याकरेय्य – ‘इधाहं, आवुसो, येन भगवा तेनुपसङ्कमिं, तस्स मे भगवा धम्मं देसेसि, ताहं धम्मं सुत्वा तेसं भिक्खूनं अभासिं। तं ते भिक्खू धम्मं सुत्वा अकुसला वुट्ठहिंसु, कुसले पतिट्ठहिंसू’ति। एवं ब्याकरमानो खो, भिक्खवे, भिक्खु न चेव अत्तानं उक्कंसेति, न परं वम्भेति, धम्मस्स चानुधम्मं ब्याकरोति, न च कोचि सहधम्मिको वादानुवादो गारय्हं ठानं आगच्छती’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
किन्तिसुत्तं निट्ठितं ततियं।