
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान शाक्यों के सामग्राम में विहार कर रहे थे। उस समय निगण्ठ नाटपुत्र (=जैन महावीर) की पावा में हाल ही में मौत हुई थी। उनकी मौत होने पर निगण्ठ दो पक्षों में बंटकर लड़ाई, कलह और विवाद करते हुए एक-दूसरे को शब्द-बाणों से घायल कर रहे थे—“तुम इस धम्म-विनय को नहीं जानते, मैं इस धम्म-विनय को जानता हूँ, तुम भला क्या इस धम्म-विनय को जानोगे? तुम्हारी साधना मिथ्या है, मेरी साधना सम्यक। मेरी बात सार्थक है, तुम्हारी निरर्थक। पहले कहने-योग्य बात को अंत में बताते हो, और अंत में कहने-योग्य बात को पहले। तुम्हारी परिकल्पना उलट गयी, तुम्हारी धारणा खंडित हुई, जाओ, बचाओ अपनी धारणा को। तुम इसमें फँस गए, हिम्मत है तो निकलो इससे।” ऐसा लग रहा था, मानो निगण्ठ नाटपुत्रों में कत्लेआम मचा था।
और, जो निगण्ठ नाटपुत्र के श्रावक श्वेत वस्त्रधारी गृहस्थ थे, उनकी निगण्ठ नाटपुत्रों के प्रति मोहभंगिमा हो रही थी, विरक्ति हो रही थी, निराशा हो रही थी। और साथ ही उस धम्म-विनय के प्रति भी—जो अस्पष्ट बताया, दुर्घोषित, न तारने वाला, न परमशान्ति प्रदानकर्ता, न सम्यक-सम्बुद्ध द्वारा विदित, टूटे स्तूप का, बिना शरण वाला था।
तब, श्रामणेर चुन्द ने पावा में वर्षावास कर सामगाँव जाकर, आयुष्मान आनन्द के पास गया, और अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर श्रामणेर चुन्द ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “भन्ते, निगण्ठ नाटपुत्र की पावा में हाल ही में मौत हुई है। उनकी मौत होने पर निगण्ठ दो पक्षों में बंटकर लड़ाई, कलह और विवाद… मानो, कत्लेआम मचा है… श्वेत वस्त्रधारी गृहस्थ… की मोहभंगिमा… विरक्ति… निराशा हो रही है… और उस धम्म-विनय के प्रति भी… जो बिना शरण वाला है।” 1
ऐसा कहे जाने पर, आयुष्मान आनन्द ने श्रामणेर चुन्द से कहा, “मित्र चुन्द, इस बात पर भगवान का दर्शन लेना चाहिए। आओ, मित्र चुन्द, भगवान के पास जाए, और जाकर भगवान को यह बात बताए।”
“ठीक है, भन्ते।” श्रामणेर चुन्द ने आयुष्मान आनन्द को उत्तर दिया।
तब आयुष्मान आनन्द और श्रामणेर चुन्द भगवान के पास गए, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा, “भन्ते, ये श्रामणेर चुन्द कहता है कि ‘भन्ते, निगण्ठ नाटपुत्र की पावा में हाल ही में मौत हुई है। उनकी मौत होने पर निगण्ठ दो पक्षों में बंटकर लड़ाई, कलह और विवाद… मानो, कत्लेआम मचा है… श्वेत वस्त्रधारी गृहस्थ… की मोहभंगिमा… विरक्ति… निराशा हो रही है… और उस धम्म-विनय के प्रति भी… जो बिना शरण वाला है।’
भन्ते, मुझे (भय) लगता है कि ‘भगवान के गुजरने के बाद संघ में भी कहीं ऐसा विवाद न उत्पन्न हो। क्योंकि ऐसा विवाद बहुजनों के हित, बहुजनों के सुख, बहुजन के लिए अनर्थकारी होगा, देव-मनुष्यों के लिए दुखदायी और अहितकारक होगा।’”
“क्या लगता है, आनन्द? मैंने प्रत्यक्ष-ज्ञान से जो धम्म बताए हैं, जैसे—
—क्या इन धम्मों को लेकर, तुम किसी दो भिक्षुओं में भी भिन्न मत देखते हो?”
“नहीं, भन्ते। भगवान ने जो प्रत्यक्ष-ज्ञान से जो धम्म बताए हैं, जैसे—चार स्मृतिप्रस्थान, चार सम्यक परिश्रम, चार ऋद्धिपद, पाँच इन्द्रिय, पाँच बल, सात संबोध्यङ्ग, आर्य अष्टांगिक मार्ग—इन धम्मों को लेकर, मैं किसी दो भिक्षुओं में भी भिन्न मत नहीं देखता हूँ। किन्तु, भन्ते, कुछ लोग भगवान के प्रति आज्ञाकारी जैसे होकर विहार करते हैं, वे भगवान के गुजरने के बाद संघ में विवाद पैदा कर सकते हैं, आजीविका अथवा श्रेष्ठ पातिमोक्ख को लेकर। ऐसा विवाद बहुजनों के हित, बहुजनों के सुख, बहुजन के लिए अनर्थकारी होगा, देव-मनुष्यों के लिए दुखदायी और अहितकारक होगा।”
“आनन्द, आजीविका अथवा श्रेष्ठ पातिमोक्ख तो छोटी-सी बातें है। किन्तु यदि, आनन्द, मार्ग अथवा साधना (“पटिपदा”) को लेकर संघ में विवाद पैदा हो, तो वह विवाद (वाकई) बहुजनों के हित, बहुजनों के सुख, बहुजन के लिए अनर्थकारी होगा, देव-मनुष्यों के लिए दुखदायी और अहितकारक होगा।
आनन्द, विवाद (=कलह) की छह जड़े होती हैं। कौन-सी छह?
(१) आनन्द, कोई भिक्षु क्रोधी और बदलेखोर होता है। ऐसे क्रोधी और बदलेखोर भिक्षु शास्ता के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; धम्म के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; संघ के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; प्रशिक्षण परिपूर्ण नहीं करता है।
ऐसा भिक्षु, आनन्द, जो शास्ता के प्रति… धम्म के प्रति… संघ के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; प्रशिक्षण परिपूर्ण नहीं करता है, वह संघ में विवाद पैदा करता है। ऐसा विवाद बहुजनों के हित, बहुजनों के सुख, बहुजन के लिए अनर्थकारी होता है, देव-मनुष्यों के लिए दुखदायी और अहितकारक होता है।
यदि, आनन्द, तुम इस प्रकार की विवाद की जड़ भीतर अथवा बाहर देखते हो, तब तुम्हें उस पापकारी विवाद की जड़ को त्यागने का प्रयास करना चाहिए। और, यदि तुम इस प्रकार की विवाद की जड़ भीतर अथवा बाहर नहीं देखते हो, तब तुम्हें उस पापकारी विवाद की जड़ को भविष्य में पैदा न होने देने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार वह पापकारी विवाद की जड़ त्यागी जाती है। इस प्रकार वह पापकारी विवाद की जड़ भविष्य में पैदा नहीं होती।
(२) आगे, आनन्द, कोई भिक्षु तिरस्कारी और प्रतिरोधी होता है…
(३) आगे, आनन्द, कोई भिक्षु ईर्ष्यालु और कंजूस होता है…
(४) आगे, आनन्द, कोई भिक्षु ठग और धोखेबाज होता है…
(५) आगे, आनन्द, कोई भिक्षु पाप-इच्छुक और मिथ्यादृष्टि वाला होता है…
(६) आगे, आनन्द, कोई भिक्षु अपने ही मान्यताओं को पकड़ने वाला, दुराग्रही, न छोड़ने वाला होता है। ऐसे अपने ही मान्यताओं को पकड़ने वाला, दुराग्रही, न छोड़ने वाला भिक्षु शास्ता के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; धम्म के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; संघ के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; प्रशिक्षण परिपूर्ण नहीं करता है।
ऐसा भिक्षु, आनन्द, जो शास्ता के प्रति… धम्म के प्रति… संघ के प्रति बिना आदर, बिना सम्मान के विहार करता है; प्रशिक्षण परिपूर्ण नहीं करता है, वह संघ में विवाद पैदा करता है। ऐसा विवाद बहुजनों के हित, बहुजनों के सुख, बहुजन के लिए अनर्थकारी होता है, देव-मनुष्यों के लिए दुखदायी और अहितकारक होता है।
यदि, आनन्द, तुम इस प्रकार की विवाद की जड़ भीतर अथवा बाहर देखते हो, तब तुम्हें उस पापकारी विवाद की जड़ को त्यागने का प्रयास करना चाहिए। और, यदि तुम इस प्रकार की विवाद की जड़ भीतर अथवा बाहर नहीं देखते हो, तब तुम्हें उस पापकारी विवाद की जड़ को भविष्य में पैदा न होने देने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार वह पापकारी विवाद की जड़ त्यागी जाती है। इस प्रकार वह पापकारी विवाद की जड़ भविष्य में पैदा नहीं होती।
ये छह, आनन्द, विवाद की जड़ें हैं।
आनन्द, चार प्रकार की अधिकरण 2 हैं। कौन-से चार?
ये चार प्रकार के, आनन्द, अधिकरण हैं।
उत्पन्न हो चुके अधिकरण को निपटाने और सुलझाने करने के लिए, आनन्द, सात प्रकार के अधिकरण-समथ हैं।
(१) आनन्द, सम्मुख (=सबके आगे) निपटारा क्या होता है?
जब भिक्षु विवाद करते हैं, ‘यह धम्म है’, ‘यह धम्म नहीं है’, ‘यह विनय है’, ‘यह विनय नहीं है’, तब आनन्द, उन सभी भिक्षुओं को मिल-जुलकर साथ में बैठक करनी चाहिए। और साथ में बैठकर धम्म के दिशानिर्देश के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। धम्म के दिशानिर्देश के अनुसार आगे बढ़ते हुए, उस अधिकरण को निपटाना चाहिए, सुलझाना चाहिए। इस प्रकार, आनन्द, सबके आगे निपटारा होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी सम्मुख निपटारे से।
(२) आगे, आनन्द, बहुमत निपटारा 3 क्या होता है?
यदि, आनन्द, वे भिक्षु उस अधिकरण को उस विहार में नहीं सुलझा पाते हैं, तब उन भिक्षुओं को किसी ऐसे विहार में जाना चाहिए, जहाँ बहुत से भिक्षु हो। वहाँ जाकर सभी ने मिल-जुलकर बैठक करनी चाहिए। और साथ में बैठकर धम्म के दिशानिर्देश के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। धम्म के दिशानिर्देश के अनुसार आगे बढ़ते हुए, उस अधिकरण को निपटाना चाहिए, सुलझाना चाहिए। इस प्रकार, आनन्द, बहुमत से निपटारा होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी बहुमत निपटारे से।
(३) आगे, आनन्द, स्मृति निपटारा क्या होता है?
जब भिक्षुगण किसी भिक्षु पर इस प्रकार का गंभीर आपत्ति का आरोप लगाते हैं, जैसे पाराजिक 4, या कोई पाराजिक के समान ही, ‘आयुष्मान, क्या तुम्हें इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद है?’
वह कहता है, ‘नहीं, मित्रों, मुझे इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद नहीं।’
तब, आनन्द, उस भिक्षु को उसकी याद के आधार पर छूट देनी चाहिए। 5 इस प्रकार, आनन्द, स्मृति निपटारा होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी स्मृति निपटारे से।
(४) आगे, आनन्द, पूर्व-पागलपन का निपटारा क्या होता है?
जब भिक्षुगण किसी भिक्षु पर इस प्रकार का गंभीर आपत्ति का आरोप लगाते हैं, जैसे पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही, ‘आयुष्मान, क्या तुम्हें इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद है?’
वह कहता है, ‘नहीं, मित्रों, मुझे इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद नहीं।’
तब वे उस छुटना चाहने वाले को और अधिक लपेटते हैं, ‘चलो भी, आयुष्मान, अवश्य ही तुम्हें बहुत अच्छे से याद होगा, इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना?’
तब वह कहता है, ‘मित्रों, मैं पागल हो गया था, विकृत चित्त का। और उस पागलपन में मैंने श्रमणों के लिए अनुचित ऐसी बहुत-सी बातें बोल दी, बहुत ही हरकतें कर दी, जो मुझे याद नहीं है। वैसा करते हुए मैं मूढ़ था।’
तब, आनन्द, उस भिक्षु को उसके पूर्व-पागलपन के आधार पर छूट देनी चाहिए। इस प्रकार, आनन्द, पूर्व-पागलपन का निपटारा होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी पूर्व-पागलपन निपटारे से।
(५) आगे, आनन्द, स्वीकारोक्ति के अनुसार निपटारा क्या होता है?
कोई भिक्षु, आनन्द, आरोपित हो या न हो, अपनी आपत्ति को स्मरण कर, उसे खोलता है, प्रकट करता है। किसी वरिष्ठ भिक्षु के पास जाकर वह एक कंधे पर चीवर कर, उसके चरणों में वंदन करते हुए उकड़ू बैठकर प्रणाम करते हुए ऐसा कहता है, ‘भन्ते, मुझसे ऐसी-ऐसी आपत्ति हुई। उसे मैं स्वीकार करता हूँ।’
(वरिष्ठ भिक्षु) कहता है, ‘(अपना दोष) दिखायी देता है?’
‘हाँ, दिखायी देता है।’
‘भविष्य में संयम करो।’
‘भविष्य में संयम करूँगा।’
इस प्रकार, आनन्द, स्वीकारोक्ति के अनुसार निपटारा होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी स्वीकारोक्ति के अनुसार निपटारे से।
(६) आगे, आनन्द, अतिरिक्त दण्ड क्या होता है?
जब भिक्षुगण किसी भिक्षु पर इस प्रकार का गंभीर आपत्ति का आरोप लगाते हैं, जैसे पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही, ‘आयुष्मान, क्या तुम्हें इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद है?’
वह कहता है, ‘नहीं, मित्रों, मुझे इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद नहीं।’
तब वे उस छुटना चाहने वाले को और अधिक लपेटते हैं, ‘चलो भी, आयुष्मान, अवश्य ही तुम्हें बहुत अच्छे से याद होगा, इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना?’
तब वह कहता है, ‘नहीं, मित्रों, मुझे इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद नहीं। किन्तु, मित्रों, मुझे अमुक प्रकार की हल्की आपत्ति करना याद आता है।’
तब वे उस छुटना चाहने वाले को और अधिक लपेटते हैं, ‘चलो भी, आयुष्मान, अवश्य ही तुम्हें बहुत अच्छे से याद होगा, इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना?’ 6
‘मित्रों, जब मैं हल्की आपत्ति को भी बिना पूछे स्वीकार कर रहा हूँ, तब भला क्यों मैं इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति को पूछने पर स्वीकार नहीं करूँगा?’
तब वे कहते हैं, ‘मित्र, जब तुमने उस हल्की आपत्ति को पूछे जाने पर ही स्वीकार किया, तब भला तुम कैसे इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति को पूछने पर स्वीकार करोगे? चलो भी, आयुष्मान, अवश्य ही तुम्हें बहुत अच्छे से याद होगा, इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना?’
तब वह कहता है, ‘मित्रो, मुझे याद आता है इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति को करना। मैंने जल्दबाज़ी में ऐसा कह दिया था, मैंने बिना अधिक सोचे ऐसा कह दिया था कि—नहीं, मित्रों, मुझे इस प्रकार पाराजिक या कोई पाराजिक के समान ही गंभीर आपत्ति करना याद नहीं।’
इस प्रकार, आनन्द, अतिरिक्त दण्ड होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी अतिरिक्त दण्ड से।
(७) आगे, आनन्द, घाँस से ढँकना क्या होता है?
आनन्द, जब भिक्षुगण झगड़ते हुए, कलह करते हुए, विवाद करते हुए विहार करते हैं, श्रमणों के लिए अनुचित ऐसी बहुत-सी बातें बोलते हैं, बहुत ही हरकतें करते हैं।
तब उस भिक्षुओं को मिल-जुलकर साथ में बैठक करनी चाहिए। बैठने पर किसी एक पक्ष के सक्षम भिक्षु को अपने आसन से उठकर, चीवर को एक कंधे पर कर, प्रणाम करते हुए संघ को जानकारी देनी चाहिए—भन्ते, संघ मेरी बात सुनें। हम झगड़ते हुए, कलह करते हुए, विवाद करते हुए विहार कर रहे हैं, श्रमणों के लिए अनुचित ऐसी बहुत-सी बातें बोलते हुए, बहुत ही हरकतें करते हुए।
यदि संघ को उचित लगे, तो मैं संघ के बीच आयुष्मानों की आपत्ति को और मेरी आपत्ति को, आयुष्मानों के हित के लिए और मेरे हित के लिए, घाँस से ढँकना 7 बताता हूँ, उन आपत्तियों को छोड़कर जो गंभीर स्तर पर निंदनीय हो, या गृहस्थों से जुड़ी हो।’
तब, दूसरे पक्ष के किसी सक्षम भिक्षु को अपने आसन से उठकर, चीवर को एक कंधे पर कर, प्रणाम करते हुए संघ को जानकारी देनी चाहिए—भन्ते, संघ मेरी बात सुनें। हम झगड़ते हुए, कलह करते हुए, विवाद करते हुए विहार कर रहे हैं, श्रमणों के लिए अनुचित ऐसी बहुत-सी बातें बोलते हुए, बहुत ही हरकतें करते हुए। यदि संघ को उचित लगे, तो मैं संघ के बीच आयुष्मानों की आपत्ति को और मेरी आपत्ति को, आयुष्मानों के हित के लिए और मेरे हित के लिए, घाँस से ढँकना बताता हूँ, उन आपत्तियों को छोड़कर जो गंभीर स्तर पर निंदनीय हो, या गृहस्थों से जुड़ी हो।’
इस प्रकार, आनन्द, घास से ढँकना होता है। इस प्रकार कोई-कोई अधिकरण सुलझता है, इसी घास से ढँक कर।
छह स्नेहभाव धम्मों से, आनन्द, लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाता है। कौन से छह?
(१) आनन्द, कोई भिक्षु सब्रह्मचारियों के प्रति सद्भावपूर्ण शारीरिक कर्म में स्थापित होता है, उनके आगे भी और उनके पीछे भी। इस स्नेहभाव धम्म से लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
(२) आगे, कोई भिक्षु सब्रह्मचारियों के प्रति सद्भावपूर्ण वाचिक कर्म में स्थापित होता है, उनके आगे भी और उनके पीछे भी। इस स्नेहभाव धम्म से लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
(३) आगे, कोई भिक्षु सब्रह्मचारियों के प्रति सद्भावपूर्ण मानसिक कर्म में स्थापित होता है, उनके आगे भी और उनके पीछे भी। इस स्नेहभाव धम्म से लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
(४) आगे, कोई भिक्षु धम्मानुसार जो भी धार्मिक लाभ प्राप्त करता है, भले ही पात्र में पड़ी भिक्षा ही क्यों न हो, उसका अकेले उपभोग नहीं करता। बल्कि उसे शीलवान सब्रह्मचारियों के साथ बाँटकर समान उपभोग करता है। इस स्नेहभाव धम्म से लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
(५) आगे, कोई भिक्षु ऐसे शील—जो अखंडित हो, अछिद्रित हो, बेदाग हो, बेधब्बा हो, निष्कलंक हो, विद्वानों द्वारा प्रशंसित हो, छुटकारा दिलाते हो, और समाधि की ओर बढ़ाते हो—ऐसे शीलों में सब्रह्मचारियों के शील-समानता के साथ विहार करता है, उनके आगे भी और उनके पीछे भी। इस स्नेहभाव धम्म से लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
(६) आगे, कोई भिक्षु ऐसी दृष्टि—जो आर्य हो, पार कराती हो, साधना करने वाले को सम्यक दुःखों के अंत की ओर ले जाती हो—ऐसी दृष्टि में सब्रह्मचारियों के दृष्टि-समानता के साथ विहार करता है, उनके आगे भी और उनके पीछे भी। इस स्नेहभाव धम्म से लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
ये छह स्नेहभाव धम्म हैं, आनन्द, जिनसे लाड़-प्यार और आदरभाव जन्मता है, जो साथ जुटाकर सामंजस्यता और साथ लाकर एकता लाती है।
आनन्द, यदि तुम इन छह स्नेहभाव धम्म को अंगीकार कर वर्तन करो, तब क्या तुम्हें वचनशैली का कोई छोटा-बड़ा तरीका दिखाई देता है, जिसे तुम सहन नहीं कर पाओगे?”
“नहीं, भन्ते।”
“ठीक है, आनन्द, तब इन छह स्नेहभाव धम्म को अंगीकार कर वर्तन करो। वह तुम्हारे दीर्घकाल के लिए हितकारक और सुखदायी होगा।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
दीघनिकाय २९ में भी यह घटना शाक्य देश की ही बताई गई है, पर वहाँ बुद्ध “वेधञ्ञ” नामक साक्यों के आम्रवन में ठहरे हुए हैं। दोनों स्रोत बताते हैं कि श्रामणेर चुन्द ने यह समाचार आयुष्मान आनन्द भन्ते के माध्यम से सामग्राम नामक गाँव में पहुँचाया, जो सम्भवतः उसी आम्रवन के पास रहा होगा। यह अवश्य थोड़ा आश्चर्यजनक लगता है कि एक ही प्रसंग से दो अलग-अलग उपदेशों का वर्णन मिलता है; लेकिन शायद इतने महत्त्वपूर्ण विषय पर भगवान बुद्ध ने दो बार धम्म बताना इतना भी विचित्र नहीं है। ↩︎
अधिकरण वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए भिक्षु अपने संघ में होने वाले किसी भी विवाद, गलतफ़हमी, आरोप, या अनुशासन से जुड़े मामलों को सुलझाते हैं। इसे आप संघ की अपनी न्यायिक या फैसले लेने वाली व्यवस्था भी कह सकते हैं। इस प्रक्रिया में मामला संघ के सामने रखा जाता है, बातचीत और जाँच-पड़ताल होती है, और फिर पूरा संघ मिलकर तय करता है कि क्या उचित कदम उठाया जाए।
इस तरह, अधिकरण का उद्देश्य सिर्फ़ कलह खत्म करना नहीं होता, बल्कि संघ के भीतर अनुशासन, एकजुटता और शुद्ध माहौल को बनाए रखना भी होता है। इसे विनयपिटक : चुल्लवग्ग के १४ वे अध्याय “समथक्खन्धक” में विवरण के साथ बताया गया है। ↩︎
यह क्रम पाँचवें से सीधे दूसरे स्थान पर क्यों आ गया, इसका हमें निश्चित कारण ज्ञात नहीं है। सम्भव है कि यह किसी बाद के संपादन-काल की त्रुटि हो, या फिर किसी ऐसे कारण से, जिसे हम आज नहीं जानते, भगवान ने स्वयं उसे पाँचवें स्थान से हटाकर दूसरे क्रम में रखा हो। ↩︎
पाराजिक, अथवा पराजित, अपराध होने पर भिक्षु तुरंत अपने भिक्षुत्व से वंचित हो जाता है। ऐसे मामले में वह भिक्षु-संघ का सदस्य नहीं रहता और उसे जीवनभर के लिए संघ से निष्कासित कर दिया जाता है। यह दंड अंतिम होता है; पराजित होने के बाद किसी को भी दोबारा भिक्षुत्व नहीं दिया जा सकता।
विनय के अनुसार, चार प्रकार के कर्म भिक्षु को पराजित कर देते हैं—संभोग करना, चोरी करना, अपनी आध्यात्मिक सिद्धि के बारे में झूठा दावा करना, और किसी मानव की हत्या करना या हत्या कराने में सीधी भागीदारी निभाना। ये चारों अपराध संघ-विनय में सबसे गंभीर माने गए हैं, क्योंकि ये भिक्षु के जीवन और संघ की शुद्धि के मूल सिद्धांतों का पूर्ण उल्लंघन करते हैं। ↩︎
विनय की व्यवस्था मूल रूप से विश्वास पर चलती है। अगर कोई भिक्षु साफ़ दिमाग से अपनी बात रखता है, तो ज्यादातर मामलों में उसका बयान ही उसे दोषमुक्त मानने के लिए काफी होता है। संघ का उद्देश्य किसी से बदला लेना नहीं होता; वह कर्म के सिद्धान्त पर भरोसा करता है। इसलिए यदि कोई भिक्षु झूठ बोलकर बच भी जाए, तो माना जाता है कि उसके कर्मों का फल उसे आगे, खासकर अगली जन्म-यात्राओं में, और भी कड़ी तरह से भोगना पड़ेगा। ↩︎
सामान्यतः भिक्षु की सच्ची स्वीकारोक्ति ही पर्याप्त मानी जाती है। परंतु जब प्रमाण स्पष्ट हों और संबंधित भिक्षु भरोसे के योग्य न लगे, तब संघ के भिक्षु मिलकर उससे लगातार पूछताछ करते हैं, ताकि वह सत्य स्वीकार कर ले। पाली में इस प्रक्रिया को “तस्सपापियसिका” कहा गया है, जिसका अर्थ है, जो उस भिक्षु के लिए “और भी अधिक बुरा” हो। ↩︎
जैसे कोई व्यक्ति शौच करने के बाद उस मल को घास से ढँक देता है ताकि वह मल और किसी को न दिखे और उसकी बदबू ज़्यादा न फैले, उसी तरह यहाँ भी समझा जाता है कि उन भिक्षुओं ने ऐसा कृत्य कर दिया है जिसे खुला छोड़ देना दूसरों के लिए और संघ के लिए हानिकारक होगा। इसलिए उसे ढँक देना ही अधिक उपयुक्त माना जाता है। केवल कुछ गंभीर दोष को छोड़कर। यह अंतिम उपाय यह याद दिलाता है कि हर विवाद की जड़ तक जाना हमेशा जरूरी नहीं होता, खासकर तब जब गलती दोनों पक्षों में किसी-न-किसी रूप में पाई जाती हो। कई बार सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि मुद्दे को यहीं समेटकर आगे बढ़ा जाए। ↩︎
४१. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सक्केसु विहरति सामगामे। तेन खो पन समयेन निगण्ठो नाटपुत्तो नाथपुत्तो (सी॰ पी॰) पावायं अधुनाकालङ्कतो कालकतो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) होति। तस्स कालङ्किरियाय भिन्ना निगण्ठा द्वेधिकजाता द्वेळ्हकजाता (स्या॰ कं॰ क॰) भण्डनजाता कलहजाता विवादापन्ना अञ्ञमञ्ञं मुखसत्तीहि वितुदन्ता विहरन्ति – ‘‘न त्वं इमं धम्मविनयं आजानासि, अहं इमं धम्मविनयं आजानामि। किं त्वं इमं धम्मविनयं आजानिस्ससि! मिच्छापटिपन्नो त्वमसि, अहमस्मि सम्मापटिपन्नो। सहितं मे, असहितं ते। पुरेवचनीयं पच्छा अवच , पच्छावचनीयं पुरे अवच। अधिचिण्णं अविचिण्णं (सी॰ पी॰) ते विपरावत्तं। आरोपितो ते वादो। निग्गहितोसि, चर वादप्पमोक्खाय; निब्बेठेहि वा सचे पहोसी’’ति। वधोयेव खो वधोयेवेको (स्या॰ कं॰ क॰) मञ्ञे निगण्ठेसु नाटपुत्तियेसु वत्तति। येपि निगण्ठस्स नाटपुत्तस्स सावका गिही ओदातवसना तेपि निगण्ठेसु नाटपुत्तियेसु निब्बिन्नरूपा निब्बिन्दरूपा (स्या॰ कं॰ क॰) विरत्तरूपा पटिवानरूपा यथा तं दुरक्खाते धम्मविनये दुप्पवेदिते अनिय्यानिके अनुपसमसंवत्तनिके असम्मासम्बुद्धप्पवेदिते भिन्नथूपे अप्पटिसरणे।
४२. अथ खो चुन्दो समणुद्देसो पावायं वस्संवुट्ठो वस्संवुत्थो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) येन सामगामो येनायस्मा आनन्दो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो चुन्दो समणुद्देसो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘निगण्ठो, भन्ते, नाटपुत्तो पावायं अधुनाकालङ्कतो। तस्स कालङ्किरियाय भिन्ना निगण्ठा द्वेधिकजाता…पे॰… भिन्नथूपे अप्पटिसरणे’’ति। एवं वुत्ते, आयस्मा आनन्दो चुन्दं समणुद्देसं एतदवोच – ‘‘अत्थि खो इदं, आवुसो चुन्द, कथापाभतं भगवन्तं दस्सनाय। आयाम, आवुसो चुन्द, येन भगवा तेनुपसङ्कमिस्साम; उपसङ्कमित्वा एतमत्थं भगवतो आरोचेस्सामा’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो चुन्दो समणुद्देसो आयस्मतो आनन्दस्स पच्चस्सोसि।
अथ खो आयस्मा च आनन्दो चुन्दो च समणुद्देसो येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। एकमन्तं निसिन्नो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अयं, भन्ते, चुन्दो समणुद्देसो एवमाह – ‘निगण्ठो , भन्ते, नाटपुत्तो पावायं अधुनाकालङ्कतो। तस्स कालङ्किरियाय भिन्ना निगण्ठा द्वेधिकजाता…पे॰… भिन्नथूपे अप्पटिसरणे’ति। तस्स मय्हं, भन्ते, एवं होति – ‘माहेव भगवतो अच्चयेन सङ्घे विवादो उप्पज्जि; स्वास्स सो (सी॰ पी॰), स्वायं (क॰) विवादो बहुजनाहिताय बहुजनासुखाय बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सान’’’न्ति।
४३. ‘‘तं किं मञ्ञसि, आनन्द, ये वो मया धम्मा अभिञ्ञा देसिता, सेय्यथिदं – चत्तारो सतिपट्ठाना चत्तारो सम्मप्पधाना चत्तारो इद्धिपादा पञ्चिन्द्रियानि पञ्च बलानि सत्त बोज्झङ्गा अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो, पस्ससि नो त्वं, आनन्द, इमेसु धम्मेसु द्वेपि भिक्खू नानावादे’’ति? ‘‘ये मे, भन्ते, धम्मा भगवता अभिञ्ञा देसिता, सेय्यथिदं – चत्तारो सतिपट्ठाना चत्तारो सम्मप्पधाना चत्तारो इद्धिपादा पञ्चिन्द्रियानि पञ्च बलानि सत्त बोज्झङ्गा अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो, नाहं पस्सामि इमेसु धम्मेसु द्वेपि भिक्खू नानावादे। ये च खो सन्ति च खो (स्या॰ कं॰), सन्ति च (क॰), भन्ते, पुग्गला भगवन्तं पतिस्सयमानरूपा विहरन्ति तेपि भगवतो अच्चयेन सङ्घे विवादं जनेय्युं अज्झाजीवे वा अधिपातिमोक्खे वा। स्वास्स सोस्स (सी॰ पी॰), स्वायं (क॰) विवादो बहुजनाहिताय बहुजनासुखाय बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सान’’न्ति। अप्पमत्तको सो, आनन्द, विवादो यदिदं – अज्झाजीवे वा अधिपातिमोक्खे वा। मग्गे वा हि, आनन्द, पटिपदाय वा सङ्घे विवादो उप्पज्जमानो उप्पज्जेय्य; स्वास्स विवादो बहुजनाहिताय बहुजनासुखाय बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सानं।
४४. ‘‘छयिमानि, आनन्द, विवादमूलानि। कतमानि छ? इधानन्द, भिक्खु कोधनो होति उपनाही। यो सो, आनन्द, भिक्खु कोधनो होति उपनाही सो सत्थरिपि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, धम्मेपि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, सङ्घेपि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, सिक्खायपि न परिपूरकारी होति। यो सो, आनन्द, भिक्खु सत्थरि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, धम्मे… सङ्घे अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, सिक्खाय न परिपूरकारी होति, सो सङ्घे विवादं जनेति; यो होति विवादो बहुजनाहिताय बहुजनासुखाय, बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सानं। एवरूपञ्चे तुम्हे, आनन्द, विवादमूलं अज्झत्तं वा बहिद्धा वा समनुपस्सेय्याथ, तत्र तुम्हे, आनन्द, तस्सेव पापकस्स विवादमूलस्स पहानाय वायमेय्याथ। एवरूपञ्चे तुम्हे, आनन्द, विवादमूलं अज्झत्तं वा बहिद्धा वा न समनुपस्सेय्याथ। तत्र तुम्हे, आनन्द, तस्सेव पापकस्स विवादमूलस्स आयतिं अनवस्सवाय पटिपज्जेय्याथ। एवमेतस्स पापकस्स विवादमूलस्स पहानं होति, एवमेतस्स पापकस्स विवादमूलस्स आयतिं अनवस्सवो होति।
४५. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु मक्खी होति पळासी…पे॰… इस्सुकी होति मच्छरी…पे॰… सठो होति मायावी…पे॰… पापिच्छो होति मिच्छादिट्ठि मिच्छादिट्ठी (स्या॰ कं॰ पी॰ क॰) …पे॰… सन्दिट्ठिपरामासी होति आधानग्गाही दुप्पटिनिस्सग्गी। यो सो, आनन्द, भिक्खु सन्दिट्ठिपरामासी होति आधानग्गाही दुप्पटिनिस्सग्गी सो सत्थरिपि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, धम्मेपि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, सङ्घेपि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, सिक्खायपि न परिपूरकारी होति। यो सो, आनन्द, भिक्खु सत्थरि अगारवो विहरति अप्पतिस्सो, धम्मे… सङ्घे… सिक्खाय न परिपूरकारी होति सो सङ्घे विवादं जनेति; यो होति विवादो बहुजनाहिताय बहुजनासुखाय, बहुनो जनस्स अनत्थाय अहिताय दुक्खाय देवमनुस्सानं। एवरूपञ्चे तुम्हे, आनन्द, विवादमूलं अज्झत्तं वा बहिद्धा वा समनुपस्सेय्याथ। तत्र तुम्हे, आनन्द, तस्सेव पापकस्स विवादमूलस्स पहानाय वायमेय्याथ। एवरूपञ्चे तुम्हे, आनन्द, विवादमूलं अज्झत्तं वा बहिद्धा वा न समनुपस्सेय्याथ, तत्र तुम्हे, आनन्द, तस्सेव पापकस्स विवादमूलस्स आयतिं अनवस्सवाय पटिपज्जेय्याथ। एवमेतस्स पापकस्स विवादमूलस्स पहानं होति , एवमेतस्स पापकस्स विवादमूलस्स आयतिं अनवस्सवो होति। इमानि खो, आनन्द, छ विवादमूलानि।
४६. ‘‘चत्तारिमानि , आनन्द, अधिकरणानि। कतमानि चत्तारि? विवादाधिकरणं, अनुवादाधिकरणं, आपत्ताधिकरणं, किच्चाधिकरणं – इमानि खो, आनन्द, चत्तारि अधिकरणानि। सत्त खो पनिमे, आनन्द, अधिकरणसमथा – उप्पन्नुप्पन्नानं अधिकरणानं समथाय वूपसमाय सम्मुखाविनयो दातब्बो, सतिविनयो दातब्बो, अमूळ्हविनयो दातब्बो, पटिञ्ञाय कारेतब्बं, येभुय्यसिका, तस्सपापियसिका, तिणवत्थारको।
४७. ‘‘कथञ्चानन्द, सम्मुखाविनयो होति? इधानन्द, भिक्खू विवदन्ति धम्मोति वा अधम्मोति वा विनयोति वा अविनयोति वा। तेहानन्द, भिक्खूहि सब्बेहेव समग्गेहि सन्निपतितब्बं। सन्निपतित्वा धम्मनेत्ति समनुमज्जितब्बा । धम्मनेत्तिं समनुमज्जित्वा यथा तत्थ समेति तथा तं अधिकरणं वूपसमेतब्बं। एवं खो, आनन्द, सम्मुखाविनयो होति; एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – सम्मुखाविनयेन।
४८. ‘‘कथञ्चानन्द, येभुय्यसिका होति? ते चे, आनन्द, भिक्खू न सक्कोन्ति तं अधिकरणं तस्मिं आवासे वूपसमेतुं। तेहानन्द, भिक्खूहि यस्मिं आवासे बहुतरा भिक्खू सो आवासो गन्तब्बो। तत्थ सब्बेहेव समग्गेहि सन्निपतितब्बं। सन्निपतित्वा धम्मनेत्ति समनुमज्जितब्बा। धम्मनेत्तिं समनुमज्जित्वा यथा तत्थ समेति तथा तं अधिकरणं वूपसमेतब्बं। एवं खो, आनन्द, येभुय्यसिका होति, एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – येभुय्यसिकाय।
४९. ‘‘कथञ्चानन्द, सतिविनयो होति? इधानन्द, भिक्खू भिक्खुं एवरूपाय गरुकाय आपत्तिया चोदेन्ति पाराजिकेन वा पाराजिकसामन्तेन वा – ‘सरतायस्मा एवरूपिं एवरूपं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) एवरूपाय-इति वुच्चमानवचनेन समेति। विनयेनपि संसन्देतब्बं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति? सो एवमाह – ‘न खो अहं, आवुसो, सरामि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति। तस्स खो तस्स खो एवं (सब्बत्थ), आनन्द, भिक्खुनो सतिविनयो दातब्बो। एवं खो, आनन्द, सतिविनयो होति, एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – सतिविनयेन।
५०. ‘‘कथञ्चानन्द , अमूळ्हविनयो होति? इधानन्द, भिक्खू भिक्खुं एवरूपाय गरुकाय आपत्तिया चोदेन्ति पाराजिकेन वा पाराजिकसामन्तेन वा – ‘सरतायस्मा एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति? (सो एवमाह – ‘न खो अहं, आवुसो, सरामि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति। तमेनं सो निब्बेठेन्तं अतिवेठेति – ‘इङ्घायस्मा साधुकमेव जानाहि यदि सरसि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति।) ( ) एत्थन्तरे पाठो चूळव॰ २३७ नत्थि तस्सपापियसिकावारेएवेतेन भवितब्बं सो एवमाह – ‘अहं खो, आवुसो, उम्मादं पापुणिं चेतसो विपरियासं। तेन मे उम्मत्तकेन बहुं अस्सामणकं अज्झाचिण्णं भासितपरिक्कन्तं भासितपरिकन्तं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)। नाहं तं सरामि। मूळ्हेन मे एतं कत’न्ति। तस्स खो तस्स खो एवं (स्या॰ कं॰ क॰), आनन्द, भिक्खुनो अमूळ्हविनयो दातब्बो। एवं खो, आनन्द , अमूळ्हविनयो होति, एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – अमूळ्हविनयेन।
५१. ‘‘कथञ्चानन्द, पटिञ्ञातकरणं होति? इधानन्द, भिक्खु चोदितो वा अचोदितो वा आपत्तिं सरति, विवरति उत्तानीकरोति उत्तानिं करोति (क॰)। तेन, आनन्द, भिक्खुना वुड्ढतरं भिक्खुं वुड्ढतरो भिक्खु (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) उपसङ्कमित्वा एकंसं चीवरं कत्वा पादे वन्दित्वा उक्कुटिकं निसीदित्वा अञ्जलिं पग्गहेत्वा एवमस्स वचनीयो – ‘अहं, भन्ते, इत्थन्नामं आपत्तिं आपन्नो, तं पटिदेसेमी’ति। सो एवमाह – ‘पस्ससी’ति? ‘आम पस्सामी’ति। ‘आयतिं संवरेय्यासी’ति। (‘संवरिस्सामी’ति।) ( ) विनये नत्थि एवं खो, आनन्द, पटिञ्ञातकरणं होति, एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – पटिञ्ञातकरणेन।
५२. ‘‘कथञ्चानन्द , तस्सपापियसिका होति? इधानन्द, भिक्खु भिक्खुं एवरूपाय गरुकाय आपत्तिया चोदेति पाराजिकेन वा पाराजिकसामन्तेन वा – ‘सरतायस्मा एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति? सो एवमाह – ‘न खो अहं, आवुसो, सरामि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति। तमेनं सो निब्बेठेन्तं अतिवेठेति – ‘इङ्घायस्मा साधुकमेव जानाहि यदि सरसि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति। सो एवमाह – ‘न खो अहं, आवुसो, सरामि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा; सरामि च खो अहं, आवुसो, एवरूपिं अप्पमत्तिकं आपत्तिं आपज्जिता’ति। तमेनं सो निब्बेठेन्तं अतिवेठेति – ‘इङ्घायस्मा साधुकमेव जानाहि यदि सरसि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति? सो एवमाह – ‘इमञ्हि नामाहं, आवुसो, अप्पमत्तिकं आपत्तिं आपज्जित्वा अपुट्ठो पटिजानिस्सामि। किं पनाहं एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जित्वा पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा पुट्ठो नपटिजानिस्सामी’ति? सो एवमाह – ‘इमञ्हि नाम त्वं, आवुसो , अप्पमत्तिकं आपत्तिं आपज्जित्वा अपुट्ठो नपटिजानिस्ससि, किं पन त्वं एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जित्वा पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा पुट्ठो अपुट्ठो (स्या॰ कं॰ क॰) पटिजानिस्ससि? इङ्घायस्मा साधुकमेव जानाहि यदि सरसि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति। सो एवमाह – ‘सरामि खो अहं, आवुसो, एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा। दवा मे एतं वुत्तं, रवा मे एतं वुत्तं – नाहं तं सरामि एवरूपिं गरुकं आपत्तिं आपज्जिता पाराजिकं वा पाराजिकसामन्तं वा’ति। एवं खो, आनन्द, तस्सपापियसिका होति, एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – तस्सपापियसिकाय।
५३. ‘‘कथञ्चानन्द , तिणवत्थारको होति? इधानन्द, भिक्खूनं भण्डनजातानं कलहजातानं विवादापन्नानं विहरतं बहुं अस्सामणकं अज्झाचिण्णं होति भासितपरिक्कन्तं। तेहानन्द, भिक्खूहि सब्बेहेव समग्गेहि सन्निपतितब्बं। सन्निपतित्वा एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं ब्यत्तेन ब्यत्ततरेन (सी॰ पी॰ क॰) भिक्खुना उट्ठायासना एकंसं चीवरं कत्वा अञ्जलिं पणामेत्वा सङ्घो ञापेतब्बो –
‘सुणातु मे, भन्ते, सङ्घो। इदं अम्हाकं भण्डनजातानं कलहजातानं विवादापन्नानं विहरतं बहुं अस्सामणकं अज्झाचिण्णं भासितपरिक्कन्तं । यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, अहं या चेव इमेसं आयस्मन्तानं आपत्ति या च अत्तनो आपत्ति, इमेसञ्चेव आयस्मन्तानं अत्थाय अत्तनो च अत्थाय, सङ्घमज्झे तिणवत्थारकेन देसेय्यं, ठपेत्वा थुल्लवज्जं ठपेत्वा गिहिपटिसंयुत्त’’’न्ति।
‘‘अथापरेसं एकतोपक्खिकानं भिक्खूनं ब्यत्तेन भिक्खुना उट्ठायासना एकंसं चीवरं कत्वा अञ्जलिं पणामेत्वा सङ्घो ञापेतब्बो –
‘सुणातु मे, भन्ते, सङ्घो। इदं अम्हाकं भण्डनजातानं कलहजातानं विवादापन्नानं विहरतं बहुं अस्सामणकं अज्झाचिण्णं भासितपरिक्कन्तं। यदि सङ्घस्स पत्तकल्लं, अहं या चेव इमेसं आयस्मन्तानं आपत्ति या च अत्तनो आपत्ति, इमेसञ्चेव आयस्मन्तानं अत्थाय अत्तनो च अत्थाय, सङ्घमज्झे तिणवत्थारकेन देसेय्यं, ठपेत्वा थुल्लवज्जं ठपेत्वा गिहिपटिसंयुत्त’’’न्ति।
‘‘एवं खो, आनन्द, तिणवत्थारको होति, एवञ्च पनिधेकच्चानं अधिकरणानं वूपसमो होति यदिदं – तिणवत्थारकेन।
५४. ‘‘छयिमे , आनन्द, धम्मा सारणीया पियकरणा गरुकरणा सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तन्ति। कतमे छ? इधानन्द, भिक्खुनो मेत्तं कायकम्मं पच्चुपट्ठितं होति सब्रह्मचारीसु आवि चेव रहो च। अयम्पि धम्मो सारणीयो पियकरणो गरुकरणो सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तति।
‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खुनो मेत्तं वचीकम्मं पच्चुपट्ठितं होति सब्रह्मचारीसु आवि चेव रहो च। अयम्पि धम्मो सारणीयो पियकरणो गरुकरणो सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तति।
‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खुनो मेत्तं मनोकम्मं पच्चुपट्ठितं होति सब्रह्मचारीसु आवि चेव रहो च। अयम्पि धम्मो सारणीयो पियकरणो गरुकरणो सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तति।
‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु – ये ते लाभा धम्मिका धम्मलद्धा अन्तमसो पत्तपरियापन्नमत्तम्पि तथारूपेहि लाभेहि – अपटिविभत्तभोगी होति, सीलवन्तेहि सब्रह्मचारीहि साधारणभोगी। अयम्पि धम्मो सारणीयो पियकरणो गरुकरणो सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तति।
‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु – यानि तानि सीलानि अखण्डानि अच्छिद्दानि असबलानि अकम्मासानि भुजिस्सानि विञ्ञुप्पसत्थानि अपरामट्ठानि समाधिसंवत्तनिकानि तथारूपेसु सीलेसु – सीलसामञ्ञगतो विहरति सब्रह्मचारीहि आवि चेव रहो च। अयम्पि धम्मो सारणीयो पियकरणो गरुकरणो सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तति।
‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु – यायं दिट्ठि अरिया निय्यानिका निय्याति तक्करस्स सम्मा दुक्खक्खया तथारूपाय दिट्ठिया – दिट्ठिसामञ्ञगतो विहरति सब्रह्मचारीहि आवि चेव रहो च। अयम्पि धम्मो सारणीयो पियकरणो गरुकरणो सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तति। इमे खो, आनन्द, छ सारणीया धम्मा पियकरणा गरुकरणा सङ्गहाय अविवादाय सामग्गिया एकीभावाय संवत्तन्ति।
‘‘इमे चे तुम्हे, आनन्द, छ सारणीये धम्मे समादाय वत्तेय्याथ, पस्सथ नो तुम्हे, आनन्द, तं वचनपथं अणुं वा थूलं वा यं तुम्हे नाधिवासेय्याथा’’ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘तस्मातिहानन्द , इमे छ सारणीये धम्मे समादाय वत्तथ। तं वो भविस्सति दीघरत्तं हिताय सुखाया’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा आनन्दो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।
सामगामसुत्तं निट्ठितं चतुत्थं।