✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

स्वयं को ऊँचा आँकना

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ २५ मिनट

सूत्र परिचय

सुनक्खत लिच्छविपुत्र, एक कुख्यात व्यक्तित्व था। प्रारंभिक बौद्ध सूत्रों में उसके भिक्षु जीवन की कई झलकियाँ मिलती हैं। ऐसा लगता है कि इस सूत्र में उसकी बुद्ध से सार्थक भेंट और धम्म उपदेश है। फिर, दीघनिकाय ६ से ज्ञात होता है कि उस समय उसे प्रव्रज्या लिए तीन वर्ष हो चुके थे और वह कुछ अल्प-मात्रा की ऋद्धि-शक्ति प्राप्त कर चुका था, जिसे वह सार्वजनिक रूप से प्रकट भी करता था।

वहीं दीघनिकाय २४ में, उसके भिक्षु जीवन का त्याग कर देने के बाद, भगवान बुद्ध स्वयं उसके विचित्र आचरण का उल्लेख करते हैं। जबकि मज्झिमनिकाय १२ में भगवान, सुनक्खत द्वारा की गई आलोचनाओं का ऐसा उत्तर प्रदान करते हैं, जिससे सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान वैशाली के महावन में स्थित कूटागार मंडप में विहार कर रहे थे। उस समय बहुत से भिक्षुओं ने भगवान के पास जाकर प्रत्यक्ष-ज्ञान (“अञ्ञा” =अरहंतपद) घोषित किया था—हम समझते हैं, ‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’

तब सुनक्खत लिच्छविपुत्त ने सुना “बहुत से भिक्षुओं ने भगवान के पास जाकर प्रत्यक्ष-ज्ञान घोषित किया—हम समझते हैं, ‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’”

तब सुनक्खत लिच्छविपुत्त भगवान के पास गया, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर सुनक्खत लिच्छविपुत्त ने भगवान से कहा, “भन्ते, मैंने सुना है कि ‘बहुत से भिक्षुओं ने भगवान के पास जाकर प्रत्यक्ष-ज्ञान घोषित किया—‘हम समझते हैं, जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’ क्या, भन्ते, उन भिक्षुओं ने सम्यक रूप से प्रत्यक्ष-ज्ञान की घोषणा की, अथवा कुछ भिक्षुओं ने स्वयं को अधिक मानकर प्रत्यक्ष-ज्ञान की घोषणा की?”

“सुनक्खत, जो भिक्षुओं ने मेरे पास आकर प्रत्यक्ष-ज्ञान घोषित किया… उनमें से कुछ भिक्षुओं ने सम्यक रूप से प्रत्यक्ष-ज्ञान की घोषणा की, किन्तु कुछ भिक्षुओं ने स्वयं को अधिक मानकर प्रत्यक्ष-ज्ञान की घोषणा की।

सुनक्खत, जो भिक्षु सम्यक रूप से प्रत्यक्ष-ज्ञान की घोषणा करते हैं, उनके लिए वह यथार्थ होता है। किन्तु जो भिक्षु स्वयं को अधिक मानकर प्रत्यक्ष-ज्ञान की घोषणा करते हैं, तब, सुनक्खत, तथागत को ऐसा लगता है कि ‘उन्हें धम्म बताना चाहिए।’

और, सुनक्खत, जब तथागत को ऐसा लगता है कि ‘उन्हें धम्म बताना चाहिए’, तभी कोई निकम्मा पुरुष अच्छे से प्रश्न बुन कर, अच्छे से तैयार कर, तथागत के पास आकर पूछता है। तब, सुनक्खत, तथागत को ऐसा लगना कि ‘उन्हें धम्म बताना चाहिए’, वह बदल जाता है।”

यदि उचित समय है, भगवान। यही उचित समय है, सुगत। भगवान धम्म बताएं। भगवान से सुनकर भिक्षु उसे धारण करेंगे।"

“ठीक है तब, सुनक्खत। ध्यान देकर गौर से सुनो। मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, भन्ते।” सुनक्खत्त लिच्छविपुत्त ने भगवान को उत्तर दिया।

लोक-आमिष से जुड़ा

भगवान ने कहा—

सुनक्खत, पाँच कामगुण होते हैं। कौन से पाँच?

  • आँख से दिखायी देते रूप, जो अच्छे, सुंदर, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
  • कान से सुनायी देती आवाज़े, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
  • नाक से सुँघाई देती गन्ध, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
  • जीभ से पता चलते स्वाद, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
  • काया से पता चलते संस्पर्श, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।

—ये पाँच, सुनक्खत, कामगुण हैं।

अब संभव है, सुनक्खत, कि कोई व्यक्ति दुनिया के आकर्षणों (लोक-आमिष) के प्रति समर्पित हो। दुनिया के आकर्षणों के प्रति समर्पित व्यक्ति को उसी प्रकार का वार्तालाप भाता है, वह उसी स्वभाव के अनुरूप सोचता है, विचार करता है, ऐसे ही पुरुषों से संगति करता है, वही उसे मूल्यवान लगता है।

किन्तु, जब अविचलता 1 से जुड़ा वार्तालाप होने लगे, तो वह सुनना नहीं चाहता, कान नहीं देता, समझने के लिए मन नहीं लगाता, ऐसे पुरुषों से संगति नहीं करता, न ही उसे मूल्यवान लगता है।

इस सूत्र के संदर्भ में चतुर्थ ध्यान-अवस्था, और पहले दो अरूप आयाम—“अनन्त आकाश आयाम” और “अनन्त विज्ञान आयाम” हैं। उन अवस्थाओं में कामगुण विलुप्त हो जाते हैं और चित्त अविचलता को प्राप्त करता है। हालांकि, अट्ठकथा के अनुसार चारों ही अरूप आयाम “अविचलता” में शामिल हैं, लेकिन, इस सूत्र और अगले सूत्र के अनुसार बिलकुल स्पष्ट रूप से शून्य आयाम, न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम, और निरोध-समापत्ति को सम्मिलित नहीं है।

जैसे, सुनक्खत, किसी पुरुष ने अपना स्वयं का गाँव या नगर बहुत समय से छोड़ दिया हो। जब वह किसी दूसरे पुरुष को देखता है, जिसने कुछ ही समय पहले वह गाँव या नगर छोड़ा हो। तब वह पुरुष उस गाँव या नगर का कुशल-समाचार लेता है, दाना-पानी, सुभिक्ष-स्वास्थ्य इत्यादि हालचाल पूछता है। और वह पुरुष उस गाँव या नगर का कुशल-समाचार देता है, दाना-पानी, सुभिक्ष-स्वास्थ्य इत्यादि बताता है।

क्या लगता है, सुनक्खत? क्या वह पुरुष उस पुरुष से सुनना चाहेगा, कान देगा, समझने के लिए मन लगाएगा, उस पुरुष की संगति करेगा, उसे मूल्यवान लगेगा?"

“हाँ, भन्ते।”

“उसी तरह, सुनक्खत, संभव है कि कोई व्यक्ति दुनिया के आकर्षणों के प्रति समर्पित हो। दुनिया के आकर्षणों के प्रति समर्पित व्यक्ति को उसी प्रकार का वार्तालाप भाता है, वह उसी स्वभाव के अनुरूप सोचता है, विचार करता है, ऐसे ही पुरुषों से संगति करता है, वही उसे मूल्यवान लगता है। किन्तु, जब अविचलता से जुड़ा वार्तालाप होने लगे, तो वह सुनना नहीं चाहता, कान नहीं देता, समझने के लिए मन नहीं लगाता, ऐसे पुरुषों से संगति नहीं करता, न ही उसे मूल्यवान लगता है।

उसके बारे में जान लेना चाहिए कि ‘दुनिया के आकर्षणों के प्रति समर्पित यह व्यक्ति अविचलता के बंधन से जुड़ा नहीं है।’

अविचलता से जुड़ा

अब ऐसा भी संभव है, सुनक्खत, कि कोई व्यक्ति अविचलता के प्रति समर्पित हो। अविचलता के प्रति समर्पित व्यक्ति को उसी प्रकार का वार्तालाप भाता है, वह उसी स्वभाव के अनुरूप सोचता है, विचार करता है, ऐसे ही पुरुषों से संगति करता है, वही उसे मूल्यवान लगता है।

किन्तु, जब दुनिया के आकर्षणों से जुड़ा वार्तालाप होने लगे, तो वह सुनना नहीं चाहता, कान नहीं देता, समझने के लिए मन नहीं लगाता, ऐसे पुरुषों से संगति नहीं करता, न ही उसे मूल्यवान लगता है।

जैसे, सुनक्खत, कोई सड़कर गिरी पत्ती हो, जिसके लिए अब हरीभरी होना असंभव हो। उसी तरह, सुनक्खत, अविचलता के प्रति समर्पित यह व्यक्ति दुनिया के आकर्षणों के बंधनों को गिरा चुका है। उसके बारे में जान लेना चाहिए कि ‘अविचलता के प्रति समर्पित यह व्यक्ति दुनिया के आकर्षणों के बंधन से जुड़ा नहीं है।’

शून्य आयाम

अब ऐसा भी संभव है, सुनक्खत, कि कोई व्यक्ति शून्य आयाम (“आकिञ्चञ्ञायतन”) के प्रति समर्पित हो। शून्य आयाम के प्रति समर्पित व्यक्ति को उसी प्रकार का वार्तालाप भाता है, वह उसी स्वभाव के अनुरूप सोचता है, विचार करता है, ऐसे ही पुरुषों से संगति करता है, वही उसे मूल्यवान लगता है।

किन्तु, जब अविचलता से जुड़ा वार्तालाप होने लगे, तो वह सुनना नहीं चाहता, कान नहीं देता, समझने के लिए मन नहीं लगाता, ऐसे पुरुषों से संगति नहीं करता, न ही उसे मूल्यवान लगता है।

जैसे, सुनक्खत, किसी बड़ी चट्टान के दो टुकड़े होकर अलग चुके हो, जिन्हें अब साथ में जोड़ा नहीं जा सकता। उसी तरह, सुनक्खत, शून्य आयाम के प्रति समर्पित यह व्यक्ति अविचलता के बंधन से (टूट कर) अलग हो चुका है। उसके बारे में जान लेना चाहिए कि ‘शून्य आयाम के प्रति समर्पित यह व्यक्ति अविचलता के बंधन से जुड़ा नहीं है।’

न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम

अब ऐसा भी संभव है, सुनक्खत, कि कोई व्यक्ति न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम (=न बोधगम्य न बोधरहित आयाम) के प्रति समर्पित हो। न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम के प्रति समर्पित व्यक्ति को उसी प्रकार का वार्तालाप भाता है, वह उसी स्वभाव के अनुरूप सोचता है, विचार करता है, ऐसे ही पुरुषों से संगति करता है, वही उसे मूल्यवान लगता है।

किन्तु, जब शून्य आयाम से जुड़ा वार्तालाप होने लगे, तो वह सुनना नहीं चाहता, कान नहीं देता, समझने के लिए मन नहीं लगाता, ऐसे पुरुषों से संगति नहीं करता, न ही उसे मूल्यवान लगता है।

जैसे, सुनक्खत, किसी पुरुष ने मनचाहा भोजन कर छोड़ चुका हो। क्या लगता है, सुनक्खत? क्या वह पुरुष फिर से वही भोजन करना चाहेगा?”

“नहीं, भन्ते।”

“ऐसा क्यों?”

“क्योंकि, भन्ते, फिर से वही भोजन प्रतिकूल लगता है।”

“उसी तरह, सुनक्खत, न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम के प्रति समर्पित यह व्यक्ति शून्य आयाम के बंधन की उलटी कर चुका है। उसके बारे में जान लेना चाहिए कि ‘न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम के प्रति समर्पित यह व्यक्ति शून्य आयाम के बंधन से जुड़ा नहीं है।’

निर्वाण

अब ऐसा भी संभव है, सुनक्खत, कि कोई व्यक्ति निर्वाण के प्रति सम्यक रूप से समर्पित हो। निर्वाण के प्रति सम्यक रूप से समर्पित व्यक्ति को उसी प्रकार का वार्तालाप भाता है, वह उसी स्वभाव के अनुरूप सोचता है, विचार करता है, ऐसे ही पुरुषों से संगति करता है, वही उसे मूल्यवान लगता है।

किन्तु, जब न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम से जुड़ा वार्तालाप होने लगे, तो वह सुनना नहीं चाहता, कान नहीं देता, समझने के लिए मन नहीं लगाता, ऐसे पुरुषों से संगति नहीं करता, न ही उसे मूल्यवान लगता है।

जैसे, सुनक्खत, ताड़ का सिरा काट देने पर उसका दुबारा उगना असंभव है। उसी तरह, सुनक्खत, निर्वाण के प्रति सम्यक रूप से समर्पित व्यक्ति न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम के बंधन को जड़ से उखाड़ देता है, ताड़ के ठूँठ जैसे बना देता है, अस्तित्व से मिटा देता है, ताकि वे कभी पुनरुत्पन्न न हो। उसके बारे में जान लेना चाहिए कि ‘निर्वाण के प्रति सम्यक रूप से समर्पित यह व्यक्ति न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम के बंधन से जुड़ा नहीं है।’

स्वयं को ऊँचा आँकना

अब ऐसा भी संभव है, सुनक्खत, कि किसी भिक्षु को लगे, ‘श्रमण (गोतम) ने तृष्णा को तीर बताया है, जो अविद्या के विष को चाहत (“छन्द”), दिलचस्पी (“राग”) और दुर्भावना (“ब्यापाद”) के माध्यम से फैलाता है। मैंने उस तृष्णा के तीर को त्याग दिया है, अविद्या के विष को निकाल दिया है, और मैं निर्वाण के लिए सम्यक रूप से समर्पित हूँ।’

इस प्रकार के अहंभाव तथ्यात्मक नहीं होता। और, वह निर्वाण समर्पण के लिए अनुपयुक्त बातों में लिप्त होता है—

  • वह आँखों से ऐसे अनुपयुक्त रूप देखने में लिप्त होता है,
  • कान से ऐसी अनुपयुक्त आवाजे सुनने में लिप्त होता है,
  • नाक से ऐसे अनुपयुक्त गंध सूँघने में लिप्त होता है,
  • जीभ से ऐसे स्वाद चखने में लिप्त होता है,
  • काया से ऐसे अनुपयुक्त संस्पर्श महसूस करने में लिप्त होता है,
  • मन से ऐसे अनुपयुक्त स्वभाव जानने में लिप्त होता है।

और (इंद्रियों) से ऐसे अनुपयुक्त (विषयों) में लिप्त होने पर, दिलचस्पी (राग) उसके चित्त पर टूट पड़ती है। दिलचस्पी से चित्त अभिभूत होने पर, उसकी मौत होती है, या मौत-जैसी पीड़ा।

तीर की उपमा

जैसे, सुनक्खत, किसी पुरुष में ऐसा तीर बिंध जाता है, जो गाढ़े विष में डूबाया गया हो। तब उसके मित्र-सहचारी, नाति-रिश्तेदार उसके लिए शल्य-चिकित्सक वैद्य की व्यवस्था करते हैं।

वह शल्य-चिकित्सक वैद्य शस्त्र से उसके घाव-मुख को खोलता है। शस्त्र से उसके घाव-मुख को खोलकर, वह उसके तीर को टटोलता है। उसके तीर को टटोलकर, तीर को खींचकर निकालता है, विष बाहर निकालने पर कुछ विष शेष छूटता है। विष का शेष छूटना जान कर, वह कहता है, ‘भले पुरुष, तीर को खींचकर बाहर निकाल दिया, विष को बाहर निकाल दिया, कुछ शेष छोड़कर। वह तुम्हें बाधित कर सकता है—

  • इसलिए केवल उपयुक्त भोजन खाओ, अनुपयुक्त भोजन मत खाओ, वरना घाव सड़ सकता है।
  • समय-समय पर घाव को धोते रहो। समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम लगाओ। समय-समय पर घाव को न धोने पर, समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम न लगाने पर, घाव-मुख पीब और रक्त से भरने लगेगा।
  • पवन और धूप में टहलने में लिप्त मत हो। पवन और धूप में टहलने में लिप्त होने पर, घाव-मुख धूल और मल से भरने लगेगा।
  • घाव की रक्षा करो, भले पुरुष, घाव को ठीक होने दो।’

तब उसे लगता है, ‘तीर को तो खींचकर बाहर निकाल दिया है। विष को बिना शेष छोड़े निकाल दिया है। अब ये मुझे बाधित नहीं कर सकता।’ और, तब वह—

  • अनुपयुक्त भोजन खाता है। अनुपयुक्त भोजन खाने पर उसका घाव सड़ने लगता है।
  • समय-समय पर घाव को नहीं धोता, समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम नहीं लगाता। समय-समय पर घाव को न धोने पर, समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम नहीं लगाने पर, घाव-मुख पीब और रक्त से भरने लगता है।
  • पवन और धूप में टहलने में लिप्त होता है। पवन और धूप में टहलने में लिप्त होने पर, घाव-मुख धूल और मल से भरने लगता है।
  • घाव की रक्षा नहीं करता। घाव को ठीक नहीं होने देता।

इस प्रकार अनुपयुक्त कृत्य करने पर, और गंदे विष के शेष छूटने पर, उसका घाव फूलने लगता है। घाव के फूलने पर, उसकी मौत होती है, या मौत-जैसी पीड़ा।

उसी तरह, सुनक्खत, ऐसा संभव है कि किसी भिक्षु को लगे, ‘श्रमण ने तृष्णा को तीर बताया है, जो अविद्या के विष को चाहत, दिलचस्पी और दुर्भावना के माध्यम से फैलाता है। मैंने उस तृष्णा के तीर को त्याग दिया है, अविद्या के विष को निकाल दिया है, और मैं निर्वाण के लिए सम्यक रूप से समर्पित हूँ।’

इस प्रकार के अहंभाव तथ्यात्मक नहीं होता। और, वह निर्वाण समर्पण के लिए अनुपयुक्त बातों में लिप्त होता है—

  • वह आँखों से ऐसे अनुपयुक्त रूप देखने में लिप्त होता है,
  • कान से ऐसी अनुपयुक्त आवाजे सुनने में लिप्त होता है,
  • नाक से ऐसे अनुपयुक्त गंध सूँघने में लिप्त होता है,
  • जीभ से ऐसे स्वाद चखने में लिप्त होता है,
  • काया से ऐसे अनुपयुक्त संस्पर्श महसूस करने में लिप्त होता है,
  • मन से ऐसे अनुपयुक्त स्वभाव जानने में लिप्त होता है।

और (इंद्रियों) से ऐसे अनुपयुक्त (विषयों) में लिप्त होने पर, दिलचस्पी उसके चित्त पर टूट पड़ती है। दिलचस्पी से चित्त अभिभूत होने पर, उसकी मौत होती है, या मौत-जैसी पीड़ा।

क्योंकि, सुनक्खत, आर्य-विनय में शिक्षा को त्यागकर हीन जीवन में लौटने को ‘मौत’ कहते हैं। और किसी दूषित आपत्ति में पड़ने पर ‘मौत-जैसी पीड़ा’ होती है।

सम्यक समझ

अब ऐसा भी संभव है, सुनक्खत, कि किसी भिक्षु को लगे, ‘श्रमण ने तृष्णा को तीर बताया है, जो अविद्या के विष को चाहत, दिलचस्पी और दुर्भावना के माध्यम से फैलाता है। मैंने उस तृष्णा के तीर को त्याग दिया है, अविद्या के विष को निकाल दिया है, और मैं निर्वाण के लिए सम्यक रूप से समर्पित हूँ।’

निर्वाण के लिए सम्यक रूप से समर्पित होने पर, वह निर्वाण समर्पण के लिए अनुपयुक्त बातों में लिप्त नहीं होता—

  • वह आँखों से ऐसे अनुपयुक्त रूप देखने में लिप्त नहीं होता,
  • कान से ऐसी अनुपयुक्त आवाजे सुनने में लिप्त नहीं होता,
  • नाक से ऐसे अनुपयुक्त गंध सूँघने में लिप्त नहीं होता,
  • जीभ से ऐसे स्वाद चखने में लिप्त नहीं होता,
  • काया से ऐसे अनुपयुक्त संस्पर्श महसूस करने में लिप्त नहीं होता,
  • मन से ऐसे अनुपयुक्त स्वभाव जानने में लिप्त नहीं होता।

और (इंद्रियों) से ऐसे अनुपयुक्त (विषयों) में लिप्त न होने पर, दिलचस्पी उसके चित्त पर टूट नहीं पड़ती। दिलचस्पी से चित्त अभिभूत न होने पर, न उसकी मौत होती है, न मौत-जैसी पीड़ा।

जैसे, सुनक्खत, किसी पुरुष में ऐसा तीर बिंध जाता है, जो गाढ़े विष में डूबाया गया हो। तब उसके मित्र-सहचारी, नाति-रिश्तेदार उसके लिए शल्य-चिकित्सक वैद्य की व्यवस्था करते हैं।

वह शल्य-चिकित्सक वैद्य शस्त्र से उसके घाव-मुख को खोलता है। शस्त्र से उसके घाव-मुख को खोलकर, वह उसके तीर को टटोलता है। उसके तीर को टटोलकर, तीर को खींचकर निकालता है, विष पूरा बाहर निकालने पर कुछ शेष नहीं छूटता। विष का शेष न छूटना जान कर, वह कहता है, ‘भले पुरुष, तीर को खींचकर बाहर निकाल दिया, विष को पूरा बाहर निकाल दिया, शेष छोड़े। वह तुम्हें बाधित नहीं कर सकता—

  • तब भी केवल उपयुक्त भोजन खाओ, अनुपयुक्त भोजन मत खाओ, वरना घाव सड़ सकता है।
  • समय-समय पर घाव को धोते रहो। समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम लगाओ। समय-समय पर घाव को न धोने पर, समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम न लगाने पर, घाव-मुख पीब और रक्त से भरने लगेगा।
  • पवन और धूप में टहलने में लिप्त मत हो। पवन और धूप में टहलने में लिप्त होने पर, घाव-मुख धूल और मल से भरने लगेगा।
  • घाव की रक्षा करो, भले पुरुष, घाव को ठीक होने दो।’

तब उसे लगता है, ‘तीर को खींचकर बाहर निकाल दिया है। विष को बिना शेष छोड़े निकाल दिया है। अब ये मुझे बाधित नहीं कर सकता।’ तब भी वह—

  • उपयुक्त भोजन खाता है। उपयुक्त भोजन खाने पर उसका घाव नहीं सड़ता।
  • समय-समय पर घाव को धोता है, समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम लगाता है। समय-समय पर घाव को धोने पर, समय-समय पर घाव-मुख पर मलहम लगाने पर, घाव-मुख पीब और रक्त से नहीं भरता।
  • पवन और धूप में टहलने में लिप्त नहीं होता। पवन और धूप में टहलने में लिप्त न होने पर, घाव-मुख धूल और मल से नहीं भरने लगता।
  • घाव की रक्षा करता है। घाव को ठीक होने देता है।

इस प्रकार उपयुक्त कृत्य करने पर, और गंदे विष के शेष न छूटने पर, उसका घाव ठीक हो जाता है। घाव के ठीक होने पर, उसकी न मौत होती है, न ही मौत-जैसी पीड़ा।

उसी तरह, सुनक्खत, ऐसा संभव है कि किसी भिक्षु को लगे, ‘श्रमण ने तृष्णा को तीर बताया है, जो अविद्या के विष को चाहत, दिलचस्पी और दुर्भावना के माध्यम से फैलाता है। मैंने उस तृष्णा के तीर को त्याग दिया है, अविद्या के विष को निकाल दिया है, और मैं निर्वाण के लिए सम्यक रूप से समर्पित हूँ।’

निर्वाण के लिए सम्यक रूप से समर्पित होने पर, वह निर्वाण समर्पण के लिए अनुपयुक्त बातों में लिप्त नहीं होता—

  • वह आँखों से ऐसे अनुपयुक्त रूप देखने में लिप्त नहीं होता,
  • कान से ऐसी अनुपयुक्त आवाजे सुनने में लिप्त नहीं होता,
  • नाक से ऐसे अनुपयुक्त गंध सूँघने में लिप्त नहीं होता,
  • जीभ से ऐसे स्वाद चखने में लिप्त नहीं होता,
  • काया से ऐसे अनुपयुक्त संस्पर्श महसूस करने में लिप्त नहीं होता,
  • मन से ऐसे अनुपयुक्त स्वभाव जानने में लिप्त नहीं होता।

और (इंद्रियों) से ऐसे अनुपयुक्त (विषयों) में लिप्त न होने पर, दिलचस्पी उसके चित्त पर टूट नहीं पड़ती। दिलचस्पी से चित्त अभिभूत न होने पर, न उसकी मौत होती है, न मौत-जैसी पीड़ा।

उपमा का अर्थ

सुनक्खत, मैंने इस उपमा को (गहरा) अर्थ बताने के लिए बनाया है। उसका अर्थ यह है—

  • घाव—छह भीतरी (इंद्रिय) आयाम के अर्थ से है,
  • विष—अविद्या के अर्थ से है,
  • तीर—तृष्णा के अर्थ से है,
  • टटोलना—स्मृति के अर्थ से है,
  • शस्त्र—आर्य प्रज्ञा के अर्थ से है,
  • शल्य-चिकित्सक—तथागत अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध के अर्थ से है।

वाकई, सुनक्खत, भिक्षु छह संपर्क आयाम का संवर (=रक्षा) करता है। ‘उपधि 2 दुःख का मूल है’—ऐसा समझने पर उपधि-रहित हो, उपधि को खत्म कर विमुक्त होने पर, वह उपधि के मारे काया से जुटेगा या चित्त को उत्पन्न करेगा—ऐसा संभव नहीं है।

विष के प्याले की उपमा

जैसे, सुनक्खत, किसी काँसे के प्याले में अच्छे रंग का, अच्छी गंध का, अच्छे स्वाद का रस हो, जिसमें विष मिला हो। तब कोई पुरुष आता है, जो जीवित रहना चाहता है, मरना नहीं चाहता, सुख चाहता है, दुःख से दूर भागता है। क्या लगता है, सुनक्खत? क्या वह पुरुष उस काँसे के प्याले से ऐसा जानते हुए पिएगा, ‘इसे पीने पर मौत होगी, या मौत-जैसी पीड़ा’?”

“नहीं, भन्ते।”

“उसी तरह, सुनक्खत, वाकई भिक्षु छह संपर्क आयाम का संवर करता है। ‘उपधि दुःख का मूल है’—ऐसा समझने पर उपधि-रहित हो, उपधि को खत्म कर विमुक्त होने पर, वह उपधि के मारे काया से जुटेगा या चित्त को उत्पन्न करेगा—ऐसा संभव नहीं है।

जैसे, सुनक्खत, कोई घोर विषैला वाइपर (साँप) हो। तब कोई पुरुष आता है, जो जीवित रहना चाहता है, मरना नहीं चाहता, सुख चाहता है, दुःख से दूर भागता है। क्या लगता है, सुनक्खत? क्या वह पुरुष उस घोर विषैले वाइपर को ऐसा जानते हुए अपना हाथ या अँगूठा देगा, ‘इसके दंश से मौत होगी, या मौत-जैसी पीड़ा’?”

“नहीं, भन्ते।”

“उसी तरह, सुनक्खत, वाकई भिक्षु छह संपर्क आयाम का संवर करता है। ‘उपधि दुःख का मूल है’—ऐसा समझने पर उपधि-रहित हो, उपधि को खत्म कर विमुक्त होने पर, वह उपधि के मारे काया से जुटेगा या चित्त को उत्पन्न करेगा—ऐसा संभव नहीं है।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर सुनक्खत्त लिच्छविपुत्त ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. आनेञ्ज या “अविचलता”—चित्त की इस विशिष्ट अवस्था के विषय में विस्तृत जानकारी के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎

  2. उपधि के बारे जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎

पालि

५५. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा वेसालियं विहरति महावने कूटागारसालायं। तेन खो पन समयेन सम्बहुलेहि भिक्खूहि भगवतो सन्तिके अञ्‍ञा ब्याकता होति – ‘‘‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानामा’’ति। अस्सोसि खो सुनक्खत्तो लिच्छविपुत्तो – ‘‘सम्बहुलेहि किर भिक्खूहि भगवतो सन्तिके अञ्‍ञा ब्याकता होति – ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानामा’’ति। अथ खो सुनक्खत्तो लिच्छविपुत्तो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो सुनक्खत्तो लिच्छविपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सुतं मेतं, भन्ते – ‘सम्बहुलेहि किर भिक्खूहि भगवतो सन्तिके अञ्‍ञा ब्याकता – खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानामा’’ति। ‘‘ये ते, भन्ते, भिक्खू भगवतो सन्तिके अञ्‍ञं ब्याकंसु – ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानामा’’ति, कच्‍चि ते, भन्ते, भिक्खू सम्मदेव अञ्‍ञं ब्याकंसु उदाहु सन्तेत्थेकच्‍चे भिक्खू अधिमानेन अञ्‍ञं ब्याकंसूति?

५६. ‘‘ये ते, सुनक्खत्त, भिक्खू मम सन्तिके अञ्‍ञं ब्याकंसु – ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानामा’’ति । ‘‘सन्तेत्थेकच्‍चे भिक्खू सम्मदेव अञ्‍ञं ब्याकंसु, सन्ति पनिधेकच्‍चे भिक्खू अधिमानेनपि अधिमानेन (?) अञ्‍ञं ब्याकंसु। तत्र, सुनक्खत्त, ये ते भिक्खू सम्मदेव अञ्‍ञं ब्याकंसु तेसं तं तथेव होति; ये पन ते भिक्खू अधिमानेन अञ्‍ञं ब्याकंसु तत्र, सुनक्खत्त, तथागतस्स एवं होति – ‘धम्मं नेसं देसेस्स’न्ति देसेय्यन्ति (पी॰ क॰)। एवञ्‍चेत्थ, सुनक्खत्त, तथागतस्स होति – ‘धम्मं नेसं देसेस्स’न्ति। अथ च पनिधेकच्‍चे मोघपुरिसा पञ्हं अभिसङ्खरित्वा अभिसङ्खरित्वा तथागतं उपसङ्कमित्वा पुच्छन्ति। तत्र, सुनक्खत्त, यम्पि तथागतस्स एवं होति – ‘धम्मं नेसं देसेस्स’न्ति तस्सपि होति अञ्‍ञथत्त’’न्ति। ‘‘एतस्स भगवा कालो, एतस्स सुगत कालो, यं भगवा धम्मं देसेय्य। भगवतो सुत्वा भिक्खू धारेस्सन्ती’’ति। ‘‘तेन हि, सुनक्खत्त सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो सुनक्खत्तो लिच्छविपुत्तो भगवतो पच्‍चस्सोसि। भगवा एतदवोच –

५७. ‘‘पञ्‍च खो इमे, सुनक्खत्त, कामगुणा। कतमे पञ्‍च? चक्खुविञ्‍ञेय्या रूपा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया, सोतविञ्‍ञेय्या सद्दा…पे॰… घानविञ्‍ञेय्या गन्धा… जिव्हाविञ्‍ञेय्या रसा… कायविञ्‍ञेय्या फोट्ठब्बा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया – इमे खो, सुनक्खत्त, पञ्‍च कामगुणा।

५८. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चो पुरिसपुग्गलो लोकामिसाधिमुत्तो अस्स। लोकामिसाधिमुत्तस्स खो, सुनक्खत्त, पुरिसपुग्गलस्स तप्पतिरूपी चेव कथा सण्ठाति, तदनुधम्मञ्‍च अनुवितक्‍केति, अनुविचारेति, तञ्‍च पुरिसं भजति, तेन च वित्तिं आपज्‍जति; आनेञ्‍जपटिसंयुत्ताय च पन कथाय कच्छमानाय न सुस्सूसति, न सोतं ओदहति, न अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेति उपट्ठपेति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰), न च तं पुरिसं भजति, न च तेन वित्तिं आपज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, पुरिसो सकम्हा गामा वा निगमा वा चिरविप्पवुत्थो अस्स। सो अञ्‍ञतरं पुरिसं पस्सेय्य तम्हा गामा वा निगमा वा अचिरपक्‍कन्तं। सो तं पुरिसं तस्स गामस्स वा निगमस्स वा खेमतञ्‍च सुभिक्खतञ्‍च अप्पाबाधतञ्‍च पुच्छेय्य; तस्स सो पुरिसो तस्स गामस्स वा निगमस्स वा खेमतञ्‍च सुभिक्खतञ्‍च अप्पाबाधतञ्‍च संसेय्य। तं किं मञ्‍ञसि, सुनक्खत्त, अपि नु सो पुरिसो तस्स पुरिसस्स सुस्सूसेय्य, सोतं ओदहेय्य, अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेय्य, तञ्‍च पुरिसं भजेय्य, तेन च वित्तिं आपज्‍जेय्या’’ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, सुनक्खत्त, ठानमेतं विज्‍जति यं इधेकच्‍चो पुरिसपुग्गलो लोकामिसाधिमुत्तो अस्स। लोकामिसाधिमुत्तस्स खो, सुनक्खत्त, पुरिसपुग्गलस्स तप्पतिरूपी चेव कथा सण्ठाति, तदनुधम्मञ्‍च अनुवितक्‍केति, अनुविचारेति, तञ्‍च पुरिसं भजति, तेन च वित्तिं आपज्‍जति; आनेञ्‍जपटिसंयुत्ताय च पन कथाय कच्छमानाय न सुस्सूसति, न सोतं ओदहति, न अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेति, न च तं पुरिसं भजति, न च तेन वित्तिं आपज्‍जति। सो एवमस्स वेदितब्बो – ‘आनेञ्‍जसंयोजनेन हि खो विसंयुत्तो आनेञ्‍जसंयोजनेन हि खो विसंयुत्तो-इति पाठो सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰ पोत्थकेसु नत्थि, अट्ठकथासु पन तब्बण्णना दिस्सतियेव लोकामिसाधिमुत्तो पुरिसपुग्गलो’’’ति।

५९. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चो पुरिसपुग्गलो आनेञ्‍जाधिमुत्तो अस्स। आनेञ्‍जाधिमुत्तस्स खो, सुनक्खत्त, पुरिसपुग्गलस्स तप्पतिरूपी चेव कथा सण्ठाति, तदनुधम्मञ्‍च अनुवितक्‍केति, अनुविचारेति, तञ्‍च पुरिसं भजति, तेन च वित्तिं आपज्‍जति; लोकामिसपटिसंयुत्ताय च पन कथाय कच्छमानाय न सुस्सूसति, न सोतं ओदहति, न अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेति, न च तं पुरिसं भजति, न च तेन वित्तिं आपज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, पण्डुपलासो बन्धना पवुत्तो अभब्बो हरितत्ताय; एवमेव खो, सुनक्खत्त, आनेञ्‍जाधिमुत्तस्स पुरिसपुग्गलस्स ये लोकामिससंयोजने से पवुत्ते। सो एवमस्स वेदितब्बो – ‘लोकामिससंयोजनेन हि खो विसंयुत्तो आनेञ्‍जाधिमुत्तो पुरिसपुग्गलो’’’ति।

६०. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चो पुरिसपुग्गलो आकिञ्‍चञ्‍ञायतनाधिमुत्तो अस्स। आकिञ्‍चञ्‍ञायतनाधिमुत्तस्स खो, सुनक्खत्त, पुरिसपुग्गलस्स तप्पतिरूपी चेव कथा सण्ठाति, तदनुधम्मञ्‍च अनुवितक्‍केति, अनुविचारेति, तञ्‍च पुरिसं भजति, तेन च वित्तिं आपज्‍जति ; आनेञ्‍जपटिसंयुत्ताय च पन कथाय कच्छमानाय न सुस्सूसति, न सोतं ओदहति, न अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेति , न च तं पुरिसं भजति, न च तेन वित्तिं आपज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, पुथुसिला द्वेधाभिन्‍ना अप्पटिसन्धिका होति; एवमेव खो, सुनक्खत्त, आकिञ्‍चञ्‍ञायतनाधिमुत्तस्स पुरिसपुग्गलस्स ये आनेञ्‍जसंयोजने से भिन्‍ने। सो एवमस्स वेदितब्बो – ‘आनेञ्‍जसंयोजनेन हि खो विसंयुत्तो आकिञ्‍चञ्‍ञायतनाधिमुत्तो पुरिसपुग्गलो’’’ति।

६१. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चो पुरिसपुग्गलो नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनाधिमुत्तो अस्स। नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनाधिमुत्तस्स खो, सुनक्खत्त, पुरिसपुग्गलस्स तप्पतिरूपी चेव कथा सण्ठाति, तदनुधम्मञ्‍च अनुवितक्‍केति, अनुविचारेति, तञ्‍च पुरिसं भजति, तेन च वित्तिं आपज्‍जति; आकिञ्‍चञ्‍ञायतनपटिसंयुत्ताय च पन कथाय कच्छमानाय न सुस्सूसति, न सोतं ओदहति, न अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेति, न च तं पुरिसं भजति, न च तेन वित्तिं आपज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, पुरिसो मनुञ्‍ञभोजनं भुत्तावी छड्डेय्य छद्देय्य (?)। तं किं मञ्‍ञसि, सुनक्खत्त, अपि नु तस्स पुरिसस्स तस्मिं भत्ते वन्ते (क॰ सी॰), भुत्ते (क॰ सी॰ क॰) पुन भोत्तुकम्यता अस्सा’’ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘तं किस्स हेतु’’? ‘‘अदुञ्हि, भन्ते, भत्तं वन्तं (सी॰) पटिकूलसम्मत’’न्ति। ‘‘एवमेव खो, सुनक्खत्त, नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनाधिमुत्तस्स पुरिसपुग्गलस्स ये आकिञ्‍चञ्‍ञायतनसंयोजने से वन्ते। सो एवमस्स वेदितब्बो – ‘आकिञ्‍चञ्‍ञायतनसंयोजनेन हि खो विसंयुत्तो नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनाधिमुत्तो पुरिसपुग्गलो’ति।

६२. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चो पुरिसपुग्गलो सम्मा निब्बानाधिमुत्तो अस्स। सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्स खो, सुनक्खत्त, पुरिसपुग्गलस्स तप्पतिरूपी चेव कथा सण्ठाति, तदनुधम्मञ्‍च अनुवितक्‍केति, अनुविचारेति, तञ्‍च पुरिसं भजति, तेन च वित्तिं आपज्‍जति; नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनपटिसंयुत्ताय च पन कथाय कच्छमानाय न सुस्सूसति, न सोतं ओदहति, न अञ्‍ञा चित्तं उपट्ठापेति, न च तं पुरिसं भजति, न च तेन वित्तिं आपज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, तालो मत्थकच्छिन्‍नो अभब्बो पुन विरुळ्हिया; एवमेव खो, सुनक्खत्त, सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्स पुरिसपुग्गलस्स ये नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनसंयोजने से उच्छिन्‍नमूले तालावत्थुकते अनभावंकते अनभावकते (सी॰ पी॰), अनभावङ्गते (स्या॰ कं॰) आयतिं अनुप्पादधम्मे। सो एवमस्स वेदितब्बो – ‘नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनसंयोजनेन हि खो विसंयुत्तो सम्मा निब्बानाधिमुत्तो पुरिसपुग्गलो’’’ति।

६३. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चस्स भिक्खुनो एवमस्स – ‘तण्हा खो सल्‍लं समणेन वुत्तं, अविज्‍जाविसदोसो, छन्दरागब्यापादेन रुप्पति। तं मे तण्हासल्‍लं पहीनं, अपनीतो अविज्‍जाविसदोसो, सम्मा निब्बानाधिमुत्तोहमस्मी’ति। एवंमानि एवंमानी (सी॰ पी॰ क॰), एवमादि (स्या॰ कं॰) अस्स अतथं समानं अत्थं समानं (स्या॰ कं॰ पी॰), अत्थसमानं (सी॰)। सो यानि सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्स असप्पायानि तानि अनुयुञ्‍जेय्य; असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं सोतेन सद्दं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं घानेन गन्धं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं जिव्हाय रसं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं अनुयुञ्‍जेय्य , असप्पायं मनसा धम्मं अनुयुञ्‍जेय्य। तस्स असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं अनुयुत्तस्स, असप्पायं सोतेन सद्दं अनुयुत्तस्स, असप्पायं घानेन गन्धं अनुयुत्तस्स, असप्पायं जिव्हाय रसं अनुयुत्तस्स, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं अनुयुत्तस्स, असप्पायं मनसा धम्मं अनुयुत्तस्स रागो चित्तं अनुद्धंसेय्य। सो रागानुद्धंसितेन चित्तेन मरणं वा निगच्छेय्य मरणमत्तं वा दुक्खं।

‘‘सेय्यथापि, सुनक्खत्त, पुरिसो सल्‍लेन विद्धो अस्स सविसेन गाळ्हूपलेपनेन। तस्स मित्तामच्‍चा ञातिसालोहिता भिसक्‍कं सल्‍लकत्तं उपट्ठापेय्युं। तस्स सो भिसक्‍को सल्‍लकत्तो सत्थेन वणमुखं परिकन्तेय्य। सत्थेन वणमुखं परिकन्तित्वा एसनिया सल्‍लं एसेय्य। एसनिया सल्‍लं एसित्वा सल्‍लं अब्बुहेय्य, अपनेय्य विसदोसं सउपादिसेसं। सउपादिसेसोति अनुपादिसेसोति (सब्बत्थ) अयं हि तथागतस्स विसयो जानमानो सो एवं वदेय्य – ‘अम्भो पुरिस, उब्भतं खो ते सल्‍लं, अपनीतो विसदोसो सउपादिसेसो अनुपादिसेसो (सब्बत्थ) अयम्पि तथागतस्स विसयो। अनलञ्‍च ते अन्तरायाय। सप्पायानि चेव भोजनानि भुञ्‍जेय्यासि, मा ते असप्पायानि भोजनानि भुञ्‍जतो वणो अस्सावी अस्स। कालेन कालञ्‍च वणं धोवेय्यासि, कालेन कालं वणमुखं आलिम्पेय्यासि, मा ते न कालेन कालं वणं धोवतो न कालेन कालं वणमुखं आलिम्पतो पुब्बलोहितं वणमुखं परियोनन्धि। मा च वातातपे चारित्तं अनुयुञ्‍जि, मा ते वातातपे चारित्तं अनुयुत्तस्स रजोसूकं वणमुखं अनुद्धंसेसि। वणानुरक्खी च, अम्भो पुरिस, विहरेय्यासि वणसारोपी’ति वणस्सारोपीति (क॰) वण + सं + रोपी = वणसारोपी-इति पदविभागो। तस्स एवमस्स – ‘उब्भतं खो मे सल्‍लं, अपनीतो विसदोसो अनुपादिसेसो। अनलञ्‍च मे अन्तरायाया’ति। सो असप्पायानि चेव भोजनानि भुञ्‍जेय्य। तस्स असप्पायानि भोजनानि भुञ्‍जतो वणो अस्सावी अस्स। न च कालेन कालं वणं धोवेय्य, न च कालेन कालं वणमुखं आलिम्पेय्य। तस्स न कालेन कालं वणं धोवतो, न कालेन कालं वणमुखं आलिम्पतो पुब्बलोहितं वणमुखं परियोनन्धेय्य। वातातपे च चारित्तं अनुयुञ्‍जेय्य। तस्स वातातपे चारित्तं अनुयुत्तस्स रजोसूकं वणमुखं अनुद्धंसेय्य। न च वणानुरक्खी विहरेय्य न वणसारोपी। तस्स इमिस्सा च असप्पायकिरियाय, असुचि विसदोसो अपनीतो सउपादिसेसो तदुभयेन वणो पुथुत्तं गच्छेय्य। सो पुथुत्तं गतेन वणेन मरणं वा निगच्छेय्य मरणमत्तं वा दुक्खं।

‘‘एवमेव खो, सुनक्खत्त, ठानमेतं विज्‍जति यं इधेकच्‍चस्स भिक्खुनो एवमस्स – ‘तण्हा खो सल्‍लं समणेन वुत्तं, अविज्‍जाविसदोसो छन्दरागब्यापादेन रुप्पति। तं मे तण्हासल्‍लं पहीनं, अपनीतो अविज्‍जाविसदोसो, सम्मा निब्बानाधिमुत्तोहमस्मी’ति। एवंमानि अस्स अतथं समानं। सो यानि सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्स असप्पायानि तानि अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं सोतेन सद्दं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं घानेन गन्धं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं जिव्हाय रसं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं अनुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं मनसा धम्मं अनुयुञ्‍जेय्य। तस्स असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं अनुयुत्तस्स, असप्पायं सोतेन सद्दं अनुयुत्तस्स, असप्पायं घानेन गन्धं अनुयुत्तस्स, असप्पायं जिव्हाय रसं अनुयुत्तस्स, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं अनुयुत्तस्स, असप्पायं मनसा धम्मं अनुयुत्तस्स रागो चित्तं अनुद्धंसेय्य। सो रागानुद्धंसितेन चित्तेन मरणं वा निगच्छेय्य मरणमत्तं वा दुक्खं। मरणञ्हेतं, सुनक्खत्त, अरियस्स विनये यो सिक्खं पच्‍चक्खाय हीनायावत्तति; मरणमत्तञ्हेतं, सुनक्खत्त, दुक्खं यं अञ्‍ञतरं संकिलिट्ठं आपत्तिं आपज्‍जति।

६४. ‘‘ठानं खो पनेतं, सुनक्खत्त, विज्‍जति यं इधेकच्‍चस्स भिक्खुनो एवमस्स – ‘तण्हा खो सल्‍लं समणेन वुत्तं, अविज्‍जाविसदोसो छन्दरागब्यापादेन रुप्पति। तं मे तण्हासल्‍लं पहीनं, अपनीतो अविज्‍जाविसदोसो, सम्मा निब्बानाधिमुत्तोहमस्मी’ति। सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्सेव सतो सो यानि सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्स असप्पायानि तानि नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं सोतेन सद्दं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं घानेन गन्धं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं जिव्हाय रसं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं मनसा धम्मं नानुयुञ्‍जेय्य। तस्स असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं नानुयुत्तस्स, असप्पायं सोतेन सद्दं नानुयुत्तस्स, असप्पायं घानेन गन्धं नानुयुत्तस्स, असप्पायं जिव्हाय रसं नानुयुत्तस्स, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं नानुयुत्तस्स, असप्पायं मनसा धम्मं नानुयुत्तस्स रागो चित्तं नानुद्धंसेय्य। सो न रागानुद्धंसितेन चित्तेन नेव मरणं वा निगच्छेय्य न मरणमत्तं वा दुक्खं।

‘‘सेय्यथापि, सुनक्खत्त, पुरिसो सल्‍लेन विद्धो अस्स सविसेन गाळ्हूपलेपनेन। तस्स मित्तामच्‍चा ञातिसालोहिता भिसक्‍कं सल्‍लकत्तं उपट्ठापेय्युं। तस्स सो भिसक्‍को सल्‍लकत्तो सत्थेन वणमुखं परिकन्तेय्य। सत्थेन वणमुखं परिकन्तित्वा एसनिया सल्‍लं एसेय्य। एसनिया सल्‍लं एसित्वा सल्‍लं अब्बुहेय्य, अपनेय्य विसदोसं अनुपादिसेसं। अनुपादिसेसोति जानमानो सो एवं वदेय्य – ‘अम्भो पुरिस, उब्भतं खो ते सल्‍लं, अपनीतो विसदोसो अनुपादिसेसो। अनलञ्‍च ते अन्तरायाय। सप्पायानि चेव भोजनानि भुञ्‍जेय्यासि, मा ते असप्पायानि भोजनानि भुञ्‍जतो वणो अस्सावी अस्स। कालेन कालञ्‍च वणं धोवेय्यासि, कालेन कालं वणमुखं आलिम्पेय्यासि। मा ते न कालेन कालं वणं धोवतो न कालेन कालं वणमुखं आलिम्पतो पुब्बलोहितं वणमुखं परियोनन्धि। मा च वातातपे चारित्तं अनुयुञ्‍जि, मा ते वातातपे चारित्तं अनुयुत्तस्स रजोसूकं वणमुखं अनुद्धंसेसि । वणानुरक्खी च, अम्भो पुरिस, विहरेय्यासि वणसारोपी’ति। तस्स एवमस्स – ‘उब्भतं खो मे सल्‍लं, अपनीतो विसदोसो अनुपादिसेसो। अनलञ्‍च मे अन्तरायाया’ति। सो सप्पायानि चेव भोजनानि भुञ्‍जेय्य। तस्स सप्पायानि भोजनानि भुञ्‍जतो वणो न अस्सावी अस्स। कालेन कालञ्‍च वणं धोवेय्य, कालेन कालं वणमुखं आलिम्पेय्य। तस्स कालेन कालं वणं धोवतो कालेन कालं वणमुखं आलिम्पतो न पुब्बलोहितं वणमुखं परियोनन्धेय्य। न च वातातपे चारित्तं अनुयुञ्‍जेय्य। तस्स वातातपे चारित्तं अननुयुत्तस्स रजोसूकं वणमुखं नानुद्धंसेय्य। वणानुरक्खी च विहरेय्य वणसारोपी। तस्स इमिस्सा च सप्पायकिरियाय असु च असुचि (सब्बत्थ) सोचाति तब्बण्णना मनसिकातब्बा विसदोसो अपनीतो अनुपादिसेसो तदुभयेन वणो विरुहेय्य। सो रुळ्हेन वणेन सञ्छविना नेव मरणं वा निगच्छेय्य न मरणमत्तं वा दुक्खं।

‘‘एवमेव खो, सुनक्खत्त, ठानमेतं विज्‍जति यं इधेकच्‍चस्स भिक्खुनो एवमस्स – ‘तण्हा खो सल्‍लं समणेन वुत्तं, अविज्‍जाविसदोसो छन्दरागब्यापादेन रुप्पति। तं मे तण्हासल्‍लं पहीनं, अपनीतो अविज्‍जाविसदोसो, सम्मा निब्बानाधिमुत्तोहमस्मी’ति। सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्सेव सतो सो यानि सम्मा निब्बानाधिमुत्तस्स असप्पायानि तानि नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं सोतेन सद्दं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं घानेन गन्धं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं जिव्हाय रसं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं नानुयुञ्‍जेय्य, असप्पायं मनसा धम्मं नानुयुञ्‍जेय्य। तस्स असप्पायं चक्खुना रूपदस्सनं नानुयुत्तस्स, असप्पायं सोतेन सद्दं नानुयुत्तस्स, असप्पायं घानेन गन्धं नानुयुत्तस्स, असप्पायं जिव्हाय रसं नानुयुत्तस्स, असप्पायं कायेन फोट्ठब्बं नानुयुत्तस्स, असप्पायं मनसा धम्मं नानुयुत्तस्स, रागो चित्तं नानुद्धंसेय्य। सो न रागानुद्धंसितेन चित्तेन नेव मरणं वा निगच्छेय्य न मरणमत्तं वा दुक्खं।

६५. ‘‘उपमा खो मे अयं, सुनक्खत्त, कता अत्थस्स विञ्‍ञापनाय। अयंयेवेत्थ अत्थो – वणोति खो, सुनक्खत्त, छन्‍नेतं अज्झत्तिकानं आयतनानं अधिवचनं; विसदोसोति खो, सुनक्खत्त, अविज्‍जायेतं अधिवचनं; सल्‍लन्ति खो, सुनक्खत्त, तण्हायेतं अधिवचनं; एसनीति खो, सुनक्खत्त, सतियायेतं अधिवचनं; सत्थन्ति खो, सुनक्खत्त, अरियायेतं पञ्‍ञाय अधिवचनं; भिसक्‍को सल्‍लकत्तोति खो, सुनक्खत्त, तथागतस्सेतं अधिवचनं अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।

‘‘सो वत, सुनक्खत्त, भिक्खु छसु फस्सायतनेसु संवुतकारी ‘उपधि दुक्खस्स मूल’न्ति – इति विदित्वा निरुपधि उपधिसङ्खये विमुत्तो उपधिस्मिं वा कायं उपसंहरिस्सति चित्तं वा उप्पादेस्सतीति – नेतं ठानं विज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, आपानीयकंसो वण्णसम्पन्‍नो गन्धसम्पन्‍नो रससम्पन्‍नो; सो च खो विसेन संसट्ठो। अथ पुरिसो आगच्छेय्य जीवितुकामो अमरितुकामो सुखकामो दुक्खपटिकूलो। तं किं मञ्‍ञसि, सुनक्खत्त, अपि नु सो पुरिसो अमुं आपानीयकंसं पिवेय्य यं जञ्‍ञा – ‘इमाहं पिवित्वा मरणं वा निगच्छामि मरणमत्तं वा दुक्ख’’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, सुनक्खत्त, सो वत भिक्खु छसु फस्सायतनेसु संवुतकारी ‘उपधि दुक्खस्स मूल’न्ति – इति विदित्वा निरुपधि उपधिसङ्खये विमुत्तो उपधिस्मिं वा कायं उपसंहरिस्सति चित्तं वा उप्पादेस्सतीति – नेतं ठानं विज्‍जति। सेय्यथापि, सुनक्खत्त, आसीविसो आसिविसो (क॰) घोरविसो। अथ पुरिसो आगच्छेय्य जीवितुकामो अमरितुकामो सुखकामो दुक्खपटिकूलो। तं किं मञ्‍ञसि, सुनक्खत्त, अपि नु सो पुरिसो अमुस्स आसीविसस्स घोरविसस्स हत्थं वा अङ्गुट्ठं वा दज्‍जा युञ्‍जेय्य (क॰) यं जञ्‍ञा – ‘इमिनाहं दट्ठो मरणं वा निगच्छामि मरणमत्तं वा दुक्ख’’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, सुनक्खत्त, सो वत भिक्खु छसु फस्सायतनेसु संवुतकारी ‘उपधि दुक्खस्स मूल’न्ति – इति विदित्वा निरुपधि उपधिसङ्खये विमुत्तो उपधिस्मिं वा कायं उपसंहरिस्सति चित्तं वा उप्पादेस्सतीति – नेतं ठानं विज्‍जती’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमनो सुनक्खत्तो लिच्छविपुत्तो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।

सुनक्खत्तसुत्तं निट्ठितं पञ्‍चमं।

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