
यह सूत्र कामुकता के परे ले जाने वाली सभी “पटिपदा”—अर्थात अभ्यास-विधि या साधना-मार्ग—को क्रमशः उजागर करता है, और अरूप अवस्थाओं को प्राप्त करने के ठोस मार्ग दिखाता है। इसमें आनेञ्ज (अविचलता) की प्राप्ति के तीन उपाय, वहाँ से आकिञ्चञ्ञायतन (शून्य आयाम) की ओर आगे बढ़ने के तीन उपाय, और नेवसञ्ञानासञ्ञायतन (न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम) तक पहुँचने की विधि बताई गई है।
लेकिन साथ ही, भगवान यह भी स्पष्ट करते हैं कि पटिपदा महत्वपूर्ण तो है, पर अंतिम नहीं। साधक ऊँची और सूक्ष्म अवस्थाओं में निपुण होकर भी उनसे आसक्त हो सकता है, भले ही वह आसक्ति कितनी ही “श्रेष्ठ” क्यों न हो। इसलिए बुद्ध का उपदेश इन सभी अवस्थाओं की उपलब्धि पर ठहरने का नहीं, बल्कि उनसे भी आगे बढ़कर “अनुपादान”, अर्थात अनासक्त होने की दिशा में जाने का है।
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान कुरु देश में कम्मासधम्म नामक कुरु नगर में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”
“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“भिक्षुओं, कामुकता अनित्य है, तुच्छ है, झूठी है, धोखाधड़ी है। यह माया (=छल) से बना, मूर्खों का आलाप है, भिक्षुओं। वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा—दोनों मार के प्रभुत्व, मार की सत्ता, मार का डाला चारा, मार का परिसर (“गोचर”) है। इसी पापकारी अकुशल मानस से लालसा, दुर्भावना और कलह होती है। वह किसी आर्यश्रावक के धम्म सीखने में अवरोध लाते हैं।
तब, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा—दोनों मार का ही प्रभुत्व, मार की ही सत्ता, मार का ही डाला चारा (जाल), मार का ही परिसर है। इसी पापकारी अकुशल मानस से लालसा, दुर्भावना और कलह होती है। वह किसी आर्यश्रावक के धम्म सीखने में अवरोध लाते हैं।
क्यों न मैं दृढ़-संकल्प से इस लोक को हराकर, विस्तृत और विराट मानस के साथ विहार करूँ? क्योंकि दृढ़-संकल्प से इस लोक को पराभूत कर, विस्तृत और विराट मानस से विहार करने पर, जो पापकारी अकुशल मानस से लालसा, दुर्भावना और कलह होती है, वह नहीं होगी। उन्हें त्यागने पर मेरा चित्त असीम और अपरिमित होकर सुविकसित हो जाएगा।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे अविचलता 1 को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान अविचलता में जाए। इसे, भिक्षुओं, अविचलता में पहुँचाने वाली पहली साधना कहते हैं।
आगे, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा—जो भी कोई रूप हो, सभी रूप ‘चार महाभूत’ हैं, चार महाभूत के आधार से उपजे हैं।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे अविचलता को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान अविचलता में जाए। इसे, भिक्षुओं, अविचलता में पहुँचाने वाली दूसरी साधना कहते हैं।
आगे, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा; वर्तमान जीवन के रूप हो, या अगले जीवन के रूप हो; वर्तमान जीवन की रूप संज्ञा हो, या अगले जीवन की रूप संज्ञा—वे सब अनित्य हैं। और जो अनित्य हैं, वह न स्वीकार करने योग्य हैं, न स्वागत करने योग्य हैं, न ही आसक्ति करने योग्य हैं।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे अविचलता को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान अविचलता में जाए। इसे, भिक्षुओं, अविचलता में पहुँचाने वाली तीसरी साधना कहते हैं।
आगे, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा; वर्तमान जीवन के रूप हो, या अगले जीवन के रूप हो; वर्तमान जीवन की रूप संज्ञा हो, या अगले जीवन की रूप संज्ञा; अविचल संज्ञा है—वे सब संज्ञा हैं। जहाँ वे बिना शेष रहे निरुद्ध होते हैं, वह शांतिमय है, वह सूक्ष्मतम है—यही, शून्य आयाम।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे शून्य आयाम को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान शून्य आयाम में जाए। इसे, भिक्षुओं, शून्य आयाम में पहुँचाने वाली पहली साधना कहते हैं।
आगे, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक जंगल में, पेड़ के तले, या निर्जन ध्यानस्थल (“सुञ्ञागार”) (“सुञ्ञागार”) में जाकर इस प्रकार चिंतन करता है—‘यह आत्मा या आत्मीयता से शून्य है।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे शून्य आयाम को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान शून्य आयाम में जाए। इसे, भिक्षुओं, शून्य आयाम में पहुँचाने वाली दूसरी साधना कहते हैं।
आगे, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘मैं कहीं भी किसी का कुछ नहीं हूँ! और कहीं भी किसी का कुछ मेरा नहीं है!’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे शून्य आयाम को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान शून्य आयाम में जाए। इसे, भिक्षुओं, शून्य आयाम में पहुँचाने वाली तीसरी साधना कहते हैं।
आगे, भिक्षुओं, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा; वर्तमान जीवन के रूप हो, या अगले जीवन के रूप हो; वर्तमान जीवन की रूप संज्ञा हो, या अगले जीवन की रूप संज्ञा; अविचल संज्ञा हो, या शून्य आयाम संज्ञा—वे सब संज्ञा हैं। जहाँ वे बिना शेष रहे निरुद्ध होते हैं, वह शांतिमय है, वह सूक्ष्मतम है—यही, न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं। मरणोपरांत काया छूटने पर संभव है कि पहुँचाने वाला विज्ञान न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम में जाए। इसे, भिक्षुओं, न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम में पहुँचाने वाली साधना कहते हैं।”
जब ऐसा कहा गया, तब आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा, “भन्ते, जो भिक्षु इस प्रकार साधना करता है—‘न ऐसा (पहले) होता, न ऐसा (आज) मेरे साथ होता। न (अब) ऐसा होगा, न (आगे) ऐसा मेरे साथ होगा। (अभी) जो भी अस्तित्व में है, उसे मैं त्यागता हूँ’—इस प्रकार वह उपेक्षा प्राप्त करता है। भन्ते, क्या ऐसा भिक्षु परिनिर्वृत्त होगा, अथवा परिनिर्वृत्त नहीं होगा?”
“कोई भिक्षु परिनिर्वृत्त होगा, आनन्द, और कोई भिक्षु परिनिर्वृत्त नहीं होगा।”
“किस कारण और किस परिस्थिति से, भन्ते, कोई भिक्षु परिनिर्वृत्त होगा, और कोई भिक्षु परिनिर्वृत्त नहीं होगा?”
“आनन्द, कोई भिक्षु इस प्रकार साधना करता है—‘न ऐसा होता, न ऐसा मेरे साथ होता। न ऐसा होगा, न ऐसा मेरे साथ होगा। जो भी अस्तित्व में है, उसे मैं त्यागता हूँ’—इस प्रकार वह उपेक्षा प्राप्त करता है। उस उपेक्षा (अवस्था या स्वभाव) में वह हर्षित होता है, उसका स्वागत करता है, उसमें चिपके रहता है। तब, उस उपेक्षा में हर्षित होने से, स्वागत करने से, चिपके रहने से, उसका विज्ञान उसी का आधार लेकर उसी में आसक्त होता है। तब, आनन्द, आसक्ति के साथ होने पर वह भिक्षु परिनिर्वृत्त नहीं होता।”
“किन्तु, भन्ते, वह भिक्षु किस बात से आसक्ति करता है?”
“न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम से, आनन्द।”
“तब लगता है, भन्ते, वह भिक्षु सर्वश्रेष्ठ आसक्ति से आसक्ति करता है।”
“वाकई, आनन्द, वह भिक्षु सर्वश्रेष्ठ आसक्ति से आसक्ति करता है। क्योंकि, आसक्तियों में सर्वश्रेष्ठ आसक्ति वाकई यही है—न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम।
किन्तु, आनन्द, कोई भिक्षु इस प्रकार साधना करता है—‘न ऐसा होता, न ऐसा मेरे साथ होता। न ऐसा होगा, न ऐसा मेरे साथ होगा। जो भी अस्तित्व में है, उसे मैं त्यागता हूँ’—इस प्रकार वह उपेक्षा प्राप्त करता है। उस उपेक्षा में वह हर्षित नहीं होता, उसका स्वागत नहीं करता, उसमें चिपके नहीं रहता। तब, उस उपेक्षा में हर्षित न होने से, स्वागत न करने से, चिपके न रहने से, उसका विज्ञान न उस का आधार लेता है, न उस में आसक्त होता है। तब, आनन्द, अनासक्त होने पर वह भिक्षु परिनिर्वृत्त होता है।”
“आश्चर्य है, भन्ते! अद्भुत है, भन्ते! (अगला-अगला) आधार ले-लेकर, भन्ते, भगवान बाढ़ को लाँघ कर पार करना बताते हैं।
किन्तु, भन्ते, यह ‘आर्य विमोक्ष’ क्या है?”
“आनन्द, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—
—वे सब स्व-धारणा (“सक्काय”) हैं। किन्तु, यह अमृत है—यही, अनासक्त होने पर चित्त का विमोक्ष।’
इस तरह, आनन्द, मैंने अविचलता में पहुँचाने वाला साधनामार्ग बता दिया है। शून्य आयाम में पहुँचाने वाला साधनामार्ग बता दिया है। न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम में पहुँचाने वाला साधनामार्ग बता दिया है। (अगला-अगला) आधार ले-लेकर बाढ़ को लाँघकर पार करना बता दिया है। आर्य विमोक्ष बता दिया है।
जो शास्ता को करना चाहिए—अपने शिष्यों का कल्याण चाहते हुए, उन पर अनुकंपा करते हुए—वह मैंने तुम्हारे लिए कर दिया। देखों, आनन्द, वहाँ पेड़ों के तल हैं, वहाँ ख़ाली जगहें हैं। ध्यान करों, आनन्द, लापरवाह मत बनो। फिर पश्चाताप मत करना। यह हमारा तुम्हें संदेश है।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
आनेञ्ज या “अविचलता”—चित्त की इस विशिष्ट अवस्था के विषय में विस्तृत जानकारी के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎
६६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा कुरूसु विहरति कम्मासधम्मं नाम कुरूनं निगमो। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘अनिच्चा, भिक्खवे, कामा तुच्छा मुसा मोसधम्मा। मायाकतमे तं, भिक्खवे, बाललापनं। ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा, या च सम्परायिका कामसञ्ञा – उभयमेतं मारधेय्यं, मारस्सेस मारस्सेव (क॰) विसयो, मारस्सेस निवापो, मारस्सेस गोचरो। एत्थेते पापका अकुसला मानसा अभिज्झापि ब्यापादापि सारम्भापि संवत्तन्ति। तेव अरियसावकस्स इधमनुसिक्खतो अन्तरायाय सम्भवन्ति। तत्र, भिक्खवे, अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा, या च सम्परायिका कामसञ्ञा – उभयमेतं मारधेय्यं, मारस्सेस विसयो, मारस्सेस निवापो, मारस्सेस गोचरो। एत्थेते पापका अकुसला मानसा अभिज्झापि ब्यापादापि सारम्भापि संवत्तन्ति, तेव अरियसावकस्स इधमनुसिक्खतो अन्तरायाय सम्भवन्ति। यंनूनाहं विपुलेन महग्गतेन चेतसा विहरेय्यं अभिभुय्य लोकं अधिट्ठाय मनसा। विपुलेन हि मे महग्गतेन चेतसा विहरतो अभिभुय्य लोकं अधिट्ठाय मनसा ये पापका अकुसला मानसा अभिज्झापि ब्यापादापि सारम्भापि ते न भविस्सन्ति। तेसं पहाना अपरित्तञ्च मे चित्तं भविस्सति अप्पमाणं सुभावित’न्ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा आनेञ्जं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स आनेञ्जूपगं। अयं, भिक्खवे, पठमा आनेञ्जसप्पाया पटिपदा अक्खायति’’।
६७. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा , या च सम्परायिका कामसञ्ञा; यं किञ्चि रूपं (सब्बं रूपं) ( ) नत्थि सी॰ पी॰ पोत्थकेसु चत्तारि च महाभूतानि, चतुन्नञ्च महाभूतानं उपादायरूप’न्ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा आनेञ्जं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स आनेञ्जूपगं। अयं, भिक्खवे, दुतिया आनेञ्जसप्पाया पटिपदा अक्खायति।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा, या च सम्परायिका कामसञ्ञा; ये च दिट्ठधम्मिका रूपा, ये च सम्परायिका रूपा; या च दिट्ठधम्मिका रूपसञ्ञा, या च सम्परायिका रूपसञ्ञा – उभयमेतं अनिच्चं। यदनिच्चं तं नालं अभिनन्दितुं, नालं अभिवदितुं, नालं अज्झोसितु’न्ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा आनेञ्जं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स आनेञ्जूपगं। अयं, भिक्खवे, ततिया आनेञ्जसप्पाया पटिपदा अक्खायति।
६८. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा, या च सम्परायिका कामसञ्ञा; ये च दिट्ठधम्मिका रूपा, ये च सम्परायिका रूपा; या च दिट्ठधम्मिका रूपसञ्ञा, या च सम्परायिका रूपसञ्ञा; या च आनेञ्जसञ्ञा – सब्बा सञ्ञा। यत्थेता अपरिसेसा निरुज्झन्ति एतं सन्तं एतं पणीतं – यदिदं आकिञ्चञ्ञायतन’न्ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा आकिञ्चञ्ञायतनं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स आकिञ्चञ्ञायतनूपगं। अयं, भिक्खवे, पठमा आकिञ्चञ्ञायतनसप्पाया पटिपदा अक्खायति।
६९. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको अरञ्ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्ञागारगतो वा इति पटिसञ्चिक्खति – ‘सुञ्ञमिदं अत्तेन वा अत्तनियेन वा’ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा आकिञ्चञ्ञायतनं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स आकिञ्चञ्ञायतनूपगं। अयं, भिक्खवे, दुतिया आकिञ्चञ्ञायतनसप्पाया पटिपदा अक्खायति।
७०. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘नाहं क्वचनि क्वचिनि (स्या॰ कं॰ सी॰ अट्ठ॰) कस्सचि किञ्चनतस्मिं किञ्चनतस्मि (?), न च मम क्वचनि किस्मिञ्चि किञ्चनं नत्थी’ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा आकिञ्चञ्ञायतनं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स आकिञ्चञ्ञायतनूपगं। अयं, भिक्खवे, ततिया आकिञ्चञ्ञायतनसप्पाया पटिपदा अक्खायति।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा, या च सम्परायिका कामसञ्ञा; ये च दिट्ठधम्मिका रूपा, ये च सम्परायिका रूपा; या च दिट्ठधम्मिका रूपसञ्ञा, या च सम्परायिका रूपसञ्ञा ; या च आनेञ्जसञ्ञा, या च आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञा – सब्बा सञ्ञा। यत्थेता अपरिसेसा निरुज्झन्ति एतं सन्तं एतं पणीतं – यदिदं नेवसञ्ञानासञ्ञायतन’न्ति। तस्स एवंपटिपन्नस्स तब्बहुलविहारिनो आयतने चित्तं पसीदति। सम्पसादे सति एतरहि वा नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं समापज्जति पञ्ञाय वा अधिमुच्चति कायस्स भेदा परं मरणा। ठानमेतं विज्जति यं तंसंवत्तनिकं विञ्ञाणं अस्स नेवसञ्ञानासञ्ञायतनूपगं। अयं, भिक्खवे, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसप्पाया पटिपदा अक्खायती’’ति।
७१. एवं वुत्ते, आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘इध, भन्ते, भिक्खु एवं पटिपन्नो होति – ‘नो चस्स, नो च मे सिया; न भविस्सति, न मे भविस्सति; यदत्थि यं, भूतं – तं पजहामी’ति। एवं उपेक्खं पटिलभति। परिनिब्बायेय्य नु खो सो, भन्ते, भिक्खु न वा परिनिब्बायेय्या’’ति? ‘‘अपेत्थेकच्चो, आनन्द, भिक्खु परिनिब्बायेय्य, अपेत्थेकच्चो भिक्खु न परिनिब्बायेय्या’’ति। ‘‘को नु खो, भन्ते, हेतु को पच्चयो येनपेत्थेकच्चो भिक्खु परिनिब्बायेय्य, अपेत्थेकच्चो भिक्खु न परिनिब्बायेय्या’’ति? ‘‘इधानन्द, भिक्खु एवं पटिपन्नो होति – ‘नो चस्स, नो च मे सिया; न भविस्सति, न मे भविस्सति; यदत्थि, यं भूतं – तं पजहामी’ति। एवं उपेक्खं पटिलभति। सो तं उपेक्खं अभिनन्दति, अभिवदति, अज्झोसाय तिट्ठति। तस्स तं उपेक्खं अभिनन्दतो अभिवदतो अज्झोसाय तिट्ठतो तन्निस्सितं होति विञ्ञाणं तदुपादानं। सउपादानो, आनन्द, भिक्खु न परिनिब्बायती’’ति। ‘‘कहं पन सो, भन्ते, भिक्खु उपादियमानो उपादियती’’ति? ‘‘नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं, आनन्दा’’ति। ‘‘उपादानसेट्ठं किर सो, भन्ते, भिक्खु उपादियमानो उपादियती’’ति? ‘‘उपादानसेट्ठञ्हि सो, आनन्द, भिक्खु उपादियमानो उपादियति। उपादानसेट्ठञ्हेतं, आनन्द, यदिदं – नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं’’।
७२. ‘‘इधानन्द, भिक्खु एवं पटिपन्नो होति – ‘नो चस्स, नो च मे सिया; न भविस्सति, न मे भविस्सति; यदत्थि, यं भूतं – तं पजहामी’ति। एवं उपेक्खं पटिलभति। सो तं उपेक्खं नाभिनन्दति, नाभिवदति, न अज्झोसाय तिट्ठति। तस्स तं उपेक्खं अनभिनन्दतो अनभिवदतो अनज्झोसाय तिट्ठतो न तन्निस्सितं होति विञ्ञाणं न तदुपादानं। अनुपादानो, आनन्द, भिक्खु परिनिब्बायती’’ति।
७३. ‘‘अच्छरियं, भन्ते, अब्भुतं, भन्ते! निस्साय निस्साय किर नो, भन्ते, भगवता ओघस्स नित्थरणा अक्खाता। कतमो पन, भन्ते, अरियो विमोक्खो’’ति? ‘‘इधानन्द, भिक्खु अरियसावको इति पटिसञ्चिक्खति – ‘ये च दिट्ठधम्मिका कामा, ये च सम्परायिका कामा; या च दिट्ठधम्मिका कामसञ्ञा, या च सम्परायिका कामसञ्ञा; ये च दिट्ठधम्मिका रूपा, ये च सम्परायिका रूपा; या च दिट्ठधम्मिका रूपसञ्ञा, या च सम्परायिका रूपसञ्ञा; या च आनेञ्जसञ्ञा, या च आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञा , या च नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञा – एस सक्कायो यावता सक्कायो। एतं अमतं यदिदं अनुपादा चित्तस्स विमोक्खो। इति, खो, आनन्द, देसिता मया आनेञ्जसप्पाया पटिपदा, देसिता आकिञ्चञ्ञायतनसप्पाया पटिपदा, देसिता नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसप्पाया पटिपदा, देसिता निस्साय निस्साय ओघस्स नित्थरणा, देसितो अरियो विमोक्खो। यं खो, आनन्द, सत्थारा करणीयं सावकानं हितेसिना अनुकम्पकेन अनुकम्पं उपादाय, कतं वो तं मया। एतानि, आनन्द, रुक्खमूलानि, एतानि सुञ्ञागारानि। झायथानन्द, मा पमादत्थ, मा पच्छा विप्पटिसारिनो अहुवत्थ। अयं वो अम्हाकं अनुसासनी’’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा आनन्दो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।
आनेञ्जसप्पायसुत्तं निट्ठितं छट्ठं।