
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में मिगारमाता के विहार 1 पूर्वाराम में विहार कर रहे थे। तब गणक मोग्गल्लान ब्राह्मण भगवान के पास गया। जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप करने पर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर गणक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने भगवान से कहा—
“श्रीमान गोतम, जैसे इस मिगारमाता के महल में अनुक्रम से शिक्षा, अनुक्रम से क्रिया, अनुक्रम से साधना हुई दिखती है — बस यही, निचले सीढ़ी तक। ब्राह्मणों में भी, श्रीमान गोतम, अनुक्रम से शिक्षा, अनुक्रम से क्रिया, अनुक्रम से साधना दिखती है — बस यही, (वेद) अध्ययन की। तीरंदाजों में भी, श्रीमान गोतम, अनुक्रम से शिक्षा, अनुक्रम से क्रिया, अनुक्रम से साधना दिखती है — बस यही, तीरंदाजी की।
और, श्रीमान गोतम, हम लेखापाल (“गणक” =मुनीम) के लेखापाली जीवन में भी अनुक्रम से शिक्षा, अनुक्रम से क्रिया, अनुक्रम से साधना दिखती है — बस यही, गणित की। जब, श्रीमान गोतम, हमें कोई शिष्य मिलता है, तो पहले हम उसे गिनना सिखाते हैं — ‘एक एक है। दो दो हैं। तीन तीन हैं। चार चार हैं। पाँच पाँच हैं। छह छह हैं। सात सात हैं। आठ आठ हैं। नौ नौ हैं। दस दस हैं।’ इस तरह, श्रीमान गोतम, हम उसे सौ तक भी गिनने लगाते हैं।
उसी तरह, श्रीमान गोतम, क्या (आपके) इस धर्म-विनय में भी अनुक्रम से शिक्षा, अनुक्रम से क्रिया, अनुक्रम से साधना बतायी जा सकती है?”
“हाँ, ब्राह्मण। इस धर्म-विनय में भी अनुक्रम से शिक्षा, अनुक्रम से क्रिया, अनुक्रम से साधना बतायी जा सकती है। 2
जैसे, भद्दालि, कोई निपुण घोड़े का प्रशिक्षक हो, जो किसी अच्छे नस्ल के घोड़े को प्राप्त करे, तो पहले उसे लगाम पहनने की आदत डालता है। क्योंकि उसने पहले कभी ऐसा नहीं किया होता।
उसी तरह, ब्राह्मण, जब तथागत किसी दमनशील पुरुष को प्राप्त करे, तो पहले उसे इस प्रकार नियम बताते हैं — ‘चलो, भिक्षु, शीलवान हों। पातिमोक्ष के अनुसार संयम में प्रतिष्ठित होकर विहार करो, आर्य आचरण और जीवनशैली से युक्त होकर, अल्प पाप में भी दोष देखते हुए, (धर्म-विनय के) शिक्षापदों को सीखकर धारण करो।’
और जब, ब्राह्मण, वह भिक्षु शीलवान बनता है, पातिमोक्ष के अनुसार संयम में प्रतिष्ठित होकर विहार करता है, आर्य आचरण और जीवनशैली से युक्त होकर, अल्प पाप में भी दोष देखते हुए, शिक्षापदों को सीखकर धारण करता है, तब तथागत उसे आगे नियम बताते हैं — ‘चलो, भिक्षु, अपने इंद्रिय-द्वारों की रक्षा करो।
और जब, ब्राह्मण, वह भिक्षु अपने इंद्रिय-द्वारों की रक्षा करता है, तब तथागत उसे आगे नियम बताते हैं — ‘चलो, भिक्षु, अपने भोजन की मात्रा जानो। उचित चिंतन कर आहार का सेवन करो — न मज़े के लिए, न मदहोशी के लिए, न सुडौलता के लिए, न ही सौंदर्य के लिए; बल्कि काया को मात्र टिकाने के लिए। उसकी (भूख) पीड़ाएँ समाप्त करने के लिए; ब्रह्मचर्य के लिए। (सोचते हुए,) ‘पुरानी पीड़ा ख़त्म करूँगा! (अधिक खाकर) नई पीड़ा नहीं उत्पन्न करूँगा! मेरी जीवनयात्रा निर्दोष रहेगी, और राहत से रहूँगा!’’
और जब, ब्राह्मण, वह भिक्षु भोजन की मात्रा जानता है, तब तथागत उसे आगे नियम बताते हैं — ‘चलो, भिक्षु, जागरण के प्रति समर्पित होकर विहार करो।
और जब, ब्राह्मण, वह भिक्षु जागरण के प्रति समर्पित होता है, तब तथागत उसे आगे नियम बताते हैं — ‘चलो, भिक्षु, स्मरणशीलता और सचेतता से संपन्न रहो। आगे बढ़ते और लौट आते सचेत रहो। नज़र टिकाते और नज़र हटाते सचेत रहो। (अंग) सिकोड़ते और पसारते हुए सचेत रहो। संघाटी, पात्र और चीवर धारण करते हुए सचेत रहो। खाते, पीते, चबाते, स्वाद लेते हुए सचेत रहो। पेशाब और शौच करते हुए सचेत रहो। चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, मौन होते हुए सचेत रहो।’
और जब, ब्राह्मण, वह भिक्षु जागरण के प्रति समर्पित होता है, तब तथागत उसे आगे नियम बताते हैं — ‘चलो, भिक्षु, एकांतवास ढूँढो — जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर।’
तब वह एकांतवास ढूँढता है — जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर। भिक्षाटन से लौटकर भोजन के पश्चात, वह पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठता है और स्मरणशीलता आगे लाता है।
ये पाँच अवरोध (“पञ्चनीवरण”), जो मानस के उपक्लेश (=मैल) हैं, जो प्रज्ञा को दुर्बल बनाते हैं, वह उनको त्याग कर कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल-स्वभाव से निर्लिप्त, सोच एवं विचार के साथ निर्लिप्तता से उपजे प्रफुल्लता और सुखपूर्ण प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर रहता है।
तब आगे, भिक्षु सोच एवं विचार के रुक जाने पर, भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर, बिना-सोच, बिना-विचार, समाधि से उपजे प्रफुल्लता और सुखपूर्ण द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर रहता है।
तब आगे, भिक्षु प्रफुल्लता से विरक्त हो, स्मरणशील एवं सचेतता के साथ-साथ तटस्थता धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘तटस्थ, स्मरणशील, सुखविहारी’ कहते हैं, वह ऐसे तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर रहता है।
तब आगे, भिक्षु सुख एवं दर्द दोनों हटाकर, खुशी एवं परेशानी पूर्व ही विलुप्त होने पर, तटस्थता और स्मरणशीलता की परिशुद्धता के साथ, अब न-सुख-न-दर्द पूर्ण चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर रहता है।
इस प्रकार, ब्राह्मण, जो ऐसे भिक्षु हैं, जो अभी सीख रहे हैं, अब तक मंजिल प्राप्त न किए, अनुत्तर योगबन्धन से सुरक्षा पाने के ध्येय से विहार कर रहे हैं, उन्हें मैं इस प्रकार अनुशासित करता हूँ। किन्तु, जो अरहंत क्षिणास्रव भिक्षु हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हैं, कर्तव्य समाप्त किया हैं, बोझ को नीचे रखा हैं, परम-ध्येय प्राप्त किया हैं, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हैं, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हुए हैं, उनके लिए ये बताएँ धर्म वर्तमान जीवन में सुखविहार लाती है, और स्मृति और सचेतता भी।”
जब ऐसा कहा गया, तब गणक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “क्या श्रीमान गोतम के श्रावक श्रीमान गोतम से इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होकर, सभी बिना चुके, बिलकुल निश्चित रूप से निर्वाण पाने में यशस्वी होते हैं, अथवा उनमें कोई अयशस्वी भी होते हैं?”
“ब्राह्मण, मेरे श्रावक मुझसे इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होकर, बिलकुल निश्चित रूप से निर्वाण पाने में यशस्वी होते हैं, किन्तु उनमें कोई अयशस्वी भी होते हैं।”
“क्या कारण, क्या परिस्थिति है, श्रीमान गोतम? कि जब निर्वाण उपस्थित है, निर्वाण ले जाने वाला मार्ग उपस्थित है, बढ़ाने के लिए श्रीमान गोतम उपस्थित है, तब भी श्रीमान गोतम के श्रावक श्रीमान गोतम से इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होकर, बिलकुल निश्चित रूप से निर्वाण पाने में यशस्वी होते हैं, किन्तु उनमें कोई अयशस्वी भी होते हैं?”
“ठीक है, ब्राह्मण। मैं इस पर तुमसे प्रतिप्रश्न करता हूँ। तुम्हें जैसा लगे, वैसा उत्तर दो। क्या लगता है, ब्राह्मण? क्या तुम राजगृह जाने वाले मार्ग में कुशल हो?”
“हाँ, श्रीमान। मैं राजगृह जाने वाले मार्ग में कुशल हूँ।”
“क्या लगता है, ब्राह्मण? कोई पुरुष आता है, राजगृह जाने की कामना से। वह तुम्हारे पास आकर ऐसा कहता है, ‘गुरुजी, मुझे राजगृह जाने की इच्छा है। कृपा कर मुझे राजगृह का मार्ग दिखाएँ।’ तब तुम कहते हो, ‘ओ भले पुरुष, यह मार्ग राजगृह जाता है। इस पर एक मुहूर्त चलते जाओ। एक मुहूर्त चलते जाने पर अमुक नाम का गाँव दिखेगा। तब, आगे एक मुहूर्त बढ़ते जाओ। तब अमुक नाम का नगर दिखेगा। तब, आगे एक मुहूर्त बढ़ते जाओ। तब तुम्हें राजगृह के रमणीय उद्यान, रमणीय उपवन, रमणीय मैदान, रमणीय कमल के तालाब दिखेंगे।’ तुमसे इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होने पर भी वह पुरुष किसी गलत मार्ग पर मुड़ जाए, और गलत मार्ग पर चलते हुए पश्चिम दिशा में चला जाए।
तब दूसरा पुरुष आता है, राजगृह जाने की कामना से। वह तुम्हारे पास आकर ऐसा कहता है, ‘गुरुजी, मुझे राजगृह जाने की इच्छा है। कृपा कर मुझे राजगृह का मार्ग दिखाएँ।’ तब तुम कहते हो, ‘ओ भले पुरुष, यह मार्ग राजगृह जाता है। इस पर एक मुहूर्त चलते जाओ। एक मुहूर्त चलते जाने पर अमुक नाम का गाँव दिखेगा। तब, आगे एक मुहूर्त बढ़ते जाओ। तब अमुक नाम का नगर दिखेगा। तब, आगे एक मुहूर्त बढ़ते जाओ। तब तुम्हें राजगृह के रमणीय उद्यान, रमणीय उपवन, रमणीय मैदान, रमणीय कमल के तालाब दिखेंगे।’ तुमसे इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होने पर, वह दूसरा पुरुष राजगृह में सुखरूप चला जाए।
तब क्या कारण, क्या परिस्थिति है, ब्राह्मण? कि जब राजगृह उपस्थित है, राजगृह जाने का मार्ग उपस्थित है, बढ़ाने के लिए तुम उपस्थित हो। किन्तु, तब भी तुमसे इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होने पर भी एक पुरुष गलत मार्ग से पश्चिम दिशा में चला जाता है, तो कोई सुखरूप राजगृह चला जाता है?”
“तो मैं कर ही क्या सकता हूँ, श्रीमान गोतम? मैं तो केवल मार्गदर्शक हूँ।”
“उसी तरह, ब्राह्मण, जब निर्वाण उपस्थित है, निर्वाण ले जाने वाला मार्ग उपस्थित है, बढ़ाने के लिए मैं उपस्थित हूँ, तब भी मेरे श्रावक मुझसे इस प्रकार निर्देशित होकर, इस प्रकार अनुशासित होकर, बिलकुल निश्चित रूप से निर्वाण पाने में यशस्वी होते हैं, किन्तु उनमें कोई अयशस्वी भी होते हैं। तो मैं कर ही क्या सकता हूँ, ब्राह्मण? तथागत तो केवल मार्गदर्शक हैं।”
जब ऐसा कहा गया, तब गणक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, ऐसे श्रद्धाहीन व्यक्ति होते हैं, जो श्रद्धा से नहीं, बल्कि जीविका कमाने के लिए घर से बेघर होकर प्रवज्जित होते हैं। वे शठ (ठग), मायावी (धोखेबाज), और गुप्त होते हैं। बेचैन, घमंडी, चंचल, मुखर होते हैं, और बिखरी हुई बातें करते हैं। वे इंद्रियों की रक्षा नहीं करते, भोजन की मात्रा नहीं जानते, जागरण के प्रति संकल्पबद्ध नहीं होते। वे श्रामण्य जीवन की चिंता नहीं करते, शिक्षा का तीव्र आदर नहीं करते। वे भोगी और शिथिल होते हैं, पतन में सबसे आगे, एकांतवास को नजरंदाज करने वाले, आलसी और ऊर्जाहीन होते हैं। वे भुलक्कड़, अचेत, बिना एकाग्रता के, भटकता हुआ चित्त, दुष्प्रज्ञ या मंदबुद्धि होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के साथ श्रीमान गोतम संवास नहीं करते।
किन्तु, श्रीमान गोतम, ऐसे भी कुलपुत्र हैं जो श्रद्धा से घर से बेघर होकर प्रवज्जित हुए हैं। वे शठ, मायावी, और गुप्त नहीं हैं। बेचैन, घमंडी, चंचल, मुखर नहीं हैं, और बिखरी हुई बातें नहीं करते हैं। वे इंद्रियों की रक्षा करते हैं, भोजन की मात्रा जानते हैं, और जागरण के प्रति संकल्पबद्ध हैं। वे श्रामण्य जीवन की चिंता करते हैं, और शिक्षा का तीव्र आदर करते हैं। वे न भोगी, न ही शिथिल हैं, एकांतवास में सबसे आगे, जागृत ऊर्जावान हैं। वे उपस्थित स्मृतिवान, सचेत, समाहित, एकाग्र चित्त, प्रज्ञावान और तेजबुद्धि वाले हैं। ऐसे व्यक्तियों के साथ श्रीमान गोतम संवास करते हैं।
जैसे, श्रीमान गोतम, किसी भी प्रकार के सुगंधित मूल में जटामासी (‘कालानुसारि’) को अग्र कहा जाता है। जैसे, किसी भी प्रकार के सुगंधित सारकाष्ठ में लाल चन्दन को अग्र कहा जाता है। जैसे, किसी भी प्रकार के सुगंधित पुष्प में चमेली को अग्र कहा जाता है। उसी प्रकार, सभी समकालीन धर्मों में श्रीमान गोतम का निर्देश परम है।
अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए — उसी तरह श्रीमान गोतम ने धर्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। मैं श्रीमान गोतम की शरण जाता हूँ! धर्म की और संघ की भी! श्रीमान गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
जेतवन के पश्चात् श्रावस्ती का दूसरा सबसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित विहार पूर्वाराम था, जिसे “मिगारमातुपसाद”, अर्थात मिगारमाता का महल, भी कहा जाता था। यह विहार जेतवन के मुख्य द्वार से पूर्व दिशा में, लगभग २ किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। शांत वातावरण में स्थित यह स्थान बुद्ध के निवास और उपदेश के लिए उपयुक्त था, जहाँ उन्होंने कई बार वर्षावास भी किया।
इस विहार का निर्माण महाउपासिका विशाखा ने कराया था, जो बुद्धकाल की महानतम दायकों में मानी जाती हैं। विशाखा को “मिगार की माँ” के नाम से जाना जाता है। यह नामकरण साधारण नहीं था—मिगार, जो उसका ससुर था, उसे विशाखा ने धर्म में प्रवृत्त किया और उसे उपासक बनाया। इस धार्मिक उत्थान के कारण, यद्यपि वह सांसारिक दृष्टि से उसकी बहू थी, धर्म की दृष्टि से वह उसकी ‘माँ’ बन गई। ↩︎
भगवान का धर्म शिष्यों को क्रमबद्ध रूप से शिक्षित करता है; इस विषय को ठीक से समझने के लिए हमारी मार्गदर्शिका का यह लेख पढ़ें: 👉 🪜 भिक्षु का क्रमबद्ध प्रशिक्षण ⋙ ↩︎
७४. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति पुब्बारामे मिगारमातुपासादे। अथ खो गणकमोग्गल्लानो गणकमोग्गलानो (क॰) ब्राह्मणो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो गणकमोग्गल्लानो ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच –
‘‘सेय्यथापि, भो गोतम, इमस्स मिगारमातुपासादस्स दिस्सति अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा यदिदं – याव पच्छिमसोपानकळेवराः इमेसम्पि हि, भो गोतम, ब्राह्मणानं दिस्सति अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा यदिदं – अज्झेनेः इमेसम्पि हि, भो गोतम, इस्सासानं दिस्सति अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा यदिदं – इस्सत्थे इस्सत्ते (क॰)। अम्हाकम्पि हि, भो गोतम, गणकानं गणनाजीवानं दिस्सति अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा यदिदं – सङ्खाने। मयञ्हि, भो गोतम, अन्तेवासिं लभित्वा पठमं एवं गणापेम – ‘एकं एककं, द्वे दुका, तीणि तिका, चत्तारि चतुक्का, पञ्च पञ्चका, छ छक्का, सत्त सत्तका, अट्ठ अट्ठका, नव नवका, दस दसका’ति; सतम्पि मयं, भो गोतम, गणापेम, भिय्योपि गणापेम। सक्का नु खो, भो गोतम, इमस्मिम्पि धम्मविनये एवमेव अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा पञ्ञपेतु’’न्ति?
७५. ‘‘सक्का , ब्राह्मण, इमस्मिम्पि धम्मविनये अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा पञ्ञपेतुं। सेय्यथापि, ब्राह्मण, दक्खो अस्सदम्मको भद्दं अस्साजानीयं लभित्वा पठमेनेव मुखाधाने कारणं कारेति, अथ उत्तरिं कारणं कारेति; एवमेव खो, ब्राह्मण, तथागतो पुरिसदम्मं लभित्वा पठमं एवं विनेति – ‘एहि त्वं, भिक्खु, सीलवा होहि, पातिमोक्खसंवरसंवुतो विहराहि आचारगोचरसम्पन्नो अणुमत्तेसु वज्जेसु भयदस्सावी, समादाय सिक्खस्सु सिक्खापदेसू’’’ति।
‘‘यतो खो, ब्राह्मण, भिक्खु सीलवा होति, पातिमोक्खसंवरसंवुतो विहरति आचारगोचरसम्पन्नो अणुमत्तेसु वज्जेसु भयदस्सावी, समादाय सिक्खति सिक्खापदेसु, तमेनं तथागतो उत्तरिं विनेति – ‘एहि त्वं, भिक्खु, इन्द्रियेसु गुत्तद्वारो होहि, चक्खुना रूपं दिस्वा मा निमित्तग्गाही होहि मानुब्यञ्जनग्गाही। यत्वाधिकरणमेनं चक्खुन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं तस्स संवराय पटिपज्जाहि; रक्खाहि चक्खुन्द्रियं, चक्खुन्द्रिये संवरं आपज्जाहि। सोतेन सद्दं सुत्वा…पे॰… घानेन गन्धं घायित्वा…पे॰… जिव्हाय रसं सायित्वा…पे॰… कायेन फोट्ठब्बं फुसित्वा…पे॰… मनसा धम्मं विञ्ञाय मा निमित्तग्गाही होहि मानुब्यञ्जनग्गाही। यत्वाधिकरणमेनं मनिन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं तस्स संवराय पटिपज्जाहि; रक्खाहि मनिन्द्रियं, मनिन्द्रिये संवरं आपज्जाही’’’ति।
‘‘यतो खो, ब्राह्मण, भिक्खु इन्द्रियेसु गुत्तद्वारो होति, तमेनं तथागतो उत्तरिं विनेति – ‘एहि त्वं, भिक्खु, भोजने मत्तञ्ञू होहि। पटिसङ्खा योनिसो आहारं आहारेय्यासि – नेव दवाय न मदाय न मण्डनाय न विभूसनाय, यावदेव इमस्स कायस्स ठितिया यापनाय विहिंसूपरतिया ब्रह्मचरियानुग्गहाय – इति पुराणञ्च वेदनं पटिहङ्खामि, नवञ्च वेदनं न उप्पादेस्सामि, यात्रा च मे भविस्सति अनवज्जता च फासुविहारो चा’’’ति।
‘‘यतो खो, ब्राह्मण , भिक्खु भोजने मत्तञ्ञू होति, तमेनं तथागतो उत्तरिं विनेति – ‘एहि त्वं, भिक्खु, जागरियं अनुयुत्तो विहराहि, दिवसं चङ्कमेन निसज्जाय आवरणीयेहि धम्मेहि चित्तं परिसोधेहि, रत्तिया पठमं यामं चङ्कमेन निसज्जाय आवरणीयेहि धम्मेहि चित्तं परिसोधेहि, रत्तिया मज्झिमं यामं दक्खिणेन पस्सेन सीहसेय्यं कप्पेय्यासि पादे पादं अच्चाधाय सतो सम्पजानो उट्ठानसञ्ञं मनसिकरित्वा, रत्तिया पच्छिमं यामं पच्चुट्ठाय चङ्कमेन निसज्जाय आवरणीयेहि धम्मेहि चित्तं परिसोधेही’’’ति।
‘‘यतो खो, ब्राह्मण, भिक्खु जागरियं अनुयुत्तो होति, तमेनं तथागतो उत्तरिं विनेति – ‘एहि त्वं, भिक्खु, सतिसम्पजञ्ञेन समन्नागतो होहि, अभिक्कन्ते पटिक्कन्ते सम्पजानकारी , आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी, समिञ्जिते पसारिते सम्पजानकारी, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी, असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी , उच्चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी, गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी’’’ति।
‘‘यतो खो, ब्राह्मण, भिक्खु सतिसम्पजञ्ञेन समन्नागतो होति, तमेनं तथागतो उत्तरिं विनेति – ‘एहि त्वं, भिक्खु, विवित्तं सेनासनं भजाहि अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्ज’न्ति। सो विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनप्पत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। सो पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो निसीदति पल्लङ्कं आभुजित्वा, उजुं कायं पणिधाय, परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। सो अभिज्झं लोके पहाय विगताभिज्झेन चेतसा विहरति, अभिज्झाय चित्तं परिसोधेति; ब्यापादपदोसं पहाय अब्यापन्नचित्तो विहरति सब्बपाणभूतहितानुकम्पी, ब्यापादपदोसा चित्तं परिसोधेति; थिनमिद्धं थीनमिद्धं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) पहाय विगतथिनमिद्धो विहरति आलोकसञ्ञी सतो सम्पजानो, थिनमिद्धा चित्तं परिसोधेति; उद्धच्चकुक्कुच्चं पहाय अनुद्धतो विहरति अज्झत्तं वूपसन्तचित्तो, उद्धच्चकुक्कुच्चा चित्तं परिसोधेति; विचिकिच्छं पहाय तिण्णविचिकिच्छो विहरति अकथंकथी कुसलेसु धम्मेसु, विचिकिच्छाय चित्तं परिसोधेति।
७६. ‘‘सो इमे पञ्च नीवरणे पहाय चेतसो उपक्किलेसे पञ्ञाय दुब्बलीकरणे विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति। वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं…पे॰… दुतियं झानं उपसम्पज्ज विहरति। पीतिया च विरागा… ततियं झानं उपसम्पज्ज विहरति। सुखस्स च पहाना… चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति।
‘‘ये खो ते, ब्राह्मण, भिक्खू सेक्खा सेखा (सब्बत्थ) अपत्तमानसा अनुत्तरं योगक्खेमं पत्थयमाना विहरन्ति तेसु मे अयं एवरूपी अनुसासनी होति। ये पन ते भिक्खू अरहन्तो खीणासवा वुसितवन्तो कतकरणीया ओहितभारा अनुप्पत्तसदत्था परिक्खीणभवसंयोजना सम्मदञ्ञा विमुत्ता तेसं इमे धम्मा दिट्ठधम्मसुखविहाराय चेव संवत्तन्ति, सतिसम्पजञ्ञाय चा’’ति।
एवं वुत्ते, गणकमोग्गल्लानो ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘किं नु खो भोतो गोतमस्स सावका भोता गोतमेन एवं ओवदीयमाना एवं अनुसासीयमाना सब्बे अच्चन्तं निट्ठं निब्बानं आराधेन्ति उदाहु एकच्चे नाराधेन्ती’’ति? ‘‘अप्पेकच्चे खो, ब्राह्मण, मम सावका मया एवं ओवदीयमाना एवं अनुसासीयमाना अच्चन्तं निट्ठं निब्बानं आराधेन्ति, एकच्चे नाराधेन्ती’’ति।
‘‘को नु खो, भो गोतम, हेतु को पच्चयो यं तिट्ठतेव निब्बानं, तिट्ठति निब्बानगामी मग्गो, तिट्ठति भवं गोतमो समादपेता; अथ च पन भोतो गोतमस्स सावका भोता गोतमेन एवं ओवदीयमाना एवं अनुसासीयमाना अप्पेकच्चे अच्चन्तं निट्ठं निब्बानं आराधेन्ति, एकच्चे नाराधेन्ती’’ति?
७७. ‘‘तेन हि, ब्राह्मण, तंयेवेत्थ पटिपुच्छिस्सामि। यथा ते खमेय्य तथा नं ब्याकरेय्यासि। तं किं मञ्ञसि , ब्राह्मण, कुसलो त्वं राजगहगामिस्स मग्गस्सा’’ति? ‘‘एवं, भो, कुसलो अहं राजगहगामिस्स मग्गस्सा’’ति। ‘‘तं किं मञ्ञसि, ब्राह्मण, इध पुरिसो आगच्छेय्य राजगहं गन्तुकामो। सो तं उपसङ्कमित्वा एवं वदेय्य – ‘इच्छामहं, भन्ते, राजगहं गन्तुं; तस्स मे राजगहस्स मग्गं उपदिसा’ति। तमेनं त्वं एवं वदेय्यासि – ‘एहम्भो एवं भो (सी॰ पी॰) पुरिस, अयं मग्गो राजगहं गच्छति। तेन मुहुत्तं गच्छ, तेन मुहुत्तं गन्त्वा दक्खिस्ससि अमुकं नाम गामं, तेन मुहुत्तं गच्छ, तेन मुहुत्तं गन्त्वा दक्खिस्ससि अमुकं नाम निगमं; तेन मुहुत्तं गच्छ, तेन मुहुत्तं गन्त्वा दक्खिस्ससि राजगहस्स आरामरामणेय्यकं वनरामणेय्यकं भूमिरामणेय्यकं पोक्खरणीरामणेय्यक’न्ति। सो तया एवं ओवदीयमानो एवं अनुसासीयमानो उम्मग्गं गहेत्वा पच्छामुखो गच्छेय्य। अथ दुतियो पुरिसो आगच्छेय्य राजगहं गन्तुकामो। सो तं उपसङ्कमित्वा एवं वदेय्य – ‘इच्छामहं, भन्ते, राजगहं गन्तुं; तस्स मे राजगहस्स मग्गं उपदिसा’ति। तमेनं त्वं एवं वदेय्यासि – ‘एहम्भो पुरिस, अयं मग्गो राजगहं गच्छति। तेन मुहुत्तं गच्छ, तेन मुहुत्तं गन्त्वा दक्खिस्ससि अमुकं नाम गामं; तेन मुहुत्तं गच्छ, तेन मुहुत्तं गन्त्वा दक्खिस्ससि अमुकं नाम निगमं; तेन मुहुत्तं गच्छ, तेन मुहुत्तं गन्त्वा दक्खिस्ससि राजगहस्स आरामरामणेय्यकं वनरामणेय्यकं भूमिरामणेय्यकं पोक्खरणीरामणेय्यक’न्ति। सो तया एवं ओवदीयमानो एवं अनुसासीयमानो सोत्थिना राजगहं गच्छेय्य। को नु खो, ब्राह्मण, हेतु को पच्चयो यं तिट्ठतेव राजगहं , तिट्ठति राजगहगामी मग्गो, तिट्ठसि त्वं समादपेता; अथ च पन तया एवं ओवदीयमानो एवं अनुसासीयमानो एको पुरिसो उम्मग्गं गहेत्वा पच्छामुखो गच्छेय्य, एको सोत्थिना राजगहं गच्छेय्या’’ति? ‘‘एत्थ क्याहं, भो गोतम, करोमि? मग्गक्खायीहं, भो गोतमा’’ति।
‘‘एवमेव खो, ब्राह्मण, तिट्ठतेव निब्बानं, तिट्ठति निब्बानगामी मग्गो, तिट्ठामहं समादपेता; अथ च पन मम सावका मया एवं ओवदीयमाना एवं अनुसासीयमाना अप्पेकच्चे अच्चन्तं निट्ठं निब्बानं आराधेन्ति, एकच्चे नाराधेन्ति। एत्थ क्याहं, ब्राह्मण, करोमि? मग्गक्खायीहं, ब्राह्मण, तथागतो’’ति।
७८. एवं वुत्ते, गणकमोग्गल्लानो ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘येमे, भो गोतम, पुग्गला अस्सद्धा जीविकत्था न सद्धा अगारस्मा अनगारियं पब्बजिता सठा मायाविनो केतबिनो केटुभिनो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) उद्धता उन्नळा चपला मुखरा विकिण्णवाचा इन्द्रियेसु अगुत्तद्वारा भोजने अमत्तञ्ञुनो जागरियं अननुयुत्ता सामञ्ञे अनपेक्खवन्तो सिक्खाय न तिब्बगारवा बाहुलिका बाहुल्लिका (स्या॰ कं॰) साथलिका ओक्कमने पुब्बङ्गमा पविवेके निक्खित्तधुरा कुसीता हीनवीरिया मुट्ठस्सतिनो असम्पजाना असमाहिता विब्भन्तचित्ता दुप्पञ्ञा एळमूगा, न तेहि भवं गोतमो सद्धिं संवसति’’।
‘‘ये पन ते कुलपुत्ता सद्धा अगारस्मा अनगारियं पब्बजिता असठा अमायाविनो अकेतबिनो अनुद्धता अनुन्नळा अचपला अमुखरा अविकिण्णवाचा इन्द्रियेसु गुत्तद्वारा भोजने मत्तञ्ञुनो जागरियं अनुयुत्ता सामञ्ञे अपेक्खवन्तो सिक्खाय तिब्बगारवा नबाहुलिका नसाथलिका ओक्कमने निक्खित्तधुरा पविवेके पुब्बङ्गमा आरद्धवीरिया पहितत्ता उपट्ठितस्सतिनो सम्पजाना समाहिता एकग्गचित्ता पञ्ञवन्तो अनेळमूगा, तेहि भवं गोतमो सद्धिं संवसति।
‘‘सेय्यथापि , भो गोतम, ये केचि मूलगन्धा, कालानुसारि तेसं अग्गमक्खायति; ये केचि सारगन्धा, लोहितचन्दनं तेसं अग्गमक्खायति; ये केचि पुप्फगन्धा, वस्सिकं तेसं अग्गमक्खायति; एवमेव भोतो गोतमस्स ओवादो परमज्जधम्मेसु।
‘‘अभिक्कन्तं , भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम! सेय्यथापि, भो गोतम, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – ‘चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ती’ति; एवमेवं भोता गोतमेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो। एसाहं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च। उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति।
गणकमोग्गल्लानसुत्तं निट्ठितं सत्तमं।