✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

भगवान के बाद कौन?

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ २५ मिनट

सूत्र परिचय

यह सूत्र भगवान के परिनिर्वाण के कुछ ही समय बाद के भिक्षुसंघ की सोच की एक साफ़ तस्वीर सामने रखता है। एक तरफ़ इसमें भिक्षुसंघ और उस समय की राजनीतिक सत्ता के बीच का रिश्ता दिखता है। भिक्षु मंत्रियों से सम्मान के साथ पेश आते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें उन मंत्रियों को थोड़ा अनाड़ी बताने में कोई खास हिचक नहीं थी।

दूसरी तरफ़, यह भी साफ़ हो जाता है कि शुरुआती बौद्ध अभ्यास में कई ऐसी बातें शामिल नहीं थीं जो बाद की बौद्ध परम्पराओं में आम हो गईं। जैसे किसी तयशुदा वंश-परम्परा के प्रमुख (दलाई लामा), या ध्यान में एकाग्रता के लिए मानसिक क्लेशों को साधन की तरह इस्तेमाल करना।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय आयुष्मान आनन्द राजगृह के वेणुवन गिलहरियों के परिसर में विहार कर रहे थे। भगवान के परिनिर्वृत हुए अधिक समय नहीं हुआ था। उस समय मगध के राजा अजातशत्रु वेदेहीपुत्र, राजा पज्जोत की आशंका से, राजगृह की किलेबन्दी करवा रहा था। 1

तब, सुबह होने पर आयुष्मान आनन्द ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर राजगृह में भिक्षाटन के लिए प्रवेश किया। तब आयुष्मान आनन्द को लगा, “अभी राजगृह में भिक्षाटन करना बहुत जल्दी होगा। क्यों न मैं गोपक (=रक्षक) मोग्गल्लान ब्राह्मण की कार्यशाला में गोपक मोग्गल्लान के पास जाऊँ?”

तब, आयुष्मान आनन्द गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण की कार्यशाला में गोपक मोग्गल्लान के पास गए। गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने आयुष्मान आनन्द को दूर से आते हुए देखा। देखकर आयुष्मान आनन्द से कहा, “आईयें, श्रीमान आनन्द। स्वागत है श्रीमान आनन्द। बहुत समय के बाद श्रीमान आनन्द ने यहाँ आने का अवसर लिया। बैठिए, श्रीमान आनन्द, यहाँ आसन बिछा है।”

आयुष्मान आनन्द बिछे आसन पर बैठ गए। गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने अपना आसन नीचे बिछाया और एक ओर बैठ गया।

कोई एक भिक्षु?

एक ओर बैठकर गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “श्रीमान आनन्द, क्या ऐसा एक भी भिक्षु है, जो उन सब के सब गुणों से संपन्न हो, जिन गुणों से ‘श्रीमान गोतम अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ संपन्न थे?”

“नहीं, ब्राह्मण। ऐसा एक भी भिक्षु नहीं है, जो उन सब के सब गुणों से संपन्न हो, जिन गुणों से ‘भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ संपन्न थे। क्योंकि, ब्राह्मण, भगवान ने ही अनुत्पन्न मार्ग को उत्पन्न किया, अजन्में मार्ग को जन्म दिया, अघोषित मार्ग की घोषणा की, जो मार्ग के जानकार, मार्ग के विद्वान, मार्ग में निपुण हैं। और, अब श्रावक उस मार्ग पर चलकर साधना करते संपन्न होते हैं।”

तभी आयुष्मान आनन्द और गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण के साथ हो रही वार्तालाप के बीच खलल पड़ी। क्योंकि मगध देश के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण 2 राजगृह में कामकाज का पर्यवेक्षण करते हुए गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण की कार्यशाला में आयुष्मान आनन्द के पास आए। आकर आयुष्मान आनन्द से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप करने पर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठ कर मगध के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “अभी यहाँ बैठकर, श्रीमान आनन्द, क्या चर्चा कर रहे थे? कौन सी चर्चा अधूरी रह गई?”

“ब्राह्मण, गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने कहा, ‘क्या ऐसा एक भी भिक्षु है, जो उन सब के सब गुणों से संपन्न हो, जिन गुणों से ‘श्रीमान गोतम अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ संपन्न थे?’ जब ऐसा कहा गया, ब्राह्मण, तब मैंने गोपक मोग्गल्लान ब्राह्मण ने कहा, ‘नहीं, ब्राह्मण। ऐसा एक भी भिक्षु नहीं है, जो उन सब के सब गुणों से संपन्न हो, जिन गुणों से ‘भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ संपन्न थे। क्योंकि, ब्राह्मण, भगवान ने ही अनुत्पन्न मार्ग को उत्पन्न किया, अजन्में मार्ग को जन्म दिया, अघोषित मार्ग की घोषणा की, जो मार्ग के जानकार, मार्ग के विद्वान, मार्ग में निपुण हैं। और, अब श्रावक उस मार्ग पर चलकर साधना करते संपन्न होते हैं।’ अभी यहाँ बैठकर, ब्राह्मण, हम यही चर्चा कर रहे थे, जो चर्चा अधूरी रह गई।”

नियुक्त भिक्षु

(मगध देश के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण ने कहा:) “श्रीमान आनन्द, क्या किसी एक भिक्षु को श्रीमान गोतम ने नियुक्त किया हैं, (कहते हुए,) ‘मेरे गुजरने पर यह तुम्हारी प्रतिशरण (=पनाह) होगा’, जिसके साधना-मार्ग पर तुम चल सकते हो’?”

“नहीं, ब्राह्मण। ऐसे किसी एक भिक्षु को भगवान, जो जानते हैं, जो देखते हैं, जो अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, ने नियुक्त नहीं किया हैं, (कहते हुए,) ‘मेरे गुजरने पर यह तुम्हारी प्रतिशरण होगा’, जिसके साधना-मार्ग पर तुम चल सकते हो।” 3

“किन्तु, श्रीमान आनन्द, क्या किसी एक भिक्षु को संघ ने बहुत से वरिष्ठ भिक्षुओं की सम्मति से नियुक्त किया हैं, (कहते हुए,) ‘भगवान के गुजरने पर यह तुम्हारी प्रतिशरण होगा’, जिसके साधना-मार्ग पर तुम चल सकते हो’?”

“नहीं, ब्राह्मण। ऐसे किसी एक भिक्षु को संघ ने बहुत से वरिष्ठ भिक्षुओं की सम्मति से नियुक्त नहीं किया हैं, (कहते हुए,) ‘भगवान के गुजरने पर यह तुम्हारी प्रतिशरण होगा’, जिसके साधना-मार्ग पर तुम चल सकते हो।’”

“किन्तु, तब ऐसे किसी प्रतिशरण के अभाव में, श्रीमान आनन्द, आपके मिल-जुलकर रहने का क्या कारण है?”

“हमें प्रतिशरण का अभाव नहीं है, ब्राह्मण। हम प्रतिशरण के साथ है। धम्म हमारी प्रतिशरण है।” 4

“किन्तु, श्रीमान आनन्द, जब आपसे पूछा गया कि ‘क्या किसी एक भिक्षु को श्रीमान गोतम ने… या संघ ने… नियुक्त किया हैं, (कहते हुए,) ‘भगवान के गुजरने पर यह तुम्हारी प्रतिशरण होगा’… तब आप ‘नहीं…’ कहते हैं… किन्तु, ऐसे किसी प्रतिशरण के अभाव में आपके मिल-जुलकर रहने का कारण…’ पुछने पर आप ‘…धम्म हमारी प्रतिशरण है’, कहते हैं। तब, श्रीमान आनन्द, इस कही बात का अर्थ कैसे देखना चाहिए?”

“ब्राह्मण, भगवान, जो जानते हैं, जो देखते हैं, जो अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, ने भिक्षुओं के लिए (धम्म-विनय के) शिक्षापद बताएँ हैं, पातिमोक्ष का पठन किया है। 5 तब, उपोसथ के दिन हम जिस गाँव-क्षेत्र के निश्रय से विहार करते हैं, 6 वहाँ सब एक साथ इकट्ठा होते हैं। इकट्ठा होकर हम प्रवर्तन (=पातिमोक्ष पठन) करने वाले को आमंत्रित करते हैं। प्रवर्तन होते समय जिस भिक्षु को आपत्ति या उल्लंघन स्मरण होता है, उसे हम यथा-धम्मानुसार, यथा-निर्देशानुसार (विनय) कर्म करते हैं। ऐसा हमसे कोई श्रीमान नहीं कराता हैं, बल्कि धम्म कराता है।”

“श्रीमान गोतम, क्या कोई एक ऐसा भिक्षु है, जिसका आप सत्कार करते हो, सम्मान करते हो, मानते हो, पूजते हो, सत्कार और आदर देकर उसके उपनिश्रय से विहार करते हो?”

“नहीं, ब्राह्मण। ऐसा कोई एक भिक्षु नहीं है, जिसका हम सत्कार करते हो, सम्मान करते हो, मानते हो, पूजते हो, सत्कार और आदर देकर उसके उपनिश्रय से विहार करते हो।”

“किन्तु, श्रीमान आनन्द, जब आपसे पूछा गया कि ‘क्या किसी एक भिक्षु को श्रीमान गोतम ने… या संघ ने… नियुक्त किया हैं, (कहते हुए,) ‘भगवान के गुजरने पर यह तुम्हारी प्रतिशरण होगा’… तब आप ‘नहीं…’ कहते हैं… और पुछने पर कि क्या कोई एक ऐसा भिक्षु है, जिसका आप सत्कार… सम्मान… कहते हैं। तब आप ‘नहीं…’ कहते हैं… श्रीमान आनन्द, इस कही बात का अर्थ कैसे देखना चाहिए?”

दस आश्वासन धम्म

“ब्राह्मण, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, ने दस आश्वासन धम्म-गुण घोषित किए हैं। जिस किसी में ये धम्म-गुण विद्यमान हो, हम उसका सत्कार करते हैं, सम्मान करते हैं, मानते हैं, पूजते हैं, सत्कार और आदर देकर उसके उपनिश्रय से विहार करते हैं। कौन से दस?

(१) ब्राह्मण, कोई भिक्षु शीलवान होता है। वह पातिमोक्ष के अनुसार संयम में प्रतिष्ठित होकर, आर्य आचरण और जीवनशैली से युक्त होता है, (धम्म-विनय के) शिक्षापदों को सीखकर धारण करता है, अल्प पाप में भी दोष देखता है।

(२) वह बहुत धम्म सुनता है, सुना हुआ धारण करता है, सुना हुआ संचय करता है। ऐसा धम्म, जो प्रारंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, और अन्त में कल्याणकारी हो, ऐसे सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ को वह अर्थ और विवरण के साथ बार-बार सुनता है, याद रखता है, चर्चा करता है, संचित करता है, मन से जाँच-पड़ताल करता है, और गहराई से समझकर सम्यक-दृष्टि धारण करता है।

(३) वह चीवर, भिक्षान्न, आवास, और रोगावश्यक औषधि व भैषज्य में संतुष्ट होता है।

(४) वह चार ध्यान अवस्थाएँ, जो वर्तमान जीवन में ऊँचे चित्त का सुखपूर्वक विहार है, उसे जब चाहो, बिना परेशानी, बिना कठिनाई के प्राप्त करता है।

(५) वह विविध ऋद्धियाँ प्राप्त करता है—एक होकर अनेक बनता है, अनेक होकर एक बनता है। प्रकट होता है, विलुप्त होता है। दीवार, रक्षार्थ-दीवार और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चला जाता है, मानो आकाश में हो। जमीन पर गोते लगाता है, मानो जल में हो। जल-सतह पर बिना डूबे चलता है, मानो जमीन पर हो। पालथी मारकर आकाश में उड़ता है, मानो पक्षी हो। महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूता और मलता है। अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता है।

(६) वह विशुद्ध हो चुके अलौकिक दिव्यश्रोत-धातु से दोनों तरह की आवाज़ें सुनता है—चाहे दिव्य हो या मनुष्यों की हो, दूर की हो या पास की हो।

(७) वह अपना मानस फैलाकर पराए सत्वों का, अन्य लोगों का मानस जान लेता है। उसे रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘रागपूर्ण चित्त है।’ वीतराग चित्त पता चलता है कि ‘वीतराग चित्त है।’ द्वेषपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘द्वेषपूर्ण चित्त है।’ द्वेषविहीन चित्त पता चलता है कि ‘द्वेषविहीन चित्त है।’ मोहपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘मोहपूर्ण चित्त है।’ मोहविहीन चित्त पता चलता है कि ‘मोहविहीन चित्त है।’ संकुचित चित्त पता चलता है कि ‘संकुचित चित्त है।’ बिखरा चित्त पता चलता है कि ‘बिखरा चित्त है।’

उसे विस्तारित चित्त पता चलता है कि ‘विस्तारित चित्त है।’ अविस्तारित चित्त पता चलता है कि ‘अविस्तारित चित्त है।’ बेहतर चित्त पता चलता है कि ‘बेहतर चित्त है।’ सर्वोत्तर चित्त पता चलता है कि ‘सर्वोत्तर चित्त है।’ समाहित चित्त पता चलता है कि ‘समाहित चित्त है।’ असमाहित चित्त पता चलता है कि ‘असमाहित चित्त है।’ विमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘विमुक्त चित्त है।’ अविमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘अविमुक्त चित्त है।’

(८) वह विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण करता है—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त (=ब्रह्मांडिय सिकुड़न), कई कल्पों का लोक-विवर्त (=ब्रह्मांडिय विस्तार), कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है।

(९) वह विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।

(१०) वह आस्रवों के क्षय होने से अनास्रव होकर, अभी इसी जीवन में चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति प्राप्त कर, प्रत्यक्ष-ज्ञान (अभिज्ञा) का साक्षात्कार कर विहार करता है।

ये दस आश्वासन धम्म-गुण, ब्राह्मण, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, ने घोषित किए हैं। जिस किसी में ये धम्म-गुण विद्यमान हो, हम उसका सत्कार करते हैं, सम्मान करते हैं, मानते हैं, पूजते हैं, सत्कार और आदर देकर उसके उपनिश्रय से विहार करते हैं।” 7

जब ऐसा कहा गया, तब मगध के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण ने उपनन्द सेनापति को आमंत्रित किया, “क्या लगता है, श्रीमान सेनापति जी, क्या श्रीमान सत्कार-योग्य का सत्कार करते हैं, सम्मान-योग्य का सम्मान करते हैं, मानने-योग्य को मानते हैं, पूजने-योग्य को पूजते हैं?”

“वाकई, श्रीमान सत्कार-योग्य का सत्कार करते हैं, सम्मान-योग्य का सम्मान करते हैं, मानने-योग्य को मानते हैं, पूजने-योग्य को पूजते हैं। क्योंकि यदि श्रीमानों ने सत्कार-योग्य का सत्कार न किया, सम्मान-योग्य का सम्मान न किया, मानने-योग्य को न माना, पूजने-योग्य को न पुजा, तब भला फिर किस श्रीमान का सत्कार करेंगे, सम्मान करेंगे, मानेंगे, पुजेंगे; सत्कार और आदर देकर किसके उपनिश्रय से विहार करेंगे?”

तब मगध के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “श्रीमान आनन्द इस समय कहाँ विहार कर रहे हैं?”

“ब्राह्मण, मैं इस समय वेणुवन में विहार कर रहा हूँ।”

“आशा है, श्रीमान आनन्द, कि वेणुवन रमणीय, बिलकुल शान्त, निशब्द, निर्जन, मनुष्यों की बस्ती से दूर, निर्लिप्त एकांतवास के लिए उपयुक्त होगा?”

“वाकई, ब्राह्मण। वेणुवन रमणीय, बिलकुल शान्त, निशब्द, निर्जन, मनुष्यों की बस्ती से दूर, निर्लिप्त एकांतवास के लिए उपयुक्त है, तुम्हारे जैसे संरक्षक और पालक (की कृपा) से।”

“अवश्य, श्रीमान गोतम, वेणुवन रमणीय, बिलकुल शान्त, निशब्द, निर्जन, मनुष्यों की बस्ती से दूर, निर्लिप्त एकांतवास के लिए उपयुक्त है, आप जैसे श्रीमानों के ध्यान से, ध्यान करने की आदत से। क्योंकि, श्रीमान वाकई ध्यानी हैं, ध्यान करने के आदि हैं।

एक समय, श्रीमान आनन्द, श्रीमान गोतम वैशाली के महावन में स्थित कूटागार मंडप में विहार कर रहे थे। तब, श्रीमान आनन्द, मैं महावन में स्थित कूटागार मंडप में श्रीमान गोतम के पास गया। वहाँ श्रीमान गोतम ने अनेक प्रकार से ध्यान विषय पर चर्चा की। श्रीमान गोतम ध्यानी थे, और ध्यान के आदि थे। और श्रीमान गोतम ने सभी प्रकार के ध्यान की प्रशंसा की।”

निंदनीय ध्यान

“नहीं, ब्राह्मण। ऐसा नहीं है कि भगवान ने सभी प्रकार के ध्यान की प्रशंसा की हो। और ऐसा भी नहीं है कि भगवान ने सभी प्रकार के ध्यान की प्रशंसा नहीं की हो। भगवान ने किस प्रकार के ध्यान की प्रशंसा नहीं की?

  • कोई कामुक-दिलचस्पी (“कामराग”) से अभिभूत हुए, कामुक-दिलचस्पी के गिरफ्त में गए मानस से विहार करता है, जो कामुक-दिलचस्पी से निकलने का उत्पन्न मार्ग यथास्वरूप नहीं जानता है। वह कामुक-दिलचस्पी को ही भीतर छिपाकर ध्यान लगाता है, ध्यान केन्द्रित करता है, ध्यान एकाग्र करता है, ध्यान समाहित करता है।
  • वह दुर्भावना से अभिभूत हुए, दुर्भावना के गिरफ्त में गए मानस से…
  • वह सुस्ती व तंद्रा से अभिभूत हुए, सुस्ती व तंद्रा के गिरफ्त में गए मानस से…
  • वह बेचैनी व पश्चाताप से अभिभूत हुए, बेचैनी व पश्चाताप के गिरफ्त में गए मानस से…
  • वह अनिश्चितता से अभिभूत हुए, अनिश्चितता के गिरफ्त में गए मानस से विहार करता है, जो अनिश्चितता से निकलने का उत्पन्न मार्ग यथास्वरूप नहीं जानता है। वह अनिश्चितता को ही भीतर छिपाकर ध्यान लगाता है, ध्यान केन्द्रित करता है, ध्यान एकाग्र करता है, ध्यान समाहित करता है।

—इस प्रकार के ध्यान की, ब्राह्मण, भगवान ने प्रशंसा नहीं की।

प्रशंसनीय ध्यान

तब, किस प्रकार के ध्यान की भगवान ने प्रशंसा की है?

  • कोई भिक्षु कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
  • तब आगे, भिक्षु वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
  • तब आगे, भिक्षु प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—वह उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
  • तब आगे, भिक्षु सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।

— इस प्रकार के ध्यान की, ब्राह्मण, भगवान ने प्रशंसा की हैं।”

“तो, लगता है, श्रीमान आनन्द, कि भगवान से निंदनीय ध्यान की निंदा की और प्रशंसनीय ध्यान की प्रशंसा की। ठीक है, श्रीमान आनन्द, तब अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं मेरे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”

“तब, ब्राह्मण, जिसका उचित समय समझो!”

तब, मगध के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण ने आयुष्मान आनन्द की बात का अभिनंदन कर, अनुमोदन कर, आसन से उठकर चला गया। मगध के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण को जाकर अधिक समय नहीं हुआ था, जब गोपाल मोग्गल्लान ब्राह्मण ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “हमें श्रीमान आनन्द से प्रश्न पूछा था, जिसका श्रीमान आनन्द ने अब तक उत्तर नहीं दिया।”

“ब्राह्मण, क्या मैंने उत्तर नहीं दिया कि ‘नहीं, ब्राह्मण। ऐसा एक भी भिक्षु नहीं है, जो उन सब के सब गुणों से संपन्न हो, जिन गुणों से ‘भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ संपन्न थे। क्योंकि, ब्राह्मण, भगवान ने ही अनुत्पन्न मार्ग को उत्पन्न किया, अजन्में मार्ग को जन्म दिया, अघोषित मार्ग की घोषणा की, जो मार्ग के जानकार, मार्ग के विद्वान, मार्ग में निपुण हैं। और, अब श्रावक उस मार्ग पर चलकर साधना करते संपन्न होते हैं।’”

सुत्र समाप्त।


  1. यहाँ संदर्भ अवंती के राजा पज्जोत का है, जो बुद्धकालीन राजनीति में विवाह-संबंधों के माध्यम से महत्वपूर्ण गठबंधन बना चुका था। उसने लिच्छवियों के प्रमुख चेटक की पुत्री सिवा से विवाह किया था, जिससे उसका संबंध मगध के उत्तर स्थित वज्जि संघ से जुड़ गया। उसकी पुत्री वासुलदत्ता का विवाह कोसम्बी के राजा उदयन से हुआ, और उनसे उत्पन्न राजकुमार बोधि उसका नाती था (मज्झिमनिकाय ८५); इसी प्रकार मधुरा के राजा सुबाहु ने पज्जोत की बहन से विवाह किया (मज्झिमनिकाय ८४)। बिंबिसार की मृत्यु के बाद सत्ता में आए अजातशत्रु ने वज्जि में पज्जोत के सहयोगियों को धमकाया, किंतु स्वयं पितृहत्याकर्म के अपराधबोध और भय से ग्रस्त रहा—यहाँ तक कि वह ध्यानरत भिक्षुओं से भी भयभीत होता था (दीघनिकाय २)। पज्जोत से उसका भय निराधार नहीं था, क्योंकि पज्जोत अपने शक्तिशाली हाथियों और उग्र स्वभाव के लिए प्रसिद्ध था। ↩︎

  2. मगध देश के मुख्यमंत्री वस्सकार ब्राह्मण अवश्य ही गंगा के उत्तर तट पर स्थित पाटलिपुत्र के निर्माण का कार्य पूरा कर वहाँ से लौटा होगा। यह वही नगर था जो आगे चलकर विस्तारित मगध साम्राज्य की राजधानी बना। यह विवरण दीघनिकाय १६ में मिलता है। इसके विपरीत, तत्कालीन मगध की राजधानी राजगृह चारों ओर से पहाड़ियों से घिरी हुई थी, जिन पर आज भी प्राचीन दुर्ग-प्रणालियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। ↩︎

  3. भगवान ने अपने महापरिनिर्वाण से कुछ ही समय पूर्व यह बात स्पष्ट रूप से आनन्द भन्ते को कही थी (दीघनिकाय १६)। ↩︎

  4. इस बात को भी भगवान ने अपने महापरिनिर्वाण से कुछ ही समय पूर्व स्पष्ट किया था। (दीघनिकाय १६)। ↩︎

  5. पातिमोक्ख भिक्षुओं का विनय नियमावली है। प्रारम्भिक काल में (अंगुत्तरनिकाय ३.८४) इसमें १५२ नियम बताए जाते हैं, जबकि पालि परम्परा में आज भिक्षुओं के लिए कुल २२७ नियम माने जाते हैं । बुद्ध द्वारा पहला नियम निर्धारित किए जाने की कथा विनयपिटक में दी गई है। इससे पूर्व सामूहिक पठन केवल उन गाथाओं तक सीमित था जिन्हें ओवाद पातिमोक्ख कहा जाता है (दीघनिकाय १४)। इस पाठ का मुख्य उद्देश्य था कि किसी एक नैतिक संहिता के प्रति सभी भिक्षुओं की निष्ठा से संघ को एकीकृत किया जाए। ↩︎

  6. उपोसथ एक विशेष साधना-दिन होता है, जो पूर्णिमा, अमावस्या, और दोनों अष्टमी तिथियों (चतुर्दशी/अष्टमी) पर आता है, अर्थात, महीने में चार। लेकिन भिक्षुओं का पातिमोक्ख पठन केवल महीने में दो बार किया जाता है, अष्टमियों पर नहीं। इसका विस्तृत विवरण विनयपिटक में मिलता है।

    यहाँ उल्लेखित “गाँव-क्षेत्र” का आशय ऐसी किसी गाँव से है, जिसकी सीमा के भीतर भिक्षु विहार करते हो। विनय में बताया गया है कि किस प्रकार भिक्षुओं के द्वारा एक औपचारिक सीमा निर्धारित की जाती है, जिसके भीतर रहने वाले सभी भिक्षुओं के लिए उपोसथ में उपस्थित होना अनिवार्य होता है। यह सीमा आवश्यक नहीं कि गाँव के औपचारिक सीमा से मेल खाती हो। ↩︎

  7. यहाँ जिन “दस बातों” का उल्लेख है, वे सभी सूत्रों में अवश्य बार-बार मिलती हैं; किन्तु मेरी जानकारी में किसी एक ही सूत्र में इन्हें एकत्र कर “दस आश्वासन धम्म” कहकर सूचीबद्ध किए जाने का उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु संघ में इन दसों गुणों से संपन्न अनेक भिक्षु और भिक्षुणियों का उल्लेख मिलता है। ↩︎

पालि

७९. एवं मे सुतं – एकं समयं आयस्मा आनन्दो राजगहे विहरति वेळुवने कलन्दकनिवापे अचिरपरिनिब्बुते भगवति। तेन खो पन समयेन राजा मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो राजगहं पटिसङ्खारापेति रञ्‍ञो पज्‍जोतस्स आसङ्कमानो। अथ खो आयस्मा आनन्दो पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय राजगहं पिण्डाय पाविसि। अथ खो आयस्मतो आनन्दस्स एतदहोसि – ‘‘अतिप्पगो खो ताव राजगहे पिण्डाय चरितुं। यंनूनाहं येन गोपकमोग्गल्‍लानस्स ब्राह्मणस्स कम्मन्तो, येन गोपकमोग्गल्‍लानो ब्राह्मणो तेनुपसङ्कमेय्य’’न्ति।

अथ खो आयस्मा आनन्दो येन गोपकमोग्गल्‍लानस्स ब्राह्मणस्स कम्मन्तो, येन गोपकमोग्गल्‍लानो ब्राह्मणो तेनुपसङ्कमि। अद्दसा खो गोपकमोग्गल्‍लानो ब्राह्मणो आयस्मन्तं आनन्दं दूरतोव आगच्छन्तं। दिस्वान आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘एतु खो भवं आनन्दो। स्वागतं भोतो आनन्दस्स। चिरस्सं खो भवं आनन्दो इमं परियायमकासि यदिदं इधागमनाय। निसीदतु भवं आनन्दो, इदमासनं पञ्‍ञत्त’’न्ति। निसीदि खो आयस्मा आनन्दो पञ्‍ञत्ते आसने। गोपकमोग्गल्‍लानोपि खो ब्राह्मणो अञ्‍ञतरं नीचं आसनं गहेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो गोपकमोग्गल्‍लानो ब्राह्मणो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि तेहि धम्मेहि सब्बेनसब्बं सब्बथासब्बं समन्‍नागतो येहि धम्मेहि समन्‍नागतो सो भवं गोतमो अहोसि अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति? ‘‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि तेहि धम्मेहि सब्बेनसब्बं सब्बथासब्बं समन्‍नागतो येहि धम्मेहि समन्‍नागतो सो भगवा अहोसि अरहं सम्मासम्बुद्धो। सो हि, ब्राह्मण, भगवा अनुप्पन्‍नस्स मग्गस्स उप्पादेता, असञ्‍जातस्स मग्गस्स सञ्‍जनेता, अनक्खातस्स मग्गस्स अक्खाता, मग्गञ्‍ञू, मग्गविदू, मग्गकोविदो; मग्गानुगा च पन एतरहि सावका विहरन्ति पच्छा समन्‍नागता’’ति। अयञ्‍च हिदं आयस्मतो आनन्दस्स गोपकमोग्गल्‍लानेन ब्राह्मणेन सद्धिं अन्तराकथा विप्पकता अहोसि।

अथ खो वस्सकारो ब्राह्मणो मगधमहामत्तो राजगहे कम्मन्ते अनुसञ्‍ञायमानो येन गोपकमोग्गल्‍लानस्स ब्राह्मणस्स कम्मन्तो, येनायस्मा आनन्दो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मता आनन्देन सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो वस्सकारो ब्राह्मणो मगधमहामत्तो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘कायनुत्थ, भो आनन्द, एतरहि कथाय सन्‍निसिन्‍ना, का च पन वो अन्तराकथा विप्पकता’’ति? ‘‘इध मं, ब्राह्मण, गोपकमोग्गल्‍लानो ब्राह्मणो एवमाह – ‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि तेहि धम्मेहि सब्बेनसब्बं सब्बथासब्बं समन्‍नागतो येहि धम्मेहि समन्‍नागतो सो भवं गोतमो अहोसि अरहं सम्मासम्बुद्धो’ति। एवं वुत्ते अहं, ब्राह्मण, गोपकमोग्गल्‍लानं ब्राह्मणं एतदवोचं – ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि तेहि धम्मेहि सब्बेनसब्बं सब्बथासब्बं समन्‍नागतो येहि धम्मेहि समन्‍नागतो सो भगवा अहोसि अरहं सम्मासम्बुद्धो। सो हि, ब्राह्मण, भगवा अनुप्पन्‍नस्स मग्गस्स उप्पादेता, असञ्‍जातस्स मग्गस्स सञ्‍जनेता, अनक्खातस्स मग्गस्स अक्खाता, मग्गञ्‍ञू, मग्गविदू, मग्गकोविदो; मग्गानुगा च पन एतरहि सावका विहरन्ति पच्छा समन्‍नागता’ति। अयं खो नो, ब्राह्मण, गोपकमोग्गल्‍लानेन ब्राह्मणेन सद्धिं अन्तराकथा विप्पकता। अथ त्वं अनुप्पत्तो’’ति।

८०. ‘‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि तेन भोता गोतमेन ठपितो – ‘अयं वो ममच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सती’ति, यं तुम्हे एतरहि पटिपादेय्याथा’’ति पटिधावेय्याथाति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)? ‘‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन ठपितो – ‘अयं वो ममच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सती’ति, यं मयं एतरहि पटिपादेय्यामा’’ति। ‘‘अत्थि पन, भो आनन्द, एकभिक्खुपि सङ्घेन सम्मतो, सम्बहुलेहि थेरेहि भिक्खूहि ठपितो – ‘अयं नो भगवतो अच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सती’ति, यं तुम्हे एतरहि पटिपादेय्याथा’’ति? ‘‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि सङ्घेन सम्मतो, सम्बहुलेहि थेरेहि भिक्खूहि ठपितो – ‘अयं नो भगवतो अच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सती’ति, यं मयं एतरहि पटिपादेय्यामा’’ति। ‘‘एवं अप्पटिसरणे च पन, भो आनन्द, को हेतु सामग्गिया’’ति? ‘‘न खो मयं, ब्राह्मण, अप्पटिसरणा; सप्पटिसरणा मयं, ब्राह्मण; धम्मप्पटिसरणा’’ति।

‘‘‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि तेन भोता गोतमेन ठपितो – अयं वो ममच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति, यं तुम्हे एतरहि पटिपादेय्याथा’ति – इति पुट्ठो समानो ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन ठपितो – अयं वो ममच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति, यं मयं एतरहि पटिपादेय्यामा’ति वदेसि; ‘अत्थि पन, भो आनन्द, एकभिक्खुपि सङ्घेन सम्मतो, सम्बहुलेहि थेरेहि भिक्खूहि ठपितो – अयं नो भगवतो अच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति, यं तुम्हे एतरहि पटिपादेय्याथा’ति – इति पुट्ठो समानो ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि सङ्घेन सम्मतो, सम्बहुलेहि थेरेहि भिक्खूहि ठपितो – अयं नो भगवतो अच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति, यं मयं एतरहि पटिपादेय्यामा’ति – वदेसि; ‘एवं अप्पटिसरणे च पन, भो आनन्द, को हेतु सामग्गिया’ति इति पुट्ठो समानो ‘न खो मयं, ब्राह्मण , अप्पटिसरणा; सप्पटिसरणा मयं, ब्राह्मण; धम्मप्पटिसरणा’ति वदेसि। इमस्स पन, भो आनन्द, भासितस्स कथं अत्थो दट्ठब्बो’’ति?

८१. ‘‘अत्थि खो, ब्राह्मण, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन भिक्खूनं सिक्खापदं पञ्‍ञत्तं, पातिमोक्खं उद्दिट्ठं। ते मयं तदहुपोसथे यावतिका एकं गामखेत्तं उपनिस्साय विहराम ते सब्बे एकज्झं सन्‍निपताम; सन्‍निपतित्वा यस्स तं पवत्तति तं अज्झेसाम। तस्मिं चे भञ्‍ञमाने होति भिक्खुस्स आपत्ति होति वीतिक्‍कमो तं मयं यथाधम्मं यथानुसिट्ठं कारेमाति।

‘‘न किर नो भवन्तो कारेन्ति; धम्मो नो कारेति’’। ‘‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि यं तुम्हे एतरहि सक्‍करोथ गरुं करोथ गरुकरोथ (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) मानेथ पूजेथ; सक्‍कत्वा गरुं कत्वा गरुकत्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) उपनिस्साय विहरथा’’ति? ‘‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि यं मयं एतरहि सक्‍करोम गरुं करोम मानेम पूजेम; सक्‍कत्वा गरुं कत्वा उपनिस्साय विहरामा’’ति।

‘‘‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि तेन भोता गोतमेन ठपितो – अयं वो ममच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति यं तुम्हे एतरहि पटिपादेय्याथा’ति – इति पुट्ठो समानो ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन ठपितो – अयं वो ममच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति यं मयं एतरहि पटिपादेय्यामा’ति वदेसि; ‘अत्थि पन, भो आनन्द, एकभिक्खुपि सङ्घेन सम्मतो, सम्बहुलेहि थेरेहि भिक्खूहि ठपितो – अयं नो भगवतो अच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति यं तुम्हे एतरहि पटिपादेय्याथा’ति – इति पुट्ठो समानो ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि सङ्घेन सम्मतो, सम्बहुलेहि थेरेहि भिक्खूहि ठपितो – अयं नो भगवतो अच्‍चयेन पटिसरणं भविस्सतीति यं मयं एतरहि पटिपादेय्यामा’ति वदेसि; ‘अत्थि नु खो, भो आनन्द, एकभिक्खुपि यं तुम्हे एतरहि सक्‍करोथ गरुं करोथ मानेथ पूजेथ; सक्‍कत्वा गरुं कत्वा उपनिस्साय विहरथा’ति – इति पुट्ठो समानो ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि यं मयं एतरहि सक्‍करोम गरुं करोम मानेम पूजेम; सक्‍कत्वा गरुं कत्वा उपनिस्साय विहरामा’ति वदेसि। इमस्स पन, भो आनन्द, भासितस्स कथं अत्थो दट्ठब्बो’’ति?

८२. ‘‘अत्थि खो, ब्राह्मण, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन दस पसादनीया धम्मा अक्खाता। यस्मिं नो इमे धम्मा संविज्‍जन्ति तं मयं एतरहि सक्‍करोम गरुं करोम मानेम पूजेम; सक्‍कत्वा गरुं कत्वा उपनिस्साय विहराम। कतमे दस?

‘‘इध , ब्राह्मण, भिक्खु सीलवा होति, पातिमोक्खसंवरसंवुतो विहरति आचारगोचरसम्पन्‍नो, अणुमत्तेसु वज्‍जेसु भयदस्सावी, समादाय सिक्खति सिक्खापदेसु।

‘‘बहुस्सुतो होति सुतधरो सुतसन्‍निचयो। ये ते धम्मा आदिकल्याणा, मज्झेकल्याणा, परियोसानकल्याणा, सात्थं, सब्यञ्‍जनं सात्था सब्यञ्‍जना (सी॰ स्या॰ कं॰), केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं अभिवदन्ति तथारूपास्स धम्मा बहुस्सुता होन्ति धाता धता (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) वचसा परिचिता मनसानुपेक्खिता दिट्ठिया सुप्पटिविद्धा।

‘‘सन्तुट्ठो होति ( ) (इतरीतरेहि) दी॰ नि॰ ३.३४५ चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्‍चयभेसज्‍जपरिक्खारेहि।

‘‘चतुन्‍नं झानानं आभिचेतसिकानं दिट्ठधम्मसुखविहारानं निकामलाभी होति अकिच्छलाभी अकसिरलाभी।

‘‘अनेकविहितं इद्धिविधं पच्‍चनुभोति – एकोपि हुत्वा बहुधा होति, बहुधापि हुत्वा एको होति; आविभावं तिरोभावं; तिरोकुट्टं तिरोकुड्डं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) तिरोपाकारं तिरोपब्बतं असज्‍जमानो गच्छति, सेय्यथापि आकासे; पथवियापि उम्मुज्‍जनिमुज्‍जं करोति, सेय्यथापि उदके; उदकेपि अभिज्‍जमाने गच्छति, सेय्यथापि पथवियं; आकासेपि पल्‍लङ्केन कमति, सेय्यथापि पक्खी सकुणो; इमेपि चन्दिमसूरिये एवंमहिद्धिके एवंमहानुभावे पाणिना परिमसति परामसति (क॰) परिमज्‍जति, याव ब्रह्मलोकापि कायेन वसं वत्तेति।

‘‘दिब्बाय सोतधातुया विसुद्धाय अतिक्‍कन्तमानुसिकाय उभो सद्दे सुणाति – दिब्बे च मानुसे च, ये दूरे सन्तिके च।

‘‘परसत्तानं परपुग्गलानं चेतसा चेतो परिच्‍च पजानाति। सरागं वा चित्तं ‘सरागं चित्त’न्ति पजानाति, वीतरागं वा चित्तं ‘वीतरागं चित्त’न्ति पजानाति, सदोसं वा चित्तं ‘सदोसं चित्त’न्ति पजानाति, वीतदोसं वा चित्तं ‘वीतदोसं चित्त’न्ति पजानाति, समोहं वा चित्तं ‘समोहं चित्त’न्ति पजानाति, वीतमोहं वा चित्तं ‘वीतमोहं चित्त’न्ति पजानाति, संखित्तं वा चित्तं ‘संखित्तं चित्त’न्ति पजानाति, विक्खित्तं वा चित्तं ‘विक्खित्तं चित्त’न्ति पजानाति , महग्गतं वा चित्तं ‘महग्गतं चित्त’न्ति पजानाति, अमहग्गतं वा चित्तं ‘अमहग्गतं चित्त’न्ति पजानाति, सउत्तरं वा चित्तं ‘सउत्तरं चित्त’न्ति पजानाति, अनुत्तरं वा चित्तं ‘अनुत्तरं चित्त’न्ति पजानाति, समाहितं वा चित्तं ‘समाहितं चित्त’न्ति पजानाति, असमाहितं वा चित्तं ‘असमाहितं चित्त’न्ति पजानाति, विमुत्तं वा चित्तं ‘विमुत्तं चित्त’न्ति पजानाति, अविमुत्तं वा चित्तं ‘अविमुत्तं चित्त’न्ति पजानाति।

‘‘अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति, सेय्यथिदं – एकम्पि जातिं द्वेपि जातियो तिस्सोपि जातियो चतस्सोपि जातियो पञ्‍चपि जातियो दसपि जातियो वीसम्पि जातियो तिंसम्पि जातियो चत्तारीसम्पि जातियो पञ्‍ञासम्पि जातियो जातिसतम्पि जातिसहस्सम्पि जातिसतसहस्सम्पि अनेकेपि संवट्टकप्पे अनेकेपि विवट्टकप्पे अनेकेपि संवट्टविवट्टकप्पे – ‘अमुत्रासिं एवंनामो एवंगोत्तो एवंवण्णो एवमाहारो एवंसुखदुक्खप्पटिसंवेदी एवमायुपरियन्तो, सो ततो चुतो अमुत्र उदपादिं; तत्रापासिं एवंनामो एवंगोत्तो एवंवण्णो एवमाहारो एवंसुखदुक्खप्पटिसंवेदी एवमायुपरियन्तो, सो ततो चुतो इधूपपन्‍नो’ति। इति साकारं सउद्देसं अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति।

‘‘दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्‍कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्‍जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे, सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति।

‘‘आसवानं खया अनासवं चेतोविमुत्तिं पञ्‍ञाविमुत्तिं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्‍ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्‍ज विहरति।

‘‘इमे खो, ब्राह्मण, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन दस पसादनीया धम्मा अक्खाता। यस्मिं नो इमे धम्मा संविज्‍जन्ति तं मयं एतरहि सक्‍करोम गरुं करोम मानेम पूजेम; सक्‍कत्वा गरुं कत्वा उपनिस्साय विहरामा’’ति।

८३. एवं वुत्ते वस्सकारो ब्राह्मणो मगधमहामत्तो उपनन्दं सेनापतिं आमन्तेसि – ‘‘तं किं मञ्‍ञति भवं सेनापति मञ्‍ञसि एवं सेनापति (स्या॰ कं॰ पी॰), मञ्‍ञसि सेनापति (सी॰), मञ्‍ञसि भवं सेनापति (क॰) यदिमे भोन्तो सक्‍कातब्बं सक्‍करोन्ति, गरुं कातब्बं गरुं करोन्ति, मानेतब्बं मानेन्ति , पूजेतब्बं पूजेन्ति’’? ‘‘तग्घिमे तग्घ मे (क॰) भोन्तो सक्‍कातब्बं सक्‍करोन्ति, गरुं कातब्बं गरुं करोन्ति, मानेतब्बं मानेन्ति, पूजेतब्बं पूजेन्ति। इमञ्‍च हि ते भोन्तो न सक्‍करेय्युं न गरुं करेय्युं न मानेय्युं न पूजेय्युं; अथ किञ्‍चरहि ते भोन्तो सक्‍करेय्युं गरुं करेय्युं मानेय्युं पूजेय्युं, सक्‍कत्वा गरुं कत्वा मानेत्वा पूजेत्वा उपनिस्साय विहरेय्यु’’न्ति? अथ खो वस्सकारो ब्राह्मणो मगधमहामत्तो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘कहं पन भवं आनन्दो एतरहि विहरती’’ति? ‘‘वेळुवने खोहं, ब्राह्मण, एतरहि विहरामी’’ति। ‘‘कच्‍चि पन, भो आनन्द, वेळुवनं रमणीयञ्‍चेव अप्पसद्दञ्‍च अप्पनिग्घोसञ्‍च विजनवातं मनुस्सराहस्सेय्यकं मनुस्सराहसेय्यकं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) पटिसल्‍लानसारुप्प’’न्ति? ‘‘तग्घ, ब्राह्मण, वेळुवनं रमणीयञ्‍चेव अप्पसद्दञ्‍च अप्पनिग्घोसञ्‍च विजनवातं मनुस्सराहस्सेय्यकं पटिसल्‍लानसारुप्पं, यथा तं तुम्हादिसेहि रक्खकेहि गोपकेही’’ति। ‘‘तग्घ, भो आनन्द, वेळुवनं रमणीयञ्‍चेव अप्पसद्दञ्‍च अप्पनिग्घोसञ्‍च विजनवातं मनुस्सराहस्सेय्यकं पटिसल्‍लानसारुप्पं, यथा तं भवन्तेहि झायीहि झानसीलीहि। झायिनो चेव भवन्तो झानसीलिनो च’’।

‘‘एकमिदाहं , भो आनन्द, समयं सो भवं गोतमो वेसालियं विहरति महावने कूटागारसालायं। अथ ख्वाहं, भो आनन्द, येन महावनं कूटागारसाला येन सो भवं गोतमो तेनुपसङ्कमिं। तत्र च पन सो तत्र च सो (सी॰ पी॰) भवं गोतमो अनेकपरियायेन झानकथं कथेसि। झायी चेव सो भवं गोतमो अहोसि झानसीली च। सब्बञ्‍च पन सो भवं गोतमो झानं वण्णेसी’’ति।

८४. ‘‘न च खो, ब्राह्मण, सो भगवा सब्बं झानं वण्णेसि, नपि सो भगवा सब्बं झानं न वण्णेसीति। कथं रूपञ्‍च , ब्राह्मण, सो भगवा झानं न वण्णेसि? इध, ब्राह्मण, एकच्‍चो कामरागपरियुट्ठितेन चेतसा विहरति कामरागपरेतेन, उप्पन्‍नस्स च कामरागस्स निस्सरणं यथाभूतं नप्पजानाति; सो कामरागंयेव अन्तरं करित्वा झायति पज्झायति निज्झायति अपज्झायति। ब्यापादपरियुट्ठितेन चेतसा विहरति ब्यापादपरेतेन, उप्पन्‍नस्स च ब्यापादस्स निस्सरणं यथाभूतं नप्पजानाति; सो ब्यापादंयेव अन्तरं करित्वा झायति पज्झायति निज्झायति अपज्झायति। थिनमिद्धपरियुट्ठितेन चेतसा विहरति थिनमिद्धपरेतेन, उप्पन्‍नस्स च थिनमिद्धस्स निस्सरणं यथाभूतं नप्पजानाति; सो थिनमिद्धंयेव अन्तरं करित्वा झायति पज्झायति निज्झायति अपज्झायति। उद्धच्‍चकुक्‍कुच्‍चपरियुट्ठितेन चेतसा विहरति उद्धच्‍चकुक्‍कुच्‍चपरेतेन, उप्पन्‍नस्स च उद्धच्‍चकुक्‍कुच्‍चस्स निस्सरणं यथाभूतं नप्पजानाति; सो उद्धच्‍चकुक्‍कुच्‍चंयेव अन्तरं करित्वा झायति पज्झायति निज्झायति अपज्झायति। विचिकिच्छापरियुट्ठितेन चेतसा विहरति विचिकिच्छापरेतेन, उप्पन्‍नाय च विचिकिच्छाय निस्सरणं यथाभूतं नप्पजानाति; सो विचिकिच्छंयेव अन्तरं करित्वा झायति पज्झायति निज्झायति अपज्झायति। एवरूपं खो, ब्राह्मण, सो भगवा झानं न वण्णेसि।

‘‘कथं रूपञ्‍च, ब्राह्मण, सो भगवा झानं वण्णेसि? इध, ब्राह्मण, भिक्खु विविच्‍चेव कामेहि विविच्‍च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्‍कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। वितक्‍कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्‍कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं…पे॰… ततियं झानं… चतुत्थं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। एवरूपं खो, ब्राह्मण, सो भगवा झानं वण्णेसी’’ति।

‘‘गारय्हं किर, भो आनन्द, सो भवं गोतमो झानं गरहि, पासंसं पसंसि। हन्द, च दानि मयं, भो आनन्द, गच्छाम; बहुकिच्‍चा मयं बहुकरणीया’’ति। ‘‘यस्सदानि त्वं, ब्राह्मण, कालं मञ्‍ञसी’’ति। अथ खो वस्सकारो ब्राह्मणो मगधमहामत्तो आयस्मतो आनन्दस्स भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना पक्‍कामि।

अथ खो गोपकमोग्गल्‍लानो ब्राह्मणो अचिरपक्‍कन्ते वस्सकारे ब्राह्मणे मगधमहामत्ते आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘यं नो मयं भवन्तं आनन्दं अपुच्छिम्हा तं नो भवं आनन्दो न ब्याकासी’’ति। ‘‘ननु ते, ब्राह्मण, अवोचुम्हा – ‘नत्थि खो, ब्राह्मण, एकभिक्खुपि तेहि धम्मेहि सब्बेनसब्बं सब्बथासब्बं समन्‍नागतो येहि धम्मेहि समन्‍नागतो सो भगवा अहोसि अरहं सम्मासम्बुद्धो। सो हि, ब्राह्मण, भगवा अनुप्पन्‍नस्स मग्गस्स उप्पादेता, असञ्‍जातस्स मग्गस्स सञ्‍जनेता, अनक्खातस्स मग्गस्स अक्खाता, मग्गञ्‍ञू, मग्गविदू, मग्गकोविदो । मग्गानुगा च पन एतरहि सावका विहरन्ति पच्छा समन्‍नागता’’’ति।

गोपकमोग्गल्‍लानसुत्तं निट्ठितं अट्ठमं।

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