
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में मिगारमाता के विहार पूर्वाराम में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान उपोसथ की पंचदशी पुर्णिमा की रात को भिक्षुसंघ से घिरकर खुले आकाश के नीचे बैठे थे। तब भगवान ने अवलोकन कर भिक्षुसंघ को बिलकुल चुपचाप और मौन बैठे हुए देखकर भिक्षुओं को आमंत्रित किया—
“भिक्षुओं, क्या कोई असत्पुरुष (=बुरा व्यक्ति) किसी (दूसरे) असत्पुरुष को पहचान सकता है कि ‘यह असत्पुरुष है!’?"
“नहीं, भन्ते।”
“साधु, भिक्षुओं। यह असंभव है, भिक्षुओं। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई असत्पुरुष किसी असत्पुरुष को पहचान सके कि ‘यह असत्पुरुष है!’ और, क्या कोई असत्पुरुष किसी सत्पुरुष (भला व्यक्ति) को पहचान सकता है कि ‘यह सत्पुरुष है!’?”
“नहीं, भन्ते।”
“साधु, भिक्षुओं। यह असंभव है, भिक्षुओं। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई असत्पुरुष किसी सत्पुरुष को भी पहचान सके कि ‘यह सत्पुरुष है!’
भिक्षुओं, असत्पुरुष बुरे स्वभाव से युक्त होता है, असत्पुरुष भक्ति करता है, असत्पुरुष इरादा करता है, असत्पुरुष सुझाव देता है, असत्पुरुष वाणी बोलता है, असत्पुरुष कार्य करता है, असत्पुरुष दृष्टि का होता है, असत्पुरुष दान करता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, बुरे स्वभाव से युक्त होता है? कोई असत्पुरुष श्रद्धाहिन होता है, लज्जाहीन (=बेशर्म) होता है, भयहीन (=बिंदास) होता है, अल्प (धम्म) सुना होता है, आलसी होता है, स्मृतिहीन (=भुलक्कड़) होता है, दुष्प्रज्ञ होता है। इस प्रकार, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष बुरे स्वभाव से युक्त होता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष भक्ति करता है? कोई असत्पुरुष ऐसे श्रमण-ब्राह्मणों का मित्र या सहायक होता है, जो श्रद्धाहिन हो, लज्जाहीन हो, भयहीन हो, अल्प सुने हो, आलसी हो, स्मृतिहीन हो, दुष्प्रज्ञ हो। 1 इस प्रकार कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष भक्ति करता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष इरादा करता है? कोई असत्पुरुष आत्मपीड़ा का इरादा करता है, परपीड़ा का इरादा करता है, आपसी-पीड़ा का इरादा करता है। इस प्रकार कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष इरादा करता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष सुझाव देता है? कोई असत्पुरुष आत्मपीड़ा का सुझाव देता है, परपीड़ा का सुझाव देता है, आपसी-पीड़ा का सुझाव देता है। इस प्रकार कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष सुझाव देता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष वाणी बोलता है? कोई असत्पुरुष झूठ बोलता है, फूट डालने वाली बात बोलता है, कटु बात बोलता है, निरर्थक बकवास करता है। इस प्रकार कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष वाणी बोलता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष कार्य करता है? कोई असत्पुरुष जीवहत्या करता है, चोरी करता है, कामुक व्यभिचार करता है। इस प्रकार कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष कार्य करता है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष दृष्टि का होता है? किसी असत्पुरुष की ऐसी दृष्टि होती है—‘दान (का फ़ल) नहीं है। यज्ञ (=चढ़ावा) नहीं है। आहुति (=बलिदान) नहीं है। सुकृत्य या दुष्कृत्य कर्मों का फ़ल-परिणाम नहीं हैं। लोक नहीं है। परलोक नहीं है। न माता है, न पिता है, न स्वयं से प्रकट होते (“ओपपातिक”) सत्व हैं। न ही दुनिया में ऐसे श्रमण-ब्राह्मण हैं जो सम्यक-साधना कर सम्यक-प्रगति करते हुए विशिष्ट-ज्ञान का साक्षात्कार कर लोक-परलोक होने की घोषणा करते हैं।’ इस प्रकार किसी असत्पुरुष की, भिक्षुओं, असत्पुरुष दृष्टि होती है।
कैसे कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष दान करता है? कोई असत्पुरुष न ध्यान देकर दान करता है, न अपने हाथ से दान करता है, न सोच-विचार कर दान करता है, अनावश्यक दान देता है, ऐसी दृष्टि से दान देता है मानो कोई फल नहीं आएगा। इस प्रकार कोई असत्पुरुष, भिक्षुओं, असत्पुरुष दान करता है।
और, भिक्षुओं, जो असत्पुरुष ऐसा बुरे स्वभाव से युक्त हो, असत्पुरुष भक्ति करता हो, असत्पुरुष इरादा करता हो, असत्पुरुष सुझाव देता हो, असत्पुरुष वाणी बोलता हो, असत्पुरुष कार्य करता हो, असत्पुरुष दृष्टि का हो—वह असत्पुरुष दान देकर मरणोपरांत काया छूटने पर असत्पुरुष की गति होकर वहाँ उपजता है।
और, भिक्षुओं, यह असत्पुरुष की गति क्या है? नर्क अथवा प्राणियोनि।
आगे, भिक्षुओं, क्या कोई सत्पुरुष किसी (दूसरे) सत्पुरुष को पहचान सकता है कि ‘यह सत्पुरुष है!’?”
“हाँ, भन्ते।”
“साधु, भिक्षुओं। यह संभव है, भिक्षुओं। ऐसा हो सकता कि कोई सत्पुरुष किसी सत्पुरुष को पहचान सके कि ‘यह सत्पुरुष है!’ और, क्या कोई सत्पुरुष किसी असत्पुरुष को पहचान सकता है कि ‘यह असत्पुरुष है!’?”
“हाँ, भन्ते।”
“साधु, भिक्षुओं। यह संभव है, भिक्षुओं। ऐसा हो सकता कि कोई सत्पुरुष किसी असत्पुरुष को भी पहचान सके कि ‘यह असत्पुरुष है!’
भिक्षुओं, सत्पुरुष भले स्वभाव से युक्त होता है, सत्पुरुष भक्ति करता है, सत्पुरुष इरादा करता है, सत्पुरुष सुझाव देता है, सत्पुरुष वाणी बोलता है, सत्पुरुष कार्य करता है, सत्पुरुष दृष्टि का होता है, सत्पुरुष दान करता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, भले स्वभाव से युक्त होता है? कोई सत्पुरुष श्रद्धालु होता है, लज्जावान होता है, भयभीरु (=चौकस) होता है, बहुत (धम्म) सुना होता है, वीर्यवान होता है, स्मृतिमान होता है, प्रज्ञावान होता है। इस प्रकार, भिक्षुओं, कोई सत्पुरुष भले स्वभाव से युक्त होता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष भक्ति करता है? कोई सत्पुरुष ऐसे श्रमण-ब्राह्मणों का मित्र या सहायक होता है, जो श्रद्धालु हो, लज्जावान हो, भयभीरु हो, बहुत (धम्म) सुना हो, वीर्यवान हो, स्मृतिमान हो, प्रज्ञावान हो। 2 इस प्रकार कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष भक्ति करता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष इरादा करता है? कोई सत्पुरुष न आत्मपीड़ा का इरादा करता है, न परपीड़ा का इरादा करता है, न ही आपसी-पीड़ा का इरादा करता है। इस प्रकार कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष इरादा करता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष सुझाव देता है? कोई सत्पुरुष न आत्मपीड़ा का सुझाव देता है, न परपीड़ा का सुझाव देता है, न ही आपसी-पीड़ा का सुझाव देता है। इस प्रकार कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष सुझाव देता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष वाणी बोलता है? कोई सत्पुरुष झूठ बोलने से विरत होता है, फूट डालने वाली बात बोलने से विरत होता है, कटु बोलने से विरत होता है, निरर्थक बकवास करने से विरत होता है। इस प्रकार कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष वाणी बोलता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष कार्य करता है? कोई सत्पुरुष जीवहत्या से विरत होता है, चोरी करने से विरत होता है, कामुक व्यभिचार करने से विरत होता है। इस प्रकार कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष कार्य करता है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष दृष्टि का होता है? किसी सत्पुरुष की ऐसी दृष्टि होती है—‘दान होता है; चढ़ावा होता है; आहुति होती है। अच्छे या बुरे कर्मों के फल-परिणाम होते हैं। लोक होता है; परलोक होता है। माता होती है; पिता होते है। स्वयं से उत्पन्न सत्व होते हैं। और ऐसे श्रमण-ब्राह्मण होते हैं, जो सम्यक-साधना कर, सम्यक-प्रगति करते हुए विशिष्ट-ज्ञान का साक्षात्कार कर, लोक-परलोक होने की घोषणा करते हैं।’ इस प्रकार किसी सत्पुरुष की, भिक्षुओं, सत्पुरुष दृष्टि होती है।
कैसे कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष दान करता है? कोई सत्पुरुष ध्यान देकर दान करता है, अपने हाथ से दान करता है, सोच-विचार कर दान करता है, अनावश्यक दान नहीं देता, ऐसी दृष्टि से दान देता है मानो फल आएगा। इस प्रकार कोई सत्पुरुष, भिक्षुओं, सत्पुरुष दान करता है।
और, भिक्षुओं, जो सत्पुरुष ऐसा भले स्वभाव से युक्त हो, सत्पुरुष भक्ति करता हो, सत्पुरुष इरादा करता हो, सत्पुरुष सुझाव देता हो, सत्पुरुष वाणी बोलता हो, सत्पुरुष कार्य करता हो, सत्पुरुष दृष्टि का हो—वह सत्पुरुष दान देकर मरणोपरांत काया छूटने पर सत्पुरुष की गति होकर वहाँ उपजता है।
और, भिक्षुओं, यह सत्पुरुष की गति क्या है? महान देवताओं या महान मनुष्यों की अवस्था।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
बुरे स्वभाव वाले लोग प्रायः अपने दुर्गुणों में परिवर्तन करने के बजाय तात्कालिक सांसारिक लाभ के पीछे भागते रहते हैं। चाहे कोई साधु-संत उन्हें मुक्ति और आत्मपरिवर्तन का मार्ग दिखाएँ, फिर भी वे उस उपदेश को त्यागकर किसी तथाकथित चमत्कारी बाबा के मोहजाल में फँस जाते हैं। ऐसे बाबा उनके दुष्ट स्वभाव के त्याग की प्रेरणा देने के स्थान पर बाहरी, तात्कालिक भौतिक लाभों का प्रलोभन देकर उन्हें निरंतर अपने अधीन बाँधे रखते हैं। ↩︎
भले स्वभाव वाले लोग प्रायः तात्कालिक सांसारिक लाभ के पीछे दौड़ने के बजाय अपने दुर्गुणों को दूर करने का निरंतर प्रयास करते हैं। भले ही कोई तथाकथित चमत्कारी बाबा उन्हें अपने मोहजाल में बाँधने का प्रयास करे, तब भी वे उसे त्यागकर ऐसे भिक्षुओं और साधुओं से जुड़ते हैं जो उन्हें मुक्ति और आत्मपरिवर्तन का मार्ग दिखाते हैं। ऐसे भिक्षु बाहरी, तात्कालिक भौतिक लाभों का प्रलोभन देने के बजाय उन्हें अपने दुष्ट स्वभाव के त्याग की प्रेरणा देकर मुक्त और स्वावलंबी बनाने का प्रयत्न करते हैं। ↩︎
९१. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति पुब्बारामे मिगारमातुपासादे। तेन खो पन समयेन भगवा तदहुपोसथे पन्नरसे पुण्णाय पुण्णमाय रत्तिया भिक्खुसङ्घपरिवुतो अब्भोकासे निसिन्नो होति। अथ खो भगवा तुण्हीभूतं तुण्हीभूतं भिक्खुसङ्घं अनुविलोकेत्वा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘जानेय्य नु खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसं – ‘असप्पुरिसो अयं भव’’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘साधु, भिक्खवे; अट्ठानमेतं, भिक्खवे, अनवकासो यं असप्पुरिसो असप्पुरिसं जानेय्य – ‘असप्पुरिसो अयं भव’न्ति। जानेय्य पन, भिक्खवे, असप्पुरिसो सप्पुरिसं – ‘सप्पुरिसो अयं भव’’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘साधु, भिक्खवे; एतम्पि खो, भिक्खवे, अट्ठानं अनवकासो यं असप्पुरिसो सप्पुरिसं जानेय्य – ‘सप्पुरिसो अयं भव’न्ति। असप्पुरिसो, भिक्खवे, अस्सद्धम्मसमन्नागतो होति, असप्पुरिसभत्ति असप्पुरिसभत्ती (सब्बत्थ) होति, असप्पुरिसचिन्ती होति, असप्पुरिसमन्ती होति, असप्पुरिसवाचो होति, असप्पुरिसकम्मन्तो होति, असप्पुरिसदिट्ठि असप्पुरिसदिट्ठी (सब्बत्थ) होति; असप्पुरिसदानं देति’’।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो अस्सद्धम्मसमन्नागतो होति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो अस्सद्धो होति, अहिरिको होति, अनोत्तप्पी होति, अप्पस्सुतो होति , कुसीतो होति, मुट्ठस्सति होति, दुप्पञ्ञो होति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो अस्सद्धम्मसमन्नागतो होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसभत्ति होति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसस्स ये ते समणब्राह्मणा अस्सद्धा अहिरिका अनोत्तप्पिनो अप्पस्सुता कुसीता मुट्ठस्सतिनो दुप्पञ्ञा त्यास्स मित्ता होन्ति ते सहाया। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसभत्ति होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसचिन्ती होति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो अत्तब्याबाधायपि चेतेति, परब्याबाधायपि चेतेति, उभयब्याबाधायपि चेतेति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसचिन्ती होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसमन्ती होति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो अत्तब्याबाधायपि मन्तेति, परब्याबाधायपि मन्तेति, उभयब्याबाधायपि मन्तेति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसमन्ती होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसवाचो होति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो मुसावादी होति, पिसुणवाचो होति, फरुसवाचो होति , सम्फप्पलापी होति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसवाचो होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसकम्मन्तो होति? इध , भिक्खवे, असप्पुरिसो पाणातिपाती होति, अदिन्नादायी होति, कामेसुमिच्छाचारी होति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसकम्मन्तो होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसदिट्ठि होति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो एवंदिट्ठि एवंदिट्ठी (सी॰ पी॰), एवंदिट्ठिको (स्या॰ कं॰) होति – ‘नत्थि दिन्नं, नत्थि यिट्ठं, नत्थि हुतं, नत्थि सुकतदुक्कटानं सुक्कटदुक्कटानं (सी॰ पी॰) कम्मानं फलं विपाको, नत्थि अयं लोको, नत्थि परो लोको, नत्थि माता, नत्थि पिता, नत्थि सत्ता ओपपातिका, नत्थि लोके समणब्राह्मणा सम्मग्गता समग्गता (क॰) सम्मापटिपन्ना, ये इमञ्च लोकं परञ्च लोकं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेन्ती’ति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसदिट्ठि होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसदानं देति? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो असक्कच्चं दानं देति, असहत्था दानं देति, अचित्तीकत्वा दानं देति, अपविट्ठं दानं देति अनागमनदिट्ठिको दानं देति। एवं खो, भिक्खवे, असप्पुरिसो असप्पुरिसदानं देति।
‘‘सो, भिक्खवे, असप्पुरिसो एवं अस्सद्धम्मसमन्नागतो, एवं असप्पुरिसभत्ति, एवं असप्पुरिसचिन्ती, एवं असप्पुरिसमन्ती, एवं असप्पुरिसवाचो, एवं असप्पुरिसकम्मन्तो, एवं असप्पुरिसदिट्ठि; एवं असप्पुरिसदानं दत्वा कायस्स भेदा परं मरणा या असप्पुरिसानं गति तत्थ उपपज्जति। का च, भिक्खवे, असप्पुरिसानं गति? निरयो वा तिरच्छानयोनि वा।
९२. ‘‘जानेय्य नु खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसं – ‘सप्पुरिसो अयं भव’’’न्ति? ‘‘एवं , भन्ते’’। ‘‘साधु, भिक्खवे; ठानमेतं, भिक्खवे, विज्जति यं सप्पुरिसो सप्पुरिसं जानेय्य – ‘सप्पुरिसो अयं भव’न्ति। जानेय्य पन, भिक्खवे, सप्पुरिसो असप्पुरिसं – ‘असप्पुरिसो अयं भव’’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘साधु, भिक्खवे; एतम्पि खो, भिक्खवे, ठानं विज्जति यं सप्पुरिसो असप्पुरिसं जानेय्य – ‘असप्पुरिसो अयं भव’न्ति। सप्पुरिसो, भिक्खवे, सद्धम्मसमन्नागतो होति, सप्पुरिसभत्ति होति, सप्पुरिसचिन्ती होति, सप्पुरिसमन्ती होति, सप्पुरिसवाचो होति, सप्पुरिसकम्मन्तो होति, सप्पुरिसदिट्ठि होति; सप्पुरिसदानं देति’’।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सद्धम्मसमन्नागतो होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो सद्धो होति, हिरिमा होति, ओत्तप्पी होति, बहुस्सुतो होति, आरद्धवीरियो होति, उपट्ठितस्सति होति, पञ्ञवा होति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सद्धम्मसमन्नागतो होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसभत्ति होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसस्स ये ते समणब्राह्मणा सद्धा हिरिमन्तो ओत्तप्पिनो बहुस्सुता आरद्धवीरिया उपट्ठितस्सतिनो पञ्ञवन्तो त्यास्स मित्ता होन्ति, ते सहाया। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसभत्ति होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसचिन्ती होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो नेवत्तब्याबाधाय चेतेति, न परब्याबाधाय चेतेति, न उभयब्याबाधाय चेतेति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसचिन्ती होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसमन्ती होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो नेवत्तब्याबाधाय मन्तेति, न परब्याबाधाय मन्तेति, न उभयब्याबाधाय मन्तेति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसमन्ती होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसवाचो होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो मुसावादा पटिविरतो होति, पिसुणाय वाचाय पटिविरतो होति, फरुसाय वाचाय पटिविरतो होति, सम्फप्पलापा पटिविरतो होति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसवाचो होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसकम्मन्तो होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो पाणातिपाता पटिविरतो होति, अदिन्नादाना पटिविरतो होति, कामेसुमिच्छाचारा पटिविरतो होति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसकम्मन्तो होति।
‘‘कथञ्च , भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसदिट्ठि होति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो एवंदिट्ठि होति – ‘अत्थि दिन्नं, अत्थि यिट्ठं, अत्थि हुतं, अत्थि सुकतदुक्कटानं कम्मानं फलं विपाको, अत्थि अयं लोको , अत्थि परो लोको, अत्थि माता, अत्थि पिता, अत्थि सत्ता ओपपातिका, अत्थि लोके समणब्राह्मणा सम्मग्गता सम्मापटिपन्ना ये इमञ्च लोकं परञ्च लोकं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेन्ती’ति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसदिट्ठि होति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसदानं देति? इध, भिक्खवे, सप्पुरिसो सक्कच्चं दानं देति, सहत्था दानं देति, चित्तीकत्वा दानं देति, अनपविट्ठं दानं देति, आगमनदिट्ठिको दानं देति। एवं खो, भिक्खवे, सप्पुरिसो सप्पुरिसदानं देति।
‘‘सो, भिक्खवे, सप्पुरिसो एवं सद्धम्मसमन्नागतो, एवं सप्पुरिसभत्ति, एवं सप्पुरिसचिन्ती, एवं सप्पुरिसमन्ती, एवं सप्पुरिसवाचो, एवं सप्पुरिसकम्मन्तो, एवं सप्पुरिसदिट्ठि; एवं सप्पुरिसदानं दत्वा कायस्स भेदा परं मरणा या सप्पुरिसानं गति तत्थ उपपज्जति। का च, भिक्खवे, सप्पुरिसानं गति? देवमहत्तता वा मनुस्समहत्तता वा’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
चूळपुण्णमसुत्तं निट्ठितं दसमं।
देवदहवग्गो निट्ठितो पठमो।