✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

धम्म विपश्यना

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १५ मिनट

सूत्र परिचय

कई संकेत बताते हैं कि यह सूत्र अपेक्षाकृत बाद का है। इसका कोई समानांतर सूत्र नहीं मिलता, विवेचन असामान्य रूप से विस्तृत है, संपादन में कुछ असहजता दिखाई देती है, और इसमें कई ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो प्रायः बाद के जोड़-तोड़ वाले ग्रंथों में ही मिलते हैं। इस कारण यह सूत्र न तो प्रारंभिक सूत्रों से पूरी तरह मेल खाता है, न ही बहुत पश्चात के अभिधम्म ग्रंथों से; बल्कि यह दोनों के बीच एक सेतु के रूप में खड़ा दिखाई देता है।

इस सूत्र में भगवान ने आयुष्मान सारिपुत्त के अरहंतपद प्राप्ति का आंतरिक विवरण दिया है—जहाँ सारिपुत्त भन्ते क्रमशः धम्मों की विपश्यना करते हुए समाधि की सभी अवस्थाओं से गुजरते हैं और अंततः निरोध-समापत्ति तक पहुँचते हैं। किन्तु, मज्झिमनिकाय ७४ में उनका अरहंतपद प्राप्ति का वर्णन उस संदर्भ में आता है, जब वे भगवान के पीछे खड़े होकर पंखा झलते हुए धम्म सुन रहे थे, और भगवान उनके भांजे, घुमक्कड़ दीघनख, को उपदेश दे रहे थे।

इस प्रकार ये दोनों सूत्र सारिपुत्त भन्ते की मुक्ति-कथा को दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से प्रस्तुत करते हैं—एक बाहरी और एक भीतरी। लेकिन फिर यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति शारीरिक गतिविधि करते हुए (जैसे पंखा झलना) या धम्म सुनते हुए चतुर्थ ध्यान और अरूप आयामों की प्राप्ति कर सकता है। इसका सीधा उत्तर है—नहीं। ऐसा संभव नहीं है। यदि यह सूत्र-वर्णन सच मान लिया जाए (जिसकी संभावना मुझे कम लगती है), तो यह मानना पड़ेगा कि उस समय उनका पंखा झलना और धम्म सुनना, दोनों ही रुक गए होंगे।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”

“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—

“सारिपुत्त पंडित है, भिक्षुओं। सारिपुत्त महाप्रज्ञा वाला है। सारिपुत्त विस्तृत प्रज्ञा वाला है। सारिपुत्त हास्य (=हँसाने लायक सरल?) प्रज्ञा वाला है। सारिपुत्त तेज प्रज्ञा वाला है। सारिपुत्त तीक्ष्ण प्रज्ञा वाला है। सारिपुत्त भेदक प्रज्ञा वाला है।

सारिपुत्त ने आधे महीने तक एक-एक करके स्वभाव की विपश्यना (“धम्मविपस्सना”) को अंतर्दृष्टि से देखा। और, भिक्षुओं, इस प्रकार सारिपुत्त ने एक-एक करके स्वभाव की विपश्यना की।

प्रथम-ध्यान

भिक्षुओं, सारिपुत्त ने कामुकता से निर्लिप्त होकर, अकुशल-स्वभाव से निर्लिप्त होकर, सोच एवं विचार के साथ निर्लिप्तता से उपजे प्रीति और सुखपूर्ण प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर विहार किया।

तब प्रथम-ध्यान में जो तत्व होते हैं—सोच (“वितक्क”), विचार, प्रीति (“पीति”), सुख, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा (“चेतना”), चित्त, चाहत (“छन्द”), निर्णय (“अधिमोक्ख”), वीर्य (“वीरिय”), स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग (“मनसिकार” =ध्यान देना)—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर (पता चला कि) वह (निकलने का मार्ग उपलब्ध) था।

द्वितीय-ध्यान

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने सोच एवं विचार के रुकने पर, भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर, बिना-सोच, बिना-विचार, समाधि से उपजे प्रीति और सुखपूर्ण द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर विहार किया।

तब द्वितीय-ध्यान में जो तत्व होते हैं—भीतर आश्वस्तता, प्रीति, सुख, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा, चित्त, चाहत, निर्णय, वीर्य, स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

तृतीय-ध्यान

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं, वह ऐसे तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर विहार किया।

तब तृतीय-ध्यान में जो तत्व होते हैं—सुख, स्मृति, सचेतता, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा, चित्त, चाहत, निर्णय, वीर्य, स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

चतुर्थ-ध्यान

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते विहार किया।

तब चतुर्थ-ध्यान में जो तत्व होते हैं—उपेक्षा, नदुखद-नसुखद वेदना, प्रशान्ति (“पस्सद्धत्ता”), चित्त की भोग-विहीनता (“अनाभोग” =अनिच्छा) परिशुद्ध स्मृति, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा, चित्त, चाहत, निर्णय, वीर्य, स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

आकाश आयाम

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने रूप संज्ञा पूर्णतः लाँघकर, विरोधी संज्ञा ओझल होने पर, विविध संज्ञा पर ध्यान न देकर—‘आकाश अनन्त है’ (देखते हुए) ‘अनन्त आकाश आयाम’ में प्रवेश पाकर विहार किया।

तब आकाश आयाम में जो तत्व होते हैं—विज्ञान आयाम संज्ञा, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा, चित्त, चाहत, निर्णय, वीर्य, स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

विज्ञान आयाम

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने अनन्त आकाश आयाम पूर्णतः लाँघकर, ‘विज्ञान अनन्त है’ (देखते हुए) ‘अनन्त विज्ञान आयाम’ में प्रवेश पाकर विहार किया।

तब चतुर्थ-ध्यान में जो तत्व होते हैं—विज्ञान आयाम संज्ञा, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा, चित्त, चाहत, निर्णय, वीर्य, स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

शून्य आयाम

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने अनन्त विज्ञान आयाम पूर्णतः लाँघकर, ‘कुछ नहीं है’ (देखते हुए) ‘सूने आयाम’ में प्रवेश पाकर विहार किया।

तब चतुर्थ-ध्यान में जो तत्व होते हैं—शून्य आयाम संज्ञा, चित्त की एकाग्रता। और संपर्क, वेदना, संज्ञा, इरादा, चित्त, चाहत, निर्णय, वीर्य, स्मृति, उपेक्षा, और ध्यान-योग—उसने इन सभी तत्वों की एक-एक करके समीक्षा की। उसे वे तत्व उगते हुए पता चले, ठहरते हुए पता चले, अस्त होते हुए पता चले। उसे ज्ञात हुआ कि—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने सुने आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, न-संज्ञा-न-असंज्ञा (=न बोधगम्य, न अबोधगम्य) आयाम में प्रवेश पाकर विहार किया।

और फिर, वह उस अवस्था से स्मृतिमान निकला। 1 और, तब उस अवस्था से स्मृतिमान निकलने पर अतीत में जो तत्व निरुद्ध हुए थे, परिवर्तित हुए थे, उन तत्वों को ठीक से देखा—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई था।

निरोध अवस्था

आगे, भिक्षुओं, सारिपुत्त ने न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, संज्ञा वेदना निरोध अवस्था में प्रवेश पाकर विहार किया। प्रज्ञा से देखने पर उसके आस्रव समाप्त हुए।

और फिर, वह उस अवस्था से स्मृतिमान निकला। और, तब उस अवस्था से स्मृतिमान निकलने पर अतीत में जो तत्व निरुद्ध हुए थे, परिवर्तित हुए थे, उन तत्वों को ठीक से देखा—‘न होने पर वे तत्व किस प्रकार प्रकटते हैं। और होने पर किस प्रकार अस्त होते हैं।’ 2

तब उन तत्वों से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, उसने मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार रहा। तब उसे ज्ञात हुआ कि ‘इसके आगे निकलने का मार्ग नहीं है!’ और, विकसित करने पर वह वाकई नहीं था।

प्रशंसा

भिक्षुओं, यदि किसी के बारे में सम्यक रूप से कहा जाए कि—“आर्य शील में महारत और परमता (“पारमि”) 3 प्राप्त है, आर्य समाधि में महारत और परमता प्राप्त है, आर्य प्रज्ञा में महारत और परमता प्राप्त है, आर्य विमुक्ति में महारत और परमता प्राप्त है”—तब ऐसा सारिपुत्त के बारे में सम्यक रूप से कहा जा सकता है।

और, भिक्षुओं, यदि किसी के बारे में सम्यक रूप से कहा जाए कि—“भगवान का सच्चा पुत्र, भगवान के मुख से जन्मा, धम्म से जन्मा, धम्म से निर्मित, धम्म-वारिस, आमिष-वारिस नहीं”—तब ऐसा सारिपुत्त के बारे में सम्यक रूप से कहा जा सकता है।

सारिपुत्त ही, भिक्षुओं, तथागत के द्वारा घुमाए अनुत्तर धम्मचक्र को सम्यक रूप से घुमाते जा रहा है।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. ध्यान दें कि इससे पहले की हर समाधि अवस्था में सारिपुत्त भन्ते उसी अवस्था में रहते हुए अलग-अलग तत्वों की समीक्षा कर पा रहे थे। लेकिन इस अवस्था में, और इसके आगे भी, वे यह काम उससे बाहर निकलने के बाद ही कर पाते हैं। इस अंतर को अंगुत्तरनिकाय ९.३६ में समझाया गया है, जहाँ कहा गया है कि ‘शून्य आयाम’ तक की सारी अवस्थाएँ “संज्ञा पर आधारित उपलब्धियाँ” हैं। जबकि ‘न-संज्ञा-न-असंज्ञा का आयाम’ और ‘निरोध अवस्था’ वही भिक्षु ठीक तरह से समझा सकते हैं जो ध्यान में अत्यंत पारंगत हों और समाधि में प्रवेश करने तथा उससे बाहर आने में निपुण हों। ↩︎

  2. यह स्पष्ट नहीं है कि यहाँ किस बात की ओर संकेत किया गया है, क्योंकि निरोध अवस्था में कोई भी मानसिक अवस्था न तो उत्पन्न होती है और न ही समाप्त होती है। अट्ठकथा के अनुसार इसका संदर्भ या तो वहाँ उपस्थित भौतिक अवस्थाओं से है (अर्थात कर्म से उत्पन्न शरीर), या फिर पूर्ववर्ती समाधि की अवस्थाओं से। मुझे लगता है कि यह केवल संपादकीय स्तर पर हुई एक चूक हो। ↩︎

  3. यहाँ पारमि शब्द का दुर्लभ प्रयोग किया गया है—आर्य शील-समाधि-प्रज्ञा-विमुक्ति में महारत और पारमि, अर्थात “अरहत्व अवस्था” के संदर्भ में। पारमि या “परमता”, प्रारंभिक बौद्ध साहित्य के चार मुख्य निकायों में केवल तीन-चार संदर्भों में मिलता है—मज्झिमनिकाय ७७, अंगुत्तरनिकाय ५.११, और मज्झिमनिकाय १०० के साथ यहाँ। इन चारों संदर्भों में, इसका अर्थ किसी गुण के पूर्ण रूप से विकसित होने से है, और यह उन “दस पारमियों” का संदर्भ नहीं देता, जिन्हें भगवान के परिनिर्वाण के कई शताब्दियों बाद सूचीबद्ध किया गया। पारमि के बारे में जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें, और यह मार्गदर्शिका भी। ↩︎

पालि

९३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –

‘‘पण्डितो, भिक्खवे, सारिपुत्तो; महापञ्‍ञो, भिक्खवे, सारिपुत्तो; पुथुपञ्‍ञो, भिक्खवे, सारिपुत्तो; हासपञ्‍ञो हासुपञ्‍ञो (सी॰ पी॰), भिक्खवे, सारिपुत्तो; जवनपञ्‍ञो, भिक्खवे, सारिपुत्तो; तिक्खपञ्‍ञो, भिक्खवे, सारिपुत्तो; निब्बेधिकपञ्‍ञो, भिक्खवे, सारिपुत्तो; सारिपुत्तो, भिक्खवे, अड्ढमासं अनुपदधम्मविपस्सनं विपस्सति। तत्रिदं, भिक्खवे, सारिपुत्तस्स अनुपदधम्मविपस्सनाय होति।

९४. ‘‘इध, भिक्खवे, सारिपुत्तो विविच्‍चेव कामेहि विविच्‍च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्‍कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च पठमे झाने पठमज्झाने (क॰ सी॰ पी॰ क॰) धम्मा वितक्‍को च विचारो च पीति च सुखञ्‍च चित्तेकग्गता च, फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति। त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो अप्पटिबन्धो (क॰) विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स अत्थितेवस्स (सी॰ पी॰) होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो वितक्‍कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्‍कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च दुतिये झाने धम्मा – अज्झत्तं सम्पसादो च पीति च सुखञ्‍च चित्तेकग्गता च, फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति। त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो पीतिया च विरागा उपेक्खको च विहरति सतो च सम्पजानो, सुखञ्‍च कायेन पटिसंवेदेति। यं तं अरिया आचिक्खन्ति – ‘उपेक्खको सतिमा सुखविहारी’ति ततियं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च ततिये झाने धम्मा – सुखञ्‍च सति च सम्पजञ्‍ञञ्‍च चित्तेकग्गता च, फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति, त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो सुखस्स च पहाना दुक्खस्स च पहाना पुब्बेव सोमनस्सदोमनस्सानं अत्थङ्गमा अदुक्खमसुखं उपेक्खासतिपारिसुद्धिं चतुत्थं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च चतुत्थे झाने धम्मा – उपेक्खा अदुक्खमसुखा वेदना पस्सद्धत्ता चेतसो अनाभोगो सतिपारिसुद्धि चित्तेकग्गता च, फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति। त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो सब्बसो रूपसञ्‍ञानं समतिक्‍कमा पटिघसञ्‍ञानं अत्थङ्गमा नानत्तसञ्‍ञानं अमनसिकारा ‘अनन्तो आकासो’ति आकासानञ्‍चायतनं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च आकासानञ्‍चायतने धम्मा – आकासानञ्‍चायतनसञ्‍ञा च चित्तेकग्गता च फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति। त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो सब्बसो आकासानञ्‍चायतनं समतिक्‍कम्म ‘अनन्तं विञ्‍ञाण’न्ति विञ्‍ञाणञ्‍चायतनं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च विञ्‍ञाणञ्‍चायतने धम्मा – विञ्‍ञाणञ्‍चायतनसञ्‍ञा च चित्तेकग्गता च, फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति। त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो सब्बसो विञ्‍ञाणञ्‍चायतनं समतिक्‍कम्म ‘नत्थि किञ्‍ची’ति आकिञ्‍चञ्‍ञायतनं उपसम्पज्‍ज विहरति। ये च आकिञ्‍चञ्‍ञायतने धम्मा – आकिञ्‍चञ्‍ञायतनसञ्‍ञा च चित्तेकग्गता च, फस्सो वेदना सञ्‍ञा चेतना चित्तं छन्दो अधिमोक्खो वीरियं सति उपेक्खा मनसिकारो – त्यास्स धम्मा अनुपदववत्थिता होन्ति। त्यास्स धम्मा विदिता उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। सो एवं पजानाति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

९५. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो सब्बसो आकिञ्‍चञ्‍ञायतनं समतिक्‍कम्म नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनं उपसम्पज्‍ज विहरति। सो ताय समापत्तिया सतो वुट्ठहति। सो ताय समापत्तिया सतो वुट्ठहित्वा ये धम्मा ये ते धम्मा (सी॰) अतीता निरुद्धा विपरिणता ते धम्मे समनुपस्सति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘अत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा अत्थित्वेवस्स होति।

९६. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सारिपुत्तो सब्बसो नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतनं समतिक्‍कम्म सञ्‍ञावेदयितनिरोधं उपसम्पज्‍ज विहरति। पञ्‍ञाय चस्स दिस्वा आसवा परिक्खीणा होन्ति। सो ताय समापत्तिया सतो वुट्ठहति। सो ताय समापत्तिया सतो वुट्ठहित्वा ये धम्मा अतीता निरुद्धा विपरिणता ते धम्मे समनुपस्सति – ‘एवं किरमे धम्मा अहुत्वा सम्भोन्ति, हुत्वा पटिवेन्ती’ति। सो तेसु धम्मेसु अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरति। सो ‘नत्थि उत्तरि निस्सरण’न्ति पजानाति। तब्बहुलीकारा नत्थित्वेवस्स होति।

९७. ‘‘यं खो तं, भिक्खवे, सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियस्मिं सीलस्मिं, वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियस्मिं समाधिस्मिं, वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियाय पञ्‍ञाय , वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियाय विमुत्तिया’ति, सारिपुत्तमेव तं सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियस्मिं सीलस्मिं, वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियस्मिं समाधिस्मिं, वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियाय पञ्‍ञाय, वसिप्पत्तो पारमिप्पत्तो अरियाय विमुत्तिया’ति। यं खो तं, भिक्खवे , सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘भगवतो पुत्तो ओरसो मुखतो जातो धम्मजो धम्मनिम्मितो धम्मदायादो नो आमिसदायादो’ति, सारिपुत्तमेव तं सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘भगवतो पुत्तो ओरसो मुखतो जातो धम्मजो धम्मनिम्मितो धम्मदायादो नो आमिसदायादो’ति। सारिपुत्तो, भिक्खवे, तथागतेन अनुत्तरं धम्मचक्‍कं पवत्तितं सम्मदेव अनुप्पवत्तेती’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

अनुपदसुत्तं निट्ठितं पठमं।

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