
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”
“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“जब, भिक्षुओं, कोई भिक्षु प्रत्यक्ष-ज्ञान (“अञ्ञा” =अरहंतपद) घोषित करता है—‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं’—तब उस भिक्षु की बात को न स्वीकारना चाहिए, न ही नकारना चाहिए। बल्कि, न स्वीकार कर, न नकार कर, उससे पूछना चाहिए—
‘मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, वे सम्यक रूप से चार प्रकार के व्यवहार बताते हैं। कौन से चार?
—ये चार प्रकार के व्यवहार, मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, सम्यक रूप से बताते हैं। इन चार प्रकार के व्यवहारों को कैसे जानते हुए, कैसे देखते हुए, आयुष्मान का चित्त अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त है?’
तब, भिक्षुओं, जो क्षिणास्रव भिक्षु, जिसने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हो, कर्तव्य समाप्त किया हो, बोझ को नीचे रखा हो, परम-ध्येय प्राप्त किया हो, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हो, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हुआ हो—उसका धम्मानुसार उत्तर इस प्रकार होगा—
‘मित्र, मैं ‘देखे हुए’ से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार करता हूँ। मित्र, मैं ‘सुने’ हुए से… ‘अनुभव हुए’ से… ‘जाने हुए’ से न आकर्षित होकर, न प्रतिकर्षित होकर, स्वतंत्र, निर्लिप्त, विमुक्त, बिना जुड़े, मर्यादापूर्ण चित्त के साथ विहार करता हूँ। इस प्रकार जानते हुए, इस प्रकार देखते हुए, मित्र, मैं चार प्रकार के व्यवहारों में अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त चित्त का हूँ।’
तब, भिक्षुओं, उस भिक्षु की बात को ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करना चाहिए। 2 ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करने के पश्चात फिर अगला प्रश्न पूछना चाहिए—
‘मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, वे सम्यक रूप से पाँच प्रकार की आसक्ति बताते हैं। कौन सी पाँच?
—ये पाँच प्रकार की आसक्तियाँ, मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, सम्यक रूप से बताते हैं। इन पाँच प्रकार की आसक्तियों को कैसे जानते हुए, कैसे देखते हुए, आयुष्मान का चित्त अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त है?’
तब, भिक्षुओं, जो क्षिणास्रव भिक्षु, जिसने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हो, कर्तव्य समाप्त किया हो, बोझ को नीचे रखा हो, परम-ध्येय प्राप्त किया हो, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हो, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हुआ हो—उसका धम्मानुसार उत्तर इस प्रकार होगा—
‘मित्र, मैंने रूप को निर्बल, बेरंग 3 और अविश्वसनीय जानने पर, जो रूप के प्रति आकर्षण और आसक्ति थी, मानस के संकल्प और झुकाव की सुप्त प्रवृत्ति (“चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया”) थी, उनके समाप्त होने, विराग होने, निरोध होने, परित्याग होने और छोड़े जाने से, मैं चित्त को विमुक्त जानता हूँ।
मित्र, मैंने वेदना को… संज्ञा को… संस्कार को… विज्ञान को निर्बल, बेरंग और अविश्वसनीय जानने पर, जो विज्ञान के प्रति आकर्षण और आसक्ति थी, मानस के संकल्प और झुकाव की सुप्त प्रवृत्ति थी, उनके समाप्त होने, विराग होने, निरोध होने, परित्याग होने और छोड़े जाने से, मैं चित्त को विमुक्त जानता हूँ।
इस प्रकार जानते हुए, इस प्रकार देखते हुए, मित्र, मैं पाँच प्रकार की आसक्तियों में अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त चित्त का हूँ।’
तब, भिक्षुओं, उस भिक्षु की बात को ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करना चाहिए। ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करने के पश्चात फिर अगला प्रश्न पूछना चाहिए—
‘मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, वे छह धातुओं को सम्यक रूप से बताते हैं। कौन से छह?
—ये छह प्रकार की धातुएँ, मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, सम्यक रूप से बताते हैं। इन छह प्रकार की धातुओं को कैसे जानते हुए, कैसे देखते हुए, आयुष्मान का चित्त अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त है?’
तब, भिक्षुओं, जो क्षिणास्रव भिक्षु, जिसने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हो, कर्तव्य समाप्त किया हो, बोझ को नीचे रखा हो, परम-ध्येय प्राप्त किया हो, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हो, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हुआ हो—उसका धम्मानुसार उत्तर इस प्रकार होगा—
‘मित्र, मैंने पृथ्वी धातु को आत्मा के रूप में नहीं लिया, न ही आत्मा को पृथ्वी धातु का आधार दिया। तब, जो पृथ्वी धातु के प्रति आकर्षण और आसक्ति थी, मानस के संकल्प और झुकाव की सुप्त प्रवृत्ति थी, उनके समाप्त होने, विराग होने, निरोध होने, परित्याग होने और छोड़े जाने से, मैं चित्त को विमुक्त जानता हूँ।
मित्र, मैंने जल धातु को… अग्नि धातु को… वायु धातु को… आकाश धातु को… विज्ञान धातु को आत्मा के रूप में नहीं लिया, न ही आत्मा को विज्ञान धातु का आधार दिया। तब, जो विज्ञान धातु के प्रति आकर्षण और आसक्ति थी, मानस के संकल्प और झुकाव की सुप्त प्रवृत्ति थी, उनके समाप्त होने, विराग होने, निरोध होने, परित्याग होने और छोड़े जाने से, मैं चित्त को विमुक्त जानता हूँ।
इस प्रकार जानते हुए, इस प्रकार देखते हुए, मित्र, मैं छह प्रकार की धातुओं में अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त चित्त का हूँ।’
तब, भिक्षुओं, उस भिक्षु की बात को ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करना चाहिए। ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करने के पश्चात फिर अगला प्रश्न पूछना चाहिए—
‘मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, वे छह भीतरी और बाहरी आयामों को सम्यक रूप से बताते हैं। कौन से छह?
—ये छह प्रकार के भीतरी और बाहरी आयाम, मित्र, भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, सम्यक रूप से बताते हैं। इन छह प्रकार के भीतरी और बाहरी आयामों को कैसे जानते हुए, कैसे देखते हुए, आयुष्मान का चित्त अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त है?’
तब, भिक्षुओं, जो क्षिणास्रव भिक्षु, जिसने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हो, कर्तव्य समाप्त किया हो, बोझ को नीचे रखा हो, परम-ध्येय प्राप्त किया हो, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हो, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हुआ हो—उसका धम्मानुसार उत्तर इस प्रकार होगा—
‘मित्र, मैंने आँखें, रूप, आँखों के विज्ञान, और आँखों के विज्ञान से जानने वाली बातों 4 के प्रति जो भी चाहत, दिलचस्पी, मजा या तृष्णा थी, आकर्षण और आसक्ति थी, मानस के संकल्प और झुकाव की सुप्त प्रवृत्ति थी, उनके समाप्त होने, विराग होने, निरोध होने, परित्याग होने और छोड़े जाने से, मैं चित्त को विमुक्त जानता हूँ।
मित्र, मैंने कान और आवाज… नाक और गंध… जीभ और स्वाद… काया और संस्पर्श… मन और स्वभाव, मन के विज्ञान, और मन के विज्ञान से जानने वाली बातों के प्रति जो भी चाहत, दिलचस्पी, मजा या तृष्णा थी, आकर्षण और आसक्ति थी, मानस के संकल्प और झुकाव की सुप्त प्रवृत्ति थी, उनके समाप्त होने, विराग होने, निरोध होने, परित्याग होने और छोड़े जाने से, मैं चित्त को विमुक्त जानता हूँ।
इस प्रकार जानते हुए, इस प्रकार देखते हुए, मित्र, मैं छह प्रकार की धातुओं में अनासक्त होकर आस्रवों से विमुक्त चित्त का हूँ।’
तब, भिक्षुओं, उस भिक्षु की बात को ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करना चाहिए। ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करने के पश्चात फिर अगला प्रश्न पूछना चाहिए—
‘किन्तु, आयुष्मान कैसे जानते हैं, कैसे देखते हैं कि वे इस विज्ञानपूर्ण काया और बाहरी सभी प्रकार की छाप (“निमित्त”) के प्रति मैं/मेरे के अहंभाव अनुशय को जड़ से उखाड़ चुके हैं?’
तब, भिक्षुओं, जो क्षिणास्रव भिक्षु, जिसने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हो, कर्तव्य समाप्त किया हो, बोझ को नीचे रखा हो, परम-ध्येय प्राप्त किया हो, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हो, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हुआ हो—उसका धम्मानुसार उत्तर इस प्रकार होगा—
‘मित्र, जब मैं पहले गृहस्थी था, तब अविद्या में पड़ा था। तब तथागत या तथागत के श्रावक ने धम्म बताया। उस धम्म को सुनने पर मुझे तथागत के प्रति श्रद्धा प्राप्त हुई। उस श्रद्धा के प्राप्त होने पर मुझे लगा, “गृहस्थ जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु प्रवज्या, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य निभाना कठिन है, जो शुद्ध शंख जैसा उज्ज्वल हो! क्यों न मैं सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो जाऊँ?”
फिर मैंने समय पाकर, थोड़ी या अधिक धन-संपत्ति त्यागकर, छोटा या बड़ा परिवार त्यागकर, सिरदाढ़ी मुंडवा कर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रजित हो गया।
• प्रव्रजित होकर, मित्र, मैंने भिक्षुओं की शिक्षा और आजीविका से संपन्न होकर हिंसा त्यागकर जीवहत्या से विरत रहा—डंडा और शस्त्र फेंक चुका, शर्मिला और दयावान, समस्त जीवहित के प्रति करुणामयी।
• मैंने ‘न सौपी चीज़ें’ त्यागकर चोरी से विरत रहा—मात्र सौपी चीज़ें ही उठायी, स्वीकार की। पावन जीवन जीया, चोरी-चुपके नहीं।
• मैंने ब्रह्मचर्य को धारण कर अब्रह्मचर्य से विरत रहा—‘देहाती’ मैथुनधम्म से विरत!
• मैंने झूठ बोलना त्यागकर असत्यवचन से विरत रहा। मैं सत्यवादी, सत्य का पक्षधर, दृढ़ और भरोसेमंद बना; दुनिया को ठगा नहीं।
• मैंने विभाजित करने वाली बातें त्यागकर फूट डालनेवाले वचन से विरत रहा। यहाँ सुनकर वहाँ नहीं बताया, ताकि वहाँ दरार पड़े। वहाँ सुनकर यहाँ नहीं बताया, ताकि यहाँ दरार पड़े। बल्कि मैंने बटे हुए लोगों का मेल कराया, साथ रहते लोगों को जोड़ा, एकता चाहा, आपसी भाईचारे में प्रसन्न और ख़ुश हुआ; ‘सामंजस्यता बढ़े’ ऐसे बोल बोले।
• मैंने तीखा बोलना त्यागकर कटु वचन से विरत रहा। मैंने ऐसे मीठे बोल बोले—जो राहत दे, कर्णमधुर लगे, हृदय छू ले, स्नेहपूर्ण हो, सौम्य हो, अधिकांश लोगों को अनुकूल और स्वीकार्य लगे।
• मैंने बक़वास त्यागकर व्यर्थ वचन से विरत रहा। मैंने समयानुकूल बोला, तथ्यात्मक बोला, अर्थपूर्ण बोला, धम्मानुकूल बोला, विनयानुकूल बोला; ‘बहुमूल्य लगे’ ऐसे सटीक वचन मैंने बोला—तर्क के साथ, नपे-तुले शब्दों में, सही समय पर, सही दिशा में, ध्येय के साथ।
• मैंने बीज और पौधों का जीवनाश करना त्यागा।…
• मैंने दिन में एक-बार भोजन किया—रात्रिभोज व विकालभोज से विरत।…
• मैं नृत्य, गीत, वाद्यसंगीत तथा मनोरंजन से विरत रहा।…
• मैं मालाएँ, गन्ध, लेप, सुडौलता-लानेवाले तथा अन्य सौंदर्य-प्रसाधन से विरत रहा।…
• मैं बड़े विलासी आसन और पलंग का उपयोग करने से विरत रहा।…
• मैं स्वर्ण व रुपये स्वीकारने से विरत रहा।…
• मैं कच्चा अनाज… कच्चा माँस… स्त्री व कुमारी… दासी व दास… भेड़ व बकरी… मुर्गी व सूवर… हाथी, गाय, घोड़ा, खच्चर… ख़ेत व संपत्ति स्वीकारने से विरत रहा।…
• मैं दूत का काम… ख़रीद-बिक्री… भ्रामक तराज़ू, नाप, मानदंडों द्वारा ठगना… घूसख़ोरी, ठगना, ज़ाली काम, छलकपट… हाथपैर काटने, पीटने बाँधने, लूट डाका व हिंसा करने से विरत रहा।
मैं शरीर ढकने के लिए चीवर और पेट भरने के लिए भिक्षा पर संतुष्ट रहा। मैं जहाँ भी जाता, अपनी सभी मूल आवश्यकताओं को साथ लेकर जाता। जैसे पक्षी जहाँ भी जाता है, मात्र अपने पंखों को लेकर उड़ता है। उसी तरह, मैं शरीर ढकने के लिए चीवर और पेट भरने के लिए भिक्षा पर संतुष्ट रहा। मैंने ऐसे आर्य शीलस्कन्ध से संपन्न होकर भीतर निष्पाप सुख का अनुभव किया।
मैंने ऐसे आर्यसँवर से संपन्न होकर भीतर निष्पाप सुख का अनुभव किया।
मैं आगे बढ़ते और लौट आते सचेत हुआ। मैं नज़र टिकाते और नज़र हटाते सचेत हुआ। मैं (अंग) सिकोड़ते और पसारते हुए सचेत हुआ। मैं संघाटी, पात्र और चीवर धारण करते हुए सचेत हुआ। मैं खाते, पीते, चबाते, स्वाद लेते हुए सचेत हुआ। मैं पेशाब और शौच करते हुए सचेत हुआ। मैं चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, मौन होते हुए सचेत हुआ।
इस तरह मैंने आर्य शीलस्कन्ध से संपन्न होकर, आर्य संतुष्टि से संपन्न होकर, इंद्रियों पर आर्य सँवर से संपन्न होकर, आर्य स्मृति और सचेतता से संपन्न होकर एकांतवास ढूँढा—जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर। भिक्षाटन से लौटकर भोजन के पश्चात, मैंने पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठा और स्मृति आगे लाया।
मैं इन पाँच व्यवधानों (“नीवरण”) को हटा दिया, ऐसे चित्त के उपक्लेश जो प्रज्ञा को दुर्बल बनाते हैं।
(१) तब, मित्र, मैं कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त — वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
(२) आगे, मित्र, मैं वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
(३) आगे, मित्र, मैं प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करते रहा। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं, मैं ऐसे तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
(४) आगे, मित्र, मैं सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करते रहा।
आगे, मित्र, जब मेरा चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो गया, तब मैंने उस चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाया। 5 तब ‘दुःख ऐसा है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘दुःख की उत्पत्ति ऐसी है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘दुःख का निरोध ऐसा है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘दुःख का निरोध-मार्ग ऐसा है’, मुझे यथास्वरूप पता चला।
‘आस्रव ऐसा है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘आस्रव की उत्पत्ति ऐसी है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘आस्रव का निरोध ऐसा है’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘आस्रव का निरोध-मार्ग ऐसा है’, मुझे यथास्वरूप पता चला।
इस तरह जानने से, देखने से, मेरा चित्त काम-आस्रव से विमुक्त हुआ, भव-आस्रव से विमुक्त हुआ, अविद्या-आस्रव से विमुक्त हुआ। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न हुआ, ‘विमुक्त हुआ!’ मुझे पता चला, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’
इस प्रकार जानते हुए, इस प्रकार देखते हुए, मित्र, मैंने इस विज्ञानपूर्ण काया और बाहरी सभी प्रकार की छाप के प्रति मैं/मेरे के अहंभाव अनुशय को जड़ से उखाड़ दिया।’
तब, भिक्षुओं, उस भिक्षु की बात को ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करना चाहिए। ‘साधु’ कहकर अभिनंदन और अनुमोदन करने के पश्चात ऐसा कहना चाहिए—
‘हम भाग्यशाली हैं, मित्र! हम सौभाग्यशाली हैं, मित्र! जो मैंने तुम जैसे आयुष्मान सब्रह्मचारी को देखा!’”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया। 6
दिट्ठे दिट्ठवादिता, सुते सुतवादिता, मुते मुतवादिता, विञ्ञाते विञ्ञातवादिता—ये चारों वे माध्यम हैं जिनके द्वारा कोई व्यक्ति आध्यात्मिक सत्य को जानता और समझता है। इनका आशय छह इन्द्रियों से नहीं है; उनकी चर्चा आगे अलग से आती है। यहाँ ज़ोर इस बात पर है कि व्यक्ति उसी के बारे में बोलता है जिसे उसने स्वयं देखा, सुना, अनुभव किया या जाना हो। इन्हीं चार तरीकों से आध्यात्मिक सत्य का बोध होता है। ↩︎
इसलिए किसी भिक्षु के दावे पर सीधे अभिनंदन और अनुमोदन करना उचित नहीं है। सही रवैया यह है कि उससे प्रश्न पूछे जाएँ और केवल धम्मानुसार सही उत्तर पर ही अभिनंदन और अनुमोदन किया जाए। यदि अत्यधिक संदेह के कारण कोई धम्मानुसार उत्तर का सम्मान नहीं करता, तो वह भी अकुशल है। और यदि भिक्षु झूठ बोल रहा हो, तो वह उसका कर्म है, आपका नहीं—आप तो केवल धम्मानुसार सही उत्तर का सम्मान कर रहे हैं।
यह भी स्मरण रखना चाहिए कि भगवान बुद्ध को छोड़कर कोई भी यह निश्चित रूप से नहीं जान सकता कि कौन अरहंत है। कभी-कभी एक अरहंत भी दूसरे अरहंत को नहीं पहचान पाता। एक प्रसंग में सारिपुत्त भन्ते एक भिक्षु के अरहंत होने के दावे पर उससे प्रश्न करते हैं; उत्तर धम्मानुसार सही होने पर भी वे उस पर विश्वास नहीं करते, क्योंकि वह भिक्षु एकांतवास के बजाय उपासकों के घर अधिक जाता था। उसके व्यक्तित्व को देखकर संदेह करने के कारण बाद में सारिपुत्त भन्ते भगवान बुद्ध द्वारा फटकारे जाते हैं, क्योंकि वह भिक्षु वाकई एक अरहंत था। ↩︎
राग शब्द का अर्थ “दिलचस्पी” या अनुराग/अनुरक्ति भी होता है, और “रंग” भी। इसी वजह से उसका विपरीत विराग भी दोहरे अर्थ रखता है—एक ओर “वैराग्य” या “कोई दिलचस्पी नहीं”, और दूसरी ओर “बेरंग” या रूपक रूप में “फीका पड़ना / मिट जाना”।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र (२.१०.५८) में लेखन के संदर्भ में इसका एक अच्छा उदाहरण मिलता है। उस समय ताड़पत्र पर लेखन की विधि यह थी कि पहले लेखनी से अक्षरों को खुरच कर उकेरा जाता था, फिर उन पर रंग या स्याही लगाई जाती थी। उसके बाद सतह को पोंछ दिया जाता था, जिससे स्याही सिर्फ़ उकेरे हुए अक्षरों में रह जाए। खराब लेखन का एक उदाहरण वहाँ विराग कहा गया है—अर्थात “बेरंग”। यानी स्याही ठीक से जमती नहीं, और केवल हल्की-सी, मुश्किल से दिखने वाली खुदाई ही बचती है। यहाँ विराग का अर्थ स्पष्ट रूप से वैराग्य नहीं, बल्कि रंग का न टिक पाना, उसका फीका पड़ जाना है। ↩︎
“आँखें, रूप, आँखों के विज्ञान, और आँखों के विज्ञान से जानने वाली बात” यह पूरा वाक्यांश बनावटी और अनावश्यक लगता है। क्योंकि ‘रूप’ ही तो “आँखों के विज्ञान से जानने वाली बात” हैं। जिस-जिस अन्य सूत्रों में यह बात आती है, वहाँ कभी “रूप” शामिल होते हैं (संयुक्तनिकाय ३५.२७, ३५.६५, ३५.६८) तो कभी नहीं होते (मज्झिमनिकाय १४४, संयुक्तनिकाय ३५.८७)। दिलचस्प बात यह है कि चीनी समानांतर सूत्र (मध्यम-आगम १८७) में यहाँ “रूप” का उल्लेख नहीं है, जिससे यह दोहराव नहीं होता। इसलिए अधिक संभावना यही लगती है कि मूल पालि सूत्र में ‘रूप’ शामिल न हो, और बाद में किसी पुराने संपादकीय चूक के कारण इसे जोड़ दिया गया। ↩︎
यहाँ सूत्र में पूर्वजन्मों के स्मरण और दिव्यचक्षु का जो सामान्य विवरण अक्सर मिलता है, उसे छोड़ दिया गया है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि संभव है सभी अरहंत भिक्षुओं को अपने पूर्वजन्मों का स्मरण न होता हो, और न ही सभी को दिव्यचक्षु का लाभ मिलता हो। लेकिन आवश्यक आस्रव-क्षय का ज्ञान अवश्य प्राप्त होता है। ↩︎
इस सूत्र का शीर्षक “छह तरह की शुद्धि” है, जबकि पालि संस्करण में केवल पाँच ही मिलते हैं। निश्चित है कि मूल पालि सूत्र का कुछ अंश खो गया है। तब इस पर अट्ठकथा दो-तीन तरह के स्पष्टीकरण देती है। उनमें से एक, “समुद्र-पार के थेरों” से जोड़ी गयी है, जो कहते हैं कि मूल सूत्र में चार आहारों से जुड़ा एक अंश भी होना चाहिए था। दिलचस्प बात यह है कि चीनी समानांतर पाठ में वाकई चारों आहार शामिल हैं (मध्यम-आगम १८७)। इससे “समुद्र-पार के थेरों” की बात सही साबित होती है। चार आहार के बारे में हमारी यह मार्गदर्शिका पढ़ें।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भले ही मूल सूत्र में कुछ हिस्सा खो गया हो, अबकी बार अट्ठकथा परंपरा में उसकी स्मृति ठीक-ठाक बनी रही। अब सवाल यह है कि ये “थेर” आखिर थे कौन। घटिकार सुत्त की अट्ठकथा बताती है कि ये समुद्र-पार के थेर “दस पारमियों” की शिक्षा देते थे। दस पारमियाँ महाविहार (या थेरवाद) परंपरा की खास पहचान हैं, क्योंकि दूसरी बौद्ध परंपराओं (जैसे महायान इत्यादि) में पारमियों की गिनती आम तौर पर दस नहीं मिलती, छह मिलती है। इसलिए यह मानना ठीक लगता है कि ये थेर किसी अलग संप्रदाय के नहीं, बल्कि थेरवादी ही थे। अमरावती और नागार्जुनकोंडा के शिलालेख बताते हैं कि आंध्र प्रदेश में महाविहार परंपरा का एक शाखा-विहार मौजूद था। संभव है कि ये थेर वहीं रहते और शिक्षा देते रहे हों। ↩︎
९८. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –
‘‘इध, भिक्खवे, भिक्खु अञ्ञं ब्याकरोति – ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्तायाति पजानामी’ति। तस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो भासितं नेव अभिनन्दितब्बं नप्पटिक्कोसितब्बं। अनभिनन्दित्वा अप्पटिक्कोसित्वा पञ्हो पुच्छितब्बो – ‘चत्तारोमे, आवुसो, वोहारा तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खाता। कतमे चत्तारो? दिट्ठे दिट्ठवादिता, सुते सुतवादिता, मुते मुतवादिता, विञ्ञाते विञ्ञातवादिता – इमे खो, आवुसो, चत्तारो वोहारा तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खाता। कथं जानतो पनायस्मतो, कथं पस्सतो इमेसु चतूसु वोहारेसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति? खीणासवस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो वुसितवतो कतकरणीयस्स ओहितभारस्स अनुप्पत्तसदत्थस्स परिक्खीणभवसंयोजनस्स सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स अयमनुधम्मो होति वेय्याकरणाय – ‘दिट्ठे खो अहं , आवुसो, अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरामि। सुते खो अहं, आवुसो…पे॰… मुते खो अहं, आवुसो… विञ्ञाते खो अहं, आवुसो, अनुपायो अनपायो अनिस्सितो अप्पटिबद्धो विप्पमुत्तो विसंयुत्तो विमरियादीकतेन चेतसा विहरामि। एवं खो मे, आवुसो, जानतो एवं पस्सतो इमेसु चतूसु वोहारेसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति। तस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दितब्बं अनुमोदितब्बं। ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उत्तरिं पञ्हो पुच्छितब्बो।
९९. ‘‘‘पञ्चिमे, आवुसो, उपादानक्खन्धा तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खाता। कतमे पञ्च? सेय्यथिदं – रूपुपादानक्खन्धो, वेदनुपादानक्खन्धो, सञ्ञुपादानक्खन्धो, सङ्खारुपादानक्खन्धो, विञ्ञाणुपादानक्खन्धो – इमे खो, आवुसो, पञ्चुपादानक्खन्धा तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खाता। कथं जानतो पनायस्मतो, कथं पस्सतो इमेसु पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति? खीणासवस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो वुसितवतो कतकरणीयस्स ओहितभारस्स अनुप्पत्तसदत्थस्स परिक्खीणभवसंयोजनस्स सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स अयमनुधम्मो होति वेय्याकरणाय – ‘रूपं खो अहं, आवुसो, अबलं विरागुनं विरागं (सी॰ पी॰), विरागुतं (टीका) अनस्सासिकन्ति विदित्वा ये रूपे उपायूपादाना उपयूपादाना (क॰) चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया तेसं खया विरागा निरोधा चागा पटिनिस्सग्गा विमुत्तं मे चित्तन्ति पजानामि। वेदनं खो अहं, आवुसो…पे॰… सञ्ञं खो अहं, आवुसो… सङ्खारे खो अहं, आवुसो… विञ्ञाणं खो अहं, आवुसो, अबलं विरागुनं अनस्सासिकन्ति विदित्वा ये विञ्ञाणे उपायूपादाना चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया तेसं खया विरागा निरोधा चागा पटिनिस्सग्गा विमुत्तं मे चित्तन्ति पजानामि। एवं खो मे, आवुसो, जानतो एवं पस्सतो इमेसु पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति। तस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दितब्बं, अनुमोदितब्बं। ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उत्तरिं पञ्हो पुच्छितब्बो।
१००. ‘‘‘छयिमा , आवुसो, धातुयो तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खाता। कतमा छ? पथवीधातु, आपोधातु, तेजोधातु, वायोधातु, आकासधातु, विञ्ञाणधातु – इमा खो, आवुसो, छ धातुयो तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खाता। कथं जानतो पनायस्मतो, कथं पस्सतो इमासु छसु धातूसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति? खीणासवस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो वुसितवतो कतकरणीयस्स ओहितभारस्स अनुप्पत्तसदत्थस्स परिक्खीणभवसंयोजनस्स सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स अयमनुधम्मो होति वेय्याकरणाय – ‘पथवीधातुं खो अहं, आवुसो, न अत्ततो उपगच्छिं, न च पथवीधातुनिस्सितं अत्तानं। ये च पथवीधातुनिस्सिता उपायूपादाना चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया तेसं खया विरागा निरोधा चागा पटिनिस्सग्गा विमुत्तं मे चित्तन्ति पजानामि। आपोधातुं खो अहं, आवुसो…पे॰… तेजोधातुं खो अहं, आवुसो… वायोधातुं खो अहं, आवुसो… आकासधातुं खो अहं, आवुसो… विञ्ञाणधातुं खो अहं, आवुसो, न अत्ततो उपगच्छिं, न च विञ्ञाणधातुनिस्सितं अत्तानं। ये च विञ्ञाणधातुनिस्सिता उपायूपादाना चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया तेसं खया विरागा निरोधा चागा पटिनिस्सग्गा विमुत्तं मे चित्तन्ति पजानामि। एवं खो मे, आवुसो, जानतो, एवं पस्सतो इमासु छसु धातूसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति। तस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दितब्बं, अनुमोदितब्बं। ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उत्तरिं पञ्हो पुच्छितब्बो।
१०१. ‘‘‘छ खो पनिमानि, आवुसो, अज्झत्तिकबाहिरानि अज्झत्तिकानि बाहिरानि (स्या॰ कं॰ पी॰) आयतनानि तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खातानि। कतमानि छ? चक्खु चेव रूपा च, सोतञ्च सद्दा च, घानञ्च गन्धा च, जिव्हा च रसा च, कायो च फोट्ठब्बा च, मनो च धम्मा च – इमानि खो, आवुसो, छ अज्झत्तिकबाहिरानि आयतनानि तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सम्मदक्खातानि। कथं जानतो पनायस्मतो, कथं पस्सतो इमेसु छसु अज्झत्तिकबाहिरेसु आयतनेसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति? खीणासवस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो वुसितवतो कतकरणीयस्स ओहितभारस्स अनुप्पत्तसदत्थस्स परिक्खीणभवसंयोजनस्स सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स अयमनुधम्मो होति वेय्याकरणाय – ‘चक्खुस्मिं, आवुसो, रूपे चक्खुविञ्ञाणे चक्खुविञ्ञाणविञ्ञातब्बेसु धम्मेसु यो छन्दो यो रागो या नन्दी नन्दि (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) या तण्हा ये च उपायूपादाना चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया तेसं खया विरागा निरोधा चागा पटिनिस्सग्गा विमुत्तं मे चित्तन्ति पजानामि। सोतस्मिं, आवुसो, सद्दे सोतविञ्ञाणे…पे॰… घानस्मिं, आवुसो, गन्धे घानविञ्ञाणे… जिव्हाय, आवुसो, रसे जिव्हाविञ्ञाणे… कायस्मिं, आवुसो, फोट्ठब्बे कायविञ्ञाणे… मनस्मिं, आवुसो, धम्मे मनोविञ्ञाणे मनोविञ्ञाणविञ्ञातब्बेसु धम्मेसु यो छन्दो यो रागो या नन्दी या तण्हा ये च उपायूपादाना चेतसो अधिट्ठानाभिनिवेसानुसया तेसं खया विरागा निरोधा चागा पटिनिस्सग्गा विमुत्तं मे चित्तन्ति पजानामि। एवं खो मे, आवुसो, जानतो एवं पस्सतो इमेसु छसु अज्झत्तिकबाहिरेसु आयतनेसु अनुपादाय आसवेहि चित्तं विमुत्त’न्ति। तस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दितब्बं अनुमोदितब्बं। ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उत्तरिं पञ्हो पुच्छितब्बो।
१०२. ‘‘‘कथं जानतो पनायस्मतो, कथं पस्सतो इमस्मिञ्च सविञ्ञाणके काये बहिद्धा च सब्बनिमित्तेसु अहंकारममंकारमानानुसया समूहता’ति सुसमूहताति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)? खीणासवस्स , भिक्खवे, भिक्खुनो वुसितवतो कतकरणीयस्स ओहितभारस्स अनुप्पत्तसदत्थस्स परिक्खीणभवसंयोजनस्स सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स अयमनुधम्मो होति वेय्याकरणाय – ‘पुब्बे खो अहं, आवुसो, अगारियभूतो समानो अविद्दसु अहोसिं। तस्स मे तथागतो वा तथागतसावको वा धम्मं देसेसि। ताहं धम्मं सुत्वा तथागते सद्धं पटिलभिं। सो तेन सद्धापटिलाभेन समन्नागतो इति पटिसञ्चिक्खिं – सम्बाधो घरावासो रजापथो, अब्भोकासो पब्बज्जा। नयिदं सुकरं अगारं अज्झावसता एकन्तपरिपुण्णं एकन्तपरिसुद्धं सङ्खलिखितं ब्रह्मचरियं चरितुं। यंनूनाहं केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजेय्य’’’न्ति।
‘‘सो खो अहं, आवुसो, अपरेन समयेन अप्पं वा भोगक्खन्धं पहाय महन्तं वा भोगक्खन्धं पहाय, अप्पं वा ञातिपरिवट्टं पहाय महन्तं वा ञातिपरिवट्टं पहाय केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजिं। सो एवं पब्बजितो समानो भिक्खूनं सिक्खासाजीवसमापन्नो पाणातिपातं पहाय पाणातिपाता पटिविरतो अहोसिं निहितदण्डो निहितसत्थो, लज्जी दयापन्नो सब्बपाणभूतहितानुकम्पी विहासिं। अदिन्नादानं पहाय अदिन्नादाना पटिविरतो अहोसिं दिन्नादायी दिन्नपाटिकङ्खी, अथेनेन सुचिभूतेन अत्तना विहासिं। अब्रह्मचरियं पहाय ब्रह्मचारी अहोसिं आराचारी विरतो मेथुना गामधम्मा। मुसावादं पहाय मुसावादा पटिविरतो अहोसिं सच्चवादी सच्चसन्धो थेतो पच्चयिको अविसंवादको लोकस्स। पिसुणं वाचं पहाय पिसुणाय वाचाय पटिविरतो अहोसिं, इतो सुत्वा न अमुत्र अक्खाता इमेसं भेदाय, अमुत्र वा सुत्वा न इमेसं अक्खाता अमूसं भेदाय; इति भिन्नानं वा सन्धाता सहितानं वा अनुप्पदाता समग्गारामो समग्गरतो समग्गनन्दी समग्गकरणिं वाचं भासिता अहोसिं। फरुसं वाचं पहाय फरुसाय वाचाय पटिविरतो अहोसिं; या सा वाचा नेला कण्णसुखा पेमनीया हदयङ्गमा पोरी बहुजनकन्ता बहुजनमनापा तथारूपिं वाचं भासिता अहोसिं। सम्फप्पलापं पहाय सम्फप्पलापा पटिविरतो अहोसिं; कालवादी भूतवादी अत्थवादी धम्मवादी विनयवादी निधानवतिं वाचं भासिता अहोसिं कालेन सापदेसं परियन्तवतिं अत्थसंहितं।
‘‘सो बीजगामभूतगामसमारम्भा पटिविरतो अहोसिं, एकभत्तिको अहोसिं रत्तूपरतो विरतो विकालभोजना। नच्चगीतवादितविसूकदस्सना पटिविरतो अहोसिं। मालागन्धविलेपनधारणमण्डनविभूसनट्ठाना पटिविरतो अहोसिं। उच्चासयनमहासयना पटिविरतो अहोसिं। जातरूपरजतपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं, आमकधञ्ञपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं, आमकमंसपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं; इत्थिकुमारिकपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं, दासिदासपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं, अजेळकपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं, कुक्कुटसूकरपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं , हत्थिगवस्सवळवपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं, खेत्तवत्थुपटिग्गहणा पटिविरतो अहोसिं। दूतेय्यपहिणगमनानुयोगा पटिविरतो अहोसिं, कयविक्कया पटिविरतो अहोसिं, तुलाकूटकंसकूटमानकूटा पटिविरतो अहोसिं, उक्कोटनवञ्चननिकतिसाचियोगा पटिविरतो अहोसिं, छेदनवधबन्धनविपरामोसआलोपसहसाकारा पटिविरतो अहोसिं।
‘‘सो सन्तुट्ठो अहोसिं कायपरिहारिकेन चीवरेन, कुच्छिपरिहारिकेन पिण्डपातेन। सो येन येनेव येन येन च (क॰) पक्कमिं समादायेव पक्कमिं। सेय्यथापि नाम पक्खी सकुणो येन येनेव डेति सपत्तभारोव डेति; एवमेव खो अहं, आवुसो; सन्तुट्ठो अहोसिं कायपरिहारिकेन चीवरेन, कुच्छिपरिहारिकेन पिण्डपातेन। सो येन येनेव पक्कमिं समादायेव पक्कमिं। सो इमिना अरियेन सीलक्खन्धेन समन्नागतो अज्झत्तं अनवज्जसुखं पटिसंवेदेसिं।
१०३. ‘‘सो चक्खुना रूपं दिस्वा न निमित्तग्गाही अहोसिं नानुब्यञ्जनग्गाही; यत्वाधिकरणमेनं चक्खुन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं, तस्स संवराय पटिपज्जिं ; रक्खिं चक्खुन्द्रियं, चक्खुन्द्रिये संवरं आपज्जिं। सोतेन सद्दं सुत्वा…पे॰… घानेन गन्धं घायित्वा…पे॰… जिव्हाय रसं सायित्वा…पे॰… कायेन फोट्ठब्बं फुसित्वा…पे॰… मनसा धम्मं विञ्ञाय न निमित्तग्गाही अहोसिं नानुब्यञ्जनग्गाही; यत्वाधिकरणमेनं मनिन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं, तस्स संवराय पटिपज्जिं; रक्खिं मनिन्द्रियं, मनिन्द्रिये संवरं आपज्जिं। सो इमिना अरियेन इन्द्रियसंवरेन समन्नागतो अज्झत्तं अब्यासेकसुखं पटिसंवेदेसिं।
‘‘सो अभिक्कन्ते पटिक्कन्ते सम्पजानकारी अहोसिं, आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी अहोसिं, समिञ्जिते पसारिते सम्पजानकारी अहोसिं, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी अहोसिं, असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी अहोसिं, उच्चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी अहोसिं, गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी अहोसिं।
‘‘सो इमिना च अरियेन सीलक्खन्धेन समन्नागतो, (इमाय च अरियाय सन्तुट्ठिया समन्नागतो,) पस्स म॰ नि॰ १.२९६ चूळहत्थिपदोपमे इमिना च अरियेन इन्द्रियसंवरेन समन्नागतो, इमिना च अरियेन सतिसम्पजञ्ञेन समन्नागतो विवित्तं सेनासनं भजिं अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। सो पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो निसीदिं पल्लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा।
‘‘सो अभिज्झं लोके पहाय विगताभिज्झेन चेतसा विहासिं, अभिज्झाय चित्तं परिसोधेसिं। ब्यापादपदोसं पहाय अब्यापन्नचित्तो विहासिं सब्बपाणभूतहितानुकम्पी, ब्यापादपदोसा चित्तं परिसोधेसिं। थिनमिद्धं पहाय विगतथिनमिद्धो विहासिं आलोकसञ्ञी सतो सम्पजानो, थिनमिद्धा चित्तं परिसोधेसिं। उद्धच्चकुक्कुच्चं पहाय अनुद्धतो विहासिं अज्झत्तं, वूपसन्तचित्तो, उद्धच्चकुक्कुच्चा चित्तं परिसोधेसिं। विचिकिच्छं पहाय तिण्णविचिकिच्छो विहासिं अकथंकथी कुसलेसु धम्मेसु, विचिकिच्छाय चित्तं परिसोधेसिं।
१०४. ‘‘सो इमे पञ्च नीवरणे पहाय चेतसो उपक्किलेसे पञ्ञाय दुब्बलीकरणे विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहासिं। वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं…पे॰… ततियं झानं… चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहासिं।
‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते आसवानं खयञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेसिं। सो इदं दुक्खन्ति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, अयं दुक्खसमुदयोति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, अयं दुक्खनिरोधोति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदाति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं; इमे आसवाति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, अयं आसवसमुदयोति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, अयं आसवनिरोधोति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं, अयं आसवनिरोधगामिनी पटिपदाति यथाभूतं अब्भञ्ञासिं। तस्स मे एवं जानतो एवं पस्सतो कामासवापि चित्तं विमुच्चित्थ, भवासवापि चित्तं विमुच्चित्थ, अविज्जासवापि चित्तं विमुच्चित्थः विमुत्तस्मिं विमुत्तमिति ञाणं अहोसि। खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्तायाति अब्भञ्ञासिं। एवं खो मे, आवुसो, जानतो एवं पस्सतो इमस्मिञ्च सविञ्ञाणके काये बहिद्धा च सब्बनिमित्तेसु अहंकारममंकारमानानुसया समूहता’’ति । ‘‘तस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दितब्बं अनुमोदितब्बं। ‘साधू’ति भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा एवमस्स वचनीयो – ‘लाभा नो, आवुसो, सुलद्धं नो, आवुसो, ये मयं आयस्मन्तं तादिसं सब्रह्मचारिं समनुपस्सामा’’’ति पस्सामाति (सी॰)।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
छब्बिसोधनसुत्तं निट्ठितं दुतियं।