
भगवान अनेक सूत्रों में सत्पुरुष और असत्पुरुष के स्वभाव का भेद स्पष्ट करते हैं। वे हमें वह दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे हम समझ सकें कि संसार में उजली प्रवृत्ति के लोग भी हैं और काली प्रवृत्ति के भी—और दोनों की पहचान करना आवश्यक है। एक ही परिस्थिति में रहते हुए सत्पुरुष और असत्पुरुष की प्रतिक्रियाओं में अंतर दिखाना, दोनों की पोल खोलता है।
असत्पुरुष छोटी या बड़ी उपलब्धियों से अहंकार गढ़ लेता है, स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन मानता है। इसके विपरीत, सत्पुरुष के लिए वही उपलब्धियाँ विशेष महत्व नहीं रखतीं। गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन मानने वाला अहंकार प्रायः भीतर छिपी गहरी असुरक्षा और भय से जन्म लेता है। एक ऐसा भय जो यह मान बैठता है कि साधारण होना अस्तित्व के योग्य नहीं है। यह मानसिकता अक्सर पुराने मानसिक आघात से जुड़ी होती है।
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”
“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“भिक्षुओं, मैं तुम्हें सत्पुरुष स्वभाव और असत्पुरुष स्वभाव के बारे में सिखाता हूँ। ध्यान देकर गौर से सुनो, मैं बताता हूँ।”
“ठीक है, भन्ते”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
(१) “असत्पुरुष स्वभाव क्या है, भिक्षुओं? कोई असत्पुरुष ऊँचे कुल से प्रव्रज्यित होता है। उसे लगता है, ‘मैं ऊँचे कुल से आकर प्रव्रज्यित हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण ऊँचे कुल से प्रव्रज्यित नहीं हैं।’ तब वह उच्च-कुलीनता के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘उच्च-कुलीनता के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई ऊँचे कुल से न भी प्रवज्यित हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, उच्च-कुलीन होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(२) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष बड़े कुल-परिवार से…
(३) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष बड़े भोगसंपत्ति वाले (करोड़पति) कुल-परिवार से…
(४) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष अत्याधिक भोगसंपत्ति वाले (अरबपति) कुल-परिवार से प्रव्रज्यित होता है। उसे लगता है, ‘मैं अरबपति कुल से आकर प्रव्रज्यित हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण अरबपति कुल से प्रव्रज्यित नहीं हैं।’ तब वह अरबपति कुल के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘अत्याधिक भोग-संपन्नता के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई अरबपति कुल से न भी प्रवज्यित हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, अरबपति कुल का होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(५) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष बहुत प्रसिद्ध और यशस्वी होता है। उसे लगता है, ‘मैं प्रसिद्ध और यशस्वी हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण कम प्रसिद्ध, कम यशस्वी हैं।’ तब वह प्रसिद्धि के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘प्रसिद्धि के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई प्रसिद्ध न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, प्रसिद्ध और यशस्वी होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(६) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष चीवर, भिक्षान्न, आवास, और रोगावश्यक औषधि और भैषज्य का (दान) लाभी होता है। उसे लगता है, ‘मैं चीवर, भिक्षान्न, आवास, और रोगावश्यक औषधि और भैषज्य का लाभी हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण उसके लाभी नहीं हैं।’ तब वह लाभी होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘(दान) लाभ के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई चीवर, भिक्षान्न, आवास, और रोगावश्यक औषधि और भैषज्य का लाभी न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, लाभी होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(७) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष बहुत धम्म सुना (या पढ़ा-लिखा) होता है। उसे लगता है, ‘मैं बहुत धम्म सुना हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण बहुत धम्म सुने नहीं हैं।’ तब वह बहुत सुना होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘बहुत (धम्म) सुना होने के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई बहुत धम्म सुना न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, बहुत धम्म सुना होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(८) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष विनयधर (=भिक्षु-विनय में निपुण) होता है। उसे लगता है, ‘मैं विनयधर हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण विनयधर नहीं हैं।’ तब वह विनयधर होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘विनयधर होने के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई विनयधर न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, विनयधर होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(९) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष धम्म प्रवचनकर्ता होता है। उसे लगता है, ‘मैं धम्म प्रवचनकर्ता हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण धम्म प्रवचनकर्ता नहीं हैं।’ तब वह धम्म प्रवचनकर्ता होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘धम्म प्रवचनकर्ता होने के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई धम्म प्रवचनकर्ता न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, धम्म प्रवचनकर्ता होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(१०) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “आरञ्ञिक” (=जंगल में रहने का धुतांग 1) होता है। उसे लगता है, ‘मैं आरञ्ञिक हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण आरञ्ञिक नहीं हैं।’ तब वह आरञ्ञिक होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘आरञ्ञिक होने के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई आरञ्ञिक न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, आरञ्ञिक होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(११) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “पंसुकूलिक” (=फेंके कपड़ों से सिला चीवर पहनने का धुतांग) होता है…
(१२) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “पिण्डपातिक” (=केवल भिक्षाटन करने का धुतांग) होता है…
(१३) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “रुक्खमूलिक” (=वृक्ष के नीचे रहने का धुतांग) होता है…
(१४) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “सोसानिक” (=श्मशान में रहने का धुतांग) होता है…
(१५) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “अब्भोकासिक” (=खुले आकाश के नीचे रहने का धुतांग) होता है…
(१६) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “नेसज्जिक” (=न लेटने का धुतांग) होता है…
(१७) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “यथासन्थतिक” (=किसी भी स्थान पर रहने का धुतांग) होता है…
(१८) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष “एकासनिक” (=दिन में एक ही बार भोजन करने का धुतांग) होता है। उसे लगता है, ‘मैं एकासनिक हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण एकासनिक नहीं हैं।’ तब वह एकासनिक होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘एकासनिक होने के कारण न तो लोभ-स्वभाव नष्ट होता है, न द्वेष-स्वभाव नष्ट होता है, न ही मोह-स्वभाव नष्ट होता है। यदि कोई एकासनिक न भी हो, किन्तु धम्मानुसार धम्म की साधना करता हो, उचित मार्ग पर चलता हो, धम्मानुसार आचरण करता हो, तो वह पूजनीय है, प्रशंसनीय है।’ तब वह केवल साधना को प्राथमिकता देकर, एकासनिक होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(१९) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। तब उसे लगता है, ‘मैं प्रथम-ध्यान अवस्था का लाभी हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण प्रथम-ध्यान अवस्था के लाभी नहीं हैं।’ तब वह प्रथम-ध्यान उपलब्धि के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘प्रथम-ध्यान उपलब्धि से भी भगवान ने अ-तन्मयता 2 कहा हैं। जिसे-जिसे भी (अपना) माने, वह बदल जाता है।’ तब वह केवल अ-तन्मयता को प्राथमिकता देकर, प्रथम-ध्यान उपलब्धि होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(२०) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष… द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर रहता है…
(२१) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष… तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर रहता है…
(२२) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। तब उसे लगता है, ‘मैं चतुर्थ-ध्यान अवस्था का लाभी हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण चतुर्थ-ध्यान अवस्था के लाभी नहीं हैं। तब वह चतुर्थ-ध्यान उपलब्धि के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘चतुर्थ-ध्यान उपलब्धि से भी भगवान ने अ-तन्मयता कहा हैं। जिसे-जिसे भी (अपना) माने, वह बदल जाता है।’ तब वह केवल अ-तन्मयता को प्राथमिकता देकर, चतुर्थ-ध्यान उपलब्धि होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(२३) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष रूप संज्ञा पूर्णतः लाँघकर, विरोधी संज्ञा ओझल होने पर, विविध संज्ञा पर ध्यान न देकर—‘आकाश अनन्त है’ (देखते हुए) ‘अनन्त आकाश आयाम’ में प्रवेश पाकर रहता है। तब उसे लगता है, ‘मैं आकाश आयाम अवस्था का लाभी हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण आकाश आयाम अवस्था के लाभी नहीं हैं। तब वह आकाश आयाम उपलब्धि के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘आकाश आयाम उपलब्धि से भी भगवान ने अ-तन्मयता कहा हैं। जिसे-जिसे भी (अपना) माने, वह बदल जाता है।’ तब वह केवल अ-तन्मयता को प्राथमिकता देकर, आकाश आयाम उपलब्धि होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
(२४) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष अनन्त आकाश आयाम पूर्णतः लाँघकर, ‘विज्ञान अनन्त है’ (देखते हुए) ‘अनन्त विज्ञान आयाम’ में प्रवेश कर रहता है…
(२५) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष अनन्त विज्ञान आयाम पूर्णतः लाँघकर, ‘कुछ नहीं है’ (देखते हुए) ‘सूने आयाम’ में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।
(२६) आगे, भिक्षुओं, कोई असत्पुरुष सुने आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, न-संज्ञा-न-असंज्ञा (=न बोधगम्य, न अबोधगम्य) आयाम में प्रवेश पाकर रहता है। तब उसे लगता है, ‘मैं न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम अवस्था का लाभी हूँ, किन्तु ये भिक्षुगण न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम अवस्था के लाभी नहीं हैं। तब वह न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम उपलब्धि के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, असत्पुरुष स्वभाव है।
(दूसरी ओर,) भिक्षुओं, सत्पुरुष को लगता है, ‘न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम उपलब्धि से भी भगवान ने अ-तन्मयता कहा हैं। जिसे-जिसे भी (अपना) माने, वह बदल जाता है।’ तब वह केवल अ-तन्मयता को प्राथमिकता देकर, न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम उपलब्धि होने पर न स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, न ही दूसरों को हीन। यह, भिक्षुओं, सत्पुरुष स्वभाव है।
आगे, भिक्षुओं, कोई सत्पुरुष न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, संज्ञा वेदना निरोध अवस्था में प्रवेश पाकर रहता है। 3 और प्रज्ञा से देखने पर उसके आस्रव नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार का भिक्षु, भिक्षुओं, कुछ भी नहीं मानता, न कहीं मानता है, न किसी भी प्रकार से मानता है।” 4
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
यहाँ कुल ९ धुतांग अभ्यासों के बारे में उल्लेख हुआ है। धुतांग के कुल १३ अभ्यास बताएं जाते हैं। उनके बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎
अतम्मयता या ‘अ-तन्मयता’ के विषय में विस्तार से जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎
इसका आशय यह है कि कोई असत्पुरुष, भले ही समाधि या अरूप अवस्थाओं की उपलब्धि भी प्राप्त कर ले, फिर भी अपने सभी आस्रवों का क्षय नहीं कर पाता। कारण यह है कि वह अपने अहंकार से निरंतर जुड़ा रहता है और अतम्मयता का अभ्यास नहीं करता। इसी कारण वह उस अंतिम अवस्था तक नहीं पहुँच पाता, जहाँ केवल अहंकार-शून्य सत्पुरुष ही पहुँच सकता है। ↩︎
इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है—“वह कुछ भी ‘मैं’ नहीं मानता, न कहीं स्वयं को स्थापित करता है, और न किसी भी प्रकार से ‘मैं’ की कल्पना करता है। अर्थात, यहाँ “न मानना” का अर्थ किसी मत का निषेध नहीं, बल्कि हर स्तर पर ‘मैं’ के निर्माण का अभाव है। दूसरे शब्दों में, उसकी पूर्व मान्यताओं, विश्वासों, धारणाओं और मत-मतांतरों का चश्मा उतर जाता है; और उनके स्थान पर वह यथार्थ को सीधे, बिना किसी आत्म-आरोपण के, निर्लिप्त भाव से देखना आरंभ करता है। ↩︎
१०५. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘सप्पुरिसधम्मञ्च वो, भिक्खवे, देसेस्सामि असप्पुरिसधम्मञ्च। तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –
‘‘कतमो च, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो? इध, भिक्खवे, असप्पुरिसो उच्चाकुला पब्बजितो होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि उच्चाकुला पब्बजितो, इमे पनञ्ञे भिक्खू न उच्चाकुला पब्बजिता’ति। सो ताय उच्चाकुलीनताय अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयं अयम्पि (सी॰ पी॰), भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो उच्चाकुलीनताय लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति , मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि उच्चाकुला पब्बजितो होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी , सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा ताय उच्चाकुलीनताय नेवत्तानुक्कंसेति न परं वम्भेति। अयं, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो महाकुला पब्बजितो होति…पे॰… यथा उच्चाकुलवारे तथा वित्थारेतब्बं महाभोगकुला पब्बजितो होति…पे॰… उळारभोगकुला पब्बजितो होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि उळारभोगकुला पब्बजितो, इमे पनञ्ञे भिक्खू न उळारभोगकुला पब्बजिता’ति। सो ताय उळारभोगताय अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो उळारभोगताय लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि उळारभोगकुला पब्बजितो होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा ताय उळारभोगताय नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
१०६. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो ञातो होति यसस्सी। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि ञातो यसस्सी, इमे पनञ्ञे भिक्खू अप्पञ्ञाता अप्पेसक्खा’ति। सो तेन ञत्तेन ञातेन (सी॰ क॰), ञातत्तेन (स्या॰ कं॰ पी॰) अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो ञत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि ञातो होति यसस्सी; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो , सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन ञत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो लाभी होति चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्चयभेसज्जपरिक्खारानं। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि लाभी चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्चयभेसज्जपरिक्खारानं, इमे पनञ्ञे भिक्खू न लाभिनो चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्चयभेसज्जपरिक्खारान’न्ति। सो तेन लाभेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो लाभेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि लाभी होति चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्चयभेसज्जपरिक्खारानं; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन लाभेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो बहुस्सुतो होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि बहुस्सुतो, इमे पनञ्ञे भिक्खू न बहुस्सुता’ति। सो तेन बाहुसच्चेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे , इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो बाहुसच्चेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति , दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि बहुस्सुतो होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन बाहुसच्चेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो विनयधरो होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि विनयधरो, इमे पनञ्ञे भिक्खू न विनयधरा’ति। सो तेन विनयधरत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो विनयधरत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि विनयधरो होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन विनयधरत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो धम्मकथिको होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि धम्मकथिको, इमे पनञ्ञे भिक्खू न धम्मकथिका’ति। सो तेन धम्मकथिकत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो धम्मकथिकत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि धम्मकथिको होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन धम्मकथिकत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
१०७. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो आरञ्ञिको होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि आरञ्ञिको इमे पनञ्ञे भिक्खू न आरञ्ञिका’ति। सो तेन आरञ्ञिकत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो आरञ्ञिकत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि आरञ्ञिको होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन आरञ्ञिकत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो पंसुकूलिको होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि पंसुकूलिको, इमे पनञ्ञे भिक्खू न पंसुकूलिका’ति। सो तेन पंसुकूलिकत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति । अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो पंसुकूलिकत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि पंसुकूलिको होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन पंसुकूलिकत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो पिण्डपातिको होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि पिण्डपातिको, इमे पनञ्ञे भिक्खू न पिण्डपातिका’ति। सो तेन पिण्डपातिकत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो पिण्डपातिकत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि पिण्डपातिको होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन पिण्डपातिकत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो रुक्खमूलिको होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि रुक्खमूलिको, इमे पनञ्ञे भिक्खू न रुक्खमूलिका’ति। सो तेन रुक्खमूलिकत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो रुक्खमूलिकत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि रुक्खमूलिको होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन रुक्खमूलिकत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो सोसानिको होति…पे॰… अब्भोकासिको होति… नेसज्जिको होति… यथासन्थतिको होति… एकासनिको होति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि एकासनिको, इमे पनञ्ञे भिक्खू न एकासनिका’ति। सो तेन एकासनिकत्तेन अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘न खो एकासनिकत्तेन लोभधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, दोसधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति, मोहधम्मा वा परिक्खयं गच्छन्ति। नो चेपि एकासनिको होति; सो च होति धम्मानुधम्मप्पटिपन्नो सामीचिप्पटिपन्नो अनुधम्मचारी, सो तत्थ पुज्जो, सो तत्थ पासंसो’ति। सो पटिपदंयेव अन्तरं करित्वा तेन एकासनिकत्तेन नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
१०८. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि पठमज्झानसमापत्तिया लाभी, इमे पनञ्ञे भिक्खू पठमज्झानसमापत्तिया न लाभिनो’ति। सो ताय पठमज्झानसमापत्तिया अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘पठमज्झानसमापत्तियापि खो अतम्मयता वुत्ता भगवता। येन येन हि मञ्ञन्ति ततो तं होति अञ्ञथा’ति। सो अतम्मयतञ्ञेव अन्तरं करित्वा ताय पठमज्झानसमापत्तिया नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं…पे॰… ततियं झानं… चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि चतुत्थज्झानसमापत्तिया लाभी, इमे पनञ्ञे भिक्खू चतुत्थज्झानसमापत्तिया न लाभिनो’ति। सो ताय चतुत्थज्झानसमापत्तिया अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो , भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘चतुत्थज्झानसमापत्तियापि खो अतम्मयता वुत्ता भगवता। येन येन हि मञ्ञन्ति ततो तं होति अञ्ञथा’ति। सो अतम्मयतञ्ञेव अन्तरं करित्वा ताय चतुत्थज्झानसमापत्तिया नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो सब्बसो रूपसञ्ञानं समतिक्कमा पटिघसञ्ञानं अत्थङ्गमा नानत्तसञ्ञानं अमनसिकारा ‘अनन्तो आकासो’ति आकासानञ्चायतनं उपसम्पज्ज विहरति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि आकासानञ्चायतनसमापत्तिया लाभी, इमे पनञ्ञे भिक्खू आकासानञ्चायतनसमापत्तिया न लाभिनो’ति। सो ताय आकासानञ्चायतनसमापत्तिया अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘आकासानञ्चायतनसमापत्तियापि खो अतम्मयता वुत्ता भगवता। येन येन हि मञ्ञन्ति ततो तं होति अञ्ञथा’ति। सो अतम्मयतञ्ञेव अन्तरं करित्वा ताय आकासानञ्चायतनसमापत्तिया नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो सब्बसो आकासानञ्चायतनं समतिक्कम्म ‘अनन्तं विञ्ञाण’न्ति विञ्ञाणञ्चायतनं उपसम्पज्ज विहरति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि विञ्ञाणञ्चायतनसमापत्तिया लाभी, इमे पनञ्ञे भिक्खू विञ्ञाणञ्चायतनसमापत्तिया न लाभिनो’ति। सो ताय विञ्ञाणञ्चायतनसमापत्तिया अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘विञ्ञाणञ्चायतनसमापत्तियापि खो अतम्मयता वुत्ता भगवता। येन येन हि मञ्ञन्ति ततो तं होति अञ्ञथा’ति। सो अतम्मयतञ्ञेव अन्तरं करित्वा ताय विञ्ञाणञ्चायतनसमापत्तिया नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो सब्बसो विञ्ञाणञ्चायतनं समतिक्कम्म ‘नत्थि किञ्ची’ति आकिञ्चञ्ञायतनं उपसम्पज्ज विहरति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि आकिञ्चञ्ञायतनसमापत्तिया लाभी, इमे पनञ्ञे भिक्खू आकिञ्चञ्ञायतनसमापत्तिया न लाभिनो’ति। सो ताय आकिञ्चञ्ञायतनसमापत्तिया अत्तानुक्कंसेति, परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे, इति पटिसञ्चिक्खति – ‘आकिञ्चञ्ञायतनसमापत्तियापि खो अतम्मयता वुत्ता भगवता। येन येन हि मञ्ञन्ति ततो तं होति अञ्ञथा’ति। सो अतम्मयतञ्ञेव अन्तरं करित्वा ताय आकिञ्चञ्ञायतनसमापत्तिया नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, असप्पुरिसो सब्बसो आकिञ्चञ्ञायतनं समतिक्कम्म नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं उपसम्पज्ज विहरति। सो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘अहं खोम्हि नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसमापत्तिया लाभी, इमे पनञ्ञे भिक्खू नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसमापत्तिया न लाभिनो’ति। सो ताय नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसमापत्तिया अत्तानुक्कंसेति , परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, असप्पुरिसधम्मो। सप्पुरिसो च खो, भिक्खवे , इति पटिसञ्चिक्खति – ‘नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसमापत्तियापि खो अतम्मयता वुत्ता भगवता। येन येन हि मञ्ञन्ति ततो तं होति अञ्ञथा’ति। सो अतम्मयतञ्ञेव अन्तरं करित्वा ताय नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसमापत्तिया नेवत्तानुक्कंसेति, न परं वम्भेति। अयम्पि, भिक्खवे, सप्पुरिसधम्मो।
‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, सप्पुरिसो सब्बसो नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं समतिक्कम्म सञ्ञावेदयितनिरोधं उपसम्पज्ज विहरति। पञ्ञाय चस्स दिस्वा आसवा एकच्चे आसवा (क॰) परिक्खीणा होन्ति। अयं अयं खो (स्या॰ कं॰), भिक्खवे, भिक्खु न किञ्चि मञ्ञति, न कुहिञ्चि मञ्ञति, न केनचि मञ्ञती’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
सप्पुरिससुत्तं निट्ठितं ततियं।