✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

बहुत सी धातुएँ

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ २० मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”

“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—

“जितने भी खतरे उपजते हैं, भिक्षुओं, वे सभी मूर्ख से उपजते हैं, ज्ञानी से नहीं। जितने भी संकट उपजते हैं, भिक्षुओं, वे सभी मूर्ख से उपजते हैं, ज्ञानी से नहीं। जितनी भी विपत्ति आती हैं, भिक्षुओं, वे सभी मूर्ख से उपजती हैं, ज्ञानी से नहीं।

जैसे, भिक्षुओं, किसी बाँस या घास से बनी झोपड़ी से आग फैलकर ऐसे बंगलों को भी जलाकर भस्म कर देती है, जो भीतर और बाहर से उपलिप्त (=पलस्तर) हो, जिसमें बन्द होने वाले दरवाजे, पवन से बचने के लिए बंद होने वाली खिड़कियाँ हो। उसी तरह, भिक्षुओं, जितने भी खतरे उपजते हैं, भिक्षुओं, वे सभी मूर्ख से उपजते हैं, ज्ञानी से नहीं। जितने भी संकट उपजते हैं, भिक्षुओं, वे सभी मूर्ख से उपजते हैं, ज्ञानी से नहीं। जितनी भी विपत्ति आती हैं, भिक्षुओं, वे सभी मूर्ख से उपजती हैं, ज्ञानी से नहीं।

इसलिए, भिक्षुओं, मूर्ख खतरनाक होता है, ज्ञानी खतरनाक नहीं होता। मूर्ख संकटपूर्ण होता है, ज्ञानी संकटपूर्ण नहीं होता। मूर्ख विपत्तिपूर्ण होता है, ज्ञानी विपत्तिपूर्ण नहीं होता। ज्ञानी से, भिक्षुओं, कोई खतरा नहीं होता। ज्ञानी से कोई संकट नहीं आता। ज्ञानी से कोई विपत्ति नहीं आती। इसलिए, भिक्षुओं, तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए कि—‘हम ज्ञानी और विवेकशील बनेंगे।’”

जब ऐसा कहा गया, तब आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा, “भन्ते, कैसे भिक्षु ज्ञानी और ‘विवेकशील’ कहलाता है?”

“आनन्द, जब कोई भिक्षु धातु में कुशल हो, आयाम में कुशल हो, प्रतित्य-समुत्पाद में कुशल हो, संभव-असंभव में कुशल हो—तो ऐसा भिक्षु ज्ञानी ‘विवेकशील’ कहलाता है।”

धातु-कुशल भिक्षु

“किन्तु, भन्ते, कैसे कोई ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाता है?”

“आनन्द, अठारह धातुएँ होती हैं—

  • आँख धातु, रूप धातु, आँख-विज्ञान धातु;
  • कान धातु, आवाज धातु, कान-विज्ञान धातु;
  • नाक धातु, गंध धातु, नाक-विज्ञान धातु;
  • जीभ धातु, स्वाद धातु, जीभ-विज्ञान धातु;
  • काया धातु, संस्पर्श धातु, काया-विज्ञान धातु;
  • मन धातु, स्वभाव धातु, मन-विज्ञान धातु।

—जो इन अठारह धातुओं को जानता है और देखता है, आनन्द, वह ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

“किन्तु, भन्ते, क्या किसी अन्य (दूसरे) तरीके से भी ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाया जा सकता है?”

“हाँ, आनन्द। छह धातुएँ होती हैं—

  • पृथ्वी धातु,
  • जल धातु,
  • अग्नि धातु,
  • वायु धातु,
  • आकाश धातु,
  • विज्ञान धातु।

—जो इन छह धातुओं को जानता है और देखता है, आनन्द, वह ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

“किन्तु, भन्ते, क्या किसी अन्य (तीसरे) तरीके से भी ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाया जा सकता है?”

“हाँ, आनन्द। छह धातुएँ होती हैं—

  • सुख धातु,
  • दुःख धातु,
  • हर्ष धातु,
  • व्यथा धातु,
  • उपेक्षा धातु,
  • अविद्या धातु।

—जो इन छह धातुओं को जानता है और देखता है, आनन्द, वह ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

“किन्तु, भन्ते, क्या किसी अन्य (चौथे) तरीके से भी ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाया जा सकता है?”

“हाँ, आनन्द। तीन धातुएँ होती हैं—

  • कामुक धातु,
  • रूप धातु,
  • अरूप धातु।

—जो इन तीन धातुओं को जानता है और देखता है, आनन्द, वह ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

“किन्तु, भन्ते, क्या किसी अन्य (पाँचवे) तरीके से भी ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाया जा सकता है?”

“हाँ, आनन्द। दो धातुएँ होती हैं—

  • संस्कृत धातु,
  • असंस्कृत धातु।

—जो इन दो धातुओं को जानता है और देखता है, आनन्द, वह ‘धातु में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

आयतन-कुशल भिक्षु

“और, भन्ते, कैसे कोई ‘आयाम में कुशल भिक्षु’ कहलाता है?”

“आनन्द, छह भीतरी और बाहरी आयाम होते हैं—

  • आँख और रूप;
  • कान और आवाज;
  • नाक और गंध;
  • जीभ और स्वाद;
  • काया और संस्पर्श;
  • मन और स्वभाव।

—जो इन छह भीतरी और बाहरी आयामों को जानता है और देखता है, आनन्द, वह ‘आयाम में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

प्रतित्य-समुत्पाद-कुशल भिक्षु

“और, भन्ते, कैसे कोई ‘प्रतित्य-समुत्पाद में कुशल भिक्षु’ कहलाता है?”

“जब, आनन्द, कोई भिक्षु समझता है कि—

  • जब यह है, तब वह है।
  • इसके उत्पन्न होने से, वह उत्पन्न होने लगता है।
  • जब यह नहीं है, तब वह भी नहीं है।
  • इसके अन्त होने से, उसका भी अन्त होने लगता है।

अर्थात—

  • अविद्या के आधार पर संस्कार होती है,
  • संस्कार के आधार पर विज्ञान होता है,
  • विज्ञान के आधार पर नाम और रूप होता है,
  • नाम और रूप के आधार पर छह आयाम होते हैं,
  • छह आयाम के आधार पर संपर्क होता है,
  • संपर्क के आधार पर वेदना होती है,
  • वेदना के आधार पर तृष्णा होती है,
  • तृष्णा के आधार पर आसक्ति होती है,
  • आसक्ति के आधार पर भव होता है,
  • भव के आधार पर जन्म होता है,
  • जन्म के आधार पर बुढ़ापा, मौत, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रकट होते हैं।

—इस तरह, इस पूरे दुःख के ढ़ेर की उत्पत्ति होती है।

  • जब अविद्या का, बिना शेष बचे, विराग और निरोध होता है, तब संस्कार का निरोध होता है,
  • संस्कार के निरोध से विज्ञान का निरोध होता है,
  • विज्ञान के निरोध से नाम और रूप का निरोध होता है,
  • नाम और रूप के निरोध से छह आयाम का निरोध होता है,
  • छह आयाम के निरोध से संपर्क का निरोध होता है,
  • संपर्क के निरोध से वेदना का निरोध होता है,
  • वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है,
  • तृष्णा के निरोध से आसक्ति का निरोध होता है,
  • आसक्ति के निरोध से भव का निरोध होता है,
  • भव के निरोध से जन्म का निरोध होता है,
  • जन्म के निरोध से बुढ़ापा, मौत, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा निरुद्ध होते हैं।

—इस तरह, इस पूरे दुःख के ढ़ेर का निरोध होता है।’ इस तरह, आनन्द, वह ‘प्रतित्य-समुत्पाद में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

संभव-असंभव में कुशल भिक्षु

“और, भन्ते, कैसे कोई ‘संभव-असंभव में कुशल भिक्षु’ कहलाता है?”

“जब, आनन्द, कोई भिक्षु समझता है कि—

  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति (=श्रोतापति) किसी संस्कार को नित्य मानकर चले। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति किसी संस्कार को नित्य मानकर चले। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति किसी संस्कार को सुख मानकर चले। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति किसी संस्कार को सुख मानकर चले। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति किसी स्वभाव को आत्म मानकर चले। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति किसी स्वभाव को आत्म मानकर चले। ऐसा संभव है।’

—ऐसा वह भिक्षु समझता है।

आगे, आनन्द, कोई भिक्षु समझता है कि—

  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति अपनी माता की हत्या करे। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति अपनी माता की हत्या करे। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति अपने पिता की हत्या करे। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति अपने पिता की हत्या करे। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति अरहंत की हत्या करे। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति अरहंत की हत्या करे। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति दुष्ट-चित्त से तथागत का रक्त गिराए। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति दुष्ट-चित्त से तथागत का रक्त गिराए। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति संघ-भेद (=संघ को विभाजित) करे। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति संघ-भेद करे। ऐसा संभव है।’ 1
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दृष्टिसंपन्न व्यक्ति (तथागत के बजाय) किसी दूसरे को गुरु बनाए। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि कोई साधारण व्यक्ति किसी दूसरे को गुरु बनाए। ऐसा असंभव है।’

—ऐसा वह भिक्षु समझता है।

आगे, आनन्द, कोई भिक्षु समझता है कि—

  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी एक लोकधातु में दो अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध एक ही साथ उत्पन्न हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी एक लोकधातु में एक अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध उत्पन्न हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी एक लोकधातु में दो चक्रवर्ती सम्राट एक ही साथ उत्पन्न हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी एक लोकधातु में एक चक्रवर्ती सम्राट उत्पन्न हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि स्त्री अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध उत्पन्न हो। ऐसा असंभव है।’ 2
  • ‘ऐसा हो सकता कि पुरुष अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध उत्पन्न हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि स्त्री चक्रवर्ती सम्राट उत्पन्न हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि पुरुष चक्रवर्ती सम्राट उत्पन्न हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि स्त्री सक्क (=देवराज इन्द्र) बने… मार बने… ब्रह्मा बने। 3 ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि पुरुष सक्क बने… मार बने… ब्रह्मा बने। ऐसा संभव है।’

—ऐसा वह भिक्षु समझता है।

आगे, आनन्द, कोई भिक्षु समझता है कि—

  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शारीरिक दुराचार से अच्छा, इच्छा के अनुरूप और मनचाहा परिणाम आए। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी शारीरिक दुराचार से बुरा, इच्छा के विपरीत और अनचाहा परिणाम आए। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शाब्दिक दुराचार से… किसी मानसिक दुराचार से अच्छा, इच्छा के अनुरूप और मनचाहा परिणाम आए। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी शाब्दिक दुराचार से… किसी मानसिक दुराचार से बुरा, इच्छा के विपरीत और अनचाहा परिणाम आए। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शारीरिक दुराचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर स्वर्ग में उपज कर सद्गति हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी शारीरिक दुराचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर यातनालोक नर्क में उपज कर दुर्गति हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शाब्दिक दुराचार में… किसी मानसिक दुराचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर स्वर्ग में उपज कर सद्गति हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी शाब्दिक दुराचार में… किसी मानसिक दुराचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर यातनालोक नर्क में उपज कर दुर्गति हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शारीरिक सदाचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर यातनालोक नर्क में उपज कर दुर्गति हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी शारीरिक सदाचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर स्वर्ग में उपज कर सद्गति हो। ऐसा संभव है।’
  • ‘ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शाब्दिक सदाचार में… किसी मानसिक सदाचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर यातनालोक नर्क में उपज कर दुर्गति हो। ऐसा असंभव है।’
  • ‘ऐसा हो सकता कि किसी शाब्दिक सदाचार में… किसी मानसिक सदाचार में लिप्त होने के कारण, उस आधार से मरणोपरांत काया छूटने पर स्वर्ग में उपज कर सद्गति हो। ऐसा संभव है।’

—ऐसा वह भिक्षु समझता है। इस तरह, आनन्द, वह ‘संभव-असंभव में कुशल भिक्षु’ कहलाता है।”

जब ऐसा कहा गया, तब आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा, “आश्चर्य है, भन्ते! अद्भुत है, भन्ते। क्या नाम है, भन्ते, इस धम्म उपदेश का?”

“ठीक है तब, आनन्द, तुम इस धम्म उपदेश को ‘बहुत सी धातुएँ’ के तौर पर धारण कर सकते हो, ‘चार वृत्त’ के तौर पर भी धारण कर सकते हो, ‘धम्म का दर्पण’ के तौर पर भी धारण कर सकते हो, ‘अमृत का नगाड़ा’ के तौर पर भी धारण कर सकते हो, ‘अनुत्तर संग्राम विजय’ के तौर पर भी धारण कर सकते हो।” 4

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. इन पाँच कर्मों को महापाप कहा जाता है। अर्थात, जब कोई अपने माता, पिता या किसी अरहंत की हत्या करता है, अथवा तथागत का रक्तपात करता है या संघभेद करता है, तो वह साधारण पाप की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे कर्म का फल किसी अन्य लोक में नहीं भोगा जा सकता, बल्कि उसका फल अनिवार्य रूप से सबसे निचले अवीचि नरक में ही फलित होता है। जिसके द्वारा इनमें से कोई भी महापाप किया गया हो, उसे भिक्षु नहीं बनाया जा सकता।

    यहाँ यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इन महापापों की सूची में “तथागत की हत्या” करने का कर्म सम्मिलित नहीं है; केवल “तथागत का रक्त गिराना” ही इसमें आता है। इसका कारण यह बताया जाता है कि किसी अरहंत सम्यक्–सम्बुद्ध की हत्या संभव ही नहीं है। किंतु प्रश्न यह उठता है कि इस तथ्य को यहाँ स्पष्ट रूप से “असंभव” कर्मों की सूची में क्यों नहीं रखा गया। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि ऐसा जानबूझकर किया गया होगा। क्योंकि यदि सार्वजनिक रूप से यह घोषित कर दिया जाता कि किसी व्यक्ति की हत्या होना असंभव है, तो अनेक सिरफिरे उस असंभव को संभव बनाने का प्रयास करते। और ऐसा प्रयास स्वयं उन्हें महापाप का भागी बना देता। और, ऐसा हुआ भी। ↩︎

  2. यह स्पष्ट नहीं है कि यहाँ स्त्री की इस असक्षमता का इस प्रकार क्यों उल्लेख किया गया, जो एक प्रकार से अटपटा लगता है। इसका कोई प्रत्यक्ष आध्यात्मिक महत्व भी नहीं दिखता, क्योंकि प्रारम्भिक बौद्ध ग्रंथों में भविष्य में बुद्ध बनने की आकांक्षा जैसी कोई धारणा नहीं मिलती। इसका चीनी समानांतर सूत्र मध्यमआगम १८१ में यह स्त्री का अंश पूरी तरह अनुपस्थित है। और अतः संभव है कि यह बाद में जोड़ा गया हो। भिक्षु अनालयो, भिक्षु सुजातो इत्यादि अनेक बौद्ध विद्वान मानते हैं कि ब्राह्मणों के प्रभाव में थेरवाद में स्त्री की असक्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है। क्योंकि, वे एक स्पष्ट तौर पर संघ को पुरुष-प्रधान बनाना चाहते थे, और तथाकथित तौर पर संपूर्ण सत्ता, वैधता और अधिकार अपने पुरुष हाथों में सुरक्षित रखना चाहते थे।

    स्त्री, निस्संदेह, अरहन्त के रूप में पूर्ण मुक्ति प्राप्त कर सकती है; अतः प्रश्न आध्यात्मिक सामर्थ्य का नहीं है। इस दावे के पीछे जो तर्क प्रतीत होता है, वह यह है कि इस प्रसंग में बुद्ध के बाद क्रमशः चक्रवर्ती राजा, सक्क, मार और ब्रह्मा का उल्लेख है। और इन सभी में एक समानता है: ये सभी नेतृत्वकारी पदों पर स्थित हैं। चूँकि उस समय के नेता पुरुष होते थे, या पसंद किए जाते थे, तो संभव है यह मान लिया गया हो कि लोग किसी स्त्री का उस भूमिका में अनुसरण नहीं करेंगे। यही तर्क शायद उस धारणा के लिए भी काम करता है कि बुद्ध का जन्म या तो क्षत्रिय कुल में होता है, या ब्राह्मण कुल में—जो भी उस समय का अग्रणी वर्ग हो। (दीघनिकाय १४↩︎

  3. देवराज इन्द्र “सक्क” हों, या “मार” हों, या “महा ब्रह्मा”—इन्हें किसी एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में समझने के बजाय अपने-अपने लोक में एक पद या भूमिका के तौर पर समझना चाहिए। जैसे देश–विदेश में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति होते हैं, जो समय के साथ बदलते रहते हैं। उसी तरह “सक्क”, “मार” या “ब्रह्मा” भी पद हैं, जिन्हें धारण करने वाले बदलते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर, आयुष्मान महामोग्गल्लान मारतज्‍जनीय सुत्त में बताते हैं कि किसी पूर्व जन्म में वे स्वयं मार थे—अर्थात वर्तमान में जो मार बना है, जिसका नाम “नमूची” है, उसके मामा। मार के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎

  4. चार वृत्त के चार विषय थे—धातुएँ, आयाम, प्रतित्य-समुत्पाद और संभव-असंभव। हालांकि, संयुक्तनिकाय २२.५६ में चार आर्यसत्यों को भी “चार वृत्त” कहा गया है। धम्म को अपने भीतर देख पाने की सक्षमता को धम्म का दर्पण कहा जाता है, जैसे संयुक्तनिकाय ५५.८, और दीघनिकाय १६ में बताया गया है। मज्झिमनिकाय २६ के अनुसार, सम्यक-संबोधि प्राप्त करने पर भगवान ने सांकेतिक रूप से अमृत का नगाड़ा बजाया। भगवान ने ब्रह्मजाल सुत्त को भी अनुत्तर संग्राम विजय के तौर पर धारण करने का सुझाव दिया था, और संयुक्तनिकाय ४५.४ में “आर्य अष्टांगिक मार्ग” को भी। ↩︎

पालि

१२४. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –

‘‘यानि कानिचि, भिक्खवे, भयानि उप्पज्‍जन्ति सब्बानि तानि बालतो उप्पज्‍जन्ति, नो पण्डिततो; ये केचि उपद्दवा उप्पज्‍जन्ति सब्बे ते बालतो उप्पज्‍जन्ति, नो पण्डिततो; ये केचि उपसग्गा उप्पज्‍जन्ति सब्बे ते बालतो उप्पज्‍जन्ति, नो पण्डिततो। सेय्यथापि, भिक्खवे , नळागारा वा तिणागारा वा अग्गि मुत्तो अग्गिमुक्‍को (सी॰ पी॰) कूटागारानिपि दहति उल्‍लित्तावलित्तानि निवातानि फुसितग्गळानि पिहितवातपानानि; एवमेव खो, भिक्खवे, यानि कानिचि भयानि उप्पज्‍जन्ति सब्बानि तानि बालतो उप्पज्‍जन्ति, नो पण्डिततो; ये केचि उपद्दवा उप्पज्‍जन्ति सब्बे ते बालतो उप्पज्‍जन्ति, नो पण्डिततो; ये केचि उपसग्गा उप्पज्‍जन्ति सब्बे ते बालतो उप्पज्‍जन्ति, नो पण्डिततो। इति खो, भिक्खवे, सप्पटिभयो बालो, अप्पटिभयो पण्डितो; सउपद्दवो बालो, अनुपद्दवो पण्डितो; सउपसग्गो बालो, अनुपसग्गो पण्डितो। नत्थि, भिक्खवे, पण्डिततो भयं, नत्थि पण्डिततो उपद्दवो, नत्थि पण्डिततो उपसग्गो। तस्मातिह, भिक्खवे, ‘पण्डिता भविस्साम वीमंसका’ति – एवञ्हि वो, भिक्खवे, सिक्खितब्ब’’न्ति।

एवं वुत्ते, आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘कित्तावता नु खो, भन्ते, पण्डितो भिक्खु ‘वीमंसको’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘यतो खो, आनन्द, भिक्खु धातुकुसलो च होति, आयतनकुसलो च होति, पटिच्‍चसमुप्पादकुसलो च होति, ठानाठानकुसलो च होति – एत्तावता खो, आनन्द, पण्डितो भिक्खु ‘वीमंसको’ति अलं वचनाया’’ति।

१२५. ‘‘कित्तावता पन, भन्ते, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘अट्ठारस खो इमा, आनन्द, धातुयो – चक्खुधातु, रूपधातु, चक्खुविञ्‍ञाणधातु; सोतधातु, सद्दधातु, सोतविञ्‍ञाणधातु; घानधातु, गन्धधातु, घानविञ्‍ञाणधातु; जिव्हाधातु, रसधातु, जिव्हाविञ्‍ञाणधातु; कायधातु, फोट्ठब्बधातु, कायविञ्‍ञाणधातु; मनोधातु, धम्मधातु, मनोविञ्‍ञाणधातु। इमा खो, आनन्द, अट्ठारस धातुयो यतो जानाति पस्सति – एत्तावतापि खो, आनन्द, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

‘‘सिया पन, भन्ते, अञ्‍ञोपि परियायो, यथा ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘सिया, आनन्द। छयिमा, आनन्द, धातुयो – पथवीधातु, आपोधातु, तेजोधातु, वायोधातु, आकासधातु, विञ्‍ञाणधातु। इमा खो, आनन्द, छ धातुयो यतो जानाति पस्सति – एत्तावतापि खो, आनन्द, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

‘‘सिया पन, भन्ते, अञ्‍ञोपि परियायो, यथा ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘सिया, आनन्द। छयिमा, आनन्द, धातुयो – सुखधातु , दुक्खधातु, सोमनस्सधातु, दोमनस्सधातु, उपेक्खाधातु, अविज्‍जाधातु। इमा खो, आनन्द, छ धातुयो यतो जानाति पस्सति – एत्तावतापि खो, आनन्द, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

‘‘सिया पन, भन्ते, अञ्‍ञोपि परियायो, यथा ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘सिया, आनन्द। छयिमा, आनन्द, धातुयो – कामधातु, नेक्खम्मधातु, ब्यापादधातु, अब्यापादधातु, विहिंसाधातु , अविहिंसाधातु। इमा खो, आनन्द, छ धातुयो यतो जानाति पस्सति – एत्तावतापि खो, आनन्द, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

‘‘सिया पन, भन्ते, अञ्‍ञोपि परियायो, यथा ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘सिया, आनन्द। तिस्सो इमा, आनन्द, धातुयो – कामधातु, रूपधातु, अरूपधातु। इमा खो, आनन्द, तिस्सो धातुयो यतो जानाति पस्सति – एत्तावतापि खो, आनन्द, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

‘‘सिया पन, भन्ते, अञ्‍ञोपि परियायो, यथा ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘सिया, आनन्द। द्वे इमा, आनन्द, धातुयो – सङ्खताधातु, असङ्खताधातु। इमा खो, आनन्द, द्वे धातुयो यतो जानाति पस्सति – एत्तावतापि खो, आनन्द, ‘धातुकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

१२६. ‘‘कित्तावता पन, भन्ते, ‘आयतनकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘छ खो पनिमानि, आनन्द, अज्झत्तिकबाहिरानि आयतनानि – चक्खुचेव रूपा च सोतञ्‍च सद्दा च घानञ्‍च गन्धा च जिव्हा च रसा च कायो च फोट्ठब्बा च मनो च धम्मा च। इमानि खो, आनन्द, छ अज्झत्तिकबाहिरानि आयतनानि यतो जानाति पस्सति – एत्तावता खो, आनन्द, ‘आयतनकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

‘‘कित्तावता पन, भन्ते, ‘पटिच्‍चसमुप्पादकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘इधानन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘इमस्मिं सति इदं होति, इमस्सुप्पादा इदं उप्पज्‍जति, इमस्मिं असति इदं न होति, इमस्स निरोधा इदं निरुज्झति, यदिदं – अविज्‍जापच्‍चया सङ्खारा, सङ्खारपच्‍चया विञ्‍ञाणं, विञ्‍ञाणपच्‍चया नामरूपं, नामरूपपच्‍चया सळायतनं, सळायतनपच्‍चया फस्सो, फस्सपच्‍चया वेदना, वेदनापच्‍चया तण्हा, तण्हापच्‍चया उपादानं, उपादानपच्‍चया भवो , भवपच्‍चया जाति, जातिपच्‍चया जरामरणं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा सम्भवन्ति। एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स समुदयो होति। अविज्‍जायत्वेव असेसविरागनिरोधा सङ्खारनिरोधो, सङ्खारनिरोधा विञ्‍ञाणनिरोधो, विञ्‍ञाणनिरोधा नामरूपनिरोधो, नामरूपनिरोधा सळायतननिरोधो, सळायतननिरोधा फस्सनिरोधो, फस्सनिरोधा वेदनानिरोधो, वेदनानिरोधा तण्हानिरोधो, तण्हानिरोधा उपादाननिरोधो, उपादाननिरोधा भवनिरोधो, भवनिरोधा जातिनिरोधो, जातिनिरोधा जरामरणं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा निरुज्झन्ति। एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधो होति’। एत्तावता खो, आनन्द, ‘पटिच्‍चसमुप्पादकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

१२७. ‘‘कित्तावता पन, भन्ते, ‘ठानाठानकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति? ‘‘इधानन्द, भिक्खु ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो कञ्‍चि किञ्‍चि (स्या॰ कं॰ क॰) सङ्खारं निच्‍चतो उपगच्छेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो कञ्‍चि सङ्खारं निच्‍चतो उपगच्छेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो कञ्‍चि सङ्खारं सुखतो उपगच्छेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो कञ्‍चि सङ्खारं सुखतो उपगच्छेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो कञ्‍चि धम्मं अत्ततो उपगच्छेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति, ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो कञ्‍चि धम्मं अत्ततो उपगच्छेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति।

१२८. ‘‘‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो मातरं जीविता वोरोपेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो मातरं जीविता वोरोपेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो पितरं जीविता वोरोपेय्य…पे॰… अरहन्तं जीविता वोरोपेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो दुट्ठचित्तो तथागतस्स लोहितं उप्पादेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो दुट्ठचित्तो तथागतस्स लोहितं उप्पादेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो सङ्घं भिन्देय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो सङ्घं भिन्देय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं दिट्ठिसम्पन्‍नो पुग्गलो अञ्‍ञं सत्थारं उद्दिसेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुथुज्‍जनो अञ्‍ञं सत्थारं उद्दिसेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति।

१२९. ‘‘‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं एकिस्सा लोकधातुया द्वे अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा अपुब्बं अचरिमं उप्पज्‍जेय्युं, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं एकिस्सा लोकधातुया एको अरहं सम्मासम्बुद्धो उप्पज्‍जेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं एकिस्सा लोकधातुया द्वे राजानो चक्‍कवत्तिनो अपुब्बं अचरिमं उप्पज्‍जेय्युं, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं एकिस्सा लोकधातुया एको राजा चक्‍कवत्ती उप्पज्‍जेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति।

१३०. ‘‘‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं इत्थी अरहं अस्स सम्मासम्बुद्धो , नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुरिसो अरहं अस्स सम्मासम्बुद्धो, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं इत्थी राजा अस्स चक्‍कवत्ती, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुरिसो राजा अस्स चक्‍कवत्ती, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं इत्थी सक्‍कत्तं करेय्य … मारत्तं करेय्य… ब्रह्मत्तं करेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं पुरिसो सक्‍कत्तं करेय्य… मारत्तं करेय्य… ब्रह्मत्तं करेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति।

१३१. ‘‘‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं कायदुच्‍चरितस्स इट्ठो कन्तो मनापो विपाको निब्बत्तेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं कायदुच्‍चरितस्स अनिट्ठो अकन्तो अमनापो विपाको निब्बत्तेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं वचीदुच्‍चरितस्स…पे॰… यं मनोदुच्‍चरितस्स इट्ठो कन्तो मनापो विपाको निब्बत्तेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं वचीदुच्‍चरितस्स…पे॰… यं मनोदुच्‍चरितस्स अनिट्ठो अकन्तो अमनापो विपाको निब्बत्तेय्य, ठानमेतं विज्‍जतीति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं कायसुचरितस्स अनिट्ठो अकन्तो अमनापो विपाको निब्बत्तेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं कायसुचरितस्स इट्ठो कन्तो मनापो विपाको निब्बत्तेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं वचीसुचरितस्स…पे॰… यं मनोसुचरितस्स अनिट्ठो अकन्तो अमनापो विपाको निब्बत्तेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं वचीसुचरितस्स…पे॰… यं मनोसुचरितस्स इट्ठो कन्तो मनापो विपाको निब्बत्तेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति।

‘‘‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं कायदुच्‍चरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं कायदुच्‍चरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं वचीदुच्‍चरितसमङ्गी…पे॰… यं मनोदुच्‍चरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं वचीदुच्‍चरितसमङ्गी…पे॰… यं मनोदुच्‍चरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं कायसुचरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं कायसुचरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। ‘अट्ठानमेतं अनवकासो यं वचीसुचरितसमङ्गी…पे॰… यं मनोसुचरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जेय्य, नेतं ठानं विज्‍जती’ति पजानाति; ‘ठानञ्‍च खो एतं विज्‍जति यं वचीसुचरितसमङ्गी…पे॰… यं मनोसुचरितसमङ्गी तंनिदाना तप्पच्‍चया कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जेय्य, ठानमेतं विज्‍जती’ति पजानाति। एत्तावता खो, आनन्द, ‘ठानाठानकुसलो भिक्खू’ति अलं वचनाया’’ति।

१३२. एवं वुत्ते आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अच्छरियं, भन्ते, अब्भुतं, भन्ते! कोनामो अयं, भन्ते, धम्मपरियायो’’ति? ‘‘तस्मातिह त्वं, आनन्द, इमं धम्मपरियायं ‘बहुधातुको’तिपि नं धारेहि, ‘चतुपरिवट्टो’तिपि नं धारेहि, ‘धम्मादासो’तिपि नं धारेहि, ‘अमतदुन्दुभी’तिपि दुद्रभीतिपि (क॰) नं धारेहि, ‘अनुत्तरो सङ्गामविजयो’तिपि नं धारेही’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा आनन्दो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।

बहुधातुकसुत्तं निट्ठितं पञ्‍चमं।

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