✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

प्रत्येक-बुद्धों की किर्ति

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ५ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान राजगृह में इसिगिलि पर्वत पर विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं!"

“भदंत”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—

“भिक्षुओं, क्या तुम उस वेभार पर्वत को देखते हो?”

“हाँ, भन्ते।”

“उस वेभार पर्वत का पहले अलग नाम था, भिक्षुओं, अलग पहचान थी। और, भिक्षुओं, क्या तुम उस पण्डव पर्वत को देखते हो?”

“हाँ, भन्ते।”

“उस पण्डव पर्वत का भी पहले अलग नाम था, भिक्षुओं, अलग पहचान थी। और, भिक्षुओं, क्या तुम उस वेपुल्ल पर्वत को देखते हो?”

“हाँ, भन्ते।”

“उस वेपुल्ल पर्वत का भी पहले अलग नाम था, भिक्षुओं, अलग पहचान थी। और, भिक्षुओं, क्या तुम उस गृद्धकूट पर्वत को देखते हो?”

“हाँ, भन्ते।”

“उस गृद्धकूट पर्वत का भी पहले अलग नाम था, भिक्षुओं, अलग पहचान थी। और, भिक्षुओं, क्या तुम इस इसिगिलि पर्वत को देखते हो?”

“हाँ, भन्ते।”

“इस इसिगिलि पर्वत का भी पहले अलग नाम था, भिक्षुओं, अलग पहचान थी। बहुत पहले की बात है, भिक्षुओं, पाँच सौ प्रत्येक-बुद्ध इसी इसिगिलि पर्वत पर दीर्घकाल तक निवास करते थे। वे इस पर्वत पर प्रवेश करते हुए दिखायी देते हैं, और प्रवेश करने पर नहीं दिखते थे। तब मनुष्यों को देखकर लगता था, ‘वह पर्वत इन ऋषियों को निगल लेता है।’ तब, ‘ऋषियों को निगलता है (“इसिगिलि”)… ऋषियों को निगलता है’, इस तरह उसका नाम पड़ा।

भिक्षुओं, मैं उन प्रत्येक-बुद्धों का नाम घोषित करूँगा। मैं उन प्रत्येक-बुद्धों के नाम की किर्ति करूँगा। मैं उन प्रत्येक-बुद्धों का नाम सिखाऊँगा। ध्यान देकर गौर से सुनो, भिक्षुओं, मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, भन्ते।” भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—

  • “अरिट्ठ नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध ने, भिक्षुओं, इसी इसिगिलि पर्वत पर दीर्घकाल तक निवास किया हैं।
  • उपरिट्ठ नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • तगरसिखी नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • यसस्सी नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • सुदस्सन नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • पियदस्सी नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • गन्धार नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • पिण्डोल नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • उपासभ नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • नीत नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • तथ नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • सुतवा नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध…
  • भावितत्त नामक प्रत्येक-सम्बुद्ध ने, भिक्षुओं, इसी इसिगिलि पर्वत पर दीर्घकाल तक निवास किया हैं। 1
सार पा चुके ये सत्व,
न परेशान, न आस लगाए,
पा चुके थे बोधि,
प्रत्येक ने स्वतंत्र रूप से,
उन तीर-निकाले उत्तम नरों के,
किर्ति नाम की सुनो मुझसे।

अरिट्ठ, उपरिट्ठ, तगरसिखी, यसस्सी,
सुदस्सन, पियदस्सी — सुसम्बुद्ध;
गन्धार, पिण्डोल, उपासभ,
नीत, तथ, सुतवा, भावितत्त।

सुम्भो, सुभो, मतुलो, अट्ठम,
अथस्सुमेघ, अनीघ, सुदाठ;
प्रत्येक-बुद्ध भव-नाल काट चुके,
हिङ्गू, हिङ्ग महानुभाव थे।

दो मुनि थे जालि और अट्ठक,
तब कोसल बुद्ध और सुबाहु थे,
उपनेमि, नेमि, सन्तचित्त,
सच्चे और यथार्थ, धूल-रहित पंडित थे।

काळ, उपकाळ, विजित और जित,
अङ्ग, पङ्ग और गुत्तिजित भी;
पस्सि ने दुःख-मूल उपधि छोड़ दिए।
अपराजित ने मार-शक्ति को हरा दिया।

सत्थ, पवत्त, सरभङ्ग, लोमहंस,
उच्चङ्गमाय, असित, अनासव।
मनोमय और बन्धुम अहंभाव काटने वाले,
तब अधिमुत्त, केतुम विमल थे।

केतुम्भराग, मातङ्ग, अरिय,
तब अच्चुत, अच्चुतगाम, ब्यामक;
सुमङ्गल, दब्बिल, सुपतिट्ठित,
असय्ह, खेमाभिरत, सोरत।

दुरन्नय, सङ्घ, और उज्जय भी,
और एक मुनि सय्ह अद्वितीय प्रयास वाले।
बारह आनन्द, नन्द और उपनन्द थे,
भारद्वाज अन्तिम देहधारी थे।

बोधि, महानाम और उत्तर भी,
केसी, सिखी, सुन्दर, द्वारभाज;
तिस्स, उपतिस्स, भवबंधन तोड़ने वाले,
उपसिखि और सिखरि ने तृष्णा काट दी।

बुद्ध हुए मङ्गल वीतरागी,
उसभ ने दुःख-मूल जाल को काट दिया।
उपनीत ने सन्त-पद पा लिया।
उपोसथ, सुन्दर, सच्चनाम।

जेत, जयन्त, पदुम, उप्पल,
पदुमुत्तर, रक्खित, पब्बत;
मानत्थद्ध, शोभित वीतरागी,
कण्ह बुद्ध सुविमुक्त चित्त के।

ये और दूसरे भी महानुभाव,
प्रत्येकबुद्ध भव-नाल काट चुके;
उन सभी बेड़ियाँ गिराए महर्षि,
परिनिर्वृत असीम को वन्दने करे।”

सुत्र समाप्त।


  1. यह गाथाएँ चीनी समानांतर सूत्र में नहीं मिलती। अतः संभव है कि ये गाथाएँ बहुत बाद में रची गयी होगी। यहाँ लगभग प्रत्येक-बुद्धों के कुल १०३ नाम आए हैं। ↩︎

पालि

१३३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा राजगहे विहरति इसिगिलिस्मिं पब्बते। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –

‘‘पस्सथ नो तुम्हे, भिक्खवे, एतं वेभारं पब्बत’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एतस्सपि खो, भिक्खवे, वेभारस्स पब्बतस्स अञ्‍ञाव समञ्‍ञा अहोसि अञ्‍ञा पञ्‍ञत्ति’’।

‘‘पस्सथ नो तुम्हे, भिक्खवे, एतं पण्डवं पब्बत’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एतस्सपि खो, भिक्खवे, पण्डवस्स पब्बतस्स अञ्‍ञाव समञ्‍ञा अहोसि अञ्‍ञा पञ्‍ञत्ति’’।

‘‘पस्सथ नो तुम्हे, भिक्खवे, एतं वेपुल्‍लं पब्बत’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एतस्सपि खो, भिक्खवे, वेपुल्‍लस्स पब्बतस्स अञ्‍ञाव समञ्‍ञा अहोसि अञ्‍ञा पञ्‍ञत्ति’’।

‘‘पस्सथ नो तुम्हे, भिक्खवे, एतं गिज्झकूटं पब्बत’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एतस्सपि खो, भिक्खवे, गिज्झकूटस्स पब्बतस्स अञ्‍ञाव समञ्‍ञा अहोसि अञ्‍ञा पञ्‍ञत्ति’’।

‘‘पस्सथ नो तुम्हे, भिक्खवे, इमं इसिगिलिं पब्बत’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘इमस्स खो पन, भिक्खवे, इसिगिलिस्स पब्बतस्स एसाव समञ्‍ञा अहोसि एसा पञ्‍ञत्ति’’।

‘‘भूतपुब्बं, भिक्खवे, पञ्‍च पच्‍चेकबुद्धसतानि इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासिनो अहेसुं। ते इमं पब्बतं पविसन्ता दिस्सन्ति , पविट्ठा न दिस्सन्ति। तमेनं मनुस्सा दिस्वा एवमाहंसु – ‘अयं पब्बतो इमे इसी इसयो (क॰) गिलती’ति; ‘इसिगिलि इसिगिलि’ त्वेव समञ्‍ञा उदपादि। आचिक्खिस्सामि अचिक्खिस्सामि वो (क॰), भिक्खवे, पच्‍चेकबुद्धानं नामानि; कित्तयिस्सामि, भिक्खवे, पच्‍चेकबुद्धानं नामानि; देसेस्सामि, भिक्खवे , पच्‍चेकबुद्धानं नामानि । तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –

१३४. ‘‘अरिट्ठो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो पच्‍चेकबुद्धो (क॰ सी॰ पी॰) इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; उपरिट्ठो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; तगरसिखी तग्गरसिखी (क॰) नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; यसस्सी नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; सुदस्सनो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; पियदस्सी नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; गन्धारो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; पिण्डोलो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; उपासभो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; नीतो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; तथो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि, सुतवा नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि; भावितत्तो नाम, भिक्खवे, पच्‍चेकसम्बुद्धो इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरनिवासी अहोसि।

१३५.

‘‘ये सत्तसारा अनीघा निरासा,

पच्‍चेकमेवज्झगमंसु बोधिं पच्‍चेकमेवज्झगमुं सुबोधिं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)।

तेसं विसल्‍लान नरुत्तमानं,

नामानि मे कित्तयतो सुणाथ॥

‘‘अरिट्ठो उपरिट्ठो तगरसिखी यसस्सी,

सुदस्सनो पियदस्सी च सुसम्बुद्धो बुद्धो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)।

गन्धारो पिण्डोलो उपासभो च,

नीतो तथो सुतवा भावितत्तो॥

‘‘सुम्भो सुभो मतुलो मेथुलो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अट्ठमो च,

अथस्सुमेघो अट्ठसुमेधो (क॰) अनीघो सुदाठो।

पच्‍चेकबुद्धा भवनेत्तिखीणा,

हिङ्गू च हिङ्गो च महानुभावा॥

‘‘द्वे जालिनो मुनिनो अट्ठको च,

अथ कोसल्‍लो बुद्धो अथो सुबाहु।

उपनेमिसो नेमिसो सन्तचित्तो,

सच्‍चो तथो विरजो पण्डितो च॥

‘‘काळूपकाळा विजितो जितो च,

अङ्गो च पङ्गो च गुत्तिजितो च।

पस्सि जहि उपधिदुक्खमूलं पस्सी जही उपधिं दुक्खमूलं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰),

अपराजितो मारबलं अजेसि॥

‘‘सत्था पवत्ता सरभङ्गो लोमहंसो,

उच्‍चङ्गमायो असितो अनासवो।

मनोमयो मानच्छिदो च बन्धुमा,

तदाधिमुत्तो विमलो च केतुमा॥

‘‘केतुम्भरागो च मातङ्गो अरियो,

अथच्‍चुतो अच्‍चुतगामब्यामको।

सुमङ्गलो दब्बिलो सुपतिट्ठितो,

असय्हो खेमाभिरतो च सोरतो॥

‘‘दुरन्‍नयो सङ्घो अथोपि उज्‍जयो,

अपरो मुनि सय्हो अनोमनिक्‍कमो।

आनन्दो नन्दो उपनन्दो द्वादस,

भारद्वाजो अन्तिमदेहधारी अन्तिमदेहधारि (सी॰)॥

‘‘बोधि महानामो अथोपि उत्तरो,

केसी सिखी सुन्दरो द्वारभाजो।

तिस्सूपतिस्सा भवबन्धनच्छिदा,

उपसिखि तण्हच्छिदो च सिखरि उपसीदरी तण्हच्छिदो च सीदरी (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)॥

‘‘बुद्धो अहु मङ्गलो वीतरागो,

उसभच्छिदा जालिनिं दुक्खमूलं।

सन्तं पदं अज्झगमोपनीतो,

उपोसथो सुन्दरो सच्‍चनामो॥

‘‘जेतो जयन्तो पदुमो उप्पलो च,

पदुमुत्तरो रक्खितो पब्बतो च।

मानत्थद्धो सोभितो वीतरागो,

कण्हो च बुद्धो सुविमुत्तचित्तो॥

‘‘एते च अञ्‍ञे च महानुभावा,

पच्‍चेकबुद्धा भवनेत्तिखीणा।

ते सब्बसङ्गातिगते महेसी,

परिनिब्बुते वन्दथ अप्पमेय्ये’’ति॥

इसिगिलिसुत्तं निट्ठितं छट्ठं।

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