✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

महाचालीस

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ २२ मिनट

सूत्र परिचय

यह सूत्र आर्य अष्टांगिक मार्ग के सात अंगों को विस्तार से परिभाषित करता है—लौकिक और “आर्य” पक्षों में विभाजित करते हुए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि ये “आर्य” अंग आपस में किस प्रकार जुड़े हुए हैं, और कैसे वे सभी मिलकर सम्यक-समाधि को सचमुच “आर्य” बनाते हैं—जिसका फल अंततः “आर्य विमुक्ति” है।

इस सूत्र के साथ संयुक्तनिकाय के “मग्ग-संयुक्त” के सूत्रों से यह स्पष्ट होता है कि आर्य अष्टांगिक मार्ग के पहले सात अंगों की भूमिका सम्यक-समाधि को आधार और पोषण देना है। इस दृष्टि से साधना का वास्तविक लक्ष्य अंततः “आर्य सम्यक-समाधि” ही है—अर्थात चार ध्यान-अवस्थाएँ—जो स्वयं भी आर्य हों और साधक को भी आर्य बना दें।

सूत्र के शीर्षक “महाचालीस” का अर्थ अंतिम अनुच्छेद में स्पष्ट किया गया है।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं!"

“भदंत”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—

“भिक्षुओं, मैं ‘आर्य सम्यक-समाधि’ सिखाता हूँ, उसके नींव और अनिवार्य अंगों के साथ। ध्यान देकर गौर से सुनो, मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, भन्ते”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—

“तो, भिक्षुओं, क्या है आर्य सम्यक-समाधि, उसके नींव और अनिवार्य अंगों के साथ?

भिक्षुओं, जब चित्त की एकाग्रता इन सात अंगों से परिष्कृत हो—यही सम्यक-दृष्टि, सम्यक-संकल्प, सम्यक-वचन, सम्यक-कर्मांत, सम्यक-जीविका, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति— तब उसे ‘आर्य सम्यक-समाधि’ कहते हैं, उसके नींव के साथ, और उसके अनिवार्य अंगों के साथ।

सम्यक-दृष्टि

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-दृष्टि को ‘मिथ्या-दृष्टि’ समझता है, और सम्यक-दृष्टि को ‘सम्यक-दृष्टि’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

‘दान (का फ़ल) नहीं है। यज्ञ (=चढ़ावा) नहीं है। आहुति (=बलिदान) नहीं है। सुकृत्य या दुष्कृत्य कर्मों का फ़ल-परिणाम नहीं हैं। लोक नहीं है। परलोक नहीं है। न माता है, न पिता है, न स्वयं से प्रकट होते (“ओपपातिक”) सत्व हैं। न ही दुनिया में ऐसे श्रमण-ब्राह्मण हैं जो सम्यक-साधना कर सम्यक-प्रगति करते हुए विशिष्ट-ज्ञान का साक्षात्कार कर लोक-परलोक होने की घोषणा करते हैं।’

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-दृष्टि है।

और, सम्यक-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-दृष्टि, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-दृष्टि—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली (=संग्रह कराने वाली);
  • आर्य सम्यक-दृष्टि—अनास्रव (=बिना आस्रव के), लोकुत्तर (=संसार के परे ले जाने वाली), मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

‘दान होता है; चढ़ावा होता है; आहुति होती है। अच्छे या बुरे कर्मों के फल-परिणाम होते हैं। लोक होता है; परलोक होता है। माता होती है; पिता होते है। स्वयं से उत्पन्न सत्व होते हैं। और ऐसे श्रमण-ब्राह्मण होते हैं, जो सम्यक-साधना कर, सम्यक-प्रगति करते हुए विशिष्ट-ज्ञान का साक्षात्कार कर, लोक-परलोक होने की घोषणा करते हैं।’

—यह सम्यक-दृष्टि आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली है।

आर्य सम्यक-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की प्रज्ञा, प्रज्ञा-इंद्रिय, प्रज्ञा-बल, धम्म-विचय संबोध्यङ्ग, सम्यक-दृष्टि मार्ग-अंग। 1

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-दृष्टि—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

मिथ्या-दृष्टि को त्यागकर सम्यक-दृष्टि को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-दृष्टि को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-दृष्टि को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। 2 इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-दृष्टि’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-संकल्प

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-संकल्प को ‘मिथ्या-संकल्प’ समझता है, सम्यक-संकल्प को ‘सम्यक-संकल्प’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

  • कामुक संकल्प;
  • दुर्भावनापूर्ण संकल्प;
  • हिंसक संकल्प।

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-संकल्प है।

और, सम्यक-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-संकल्प, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-संकल्प—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-संकल्प—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

  • निष्काम (“नेक्खम्म” =कामुकता से संन्यास) संकल्प;
  • दुर्भावना-विहीन संकल्प;
  • अहिंसक संकल्प।

—यह सम्यक-संकल्प आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली है।

आर्य सम्यक-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की सोच, विचार, संकल्प, ठहराव, तल्लीनता, मन लगाना और वचन-संस्कार। 3

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-संकल्प—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-संकल्प को त्यागकर सम्यक-संकल्प को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-संकल्प को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-संकल्प को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-संकल्प’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-वचन

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-वचन को ‘मिथ्या-वचन’ समझता है, सम्यक-वचन को ‘सम्यक-वचन’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-वचन क्या है, भिक्षुओं?

  • झूठ बोलना,
  • फूट डालने वाली बात करना,
  • कटु वचन बोलना,
  • निरर्थक बातें करना।

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-वचन है।

और, सम्यक-वचन क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-वचन, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-वचन—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-वचन—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-वचन क्या है, भिक्षुओं?

  • झूठ बोलने से विरत रहना,
  • फूट डालने वाले वचन से विरत रहना,
  • कटु वचन से विरत रहना,
  • निरर्थक वचन से विरत रहना।

—यह सम्यक-वचन आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली हैं।

आर्य सम्यक-वचन क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की चार प्रकार के वाणी दुराचार से विरति, परहेज, परिवर्जन, परिहार।

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-वचन—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-वचन को त्यागकर सम्यक-वचन को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-वचन को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-वचन को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-वचन’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-कर्मांत

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-कर्मांत को ‘मिथ्या-कर्मांत’ समझता है, सम्यक-कर्मांत को ‘सम्यक-कर्मांत’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

  • जीवहत्या,
  • चोरी,
  • व्यभिचार।

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-कर्मांत है।

और, सम्यक-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-कर्मांत, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-कर्मांत—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-कर्मांत—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

  • जीवहत्या से विरत रहना,
  • चुराने से विरत रहना,
  • व्यभिचार से विरत रहना।

—यह सम्यक-कर्मांत आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली हैं।

आर्य सम्यक-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की तीन प्रकार के शारीरिक दुराचार से विरति, परहेज, परिवर्जन, परिहार।

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-कर्मांत—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-कर्मांत को त्यागकर सम्यक-कर्मांत को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-कर्मांत को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-कर्मांत को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-कर्मांत’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-जीविका

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-जीविका को ‘मिथ्या-जीविका’ समझता है, सम्यक-जीविका को ‘सम्यक-जीविका’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

  • ढोंग-पाखंड करना, मस्का लगाना, संकेत देना, दूसरों को नीचा दिखाना, लाभ से लाभ ढूँढना। 4

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-जीविका है।

और, सम्यक-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-जीविका, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-जीविका—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-जीविका—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

  • जीवहत्या से विरत रहना,
  • चुराने से विरत रहना,
  • व्यभिचार से विरत रहना।

—यह सम्यक-जीविका आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली हैं।

आर्य सम्यक-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की मिथ्या जीविका से विरति, परहेज, परिवर्जन, परिहार।

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-जीविका—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-जीविका को त्यागकर सम्यक-जीविका को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-जीविका को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-जीविका को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-जीविका’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-विमुक्ति तक

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

  • सम्यक-दृष्टि से, भिक्षुओं, सम्यक-संकल्प होने लगते हैं;
  • सम्यक-संकल्प से सम्यक-वचन होने लगते हैं;
  • सम्यक-वचन से सम्यक-कर्मांत होने लगते हैं;
  • सम्यक-कर्मांत से सम्यक-जीविका होने लगती है;
  • सम्यक-जीविका से सम्यक-प्रयास होने लगता है;
  • सम्यक-प्रयास से सम्यक-स्मृति होने लगती है;
  • सम्यक-स्मृति से सम्यक-समाधि होने लगती है;
  • सम्यक-समाधि से सम्यक-ज्ञान होने लगता है;
  • सम्यक-ज्ञान से सम्यक-विमुक्ति होने लगती है। 5

—इस प्रकार, भिक्षुओं, आठ अंगों से युक्त साधक (“सेक्ख” =सीखने वाला) दस अंगों से युक्त अरहंत होता है।

अभ्यास की पूर्णता

यहाँ सम्यक-ज्ञान से अनेक पाप अकुशल स्वभाव दूर हटने पर अभ्यास अपनी परिपूर्णता प्राप्त करती है। उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

✦ सम्यक-दृष्टि से, भिक्षुओं, मिथ्या-दृष्टि की निर्जरा (=नष्ट) होती है; और मिथ्या-दृष्टि के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-दृष्टि के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-संकल्प से, भिक्षुओं, मिथ्या-संकल्प की निर्जरा होती है; और मिथ्या-संकल्प के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-संकल्प के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-वचन से, भिक्षुओं, मिथ्या-वचन की निर्जरा होती है; और मिथ्या-वचन के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-वचन के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-कर्मांत से, भिक्षुओं, मिथ्या-कर्मांत की निर्जरा होती है; और मिथ्या-कर्मांत के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-कर्मांत के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-जीविका से, भिक्षुओं, मिथ्या-जीविका की निर्जरा होती है; और मिथ्या-जीविका के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-जीविका के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-प्रयास से, भिक्षुओं, मिथ्या-प्रयास की निर्जरा होती है; और मिथ्या-प्रयास के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-प्रयास के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-स्मृति से, भिक्षुओं, मिथ्या-स्मृति की निर्जरा होती है; और मिथ्या-स्मृति के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-स्मृति के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-समाधि से, भिक्षुओं, मिथ्या-समाधि की निर्जरा होती है; और मिथ्या-समाधि के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-समाधि के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-ज्ञान से, भिक्षुओं, मिथ्या-ज्ञान की निर्जरा होती है; और मिथ्या-ज्ञान के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-ज्ञान के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-विमुक्ति से, भिक्षुओं, मिथ्या-विमुक्ति की निर्जरा होती है; और मिथ्या-विमुक्ति के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-विमुक्ति के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

महाचालीस

इस प्रकार, भिक्षुओं, कुशल पक्ष में बीस (धम्म) हैं, और अकुशल पक्ष में बीस। और, अब इस महाचालीस के धम्म उपदेश को प्रवर्तित किया जा चुका है, जिसे कोई श्रमण या ब्राह्मण, देव, मार, या ब्रह्मा, या कोई भी इस लोक में रोक नहीं सकता।

भिक्षुओं, यदि कोई श्रमण या ब्राह्मण ऐसा माने कि इस महाचालीस के धम्म उपदेश की आलोचना की जानी चाहिए, खंडन किया जाना चाहिए, तो वर्तमान जीवन में उसका धर्मानुसार दस प्रकार से खण्डन और आलोचना होगी—

  • यदि वह श्रीमान सम्यक-दृष्टि की आलोचना करता है, तो (दरअसल) मिथ्या-दृष्टि के श्रमण-ब्राह्मण श्रीमानों की पूजा करता है, प्रशंसा करता है।
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-संकल्प की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-वचन की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-कर्मांत की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-जीविका की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-प्रयास की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-स्मृति की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-समाधि की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-ज्ञान की आलोचना…
  • यदि वह श्रीमान सम्यक-विमुक्ति की आलोचना करता है, तो मिथ्या-दृष्टि के श्रमण-ब्राह्मण श्रीमानों की पूजा करता है, प्रशंसा करता है।

भिक्षुओं, यदि कोई श्रमण या ब्राह्मण ऐसा माने कि इस महाचालीस के धम्म उपदेश की आलोचना की जानी चाहिए, खंडन किया जाना चाहिए, तो वर्तमान जीवन में उसका धर्मानुसार इन दस प्रकार से खण्डन और आलोचना होगी।

भले ही, भिक्षुओं, जो उग्र और उद्दंड अहेतुवादी (=जो मानते हैं कि सब अकारण होता है), अक्रियावादी (=जो मानते हैं कि प्रयास से मुक्ति नहीं), नास्तिकवादी (=जो न कर्म, न पुनर्जन्म मानते हैं) भी हैं, वे भी ऐसा नहीं मानते हैं कि इस महाचालीस के धम्म उपदेश की आलोचना की जानी चाहिए, खंडन किया जाना चाहिए। ऐसा क्यों? निंदा होने, फटकारे जाने, गलती निकाले जाने के डर से।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. इन सभी अंगों को, “चार आर्य सत्यों” के आलोक में देखा जाए, तो वे “प्रज्ञा” के ही रूप माने जाते हैं। “धम्मविचय संबोध्यङ्ग”, अर्थात स्वभावों की जाँच, तभी विकसित होता है, जब मन स्वभावों को ठीक से परखता है और देखता है कि क्या कुशल है और क्या अकुशल। यही बात संयुक्तनिकाय ४६.५१ में स्पष्ट की गई है, जहाँ चार आर्य सत्यों और कुशल–अकुशल कर्म के प्रश्न के बीच का संबंध सामने आता है। इसी संदर्भ में मज्झिमनिकाय ९ भी देखने योग्य है। ↩︎

  2. यहाँ स्मृति की भूमिका को ठीक से समझना ज़रूरी है। स्मृति कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है कि बस सही–गलत को स्वीकार करते रहे। बल्कि इसके विपरीत, स्मृति की भूमिका पूरी तरह सक्रिय है, यहाँ भी और मार्ग के हर अंग के साथ भी। अपने मूल अर्थ में स्मृति का मतलब है किसी बात को लगातार याद में बनाए रखना। इसी कारण स्मृति बार-बार चेताती रहती है कि मिथ्या-मार्ग के अंगों को छोड़ना है, और सम्यक-मार्ग के अंगों में प्रवेश करके उन्हीं में टिके रहना है। अकुशल स्वभावों को छोड़ने और कुशल स्वभावों को विकसित करने की इस सक्रिय साधना में स्मृति कैसे काम करती है, इसे अंगुत्तरनिकाय ४.२४५ और ७.६३ में विस्तार से देखा जा सकता है। ↩︎

  3. मज्झिमनिकाय ४४ के अनुसार वाचा-संस्कार “वितक्क” और “विचार” हैं। यहाँ आर्य सम्यक-संकल्प की जो परिभाषा दी गई है, वह प्रथम-ध्यान में उपस्थित संकल्पों की ओर संकेत करती प्रतीत होती है (देखें मज्झिमनिकाय ७८); इस प्रकार यह आर्य सम्यक-संकल्प को सम्यक-समाधि से जोड़ देती है। ↩︎

    • कुहना (ढोंग-पाखंड करना) का सीधा अर्थ है भीतर कुछ, बाहर कुछ। यानी साधु-वेश या आचरण के ज़रिये ऐसा प्रभाव पैदा करना कि लोग अधिक दान करें, जबकि भीतर त्याग या वैराग्य की वास्तविक भावना न हो।
    • लपना (मस्का लगाना) का मतलब है चिकनी-चुपड़ी बात करना, जिनका उद्देश्य सामने वाले को प्रसन्न कर के कुछ हासिल करना हो।
    • नेमित्तिकता (संकेत देना) सीधे माँगने के बजाय संकेतों, इशारों, शिकायतों, या बनावटी विनय के ज़रिये दान की परिस्थिति बनाना।
    • निप्पेसिकता (दूसरों को नीचा दिखाना) का अर्थ है प्रतिद्वंदी भिक्षुओं या अन्य सन्यासियों को तुच्छ, अयोग्य, या कम साधक बताना, ताकि दान और सम्मान उन्हीं से हटकर अपने पक्ष में आ जाए।
    • लाभेन लाभं निजिगीसनता का भाव है—मिले हुए लाभ को आधार बनाकर आगे और लाभ साधने की प्रवृत्ति। दान को संतोष का कारण मानने के बजाय उसे रणनीति बना लेना: कहाँ रुकने से, किससे जुड़ने से, या कैसे व्यवहार करने से आगे अधिक लाभ मिलेगा।

    यह मिथ्या जीविका की बात विशेष तौर पर संन्यासियों और भिक्षुओं पर लागू होती है, जहाँ वे ज़रूरत की चीज़ें और भौतिक लाभ गलत या अशुद्ध तरीकों से हासिल करते हैं। अंगुत्तरनिकाय ५.१७७ में गृहस्थों के लिए गलत आजीविका के पाँच प्रकार बताए गए हैं—

    • शस्त्र-हथियारों का व्यापार,
    • जीवों का व्यापार,
    • मांस का व्यापार,
    • नशे की चीज़ों का व्यापार,
    • ज़हर का व्यापार।
     ↩︎
  4. संयुक्तनिकाय ४८.४६ में आर्य विमुक्ति को “समाधि-इन्द्रिय” के समकक्ष बताया गया है (संयुक्तनिकाय ४८.१० भी देखें)। ↩︎

पालि

१३६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘अरियं वो, भिक्खवे, सम्मासमाधिं देसेस्सामि सउपनिसं सपरिक्खारं। तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –

‘‘कतमो च, भिक्खवे, अरियो सम्मासमाधि सउपनिसो सपरिक्खारो? सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि, सम्मासङ्कप्पो, सम्मावाचा, सम्माकम्मन्तो, सम्माआजीवो, सम्मावायामो, सम्मासति; या खो, भिक्खवे, इमेहि सत्तहङ्गेहि चित्तस्स एकग्गता परिक्खता – अयं वुच्‍चति, भिक्खवे, अरियो सम्मासमाधि सउपनिसो इतिपि, सपरिक्खारो इतिपि। तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? मिच्छादिट्ठिं ‘मिच्छादिट्ठी’ति पजानाति, सम्मादिट्ठिं ‘सम्मादिट्ठी’ति पजानाति – सास्स होति सम्मादिट्ठि।

‘‘कतमा च, भिक्खवे, मिच्छादिट्ठि? ‘नत्थि दिन्‍नं, नत्थि यिट्ठं, नत्थि हुतं, नत्थि सुकतदुक्‍कटानं कम्मानं फलं विपाको, नत्थि अयं लोको, नत्थि परो लोको, नत्थि माता, नत्थि पिता, नत्थि सत्ता ओपपातिका, नत्थि लोके समणब्राह्मणा सम्मग्गता सम्मापटिपन्‍ना ये इमञ्‍च लोकं परञ्‍च लोकं सयं अभिञ्‍ञा सच्छिकत्वा पवेदेन्ती’ति – अयं, भिक्खवे, मिच्छादिट्ठि।

‘‘कतमा च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि? सम्मादिट्ठिंपहं सम्मादिट्ठिमहं (क॰) एवं सम्मासङ्कप्पंपहंक्यादीसुपि, भिक्खवे, द्वायं द्वयं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) टीका ओलोकेतब्बा वदामि – अत्थि, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि सासवा पुञ्‍ञभागिया उपधिवेपक्‍का; अत्थि, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि अरिया अनासवा लोकुत्तरा मग्गङ्गा। कतमा च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि सासवा पुञ्‍ञभागिया उपधिवेपक्‍का ? ‘अत्थि दिन्‍नं, अत्थि यिट्ठं, अत्थि हुतं, अत्थि सुकतदुक्‍कटानं कम्मानं फलं विपाको, अत्थि अयं लोको, अत्थि परो लोको, अत्थि माता, अत्थि पिता, अत्थि सत्ता ओपपातिका, अत्थि लोके समणब्राह्मणा सम्मग्गता सम्मापटिपन्‍ना ये इमञ्‍च लोकं परञ्‍च लोकं सयं अभिञ्‍ञा सच्छिकत्वा पवेदेन्ती’ति – अयं, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि सासवा पुञ्‍ञभागिया उपधिवेपक्‍का।

‘‘कतमा च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि अरिया अनासवा लोकुत्तरा मग्गङ्गा? या खो, भिक्खवे, अरियचित्तस्स अनासवचित्तस्स अरियमग्गसमङ्गिनो अरियमग्गं भावयतो पञ्‍ञा पञ्‍ञिन्द्रियं पञ्‍ञाबलं धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो सम्मादिट्ठि मग्गङ्गं मग्गङ्गा (सी॰ पी॰) – अयं वुच्‍चति, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि अरिया अनासवा लोकुत्तरा मग्गङ्गा। सो मिच्छादिट्ठिया पहानाय वायमति, सम्मादिट्ठिया, उपसम्पदाय, स्वास्स स्वायं (क॰) होति सम्मावायामो। सो सतो मिच्छादिट्ठिं पजहति, सतो सम्मादिट्ठिं उपसम्पज्‍ज विहरति, सास्स सायं (क॰) होति सम्मासति। इतियिमे इतिमे (सी॰), इतिस्सिमे (स्या॰ कं॰ पी॰) तयो धम्मा सम्मादिट्ठिं अनुपरिधावन्ति अनुपरिवत्तन्ति, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि, सम्मावायामो, सम्मासति।

१३७. ‘‘तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? मिच्छासङ्कप्पं ‘मिच्छासङ्कप्पो’ति पजानाति, सम्मासङ्कप्पं ‘सम्मासङ्कप्पो’ति पजानाति, सास्स होति सम्मादिट्ठि ।

‘‘कतमो च, भिक्खवे, मिच्छासङ्कप्पो? कामसङ्कप्पो, ब्यापादसङ्कप्पो, विहिंसासङ्कप्पो – अयं, भिक्खवे, मिच्छासङ्कप्पो।

‘‘कतमो च, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो? सम्मासङ्कप्पंपहं, भिक्खवे, द्वायं वदामि – अत्थि, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को; अत्थि, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो। कतमो च, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को? नेक्खम्मसङ्कप्पो, अब्यापादसङ्कप्पो, अविहिंसासङ्कप्पो – ‘अयं, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को’’’।

‘‘कतमो च, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो? यो खो, भिक्खवे, अरियचित्तस्स अनासवचित्तस्स अरियमग्गसमङ्गिनो अरियमग्गं भावयतो तक्‍को वितक्‍को सङ्कप्पो अप्पना ब्यप्पना चेतसो अभिनिरोपना वचीसङ्खारो – अयं, भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो। सो मिच्छासङ्कप्पस्स पहानाय वायमति, सम्मासङ्कप्पस्स उपसम्पदाय, स्वास्स होति सम्मावायामो। सो सतो मिच्छासङ्कप्पं पजहति, सतो सम्मासङ्कप्पं उपसम्पज्‍ज विहरति; सास्स होति सम्मासति। इतियिमे तयो धम्मा सम्मासङ्कप्पं अनुपरिधावन्ति अनुपरिवत्तन्ति, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि, सम्मावायामो, सम्मासति।

१३८. ‘‘तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? मिच्छावाचं ‘मिच्छावाचा’ति पजानाति, सम्मावाचं ‘सम्मावाचा’ति पजानाति; सास्स होति सम्मादिट्ठि। कतमा च, भिक्खवे, मिच्छावाचा? मुसावादो, पिसुणा वाचा, फरुसा वाचा, सम्फप्पलापो – अयं, भिक्खवे, मिच्छावाचा। कतमा च, भिक्खवे, सम्मावाचा? सम्मावाचंपहं, भिक्खवे, द्वायं वदामि – अत्थि, भिक्खवे, सम्मावाचा सासवा पुञ्‍ञभागिया उपधिवेपक्‍का; अत्थि, भिक्खवे , सम्मावाचा अरिया अनासवा लोकुत्तरा मग्गङ्गा। कतमा च, भिक्खवे, सम्मावाचा सासवा पुञ्‍ञभागिया उपधिवेपक्‍का? मुसावादा वेरमणी, पिसुणाय वाचाय वेरमणी, फरुसाय वाचाय वेरमणी, सम्फप्पलापा वेरमणी – अयं, भिक्खवे, सम्मावाचा सासवा पुञ्‍ञभागिया उपधिवेपक्‍का। कतमा च, भिक्खवे, सम्मावाचा अरिया अनासवा लोकुत्तरा मग्गङ्गा? या खो, भिक्खवे, अरियचित्तस्स अनासवचित्तस्स अरियमग्गसमङ्गिनो अरियमग्गं भावयतो चतूहि वचीदुच्‍चरितेहि आरति विरति पटिविरति वेरमणी – अयं, भिक्खवे, सम्मावाचा अरिया अनासवा लोकुत्तरा मग्गङ्गा। सो मिच्छावाचाय पहानाय वायमति, सम्मावाचाय उपसम्पदाय; स्वास्स होति सम्मावायामो। सो सतो मिच्छावाचं पजहति, सतो सम्मावाचं उपसम्पज्‍ज विहरति; सास्स होति सम्मासति। इतियिमे तयो धम्मा सम्मावाचं अनुपरिधावन्ति अनुपरिवत्तन्ति, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि, सम्मावायामो, सम्मासति।

१३९. ‘‘तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? मिच्छाकम्मन्तं ‘मिच्छाकम्मन्तो’ति पजानाति, सम्माकम्मन्तं ‘सम्माकम्मन्तो’ति पजानाति ; सास्स होति सम्मादिट्ठि। कतमो च, भिक्खवे, मिच्छाकम्मन्तो? पाणातिपातो, अदिन्‍नादानं, कामेसुमिच्छाचारो – अयं, भिक्खवे, मिच्छाकम्मन्तो। कतमो च, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो? सम्माकम्मन्तंपहं, भिक्खवे , द्वायं वदामि – अत्थि, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को; अत्थि, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो। कतमो च, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को? पाणातिपाता वेरमणी, अदिन्‍नादाना वेरमणी, कामेसुमिच्छाचारा वेरमणी – अयं, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को। कतमो च, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो? या खो, भिक्खवे, अरियचित्तस्स अनासवचित्तस्स अरियमग्गसमङ्गिनो अरियमग्गं भावयतो तीहि कायदुच्‍चरितेहि आरति विरति पटिविरति वेरमणी – अयं, भिक्खवे, सम्माकम्मन्तो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो। सो मिच्छाकम्मन्तस्स पहानाय वायमति, सम्माकम्मन्तस्स उपसम्पदाय; स्वास्स होति सम्मावायामो। सो सतो मिच्छाकम्मन्तं पजहति, सतो सम्माकम्मन्तं उपसम्पज्‍ज विहरति; सास्स होति सम्मासति। इतियिमे तयो धम्मा सम्माकम्मन्तं अनुपरिधावन्ति अनुपरिवत्तन्ति, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि, सम्मावायामो, सम्मासति।

१४०. ‘‘तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? मिच्छाआजीवं ‘मिच्छाआजीवो’ति पजानाति, सम्माआजीवं ‘सम्माआजीवो’ति पजानाति; सास्स होति सम्मादिट्ठि। कतमो च, भिक्खवे, मिच्छाआजीवो? कुहना, लपना, नेमित्तिकता, निप्पेसिकता, लाभेन लाभं निजिगीसनता निजिगिं सनता (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) – अयं, भिक्खवे, मिच्छाआजीवो। कतमो च, भिक्खवे, सम्माआजीवो? सम्माआजीवंपहं, भिक्खवे , द्वायं वदामि – अत्थि, भिक्खवे, सम्माआजीवो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को; अत्थि, भिक्खवे, सम्माआजीवो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो। कतमो च, भिक्खवे, सम्माआजीवो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को? इध, भिक्खवे, अरियसावको मिच्छाआजीवं पहाय सम्माआजीवेन जीविकं कप्पेति – अयं, भिक्खवे, सम्माआजीवो सासवो पुञ्‍ञभागियो उपधिवेपक्‍को। कतमो च, भिक्खवे, सम्माआजीवो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो? या खो, भिक्खवे, अरियचित्तस्स अनासवचित्तस्स अरियमग्गसमङ्गिनो अरियमग्गं भावयतो मिच्छाआजीवा आरति विरति पटिविरति वेरमणी – अयं, भिक्खवे, सम्माआजीवो अरियो अनासवो लोकुत्तरो मग्गङ्गो। सो मिच्छाआजीवस्स पहानाय वायमति, सम्माआजीवस्स उपसम्पदाय ; स्वास्स होति सम्मावायामो। सो सतो मिच्छाआजीवं पजहति, सतो सम्माआजीवं उपसम्पज्‍ज विहरति; सास्स होति सम्मासति। इतियिमे तयो धम्मा सम्माआजीवं अनुपरिधावन्ति अनुपरिवत्तन्ति, सेय्यथिदं – सम्मादिट्ठि, सम्मावायामो, सम्मासति।

१४१. ‘‘तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? सम्मादिट्ठिस्स , भिक्खवे, सम्मासङ्कप्पो पहोति, सम्मासङ्कप्पस्स सम्मावाचा पहोति, सम्मावाचस्स सम्माकम्मन्तो पहोति, सम्माकम्मन्तस्स सम्माआजीवो पहोति, सम्माआजीवस्स सम्मावायामो पहोति, सम्मावायामस्स सम्मासति पहोति, सम्मासतिस्स सम्मासमाधि पहोति, सम्मासमाधिस्स सम्माञाणं पहोति, सम्माञाणस्स सम्माविमुत्ति पहोति। इति खो, भिक्खवे, अट्ठङ्गसमन्‍नागतो सेक्खो अट्ठङ्गसमन्‍नागता सेखा पटिपदा (सी॰), अट्ठङ्गसमन्‍नागतो सेखो पाटिपदो (पी॰ क॰) ( ) नत्थि सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰ पोत्थकेसु, दसङ्गसमन्‍नागतो अरहा होति। (तत्रपि सम्माञाणेन अनेके पापका अकुसला धम्मा विगता भावनापारिपूरिं गच्छन्ति)।

१४२. ‘‘तत्र, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति। कथञ्‍च, भिक्खवे, सम्मादिट्ठि पुब्बङ्गमा होति? सम्मादिट्ठिस्स, भिक्खवे, मिच्छादिट्ठि निज्‍जिण्णा होति। ये च मिच्छादिट्ठिपच्‍चया अनेके पापका अकुसला धम्मा सम्भवन्ति ते चस्स निज्‍जिण्णा होन्ति। सम्मादिट्ठिपच्‍चया अनेके कुसला धम्मा भावनापारिपूरिं गच्छन्ति। सम्मासङ्कप्पस्स, भिक्खवे, मिच्छासङ्कप्पो निज्‍जिण्णो होति…पे॰… सम्मावाचस्स, भिक्खवे, मिच्छावाचा निज्‍जिण्णा होति… सम्माकम्मन्तस्स, भिक्खवे, मिच्छाकम्मन्तो निज्‍जिण्णो होति… सम्माआजीवस्स, भिक्खवे, मिच्छाआजीवो निज्‍जिण्णो होति… सम्मावायामस्स , भिक्खवे , मिच्छावायामो निज्‍जिण्णो होति… सम्मासतिस्स, भिक्खवे, मिच्छासति निज्‍जिण्णा होति… सम्मासमाधिस्स, भिक्खवे, मिच्छासमाधि निज्‍जिण्णो होति… सम्माञाणस्स, भिक्खवे, मिच्छाञाणं निज्‍जिण्णं होति… सम्माविमुत्तस्स, भिक्खवे, मिच्छाविमुत्ति निज्‍जिण्णा होति। ये च मिच्छाविमुत्तिपच्‍चया अनेके पापका अकुसला धम्मा सम्भवन्ति ते चस्स निज्‍जिण्णा होन्ति। सम्माविमुत्तिपच्‍चया च अनेके कुसला धम्मा भावनापारिपूरिं गच्छन्ति।

‘‘इति खो, भिक्खवे, वीसति कुसलपक्खा, वीसति अकुसलपक्खा – महाचत्तारीसको धम्मपरियायो पवत्तितो अप्पटिवत्तियो समणेन वा ब्राह्मणेन वा देवेन वा मारेन वा ब्रह्मुना वा केनचि वा लोकस्मिं।

१४३. ‘‘यो हि कोचि, भिक्खवे, समणो वा ब्राह्मणो वा इमं महाचत्तारीसकं धम्मपरियायं गरहितब्बं पटिक्‍कोसितब्बं मञ्‍ञेय्य तस्स दिट्ठेव धम्मे दससहधम्मिका वादानुवादा गारय्हं ठानं आगच्छन्ति – सम्मादिट्ठिं चे भवं गरहति, ये च मिच्छादिट्ठी समणब्राह्मणा ते भोतो पुज्‍जा, ते भोतो पासंसा; सम्मासङ्कप्पं चे भवं गरहति , ये च मिच्छासङ्कप्पा समणब्राह्मणा ते भोतो पुज्‍जा, ते भोतो पासंसा; सम्मावाचं चे भवं गरहति…पे॰… सम्माकम्मन्तं चे भवं गरहति… सम्माआजीवं चे भवं गरहति… सम्मावायामं चे भवं गरहति… सम्मासतिं चे भवं गरहति… सम्मासमाधिं चे भवं गरहति… सम्माञाणं चे भवं गरहति … सम्माविमुत्तिं चे भवं गरहति, ये च मिच्छाविमुत्ती समणब्राह्मणा ते भोतो पुज्‍जा, ते भोतो पासंसा। यो कोचि, भिक्खवे, समणो वा ब्राह्मणो वा इमं महाचत्तारीसकं धम्मपरियायं गरहितब्बं पटिक्‍कोसितब्बं मञ्‍ञेय्य तस्स दिट्ठेव धम्मे इमे दससहधम्मिका वादानुवादा गारय्हं ठानं आगच्छन्ति। येपि ते, भिक्खवे, अहेसुं ओक्‍कला वस्सभञ्‍ञा वयभिञ्‍ञा (क॰) सं॰ नि॰ ३.६२; अ॰ नि॰ ४.३० पस्सितब्बं अहेतुवादा अकिरियवादा नत्थिकवादा तेपि महाचत्तारीसकं धम्मपरियायं न गरहितब्बं नपटिक्‍कोसितब्बं अमञ्‍ञिंसु मञ्‍ञेय्युं (क॰)। तं किस्स हेतु? निन्दाब्यारोसउपारम्भभया’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

महाचत्तारीसकसुत्तं निट्ठितं सत्तमं।

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