✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

आनापान-स्मृति

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ४० मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में मिगारमाता के विहार पूर्वाराम 1 में बहुत से जाने-माने और प्रसिद्ध थेर (=वरिष्ठ) भिक्षुओं के साथ विहार कर रहे थे—जैसे आयुष्मान सारिपुत्त, आयुष्मान महामोग्गल्लान, आयुष्मान महाकस्सप, आयुष्मान महाकच्चान, आयुष्मान महाकोट्ठित, आयुष्मान महाकप्पिन, आयुष्मान महाचुन्द, आयुष्मान अनुरुद्ध, आयुष्मान रेवत, आयुष्मान आनन्द, और दूसरे भी जाने-माने और प्रसिद्ध थेर भिक्षुओं के साथ।

उस समय थेर भिक्षु नए भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित कर रहे थे। कुछ थेर भिक्षु दस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित कर रहे थे। कुछ थेर भिक्षु बीस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित कर रहे थे। कुछ थेर भिक्षु तीस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित कर रहे थे। कुछ थेर भिक्षु चालीस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित कर रहे थे। नए भिक्षु थेर भिक्षुओं से निर्देशित और अनुशासित होकर पहले से अधिक ऊँची अवस्थाओं को जान रहे थे।

उस समय भगवान उपोसथ की पंचदशी पुर्णिमा की रात को भिक्षुसंघ से घिरकर खुले आकाश के नीचे बैठे थे। तब भगवान ने अवलोकन कर भिक्षुसंघ को बिलकुल चुपचाप और मौन बैठे हुए देखकर भिक्षुओं को आमंत्रित किया—

“भिक्षुओं, मैं इस साधनापथ (“पटिपदा”) से संतुष्ट हूँ। मेरा चित्त इस साधनापथ से संतुष्ट है। इसलिए, भिक्षुओं, और भी अधिक मात्रा में वीर्य जगाओ—अप्राप्त (अवस्था) की प्राप्ति के लिए, न पहुँचे तक पहुँचने के लिए, असाक्षात्कार के साक्षात्कार के लिए। मैं कोमुदी चातुर्मास के आने तक 2 इसी श्रावस्ती में रहूँगा।”

तब देश के भिक्षुओं ने सुना, “भगवान कोमुदी चातुर्मास के आने तक श्रावस्ती में ही रहेंगे।” तब देश के भिक्षु भगवान के दर्शन के लिए श्रावस्ती आए।

तब, थेर भिक्षु और भी अधिक नए भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित करने लगे। कुछ थेर भिक्षु दस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित करने लगे। कुछ थेर भिक्षु बीस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित करने लगे। कुछ थेर भिक्षु तीस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित करने लगे। कुछ थेर भिक्षु चालीस भिक्षुओं को निर्देशित और अनुशासित करने लगे। नए भिक्षु थेर भिक्षुओं से निर्देशित और अनुशासित होकर पहले से अधिक ऊँची अवस्थाओं को जानने लगे।

भिक्षुसंघ की महिमा

उस समय भगवान कौमुदी चातुर्मास के उपोसथ की पंचदशी पुर्णिमा की रात को भिक्षुसंघ से घिरकर खुले आकाश के नीचे बैठे थे। तब भगवान ने अवलोकन कर भिक्षुसंघ को बिलकुल चुपचाप और मौन बैठे हुए देखकर भिक्षुओं को आमंत्रित किया—

“परिषद में, भिक्षुओं, भूसा नहीं है। यह परिषद बिना भूसे की है, शुद्ध सार में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार का यह भिक्षुसंघ है, भिक्षुओं। इस प्रकार की यह परिषद है। इस प्रकार की परिषद, भिक्षुओं, उपहार योग्य, सत्कार योग्य, दक्षिणा योग्य, वंदना योग्य, दुनिया के लिए अनुत्तर पुण्यक्षेत्र है। इस प्रकार का यह भिक्षुसंघ है, भिक्षुओं। इस प्रकार की यह परिषद है। इस प्रकार के परिषद को दिया अल्प-दान भी बहुत (फलश्रुत) होता है, और बहुत-दान बहुत अधिक। इस प्रकार का यह भिक्षुसंघ है, भिक्षुओं। इस प्रकार की यह परिषद है।

इस प्रकार की परिषद का दर्शन इस लोक के लिए दुर्लभ है। इस प्रकार का यह भिक्षुसंघ है, भिक्षुओं। इस प्रकार की यह परिषद है। इस प्रकार की परिषद का दर्शन करने के लिए कई योजन (=दर्जनों किलोमीटर) दूर पोटली (=टिफ़िन) बाँधकर जाना भी उचित है।

भिक्षुओं, इस भिक्षुसंघ में ऐसे (आर्य) भिक्षु हैं—

  • जो अरहंत हैं, क्षिणास्रव हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य परिपूर्ण किया हैं, कर्तव्य समाप्त किया हैं, बोझ को नीचे रखा हैं, परम-ध्येय प्राप्त किया हैं, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ दिया हैं, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त हैं।
  • जो निचले पाँच संयोजन तोड़कर (शुद्धवास ब्रह्मलोक में) स्वप्रकट होकर वहीं परिनिर्वाण प्राप्त करेंगे, अब इस लोक में नहीं लौटेंगे (=अनागामी अवस्था)।
  • जो तीन संयोजन तोड़कर, राग-द्वेष-मोह को दुर्बल कर सकृदागामी हैं, जो इस लोक में दुबारा लौटकर अपने दुःखों का अन्त करते हैं।
  • जो तीन संयोजन तोड़कर, श्रोतापन्न हैं—अ-पतन स्वभाव के, निश्चित संबोधि की ओर अग्रसर।

—इस प्रकार के भिक्षु इस भिक्षुसंघ में हैं।


भिक्षुओं, इस भिक्षुसंघ में ऐसे (बोधिपक्खिय धम्म के साधक) भिक्षु हैं—

—इस प्रकार के भिक्षु इस भिक्षुसंघ में हैं।


भिक्षुओं, इस भिक्षुसंघ में ऐसे (ब्रह्मविहार और दुख-पटिपदा के साधक) भिक्षु हैं—

  • जो मेत्ता (=सद्भावना) की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं।
  • जो करुणा की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं।
  • जो मुदिता की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं।
  • जो उपेक्षा (=तटस्थता) की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं।
  • जो अशुभ की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं।
  • जो अनित्य-संज्ञा की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं।

—इस प्रकार के भिक्षु इस भिक्षुसंघ में हैं।


भिक्षुओं, इस भिक्षुसंघ में ऐसे भिक्षु हैं, जो आनापान-स्मृति की समर्पित चित्त से साधना करते हुए विहार करते हैं। भिक्षुओं, आनापान-स्मृति की साधना करना और उसे विकसित करना, महाफलदायी और महालाभकारी होता है।

  • आनापान-स्मृति की साधना करने और उसे विकसित करने से, चारों स्मृतिप्रस्थान परिपूर्ण होते हैं।
  • चारों स्मृतिप्रस्थान की साधना करने और उसे विकसित करने से, सातों संबोध्यङ्ग (संबोधि अंग) परिपूर्ण होते हैं।
  • सातों संबोध्यङ्ग की साधना करने और उसे विकसित करने से, विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होते हैं।

तो, भिक्षुओं, किस प्रकार साधी गई और विकसित की गई आनापान-स्मृति, महाफलदायी और महालाभकारी होती है?

आनापान की मूल विधि

कोई व्यक्ति जंगल में, या पेड़ के तले, या निर्जन ध्यानस्थल में जाकर पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखते हुए बैठता है, और स्मृति को (“परिमुखं”) 3 अपने सामने उपस्थित करता है। वह स्मृतिपूर्वक श्वास लेता है, और स्मृतिपूर्वक श्वास छोड़ता है।

कायानुपस्सना

  • लंबी श्वास लेते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास ले रहा हूँ।’ लंबी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
  • छोटी श्वास लेते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास ले रहा हूँ।’ छोटी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
  • पूरी काया महसूस करते हुए 4 श्वास लेना सीखता है। पूरी काया महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • काया के संस्कार को शान्त करते हुए 5 श्वास लेना सीखता है। काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।

वेदनानुपस्सना

  • प्रीति महसूस करते हुए श्वास लेना सीखता है। प्रीति महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • सुख महसूस करते हुए श्वास लेना सीखता है। सुख महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • चित्त के संस्कारों 6 को महसूस करते हुए श्वास लेना सीखता है। चित्त के संस्कारों को महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • चित्त के संस्कारों को शान्त करते हुए 7 श्वास लेना सीखता है। चित्त के संस्कारों को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।

चित्तानुपस्सना

  • चित्त महसूस करते हुए श्वास लेना सीखता है। चित्त महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • चित्त को प्रसन्न करते हुए श्वास लेना सीखता है। चित्त को प्रसन्न करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • चित्त को समाहित (एकाग्र) करते हुए श्वास लेना सीखता है। चित्त को समाहित करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • चित्त को विमुक्त (आज़ाद) करते हुए श्वास लेना सीखता है। चित्त को विमुक्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है। 8

धम्मानुपस्सना

  • अनित्यता को देखते हुए श्वास लेना सीखता है। अनित्यता को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • विराग (फीका पड़ने/मिटने) को देखते हुए श्वास लेना सीखता है। विराग को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • निरोध (रुकने) को देखते हुए श्वास लेना सीखता है। निरोध को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • परित्याग (छूटने) को देखते हुए श्वास लेना सीखता है। परित्याग को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।

इस प्रकार साधी गई और विकसित की गई आनापान-स्मृति, भिक्षुओं, महाफलदायी और महालाभकारी होती है। 9

चार स्मृतिप्रस्थान की परिपूर्णता

और, भिक्षुओं, कैसे इस प्रकार साधी और विकसित की गई आनापान-स्मृति से चारों स्मृतिप्रस्थान परिपूर्ण होते हैं?

जिस समय, भिक्षुओं, भिक्षु लंबी श्वास लेते/छोड़ते हुए… छोटी श्वास लेते/छोड़ते हुए… पूरी काया महसूस करते हुए… काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास लेना/छोड़ना सीखता है—उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—काया को काया देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। क्योंकि, भिक्षुओं, आश्वास-प्रश्वास (आने-जाने वाली साँस) को मैं काया में एक (अलग) काया कहता हूँ। 10 इसलिए, भिक्षुओं, उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—काया को काया देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

और भिक्षुओं, जिस समय भिक्षु प्रीति महसूस करते हुए… सुख महसूस करते हुए… चित्त के संस्कारोंको महसूस करते हुए… चित्त के संस्कारों को शान्त करते हुए श्वास लेना/छोड़ना सीखता है—उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—वेदना (=अनुभूति) को वेदना देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। क्योंकि, भिक्षुओं, आश्वास-प्रश्वास पर अच्छे से ध्यान देने को मैं वेदना में एक (अलग) वेदना कहता हूँ। 11 इसलिए, भिक्षुओं, उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—वेदना को वेदना देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

और भिक्षुओं, जिस समय भिक्षु चित्त महसूस करते… चित्त को प्रसन्न करते हुए… चित्त को समाहित करते हुए… चित्त को विमुक्त करते हुए श्वास लेना/छोड़ना सीखता है—उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—चित्त को चित्त देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। क्योंकि, भिक्षुओं, मैं कहता हूँ कि विस्मृतिमान और असजग के लिए आनापान-स्मृति नहीं है। 12 इसलिए, भिक्षुओं, उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—चित्त को चित्त देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

और भिक्षुओं, जिस समय भिक्षु अनित्यता को देखते हुए… विराग को देखते हुए… निरोध को देखते हुए… परित्याग को देखते हुए श्वास लेना/छोड़ना सीखता है—उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—धम्म को धम्म देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। उपेक्षा (=तटस्थता) से निरीक्षण कर लालसा और नाराजी त्यागते हुए अच्छे से प्रज्ञापूर्वक देखता है। इसलिए, भिक्षुओं, उस समय भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—धम्म को धम्म देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

इस प्रकार साधी गई और विकसित की गई आनापान-स्मृति, भिक्षुओं, महाफलदायी और महालाभकारी होती है।

सात संबोध्यङ्ग की परिपूर्णता

और, भिक्षुओं, कैसे साधी और विकसित की गई आनापान-स्मृति से सातों संबोध्यङ्ग परिपूर्ण होते हैं?

कायानुपस्सना

(१) जिस समय, भिक्षुओं, भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—काया को काया देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान, उस समय उसकी स्मृति स्थापित होती है, बिना विस्मृत हुए। और, जिस समय भिक्षु की स्मृति स्थापित होती है, बिना विस्मृत हुए, उस समय स्मृति संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस स्मृति-संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(२) इस प्रकार स्मृतिमान होकर विहार करते हुए, वह प्रज्ञापूर्वक धम्म (=स्वभाव) की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है। जब वह इस प्रकार स्मृतिमान होकर विहार करते हुए, प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है, तब धम्म-विचय संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस धम्म-विचय संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(३) जब वह प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है, तब वीर्य जागृत होता है, अथक रूप से। जिस समय भिक्षु प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है, और वीर्य जागृत होता है, अथक रूप से, तब वीर्य संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस वीर्य संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(४) वीर्य जागृत होने पर प्रीति (=रोमांचकारी हर्ष) उपजती है, निरामिष (=शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक)। जिस समय भिक्षु की ऊर्जा जागृत होने पर निरामिष प्रीति उपजती है, तब प्रीति संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस प्रीति संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(५) प्रीति भरे मन से काया प्रशांत होती है, चित्त प्रशांत होता है। जिस समय भिक्षु के प्रीति भरे मन से काया प्रशांत होती है, चित्त प्रशांत होता है, तब प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(६) प्रश्रब्ध काया से सुखी होने पर चित्त समाधिस्त होता है। जिस समय भिक्षु की प्रश्रब्ध काया से सुखी होने पर चित्त समाधिस्त होता है, तब समाधि संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस समाधि संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(७) उस प्रकार के समाहित चित्त को वह अच्छे से उपेक्षा के साथ निरीक्षण करता है। जिस समय भिक्षु उस प्रकार के समाहित चित्त को वह अच्छे से उपेक्षा के साथ निरीक्षण करता है, जब वह ऐसे समाहित चित्त का निरीक्षण तटस्थतापूर्वक करें, तब उपेक्षा संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस उपेक्षा संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

वेदना… चित्ता… धम्मानुपस्सना

(१) जिस समय, भिक्षुओं, भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराजी हटाकर—वेदना को वेदना देखते हुए… चित्त को चित्त देखते हुए… धम्म को धम्म देखते हुए विहार करता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान, उस समय उसकी स्मृति स्थापित होती है, बिना विस्मृत हुए। और, जिस समय भिक्षु की स्मृति स्थापित होती है, बिना विस्मृत हुए, उस समय स्मृति संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस स्मृति-संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(२) इस प्रकार स्मृतिमान होकर विहार करते हुए, वह प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है। जब वह इस प्रकार स्मृतिमान होकर विहार करते हुए, प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है, तब धम्म-विचय संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस धम्म-विचय संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(३) जब वह प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है, तब वीर्य जागृत होता है, अथक रूप से। जिस समय भिक्षु प्रज्ञापूर्वक धम्म की जाँच-पड़ताल करता है, विश्लेषण करता है और विवेकशीलता से समझता है, और वीर्य जागृत होता है, अथक रूप से, तब वीर्य संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस वीर्य संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(४) वीर्य जागृत होने पर प्रीति उपजती है, निरामिष। जिस समय भिक्षु की ऊर्जा जागृत होने पर निरामिष प्रीति उपजती है, तब प्रीति संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस प्रीति संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(५) प्रीति भरे मन से काया प्रशांत होती है, चित्त प्रशांत होता है। जिस समय भिक्षु के प्रीति भरे मन से काया प्रशांत होती है, चित्त प्रशांत होता है, तब प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(६) प्रश्रब्ध काया से सुखी होने पर चित्त समाधिस्त होता है। जिस समय भिक्षु की प्रश्रब्ध काया से सुखी होने पर चित्त समाधिस्त होता है, तब समाधि संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस समाधि संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

(७) उस प्रकार के समाहित चित्त को वह अच्छे से उपेक्षा के साथ निरीक्षण करता है। जिस समय भिक्षु उस प्रकार के समाहित चित्त को वह अच्छे से उपेक्षा के साथ निरीक्षण करता है, जब वह ऐसे समाहित चित्त का निरीक्षण तटस्थतापूर्वक करें, तब उपेक्षा संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उस उपेक्षा संबोध्यङ्ग की साधना करता है, और विकसित कर उसे परिपूर्ण करता है।

इस प्रकार साधे गए और विकसित किए गए चार स्मृतिप्रस्थान, भिक्षुओं, सातों संबोध्यङ्ग परिपूर्ण करते हैं।

विद्या और विमुक्ति

और, भिक्षुओं, कैसे साधे और विकसित किए सात संबोध्यङ्ग से विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होती है?

भिक्षुओं, कोई भिक्षु—

  • स्मृति संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • धम्म-विचय संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • वीर्य संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • प्रीति संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • समाधि संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • उपेक्षा संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो। 13

इस प्रकार साधे गए और विकसित किए गए सात संबोध्यङ्ग से, भिक्षुओं, विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होती है।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. जेतवन के पश्चात श्रावस्ती का दूसरा सबसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित विहार पूर्वाराम था, जिसे “मिगारमातुपसाद”, अर्थात मिगारमाता का महल, भी कहा जाता था। यह विहार जेतवन के मुख्य द्वार से पूर्व दिशा में, लगभग २ किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। शांत वातावरण में स्थित यह स्थान बुद्ध के निवास और उपदेश के लिए उपयुक्त था, जहाँ उन्होंने कई बार वर्षावास भी किया।

    इस विहार का निर्माण महाउपासिका विशाखा ने कराया था, जो बुद्धकाल की महानतम दायकों में मानी जाती हैं। विशाखा को “मिगार की माँ” के नाम से जाना जाता है। यह नामकरण साधारण नहीं था—मिगार, जो उसका ससुर था, उसे विशाखा ने धर्म में प्रवृत्त किया और उसे उपासक बनाया। इस धार्मिक उत्थान के कारण, यद्यपि वह सांसारिक दृष्टि से उसकी बहू थी, धर्म की दृष्टि से वह उसकी ‘माँ’ बन गई। ↩︎

  2. वर्षावास सामान्यतः तीन महीनों का होता है, जिसमें भिक्षु एक ही विहार में ठहरने का अधिष्ठान लेते हैं। ये तीन महीने पूरे होते ही वे कुछ समय तक वहीं रुकते हैं—कठिन की प्रक्रिया पूरी करने, चीवर सिलने, और आगे के भ्रमण की तैयारी करने के लिए। पहले यह चलन था कि जो भिक्षु वर्षावास किसी अन्य स्थान पर बिताकर आए होते, वे भगवान बुद्ध के दर्शन हेतु श्रावस्ती पहुँचते। यह महिना, जो अक्टूबर और नवंबर की पूर्णिमाओं के बीच आता है, कार्तिक कहलाता है, जिसका नाम कार्तिक नक्षत्र से जुड़ा है। कार्तिक का अंतिम दिन कोमुदी पूर्णिमा होता है। कहा जाता है कि इस समय श्वेत कमल खिलते हैं, और बरसात के बाद के साफ आकाश में चंद्रमा असाधारण रूप से उज्ज्वल दिखाई देता है। भिक्षुओं के लिए यह शीतल मौसम विशेष रूप से सुखद और उत्साहजनक होता है, क्योंकि अब वे स्वतंत्र होते हैं—जहाँ चाहें, वहाँ जाने के लिए। ↩︎

  3. “परिमुखं” का अर्थ केवल “नाक की नोक” या “मुख के ऊपर” मान लेना ठीक नहीं है, भले ही कई शताब्दियों बाद अभिधम्म में ऐसा कहा गया हो। यह शब्द एक तय-सा वाक्यांश बनकर हर तरह के ध्यान में आता है, यहाँ तक कि उन ध्यानों में भी जिनका शरीर से सीधा लेना-देना नहीं है, जैसे ब्रह्मविहार-भावना (अंगुत्तरनिकाय ३.६४)। विनयपिटक में तो इसका इशारा साफ़ तौर पर “छाती” या “छाती के सामने” की ओर जाता है। इसलिए इसे किसी एक शारीरिक बिंदु तक बाँध देना ठीक नहीं बैठता। “परिमुखं” का मूल आशय है कि ध्यान (स्मृति) को कहीं पीछे या धुंधला नहीं रखना है, बल्कि उसे प्राथमिकता देकर बिल्कुल ‘सामने’ लाना है, जैसे हम किसी महत्वपूर्ण वस्तु को अपनी मेज़ पर ठीक सामने रखते हैं। ‘उपस्थित’ करने का मतलब यह है कि जो स्मृति बिखरी हुई थी या अनुपस्थित-सी थी, उसे स्वयं सामने लाया जाए। जो चीज़ मानो खो-सी गई थी, उसे फिर से वहाँ हाज़िर किया जाए। अर्थात, स्मृति अपने आप प्रकट नहीं होती; उसे सक्रिय और सचेत प्रयास से सामने लाकर टिकाए रखना पड़ता है। ↩︎

  4. अट्ठकथा यहाँ “काया” का अर्थ “पूरी श्वास की लंबाई” बताती हैं, लेकिन इस संदर्भ में यह बात ठीक नहीं बैठती—इसके तीन साफ़ कारण हैं:

    पहला, आनापानस्मृति के शुरुआती दो चरणों में ही साधक को श्वास की पूरी लंबाई का बोध होना ज़रूरी है। अगर पूरी श्वास का पता ही न हो, तो यह कैसे समझ आएगा कि श्वास लंबी है या छोटी?

    दूसरा, चौथे कदम पर, बिना किसी नई परिभाषा के, श्वास को “काय-संस्कार” कहा गया है। अगर भगवान एक ही जगह श्वास के लिए दो अलग शब्द (“काया” और “काय-संस्कार”) अलग-अलग अर्थों में इस्तेमाल कर रहे होते, तो वे यह साफ़ बताते कि यहाँ शब्द का अर्थ बदला जा रहा है। वे ऐसा करते भी हैं, जैसे आगे समझाते हैं कि श्वास-ध्यान के पहले चार चरण काया पर ही ध्यान करने से जुड़े हैं। लेकिन यहाँ ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया।

    तीसरा, अन्य सूत्रों से पता चलता है कि चौथा कदम चित्त को चतुर्थ-ध्यान की ओर ले जाता है, जहाँ श्वास भीतर-बाहर लगभग शांत हो जाती है और शरीर शुद्ध, उजली जागरूकता से भर जाता है। लेकिन श्वास को शांत करने से पहले ज़रूरी है कि जागरूकता पूरे शरीर में फैले। इसलिए श्वास के शांत होने से पहले एक ऐसा कदम होना चाहिए, जिसमें ध्यान पूरे शरीर के कोने-कोने में सूक्ष्मता से भर जाए। और यही वह कदम है।

    इसलिए यहाँ “काया” का मतलब केवल श्वास की लंबाई नहीं, बल्कि पूरे शरीर में फैली हुई जागरूकता को समझना अधिक सुसंगत और अर्थपूर्ण लगता है। ↩︎

  5. मज्झिमनिकाय ४४ के अनुसार काया के संस्कार आश्वास-प्रश्वास को ही कहा गया है। क्योंकि, साँस सीधे काया से जुड़ी हुई प्रक्रिया है, इसलिए वही काया-संस्कार कहलाती है। चाहें तो इसे “शारीरिक हलचल” कह लें, या फिर शरीर में चल रहे ऊर्जा-प्रवाह के रूप में समझ लें, जिसे ध्यान में धीरे-धीरे शांत किया जाता है। अंगुत्तरनिकाय १०.२० बताता है कि काया-संस्कार का शांत होना चतुर्थ-ध्यान में ही होता है। और संयुक्तनिकाय ३६.११ तथा अंगुत्तरनिकाय ९.३१ के अनुसार, चतुर्थ-ध्यान में पहुँचकर साँस भीतर-बाहर लगभग पूरी तरह रुक जाती है। उस अवस्था में मानस, यानी जागरूकता, पूरे शरीर में, और मानो शरीर के बाहर तक भी, गुब्बारे की तरह फैल जाती है। ↩︎

  6. मज्झिमनिकाय ४४ के अनुसार “संज्ञा और वेदना” दोनों चैतसिक हैं, सीधे चित्त से जुड़े हुए। इसी कारण “संज्ञा–वेदना” का जोड़ ही चित्त-संस्कार कहलाता है। वास्तव में, चित्त में जो तरह-तरह के संस्कार बनते रहते हैं, वे इसी संज्ञा और वेदना के मेल से बनते हैं। उदाहरण के लिए, “मेरा पति” एक संज्ञा है। यदि इसके साथ “सुखद वेदना” जुड़ी हो, तो चित्त-संस्कार एक तरह का बनेगा; और यदि इसी संज्ञा के साथ “दुखद वेदना” जुड़ जाए, तो चित्त-संस्कार पूरी तरह बदल जाएगा। वस्तु वही है, संज्ञा वही है, पर वेदना बदलते ही चित्त की बनावट बदल जाती है। इस चरण में साधक को यही देखना है कि वेदना कैसे संज्ञा से जुड़कर चित्त-संस्कार बनाती है, और यह भी महसूस करना है कि संज्ञा बदलते ही वेदना कैसे बदल जाती है। यही चित्त-संस्कार को प्रत्यक्ष देखने की साधना है। ↩︎

  7. एक ही अनुभव पर अलग-अलग संज्ञा रखने से चित्त-संस्कार बदल जाते हैं—कभी शांत, कभी बेचैन। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को “मेरा शत्रु” की संज्ञा देने पर चित्त में कसाव, चिढ़ या द्वेष उठ सकता है; लेकिन उसी व्यक्ति को “एक पीड़ित मनुष्य” के रूप में देखने पर वही चित्त कुछ नरम पड़ जाता है। इसी तरह, “मेरा शरीर” की स्थूल संज्ञा के साथ भारीपन या असहजता जुड़ सकती है; लेकिन जब संज्ञा को बदलकर “धातुओं का संयोग” या “क्षण-क्षण बदलती प्रक्रिया” देखा जाता है, तो वेदना हल्की हो जाती है और चित्त-संस्कार शांत होने लगते हैं। इस कदम में साधक जान-बूझकर स्थूल संज्ञाओं को छोड़ता है और उनके स्थान पर सूक्ष्म, फिर सूक्ष्मतम संज्ञाओं का उपयोग करता है। जैसे-जैसे संज्ञा सूक्ष्म होती जाती है, वैसे-वैसे चित्त के संस्कार शांत होने लगते हैं। ↩︎

  8. अंगुत्तरनिकाय ९.३४ यह दिखाता है कि ध्यान की प्रगति में चित्त कैसे कदम-दर-कदम हल्के होते हुए मुक्त होता है। जैसे-जैसे साधक ध्यान के क्रम में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे पहले स्थूल और भारी मानसिक अवस्थाएँ छूटती जाती हैं, फिर उनसे भी अधिक सूक्ष्म बोझ छोड़ दिए जाते हैं। हालाँकि यह मुक्ति स्थायी नहीं, बल्कि उस अवस्था में अस्थायी रूप से घटती है। लेकिन हर चरण में चित्त पहले से अधिक हल्का और साफ़ होता जाता है।

    वहीं मज्झिमनिकाय १११ यह बताता है कि साधक केवल ध्यान में डूबा ही नहीं रहता, बल्कि प्रज्ञा के साथ देखता भी है। वह किसी ध्यान अवस्था में स्थित रहते हुए ही उसके घटकों को पहचान सकता है, और आवश्यकता पड़ने पर उन्हीं घटकों से छूट भी सकता है, बिना उस अवस्था से गिरे। संक्षेप में, एक ओर चित्त ध्यान-अवस्थाओं के माध्यम से क्रमशः बोझ छोड़ना सीखता है, और दूसरी ओर प्रज्ञा के सहारे उन्हीं सूक्ष्म अवस्थाओं से भी आसक्ति छोड़ना सीखता है। यही समाधि और प्रज्ञा का, या कहें समथ और विपस्सना का संयुक्त अभ्यास है। ↩︎

  9. इस सोलह चरणों वाली आनापान-स्मृति को व्यवहार में उतारने की क्रमबद्ध विधि समझने के लिए हमारी मार्गदर्शिका का यह लेख देखें: 👉 आनापान-स्मृति की मूल विधि ↩︎

  10. कायेसु कायञ्ञतराहं—अर्थात, काया में एक (अलग) काया। इसका अर्थ कई तरह से समझा जा सकता है। पहला अर्थ है—काया का कोई एक पहलू। काया चार महाभूतों से बनी है: पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु। इसी काया में आश्वास-प्रश्वास को आप केवल वायु-धातु के रूप में भी देख सकते हैं; या गर्म-शीतल के रूप में अग्नि+वायु; या फिर गीलापन-सूखापन-गर्मी-शीतलता के रूप में जल+अग्नि+वायु। इसी कारण कुछ साधक केवल साँस के सहारे अपनी काया का तापमान और जल-तत्व तक को नियंत्रित कर लेते हैं।

    दूसरा अर्थ है—ऊर्जा के रूप में। काया मूलतः ऊर्जा के स्तर पर काम करती है। जैसे श्वास भीतर-बाहर आती-जाती है, वैसे ही शरीर में ऊर्जा का प्रवाह चलता रहता है। यदि आप लगातार गहरी-गहरी श्वास भीतर लेते रहें, तो ऊर्जा बढ़ती है और काया उत्साहित या बेचैन-सी लगने लगती है। इसके विपरीत, यदि आप लंबी श्वास बाहर छोड़ते रहें, तो ऊर्जा का बहिर्गमन होता है और काया ढीली, शांत या थोड़ी निरुत्साहित-सी महसूस होती है। इसी वजह से कुछ साधक केवल साँस के माध्यम से अपनी नींद, आलस, बेचैनी, उत्साह, शक्ति और गति तक को नियंत्रित कर पाते हैं। ↩︎

  11. आश्वास–प्रश्वास केवल कोई यांत्रिक शारीरिक क्रिया नहीं है। यदि ऐसा होता, तो श्वास-ध्यान मात्र कायानुपस्सना तक सीमित रह जाता। लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भौतिक प्रक्रिया (श्वास) जब मानसिक (चित्त) से जुड़ती है, तभी वेदना महसूस होती है। यदि चित्त बेचैन या अशांत हो, तो श्वास के साथ भीतर तनाव या दर्द महसूस होता है। और जैसे-जैसे चित्त स्थिर, शांत और एकाग्र होता जाता है, वैसे-वैसे श्वास के साथ प्रीति, सुख या तटस्थ वेदना उभरने लगती है। इन्हीं उभरती हुई वेदनाओं पर “साधुकं मनसिकारं”, अर्थात अच्छे से ध्यान देना, मूल आनापान विधि का आवश्यक अंग है।

    दूसरी बात, यहाँ यह स्पष्ट होती है कि साधक को श्वास को आधार बनाए रखना होता है। वेदनाओं पर ध्यान का अर्थ श्वास को छोड़ देना नहीं है, बल्कि श्वास पर टिके रहते हुए यह देखना है कि वेदनाएँ कैसे उभरती हैं और कैसे शांत होती हैं। ↩︎

  12. यहाँ व्याख्या की शैली बदलती है, लेकिन आशय वही रहता है। मज्झिमनिकाय १० में चित्तानुपस्सना के अंतर्गत “लोभ, द्वेष और मोह” से युक्त चित्त-स्थितियाँ भी आती हैं। यानी वे अवस्थाएँ जो विस्मृति और असजगता में अनुभव होती हैं। इसके विपरीत, आनापान-स्मृति में साधक का ध्यान क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतम की ओर बढ़ता है। इसलिए यह अभ्यास किसी विस्मृत या असजग व्यक्ति का नहीं, बल्कि जागरूक और स्मृतिमान के लिए है। ↩︎

  13. यहाँ के अंतिम तीन पद लगभग वही हैं जो आनापान-स्मृति के अंतिम तीन चरणों में आते हैं—विराग, निरोध, और परित्याग। इससे यह स्पष्ट होता है कि ये सभी साधनाएँ आपस में कितनी गहराई से जुड़ती हैं। भले ही साधना-मार्ग अलग-अलग दिखायी देते हो, लेकिन साधना-प्रवाह एक ही है। ↩︎

पालि

१४४. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति पुब्बारामे मिगारमातुपासादे सम्बहुलेहि अभिञ्‍ञातेहि अभिञ्‍ञातेहि थेरेहि सावकेहि सद्धिं – आयस्मता च सारिपुत्तेन आयस्मता च महामोग्गल्‍लानेन महामोग्गलानेन (क॰) आयस्मता च महाकस्सपेन आयस्मता च महाकच्‍चायनेन आयस्मता च महाकोट्ठिकेन आयस्मता च महाकप्पिनेन आयस्मता च महाचुन्देन आयस्मता च अनुरुद्धेन आयस्मता च रेवतेन आयस्मता च आनन्देन, अञ्‍ञेहि च अभिञ्‍ञातेहि अभिञ्‍ञातेहि थेरेहि सावकेहि सद्धिं।

तेन खो पन समयेन थेरा भिक्खू नवे भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति। अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू दसपि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति, अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू वीसम्पि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति, अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू तिंसम्पि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति, अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू चत्तारीसम्पि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति। ते च नवा भिक्खू थेरेहि भिक्खूहि ओवदियमाना अनुसासियमाना उळारं पुब्बेनापरं विसेसं जानन्ति पजानन्ति (स्या॰ कं॰), सञ्‍जानन्ति (क॰)।

१४५. तेन खो पन समयेन भगवा तदहुपोसथे पन्‍नरसे पवारणाय पुण्णाय पुण्णमाय रत्तिया भिक्खुसङ्घपरिवुतो अब्भोकासे निसिन्‍नो होति। अथ खो भगवा तुण्हीभूतं तुण्हीभूतं भिक्खुसङ्घं अनुविलोकेत्वा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘आरद्धोस्मि, भिक्खवे, इमाय पटिपदाय; आरद्धचित्तोस्मि, भिक्खवे, इमाय पटिपदाय। तस्मातिह, भिक्खवे, भिय्योसोमत्ताय वीरियं आरभथ अप्पत्तस्स पत्तिया, अनधिगतस्स अधिगमाय , असच्छिकतस्स सच्छिकिरियाय। इधेवाहं सावत्थियं कोमुदिं चातुमासिनिं आगमेस्सामी’’ति। अस्सोसुं खो जानपदा भिक्खू – ‘‘भगवा किर तत्थेव सावत्थियं कोमुदिं चातुमासिनिं आगमेस्सती’’ति। ते जानपदा भिक्खू सावत्थिं सावत्थियं (स्या॰ कं॰ पी॰ क॰) ओसरन्ति भगवन्तं दस्सनाय। ते च खो थेरा भिक्खू भिय्योसोमत्ताय नवे भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति। अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू दसपि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति, अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू वीसम्पि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति , अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू तिंसम्पि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति, अप्पेकच्‍चे थेरा भिक्खू चत्तारीसम्पि भिक्खू ओवदन्ति अनुसासन्ति। ते च नवा भिक्खू थेरेहि भिक्खूहि ओवदियमाना अनुसासियमाना उळारं पुब्बेनापरं विसेसं जानन्ति।

१४६. तेन खो पन समयेन भगवा तदहुपोसथे पन्‍नरसे कोमुदिया चातुमासिनिया पुण्णाय पुण्णमाय रत्तिया भिक्खुसङ्घपरिवुतो अब्भोकासे निसिन्‍नो होति। अथ खो भगवा तुण्हीभूतं तुण्हीभूतं भिक्खुसङ्घं अनुविलोकेत्वा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘अपलापायं, भिक्खवे, परिसा; निप्पलापायं, भिक्खवे, परिसा; सुद्धा सारे सुद्धसारे पतिट्ठिता (स्या॰ कं॰ पी॰) पतिट्ठिता। तथारूपो अयं, भिक्खवे, भिक्खुसङ्घो; तथारूपा अयं, भिक्खवे, परिसा यथारूपा परिसा आहुनेय्या पाहुनेय्या दक्खिणेय्या अञ्‍जलिकरणीया अनुत्तरं पुञ्‍ञक्खेत्तं लोकस्स। तथारूपो अयं, भिक्खवे, भिक्खुसङ्घो; तथारूपा अयं, भिक्खवे, परिसा यथारूपाय परिसाय अप्पं दिन्‍नं बहु होति, बहु दिन्‍नं बहुतरं। तथारूपो अयं, भिक्खवे, भिक्खुसङ्घो; तथारूपा अयं, भिक्खवे, परिसा यथारूपा परिसा दुल्‍लभा दस्सनाय लोकस्स। तथारूपो अयं, भिक्खवे, भिक्खुसङ्घो; तथारूपा अयं, भिक्खवे, परिसा यथारूपं परिसं अलं योजनगणनानि दस्सनाय गन्तुं पुटोसेनापि’’ पुटोसेनापि, तथारूपो अयं भिक्खवे भिक्खुसंघो, तथारूपा अयं परिसा (सी॰ पी॰ क॰)।

१४७. ‘‘सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे अरहन्तो खीणासवा वुसितवन्तो कतकरणीया ओहितभारा अनुप्पत्तसदत्था परिक्खीणभवसंयोजना सम्मदञ्‍ञाविमुत्ता – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे । सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे पञ्‍चन्‍नं ओरम्भागियानं संयोजनानं परिक्खया ओपपातिका तत्थ परिनिब्बायिनो अनावत्तिधम्मा तस्मा लोका – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे। सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे तिण्णं संयोजनानं परिक्खया रागदोसमोहानं तनुत्ता सकदागामिनो सकिदेव सकिं देव (क॰) इमं लोकं आगन्त्वा दुक्खस्सन्तं करिस्सन्ति – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे । सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे तिण्णं संयोजनानं परिक्खया सोतापन्‍ना अविनिपातधम्मा नियता सम्बोधिपरायना – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे।

‘‘सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे चतुन्‍नं सतिपट्ठानानं भावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे। सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे चतुन्‍नं सम्मप्पधानानं भावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति…पे॰… चतुन्‍नं इद्धिपादानं… पञ्‍चन्‍नं इन्द्रियानं… पञ्‍चन्‍नं बलानं… सत्तन्‍नं बोज्झङ्गानं… अरियस्स अट्ठङ्गिकस्स मग्गस्स भावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे। सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे मेत्ताभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति… करुणाभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति… मुदिताभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति… उपेक्खाभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति… असुभभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति… अनिच्‍चसञ्‍ञाभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति – एवरूपापि, भिक्खवे, सन्ति भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे। सन्ति, भिक्खवे, भिक्खू इमस्मिं भिक्खुसङ्घे आनापानस्सतिभावनानुयोगमनुयुत्ता विहरन्ति। आनापानस्सति, भिक्खवे, भाविता बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा। आनापानस्सति, भिक्खवे, भाविता बहुलीकता चत्तारो सतिपट्ठाने परिपूरेति। चत्तारो सतिपट्ठाना भाविता बहुलीकता सत्त बोज्झङ्गे परिपूरेन्ति। सत्त बोज्झङ्गा भाविता बहुलीकता विज्‍जाविमुत्तिं परिपूरेन्ति।

१४८. ‘‘कथं भाविता च, भिक्खवे, आनापानस्सति कथं बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा? इध, भिक्खवे, भिक्खु अरञ्‍ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्‍ञागारगतो वा निसीदति पल्‍लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। सो सतोव अस्ससति सतोव सतो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) पस्ससति।

‘‘दीघं वा अस्ससन्तो ‘दीघं अस्ससामी’ति पजानाति, दीघं वा पस्ससन्तो ‘दीघं पस्ससामी’ति पजानाति; रस्सं वा अस्ससन्तो ‘रस्सं अस्ससामी’ति पजानाति, रस्सं वा पस्ससन्तो ‘रस्सं पस्ससामी’ति पजानाति; ‘सब्बकायपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सब्बकायपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।

‘‘‘पीतिपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पीतिपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘सुखपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सुखपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘चित्तसङ्खारपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘चित्तसङ्खारपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।

‘‘‘चित्तपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘चित्तपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘अभिप्पमोदयं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘अभिप्पमोदयं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति ; ‘समादहं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘समादहं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘विमोचयं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘विमोचयं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।

‘‘‘अनिच्‍चानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘अनिच्‍चानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘विरागानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘विरागानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘निरोधानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘निरोधानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति। एवं भाविता खो, भिक्खवे, आनापानस्सति एवं बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा।

१४९. ‘‘कथं भाविता च, भिक्खवे, आनापानस्सति कथं बहुलीकता चत्तारो सतिपट्ठाने परिपूरेति? यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु दीघं वा अस्ससन्तो ‘दीघं अस्ससामी’ति पजानाति, दीघं वा पस्ससन्तो ‘दीघं पस्ससामी’ति पजानाति; रस्सं वा अस्ससन्तो ‘रस्सं अस्ससामी’ति पजानाति, रस्सं वा पस्ससन्तो ‘रस्सं पस्ससामी’ति पजानाति; ‘सब्बकायपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सब्बकायपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; काये कायानुपस्सी, भिक्खवे, तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं। कायेसु कायञ्‍ञतराहं, भिक्खवे, एवं वदामि यदिदं – अस्सासपस्सासा। तस्मातिह, भिक्खवे, काये कायानुपस्सी तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं।

‘‘यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु ‘पीतिपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पीतिपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘सुखपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सुखपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘चित्तसङ्खारपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘चित्तसङ्खारपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; वेदनासु वेदनानुपस्सी, भिक्खवे, तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं। वेदनासु वेदनाञ्‍ञतराहं, भिक्खवे, एवं वदामि यदिदं – अस्सासपस्सासानं साधुकं मनसिकारं। तस्मातिह, भिक्खवे, वेदनासु वेदनानुपस्सी तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं।

‘‘यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु ‘चित्तपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘चित्तपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘अभिप्पमोदयं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘अभिप्पमोदयं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘समादहं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘समादहं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘विमोचयं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘विमोचयं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; चित्ते चित्तानुपस्सी, भिक्खवे, तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं। नाहं, भिक्खवे, मुट्ठस्सतिस्स असम्पजानस्स आनापानस्सतिं वदामि। तस्मातिह, भिक्खवे, चित्ते चित्तानुपस्सी तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं।

‘‘यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु ‘अनिच्‍चानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘अनिच्‍चानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘विरागानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘विरागानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘निरोधानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘निरोधानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; धम्मेसु धम्मानुपस्सी, भिक्खवे, तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं। सो यं तं अभिज्झादोमनस्सानं पहानं तं पञ्‍ञाय दिस्वा साधुकं अज्झुपेक्खिता होति। तस्मातिह, भिक्खवे, धम्मेसु धम्मानुपस्सी तस्मिं समये भिक्खु विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं।

‘‘एवं भाविता खो, भिक्खवे, आनापानस्सति एवं बहुलीकता चत्तारो सतिपट्ठाने परिपूरेति।

१५०. ‘‘कथं भाविता च, भिक्खवे, चत्तारो सतिपट्ठाना कथं बहुलीकता सत्त बोज्झङ्गे परिपूरेन्ति? यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं, उपट्ठितास्स तस्मिं समये सति होति असम्मुट्ठा अप्पम्मुट्ठा (स्या॰ कं॰)। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो उपट्ठिता सति होति असम्मुट्ठा, सतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति। सतिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, सतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘सो तथासतो विहरन्तो तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनति पविचयति पविचरति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) परिवीमंसं आपज्‍जति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु तथासतो विहरन्तो तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनति पविचयति परिवीमंसं आपज्‍जति, धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, धम्मविचयसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘तस्स तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनतो पविचयतो परिवीमंसं आपज्‍जतो आरद्धं होति वीरियं असल्‍लीनं। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनतो पविचयतो परिवीमंसं आपज्‍जतो आरद्धं होति वीरियं असल्‍लीनं, वीरियसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, वीरियसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, वीरियसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘आरद्धवीरियस्स उप्पज्‍जति पीति निरामिसा। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो आरद्धवीरियस्स उप्पज्‍जति पीति निरामिसा, पीतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, पीतिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, पीतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘पीतिमनस्स कायोपि पस्सम्भति, चित्तम्पि पस्सम्भति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो पीतिमनस्स कायोपि पस्सम्भति, चित्तम्पि पस्सम्भति, पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘पस्सद्धकायस्स सुखिनो चित्तं समाधियति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो पस्सद्धकायस्स सुखिनो चित्तं समाधियति, समाधिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, समाधिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, समाधिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘सो तथासमाहितं चित्तं साधुकं अज्झुपेक्खिता होति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु तथासमाहितं चित्तं साधुकं अज्झुपेक्खिता होति, उपेक्खासम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, उपेक्खासम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, उपेक्खासम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

१५१. ‘‘यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु वेदनासु…पे॰… चित्ते… धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं, उपट्ठितास्स तस्मिं समये सति होति असम्मुट्ठा। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो उपट्ठिता सति होति असम्मुट्ठा, सतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, सतिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, सतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘सो तथासतो विहरन्तो तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनति पविचयति परिवीमंसं आपज्‍जति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु तथासतो विहरन्तो तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनति पविचयति परिवीमंसं आपज्‍जति, धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, धम्मविचयसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘तस्स तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनतो पविचयतो परिवीमंसं आपज्‍जतो आरद्धं होति वीरियं असल्‍लीनं। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो तं धम्मं पञ्‍ञाय पविचिनतो पविचयतो परिवीमंसं आपज्‍जतो आरद्धं होति वीरियं असल्‍लीनं, वीरियसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, वीरियसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, वीरियसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘आरद्धवीरियस्स उप्पज्‍जति पीति निरामिसा। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो आरद्धवीरियस्स उप्पज्‍जति पीति निरामिसा, पीतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, पीतिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, पीतिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘पीतिमनस्स कायोपि पस्सम्भति, चित्तम्पि पस्सम्भति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो पीतिमनस्स कायोपि पस्सम्भति, चित्तम्पि पस्सम्भति, पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘पस्सद्धकायस्स सुखिनो चित्तं समाधियति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खुनो पस्सद्धकायस्स सुखिनो चित्तं समाधियति, समाधिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, समाधिसम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, समाधिसम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति।

‘‘सो तथासमाहितं चित्तं साधुकं अज्झुपेक्खिता होति। यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु तथासमाहितं चित्तं साधुकं अज्झुपेक्खिता होति, उपेक्खासम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरद्धो होति, उपेक्खासम्बोज्झङ्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति, उपेक्खासम्बोज्झङ्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गच्छति। एवं भाविता खो, भिक्खवे, चत्तारो सतिपट्ठाना एवं बहुलीकता सत्त सम्बोज्झङ्गे परिपूरेन्ति।

१५२. ‘‘कथं भाविता च, भिक्खवे, सत्त बोज्झङ्गा कथं बहुलीकता विज्‍जाविमुत्तिं परिपूरेन्ति ? इध, भिक्खवे, भिक्खु सतिसम्बोज्झङ्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं। धम्मविचयसम्बोज्झङ्गं भावेति…पे॰… वीरियसम्बोज्झङ्गं भावेति… पीतिसम्बोज्झङ्गं भावेति… पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गं भावेति… समाधिसम्बोज्झङ्गं भावेति… उपेक्खासम्बोज्झङ्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं। एवं भाविता खो, भिक्खवे, सत्त बोज्झङ्गा एवं बहुलीकता विज्‍जाविमुत्तिं परिपूरेन्ती’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

आनापानस्सतिसुत्तं निट्ठितं अट्ठमं।

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