✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

कायागत-स्मृति

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ३० मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। तब बहुत से भिक्षू भिक्षाटन कर भोजन करने के पश्चात सभागृह में साथ मिल-जुलकर बैठे थे, तब उनमें यह चर्चा चल पड़ी, “आश्चर्य है, मित्र! अद्भुत है, मित्र! भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, कैसे साधी और विकसित की गई कायागत-स्मृति को महाफलदायी और महालाभकारी बताते हैं!”

किन्तु, भिक्षुओं की यह धर्मचर्चा अधूरी रह गयी। तब भगवान सायंकाल के समय एकांतवास से निकल कर सभागृह में गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने उन भिक्षुओं से कहा, “अभी यहाँ बैठकर, भिक्षुओं, क्या चर्चा कर रहे थे? कौन सी चर्चा अधूरी रह गई?”

“भन्ते, हम भिक्षाटन कर भोजन करने के पश्चात सभागृह में साथ मिल-जुलकर बैठे थे, तब हम में यह चर्चा चल पड़ी, ‘आश्चर्य है, मित्र! अद्भुत है, मित्र! भगवान, जो जानते हैं, देखते हैं, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध हैं, कैसे साधी और विकसित की गई कायागत-स्मृति को महाफलदायी और महालाभकारी बताते हैं!’ बस, भन्ते, यही चर्चा अधूरी रह गयी, जब भगवान आएँ।”

“तो, भिक्षुओं, किस प्रकार साधी गई और विकसित की गई कायागत-स्मृति महाफलदायी और महालाभकारी होती है?

१. आनापान

भिक्षुओं, कोई भिक्षू जंगल में, या पेड़ के तले, या निर्जन ध्यानस्थल में जाकर पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखते हुए बैठता है, और स्मृति को अपने सामने उपस्थित करता है। वह स्मृतिपूर्वक श्वास लेता है, और स्मृतिपूर्वक श्वास छोड़ता है।

  • लंबी श्वास लेते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास ले रहा हूँ।’ लंबी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
  • छोटी श्वास लेते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास ले रहा हूँ।’ छोटी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
  • पूरी काया महसूस करते हुए श्वास लेना सीखता है। पूरी काया महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास लेना सीखता है। काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त (=बिना मदहोश हुए), तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

२. इरियापथ

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु—

  • चलते हुए जानता है, ‘चल रहा हूँ।’
  • खड़े होते हुए जनता है, ‘खड़ा हूँ।’
  • बैठे हुए जानता है, ‘बैठा हूँ।’
  • लेटे हुए जानता है, ‘लेटा हूँ।’
  • जैसे-जैसे उसकी काया अवस्था लेती है, वैसे-वैसे वह जानता है।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

३. सम्पजान

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु—

  • आगे बढ़ते और लौट आते सचेत रहता है।
  • नज़र टिकाते और नज़र हटाते सचेत रहता है।
  • (अंग को) सिकोड़ते और पसारते हुए सचेत रहता है।
  • संघाटि, पात्र और चीवर धारण करते हुए सचेत रहता है।
  • खाते, पीते, चबाते, स्वाद लेते हुए सचेत रहता है।
  • पेशाब और शौच करते हुए सचेत रहता है।
  • चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, मौन होते हुए सचेत रहता है।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

४. पटिकूलमनसिकार

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है—‘मेरी इस काया में हैं—

  • केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा;
  • माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली;
  • हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा;
  • आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क;
  • पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी;
  • आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, मूत्र।’

जैसे, किसी खुली बोरी में चावल, गेहूँ, मूँग, राजमा, तिल, कनकी आदि नाना-प्रकार का अनाज भरा हो। तब, कोई अच्छी आँखोंवाला पुरुष उसे नीचे उड़ेलकर पता करें—‘यह चावल है, यह गेहूँ है, यह मूँग है, यह राजमा है, यह तिल है, यह कनकी है।’ उसी तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है—‘मेरी इस काया में हैं—

  • केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा;
  • माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली;
  • हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा;
  • आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क;
  • पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी;
  • आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, मूत्र।’

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

५. धातुमनसिकार

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु इस काया को, चाहे जिस अवस्था, जिस परिस्थिति में हो, धातु के अनुसार मनन करता है—‘इस काया में—

  • पृथ्वीधातु है;
  • जलधातु है;
  • अग्निधातु है;
  • वायुधातु है।’

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

६. नवसिवथिक

(१) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

(२) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—कौवों द्वारा नोची जाती, चीलों द्वारा नोची जाती, गिद्धों द्वारा नोची जाती, बगुलों द्वारा नोची जाती, कुत्तों द्वारा चबाई जाती, बाघ द्वारा चबाई जाती, तेंदुए द्वारा चबाई जाती, सियार द्वारा चबाई जाती, अथवा विविध जंतुओं द्वारा खायी जाती। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

(३) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस से युक्त, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

(४) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

(५) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

(६) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बिना बँधी, हड्डियाँ जहाँ-वहाँ बिखरी हुई—कही हाथ की हड्डी; कही पैर की; कही टखने की हड्डी; कही जाँघ की; कही कुल्हे की हड्डी; कही कमर की; कही पसली; कही पीठ की हड्डी; कही कंधे की हड्डी; कही गर्दन की; कही ठोड़ी की हड्डी; कही दाँत; कही खोपड़ी। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

(७) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—हड्डियाँ शंख जैसे सफ़ेद हो चुकी…

(८) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—वर्षोंपश्चात, जब हड्डियों का ढ़ेर लगा हो…

(९) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—जब हड्डियाँ सड़कर चूर्ण बन चुकी हो। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

७. ध्यान-अवस्थाएँ

(१) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। तब वह उस निर्लिप्तता से उपजे प्रीति और सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस निर्लिप्तता से उपजे प्रीति और सुख से अव्याप्त न रह जाए।

जैसे, भिक्षुओं, कोई निपुण स्नान करानेवाला (या आटा गूँथनेवाला) हो, जो काँस की थाली में स्नानचूर्ण (या आटा) रखे, और उसमें पानी छिड़क-छिड़ककर उसे इस तरह गूँथे कि चूर्णपिंड पूर्णतः जलव्याप्त हो जाए, किंतु चुए न। उसी तरह, वह उस निर्लिप्तता से उपजे प्रीति और सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस निर्लिप्तता से उपजे प्रीति और सुख से अव्याप्त न रह जाए।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

(२) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। तब वह उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से अव्याप्त न रह जाए।

जैसे, किसी गहरी झील में भीतर से जलस्त्रोत निकलता हो। जिसके पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण दिशा से कोई (भीतर आता) अंतप्रवाह न हो, और समय-समय पर देवता वर्षा न कराए। तब उस झील को केवल भीतर गहराई से निकलता शीतल जलस्त्रोत फूटकर उसे शीतल जल से सींच देगा, भिगो देगा, फैल जाएगा, पूर्णतः व्याप्त करेगा। और उस संपूर्ण झील को कोई भी हिस्सा उस शीतल जलस्त्रोत के जल से अव्याप्त नहीं रह जाएगा।

उसी प्रकार, भिक्षु उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से अव्याप्त न रह जाए।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

(३) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—वह उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। तब वह उस प्रीति-रहित सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस प्रीति-रहित सुख से अव्याप्त न रह जाए।

जैसे, किसी पुष्करणी (=कमलपुष्प के तालाब) में कोई कोई नीलकमल, रक्तकमल या श्वेतकमल होते हैं, जो बिना बाहर निकले, जल के भीतर ही जन्म लेते हैं, जल के भीतर ही बढ़ते हैं, जल के भीतर ही डूबे रहते हैं, जल के भीतर ही पनपते रहते हैं। वे सिरे से जड़ तक शीतल जल से ही सींचे जाते हैं, भिगोए जाते हैं, फैलाए जाते हैं, पूर्णतः व्याप्त किए जाते हैं। और उन कमलपुष्पों का कोई भी हिस्सा उस शीतल जल से अव्याप्त नहीं रह जाता।

उसी प्रकार, भिक्षु उस प्रीति-रहित सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस प्रीति-रहित सुख से अव्याप्त न रह जाए।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

(४) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। तब वह काया में उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त को फैलाकर बैठता है, ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त से अव्याप्त न रह जाए।

जैसे, कोई पुरुष सिर से पैर तक शुभ्र उज्ज्वल वस्त्र ओढ़कर बैठ जाए, ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस शुभ्र उज्ज्वल वस्त्र से अव्याप्त न रह जाए।

उसी प्रकार, भिक्षु काया में उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त को फैलाकर बैठता है, ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त से अव्याप्त न रह जाए।

जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कायगत-स्मृति की साधना करता है।

कायागत की उपमाएँ

जिसने भी, भिक्षुओं, इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, उसमें विद्या-पक्ष के सारे कुशल धम्म (=स्वभाव) आत्मसात होते हैं। जैसे, भिक्षुओं, जिसने भी मानस से महासमुद्र को व्याप्त किया हो, उसमें समुद्र के सारी नदियाँ आत्मसात होती हैं। उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, उसमें विद्या-पक्ष के सारे कुशल धम्म आत्मसात होते हैं।

और, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना न की हो, और उसे विकसित न किया हो, मार उसे भेद लेता है, मार उसमें अवसर ढूँढ लेता है। जैसे, भिक्षुओं, कोई पुरुष भारी पत्थर को मिट्टी के गीले ढ़ेर पर फेंकता है। क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह भारी पत्थर मिट्टी के गीले ढ़ेर को भेद लेगा?”

“हाँ, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना न की हो, और उसे विकसित न किया हो, मार उसे भेद लेता है, मार उसमें अवसर ढूँढ लेता है।

जैसे, भिक्षुओं, सूखी और सड़ी हुई लकड़ी हो। तब एक पुरुष माचिस की तीली 1 लेकर आता है, ‘मैं इसे जला दूँगा, अग्नि प्रकट करूँगा।’ क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह पुरुष माचिस की तीली से सूखी और सड़ी हुई लकड़ी को जला देगा, अग्नि प्रकट करेगा?”

“हाँ, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना न की हो, और उसे विकसित न किया हो, मार उसे भेद लेता है, मार उसमें अवसर ढूँढ लेता है।

जैसे, भिक्षुओं, जल का मटका खाली हो, खोखला हो, आधार देकर रखा हो। तब एक पुरुष बहुत-सा जल लेकर आता है। क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह पुरुष घड़े में गिरा पाएगा?”

“हाँ, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना न की हो, और उसे विकसित न किया हो, मार उसे भेद लेता है, मार उसमें अवसर ढूँढ लेता है।

किन्तु, भिक्षुओं, जिस किसी ने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, मार उसे भेद नहीं पाता है, मार उसमें अवसर नहीं ढूँढ पाता है। जैसे, भिक्षुओं, कोई पुरुष सूत के हल्के गोले को पूरी तरह सारकाष्ठ से बने सख्त फलक पर फेंकता है। क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह सूत का हल्का गोला पूरी तरह सारकाष्ठ से बने सख्त फलक को भेद लेगा?”

“नहीं, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, मार उसे भेद नहीं पाता है, मार उसमें अवसर नहीं ढूँढ पाता है। जैसे, भिक्षुओं, एक गीली रसदार लकड़ी जल में पड़ी हो। तब एक पुरुष माचिस की तीली लेकर आता है, ‘मैं इसे जला दूँगा, अग्नि प्रकट करूँगा।’ क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह पुरुष माचिस की तीली से जल में पड़ी गीली रसदार लकड़ी को जला देगा, अग्नि प्रकट करेगा?”

“नहीं, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, मार उसे भेद नहीं पाता है, मार उसमें अवसर नहीं ढूँढ पाता है।

जैसे, भिक्षुओं, जल का मटका आधार देकर रखा हो, जल से पूरी तरह भरा हुआ, ऊपर तक लबालब, जिसे कौवा भी पी सके। तब एक पुरुष बहुत-सा जल लेकर आता है। क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह पुरुष घड़े में गिरा पाएगा?”

“नहीं, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, मार उसे भेद नहीं पाता है, मार उसमें अवसर नहीं ढूँढ पाता है।

भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, वह जिस-जिस अभिज्ञा (=विशेष-ज्ञान) का धम्म साक्षात्कार करने के लिए अपने चित्त को झुकाता है, उस आयाम के होने पर वह उन-उनका साक्षात्कार करता है।

जैसे, भिक्षुओं, जल का मटका आधार देकर रखा हो, जल से पूरी तरह भरा हुआ, ऊपर तक लबालब, जिसे कौवा भी पी सके। तब क्या कोई बलवान पुरुष जिस-जिस दिशा में गिराना चाहे, जल गिरेगा?”

“हाँ, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, वह जिस-जिस अभिज्ञा का धम्म साक्षात्कार करने के लिए अपने चित्त को झुकाता है, उस आयाम के होने पर वह उन-उनका साक्षात्कार करता है।

जैसे, भिक्षुओं, किसी समतल भूमि पर बाँध बनाया चौकोण तालाब हो, जल से पूरी तरह भरा हुआ, ऊपर तक लबालब, जिसे कौवा भी पी सके। तब क्या कोई बलवान पुरुष जिस-जिस दिशा की नहर खोलेगा, जल बहने लगेगा?”

“हाँ, भन्ते!”

“उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, वह जिस-जिस अभिज्ञा का धम्म साक्षात्कार करने के लिए अपने चित्त को झुकाता है, उस आयाम के होने पर वह उन-उनका साक्षात्कार करता है।

जैसे, भिक्षुओं, किसी समतल चौराहे पर एक रथ खड़ा हो—उत्तम नस्ल के घोड़ों से जुता हुआ, चाबुक के साथ तैयार! तब उस रथ पर एक निपुण रथाचार्य, घोड़ों का वशकर्ता सारथी चढ़े। वह बाए हाथ से लगाम को खींच कर, दाए हाथ से चाबुक लगाते हुए, जहाँ जाना चाहे, जिधर जाना चाहे, सवार होकर निकल पड़ता है और लौट आता है।

उसी प्रकार, भिक्षुओं, जिसने भी इस प्रकार कायागत-स्मृति की साधना की हो, और उसे विकसित किया हो, वह जिस-जिस अभिज्ञा का धम्म साक्षात्कार करने के लिए अपने चित्त को झुकाता है, उस आयाम के होने पर वह उन-उनका साक्षात्कार करता है।

कायागत के दस लाभ

भिक्षुओं, कायागत-स्मृति को अपनाने, साधने, विकसित करने, सवार होने, आधार बनाने, स्थापन करने, मजबूती देने, अच्छे से लागू करने से दस लाभों की आशा कर सकते हैं।

(१) अरति (=मजा न आना, बोरियत) और रति (=मजा) को हराता है; अरति उसे नहीं हराती। उत्पन्न हुई अरति को वशीभूत कर विहार करता है।

(२) डर और आतंक 2 को हराता है; डर और आतंक उसे नहीं हराता। उत्पन्न हुए डर और आतंक को वशीभूत कर विहार करता है।

(३) सहनशील होता है—सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, मक्खियाँ, मच्छर, हवा, धूप, बिच्छु, साँप का संस्पर्श, कटु और नापसंदीदा वचन, काया में उत्पन्न होने वाली तीक्ष्ण, तीव्र, भेदती, चीरती, प्राण-हरति अनिच्छित पीड़ाओं को बर्दाश्त कर लेता है।

(४) चार ध्यान अवस्थाएँ, जो वर्तमान जीवन में ऊँचे चित्त का सुखपूर्वक विहार है, उसे जब चाहो, बिना परेशानी, बिना कठिनाई के प्राप्त करता है।

(५) विविध ऋद्धियाँ प्राप्त करता है—एक होकर अनेक बनता है, अनेक होकर एक बनता है। प्रकट होता है, विलुप्त होता है। दीवार, रक्षार्थ-दीवार और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चला जाता है, मानो आकाश में हो। ज़मीन पर गोते लगाता है, मानो जल में हो। जल-सतह पर बिना डूबे चलता है, मानो ज़मीन पर हो। पालथी मारकर आकाश में उड़ता है, मानो पक्षी हो। महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूता और मलता है। अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता है।

(६) विशुद्ध हो चुके अलौकिक दिव्यश्रोत-धातु से दोनों तरह की आवाज़ें सुनता है—चाहे दिव्य हो या मनुष्यों की हो, दूर की हो या पास की हो।

(७) अपना मानस फैलाकर पराए सत्वों का, अन्य लोगों का मानस जान लेता है। उसे रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘रागपूर्ण चित्त है।’ वीतराग चित्त पता चलता है कि ‘वीतराग चित्त है।’ द्वेषपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘द्वेषपूर्ण चित्त है।’ द्वेषविहीन चित्त पता चलता है कि ‘द्वेषविहीन चित्त है।’ मोहपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘मोहपूर्ण चित्त है।’ मोहविहीन चित्त पता चलता है कि ‘मोहविहीन चित्त है।’ संकुचित चित्त पता चलता है कि ‘संकुचित चित्त है।’ बिखरा चित्त पता चलता है कि ‘बिखरा चित्त है।’

उसे विस्तारित चित्त पता चलता है कि ‘विस्तारित चित्त है।’ अविस्तारित चित्त पता चलता है कि ‘अविस्तारित चित्त है।’ बेहतर चित्त पता चलता है कि ‘बेहतर चित्त है।’ सर्वोत्तर चित्त पता चलता है कि ‘सर्वोत्तर चित्त है।’ समाहित चित्त पता चलता है कि ‘समाहित चित्त है।’ असमाहित चित्त पता चलता है कि ‘असमाहित चित्त है।’ विमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘विमुक्त चित्त है।’ अविमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘अविमुक्त चित्त है।’

(८) विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण करता है—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त (=ब्रह्मांडिय सिकुड़न), कई कल्पों का लोक-विवर्त (=ब्रह्मांडिय विस्तार), कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है।

(९) विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।

(१०) आस्रवों के क्षय होने से अनास्रव होकर, अभी इसी जीवन में चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति प्राप्त कर, अभिज्ञा का साक्षात्कार कर विहार करता है।

भिक्षुओं, कायागत-स्मृति को अपनाने, साधने, विकसित करने, सवार होने, आधार बनाने, स्थापन करने, मजबूती देने, अच्छे से लागू करने से दस लाभों की आशा कर सकते हैं।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. मैंने आज की माचिस की तीली का उदाहरण दिया है, लेकिन असल में जो उपमा दी गई है, वह प्राचीन अग्नि-संयोग—अरणि मंथन—की प्रक्रिया से है। यानी वह प्रयास जिसमें कोई व्यक्ति दो लकड़ियों को रगड़कर अग्नि उत्पन्न करने की कोशिश करता है। यदि लकड़ी सूखी और सड़ी हुई हो, तो उसमें रगड़कर आग जलायी जा सकती है। लेकिन यदि लकड़ी गीली और रसदार हो, तो चाहे जितनी कोशिश की जाए, उससे आग नहीं जलाई जा सकती।

    परंतु चूंकि आज के आधुनिक लोग शायद इस पारंपरिक प्रक्रिया को एक शब्द में नहीं समझ पाते, इसलिए मैंने उन्हें उनकी ‘आधुनिक भाषा’ में समझाने के लिए माचिस की तीली का उदाहरण दिया, और शायद जाने-अनजाने में उन्हें और भी अधिक आलसी बना दिया। ↩︎

  2. डर और आतंक के विषय में भगवान ने भयभेरव सुत्त में विस्तार से चर्चा की है। ↩︎

पालि

१५३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो सम्बहुलानं भिक्खूनं पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्‍कन्तानं उपट्ठानसालायं सन्‍निसिन्‍नानं सन्‍निपतितानं अयमन्तराकथा उदपादि – ‘‘अच्छरियं, आवुसो, अब्भुतं, आवुसो! यावञ्‍चिदं तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन कायगतासति कायगता सति (स्या॰ कं॰ पी॰) भाविता बहुलीकता महप्फला वुत्ता महानिसंसा’’ति। अयञ्‍च हिदं तेसं भिक्खूनं अन्तराकथा विप्पकता होति, अथ खो भगवा सायन्हसमयं पटिसल्‍लाना वुट्ठितो येन उपट्ठानसाला तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्‍ञत्ते आसने निसीदि। निसज्‍ज खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘काय नुत्थ, भिक्खवे, एतरहि कथाय सन्‍निसिन्‍ना, का च पन वो अन्तराकथा विप्पकता’’ति? ‘‘इध , भन्ते, अम्हाकं पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्‍कन्तानं उपट्ठानसालायं सन्‍निसिन्‍नानं सन्‍निपतितानं अयमन्तराकथा उदपादि – ‘अच्छरियं, आवुसो, अब्भुतं, आवुसो! यावञ्‍चिदं तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन कायगतासति भाविता बहुलीकता महप्फला वुत्ता महानिसंसा’ति। अयं खो नो, भन्ते, अन्तराकथा विप्पकता, अथ भगवा अनुप्पत्तो’’ति।

१५४. ‘‘कथं भाविता च, भिक्खवे, कायगतासति कथं बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा? इध, भिक्खवे, भिक्खु अरञ्‍ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्‍ञागारगतो वा निसीदति पल्‍लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। सो सतोव अस्ससति सतोव पस्ससति; दीघं वा अस्ससन्तो ‘दीघं अस्ससामी’ति पजानाति, दीघं वा पस्ससन्तो ‘दीघं पस्ससामी’ति पजानाति; रस्सं वा अस्ससन्तो ‘रस्सं अस्ससामी’ति पजानाति, रस्सं वा पस्ससन्तो ‘रस्सं पस्ससामी’ति पजानाति; ‘सब्बकायपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सब्बकायपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता गेहस्सिता (टीका) सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति । तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति सन्‍निसीदति एकोदि होति एकोदी होति (सी॰), एकोदिभोति (स्या॰ कं॰) समाधियति। एवं, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं कायगतं सतिं (स्या॰ कं॰ पी॰) भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु गच्छन्तो वा ‘गच्छामी’ति पजानाति, ठितो वा ‘ठितोम्ही’ति पजानाति, निसिन्‍नो वा ‘निसिन्‍नोम्ही’ति पजानाति, सयानो वा ‘सयानोम्ही’ति पजानाति। यथा यथा वा पनस्स कायो पणिहितो होति, तथा तथा नं पजानाति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति। तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति सन्‍निसीदति एकोदि होति समाधियति। एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु अभिक्‍कन्ते पटिक्‍कन्ते सम्पजानकारी होति, आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होति, समिञ्‍जिते पसारिते सम्पजानकारी होति, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी होति, असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी होति, उच्‍चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी होति, गते ठिते निसिन्‍ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी होति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति। तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति सन्‍निसीदति एकोदि होति समाधियति। एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं उद्धं पादतला अधो केसमत्थका तचपरियन्तं पूरं नानप्पकारस्स असुचिनो पच्‍चवेक्खति – ‘अत्थि इमस्मिं काये केसा लोमा नखा दन्ता तचो मंसं न्हारु नहारु (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अट्ठि अट्ठिमिञ्‍जं वक्‍कं हदयं यकनं किलोमकं पिहकं पप्फासं अन्तं अन्तगुणं उदरियं करीसं पित्तं सेम्हं पुब्बो लोहितं सेदो मेदो अस्सु वसा खेळो सिङ्घाणिका लसिका मुत्त’न्ति।

‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, उभतोमुखा पुतोळि मूतोळी (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) पूरा नानाविहितस्स धञ्‍ञस्स, सेय्यथिदं – सालीनं वीहीनं मुग्गानं मासानं तिलानं तण्डुलानं, तमेनं चक्खुमा पुरिसो मुञ्‍चित्वा पच्‍चवेक्खेय्य – ‘इमे साली इमे वीही इमे मुग्गा इमे मासा इमे तिला इमे तण्डुला’ति; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं उद्धं पादतला अधो केसमत्थका तचपरियन्तं पूरं नानप्पकारस्स असुचिनो पच्‍चवेक्खति – ‘अत्थि इमस्मिं काये केसा लोमा नखा दन्ता तचो मंसं न्हारु अट्ठि अट्ठिमिञ्‍जं वक्‍कं हदयं यकनं किलोमकं पिहकं पप्फासं अन्तं अन्तगुणं उदरियं करीसं पित्तं सेम्हं पुब्बो लोहितं सेदो मेदो अस्सु वसा खेळो सिङ्घाणिका लसिका मुत्त’न्ति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति। तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति सन्‍निसीदति एकोदि होति समाधियति। एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं यथाठितं यथापणिहितं धातुसो पच्‍चवेक्खति – ‘अत्थि इमस्मिं काये पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, दक्खो गोघातको वा गोघातकन्तेवासी वा गाविं वधित्वा चतुमहापथे चातुम्महापथे (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) बिलसो विभजित्वा पटिविभजित्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) निसिन्‍नो अस्स; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं यथाठितं यथापणिहितं धातुसो पच्‍चवेक्खति – ‘अत्थि इमस्मिं काये पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति। तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति सन्‍निसीदति एकोदि होति समाधियति। एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय सीवथिकाय (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) छड्डितं एकाहमतं वा द्वीहमतं वा तीहमतं वा उद्धुमातकं विनीलकं विपुब्बकजातं। सो इममेव कायं उपसंहरति – ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति एतं अनतीतोति (सी॰)। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति। तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति सन्‍निसीदति एकोदि होति समाधियति। एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं काकेहि वा खज्‍जमानं कुललेहि वा खज्‍जमानं गिज्झेहि वा खज्‍जमानं कङ्केहि वा खज्‍जमानं सुनखेहि वा खज्‍जमानं ब्यग्घेहि वा खज्‍जमानं दीपीहि वा खज्‍जमानं सिङ्गालेहि वा गिज्झेहि वा खज्‍जमानं सुवानेहि वा खज्‍जमानं सिगालेहि वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) खज्‍जमानं विविधेहि वा पाणकजातेहि खज्‍जमानं। सो इममेव कायं उपसंहरति – ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स…पे॰… एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं अट्ठिकसङ्खलिकं समंसलोहितं न्हारुसम्बन्धं…पे॰… अट्ठिकसङ्खलिकं निम्मंसलोहितमक्खितं न्हारुसम्बन्धं…पे॰… अट्ठिकसङ्खलिकं अपगतमंसलोहितं न्हारुसम्बन्धं…पे॰… अट्ठिकानि अपगतसम्बन्धानि अपगतनहारूसम्बन्धानि (स्या॰ कं॰) दिसाविदिसाविक्खित्तानि दिसाविदिसासु विक्खितानि (सी॰ पी॰) अञ्‍ञेन हत्थट्ठिकं अञ्‍ञेन पादट्ठिकं अञ्‍ञेन गोप्फकट्ठिकं अञ्‍ञेन गोप्फकट्ठिकन्ति इदं सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰ पोत्थकेसु नत्थि अञ्‍ञेन जङ्घट्ठिकं अञ्‍ञेन ऊरुट्ठिकं अञ्‍ञेन कटिट्ठिकं अञ्‍ञेन कटट्ठिकं अञ्‍ञेन पिट्ठिकण्डकं अञ्‍ञेन सीसकटाहं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अञ्‍ञेन फासुकट्ठिकं अञ्‍ञेन पिट्ठिट्ठिकं अञ्‍ञेन खन्धट्ठिकं अञ्‍ञेन गीवट्ठिकं अञ्‍ञेन हनुकट्ठिकं अञ्‍ञेन दन्तट्ठिकं अञ्‍ञेन सीसकटाहं अञ्‍ञेन कटट्ठिकं अञ्‍ञेन पिट्ठिकण्डकं अञ्‍ञेन सीसकटाहं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)। सो इममेव कायं उपसंहरति – ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स…पे॰… एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं – अट्ठिकानि सेतानि सङ्खवण्णपटिभागानि सङ्खवण्णूपनिभानि (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) …पे॰… अट्ठिकानि पुञ्‍जकितानि तेरोवस्सिकानि…पे॰… अट्ठिकानि पूतीनि चुण्णकजातानि। सो इममेव कायं उपसंहरति – ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स…पे॰… एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

१५५. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु विविच्‍चेव कामेहि…पे॰… पठमं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। सो इममेव कायं विवेकजेन पीतिसुखेन अभिसन्देति परिसन्देति परिपूरेति परिप्फरति, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स विवेकजेन पीतिसुखेन अप्फुटं होति। सेय्यथापि, भिक्खवे, दक्खो न्हापको नहापको (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) वा न्हापकन्तेवासी वा कंसथाले न्हानीयचुण्णानि नहानीयचुण्णानि (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) आकिरित्वा उदकेन परिप्फोसकं परिप्फोसकं सन्‍नेय्य, सायं न्हानीयपिण्डि सास्स नहानीयपिण्डी (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) स्नेहानुगता स्नेहपरेता सन्तरबाहिरा फुटा स्नेहेन न च पग्घरिणी; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं विवेकजेन पीतिसुखेन अभिसन्देति परिसन्देति परिपूरेति परिप्फरति; नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स विवेकजेन पीतिसुखेन अप्फुटं होति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स…पे॰… एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु वितक्‍कविचारानं वूपसमा…पे॰… दुतियं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। सो इममेव कायं समाधिजेन पीतिसुखेन अभिसन्देति परिसन्देति परिपूरेति परिप्फरति; नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स समाधिजेन पीतिसुखेन अप्फुटं होति। सेय्यथापि, भिक्खवे, उदकरहदो गम्भीरो उब्भिदोदको उब्भितोदको (स्या॰ कं॰ क॰)। तस्स नेवस्स पुरत्थिमाय दिसाय उदकस्स आयमुखं न पच्छिमाय दिसाय उदकस्स आयमुखं न उत्तराय दिसाय उदकस्स आयमुखं न दक्खिणाय दिसाय उदकस्स आयमुखं; देवो च न कालेन कालं सम्मा धारं अनुप्पवेच्छेय्य; अथ खो तम्हाव उदकरहदा सीता वारिधारा उब्भिज्‍जित्वा तमेव उदकरहदं सीतेन वारिना अभिसन्देय्य परिसन्देय्य परिपूरेय्य परिप्फरेय्य, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो उदकरहदस्स सीतेन वारिना अप्फुटं अस्स; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं समाधिजेन पीतिसुखेन अभिसन्देति परिसन्देति परिपूरेति परिप्फरति, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स समाधिजेन पीतिसुखेन अप्फुटं होति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स…पे॰… एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु पीतिया च विरागा…पे॰… ततियं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। सो इममेव कायं निप्पीतिकेन सुखेन अभिसन्देति परिसन्देति परिपूरेति परिप्फरति, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स निप्पीतिकेन सुखेन अप्फुटं होति। सेय्यथापि, भिक्खवे, उप्पलिनियं वा पदुमिनियं वा पुण्डरीकिनियं वा अप्पेकच्‍चानि उप्पलानि वा पदुमानि वा पुण्डरीकानि वा उदके जातानि उदके संवड्ढानि उदकानुग्गतानि अन्तोनिमुग्गपोसीनि , तानि याव चग्गा याव च मूला सीतेन वारिना अभिसन्‍नानि परिसन्‍नानि अभिसन्दानि परिसन्दानि (क॰) परिपूरानि परिप्फुटानि, नास्स न नेसं (?) किञ्‍चि सब्बावतं उप्पलानं वा पदुमानं वा पुण्डरीकानं वा सीतेन वारिना अप्फुटं अस्स; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं निप्पीतिकेन सुखेन अभिसन्देति परिसन्देति परिपूरेति परिप्फरति, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स निप्पीतिकेन सुखेन अप्फुटं होति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स…पे॰… एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सुखस्स च पहाना…पे॰… चतुत्थं झानं उपसम्पज्‍ज विहरति। सो इममेव कायं परिसुद्धेन चेतसा परियोदातेन फरित्वा निसिन्‍नो होति; नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स परिसुद्धेन चेतसा परियोदातेन अप्फुटं होति। सेय्यथापि, भिक्खवे , पुरिसो ओदातेन वत्थेन ससीसं पारुपित्वा निसिन्‍नो अस्स, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स ओदातेन वत्थेन अप्फुटं अस्स; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं परिसुद्धेन चेतसा परियोदातेन फरित्वा निसिन्‍नो होति, नास्स किञ्‍चि सब्बावतो कायस्स परिसुद्धेन चेतसा परियोदातेन अप्फुटं होति। तस्स एवं अप्पमत्तस्स आतापिनो पहितत्तस्स विहरतो ये गेहसिता सरसङ्कप्पा ते पहीयन्ति। तेसं पहाना अज्झत्तमेव चित्तं सन्तिट्ठति, सन्‍निसीदति एकोदि होति समाधियति। एवम्पि, भिक्खवे, भिक्खु कायगतासतिं भावेति।

१५६. ‘‘यस्स कस्सचि, भिक्खवे, कायगतासति भाविता बहुलीकता, अन्तोगधावास्स अन्तोगधा तस्स (सी॰ पी॰) कुसला धम्मा ये केचि विज्‍जाभागिया। सेय्यथापि, भिक्खवे, यस्स कस्सचि महासमुद्दो चेतसा फुटो, अन्तोगधावास्स कुन्‍नदियो या काचि समुद्दङ्गमा; एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता, अन्तोगधावास्स कुसला धम्मा ये केचि विज्‍जाभागिया।

‘‘यस्स कस्सचि, भिक्खवे, कायगतासति अभाविता अबहुलीकता, लभति तस्स मारो ओतारं, लभति तस्स मारो आरम्मणं आरमणं (?)। सेय्यथापि , भिक्खवे, पुरिसो गरुकं सिलागुळं अल्‍लमत्तिकापुञ्‍जे पक्खिपेय्य। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु तं गरुकं सिलागुळं अल्‍लमत्तिकापुञ्‍जे लभेथ ओतार’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो , भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति अभाविता अबहुलीकता, लभति तस्स मारो ओतारं, लभति तस्स मारो आरम्मणं। सेय्यथापि, भिक्खवे, सुक्खं कट्ठं कोळापं कोळापं आरका उदका थले निक्खित्तं (क॰); अथ पुरिसो आगच्छेय्य उत्तरारणिं आदाय – ‘अग्गिं अभिनिब्बत्तेस्सामि, तेजो पातुकरिस्सामी’ति। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु सो पुरिसो अमुं सुक्खं कट्ठं कोळापं उत्तरारणिं आदाय अभिमन्थेन्तो अभिमन्थेन्तो (स्या॰ कं॰ पी॰ क॰) अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्या’’ति? ‘‘एवं , भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति अभाविता अबहुलीकता, लभति तस्स मारो ओतारं, लभति तस्स मारो आरम्मणं। सेय्यथापि, भिक्खवे, उदकमणिको रित्तो तुच्छो आधारे ठपितो; अथ पुरिसो आगच्छेय्य उदकभारं आदाय। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु सो पुरिसो लभेथ उदकस्स निक्खेपन’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति अभाविता अबहुलीकता, लभति तस्स मारो ओतारं, लभति तस्स मारो आरम्मणं’’।

१५७. ‘‘यस्स कस्सचि, भिक्खवे, कायगतासति भाविता बहुलीकता, न तस्स लभति मारो ओतारं, न तस्स लभति मारो आरम्मणं। सेय्यथापि, भिक्खवे, पुरिसो लहुकं सुत्तगुळं सब्बसारमये अग्गळफलके पक्खिपेय्य। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु सो पुरिसो तं लहुकं सुत्तगुळं सब्बसारमये अग्गळफलके लभेथ ओतार’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता, न तस्स लभति मारो ओतारं, न तस्स लभति मारो आरम्मणं। सेय्यथापि, भिक्खवे, अल्‍लं कट्ठं सस्नेहं सस्नेहं आरका उदका थले निक्खित्तं (क॰); अथ पुरिसो आगच्छेय्य उत्तरारणिं आदाय – ‘अग्गिं अभिनिब्बत्तेस्सामि, तेजो पातुकरिस्सामी’ति। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु सो पुरिसो अमुं अल्‍लं कट्ठं सस्नेहं उत्तरारणिं आदाय अभिमन्थेन्तो अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्या’’ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे , यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता, न तस्स लभति मारो ओतारं, न तस्स लभति मारो आरम्मणं। सेय्यथापि, भिक्खवे, उदकमणिको पूरो उदकस्स समतित्तिको काकपेय्यो आधारे ठपितो; अथ पुरिसो आगच्छेय्य उदकभारं आदाय। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु सो पुरिसो लभेथ उदकस्स निक्खेपन’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता, न तस्स लभति मारो ओतारं, न तस्स लभति मारो आरम्मणं’’।

१५८. ‘‘यस्स कस्सचि, भिक्खवे, कायगतासति भाविता बहुलीकता, सो यस्स यस्स अभिञ्‍ञासच्छिकरणीयस्स धम्मस्स चित्तं अभिनिन्‍नामेति अभिञ्‍ञासच्छिकिरियाय, तत्र तत्रेव सक्खिभब्बतं पापुणाति सति सतिआयतने। सेय्यथापि, भिक्खवे, उदकमणिको पूरो उदकस्स समतित्तिको काकपेय्यो आधारे ठपितो। तमेनं बलवा पुरिसो यतो यतो आविञ्छेय्य, आगच्छेय्य उदक’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता सो, यस्स यस्स अभिञ्‍ञासच्छिकरणीयस्स धम्मस्स चित्तं अभिनिन्‍नामेति अभिञ्‍ञासच्छिकिरियाय, तत्र तत्रेव सक्खिभब्बतं पापुणाति सति सतिआयतने। सेय्यथापि, भिक्खवे, समे भूमिभागे चतुरस्सा पोक्खरणी पोक्खरिणी (सी॰) अस्स आळिबन्धा पूरा उदकस्स समतित्तिका काकपेय्या। तमेनं बलवा पुरिसो यतो यतो आळिं मुञ्‍चेय्य आगच्छेय्य उदक’’न्ति? ‘‘एवं , भन्ते’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता, सो यस्स यस्स अभिञ्‍ञासच्छिकरणीयस्स धम्मस्स चित्तं अभिनिन्‍नामेति अभिञ्‍ञासच्छिकिरियाय, तत्र तत्रेव सक्खिभब्बतं पापुणाति सति सतिआयतने। सेय्यथापि, भिक्खवे, सुभूमियं चतुमहापथे आजञ्‍ञरथो युत्तो अस्स ठितो ओधस्तपतोदो ओभस्तपतोदो (क॰), उभन्तरपटोदो (स्या॰ कं॰) अव + धंसु + त = ओधस्त-इतिपदविभागो; तमेनं दक्खो योग्गाचरियो अस्सदम्मसारथि अभिरुहित्वा वामेन हत्थेन रस्मियो गहेत्वा दक्खिणेन हत्थेन पतोदं गहेत्वा येनिच्छकं यदिच्छकं सारेय्यापि पच्‍चासारेय्यापि; एवमेव खो, भिक्खवे, यस्स कस्सचि कायगतासति भाविता बहुलीकता, सो यस्स यस्स अभिञ्‍ञासच्छिकरणीयस्स धम्मस्स चित्तं अभिनिन्‍नामेति अभिञ्‍ञासच्छिकिरियाय , तत्र तत्रेव सक्खिभब्बतं पापुणाति सति सतिआयतने’’।

१५९. ‘‘कायगताय, भिक्खवे, सतिया आसेविताय भाविताय बहुलीकताय यानीकताय वत्थुकताय अनुट्ठिताय परिचिताय सुसमारद्धाय दसानिसंसा पाटिकङ्खा। अरतिरतिसहो होति, न च तं अरति सहति, उप्पन्‍नं अरतिं अभिभुय्य विहरति।

‘‘भयभेरवसहो होति, न च तं भयभेरवं सहति, उप्पन्‍नं भयभेरवं अभिभुय्य विहरति।

‘‘खमो होति सीतस्स उण्हस्स जिघच्छाय पिपासाय डंसमकसवातातपसरीसपसम्फस्सानं दुरुत्तानं दुरागतानं वचनपथानं, उप्पन्‍नानं सारीरिकानं वेदनानं दुक्खानं तिब्बानं खरानं कटुकानं असातानं अमनापानं पाणहरानं अधिवासकजातिको होति।

‘‘चतुन्‍नं झानानं आभिचेतसिकानं दिट्ठधम्मसुखविहारानं निकामलाभी होति अकिच्छलाभी अकसिरलाभी।

‘‘सो अनेकविहितं इद्धिविधं पच्‍चानुभोति। एकोपि हुत्वा बहुधा होति, बहुधापि हुत्वा एको होति, आविभावं…पे॰… याव ब्रह्मलोकापि कायेन वसं वत्तेति।

‘‘दिब्बाय सोतधातुया विसुद्धाय अतिक्‍कन्तमानुसिकाय उभो सद्दे सुणाति दिब्बे च मानुसे च, ये दूरे सन्तिके च…पे॰…।

‘‘परसत्तानं परपुग्गलानं चेतसा चेतो परिच्‍च पजानाति। सरागं वा चित्तं ‘सरागं चित्त’न्ति पजानाति, वीतरागं वा चित्तं…पे॰… सदोसं वा चित्तं… वीतदोसं वा चित्तं… समोहं वा चित्तं… वीतमोहं वा चित्तं… संखित्तं वा चित्तं… विक्खित्तं वा चित्तं… महग्गतं वा चित्तं… अमहग्गतं वा चित्तं… सउत्तरं वा चित्तं… अनुत्तरं वा चित्तं… समाहितं वा चित्तं… असमाहितं वा चित्तं… विमुत्तं वा चित्तं… अविमुत्तं वा चित्तं ‘अविमुत्तं चित्त’न्ति पजानाति।

‘‘सो अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति, सेय्यथिदं – एकम्पि जातिं द्वेपि जातियो…पे॰… इति साकारं सउद्देसं अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति।

‘‘दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्‍कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्‍जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे, सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति।

‘‘आसवानं खया अनासवं चेतोविमुत्तिं पञ्‍ञाविमुत्तिं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्‍ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्‍ज विहरति।

‘‘कायगताय, भिक्खवे, सतिया आसेविताय भाविताय बहुलीकताय यानीकताय वत्थुकताय अनुट्ठिताय परिचिताय सुसमारद्धाय इमे दसानिसंसा पाटिकङ्खा’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

कायगतासतिसुत्तं निट्ठितं नवमं।

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