
यह सूत्र एक अलग अंदाज में अपनी बात रखता है। आम तौर पर बौद्ध मार्ग में भिक्षु का लक्ष्य साफ़ होता है—सभी प्रकार के पुनर्जन्म से मुक्ति। लेकिन यहाँ ऐसा मार्ग बताया गया है जिसमें कोई भिक्षु अपने “पुनर्जन्म के स्थान” को भी लक्ष्य बना सकता है। दूसरी ओर, बुद्ध अन्य सूत्रों में ऐसी किसी कामना पर स्पष्ट चेतावनी देते हैं। मज्झिमनिकाय १६ में कहा गया है कि पुनर्जन्म की चाह से की गई साधना एक “चेतसो-विनिबन्ध”, अर्थात, “चित्त को बांधने वाली जंजीर” बन जाती है। अंगुत्तरनिकाय ३.१८ में भिक्षु देव-योनि के लिए अभ्यास करने के विचार से ही असहज हो जाते हैं। और अंगुत्तरनिकाय ७.५० यह बताता है कि ऐसी इच्छाएँ अक्सर अवशिष्ट काम-तृष्णा से ही उपजती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में यह सूत्र एक अधिक नरम और व्यावहारिक दृष्टि अपनाता है। यहाँ भगवान बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति श्रद्धा, शील, धम्म-श्रवण, त्याग और प्रज्ञा से युक्त हो, और संसार के ३१ लोक में से किसी एक लोक की ओर चित्त को मोड़कर उसी दिशा में अपने संस्कारों को विकसित करे, तो वही साधना उसे उसी प्रकार की उत्पत्ति की ओर ले जाती है। इसमें कोई रहस्य या वरदान नहीं है। जैसा चित्त ढलता है, वैसा ही अगला जन्म बनता है।
फिर भी, यह बात यहीं आकर रुकती नहीं। यह सूत्र साधक से यह नहीं कहता कि “पुनर्जन्म की कामना करों!” बल्कि यह दिखाता है कि चित्त को कैसे धीरे-धीरे परिष्कृत किया जाता है—स्थूल इच्छाओं से हटाकर अधिक सूक्ष्म आकांक्षाओं की ओर, और अंततः वहाँ तक जहाँ पुनर्जन्म की चाह भी छूट जाती है। इसी अर्थ में भगवान मानो चुनने की पूरी आजादी देते हुए कहते प्रतीत होते हैं—“जिसे जहाँ जाना हो, यह उसका रास्ता है! जाओ!”
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं!"
“भदंत”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“भिक्षुओं, संस्कार से उत्पत्ति का उपदेश देता हूँ। ध्यान देकर गौर से सुनो, मैं बताता हूँ।”
“ठीक है, भन्ते”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने (“सुत” =धर्मविद्या) से युक्त होता है, त्याग (या उदारता) से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं मरणोपरांत काया छूटने पर महासंपत्तिशाली क्षत्रियों के बीच उत्पन्न होऊँ!’ वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ (“पटिपदा”) उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं मरणोपरांत काया छूटने पर महासंपत्तिशाली ब्राह्मणों के बीच… महासंपत्तिशाली गृहस्थों के बीच उत्पन्न होऊँ!’ वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है—
वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है, ‘सहस्र ब्रह्मा दीर्घायु, रूपवान और बहुत सुखी होते हैं।’
सहस्र ब्रह्मा, भिक्षुओं, एक हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। जैसे, भिक्षुओं, कोई नेत्रवान पुरुष एक आँवले को हाथ में लेकर परखता है। उसी प्रकार, भिक्षुओं, सहस्र ब्रह्मा एक हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं।
उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं मरणोपरांत काया छूटने पर सहस्र ब्रह्मा के बीच उत्पन्न होऊँ!’ वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है, ‘दो सहस्र ब्रह्मा… तीन सहस्र ब्रह्मा… चार सहस्र ब्रह्मा… पाँच सहस्र ब्रह्मा दीर्घायु, रूपवान और बहुत सुखी होते हैं।’
पाँच सहस्र ब्रह्मा, भिक्षुओं, पाँच हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। जैसे, भिक्षुओं, कोई नेत्रवान पुरुष पाँच आँवले को हाथ में लेकर परखता है। उसी प्रकार, भिक्षुओं, पाँच सहस्र ब्रह्मा पाँच हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं।
उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं मरणोपरांत काया छूटने पर पाँच सहस्र ब्रह्मा के बीच उत्पन्न होऊँ!’ वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है, ‘दस सहस्र ब्रह्मा दीर्घायु, रूपवान और बहुत सुखी होते हैं।’
दस सहस्र ब्रह्मा, भिक्षुओं, दस हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। जैसे, भिक्षुओं, जैसे कोई ऊँची जाति का शुभ मणि हो—अष्टपहलु, सुपरिष्कृत, स्वच्छ, पारदर्शी, निर्मल, सभी गुणों से समृद्ध। उसे श्वेत ऊनी कंबल पर रखा जाता है, तो वह चमकता है, तपता है, और चकाचौंध करता है। उसी प्रकार, भिक्षुओं, दस सहस्र ब्रह्मा दस हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं।
उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं मरणोपरांत काया छूटने पर दस सहस्र ब्रह्मा के बीच उत्पन्न होऊँ!’ वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है, ‘सौ सहस्र ब्रह्मा दीर्घायु, रूपवान और बहुत सुखी होते हैं।’
सौ सहस्र ब्रह्मा, भिक्षुओं, सौ हजार (=एक लाख) लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। जैसे, भिक्षुओं, किसी कुशल सुनार या उसके पुत्र द्वारा जमुना नदी से निकलने वाले सोने 1 को लेकर भट्ठी में अच्छी तरह से गढ़ कर निष्क (=आभूषण या पिंड) बनाया हो। उसे श्वेत ऊनी कंबल पर रखा जाता है, तो वह चमकता है, तपता है, और चकाचौंध करता है। उसी प्रकार, भिक्षुओं, सौ सहस्र ब्रह्मा सौ हजार लोकधातुओं पर ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं। साथ ही, उनमें जो सत्व उत्पन्न होते हैं, उन पर भी ध्यान लगाकर व्याप्त होकर विहार करते हैं।
उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं मरणोपरांत काया छूटने पर सौ सहस्र ब्रह्मा के बीच उत्पन्न होऊँ!’ वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है—
वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है—
वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है—
वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। वह सुनता है—
वह उसी पर मन लगाता है, ठानता है, चित्त को विकसित करता है। तब, उसका वह संस्कार और साधना, इस तरह साधे जाने और विकसित होने पर, उसे उसी उत्पत्ति की ओर ले जाता है। यही मार्ग, भिक्षुओं, यही अभ्यासपथ उस उत्पत्ति की ओर ले जाता है।
आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से युक्त होता है, धर्म सुनने से युक्त होता है, त्याग से युक्त होता है, प्रज्ञा से युक्त होता है। उसे लगता है, ‘अरे! काश मैं आस्रवों के क्षय होने से अनास्रव होकर, इसी जीवन में चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति प्राप्त कर, (अर्हत्व) प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर रहूँ!’
तब, वह आस्रवों के क्षय होने से अनास्रव होकर, इसी जीवन में चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति प्राप्त कर, प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर विहार करता है। ऐसा भिक्षु, भिक्षुओं, कहीं भी उत्पन्न नहीं होता।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सुमेरु पर्वत की ढलानों पर एक विशाल जम्बू (जामुन) का वृक्ष उगता है। इसी वृक्ष के नाम पर भारतीय उपमहाद्वीप को जम्बूद्वीप, अर्थात, “जामुन का द्वीप” कहा गया। कहा जाता है कि इस वृक्ष के फल हाथियों जितने विशाल होते हैं। जब वे धरती पर गिरते हैं, तो उनका रस बहकर “जम्बूनदी” (यमुना नदी) बन जाती है। उस नदी की कीचड़ जब सूखती है, तो उसमें से अत्यंत चमकदार सोने के ढेले निकलते हैं। इस सोने की आभा इतनी विशिष्ट मानी गई है कि देवता भी उसे पाने की आकांक्षा रखते हैं। यही वही प्रसिद्ध सोना है जिसका उल्लेख शिव पुराण में मिलता है। हमें नहीं पता कि उस स्वर्ण की उत्पत्ति वास्तव में वैसी ही है या नहीं, लेकिन भगवान बुद्ध ने उससे निकलने वाले चमक को हीरे-मणि की चमक से भी अधिक उज्ज्वल और श्रेष्ठ बताया हैं। ↩︎
१६०. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘सङ्खारुपपत्तिं सङ्खारूपपत्तिं (स्या॰ कं॰), सङ्खारुप्पत्तिं (सी॰ पी॰) वो, भिक्खवे, देसेस्सामि, तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –
१६१. ‘‘इध, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन समन्नागतो होति, चागेन समन्नागतो होति, पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा खत्तियमहासालानं खत्तियमहासालानं वा (स्या॰ कं॰ पी॰) सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति । तस्स ते सङ्खारा च विहारा विहारो (सी॰ पी॰) च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया तत्रूपपत्तिया (स्या॰ कं॰), तत्रुप्पत्तिया (सी॰ पी॰) संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६२. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन समन्नागतो होति, चागेन समन्नागतो होति, पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा ब्राह्मणमहासालानं…पे॰… गहपतिमहासालानं ब्राह्मणमहासालानं वा गहपतिमहासालानं वा (स्या॰ कं॰ पी॰) सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६३. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन समन्नागतो होति, चागेन समन्नागतो होति, पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – ‘चातुमहाराजिका चातुम्महाराजिका (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) देवा दीघायुका वण्णवन्तो सुखबहुला’ति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा चातुमहाराजिकानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति । सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६४. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन समन्नागतो होति, चागेन समन्नागतो होति, पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – तावतिंसा देवा…पे॰… यामा देवा… तुसिता देवा… निम्मानरती देवा… परनिम्मितवसवत्ती देवा दीघायुका वण्णवन्तो सुखबहुलाति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा परनिम्मितवसवत्तीनं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति । सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६५. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन समन्नागतो होति, चागेन समन्नागतो होति, पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – ‘सहस्सो ब्रह्मा दीघायुको वण्णवा सुखबहुलो’ति। सहस्सो, भिक्खवे, ब्रह्मा सहस्सिलोकधातुं सहस्सिं लोकधातुं (सी॰) फरित्वा अधिमुच्चित्वा अधिमुञ्चित्वा (क॰) विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। सेय्यथापि, भिक्खवे, चक्खुमा पुरिसो एकं आमण्डं हत्थे करित्वा पच्चवेक्खेय्य; एवमेव खो, भिक्खवे, सहस्सो ब्रह्मा सहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा सहस्सस्स ब्रह्मुनो सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६६. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – द्विसहस्सो ब्रह्मा…पे॰… तिसहस्सो ब्रह्मा… चतुसहस्सो ब्रह्मा… पञ्चसहस्सो ब्रह्मा दीघायुको वण्णवा सुखबहुलोति। पञ्चसहस्सो, भिक्खवे, ब्रह्मा पञ्चसहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। सेय्यथापि, भिक्खवे, चक्खुमा पुरिसो पञ्च आमण्डानि हत्थे करित्वा पच्चवेक्खेय्य; एवमेव खो, भिक्खवे, पञ्चसहस्सो ब्रह्मा पञ्चसहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा पञ्चसहस्सस्स ब्रह्मुनो सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६७. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन समन्नागतो होति, सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – ‘दससहस्सो ब्रह्मा दीघायुको वण्णवा सुखबहुलो’ति। दससहस्सो, भिक्खवे, ब्रह्मा दससहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। सेय्यथापि, भिक्खवे, मणि वेळुरियो सुभो जातिमा अट्ठंसो सुपरिकम्मकतो पण्डुकम्बले निक्खित्तो भासते च तपते च भासति च तपति च (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) विरोचति च; एवमेव खो, भिक्खवे, दससहस्सो ब्रह्मा दससहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा दससहस्सस्स ब्रह्मुनो सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६८. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – ‘सतसहस्सो ब्रह्मा दीघायुको वण्णवा सुखबहुलो’ति। सतसहस्सो, भिक्खवे, ब्रह्मा सतसहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। सेय्यथापि, भिक्खवे, निक्खं जम्बोनदं नेक्खं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) दक्खकम्मारपुत्तउक्कामुखसुकुसलसम्पहट्ठं पण्डुकम्बले निक्खित्तं भासते च तपते च विरोचति च; एवमेव खो, भिक्खवे, सतसहस्सो ब्रह्मा सतसहस्सिलोकधातुं फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि फरित्वा अधिमुच्चित्वा विहरति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा सतसहस्सस्स ब्रह्मुनो सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति । सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१६९. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – आभा देवा…पे॰… परित्ताभा देवा… अप्पमाणाभा देवा… आभस्सरा देवा दीघायुका वण्णवन्तो सुखबहुलाति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा आभस्सरानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१७०. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन … सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – परित्तसुभा देवा…पे॰… अप्पमाणसुभा देवा… सुभकिण्हा देवा दीघायुका वण्णवन्तो सुखबहुलाति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा सुभकिण्हानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१७१. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – वेहप्फला देवा…पे॰… अविहा देवा… अतप्पा देवा… सुदस्सा देवा… सुदस्सी देवा… अकनिट्ठा देवा दीघायुका वण्णवन्तो सुखबहुलाति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा अकनिट्ठानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१७२. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – ‘आकासानञ्चायतनूपगा देवा दीघायुका चिरट्ठितिका सुखबहुला’ति । तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा आकासानञ्चायतनूपगानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१७३. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – ‘विञ्ञाणञ्चायतनूपगा देवा दीघायुका चिरट्ठितिका सुखबहुला’ति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा विञ्ञाणञ्चायतनूपगानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१७४. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स सुतं होति – आकिञ्चञ्ञायतनूपगा देवा…पे॰… नेवसञ्ञानासञ्ञायतनूपगा देवा दीघायुका चिरट्ठितिका सुखबहुलाति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं कायस्स भेदा परं मरणा नेवसञ्ञानासञ्ञायतनूपगानं देवानं सहब्यतं उपपज्जेय्य’न्ति। सो तं चित्तं दहति, तं चित्तं अधिट्ठाति, तं चित्तं भावेति। तस्स ते सङ्खारा च विहारा च एवं भाविता एवं बहुलीकता तत्रुपपत्तिया संवत्तन्ति। अयं, भिक्खवे, मग्गो अयं पटिपदा तत्रुपपत्तिया संवत्तति।
१७५. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सद्धाय समन्नागतो होति, सीलेन… सुतेन… चागेन… पञ्ञाय समन्नागतो होति। तस्स एवं होति – ‘अहो वताहं आसवानं खया अनासवं चेतोविमुत्तिं पञ्ञाविमुत्तिं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरेय्य’न्ति। सो आसवानं खया अनासवं चेतोविमुत्तिं पञ्ञाविमुत्तिं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरति। अयं, भिक्खवे, भिक्खु न कत्थचि उपपज्जती’’ति न कत्थचि उपपज्जति, न कुहिञ्चि उपपज्जतीति (सी॰ पी॰), न कत्थचि उपपज्जति, न कुहिञ्चि उपसम्पज्ज विहरतीति। (क॰)।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
सङ्खारुपपत्तिसुत्तं निट्ठितं दसमं।
अनुपदवग्गो निट्ठितो दुतियो।