
यह सूत्र शून्यता की ध्यान अवस्था को पाने का एक सरल तरीका प्रस्तुत करता है, जहाँ तुलनात्मक शून्यता की संज्ञाओं से समाधि का आधार बनाया जाता है।
पाली सूत्रों में शून्यता का विषय उतना प्रमुख नहीं दिखाई देता, जितना वह बाद के बौद्ध परम्पराओं में बन गया। इसका एक कारण प्रारंभिक बौद्ध समुदायों में हुए भिन्न-भिन्न सिद्धान्तगत विकास भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, जहाँ पाली सूत्रों में प्रायः “अनित्य, दुःख और अनात्म” की चर्चा मिलती है, वहीं उन्हीं सूत्रों के मूलसर्वास्तिवाद परम्परा के समानांतर पाठों में “शून्यता” का उल्लेख भी साथ-साथ मिलता है।
इससे किसी प्रकार का सिद्धान्तगत विरोधाभास नहीं निकलता, क्योंकि शून्यता को वहीं “अनात्म” के अर्थ में ही समझाया गया है। लेकिन यह अवश्य संकेत करता है कि शून्यता की भाषा और प्रस्तुति उस परम्परा में अधिक प्रचलित और पसंद की जाती थी।
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में मिगारमाता के विहार पूर्वाराम 1 में विहार कर रहे थे। तब आयुष्मान आनन्द सायंकाल होने पर एकांतवास से निकल कर भगवान के पास गए। जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा—
“भन्ते, एक बार भगवान शाक्यों के नगरक नामक शाक्य नगर में विहार कर रहे थे। वहाँ मैंने भगवान के सम्मुख सुना, सम्मुख ग्रहण किया कि ‘आनन्द, आजकल ज्यादातर मैं शून्यता में विहार करता हूँ।’ भन्ते, क्या मैंने वह ठीक सुना, ठीक ग्रहण किया, ठीक गौर किया, ठीक धारण किया था?”
“वाकई, आनन्द, तुमने वह ठीक ही सुना, ठीक ग्रहण किया, ठीक गौर किया, ठीक धारण किया। पहले भी, और आजकल भी, आनन्द, मैं ज्यादातर शून्यता में विहार करता हूँ।
जैसे, आनन्द, यह मिगारमाता का विहार हाथियों, गाय-बैलों, घोड़ों और खच्चरों से शून्य है; स्वर्ण और रुपए से शून्य है; स्त्री-पुरुषों के मेल-मिलाप से शून्य है। यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, भिक्षुसंघ पर आधारित एकत्व। 2
उसी तरह, आनन्द, कोई भिक्षु ‘गाँव की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘मनुष्य (=लोगों) की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘अरण्य की संज्ञा’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। अरण्य की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘जो गाँव की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो लोगों की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, अरण्य की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र गाँव की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र लोगों की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, अरण्य की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘लोगों की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘अरण्य की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘पृथ्वी की संज्ञा’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। पृथ्वी की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है।
जैसे, आनंद, वृषभ का चमड़े को अच्छे से फैलाकर, बिना झुर्री (=शिकन, सिकुड़न) को रखे, सैकड़ों कील से ताना जाता है। उसी तरह, आनंद, वह भिक्षु पृथ्वी के सभी ऊँचे-नीचे पठार, नदी के दुर्गम घाट, ठूँठ और कँटीले स्थान, विषम पर्वत को नजरंदाज कर पृथ्वी की संज्ञा पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। पृथ्वी की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है।
उसे पता चलता है, ‘जो लोगों की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो अरण्य की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, पृथ्वी की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र लोगों की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र अरण्य की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, पृथ्वी की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘अरण्य की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘पृथ्वी की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘आकाश आयाम की संज्ञा’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। आकाश आयाम की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘जो अरण्य की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो पृथ्वी की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, आकाश आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र अरण्य की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र पृथ्वी की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, आकाश आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘पृथ्वी की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘आकाश आयाम की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘विज्ञान आयाम की संज्ञा’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। विज्ञान आयाम की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘जो पृथ्वी की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो आकाश आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, विज्ञान आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र पृथ्वी की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र आकाश आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, विज्ञान आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘आकाश आयाम की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘विज्ञान आयाम की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘सूने (“आकिञ्चञ्ञायतन” =कुछ नहीं है) आयाम की संज्ञा’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। सूने आयाम की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘जो आकाश आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो विज्ञान आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, सूने आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र आकाश आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र विज्ञान आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, सूने आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘विज्ञान आयाम की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘सूने आयाम की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘जो विज्ञान आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो सूने आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र विज्ञान आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र सूने आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा पर आधारित एकत्व।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘सूने आयाम की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘अनिमित्त चेतोसमाधि’ 3 पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। अनिमित्त चेतोसमाधि पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘जो सूने आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, जीवित होने के कारण से इस काया पर आधारित छह (इंद्रिय) आयाम।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र सूने आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, जीवित होने के कारण से इस काया पर आधारित छह (इंद्रिय) आयाम। इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आगे, आनंद, भिक्षु ‘सूने आयाम की संज्ञा’ को नजरंदाज कर, ‘न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम की संज्ञा’ को भी नजरंदाज कर, ‘अनिमित्त चेतोसमाधि’ पर आधारित एकत्व पर ध्यान देता है। अनिमित्त चेतोसमाधि पर उसका चित्त उछलता है, आश्वस्त होता है, दृढ़ होता है, संकल्पबद्ध होता है। उसे पता चलता है, ‘यह अनिमित्त चेतोसमाधि भी संस्कृत (=रचित, गढ़ी गयी) है, चेतना (=इरादे) से बनी है।’
इस तरह जानने से, देखने से, उसका चित्त कामुक-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, भव-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, अविद्या-आस्रव से विमुक्त हो जाता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है, ‘विमुक्त हुआ!’ उसे पता चलता है, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’
उसे पता चलता है, ‘जो कामुक-आस्रव पर आधारित व्याकुलता थी, यहाँ वह नहीं है। जो भव-आस्रव पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। जो अविद्या-आस्रव पर आधारित व्याकुलता था, यहाँ वह नहीं है। यहाँ केवल हल्का-सी व्याकुलता है, और वह है, जीवित होने के कारण से इस काया पर आधारित छह (इंद्रिय) आयाम।’
उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र कामुक-आस्रव से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र भव-आस्रव से शून्य है।’ उसे पता चलता है, ‘संज्ञा का यह क्षेत्र अविद्या-आस्रव से शून्य है।’ ‘यहाँ केवल एक ही (बात) अशून्य है, और वह है, जीवित होने के कारण से इस काया पर आधारित छह (इंद्रिय) आयाम।’ इसलिए वह उसे, वहाँ जो कुछ भी न हो, उससे शून्य देखता है। और जो कुछ शेष बचता हो, उसे पता चलता है, ‘यहाँ यह उपस्थित है।’ इस प्रकार, आनंद, उसका ‘शून्यता में प्रवेश’ यथास्वरूप, अविकृत और परिशुद्ध होता है।
आनन्द, अतीत में जितने भी श्रमणों और ब्राह्मणों ने परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार किया, सभी ने इसी परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार किया था। भविष्य में जितने भी श्रमण और ब्राह्मण परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार करेंगे, सभी इसी परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार करेंगे। और वर्तमान में जितने भी श्रमण और ब्राह्मण परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार करते हैं, सभी इसी परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार करते हैं।
इसलिए, आनन्द, तुम्हें भी सीखना चाहिए कि ‘मैं भी ऐसी परिशुद्ध परम-अनुत्तर शून्यता से युक्त होकर विहार करूँगा।’”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
जेतवन के पश्चात श्रावस्ती का दूसरा सबसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित विहार पूर्वाराम था, जिसे “मिगारमातुपसाद”, अर्थात मिगारमाता का महल, भी कहा जाता था। यह विहार जेतवन के मुख्य द्वार से पूर्व दिशा में, लगभग २ किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। शांत वातावरण में स्थित यह स्थान बुद्ध के निवास और उपदेश के लिए उपयुक्त था, जहाँ उन्होंने कई बार वर्षावास भी किया।
इस विहार का निर्माण महाउपासिका विशाखा ने कराया था, जो बुद्धकाल की महानतम दायकों में मानी जाती हैं। विशाखा को “मिगार की माँ” के नाम से जाना जाता है। यह नामकरण साधारण नहीं था—मिगार, जो उसका ससुर था, उसे विशाखा ने धर्म में प्रवृत्त किया और उसे उपासक बनाया। इस धार्मिक उत्थान के कारण, यद्यपि वह सांसारिक दृष्टि से उसकी बहू थी, धर्म की दृष्टि से वह उसकी ‘माँ’ बन गई। ↩︎
शून्यता कोई दार्शनिक या तत्वमीमांसात्मक गुण नहीं है, बल्कि एक तुलनात्मक (सापेक्ष) अवस्था है। कोई अवस्था किसी विशेष बात से रिक्त (शून्य) होती है। ठीक उसी तरह एकत्व भी, शून्यता की तरह, एक तुलनात्मक अवस्था है। यहाँ बात किसी परम “एक” की नहीं, बल्कि उस स्थिति की है जहाँ विचलित करने वाली और लुभाने वाली चीज़ें अनुपस्थित हो जाती हैं, और शेष रह जाता है वही जो अधिक शांत, स्थिर और सहज होता है। ↩︎
अनिमित्त चेतोसमाधि—अर्थात “बिना किसी निमित्त के चित्त की समाधि।” अनिमित्त का अर्थ “कुछ भी अनुभव न होना” नहीं है, बल्कि होने वाले अनुभव के साथ चिपक कर उसकी कहानी न गढ़ना है। यह ऐसी सजग अवस्था है, जहाँ चित्त इन्द्रिय अनुभवों को देखता तो है, लेकिन उनके आकर्षण या प्रतिकर्षण में बहता नहीं।
इसकी मूल विशेषता यह है कि इसमें चेतना निमित्तों, यानी छाप, छवि, चिन्ह, या अनुभवों के पकड़ में आने वाले रूप-लक्षणों के पीछे नहीं दौड़ती, जिसे सूत्रों में “निमित्तानुसारी विञ्ञाणं” कहा गया है (उदाहरणार्थ अंगुत्तरनिकाय ६.१३)। मज्झिमनिकाय १३८ में बात यह कही गई है कि इंद्रियों से जो अनुभव होते हैं, उनके विषय चित्त को अपने साथ बहा नहीं ले जाते। चित्त अनुभव को देखता है, लेकिन उससे चिपकता नहीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो “निमित्त” हमें खींचते या धकेलते हैं, वे वस्तु में अपने-आप मौजूद नहीं होते; बल्कि, वे हमारे ही भीतर उठने वाले लोभ, द्वेष और मोह से बनते हैं (मज्झिमनिकाय ४३)।
जाहिर है, यह अवस्था संबोधि का प्रमाण नहीं है (अंगुत्तरनिकाय ६.६०)। आगे की प्रगति के लिए शील और आचरण अनिवार्य रहते हैं (अंगुत्तरनिकाय ७.५६)। बोधि से पूर्व यह अभ्यास आयुष्मान महामोग्गल्लान ने भी किया था; जिन्हें स्पष्ट उपदेश दिया गया था—“किसी भी निमित्त के पीछे मत जाओ” (संयुक्तनिकाय ४०.९)। यही “अनिमित्त चेतोसमाधि” अरहंत के ध्यान का वर्णन करने में भी प्रयुक्त होती है (संयुक्तनिकाय ४१.७)।
गहरे ध्यान-समापत्ति से भिन्न, जहाँ काया का अनुभव लुप्त हो जाता है, अनिमित्त चेतोसमाधि एक अत्यधिक विकसित प्रज्ञा-अवस्था है। इसमें छहों इन्द्रियाँ यथाभूत देखी जाती हैं—जैसी वे हैं, वैसी ही। इसी कारण महापरिनिर्वाण सूत्र के अनुसार यह अवस्था स्वयं भगवान बुद्ध के लिए वृद्धावस्था और बीमारी में शारीरिक कष्टों को शांत करने का साधन बनी। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अवस्था में रहते हुए वे सामान्य रूप से कार्य भी कर पाते थे, और साथ-साथ काया के दुःख-दर्द को भेदकर देखते भी थे। ↩︎
१७६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति पुब्बारामे मिगारमातुपासादे। अथ खो आयस्मा आनन्दो सायन्हसमयं पटिसल्लाना वुट्ठितो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘एकमिदं, भन्ते, समयं भगवा सक्केसु विहरति नगरकं नाम सक्यानं निगमो। तत्थ मे, भन्ते, भगवतो सम्मुखा सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सुञ्ञताविहारेनाहं, आनन्द, एतरहि बहुलं विहरामी’ति। कच्चि मेतं, भन्ते, सुस्सुतं सुग्गहितं सुमनसिकतं सूपधारित’’न्ति? ‘‘तग्घ ते एतं, आनन्द, सुस्सुतं सुग्गहितं सुमनसिकतं सूपधारितं। पुब्बेपाहं पुब्बेचाहं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰), आनन्द, एतरहिपि एतरहि च (सब्बत्थ) सुञ्ञताविहारेन बहुलं विहरामि। सेय्यथापि, आनन्द, अयं मिगारमातुपासादो सुञ्ञो हत्थिगवस्सवळवेन, सुञ्ञो जातरूपरजतेन, सुञ्ञो इत्थिपुरिससन्निपातेन अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – भिक्खुसङ्घं पटिच्च एकत्तं; एवमेव खो, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा गामसञ्ञं, अमनसिकरित्वा मनुस्ससञ्ञं, अरञ्ञसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं । तस्स अरञ्ञसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा गामसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा मनुस्ससञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – अरञ्ञसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं गामसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं मनुस्ससञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – अरञ्ञसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’’’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१७७. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा मनुस्ससञ्ञं, अमनसिकरित्वा अरञ्ञसञ्ञं, पथवीसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स पथवीसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सेय्यथापि, आनन्द, आसभचम्मं सङ्कुसतेन सुविहतं विगतवलिकं; एवमेव खो, आनन्द, भिक्खु यं इमिस्सा पथविया उक्कूलविक्कूलं नदीविदुग्गं खाणुकण्टकट्ठानं पब्बतविसमं तं सब्बं सब्बं (क॰) अमनसिकरित्वा पथवीसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स पथवीसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा मनुस्ससञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा अरञ्ञसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – पथवीसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं मनुस्ससञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं अरञ्ञसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – पथवीसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१७८. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा अरञ्ञसञ्ञं, अमनसिकरित्वा पथवीसञ्ञं, आकासानञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स आकासानञ्चायतनसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा अरञ्ञसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा पथवीसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – आकासानञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं अरञ्ञसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं पथवीसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – आकासानञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द , यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१७९. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा पथवीसञ्ञं, अमनसिकरित्वा आकासानञ्चायतनसञ्ञं, विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा पथवीसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा आकासानञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं पथवीसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं आकासानञ्चायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१८०. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा आकासानञ्चायतनसञ्ञं, अमनसिकरित्वा विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं, आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा आकासानञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं आकासानञ्चायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१८१. ‘‘पुन चपरं, आनन्द भिक्खु अमनसिकरित्वा विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं, अमनसिकरित्वा आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं विञ्ञाणञ्चायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च एकत्त’न्ति । इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१८२. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं, अमनसिकरित्वा नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञं, अनिमित्तं चेतोसमाधिं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स अनिमित्ते चेतोसमाधिम्हि चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – इममेव कायं पटिच्च सळायतनिकं जीवितपच्चया’ति । सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञाया’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – इममेव कायं पटिच्च सळायतनिकं जीवितपच्चया’ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१८३. ‘‘पुन चपरं, आनन्द, भिक्खु अमनसिकरित्वा आकिञ्चञ्ञायतनसञ्ञं, अमनसिकरित्वा नेवसञ्ञानासञ्ञायतनसञ्ञं, अनिमित्तं चेतोसमाधिं पटिच्च मनसि करोति एकत्तं। तस्स अनिमित्ते चेतोसमाधिम्हि चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति अधिमुच्चति। सो एवं पजानाति – ‘अयम्पि खो अनिमित्तो चेतोसमाधि अभिसङ्खतो अभिसञ्चेतयितो’। ‘यं खो पन किञ्चि अभिसङ्खतं अभिसञ्चेतयितं तदनिच्चं निरोधधम्म’न्ति पजानाति। तस्स एवं जानतो एवं पस्सतो कामासवापि चित्तं विमुच्चति, भवासवापि चित्तं विमुच्चति, अविज्जासवापि चित्तं विमुच्चति। विमुत्तस्मिं विमुत्तमिति ञाणं होति। ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानाति। सो एवं पजानाति – ‘ये अस्सु दरथा कामासवं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा भवासवं पटिच्च तेध न सन्ति, ये अस्सु दरथा अविज्जासवं पटिच्च तेध न सन्ति, अत्थि चेवायं दरथमत्ता यदिदं – इममेव कायं पटिच्च सळायतनिकं जीवितपच्चया’ति। सो ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं कामासवेना’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं भवासवेना’ति पजानाति, ‘सुञ्ञमिदं सञ्ञागतं अविज्जासवेना’ति पजानाति, ‘अत्थि चेविदं असुञ्ञतं यदिदं – इममेव कायं पटिच्च सळायतनिकं जीवितपच्चया’ति। इति यञ्हि खो तत्थ न होति तेन तं सुञ्ञं समनुपस्सति, यं पन तत्थ अवसिट्ठं होति तं ‘सन्तमिदं अत्थी’ति पजानाति। एवम्पिस्स एसा, आनन्द, यथाभुच्चा अविपल्लत्था परिसुद्धा परमानुत्तरा सुञ्ञतावक्कन्ति भवति।
१८४. ‘‘येपि हि केचि, आनन्द, अतीतमद्धानं समणा वा ब्राह्मणा वा परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरिंसु, सब्बे ते इमंयेव परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरिंसु। येपि ये (सी॰ पी॰) हि केचि, आनन्द, अनागतमद्धानं समणा वा ब्राह्मणा वा परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरिस्सन्ति, सब्बे ते इमंयेव परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरिस्सन्ति। येपि ये (सी॰ पी॰) हि केचि, आनन्द, एतरहि समणा वा ब्राह्मणा वा परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरन्ति, सब्बे ते इमंयेव परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरन्ति। तस्मातिह, आनन्द, ‘परिसुद्धं परमानुत्तरं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरिस्सामा’ति विहरिस्सामीति (पी॰ क॰) – एवञ्हि वो ते (क॰), आनन्द, सिक्खितब्ब’’न्ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा आनन्दो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।
चूळसुञ्ञतसुत्तं निट्ठितं पठमं।