
यह सूत्र भगवान बुद्ध के ‘कठोर प्रेम’ और एक सच्चे गुरु की भूमिका को दर्शाता है। जहाँ ‘चूळसुञ्ञत सुत्त’ (MN 121) में शून्यता की ‘विधि’ बताई गई है, वहीं इस सूत्र में शून्यता के ‘अभ्यास के लिए आवश्यक वातावरण’ और एकांत के खतरों पर जोर दिया गया है।
बुद्ध यहाँ स्पष्ट करते हैं कि सच्चा एकांत केवल जंगल में रहना नहीं है, बल्कि चित्त को भीतर स्थित करना है। वे चेतावनी देते हैं कि कैसे लोकप्रियता और प्रसिद्धि एक साधक के लिए—चाहे वह गुरु हो या शिष्य—विनाशकारी हो सकती है। अंत में, ‘कुम्हार और कच्ची मिट्टी’ की प्रसिद्ध उपमा के माध्यम से वे बताते हैं कि वे शिष्यों को लाड़-प्यार से नहीं, बल्कि उनकी कमियों को बार-बार उजागर करके, उन्हें तप की आग में पकाकर ही धर्म में मजबूत बनाते हैं।
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान शाक्यों के साथ कपिलवस्तु के बरगद उद्यान में विहार कर रहे थे। तब सुबह होने पर भगवान ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर, भिक्षाटन के लिए कपिलवस्तु में प्रवेश किया। वे कपिलवस्तु में भिक्षाटन कर, भोजन करने के पश्चात, दिन बिताने के लिए काळखेमक (=काला खेमक) नामक शाक्य विहार में दिन बिताने के लिए गए।
उस समय काळखेमक शाक्य विहार में बहुत से बिस्तर बिछे हुए थे। भगवान ने काळखेमक शाक्य विहार में बहुत से बिस्तर बिछे हुए देखे। देखकर भगवान को लगा, “काळखेमक शाक्य विहार में बहुत से बिस्तर बिछे हुए हैं। क्या यहाँ बहुत से भिक्षुगण विहार करते हैं?”
उस समय आयुष्मान आनन्द बहुत से भिक्षुओं के साथ शाक्य घटा विहार में चीवर सिलने का कार्य कर रहे थे। तब भगवान सायंकाल होने पर एकांतवास के निकलकर उस शाक्य घटा विहार में गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने आयुष्मान आनन्द को आमंत्रित किया, “आनन्द, काळखेमक शाक्य विहार में बहुत से बिस्तर बिछे हुए हैं। क्या यहाँ बहुत से भिक्षुगण विहार करते हैं?”
“हाँ, भन्ते। काळखेमक शाक्य विहार में बहुत से बिस्तर बिछे हुए हैं, क्योंकि वहाँ बहुत से भिक्षुगण विहार करते हैं। भन्ते, यह चीवर सिलने का समय चल रहा है।”
“आनन्द, भिक्षु को यह शोभा नहीं देता कि वह संघ में (मेल-मिलाप का) मजा लेता हो, संघ में मस्त रहता हो, संघ में मजा लेने के प्रति समर्पित होता हो, या वह गुट में मजा लेता हो, गुट में मस्त रहता हो, गुट में प्रसन्न रहता हो।
ऐसा भिक्षु, आनन्द, जो संघ में मजा लेता हो, संघ में मस्त रहता हो, संघ में मजे लेने के प्रति समर्पित होता हो, या वह गुट में मजा लेता हो, गुट में मस्त रहता हो, गुट में प्रसन्न रहता हो—उसे जब चाहो, बिना परेशानी, बिना कठिनाई के निष्काम (=संन्यास) सुख, निर्लिप्त-एकांतवास का सुख, प्रशान्ति सुख, संबोधि सुख प्राप्त हो—यह असंभव है।
किन्तु, आनन्द, जो भिक्षु गुट से परे हटकर अकेला विहार करता हो, उस भिक्षु से आशा है कि उसे जब चाहो, बिना परेशानी, बिना कठिनाई के निष्काम सुख, निर्लिप्त-एकांतवास का सुख, प्रशान्ति सुख, संबोधि सुख प्राप्त हो—यह संभव है।
वाकई, आनंद, ऐसा भिक्षु, जो संघ में मजा लेता हो, संघ में मस्त रहता हो, संघ में मजे लेने के प्रति समर्पित होता हो, या वह गुट में मजा लेता हो, गुट में मस्त रहता हो, गुट में प्रसन्न रहता हो—वह अल्पकालिक और सुखद चेतो-विमुक्ति से युक्त होकर विहार करे, अथवा अपरिवर्तनीय अडिग में—यह असंभव है। 1
किन्तु, आनन्द, जो भिक्षु गुट से परे हटकर अकेला विहार करता हो, उस भिक्षु से आशा है कि वह अल्पकालिक और सुखद चेतो-विमुक्ति से युक्त होकर विहार करे, अथवा अपरिवर्तनीय अडिगता में—यह संभव है।
मैं एक भी ऐसा रूप (या दृश्य) नहीं देखता, आनन्द, जिससे आसक्त होने पर, जिसमें मजा लेने पर, उस रूप के बदलते और परिवर्तित होते ही शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा न उपजती हो। किन्तु, आनन्द, तथागत ने इस साधना के प्रति बोधि प्राप्त की हैं—यहीं, सभी निमित्तों पर ध्यान न देकर भीतर शून्यता में प्रवेश पाकर विहार करना।
और, आनन्द, जब तथागत इस (शून्यता) साधना में विहार कर रहे हों, और वहाँ भिक्षु, भिक्षुणियाँ, उपासक, उपासिकाएँ, राजा, राज-महामंत्री, परधर्मी संन्यासी, या परधर्मी शिष्य आते हैं। तब तथागत—जिनका चित्त विवेक (=एकांत) की ओर झुका है, विवेक की ओर मुड़ा है, विवेक की ओर नत है, जो एकांतवास में रत हैं, (भीड़ से) पूरी तरह अलग हैं, और जिन्होंने तमाम आस्रव-स्थानों का नाश कर दिया है—वे उनसे केवल (वापस) भेजने वाली कथा [^1] (=बातचीत) ही करते हैं।
यहाँ, आनन्द, तथागत—जिनका चित्त विवेक (=एकांत) की ओर झुका है, विवेक की ओर मुड़ा है, विवेक की ओर नत है, जो एकांतवास में रत हैं, (भीड़ से) पूरी तरह अलग हैं, और जिन्होंने तमाम आस्रव-स्थानों का नाश कर दिया है—वे उनसे केवल (वापस) भेजने वाली कथा ही करते हैं।
भेजने वाली कथा (उय्योजनिक-कथा): इसका अर्थ है ऐसी बातचीत जिसका उद्देश्य सामने वाले को विदा करना हो। चूँकि तथागत शून्यता और एकांत में स्थित हैं, वे भीड़ में या लंबी सांसारिक चर्चाओं में रुचि नहीं लेते और आगंतुकों को धर्म का सार बताकर वापस एकांत में भेज देते हैं।
इसलिए, आनन्द, यदि भिक्षु चाहे—‘मैं भीतरी शून्यता में प्रवेश पाकर विहार करूँ’, तो उस भिक्षु को अपने चित्त को भीतर ही स्थिर करना चाहिए, बिठाना चाहिए, एकाग्र करना चाहिए, समाहित करना चाहिए।
भीतरी शून्यता और कैसे, आनन्द, भिक्षु अपने चित्त को भीतर ही स्थिर करता है, बिठाता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है?
यहाँ, आनन्द, भिक्षु कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित… प्रथम-ध्यान… द्वितीय-ध्यान… तृतीय-ध्यान… चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है। इस तरह, आनन्द, भिक्षु अपने चित्त को भीतर ही स्थिर करता है, बिठाता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।
(१) वह ‘भीतरी शून्यता’ (“अज्झत्तं सुञ्ञतं”) पर ध्यान देता है। जब वह भीतरी शून्यता पर ध्यान देता है, तब यदि उसका चित्त उस भीतरी शून्यता में नहीं उछलता, आश्वस्त नहीं होता, स्थिर नहीं होता, अधिमुक्त (=विमुक्त) नहीं होता; तब वह भिक्षु ऐसा जानता है—‘भीतरी शून्यता पर ध्यान देने पर मेरा चित्त उसमें नहीं उछलता, आश्वस्त नहीं होता, स्थिर नहीं होता, विमुक्त नहीं होता।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत (“सम्पजान”) रहता है।
चित्त का उछलना (पक्खन्दति): इसका अर्थ है चित्त का उस विषय (यहाँ शून्यता) में पूरी तरह रस लेना और डूब जाना। यदि चित्त शून्यता में स्थिर नहीं हो रहा, तो साधक को जबरदस्ती कल्पना करने के बजाय, अपनी इस ‘असमर्थता’ के प्रति सचेत रहना चाहिए।
(२) (यदि ऐसा हो), तो वह ‘बाहरी शून्यता’ (“बहिद्धा सुञ्ञतं”) पर ध्यान देता है… (३) वह ‘भीतरी और बाहरी शून्यता’ पर ध्यान देता है… (४) वह ‘अविचलता’ (“आनेञ्ज”) पर ध्यान देता है। जब वह अविचलता पर ध्यान देता है, तब यदि उसका चित्त उस अविचलता में नहीं उछलता… तब वह भिक्षु ऐसा जानता है—‘अविचलता पर ध्यान देने पर मेरा चित्त उसमें नहीं उछलता…’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
तब, आनन्द, उस भिक्षु को उसी (मूल) पूर्व समाधि-निमित्त में चित्त को भीतर ही स्थिर करना चाहिए, बिठाना चाहिए, एकाग्र करना चाहिए, समाहित करना चाहिए।
मूल समाधि-निमित्त: यदि शून्यता या अविचलता में चित्त न लगे, तो भिक्षु को अपनी मूल साधना (जैसे आनापान-स्मृति या मैत्री) पर वापस लौटना चाहिए और उसे ही गहरा करना चाहिए, ताकि चित्त फिर से एकाग्र हो सके।
तब, वह (पुनः) ‘भीतरी शून्यता’ पर ध्यान देता है। जब वह भीतरी शून्यता पर ध्यान देता है, तब (अब) उसका चित्त उस भीतरी शून्यता में उछलता है, आश्वस्त होता है, स्थिर होता है, विमुक्त होता है। तब वह भिक्षु ऐसा जानता है—‘भीतरी शून्यता पर ध्यान देने पर मेरा चित्त उसमें उछलता है, आश्वस्त होता है, स्थिर होता है, विमुक्त होता है।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
वह ‘बाहरी शून्यता’ पर ध्यान देता है… वह ‘भीतरी और बाहरी शून्यता’ पर ध्यान देता है… वह ‘अविचलता’ पर ध्यान देता है… तब उसका चित्त उसमें उछलता है… विमुक्त होता है। इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
सचेतता विहार (१) इस विहार में विहार करते हुए, आनन्द, यदि उस भिक्षु का चित्त चलने (चंक्रमण) की ओर झुकता है, तो वह चलता है। चलते हुए वह (सोचता है), ‘इस प्रकार चलते हुए मुझे लालसा और नाराजी (“अभिज्झा-दोमनस्स”) रूपी पाप-अकुशल धर्म नहीं सताएंगे।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
लालसा और नाराजी: MN 118 (आनापानस्सति) की तरह यहाँ भी ‘अभिज्झा-दोमनस्स’ का अनुवाद ‘लालसा और नाराजी’ रखा गया है, जो सांसारिक आकर्षण और विकर्षण को दर्शाता है।
(२) इस विहार में विहार करते हुए… यदि उसका चित्त खड़े होने की ओर झुकता है, तो वह खड़ा होता है… ‘इस प्रकार खड़े होते हुए मुझे लालसा और नाराजी रूपी पाप-अकुशल धर्म नहीं सताएंगे।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
(३) …यदि उसका चित्त बैठने की ओर झुकता है…
(४) …यदि उसका चित्त लेटने की ओर झुकता है… ‘इस प्रकार लेटते हुए मुझे लालसा और नाराजी रूपी पाप-अकुशल धर्म नहीं सताएंगे।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
(५) इस विहार में विहार करते हुए, आनन्द, यदि उस भिक्षु का चित्त बोलने (“कथा”) की ओर झुकता है, तो वह (सोचता है)—‘जो यह कथा हीन है, गँवारू है, नश्वर है, अनार्य है, अनर्थकारी है; जो न निर्वेद (ऊब) के लिए, न विराग के लिए, न निरोध के लिए, न उपशम के लिए, न अभिज्ञा के लिए, न सम्बोधि के लिए, न निर्वाण के लिए होती है—जैसे कि: राजाओं की कथा, चोरों की कथा, महामात्रों की कथा, सेना की कथा, भय की कथा, युद्ध की कथा, अन्न की कथा, पान की कथा, वस्त्र, शय्या, माला, गंध, रिश्तेदारों की कथा, गाड़ियों की कथा, गाँव-कस्बे-नगर-जनपद की कथा, स्त्री की कथा (या शूरवीर की कथा), शराब की कथा, गली-कूचे की कथा, पनघट की कथा, पूर्वजों की कथा, नाना प्रकार की (बकवास) कथा, लोक-आख्यान, समुद्र-आख्यान, और ‘भव-अभव’ (ऐसा है या वैसा है) की कथा—ऐसी कथा मैं नहीं कहूँगा।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
किन्तु, आनन्द, जो कथा अति-सल्लेख (तप/निवारण) वाली है, जो चित्त के आवरणों को खोलने में सहायक है; जो एकान्त निर्वेद, विराग, निरोध, उपशम, अभिज्ञा, सम्बोधि और निर्वाण के लिए होती है—जैसे कि: अल्पइच्छा की कथा, संतुष्टि की कथा, एकांतवास (“पविवेक”) की कथा, असंसर्ग (मेल-जोल न रखने) की कथा, वीर्य-आरम्भ की कथा, शील की कथा, समाधि की कथा, प्रज्ञा की कथा, विमुक्ति की कथा, विमुक्ति-ज्ञान-दर्शन की कथा—‘ऐसी कथा मैं कहूँगा।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
(६) इस विहार में विहार करते हुए, आनन्द, यदि उस भिक्षु का चित्त वितर्क (सोचने) की ओर झुकता है, तो वह (सोचता है)—‘जो ये वितर्क हीन हैं… काम-वितर्क, व्यापाद (द्वेष)-वितर्क, विहिंसा-वितर्क—ऐसे वितर्क मैं नहीं करूँगा।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
किन्तु, आनन्द, जो ये वितर्क आर्य हैं, निस्तारक (पार लगाने वाले) हैं, जो करने वाले को सम्यक दुःखों के क्षय की ओर ले जाते हैं—जैसे कि: निष्काम-वितर्क, अव्यापाद-वितर्क, अहिंसा-वितर्क—‘ऐसे वितर्क मैं करूँगा।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
पाँच कामगुण और पंच-स्कंध आनन्द, पाँच कामगुण हैं। कौन-से पाँच?
आँख से पहचाने जाने वाले रूप—जो इष्ट, कांत, मनाप, प्रिय, काम-वर्धक और रजनीय हैं।
कान से पहचाने जाने वाले शब्द…
नाक से पहचाने जाने वाली गंध…
जीभ से पहचाने जाने वाले रस…
काया से पहचाने जाने वाले स्पर्श—जो इष्ट, कांत, मनाप, प्रिय, काम-वर्धक और रजनीय हैं।
ये पाँच कामगुण हैं, आनन्द। भिक्षु को इसमें बार-बार अपने चित्त का पर्यवेक्षण करना चाहिए—‘क्या इन पाँच कामगुणों में से किसी भी आयतन (इन्द्रिय-विषय) के प्रति मेरे चित्त में कोई हलचल (“समुदाचार”) उपजती है?’
यदि, आनन्द, भिक्षु पर्यवेक्षण करते हुए जानता है—‘इन पाँच कामगुणों में से किसी आयतन के प्रति मेरे चित्त में हलचल उपजती है’—तो वह भिक्षु जानता है, ‘पाँच कामगुणों को लेकर जो मेरा छन्द-राग (इच्छा-आसक्ति) है, वह प्रहीण (नष्ट) नहीं हुआ है।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
किन्तु, यदि भिक्षु पर्यवेक्षण करते हुए जानता है—‘इन पाँच कामगुणों में से किसी आयतन के प्रति मेरे चित्त में हलचल नहीं उपजती’—तो वह भिक्षु जानता है, ‘पाँच कामगुणों को लेकर जो मेरा छन्द-राग है, वह प्रहीण हो गया है।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
आनन्द, पाँच उपादान-स्कंध हैं, जिनमें भिक्षु को उदय-व्यय (उठने-गिरने) को देखते हुए विहार करना चाहिए—
‘यह रूप है, यह रूप का समुदाय (उत्पत्ति) है, यह रूप का अस्त (विनाश) है।
यह वेदना है…
यह संज्ञा है…
यह संस्कार हैं…
यह विज्ञान है, यह विज्ञान का समुदाय है, यह विज्ञान का अस्त है।’
जब वह इन पाँच उपादान-स्कंधों में उदय-व्यय को देखते हुए विहार करता है, तब इन पाँच उपादान-स्कंधों के प्रति जो ‘अस्मिमान’ (मैं हूँ, का घमंड/भाव) है, वह प्रहीण हो जाता है। तब वह भिक्षु जानता है, ‘इन पाँच उपादान-स्कंधों में जो मेरा अस्मिमान था, वह प्रहीण हो गया है।’ इस प्रकार वह वहाँ सचेत रहता है।
अस्मिमान: यह धारणा कि “मैं हूँ”। यह केवल अहंकार नहीं है, बल्कि पंच-स्कंधों के साथ “मैं” की सूक्ष्म पहचान है जो अरहंत बनने तक बनी रहती है।
आनन्द, ये धर्म नितांत कुशल हैं, कुशल के पक्षधर हैं, आर्य हैं, लोकोत्तर हैं, और पापी मार की पहुँच से बाहर हैं।
शास्ता का अनुगमन क्या लगता है, आनन्द? किस अर्थ (फायदे) को देखते हुए श्रावक को शास्ता (गुरु) के पीछे-पीछे चलना चाहिए, भले ही उसे धक्के क्यों न मारे जाएँ?”
“भन्ते, हमारे धर्म भगवान-मूलक हैं, भगवान-नेत्रिक (मार्गदर्शक) हैं, भगवान-प्रतिशरण (आश्रय) हैं। साधु हो, भन्ते, यदि भगवान ही इस भाषित का अर्थ स्पष्ट करें। भगवान से सुनकर भिक्षु धारण करेंगे।”
“आनन्द, श्रावक को शास्ता के पीछे इसलिए नहीं चलना चाहिए कि वह सुत्त, गेय्य और व्याकरण (प्रवचन/साहित्य) सुन सके। ऐसा क्यों? क्योंकि, आनन्द, बहुत समय तक तुमने धर्म सुने हैं, धारण किए हैं, वचनों से दोहराए हैं, मन से टटोले हैं, और दृष्टि से भली-भांति बेधे (समझे) हैं।
किन्तु, आनन्द, जो कथा अति-सल्लेख (तप) वाली है… जो एकान्त निर्वेद, विराग, निरोध, उपशम, अभिज्ञा, सम्बोधि और निर्वाण के लिए होती है—जैसे कि: अल्पइच्छा की कथा, संतुष्टि की कथा, एकांतवास की कथा, असंसर्ग की कथा, वीर्य-आरम्भ की कथा, शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति, और विमुक्ति-ज्ञान-दर्शन की कथा—ऐसी कथा के हेतु, आनन्द, श्रावक को शास्ता के पीछे-पीछे चलना चाहिए, भले ही उसे धक्के क्यों न मारे जाएँ।
तीन उपद्रव (बर्बादी) ऐसा (न) होने पर, आनन्द, आचार्य का उपद्रव होता है; ऐसा होने पर शिष्य का उपद्रव होता है; ऐसा होने पर ब्रह्मचारी (साथी) का उपद्रव होता है।
(१) आचार्य का उपद्रव कैसे होता है? यहाँ, आनन्द, कोई शास्ता (गुरु) एकांत शयनासन का सेवन करता है—अरण्य, वृक्ष-तल, पर्वत, कंदरा, गुफा, शमशान, वनप्रस्थ, खुला आकाश, या पुआल का ढेर। जब वह इस प्रकार एकांत में विहार करता है, तब ब्राह्मण, गृहपति, निगम और जनपद के लोग उसके पीछे उमड़ पड़ते हैं। जब ब्राह्मण, गृहपति… उमड़ पड़ते हैं, तब वह (गुरु) उस भीड़भाड़ में मूर्छित (बेसुध) हो जाता है, (चीजों की) चाहत करने लगता है, लालच में गिर जाता है, और बाहुल्य (भोग-विलास) की ओर लौट आता है। इसे कहा जाता है, आनन्द, आचार्य का उपद्रव। आचार्य उपद्रव का मारा गया; उसे पाप-अकुशल धर्मों ने मार डाला—जो संक्लेशिक (मैले) हैं, पुनर्जन्म कराने वाले हैं, डरावने हैं, दुःख-विपाक वाले हैं, और भविष्य में जाति-जरा-मरण देने वाले हैं। इस प्रकार, आनन्द, आचार्य का उपद्रव होता है।
(२) शिष्य का उपद्रव कैसे होता है? उसी शास्ता का कोई श्रावक (शिष्य), उस शास्ता के विवेक (एकांत) का अनुसरण करते हुए एकांत शयनासन का सेवन करता है… तब ब्राह्मण, गृहपति… उसके पीछे उमड़ पड़ते हैं… वह मूर्छित हो जाता है… बाहुल्य की ओर लौट आता है। इसे कहा जाता है, आनन्द, शिष्य का उपद्रव। शिष्य उपद्रव का मारा गया…। इस प्रकार, आनन्द, शिष्य का उपद्रव होता है।
(३) ब्रह्मचारी का उपद्रव कैसे होता है? यहाँ, आनन्द, तथागत लोक में उत्पन्न होते हैं… वे एकांत शयनासन का सेवन करते हैं…। जब वे इस प्रकार एकांत में विहार करते हैं, तब ब्राह्मण, गृहपति… उनके पीछे उमड़ पड़ते हैं। किन्तु, वे (तथागत) उस भीड़भाड़ में न मूर्छित होते हैं, न चाहत करते हैं, न लालच में गिरते हैं, और न ही बाहुल्य की ओर लौटते हैं।
नोट: ध्यान दें कि यहाँ तथागत स्वयं “आचार्य उपद्रव” से मुक्त हैं। वे भीड़ से घिरे होने पर भी लालच में नहीं गिरते। लेकिन उनका कोई शिष्य (ब्रह्मचारी), जो अभी कच्चा है, वह उनकी देखा-देखी या लोकप्रियता के कारण गिर सकता है।
किन्तु, उस शास्ता (तथागत) का कोई श्रावक, उस शास्ता के विवेक का अनुसरण करते हुए एकांत शयनासन का सेवन करता है… तब ब्राह्मण, गृहपति… उसके पीछे उमड़ पड़ते हैं। वह मूर्छित हो जाता है, (चीजों की) चाहत करने लगता है, लालच में गिर जाता है, और बाहुल्य की ओर लौट आता है। इसे कहा जाता है, आनन्द, ब्रह्मचारी का उपद्रव। ब्रह्मचारी उपद्रव का मारा गया; उसे पाप-अकुशल धर्मों ने मार डाला…। इस प्रकार, आनन्द, ब्रह्मचारी का उपद्रव होता है।
इनमें, आनन्द, जो यह आचार्य का उपद्रव है, और जो यह शिष्य का उपद्रव है—इन दोनों से यह ब्रह्मचारी का उपद्रव अधिक दुःखदायी विपाक वाला और अधिक कटु विपाक वाला है, और यह (निश्चित) विनाश (नरक) की ओर ले जाने वाला है।
कुम्हार और घड़ा इसलिए, आनन्द, मेरे प्रति मित्रता का भाव रखना, न कि शत्रुता का। यह तुम्हारे लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा।
और कैसे, आनन्द, श्रावक शास्ता के प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं, न कि मित्रता का? यहाँ, आनन्द, शास्ता श्रावकों को धर्म उपदेश देते हैं—अनुकंपावान होकर, हितैषी होकर, अनुकंपा को उपादान (आधार) बनाकर—‘यह तुम्हारे हित के लिए है, यह तुम्हारे सुख के लिए है।’ (लेकिन) उनके श्रावक न सुश्रूषा (सुनने की इच्छा) करते हैं, न कान देते हैं, न (धर्म) समझने के लिए चित्त उपस्थित करते हैं; बल्कि शास्ता के शासन (शिक्षा) से हटकर, विरुद्ध होकर वर्तते हैं। इस प्रकार, आनन्द, श्रावक शास्ता के प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं, न कि मित्रता का।
और कैसे, आनन्द, श्रावक शास्ता के प्रति मित्रता का भाव रखते हैं, न कि शत्रुता का? यहाँ, आनन्द, शास्ता श्रावकों को धर्म उपदेश देते हैं… (और) उनके श्रावक सुश्रूषा करते हैं, कान देते हैं, (धर्म) समझने के लिए चित्त उपस्थित करते हैं; और शास्ता के शासन से हटकर नहीं वर्तते। इस प्रकार, आनन्द, श्रावक शास्ता के प्रति मित्रता का भाव रखते हैं, न कि शत्रुता का।
इसलिए, आनन्द, मेरे प्रति मित्रता का भाव रखना, न कि शत्रुता का। यह तुम्हारे लिए दीर्घकाल तक हित और सुख के लिए होगा।
आनन्द, मैं तुम्हारे साथ वैसा व्यवहार नहीं करूँगा जैसा कुम्हार कच्ची-गीली मिट्टी के साथ करता है। आनन्द, मैं बार-बार निग्रह करके (=कमियाँ बताकर/डाँटकर) बोलूँगा; मैं बार-बार (पाप-स्वभाव) हटा-हटा कर (=परख कर) बोलूँगा। जो सारवान (मजबूत) होगा, वही टिकेगा।”
कुम्हार की उपमा: कुम्हार जब कच्ची मिट्टी के बर्तन बनाता है, तो वह बहुत सावधानी और कोमलता से उसे संभालता है, क्योंकि वह नाजुक होती है। लेकिन बुद्ध कहते हैं कि वे अपने शिष्यों को नाजुक समझकर कोमलता से नहीं, बल्कि कठोरता से, उनकी कमियों को बार-बार इंगित करके (निग्रह करके) सिखाएंगे। जैसे पक्की हुई मजबूत चीज़ ही दबाव झेल सकती है, वैसे ही जो शिष्य ‘सारवान’ होगा, वही इस कठोर प्रशिक्षण में टिक पाएगा।
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
१८५. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सक्केसु विहरति कपिलवत्थुस्मिं निग्रोधारामे। अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय कपिलवत्थुं पिण्डाय पाविसि। कपिलवत्थुस्मिं पिण्डाय चरित्वा पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो येन काळखेमकस्स सक्कस्स विहारो तेनुपसङ्कमि दिवाविहाराय। तेन खो पन समयेन काळखेमकस्स सक्कस्स विहारे सम्बहुलानि सेनासनानि पञ्ञत्तानि होन्ति। अद्दसा खो भगवा काळखेमकस्स सक्कस्स विहारे सम्बहुलानि सेनासनानि पञ्ञत्तानि। दिस्वान भगवतो एतदहोसि – ‘‘सम्बहुलानि खो काळखेमकस्स सक्कस्स विहारे सेनासनानि पञ्ञत्तानि। सम्बहुला नु खो इध भिक्खू विहरन्ती’’ति।
१८६. तेन खो पन समयेन आयस्मा आनन्दो सम्बहुलेहि भिक्खूहि सद्धिं घटाय सक्कस्स विहारे चीवरकम्मं करोति। अथ खो भगवा सायन्हसमयं पटिसल्लाना वुट्ठितो येन घटाय सक्कस्स विहारो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्ञत्ते आसने निसीदि। निसज्ज खो भगवा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि – ‘‘सम्बहुलानि खो, आनन्द, काळखेमकस्स सक्कस्स विहारे सेनासनानि पञ्ञत्तानि। सम्बहुला नु खो एत्थ भिक्खू विहरन्ती’’ति? ‘‘सम्बहुलानि, भन्ते, काळखेमकस्स सक्कस्स विहारे सेनासनानि पञ्ञत्तानि। सम्बहुला भिक्खू एत्थ विहरन्ति। चीवरकारसमयो नो, भन्ते, वत्तती’’ति।
‘‘न खो, आनन्द, भिक्खु सोभति सङ्गणिकारामो सङ्गणिकरतो सङ्गणिकारामतं अनुयुत्तो गणारामो गणरतो गणसम्मुदितो। सो वतानन्द, भिक्खु सङ्गणिकारामो सङ्गणिकरतो सङ्गणिकारामतं अनुयुत्तो गणारामो गणरतो गणसम्मुदितो यं तं नेक्खम्मसुखं पविवेकसुखं उपसमसुखं सम्बोधिसुखं सम्बोधसुखं (सी॰ पी॰), सम्बोधसुखं चित्तेकग्गतासुखं (क॰) उपरि अरणविभङ्गसुत्ते पन सम्बोधिसुखन्त्वेव दिस्सति तस्स सुखस्स निकामलाभी भविस्सति अकिच्छलाभी अकसिरलाभीति – नेतं ठानं विज्जति। यो च खो सो, आनन्द, भिक्खु एको गणस्मा वूपकट्ठो विहरति तस्सेतं भिक्खुनो पाटिकङ्खं यं तं नेक्खम्मसुखं पविवेकसुखं उपसमसुखं सम्बोधिसुखं तस्स सुखस्स निकामलाभी भविस्सति अकिच्छलाभी अकसिरलाभीति – ठानमेतं विज्जति।
‘‘सो वतानन्द, भिक्खु सङ्गणिकारामो सङ्गणिकरतो सङ्गणिकारामतं अनुयुत्तो गणारामो गणरतो गणसम्मुदितो सामायिकं वा कन्तं चेतोविमुत्तिं उपसम्पज्ज विहरिस्सति असामायिकं वा अकुप्पन्ति – नेतं ठानं विज्जति। यो च खो सो, आनन्द, भिक्खु एको गणस्मा वूपकट्ठो विहरति तस्सेतं भिक्खुनो पाटिकङ्खं सामायिकं वा कन्तं चेतोविमुत्तिं उपसम्पज्ज विहरिस्सति असामायिकं वा अकुप्पन्ति – ठानमेतं विज्जति।
‘‘नाहं, आनन्द, एकं रूपम्पि एकरूपम्पि (सी॰) समनुपस्सामि यत्थ रत्तस्स यथाभिरतस्स रूपस्स विपरिणामञ्ञथाभावा न उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सूपायासा।
१८७. ‘‘अयं खो पनानन्द, विहारो तथागतेन अभिसम्बुद्धो यदिदं – सब्बनिमित्तानं अमनसिकारा अज्झत्तं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरितुं विहरतं (क॰ सी॰), विहरति (स्या॰ कं॰ क॰)। तत्र चे, आनन्द, तथागतं इमिना विहारेन विहरन्तं भवन्ति भगवन्तं (सी॰ स्या॰ कं॰ क॰) उपसङ्कमितारो भिक्खू भिक्खुनियो उपासका उपासिकायो राजानो राजमहामत्ता तित्थिया तित्थियसावका। तत्रानन्द, तथागतो विवेकनिन्नेनेव चित्तेन विवेकपोणेन विवेकपब्भारेन वूपकट्ठेन नेक्खम्माभिरतेन ब्यन्तीभूतेन सब्बसो आसवट्ठानीयेहि धम्मेहि अञ्ञदत्थु उय्योजनिकपटिसंयुत्तंयेव कथं कत्ता होति। तस्मातिहानन्द, भिक्खु चेपि आकङ्खेय्य – ‘अज्झत्तं सुञ्ञतं उपसम्पज्ज विहरेय्य’न्ति, तेनानन्द, भिक्खुना अज्झत्तमेव चित्तं सण्ठपेतब्बं सन्निसादेतब्बं एकोदि कातब्बं समादहातब्बं।
१८८. ‘‘कथञ्चानन्द, भिक्खु अज्झत्तमेव चित्तं सण्ठपेति सन्निसादेति एकोदिं करोति एकोदिकरोति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) समादहति? इधानन्द, भिक्खु विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि…पे॰… पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति…पे॰… दुतियं झानं… ततियं झानं… चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति। एवं खो, आनन्द, भिक्खु अज्झत्तमेव चित्तं सण्ठपेति सन्निसादेति एकोदिं करोति समादहति। सो अज्झत्तं सुञ्ञतं मनसि करोति। तस्स अज्झत्तं सुञ्ञतं मनसिकरोतो सुञ्ञताय चित्तं न पक्खन्दति नप्पसीदति न सन्तिट्ठति न विमुच्चति । एवं सन्तमेतं, आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘अज्झत्तं सुञ्ञतं खो मे मनसिकरोतो अज्झत्तं सुञ्ञताय चित्तं न पक्खन्दति नप्पसीदति न सन्तिट्ठति न विमुच्चती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। सो बहिद्धा सुञ्ञतं मनसि करोति…पे॰… सो अज्झत्तबहिद्धा सुञ्ञतं मनसि करोति …पे॰… सो आनेञ्जं मनसि करोति। तस्स आनेञ्जं मनसिकरोतो आनेञ्जाय चित्तं न पक्खन्दति नप्पसीदति न सन्तिट्ठति न विमुच्चति। एवं सन्तमेतं, आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘आनेञ्जं खो मे मनसिकरोतो आनेञ्जाय चित्तं न पक्खन्दति नप्पसीदति न सन्तिट्ठति न विमुच्चती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति।
‘‘तेनानन्द, भिक्खुना तस्मिंयेव पुरिमस्मिं समाधिनिमित्ते अज्झत्तमेव चित्तं सण्ठपेतब्बं सन्निसादेतब्बं एकोदि कातब्बं समादहातब्बं। सो अज्झत्तं सुञ्ञतं मनसि करोति। तस्स अज्झत्तं सुञ्ञतं मनसिकरोतो अज्झत्तं सुञ्ञताय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति विमुच्चति। एवं सन्तमेतं, आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘अज्झत्तं सुञ्ञतं खो मे मनसिकरोतो अज्झत्तं सुञ्ञताय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति विमुच्चती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। सो बहिद्धा सुञ्ञतं मनसि करोति…पे॰… सो अज्झत्तबहिद्धा सुञ्ञतं मनसि करोति…पे॰… सो आनेञ्जं मनसि करोति। तस्स आनेञ्जं मनसिकरोतो आनेञ्जाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति विमुच्चति। एवं सन्तमेतं, आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘आनेञ्जं खो मे मनसिकरोतो आनेञ्जाय चित्तं पक्खन्दति पसीदति सन्तिट्ठति विमुच्चती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति।
१८९. ‘‘तस्स चे, आनन्द, भिक्खुनो इमिना विहारेन विहरतो चङ्कमाय चित्तं नमति, सो चङ्कमति – ‘एवं मं चङ्कमन्तं नाभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सविस्सन्ती’ति । इतिह तत्थ सम्पजानो होति। तस्स चे, आनन्द, भिक्खुनो इमिना विहारेन विहरतो ठानाय चित्तं नमति, सो तिट्ठति – ‘एवं मं ठितं नाभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सविस्सन्ती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। तस्स चे, आनन्द, भिक्खुनो इमिना विहारेन विहरतो निसज्जाय चित्तं नमति, सो निसीदति – ‘एवं मं निसिन्नं नाभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सविस्सन्ती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। तस्स चे, आनन्द, भिक्खुनो इमिना विहारेन विहरतो सयनाय चित्तं नमति , सो सयति – ‘एवं मं सयन्तं नाभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सविस्सन्ती’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति।
‘‘तस्स चे, आनन्द, भिक्खुनो इमिना विहारेन विहरतो कथाय भस्साय (सी॰), भासाय (स्या॰ कं॰ पी॰) चित्तं नमति, सो – ‘यायं कथा हीना गम्मा पोथुज्जनिका अनरिया अनत्थसंहिता न निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तति, सेय्यथिदं – राजकथा चोरकथा महामत्तकथा सेनाकथा भयकथा युद्धकथा अन्नकथा पानकथा वत्थकथा सयनकथा मालाकथा गन्धकथा ञातिकथा यानकथा गामकथा निगमकथा नगरकथा जनपदकथा इत्थिकथा सुराकथा विसिखाकथा कुम्भट्ठानकथा पुब्बपेतकथा नानत्तकथा लोकक्खायिका समुद्दक्खायिका इतिभवाभवकथा इति वा इति – एवरूपिं कथं न कथेस्सामी’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। या च खो अयं, आनन्द, कथा अभिसल्लेखिका चेतोविनीवरणसप्पाया चेतोविचारणसप्पाया (सी॰ स्या॰ कं॰), चेतोविवरणसप्पाया (पी॰) एकन्तनिब्बिदाय विरागाय निरोधाय उपसमाय अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति, सेय्यथिदं – अप्पिच्छकथा सन्तुट्ठिकथा पविवेककथा असंसग्गकथा वीरियारम्भकथा सीलकथा समाधिकथा पञ्ञाकथा विमुत्तिकथा विमुत्तिञाणदस्सनकथा इति – ‘एवरूपिं कथं कथेस्सामी’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति।
‘‘तस्स चे, आनन्द, भिक्खुनो इमिना विहारेन विहरतो वितक्काय चित्तं नमति, सो – ‘ये ते वितक्का हीना गम्मा पोथुज्जनिका अनरिया अनत्थसंहिता न निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तन्ति, सेय्यथिदं – कामवितक्को ब्यापादवितक्को विहिंसावितक्को इति एवरूपे वितक्के एवरूपेन वितक्केन (सी॰ स्या॰ कं॰ क॰) न वितक्केस्सामी’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। ये च खो इमे, आनन्द, वितक्का अरिया निय्यानिका निय्यन्ति तक्करस्स सम्मादुक्खक्खयाय, सेय्यथिदं – नेक्खम्मवितक्को अब्यापादवितक्को अविहिंसावितक्को इति – ‘एवरूपे वितक्के एवरूपेन वितक्केन (क॰) वितक्केस्सामी’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति।
१९०. ‘‘पञ्च खो इमे, आनन्द, कामगुणा। कतमे पञ्च? चक्खुविञ्ञेय्या रूपा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया, सोतविञ्ञेय्या सद्दा… घानविञ्ञेय्या गन्धा… जिव्हाविञ्ञेय्या रसा… कायविञ्ञेय्या फोट्ठब्बा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया – इमे खो, आनन्द, पञ्च कामगुणा यत्थ भिक्खुना अभिक्खणं सकं चित्तं पच्चवेक्खितब्बं – ‘अत्थि नु खो मे इमेसु पञ्चसु कामगुणेसु अञ्ञतरस्मिं वा अञ्ञतरस्मिं वा आयतने उप्पज्जति चेतसो समुदाचारो’ति? सचे, आनन्द, भिक्खु पच्चवेक्खमानो एवं पजानाति – ‘अत्थि खो मे इमेसु पञ्चसु कामगुणेसु अञ्ञतरस्मिं वा अञ्ञतरस्मिं वा आयतने उप्पज्जति चेतसो समुदाचारो’ति, एवं सन्तमेतं एवं सन्तं (अट्ठ॰), आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘यो खो इमेसु पञ्चसु कामगुणेसु छन्दरागो सो मे नप्पहीनो’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। सचे पनानन्द, भिक्खु पच्चवेक्खमानो एवं पजानाति – ‘नत्थि खो मे इमेसु पञ्चसु कामगुणेसु अञ्ञतरस्मिं वा अञ्ञतरस्मिं वा आयतने उप्पज्जति चेतसो समुदाचारो’ति, एवं सन्तमेतं, आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘यो खो इमेसु पञ्चसु कामगुणेसु छन्दरागो सो मे पहीनो’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति।
१९१. ‘‘पञ्च खो इमे, आनन्द, उपादानक्खन्धा यत्थ भिक्खुना उदयब्बयानुपस्सिना विहातब्बं – ‘इति रूपं इति रूपस्स समुदयो इति रूपस्स अत्थङ्गमो, इति वेदना… इति सञ्ञा… इति सङ्खारा… इति विञ्ञाणं इति विञ्ञाणस्स समुदयो इति विञ्ञाणस्स अत्थङ्गमो’ति। तस्स इमेसु पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु उदयब्बयानुपस्सिनो विहरतो यो पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु अस्मिमानो सो पहीयति। एवं सन्तमेतं, आनन्द, भिक्खु एवं पजानाति – ‘यो खो इमेसु पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु अस्मिमानो सो मे पहीनो’ति। इतिह तत्थ सम्पजानो होति। इमे खो ते, आनन्द, धम्मा एकन्तकुसला कुसलायातिका धम्मा एकन्तकुसलायतिका (सब्बत्थ) अट्ठकथाटीका ओलोकेतब्बा अरिया लोकुत्तरा अनवक्कन्ता पापिमता। तं किं मञ्ञसि, आनन्द, कं अत्थवसं सम्पस्समानो अरहति सावको सत्थारं अनुबन्धितुं अपि पणुज्जमानो’’ति अपि पनुज्जमानोपीति (क॰ सी॰), अपि पयुज्जमानोति (स्या॰ कं॰ पी॰)? ‘‘भगवंमूलका नो, भन्ते, धम्मा भगवंनेत्तिका भगवंपटिसरणा । साधु वत, भन्ते, भगवन्तंयेव पटिभातु एतस्स भासितस्स अत्थो। भगवतो सुत्वा भिक्खू धारेस्सन्ती’’ति।
१९२. ‘‘न खो, आनन्द, अरहति सावको सत्थारं अनुबन्धितुं, यदिदं सुत्तं गेय्यं वेय्याकरणं तस्स हेतु वेय्याकरणस्स हेतु (क॰)। तं किस्स हेतु? दीघरत्तस्स दीघरत्तं + अस्साति पदच्छेदो हि ते, आनन्द, धम्मा सुता धाता वचसा परिचिता मनसानुपेक्खिता दिट्ठिया सुप्पटिविद्धा। या च खो अयं, आनन्द, कथा अभिसल्लेखिका चेतोविनीवरणसप्पाया एकन्तनिब्बिदाय विरागाय निरोधाय उपसमा अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति, सेय्यथिदं – अप्पिच्छकथा सन्तुट्ठिकथा पविवेककथा असंसग्गकथा वीरियारम्भकथा सीलकथा समाधिकथा पञ्ञाकथा विमुत्तिकथा विमुत्तिञाणदस्सनकथा – एवरूपिया खो, आनन्द, कथाय हेतु अरहति सावको सत्थारं अनुबन्धितुं अपि पणुज्जमानो।
‘‘एवं सन्ते खो, आनन्द, आचरियूपद्दवो होति, एवं सन्ते अन्तेवासूपद्दवो होति, एवं सन्ते ब्रह्मचारूपद्दवो होति।
१९३. ‘‘कथञ्चानन्द, आचरियूपद्दवो होति? इधानन्द, एकच्चो सत्था विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। तस्स तथावूपकट्ठस्स विहरतो अन्वावत्तन्ति अन्वावट्टन्ति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) ब्राह्मणगहपतिका नेगमा चेव जानपदा च। सो अन्वावत्तन्तेसु ब्राह्मणगहपतिकेसु नेगमेसु चेव जानपदेसु च मुच्छं निकामयति मुच्छति कामयति (सी॰ पी॰) अट्ठकथायं पन न तथा दिस्सति, गेधं आपज्जति, आवत्तति बाहुल्लाय। अयं वुच्चतानन्द, उपद्दवो उपद्दुतो (सी॰ पी॰) आचरियो। आचरियूपद्दवेन अवधिंसु नं पापका अकुसला धम्मा संकिलेसिका पोनोब्भविका पोनोभविका (सी॰ पी॰) सदरा दुक्खविपाका आयतिं जातिजरामरणिया। एवं खो, आनन्द, आचरियूपद्दवो होति।
१९४. ‘‘कथञ्चानन्द, अन्तेवासूपद्दवो होति? तस्सेव खो पनानन्द, सत्थु सावको तस्स सत्थु विवेकमनुब्रूहयमानो विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। तस्स तथावूपकट्ठस्स विहरतो अन्वावत्तन्ति ब्राह्मणगहपतिका नेगमा चेव जानपदा च। सो अन्वावत्तन्तेसु ब्राह्मणगहपतिकेसु नेगमेसु चेव जानपदेसु च मुच्छं निकामयति, गेधं आपज्जति, आवत्तति बाहुल्लाय। अयं वुच्चतानन्द, उपद्दवो अन्तेवासी। अन्तेवासूपद्दवेन अवधिंसु नं पापका अकुसला धम्मा संकिलेसिका पोनोब्भविका सदरा दुक्खविपाका आयतिं जातिजरामरणिया। एवं खो, आनन्द, अन्तेवासूपद्दवो होति।
१९५. ‘‘कथञ्चानन्द, ब्रह्मचारूपद्दवो होति? इधानन्द, तथागतो लोके उप्पज्जति अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा। सो विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। तस्स तथावूपकट्ठस्स विहरतो अन्वावत्तन्ति ब्राह्मणगहपतिका नेगमा चेव जानपदा च। सो अन्वावत्तन्तेसु ब्राह्मणगहपतिकेसु नेगमेसु चेव जानपदेसु च न मुच्छं निकामयति, न गेधं आपज्जति, न आवत्तति बाहुल्लाय। तस्सेव खो पनानन्द, सत्थु सावको तस्स सत्थु विवेकमनुब्रूहयमानो विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं। तस्स तथावूपकट्ठस्स विहरतो अन्वावत्तन्ति ब्राह्मणगहपतिका नेगमा चेव जानपदा च। सो अन्वावत्तन्तेसु ब्राह्मणगहपतिकेसु नेगमेसु चेव जानपदेसु च मुच्छं निकामयति, गेधं आपज्जति, आवत्तति बाहुल्लाय। अयं वुच्चतानन्द, उपद्दवो ब्रह्मचारी। ब्रह्मचारूपद्दवेन अवधिंसु नं पापका अकुसला धम्मा संकिलेसिका पोनोब्भविका सदरा दुक्खविपाका आयतिं जातिजरामरणिया। एवं खो, आनन्द, ब्रह्मचारूपद्दवो होति।
‘‘तत्रानन्द, यो चेवायं आचरियूपद्दवो, यो च अन्तेवासूपद्दवो अयं तेहि ब्रह्मचारूपद्दवो दुक्खविपाकतरो चेव कटुकविपाकतरो च, अपि च विनिपाताय संवत्तति।
१९६. ‘‘तस्मातिह मं, आनन्द, मित्तवताय समुदाचरथ, मा सपत्तवताय। तं वो भविस्सति दीघरत्तं हिताय सुखाय।
‘‘कथञ्चानन्द , सत्थारं सावका सपत्तवताय समुदाचरन्ति, नो मित्तवताय? इधानन्द, सत्था सावकानं धम्मं देसेति अनुकम्पको हितेसी अनुकम्पं उपादाय – ‘इदं वो हिताय, इदं वो सुखाया’ति। तस्स सावका न सुस्सूसन्ति, न सोतं ओदहन्ति, न अञ्ञा चित्तं उपट्ठपेन्ति, वोक्कम्म च सत्थुसासना वत्तन्ति। एवं खो, आनन्द, सत्थारं सावका सपत्तवताय समुदाचरन्ति, नो मित्तवताय।
‘‘कथञ्चानन्द, सत्थारं सावका मित्तवताय समुदाचरन्ति, नो सपत्तवताय? इधानन्द, सत्था सावकानं धम्मं देसेति अनुकम्पको हितेसी अनुकम्पं उपादाय – ‘इदं वो हिताय, इदं वो सुखाया’ति। तस्स सावका सुस्सूसन्ति, सोतं ओदहन्ति, अञ्ञा चित्तं उपट्ठपेन्ति, न च वोक्कम सत्थुसासना वत्तन्ति। एवं खो, आनन्द, सत्थारं सावका मित्तवताय समुदाचरन्ति, नो सपत्तवताय।
‘‘तस्मातिह मं, आनन्द, मित्तवताय समुदाचरथ, मा सपत्तवताय। तं वो भविस्सति दीघरत्तं हिताय सुखाय। न वो अहं, आनन्द, तथा परक्कमिस्सामि यथा कुम्भकारो आमके आमकमत्ते। निग्गय्ह निग्गय्हाहं, आनन्द, वक्खामि; पवय्ह पवय्ह, आनन्द, वक्खामि पवय्ह पवय्ह (सी॰ पी॰), पग्गय्ह पग्गय्ह आनन्द वक्खामि (क॰)। यो सारो सो ठस्सती’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा आनन्दो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।
महासुञ्ञतसुत्तं निट्ठितं दुतियं।