
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे।
उस समय, भोजन के बाद भिक्षु उपस्थान-शाला (सभा भवन) में एकत्र हुए थे। उनके बीच यह चर्चा चल पड़ी—
“आवुसो! यह कितने आश्चर्य की बात है, यह कितनी अद्भुत बात है! तथागत की ऋद्धि और उनका महान प्रभाव कितना शक्तिशाली है! अतीत के वो बुद्ध जो परिनिर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं, जिनके प्रपंच छिन्न हो चुके हैं, जिनके मार्ग बंद हो चुके हैं, जो सभी दुःखों से पार हो चुके हैं—उन्हें भी तथागत जानते हैं और याद करते हैं। वे जानते हैं कि—‘उन भगवानों का जन्म ऐसा था, उनका नाम ऐसा था, उनका गोत्र ऐसा था, उनका शील (आचरण) ऐसा था, उनका धम्म (समाधि) ऐसा था, उनकी प्रज्ञा ऐसी थी, उनका विहार ऐसा था और उनकी विमुक्ति ऐसी थी’।”
जब वे यह चर्चा कर रहे थे, तब आयुष्मान आनंद ने भिक्षुओं से कहा—
“आवुसो, तथागत स्वयं आश्चर्यजनक हैं और वे आश्चर्यजनक धर्मों (गुणों) से युक्त हैं। तथागत अद्भुत हैं और वे अद्भुत धर्मों से युक्त हैं।”
भिक्षुओं की यह चर्चा चल ही रही थी कि भगवान वहाँ पधारे और बिछे हुए आसन पर बैठ गए। बैठकर भगवान ने भिक्षुओं से पूछा—
“भिक्षुओं, अभी तुम यहाँ किस कथा को लेकर बैठे थे? और तुम्हारे बीच क्या चर्चा चल रही थी?”
भिक्षुओं ने पूरी बात बताई कि वे तथागत की महान शक्तियों और अतीत के बुद्धों को जानने की क्षमता पर चर्चा कर रहे थे, और कैसे आनंद ने तथागत को ‘आश्चर्यजनक और अद्भुत’ कहा।
तब भगवान ने आयुष्मान आनंद को संबोधित किया—
“तो फिर, आनंद! तथागत के और भी जो आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण हैं, उन्हें तुम ही भिक्षुओं को बताओ।”
(आनंद ने कहा—)
“भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख ही यह सुना है और उन्हीं से ग्रहण किया है कि—
१. तुषित लोक में उत्पत्ति: ‘आनंद, स्मृतिमान (जागरूक) और संपज्ञान (होशपूर्वक) होकर ही बोधिसत्व तुषित लोक में उत्पन्न हुए।’ भन्ते, यह कि बोधिसत्व स्मृतिमान और संपज्ञान होकर तुषित लोक में उत्पन्न हुए—इसे मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।
२. तुषित लोक में स्थिति: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘स्मृतिमान और संपज्ञान होकर ही बोधिसत्व तुषित लोक में स्थित रहे।’ इसे भी मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।
३. आयु पर्यंत: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब तक उस तुषित लोक की आयु थी, तब तक बोधिसत्व वहीं रहे।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
४. गर्भ में प्रवेश: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘स्मृतिमान और संपज्ञान होकर ही बोधिसत्व तुषित लोक से च्युत होकर माता की कोख में आए।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
५. अपार प्रकाश: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘आनंद, जिस क्षण बोधिसत्व माता की कोख में आते हैं, उस क्षण देवों के देव-अनुभाव (तेज) को भी अतिक्रम कर, देवताओं सहित, मार और ब्रह्मा सहित इस पूरी दुनिया में एक अपार और उदार प्रकाश (रोशनी) उत्पन्न होता है। यहाँ तक कि वो लोकान्तरिक नरक—जो खुले हैं, संवर-रहित हैं, घोर अंधकार से भरे हैं, जहाँ इन महान शक्तिशाली सूर्य और चंद्रमा की रोशनी भी नहीं पहुँच पाती—वहाँ भी एक अपार प्रकाश फैल जाता है। वहाँ रहने वाले प्राणी भी उस प्रकाश से एक-दूसरे को देख पाते हैं और सोचते हैं—‘अरे! यहाँ अन्य प्राणी भी उत्पन्न हुए हैं!’ और यह दस हजार लोकों की धातु कांप उठती है, हिल जाती है।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
६. चार देवों का पहरा: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख में आते हैं, तो चारों दिशाओं से चार देवपुत्र रक्षा के लिए नियुक्त हो जाते हैं—कि बोधिसत्व को या बोधिसत्व की माता को कोई मनुष्य, अमनुष्य या कोई भी प्राणी कष्ट न पहुँचा सके।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
७. माता का शील: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख में आते हैं, तो बोधिसत्व की माता स्वभाव से ही शीलवान हो जाती हैं। वे जीव-हत्या, चोरी, व्यभिचार, झूठ और नशे से विरत (दूर) हो जाती हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
८. काम-वासना का अभाव: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख में आते हैं, तो बोधिसत्व की माता के मन में पुरुषों के प्रति कोई काम-वासना उत्पन्न नहीं होती। कोई भी पुरुष रक्ति-चित्त से उनका अतिक्रमण नहीं कर सकता।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
९. इन्द्रिय सुख: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख में आते हैं, तो बोधिसत्व की माता पाँचों काम-गुणों (इन्द्रिय सुखों) का लाभ पाती हैं और सुखपूर्वक विहार करती हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१०. रत्न की तरह दृश्य: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख में होते हैं, तो माता को कोई शारीरिक कष्ट नहीं होता। वे सुखी और क्लान्ति-रहित (थकान रहित) होती हैं। और, बोधिसत्व की माता अपनी कोख में स्थित बोधिसत्व को अपनी आँखों से साफ़ देखती हैं, जिनके सभी अंग-प्रत्यंग पूर्ण होते हैं और इन्द्रियां सबल होती हैं। जैसे, आनंद! एक वैदुर्य मणिरत्न हो—शुभ, आठ पहलुओं वाला, अच्छी तरह तराशा हुआ, स्वच्छ और पारदर्शी। और उसमें एक नीला, पीला, लाल, सफेद या पीला धागा पिरोया गया हो। उसे हाथ में लेकर एक आँख वाला व्यक्ति देखे—‘यह वैदुर्य मणि है… और यह इसमें पिरोया धागा है।’ ठीक वैसे ही, बोधिसत्व की माता बोधिसत्व को अपनी कोख में साफ़ देखती हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
११. सात दिन बाद मृत्यु: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘बोधिसत्व के जन्म के सात दिन बाद बोधिसत्व की माता का देहांत हो जाता है और वे तुषित लोक में उत्पन्न होती हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१२. दस माह: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘अन्य स्त्रियाँ नौ या दस महीने गर्भ धारण कर प्रसव करती हैं, लेकिन बोधिसत्व की माता वैसे नहीं करतीं। वे पूरे दस महीने बोधिसत्व को धारण कर ही प्रसव करती हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१३. खड़े होकर जन्म: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘अन्य स्त्रियाँ बैठकर या लेटकर प्रसव करती हैं, लेकिन बोधिसत्व की माता वैसे नहीं करतीं। वे खड़े होकर ही बोधिसत्व को जन्म देती हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१४. देवताओं का स्वागत: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख से निकलते हैं, तो सबसे पहले उन्हें देवता ग्रहण करते हैं, बाद में मनुष्य।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१५. पृथ्वी का स्पर्श नहीं: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख से निकलते हैं, तो वे पृथ्वी पर नहीं गिरते। चार देवपुत्र उन्हें ग्रहण करते हैं और माता के सामने रखकर कहते हैं—‘देवी, प्रसन्न होइए! आपके महान तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ है।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१६. निर्मल जन्म: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व माता की कोख से निकलते हैं, तो वे बेदाग निकलते हैं। वे पानी, कफ, रक्त या किसी भी अशुद्धि से सने नहीं होते। वे शुद्ध और निर्मल होते हैं। जैसे काशी (बनारस) के वस्त्र पर रखा मणिरत्न—न तो रत्न वस्त्र को मैला करता है, न वस्त्र रत्न को। क्यों? क्योंकि दोनों शुद्ध हैं।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१७. दो जल धाराएँ: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जब बोधिसत्व का जन्म होता है, तो आकाश से दो जल की धाराएँ गिरती हैं—एक ठंडी और एक गर्म—जिससे बोधिसत्व और उनकी माता का स्नान होता है।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।
१८. सात कदम और सिंहनाद: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जन्म लेते ही बोधिसत्व अपने समतल पैरों से पृथ्वी पर खड़े होते हैं और उत्तर दिशा की ओर सात कदम चलते हैं। जब वे चलते हैं, तो उनके ऊपर श्वेत छत्र छाया रहता है। वे सभी दिशाओं को देखते हैं और यह ऋषभ-वाणी (सिंहनाद) बोलते हैं— “मैं लोक में अग्र (सबसे आगे) हूँ! मैं लोक में ज्येष्ठ (सबसे बड़ा) हूँ! मैं लोक में श्रेष्ठ हूँ! यह मेरा अंतिम जन्म है, अब कोई पुनर्जन्म नहीं होगा!”’ इसे भी मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।
१९. जन्म के समय प्रकाश: भन्ते, मैंने भगवान से ही सुना है—‘जन्म के समय भी… (गर्भ में आने की तरह ही) दस हजार लोकों में अपार प्रकाश फैलता है और पृथ्वी कांप उठती है।’ इसे भी मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।”
(जब आनंद ने इतना कह दिया, तब भगवान बोले—)
“तो फिर, आनंद! तुम तथागत के इस आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण को भी धारण करो।
आनंद, यहाँ तथागत की वेदनाएँ (feelings) विदित (ज्ञात) होकर ही उत्पन्न होती हैं, विदित होकर ही ठहरती हैं, और विदित होकर ही अस्त होती हैं। तथागत की संज्ञाएँ (perceptions) विदित होकर ही उत्पन्न होती हैं, विदित होकर ही ठहरती हैं, और विदित होकर ही अस्त होती हैं। तथागत के वितर्क (thoughts) विदित होकर ही उत्पन्न होते हैं, विदित होकर ही ठहरते हैं, और विदित होकर ही अस्त होते हैं।
आनंद! इसे भी तुम तथागत का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण समझो।”
“भन्ते! चूँकि भगवान की वेदनाएँ, संज्ञाएँ और वितर्क पूरी जागरूकता (विदित) के साथ ही उत्पन्न, स्थित और अस्त होते हैं—इसे भी मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ और धारण करता हूँ।”
आयुष्मान आनंद ने ऐसा कहा। शास्ता (भगवान) ने इसका अनुमोदन किया। भिक्षु भी आनंद के कथन से प्रसन्न हुए और उसका अभिनंदन किया।
१९७. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो सम्बहुलानं भिक्खूनं पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तानं उपट्ठानसालायं सन्निसिन्नानं सन्निपतितानं अयमन्तराकथा उदपादि – ‘‘अच्छरियं, आवुसो, अब्भुतं, आवुसो, तथागतस्स महिद्धिकता महानुभावता, यत्र हि नाम तथागतो अतीते बुद्धे परिनिब्बुते छिन्नपपञ्चे छिन्नवटुमे परियादिन्नवट्टे सब्बदुक्खवीतिवत्ते जानिस्सति अनुस्सरिस्सति जानिस्सति (क॰) – ‘एवंजच्चा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंनामा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंगोत्ता ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंसीला ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंधम्मा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंपञ्ञा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंविहारी ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंविमुत्ता ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपी’’ति! एवं वुत्ते, आयस्मा आनन्दो ते भिक्खू एतदवोच – ‘‘अच्छरिया चेव, आवुसो, तथागता अच्छरियधम्मसमन्नागता च; अब्भुता चेव, आवुसो, तथागता अब्भुतधम्मसमन्नागता चा’’ति। अयञ्च हिदं तेसं भिक्खूनं अन्तराकथा विप्पकता होति।
१९८. अथ खो भगवा सायन्हसमयं पटिसल्लाना वुट्ठितो येनुपट्ठानसाला तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्ञत्ते आसने निसीदि । निसज्ज खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘काय नुत्थ, भिक्खवे, एतरहि कथाय सन्निसिन्ना, का च पन वो अन्तराकथा विप्पकता’’ति? ‘‘इध, भन्ते, अम्हाकं पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तानं उपट्ठानसालायं सन्निसिन्नानं सन्निपतितानं अयमन्तराकथा उदपादि – ‘अच्छरियं, आवुसो, अब्भुतं, आवुसो, तथागतस्स महिद्धिकता महानुभावता, यत्र हि नाम तथागतो अतीते बुद्धे परिनिब्बुते छिन्नपपञ्चे छिन्नवटुमे परियादिन्नवट्टे सब्बदुक्खवीतिवत्ते जानिस्सति – एवंजच्चा ते भगवन्तो अहेसुं इतिपि, एवंनामा… एवंगोत्ता… एवंसीला… एवंधम्मा.. एवंपञ्ञा… एवंविहारी… एवंविमुत्ता ते भगवन्तो अहेसुं इतिपी’ति! एवं वुत्ते, भन्ते, आयस्मा आनन्दो अम्हे एतदवोच – ‘अच्छरिया चेव, आवुसो, तथागता अच्छरियधम्मसमन्नागता च, अब्भुता चेव, आवुसो, तथागता अब्भुतधम्मसमन्नागता चा’ति। अयं खो नो, भन्ते, अन्तराकथा विप्पकता; अथ भगवा अनुप्पत्तो’’ति।
१९९. अथ खो भगवा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि – ‘‘तस्मातिह तं, आनन्द, भिय्योसोमत्ताय पटिभन्तु तथागतस्स अच्छरिया अब्भुतधम्मा’’ति अब्भुता धम्माति (?)।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सतो सम्पजानो, आनन्द, बोधिसत्तो तुसितं कायं उपपज्जी’ति। यम्पि, भन्ते, सतो सम्पजानो बोधिसत्तो तुसितं कायं उपपज्जि इदंपाहं , भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सतो सम्पजानो, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासी’ति। यम्पि, भन्ते, सतो सम्पजानो बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासि इदंपाहं इदंपहं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰), भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२००. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यावतायुकं, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासी’ति। यम्पि, भन्ते, यावतायुकं बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासि इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सतो सम्पजानो, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिता, काया चवित्वा मातुकुच्छिं ओक्कमी’ति। यम्पि, भन्ते , सतो सम्पजानो बोधिसत्तो तुसिता काया चवित्वा मातुकुच्छिं ओक्कमि इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०१. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिता काया चवित्वा मातुकुच्छिं ओक्कमति, अथ सदेवके लोके समारके सब्रह्मके सस्समणब्राह्मणिया पजाय सदेवमनुस्साय अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्कम्मेव देवानं देवानुभावं। यापि ता लोकन्तरिका अघा असंवुता अन्धकारा अन्धकारतिमिसा, यत्थपिमे चन्दिमसूरिया एवंमहिद्धिका एवंमहानुभावा आभाय नानुभोन्ति तत्थपि अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्कम्मेव देवानं देवानुभावं। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि तेनोभासेन अञ्ञमञ्ञं सञ्जानन्ति – अञ्ञेपि किर, भो, सन्ति सत्ता इधूपपन्नाति। अयञ्च दससहस्सी लोकधातु सङ्कम्पति सम्पकम्पति सम्पवेधति अप्पमाणो च उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्कम्मेव देवानं देवानुभाव’न्ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०२. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्कन्तो होति, चत्तारो देवपुत्ता चतुद्दिसं आरक्खाय उपगच्छन्ति – मा नं बोधिसत्तं वा बोधिसत्तमातरं वा मनुस्सो वा अमनुस्सो वा कोचि वा विहेठेसी’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०३. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्कन्तो होति, पकतिया सीलवती बोधिसत्तमाता होति विरता पाणातिपाता विरता अदिन्नादाना विरता कामेसुमिच्छाचारा विरता मुसावादा विरता सुरामेरयमज्जपमादट्ठाना’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा , आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्कन्तो होति, न बोधिसत्तमातु पुरिसेसु मानसं उप्पज्जति कामगुणूपसंहितं, अनतिक्कमनीया च बोधिसत्तमाता होति केनचि पुरिसेन रत्तचित्तेना’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्कन्तो होति, लाभिनी बोधिसत्तमाता होति पञ्चन्नं कामगुणानं। सा पञ्चहि कामगुणेहि समप्पिता समङ्गीभूता परिचारेती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०४. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्कन्तो होति, न बोधिसत्तमातु कोचिदेव आबाधो उप्पज्जति; सुखिनी बोधिसत्तमाता होति अकिलन्तकाया; बोधिसत्तञ्च बोधिसत्तमाता तिरोकुच्छिगतं पस्सति सब्बङ्गपच्चङ्गं अहीनिन्द्रियं। सेय्यथापि, आनन्द, मणि वेळुरियो सुभो जातिमा अट्ठंसो सुपरिकम्मकतो। तत्रास्स सुत्तं आवुतं नीलं वा पीतं वा लोहितं वा ओदातं वा पण्डुसुत्तं वा। तमेनं चक्खुमा पुरिसो हत्थे करित्वा पच्चवेक्खेय्य – अयं खो मणि वेळुरियो सुभो जातिमा अट्ठंसो सुपरिकम्मकतो, तत्रिदं सुत्तं आवुतं नीलं वा पीतं वा लोहितं वा ओदातं वा पण्डुसुत्तं वाति। एवमेव खो, आनन्द, यदा बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्कन्तो होति , न बोधिसत्तमातु कोचिदेव आबाधो उप्पज्जति; सुखिनी बोधिसत्तमाता होति अकिलन्तकाया; बोधिसत्तञ्च बोधिसत्तमाता तिरोकुच्छिगतं पस्सति सब्बङ्गपच्चङ्गं अहीनिन्द्रिय’न्ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०५. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सत्ताहजाते, आनन्द, बोधिसत्ते बोधिसत्तमाता कालं करोति, तुसितं कायं उपपज्जती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यथा खो पनानन्द, अञ्ञा इत्थिका नव वा दस वा मासे गब्भं कुच्छिना परिहरित्वा विजायन्ति, न हेवं बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता विजायति। दसेव मासानि बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता कुच्छिना परिहरित्वा विजायती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यथा खो पनानन्द, अञ्ञा इत्थिका निसिन्ना वा निपन्ना वा विजायन्ति, न हेवं बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता विजायति। ठिताव बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता विजायती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा , आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, देवा नं पठमं पटिग्गण्हन्ति पच्छा मनुस्सा’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०६. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, अप्पत्तोव बोधिसत्तो पथविं होति, चत्तारो नं देवपुत्ता पटिग्गहेत्वा मातु पुरतो ठपेन्ति – अत्तमना, देवि, होहि; महेसक्खो ते पुत्तो उप्पन्नो’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, विसदोव निक्खमति अमक्खितो उदेन उद्देन (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अमक्खितो सेम्हेन अमक्खितो रुहिरेन अमक्खितो केनचि असुचिना सुद्धो विसदो विसुद्धो (स्या॰)। सेय्यथापि, आनन्द, मणिरतनं कासिके वत्थे निक्खित्तं नेव मणिरतनं कासिकं वत्थं मक्खेति नापि कासिकं वत्थं मणिरतनं मक्खेति। तं किस्स हेतु? उभिन्नं सुद्धत्ता। एवमेव खो, आनन्द, यदा बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, विसदोव निक्खमति अमक्खितो उदेन अमक्खितो सेम्हेन अमक्खितो रुहिरेन अमक्खितो केनचि असुचिना सुद्धो विसदो’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, द्वे उदकस्स धारा अन्तलिक्खा पातुभवन्ति – एका सीतस्स, एका उण्हस्स; येन बोधिसत्तस्स उदककिच्चं करोन्ति मातु चा’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
२०७. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सम्पतिजातो, आनन्द, बोधिसत्तो समेहि पादेहि पथवियं पतिट्ठहित्वा उत्तराभिमुखो सत्तपदवीतिहारेन गच्छति, सेतम्हि छत्ते अनुधारियमाने, सब्बा च दिसा विलोकेति, आसभिञ्च वाचं भासति – अग्गोहमस्मि लोकस्स, जेट्ठोहमस्मि लोकस्स, सेट्ठोहमस्मि लोकस्स। अयमन्तिमा जाति , नत्थि दानि पुनब्भवो’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।
‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, अथ सदेवके लोके समारके सब्रह्मके सस्समणब्राह्मणिया पजाय सदेवमनुस्साय अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्कम्मेव देवानं देवानुभावं। यापि ता लोकन्तरिका अघा असंवुता अन्धकारा अन्धकारतिमिसा यत्थपिमे चन्दिमसूरिया एवंमहिद्धिका एवंमहानुभावा आभाय नानुभोन्ति तत्थपि अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्कम्मेव देवानं देवानुभावं। येपि तत्थ सत्ता उपपन्ना तेपि तेनोभासेन अञ्ञमञ्ञं सञ्जानन्ति – अञ्ञेपि किर, भो, सन्ति सत्ता इधूपपन्नाति। अयञ्च दससहस्सी लोकधातु सङ्कम्पति सम्पकम्पति सम्पवेधति, अप्पमाणो च उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्कम्मेव देवानं देवानुभाव’न्ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमी’’ति।
२०८. ‘‘तस्मातिह त्वं, आनन्द, इदम्पि तथागतस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेहि। इधानन्द, तथागतस्स विदिता वेदना उप्पज्जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति; विदिता सञ्ञा उप्पज्जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति; विदिता वितक्का उप्पज्जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। इदम्पि खो, त्वं, आनन्द, तथागतस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेही’’ति। ‘‘यम्पि, भन्ते, भगवतो विदिता वेदना उप्पज्जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति; विदिता सञ्ञा… विदिता वितक्का उप्पज्जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमी’’ति।
इदमवोच आयस्मा आनन्दो। समनुञ्ञो सत्था अहोसि; अत्तमना च ते भिक्खू आयस्मतो आनन्दस्स भासितं अभिनन्दुन्ति।
अच्छरियअब्भुतसुत्तं निट्ठितं ततियं।