✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

अँगुलिमाल कथा

सूत्र परिचय

कुख्यात हत्यारे अँगुलिमाल के जीवन में आया नाटकीय परिवर्तन बौद्ध परम्परा की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। यह सूत्र थोड़ा विशेष है, क्योंकि इसमें भगवान के किसी विशिष्ट धम्मोपदेश से बढ़कर एक शक्तिशाली कथा का प्रभाव उभरता है—और यह कोई बोधिसत्व के पूर्वजन्म की जातक-कथा भी नहीं, बल्कि इसी जीवन की एक आस्थावर्धक सच्ची घटना है। जिसने असंख्य लोगों को यह सोचने पर विवश किया होगा कि क्या सचमुच इतना पापकर्मी भी विमुक्ति और विमोक्ष की राह पा सकता है।

अट्ठकथाओं और समानान्तर सूत्रों में इस कथा को अत्यधिक विस्तार और कल्पनाशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। कहीं घटनाएँ मेल खाती हैं, कहीं एकदम भिन्न हो जाती हैं, और कई स्थानों पर अतिशयोक्ति इतनी बढ़ जाती है कि कथानक असंभव-सा प्रतीत होता है। मूल सूत्र में भी कहीं-कहीं ऐसी अतिशयोक्ति झलकती है, जैसे यह दावा कि अँगुलिमाल ने पूरे देश को उजाड़ दिया।

उसकी भयावह “अँगुलियों की माला” को लेकर अट्ठकथाएँ कहती हैं कि उसने यह कृत्य अपने ईर्ष्यालु ब्राह्मण गुरु के आदेश पर किया था, जिसने उँगलियाँ गिनने के लिए ही उसे यह रक्तरंजित कार्य सौंपा। इतिहासकार रिचर्ड गॉम्ब्रिच इस पूरे विवरण को अस्वीकार करते हैं। मूल सूत्र, इसके विपरीत, एक सहज और स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है—अँगुलिमाल के हिंसक कर्मों के पीछे कोई रहस्यमयी धार्मिक उद्देश्य नहीं था; वह बस एक हत्यारा था, जिसे अपनी शक्ति और श्रेष्ठता सिद्ध करने की असीम लालसा चलाती थी।

और इसी कारण यह कथा आम जनमानस के हृदय को सीधा स्पर्श करती है। जब कोई इसे सुनता है, तो उसके भीतर यह आशा जन्म लेती है कि भूतकाल चाहे कितना भी अंधकारमय क्यों न हो, परिवर्तन संभव है। मनुष्य अपने जीवन की दिशा किसी भी क्षण मोड़ सकता है—एक क्षण की जागृति सम्पूर्ण नियति बदल देने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि सहस्रों वर्षों बाद भी अँगुलिमाल की कथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानवीय आशा, परिवर्तन और क्षमा की एक जीवित मिसाल बनी हुई है।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। उस समय राजा प्रसेनजित (“पसेनदि”) कोसल के राजशासन में अँगुलिमाल नामक डाकू रहता था, जो रुद्र, रक्त से सने हाथ वाला, हताहत (=हत्या और आहत) करने पर तुला, जीवों के प्रति निर्दयी था। उसने गाँव के गाँव उजाड़ दिए थे, नगर उजाड़ दिए थे, देश तक उजाड़ दिए थे। वह मनुष्यों के वध कर-कर के उँगलियों की माला पहनता था।

तब भगवान ने सुबह होने पर चीवर ओढ़, पात्र लेकर, भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती में प्रवेश किया। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर भोजन करने के पश्चात, भिक्षाटन से लौटकर उन्होंने अपने आवास को ठीक किया, और चीवर ओढ़, पात्र लेकर, अँगुलिमाल की ओर जाने वाले मार्ग पर चलने लगे।

तब चरवाहे, पशुपालक, किसान और यात्रियों ने भगवान को अँगुलिमाल की ओर जाने वाले मार्ग पर चलते हुए देखा। देखकर उन्होंने भगवान से कहा, “श्रमण, इस मार्ग को मत चलो। इस मार्ग पर अँगुलिमाल नामक डाकू रहता है, जो रुद्र, रक्त से सने हाथ वाला, हताहत करने पर तुला, जीवों के प्रति निर्दयी है। उसने गाँव के गाँव उजाड़ दिए है, नगर उजाड़ दिए है, देश तक उजाड़ दिए है। वह मनुष्यों के वध कर-कर के उँगलियों की माला पहनता है। श्रमण, इस मार्ग पर दस पुरुष इकट्ठा हो-होकर चलते हैं… बीस पुरुष इकट्ठा हो-होकर चलते हैं… तीस पुरुष इकट्ठा हो-होकर चलते हैं… चालीस पुरुष इकट्ठा हो-होकर चलते हैं… पचास पुरुष इकट्ठा हो-होकर चलते हैं—तब भी डाकू अँगुलिमाल के हाथों मारे जाते हैं।”

ऐसा कहे जाने पर भगवान मौन रहकर चलते रहे।

दूसरी बार भी… तीसरी बार भी चरवाहे, पशुपालक, किसान और यात्रियों ने भगवान को अँगुलिमाल की ओर जाने वाले मार्ग पर चलते हुए देखा। देखकर उन्होंने भगवान से कहा, “श्रमण, इस मार्ग को मत चलो… पचास पुरुष इकट्ठा हो-होकर चलते हैं—तब भी डाकू अँगुलिमाल के हाथों मारे जाते हैं।”

ऐसा कहे जाने पर भगवान मौन रहकर चलते रहे।

तब डाकू अँगुलिमाल ने भगवान को दूर से आते हुए देखा। देखकर उसे लगा, “आश्चर्य है, भाई! अद्भुत है, भाई। इस मार्ग पर दस पुरुष… बीस पुरुष… तीस पुरुष… चालीस पुरुष… पचास पुरुष भी इकट्ठा हो-होकर चलते हैं—तब भी मेरे हाथों मारे जाते हैं। किन्तु, यहाँ एक अकेला श्रमण, अद्वितीय, मानो विजेता जैसा आ रहा है। क्यों न मैं इस श्रमण की जान ले लूँ?”

तब डाकू अँगुलिमाल ने अपनी तलवार और ढाल लेकर, तीर धनुष पर चढ़ाकर, भगवान का पीछा करने लगा। तब भगवान ने ऋद्धिबल से ऐसा संस्कार की कि डाकू अँगुलिमाल अपने पूरे वेग से दौड़कर भी सामान्य गति से चलने वाले भगवान को पकड़ न सके। तब डाकू अँगुलिमाल को लगा, “आश्चर्य है, भाई! अद्भुत है, भाई। पहले मैं भागते हाथी का भी पीछा कर पकड़ लेता था, भागते घोड़े का भी पीछा कर पकड़ लेता था, भागते रथ का भी पीछा कर पकड़ लेता था, भागते हिरण का भी पीछा कर पकड़ लेता था। किन्तु, यहाँ मैं अपने पूरे वेग से दौड़कर भी सामान्य गति से चलने वाले इस श्रमण को पकड़ नहीं पा रहा हूँ।”

तब वह रुक गया, और भगवान से कहा, “रुको, रुको, श्रमण!”

“मैं तो रुका हूँ, अँगुलिमाल। तुम ही रुको।”

तब डाकू अँगुलिमाल को लगा, “ये शाक्यपुत्र के श्रमण (=भिक्षु) हैं, सच बोलते हैं, सच को आधार बनाते हैं। तब भी यह श्रमण चलते हुए कहता है, ‘मैं तो रुका हूँ, अँगुलिमाल। तुम ही रुको।’ क्यों न मैं इस श्रमण से पूछूं?”

तब डाकू अँगुलिमाल ने भगवान को गाथाओं में कहा—

“श्रमण चलते हुए 'रुका हूँ' कहते हो,
मैं रुकने पर भी 'रुको' कहते हो।
मैं श्रमण यह तुमसे पूछता हूँ,
क्यों तुम रुके हो, पर मैं नहीं?”

(भगवान ने कहा)—
“मैं रुक गया, अँगुलिमाल, हमेशा के लिए,
शस्त्र गिरा दिए सभी जीवों के लिए।
पर तुम्हें जीवों के प्रति होश नहीं,
अतः मैं रुका हूँ, पर तुम नहीं।”

(अँगुलिमाल ने कहा)—
“अंततः, ओ महंत महर्षि,
घने वन पहुँचे सत्यवादी!
चलूँगा मैं अब पाप त्याग कर,
गाथा धम्म की आपसे सुनकर।

(लोकगाथा)—
इस प्रकार तलवार-शस्त्र डाकू ने,
फेंक दिए खाई गड्ढे प्रपात में।
झुका डाकू सुगत के चरणों में,
वही प्रव्रज्या की याचना की।

तब बुद्ध करुणामय महर्षि ने,
शास्ता, देव सहित इस लोक के,
'आओ भिक्षु' पुकारा उसे,
इस तरह भिक्षुत्व मिला उसे।

तब भगवान ने आयुष्मान अँगुलिमाल को अपना दूसरा श्रमण बनाकर श्रावस्ती में भ्रमण पर निकले। क्रमशः भ्रमण करते हुए वे श्रावस्ती पहुँचे। वहाँ श्रावस्ती में भगवान ने अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार किया।

राजा की स्वीकृति

उस समय राजा प्रसेनजित कोसल के अंतःपुर के द्वार पर बहुत से लोग इकट्ठा होकर चीखते-चिल्लाते हुए शोर मचा रहे थे—“महाराज, आपके शासन में अँगुलिमाल नामक डाकू रहता है, जो रुद्र, रक्त से सने हाथ वाला, हताहत करने पर तुला, जीवों के प्रति निर्दयी है। उसने गाँव के गाँव उजाड़ दिए है, नगर उजाड़ दिए है, देश तक उजाड़ दिए है। वह मनुष्यों के वध कर-कर के उँगलियों की माला पहनता है। महाराज, उस पर रोक लगाओ।”

तब राजा प्रसेनजित कोसल श्रावस्ती से पाँच सौ घोड़ों पर बैठे सैनिकों के साथ भरे दिन में निकला। और आकर विहार में प्रवेश किया। जहाँ तक रथ जाने की भूमि थी, वहाँ तक रथ से गया, और फिर रथ से उतर कर पैदल कश्यप भगवान के पास गया। जाकर उसने भगवान को अभिवादन किया और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे राजा प्रसेनजित कोसल से भगवान ने कहा—

“क्या बात है, महाराज? क्या मगध के राजा सेनिय बिम्बिसार आपसे क्रोधित हैं, या वैशाली के लिच्छवि, या कोई और राजा?”

“नहीं, भन्ते! न मगधराज सेनिय बिम्बिसार क्रोधित हैं, न वैशाली के लिच्छवि, न ही कोई और राजा। बल्कि, भन्ते, मेरे राजशासन में अँगुलिमाल नामक डाकू रहता है, जो रुद्र, रक्त से सने हाथ वाला, हताहत करने पर तुला, जीवों के प्रति निर्दयी है। उसने गाँव के गाँव उजाड़ दिए है, नगर उजाड़ दिए है, देश तक उजाड़ दिए है। वह मनुष्यों के वध कर-कर के उँगलियों की माला पहनता है। उस पर मुझे रोक लगाना है।”

“किन्तु, महाराज, यदि आपको अँगुलिमाल दिखायी दे—सिर-दाढ़ी मुंडवा कर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होकर, जीवहत्या से विरत रहता है, चुराने से विरत रहता है, झूठ बोलने से विरत रहता है, रात्रिभोज से विरत हो दिन में एक ही बार भोजन करता है, ब्रह्मचर्य पालन करता है, शीलवान और कल्याणकारी स्वभाव का बन चुका। तब आप उसके साथ क्या करेंगे?”

“अभिवादन करूँगा, भन्ते। उसके लिए उठूँगा, आसन दूँगा, घर पर निमंत्रित करूँगा, और चीवर, भिक्षा, निवास, और रोगावश्यक औषधि-भैषज्य के लिए आमंत्रित करूँगा, और उसकी धम्मानुसार रक्षा और बचाव करने की व्यवस्था करूँगा। किन्तु, भन्ते, कोई इतना दुष्शील पाप-धम्मी कैसे इस तरह शील से संयमित होकर रह सकता है?"

उस समय आयुष्मान अँगुलिमाल भगवान से अधिक दूर नहीं बैठे थे। तब भगवान ने दायी बाह से इशारा करते हुए राजा प्रसेनजित कोसल से कहा, “वह रहा, महाराज, अँगुलिमाल!”

तब राजा प्रसेनजित कोसल (अचानक देखने से) भयभीत हुआ, आतंकित हुआ, उसके रोंगटे खड़े हुए। तब भगवान ने राजा प्रसेनजित कोसल को भयभीत हुए, आतंकित हुए, उसके रोंगटे खड़े हुए देखकर कहा, “डरिए मत, महाराज। डरने की कोई बात नहीं है।”

तब राजा प्रसेनजित कोसल का डर और आतंक शान्त हुआ, खड़े रोंगटे बैठ गए। तब राजा प्रसेनजित कोसल आयुष्मान अँगुलिमाल के पास गए, और जाकर आयुष्मान अँगुलिमाल से पूछा, “भन्ते, क्या आप गुरुजी वाकई अँगुलिमाल है?”

“हाँ, महाराज।”

“किस गोत्र से गुरुजी के पिता है, और किस गोत्र से माता?”

“पिता गग्ग है, महाराज, और माता मन्ताणी।” 1

“भन्ते, गर्ग-मन्ताणी पुत्र गुरुजी खुश रहें। मैं स्वयं गर्ग-मन्ताणी पुत्र गुरुजी की उत्सुकता से चीवर, भिक्षा, निवास, और रोगावश्यक औषधि-भैषज्य से सेवा करूँगा।” 2

किन्तु, उस समय आयुष्मान अँगुलिमाल—

  • आरञ्ञिक (=केवल जंगल या निर्जन स्थानों में ही रहना),
  • पिण्डपातिक (=भोजन के लिए केवल भिक्षाटन पर निर्भर रहना, निमंत्रण न स्वीकारना)
  • पंसुकूलिक (=केवल फेंके गए कपड़ों “पंसुकूल” से ही सिला चीवर पहनना)
  • तेचीवरिक (=केवल तीन चीवर, संघाटि, उत्तरासङ्ग, अंतर्वासक रखना) थे। 3

इसलिए, आयुष्मान अँगुलिमाल ने राजा प्रसेनजित कोसल से कहा, “पर्याप्त हुआ, महाराज। मेरे पास चीवर पूरे हैं।”

तब राजा प्रसेनजित कोसल भगवान के पास गया, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर राजा प्रसेनजित कोसल ने भगवान से कहा, “आश्चर्य है, भन्ते! अद्भुत है, भन्ते! किस तरह भगवान बेकाबू को काबू कर लेते हैं, अशांत को शांत कर देते हैं, अपरिनिर्वृत (=सुलगते हुए) को परिनिर्वृत (=बुझा देते) हैं। मैं उसे न दण्ड से, न ही शस्त्र से ही काबू कर सकता था, भन्ते, जिसे भगवान ने बिना दण्ड और बिना शस्त्र के काबू कर लिया।

ठीक है, भन्ते! तब अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं मेरे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”

“तब, महाराज, जिसका समय उचित समझो!”

तब राजा प्रसेनजित कोसल ने आसन से उठकर भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया।

सत्यक्रिया

तब आयुष्मान अँगुलिमाल ने सुबह होने पर चीवर ओढ़, पात्र लेकर भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती में प्रवेश किया। तब आयुष्मान अँगुलिमाल श्रावस्ती में ‘सपदान’ (=भिक्षा मार्ग में आए प्रत्येक दाता से भिक्षा लेना, किसी का घर नहीं छोड़ना) भिक्षाटन करते हुए किसी स्त्री को बिगड़े पीड़ित गर्भ से, यातनापूर्ण प्रसव में देखा। देखकर उन्हें लगा, “ओह, कितनी यातना में हैं सत्व! ओह, कितनी यातना में हैं सत्व!”

तब आयुष्मान अँगुलिमाल श्रावस्ती में भिक्षाटन कर भोजन करने के पश्चात, भिक्षाटन से लौटकर भगवान के पास गए। जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर आयुष्मान अँगुलिमाल ने भगवान से कहा, “भन्ते, मैंने सुबह होने पर चीवर ओढ़, पात्र लेकर भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती में प्रवेश किया। तब श्रावस्ती में सपदान भिक्षाटन करते हुए, मैंने किसी स्त्री को बिगड़े पीड़ित गर्भ से, यातनापूर्ण प्रसव में देखा। देखकर मुझे लगा, ‘ओह, कितनी यातना में हैं सत्व! ओह, कितनी यातना में हैं सत्व!’”

“ठीक है तब, अँगुलिमाल, तुम उस स्त्री के पास जाओ। और जाकर उस स्त्री से कहो, ‘बहन, जब से मैं पैदा हुआ, तब से मैं नहीं जानता कि किसी प्राणी की जान-बूझकर हत्या की हो। इस सत्य से तुम्हारा भला हो! तुम्हारे गर्भ का भला हो!’”

“किन्तु, भन्ते, क्या वह जान-बूझकर झूठ बोलना नहीं होगा? क्योंकि, मैंने अनेक प्राणियों की जान-बूझकर हत्या की है।”

“ठीक है तब, अँगुलिमाल, तुम उस स्त्री के पास जाओ। और जाकर उस स्त्री से कहो, ‘बहन, जब से मैं ‘आर्य जाति’ में पैदा हुआ, तब से मैं नहीं जानता कि किसी प्राणी की जान-बूझकर हत्या की हो। इस सत्य से तुम्हारा भला हो! तुम्हारे गर्भ का भला हो!’”

“ठीक है, भन्ते।” आयुष्मान अँगुलिमाल ने भगवान को उत्तर दिया और उस स्त्री के पास गए। जाकर उस स्त्री से कहा, “बहन, जब से मैं ‘आर्य जाति’ में पैदा हुआ, तब से मैं नहीं जानता कि किसी प्राणी की जान-बूझकर हत्या की हो। इस सत्य से तुम्हारा भला हो! तुम्हारे गर्भ का भला हो!” 4

तब अचानक, वह स्त्री ठीक हो गयी, उसका गर्भ ठीक हो गया।

तब आयुष्मान अँगुलिमाल अकेले एकांतवास लेकर अप्रमत्त, तत्पर और समर्पित होकर विहार करने लगे। तब उन्होंने जल्द ही इसी जीवन में स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर, ब्रह्मचर्य की उस सर्वोच्च मंजिल पर पहुँचकर स्थित हुए, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं। उन्हें पता चला—‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’

इस तरह, आयुष्मान अँगुलिमाल (अनेक) अर्हन्तों में एक हुए।

फल भुगतना

तब आयुष्मान अँगुलिमाल ने सुबह होने पर चीवर ओढ़, पात्र लेकर भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती में प्रवेश किया। उस समय किसी का फेंका पत्थर आयुष्मान अँगुलिमाल की काया को लगा, किसी का फेंका डंडा आयुष्मान अँगुलिमाल की काया को लगा, किसी का फेंका पत्थर आयुष्मान अँगुलिमाल की काया को लगा, किसी का फेंका कंकड़ आयुष्मान अँगुलिमाल की काया को लगा।

तब आयुष्मान अँगुलिमाल का सिर फूट गया, रक्त बहने लगा, पात्र टूट गया, और संघाटी (=भिक्षुओं का बाहरी दोहरा चीवर) फट गयी। वे भगवान के पास गए। भगवान ने आयुष्मान अँगुलिमाल को दूर से आते देखा। देखकर आयुष्मान अँगुलिमाल से कहा, “इसे सह लो, ब्राह्मण! इसे सह लो! जिन कर्मों के फल बहुत वर्षों तक, बहुत सैकड़ों वर्षों तक, बहुत हजारों वर्षों तक नर्क में मिलते हैं, उन कर्मों के फलों का अनुभव, ब्राह्मण, तुमने इसी जीवन में कर लिया।”

पश्चात का जीवन

एक समय आयुष्मान अँगुलिमाल अकेले एकांतवास में रहते हुए विमुक्तिसुख महसूस कर रहे थे। तब वे यह उदान बोल पड़े:

“जो पहले मदहोश था,
पश्चात उसे होश लौटा,
उजाला करे इस लोक में,
जैसे चाँद छूटा बादल से।

किसी के किए पाप कर्म,
कुशल से जो विस्थापित हो,
उजाला करे इस लोक में,
जैसे चाँद छूटा बादल से।

तरुण कोई भिक्षु हो,
बुद्ध-शिक्षा में समर्पित जो,
उजाला करे इस लोक में,
जैसे चाँद छूटा बादल से।

मेरे दुश्मन हो, वे भी धम्म सुने,
मेरे दुश्मन भी बुद्ध-शिक्षा में समर्पित हो,
मेरे दुश्मन भी भले से संगत करें,
जो दूसरों को धम्म में स्थापित करे।

मेरे दुश्मन भी क्षांति-वादी से,
जो अविरोध के प्रशंसक हो,
समय पर वे उनसे धम्म सुने,
और उसका अनुसरण करें।

तब न हिंसा करेंगे मेरे प्रति,
न किसी और के प्रति भी,
पहुँच कर परम शांति पर,
रक्षा करेंगे बलवान-दुर्बल की।

जलप्रवाह निकाले सिंचक,
बाणकार तीर को धार दे,
काष्ठ को आकार दे बढ़ई,
पण्डित स्वयं को वश करे।

कोई काबू होता डंडे से,
कोई अंकुश तो कोई चाबुक से,
पर बिना डंडे, बिना शस्त्र से,
काबू हुआ मैं किसी ऐसे से ।

'अहिंसक' मेरा नाम है,
पर हिंसक था पहले मैं,
अब मेरे नाम में सच है,
अब न करता हिंसा मैं।

डाकू होता था पहले मैं,
अँगुलिमाल कुख्यात नाम से,
बहते हुए विराट बाढ़ में,
शरण लिया तब बुद्ध में।

रक्त सने हाथ थे पहले,
अँगुलिमाल कुख्यात के,
अब शरण जाना देखिए,
भव की नलि उखाड़ दी।

ऐसे-ऐसे कर्म किए मैंने,
जो बहुत दुर्गति कराते हैं,
कर्म के फल फूट चुके मेरे,
भोजन खाता मैं बिना ऋण से।

समर्पित रहे प्रमाद में,
मूर्ख और मंद लोग,
पर अप्रमाद की मेधावी,
रक्षा करे श्रेष्ठ धन जैसे।

मत प्रमाद में समर्पित हो,
या कामुक खुशी से निकट रहो,
अप्रमत्त रहो ध्यान करो,
विपुल सुख तब प्राप्त हो।

यहाँ स्वागत है, दुरागत नहीं,
बुरा सुझाव न था मेरे लिए,
सुविश्लेषण किए धम्मों से,
श्रेष्ठ तक मैं जो पहुँच गया।

यहाँ स्वागत है, दुरागत नहीं,
बुरा सुझाव न था मेरे लिए,
तीन विद्याओं को प्राप्त कर,
बुद्ध-शिक्षा जो पूर्ण किया।”

सुत्र समाप्त।


  1. ऋग्वेद ६.४७ के अनुसार गग्ग या ‘गर्ग’ गोत्र—ब्राह्मण ऋषि ‘गर्ग भारद्वाज’ से उत्पन्न है, जिसका उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद २.१, ३.६,३.८, और प्रश्न उपनिषद ४ इत्यादि में मिलता है। दूसरी ओर, मन्ताणी गोत्र, जिसे संस्कृत में ‘मैत्रायणी’ कहा जाता है, उसका उल्लेख कृष्ण यजुर्वेद के सबसे प्राचीन अनुष्ठानिक ग्रन्थ “मैत्रायणी संहिता” में मिलता है। ↩︎

  2. यहाँ राजा प्रसेनजित कोसल अपनी श्रद्धा और भलाई का परिचय देते हुए, अँगुलिमाल भन्ते के फैल चुके कुप्रसिद्ध नाम “अँगुलिमाल” को छुड़ाने के लिए उन्हें “गर्ग-मन्ताणी पुत्र गुरुजी” के नया नाम देता है, ताकि लोग अब उनके पुराने पापों के बजाय उन्हें भले नाम से पुकारे। हालांकि, उनका यह प्रयास अधिक सफल नहीं हुआ। क्योंकि पश्चात अँगुलिमाल का नाम “अहिंसक” पड़ा, जिसे वे इस सूत्र के अंत गाथाओं में बताते हैं। हालाँकि अट्ठकथा में बताया गया कि उसका गृहस्थ नाम अहिंसक था, जिसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। ↩︎

  3. यह भिक्षुओं के कठोर जीवन जीने के धुतांग अभ्यास हैं। ऐसे कुल १३ धुतांग के बारे में जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎

  4. यह वाक्य अमर हो चुका है। समस्त बौद्ध देशों में इस वाक्य को सत्यक्रिया कहा जाता है, और उसी से ‘परित्राण’ किया जाता है। हजारों वर्षों से आज भी लोग इस सत्यवचन का उच्चारण कर अपने-अपने जीवन के दुःख और विपत्तियों को दूर करने का प्रयास करते हैं। यह परित्राण पढ़ें। ↩︎

पालि

३४७. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तेन खो पन समयेन रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स विजिते चोरो अङ्गुलिमालो नाम होति लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु. तेन गामापि अगामा कता, निगमापि अनिगमा कता, जनपदापि अजनपदा कता. सो मनुस्से वधित्वा वधित्वा अङ्गुलीनं मालं धारेति. अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसि. सावत्थियं पिण्डाय चरित्वा पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो सेनासनं संसामेत्वा पत्तचीवरमादाय येन चोरो अङ्गुलिमालो तेनद्धानमग्गं पटिपज्जि. अद्दसासुं खो गोपालका पसुपालका कस्सका पथाविनो भगवन्तं येन चोरो अङ्गुलिमालो तेनद्धानमग्गपटिपन्नं. दिस्वान भगवन्तं एतदवोचुं – ‘‘मा, समण, एतं मग्गं पटिपज्जि. एतस्मिं, समण, मग्गे चोरो अङ्गुलिमालो नाम लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु. तेन गामापि अगामा कता, निगमापि अनिगमा कता, जनपदापि अजनपदा कता. सो मनुस्से वधित्वा वधित्वा अङ्गुलीनं मालं धारेति. एतञ्हि, समण, मग्गं दसपि पुरिसा वीसम्पि पुरिसा तिंसम्पि पुरिसा चत्तारीसम्पि पुरिसा पञ्ञासम्पि पुरिसा सङ्करित्वा सङ्करित्वा [संहरित्वा संहरित्वा (सी. पी.), सङ्गरित्वा (स्या. कं.)] पटिपज्जन्ति. तेपि चोरस्स अङ्गुलिमालस्स हत्थत्थं गच्छन्ती’’ति. एवं वुत्ते, भगवा तुण्हीभूतो अगमासि. दुतियम्पि खो गोपालका…पे… ततियम्पि खो गोपालका पसुपालका कस्सका पथाविनो भगवन्तं एतदवोचुं – ‘‘मा, समण, एतं मग्गं पटिपज्जि, एतस्मिं समण मग्गे चोरो अङ्गुलिमालो नाम लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु, तेन गामापि अगामा कता, निगमापि अनिगमा कता, जनपदापि अजनपदा कता. सो मनुस्से वधित्वा वधित्वा अङ्गुलीनं मालं धारेति. एतञ्हि समण मग्गं दसपि पुरिसा वीसम्पि पुरिसा तिंसम्पि पुरिसा चत्तारीसम्पि पुरिसा पञ्ञासम्पि पुरिसा सङ्करित्वा सङ्करित्वा पटिपज्जन्ति. तेपि चोरस्स अङ्गुलिमालस्स हत्थत्थं गच्छन्ती’’ति.

३४८. अथ खो भगवा तुण्हीभूतो अगमासि. अद्दसा खो चोरो अङ्गुलिमालो भगवन्तं दूरतोव आगच्छन्तं. दिस्वानस्स एतदहोसि – ‘‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो! इमञ्हि मग्गं दसपि पुरिसा वीसम्पि पुरिसा तिंसम्पि पुरिसा चत्तारीसम्पि पुरिसा पञ्ञासम्पि पुरिसा सङ्करित्वा सङ्करित्वा पटिपज्जन्ति. तेपि मम हत्थत्थं गच्छन्ति. अथ च पनायं समणो एको अदुतियो पसय्ह मञ्ञे आगच्छति. यंनूनाहं इमं समणं जीविता वोरोपेय्य’’न्ति. अथ खो चोरो अङ्गुलिमालो असिचम्मं गहेत्वा धनुकलापं सन्नय्हित्वा भगवन्तं पिट्ठितो पिट्ठितो अनुबन्धि. अथ खो भगवा तथारूपं इद्धाभिसङ्खारं अभिसङ्खासि [अभिसङ्खारेसि (स्या. कं. क.)] यथा चोरो अङ्गुलिमालो भगवन्तं पकतिया गच्छन्तं सब्बथामेन गच्छन्तो न सक्कोति सम्पापुणितुं. अथ खो चोरस्स अङ्गुलिमालस्स एतदहोसि – ‘‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो! अहञ्हि पुब्बे हत्थिम्पि धावन्तं अनुपतित्वा गण्हामि, अस्सम्पि धावन्तं अनुपतित्वा गण्हामि, रथम्पि धावन्तं अनुपतित्वा गण्हामि, मिगम्पि धावन्तं अनुपतित्वा गण्हामि; अथ च पनाहं इमं समणं पकतिया गच्छन्तं सब्बथामेन गच्छन्तो न सक्कोमि सम्पापुणितु’’न्ति! ठितोव भगवन्तं एतदवोच – ‘‘तिट्ठ, तिट्ठ, समणा’’ति. ‘‘ठितो अहं, अङ्गुलिमाल, त्वञ्च तिट्ठा’’ति. अथ खो चोरस्स अङ्गुलिमालस्स एतदहोसि – ‘‘इमे खो समणा सक्यपुत्तिया सच्चवादिनो सच्चपटिञ्ञा. अथ पनायं समणो गच्छं येवाह – ‘ठितो अहं, अङ्गुलिमाल, त्वञ्च तिट्ठा’ति. यंनूनाहं इमं समणं पुच्छेय्य’’न्ति.

३४९. अथ खो चोरो अङ्गुलिमालो भगवन्तं गाथाय अज्झभासि –

‘‘गच्छं वदेसि समण ठितोम्हि,

ममञ्च ब्रूसि ठितमट्ठितोति;

पुच्छामि तं समण एतमत्थं,

कथं ठितो त्वं अहमट्ठितोम्ही’’ति.

‘‘ठितो अहं अङ्गुलिमाल सब्बदा,

सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं;

तुवञ्च पाणेसु असञ्ञतोसि,

तस्मा ठितोहं तुवमट्ठितोसी’’ति.

‘‘चिरस्सं वत मे महितो महेसी,

महावनं पापुणि सच्चवादी [महावनं समणोयं पच्चुपादि (सी.), महावनं समण पच्चुपादि (स्या. कं.)];

सोहं चरिस्सामि पहाय पापं [सोहं चिरस्सापि पहास्सं पापं (सी.), सोहं चरिस्सामि पजहिस्सं पापं (स्या. कं.)],

सुत्वान गाथं तव धम्मयुत्तं’’.

इत्वेव चोरो असिमावुधञ्च,

सोब्भे पपाते नरके अकिरि;

अवन्दि चोरो सुगतस्स पादे,

तत्थेव नं पब्बज्जं अयाचि.

बुद्धो च खो कारुणिको महेसि,

यो सत्था लोकस्स सदेवकस्स;

‘तमेहि भिक्खू’ति तदा अवोच,

एसेव तस्स अहु भिक्खुभावोति.

३५०. अथ खो भगवा आयस्मता अङ्गुलिमालेन पच्छासमणेन येन सावत्थि तेन चारिकं पक्कामि. अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन सावत्थि तदवसरि. तत्र सुदं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तेन खो पन समयेन रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स अन्तेपुरद्वारे महाजनकायो सन्निपतित्वा उच्चासद्दो महासद्दो होति – ‘‘चोरो ते, देव, विजिते अङ्गुलिमालो नाम लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु. तेन गामापि अगामा कता, निगमापि अनिगमा कता, जनपदापि अजनपदा कता. सो मनुस्से वधित्वा वधित्वा अङ्गुलीनं मालं धारेति. तं देवो पटिसेधेतू’’ति.

अथ खो राजा पसेनदि कोसलो पञ्चमत्तेहि अस्ससतेहि सावत्थिया निक्खमि दिवा दिवस्स. येन आरामो तेन पाविसि. यावतिका यानस्स भूमि यानेन गन्त्वा याना पच्चोरोहित्वा पत्तिकोव येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो राजानं पसेनदिं कोसलं भगवा एतदवोच – ‘‘किं नु ते, महाराज, राजा वा मागधो सेनियो बिम्बिसारो कुपितो वेसालिका वा लिच्छवी अञ्ञे वा पटिराजानो’’ति? ‘‘न खो मे, भन्ते, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो कुपितो, नापि वेसालिका लिच्छवी, नापि अञ्ञे पटिराजानो. चोरो मे, भन्ते, विजिते अङ्गुलिमालो नाम लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु. तेन गामापि अगामा कता, निगमापि अनिगमा कता, जनपदापि अजनपदा कता. सो मनुस्से वधित्वा वधित्वा अङ्गुलीनं मालं धारेति. ताहं, भन्ते, पटिसेधिस्सामी’’ति. ‘‘सचे पन त्वं, महाराज, अङ्गुलिमालं पस्सेय्यासि केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजितं, विरतं पाणातिपाता, विरतं अदिन्नादाना, विरतं मुसावादा, एकभत्तिकं, ब्रह्मचारिं, सीलवन्तं, कल्याणधम्मं, किन्ति नं करेय्यासी’’ति? ‘‘अभिवादेय्याम वा, भन्ते, पच्चुट्ठेय्याम वा आसनेन वा निमन्तेय्याम, अभिनिमन्तेय्याम वा नं चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्चयभेसज्जपरिक्खारेहि, धम्मिकं वा अस्स रक्खावरणगुत्तिं संविदहेय्याम. कुतो पनस्स, भन्ते, दुस्सीलस्स पापधम्मस्स एवरूपो सीलसंयमो भविस्सती’’ति?

तेन खो पन समयेन आयस्मा अङ्गुलिमालो भगवतो अविदूरे निसिन्नो होति. अथ खो भगवा दक्खिणं बाहुं पग्गहेत्वा राजानं पसेनदिं कोसलं एतदवोच – ‘‘एसो, महाराज, अङ्गुलिमालो’’ति. अथ खो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स अहुदेव भयं, अहु छम्भितत्तं, अहु लोमहंसो. अथ खो भगवा राजानं पसेनदिं कोसलं भीतं संविग्गं लोमहट्ठजातं विदित्वा राजानं पसेनदिं कोसलं एतदवोच – ‘‘मा भायि, महाराज, नत्थि ते इतो भय’’न्ति. अथ खो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स यं अहोसि भयं वा छम्भितत्तं वा लोमहंसो वा सो पटिप्पस्सम्भि. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो येनायस्मा अङ्गुलिमालो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं अङ्गुलिमालं एतदवोच – ‘‘अय्यो नो, भन्ते, अङ्गुलिमालो’’ति? ‘‘एवं, महाराजा’’ति. ‘‘कथंगोत्तो अय्यस्स पिता, कथंगोत्ता माता’’ति? ‘‘गग्गो खो, महाराज, पिता, मन्ताणी माता’’ति. ‘‘अभिरमतु, भन्ते, अय्यो गग्गो मन्ताणिपुत्तो. अहमय्यस्स गग्गस्स मन्ताणिपुत्तस्स उस्सुक्कं करिस्सामि चीवरपिण्डपातसेनासनगिलानप्पच्चयभेसज्जपरिक्खारान’’न्ति.

३५१. तेन खो पन समयेन आयस्मा अङ्गुलिमालो आरञ्ञिको होति पिण्डपातिको पंसुकूलिको तेचीवरिको. अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो राजानं पसेनदिं कोसलं एतदवोच – ‘‘अलं, महाराज, परिपुण्णं मे चीवर’’न्ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो राजा पसेनदि कोसलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अच्छरियं, भन्ते, अब्भुतं, भन्ते! यावञ्चिदं, भन्ते, भगवा अदन्तानं दमेता, असन्तानं समेता, अपरिनिब्बुतानं परिनिब्बापेता. यञ्हि मयं, भन्ते, नासक्खिम्हा दण्डेनपि सत्थेनपि दमेतुं सो भगवता अदण्डेन असत्थेनेव [असत्थेन (स्या. कं.)] दन्तो. हन्द च दानि [हन्द दानि (स्या. कं. पी.)] मयं, भन्ते, गच्छाम; बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’ति. ‘‘यस्सदानि, महाराज, कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो उट्ठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामि.

अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थियं पिण्डाय पाविसि. अद्दसा खो आयस्मा अङ्गुलिमालो सावत्थियं सपदानं पिण्डाय चरमानो अञ्ञतरं इत्थिं मूळ्हगब्भं विघातगब्भं [विसातगब्भं (स्या. कं. पी. क.)]. दिस्वानस्स एतदहोसि – ‘‘किलिस्सन्ति वत, भो, सत्ता; किलिस्सन्ति वत, भो, सत्ता’’ति! अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो सावत्थियं पिण्डाय चरित्वा पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो आयस्मा अङ्गुलिमालो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘इधाहं, भन्ते, पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसिं. अद्दसं खो अहं, भन्ते, सावत्थियं सपदानं पिण्डाय चरमानो अञ्ञतरं इत्थिं मूळ्हगब्भं विघातगब्भं’’. दिस्वान मय्हं एतदहोसि – ‘‘किलिस्सन्ति वत , भो, सत्ता; किलिस्सन्ति वत, भो, सत्ता’’ति!

‘‘तेन हि त्वं, अङ्गुलिमाल, येन सा इत्थी तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा तं इत्थिं एवं वदेहि – ‘यतोहं, भगिनि, जातो [भगिनि जातिया जातो (सी.)] नाभिजानामि सञ्चिच्च पाणं जीविता वोरोपेता, तेन सच्चेन सोत्थि ते होतु, सोत्थि गब्भस्सा’’’ति.

‘‘सो हि नून मे, भन्ते, सम्पजानमुसावादो भविस्सति. मया हि, भन्ते, बहू सञ्चिच्च पाणा जीविता वोरोपिता’’ति. ‘‘तेन हि त्वं, अङ्गुलिमाल, येन सा इत्थी तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा तं इत्थिं एवं वदेहि – ‘यतोहं, भगिनि, अरियाय जातिया जातो, नाभिजानामि सञ्चिच्च पाणं जीविता वोरोपेता, तेन सच्चेन सोत्थि ते होतु, सोत्थि गब्भस्सा’’’ति.

‘‘एवं, भन्ते’’ति खो आयस्मा अङ्गुलिमालो भगवतो पटिस्सुत्वा येन सा इत्थी तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा तं इत्थिं एतदवोच – ‘‘यतोहं, भगिनि, अरियाय जातिया जातो, नाभिजानामि सञ्चिच्च पाणं जीविता वोरोपेता, तेन सच्चेन सोत्थि ते होतु, सोत्थि गब्भस्सा’’ति. अथ ख्वास्सा इत्थिया सोत्थि अहोसि, सोत्थि गब्भस्स.

अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो एको वूपकट्ठो अप्पमत्तो आतापी पहितत्तो विहरन्तो नचिरस्सेव – यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति तदनुत्तरं – ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहासि. ‘खीणा जाति वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति अब्भञ्ञासि. अञ्ञतरो खो पनायस्मा अङ्गुलिमालो अरहतं अहोसि.

३५२. अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसि. तेन खो पन समयेन अञ्ञेनपि लेड्डु खित्तो आयस्मतो अङ्गुलिमालस्स काये निपतति, अञ्ञेनपि दण्डो खित्तो आयस्मतो अङ्गुलिमालस्स काये निपतति, अञ्ञेनपि सक्खरा खित्ता आयस्मतो अङ्गुलिमालस्स काये निपतति. अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो भिन्नेन सीसेन, लोहितेन गळन्तेन, भिन्नेन पत्तेन, विप्फालिताय सङ्घाटिया येन भगवा तेनुपसङ्कमि. अद्दसा खो भगवा आयस्मन्तं अङ्गुलिमालं दूरतोव आगच्छन्तं. दिस्वान आयस्मन्तं अङ्गुलिमालं एतदवोच – ‘‘अधिवासेहि त्वं, ब्राह्मण, अधिवासेहि त्वं, ब्राह्मण. यस्स खो त्वं, ब्राह्मण, कम्मस्स विपाकेन बहूनि वस्सानि बहूनि वस्ससतानि बहूनि वस्ससहस्सानि निरये पच्चेय्यासि तस्स त्वं, ब्राह्मण, कम्मस्स विपाकं दिट्ठेव धम्मे पटिसंवेदेसी’’ति. अथ खो आयस्मा अङ्गुलिमालो रहोगतो पटिसल्लीनो विमुत्तिसुखं पटिसंवेदि; तायं वेलायं इमं उदानं उदानेसि –

‘‘यो पुब्बेव [यो च पुब्बे (सी. स्या. कं. पी.)] पमज्जित्वा, पच्छा सो नप्पमज्जति;

सोमं [सो इमं (सी.)] लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तोव चन्दिमा.

‘‘यस्स पापं कतं कम्मं, कुसलेन पिधीयति [पिथीयति (सी. स्या. कं. पी.)];

सोमं लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तोव चन्दिमा.

‘‘यो हवे दहरो भिक्खु, युञ्जति बुद्धसासने;

सोमं लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तोव चन्दिमा.

‘‘दिसा हि मे धम्मकथं सुणन्तु,

दिसा हि मे युञ्जन्तु बुद्धसासने;

दिसा हि मे ते मनुजा भजन्तु,

ये धम्ममेवादपयन्ति सन्तो.

‘‘दिसा हि मे खन्तिवादानं, अविरोधप्पसंसीनं;

सुणन्तु धम्मं कालेन, तञ्च अनुविधीयन्तु.

‘‘न हि जातु सो ममं हिंसे, अञ्ञं वा पन किञ्चि नं [कञ्चि नं (सी. स्या. कं. पी.), कञ्चनं (?)];

पप्पुय्य परमं सन्तिं, रक्खेय्य तसथावरे.

‘‘उदकञ्हि नयन्ति नेत्तिका, उसुकारा नमयन्ति [दमयन्ति (क.)] तेजनं;

दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति पण्डिता.

‘‘दण्डेनेके दमयन्ति, अङ्कुसेहि कसाहि च;

अदण्डेन असत्थेन, अहं दन्तोम्हि तादिना.

‘‘अहिंसकोति मे नामं, हिंसकस्स पुरे सतो;

अज्जाहं सच्चनामोम्हि, न नं हिंसामि किञ्चि नं [कञ्चि नं (सी. स्या. कं. पी.), कञ्चनं (?)].

‘‘चोरो अहं पुरे आसिं, अङ्गुलिमालोति विस्सुतो;

वुय्हमानो महोघेन, बुद्धं सरणमागमं.

‘‘लोहितपाणि पुरे आसिं, अङ्गुलिमालोति विस्सुतो;

सरणगमनं पस्स, भवनेत्ति समूहता.

‘‘तादिसं कम्मं कत्वान, बहुं दुग्गतिगामिनं;

फुट्ठो कम्मविपाकेन, अणणो भुञ्जामि भोजनं.

‘‘पमादमनुयुञ्जन्ति, बाला दुम्मेधिनो जना;

अप्पमादञ्च मेधावी, धनं सेट्ठंव रक्खति.

‘‘मा पमादमनुयुञ्जेथ, मा कामरति सन्थवं;

अप्पमत्तो हि झायन्तो, पप्पोति विपुलं [परमं (क.)] सुखं.

‘‘स्वागतं [सागतं (सी. पी.)] नापगतं [नाम सगतं (क.)], नयिदं दुम्मन्तितं मम;

संविभत्तेसु [सुविभत्तेसु (स्या. कं.), सविभत्तेसु (सी. क.), पटिभत्तेसु (पी.)] धम्मेसु, यं सेट्ठं तदुपागमं.

‘‘स्वागतं नापगतं, नयिदं दुम्मन्तितं मम;

तिस्सो विज्जा अनुप्पत्ता, कतं बुद्धस्स सासन’’न्ति.

अङ्गुलिमालसुत्तं निट्ठितं छट्ठं.

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