✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

प्रिय से दुःख

सूत्र परिचय

कोसल देश के महाराज राजा प्रसेनजित को बौद्ध साहित्य में भगवान के उपासक के रूप में चित्रित किया गया है, लेकिन यह सूत्र दर्शाता है कि वे पहले भगवान के प्रति समर्पित नहीं थे। उनका पहला संवाद भगवान से संयुक्तनिकाय ३.१ में हुआ था, लेकिन उनका विश्वास मजबूत नहीं था, क्योंकि वे अपनी प्रमुख रानी मल्लिका के भक्तिपूर्ण व्यवहार से परेशान थे।

अंततः रानी मल्लिका की चतुराई और बुद्धिमान प्रश्नोत्तरों ने उन्हें बुद्ध के प्रति अनुकूल बना दिया। मल्लिका से आत्मीयता और प्रेम की अवधारणाओं पर संवाद संयुक्तनिकाय ३.८ और उदान ५.१ में भी हैं। राजा प्रसेनजित के कई सूत्र हैं, जिनमें उनकी गहरी समझ और तीक्ष्ण निरीक्षण उन्हें विशिष्ट बनाते हैं।

लेकिन इस सूत्र में राजा प्रसेनजित कोशल की तीक्ष्ण बुद्धि और निरीक्षण क्षमता भी भगवान के अतिसरल धम्म को भेद नहीं पायी। कोई-कोई धम्म-सत्य सहज बुद्धि और सामान्य ज्ञान के इतना विपरीत लगता है कि लोग उसे हजम नहीं कर पाते। इसलिए तार्किक लोगों के लिए ऐसा सीधा धम्म सुनना कभी-कभी बहुत क्रांतिकारी पड़ता है, और समाज में हंगामा मचा देता है—जैसा इस सूत्र में हुआ।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। उस समय किसी गृहस्थ का प्रिय और मनचाहा इकलौता पुत्र गुजर गया था। उसके गुजरने पर उसे न काम की सुध रही, न भोजन की सुध रही। वह श्मशान में जाकर रोता रहता, “कहाँ हो, (मेरे) इकलौते पुत्र? कहाँ हो, इकलौते पुत्र?”

तब वह गृहस्थ भगवान के पास गया, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे उस गृहस्थ से भगवान ने कहा, “गृहस्थ, तुम्हारी इंद्रियाँ स्थिर चित्त की नहीं है। तुम्हारी इंद्रियाँ बदली हुई है।”

“भला कैसे, भन्ते, मेरी इंद्रियाँ बदली नहीं होगी? क्योंकि मेरा प्रिय और मनचाहा इकलौता पुत्र गुजर गया है। उसके गुजरने पर मुझे न काम की सुध रही, न भोजन की सुध रही। बस श्मशान में जाकर रोता रहता हूँ, ‘कहाँ हो, इकलौते पुत्र? कहाँ हो, इकलौते पुत्र?’”

“ऐसा ही होता है, गृहस्थ! ऐसा ही होता है! क्योंकि शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।”

“भला ऐसा, भन्ते, कोई क्यों सोचेगा कि ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’ क्योंकि आनंद और खुशियाँ प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।”

तब उस गृहस्थ ने भगवान की बात को स्वीकार नहीं किया, बल्कि नकारते हुए अपने आसन से उठा और चला गया। उस समय भगवान से कुछ दूरी पर बहुत से जुवारी जुवा खेल रहे थे। वह गृहस्थ उन जुवारियों के पास गया, और जाकर उन जुवारियों से कहा, “श्रीमानों, मैं श्रमण गोतम के पास गया था… (तो उन्होंने कहा,) ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं’… (तब मैंने कहा,) ‘भला ऐसा, भन्ते, कोई क्यों सोचेगा… क्योंकि आनंद और खुशियाँ प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’”

“बिलकुल ऐसा ही है, गृहस्थ! बिलकुल ऐसा ही है! आनंद और खुशियाँ प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।”

तब वह गृहस्थ, “मैं जुवारियों से सहमत हूँ”, सोचते हुए चला गया। 1

अंतःपुर में गर्मी

यह बात फैलते-फैलते राजा के अंतःपुर तक पहुँच गयी। वहाँ राजा प्रसेनजित (“पसेनदि”) कोसल ने (महारानी) मल्लिका देवी को आमंत्रित किया, “मल्लिका, तुम्हारे श्रमण गोतम ने कहा—‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’”

“यदि वाकई यह भगवान ने कहा हो, महाराज, तो सच ही होगा।”

“श्रमण गोतम जैसा भी कहे, मल्लिका तुरंत स्वीकार लेती है—‘यदि वाकई यह भगवान ने कहा हो, महाराज, तो सच ही होगा।’

जैसे कोई गुरु कुछ भी कहे, चेले तुरंत स्वीकार लेते हैं—‘ऐसा ही है, गुरुजी! ऐसा ही है, गुरुजी!’ तुम भी ठीक वैसी ही हो, मल्लिका। श्रमण गोतम जैसा भी कहे, मल्लिका तुरंत स्वीकार लेती है—‘यदि वाकई यह भगवान ने कहा हो, महाराज, तो सच ही होगा।’

जाओ, मल्लिके, दफा हो जाओ!”

तब मल्लिका देवी ने नाळिजङ्घ ब्राह्मण को आमंत्रित किया, “आओ, ब्राह्मण, भगवान के पास जाओ, और जाकर मेरी ओर से भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछना, ‘भन्ते, मल्लिका देवी भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछती हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?’

और तब कहना, ‘भन्ते, क्या भगवान ने ऐसा कहा—‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं’? और भगवान जैसा उत्तर दे, उसे अच्छे से याद कर के आकर मुझे बताना। चूँकि तथागत व्यर्थ नहीं बोलते हैं।”

“ठीक है, देवी जी!” नाळिजङ्घ ब्राह्मण ने मल्लिका देवी को उत्तर दिया, और भगवान के पास गया, और जाकर भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर कहा, “भन्ते, महारानी मल्लिका देवी भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछती हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं? और कहती हैं, ‘भन्ते, क्या भगवान ने ऐसा कहा—‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं’?”

भगवान का स्पष्टीकरण

“ऐसा ही है, ब्राह्मण! ऐसा ही है! शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।

और, ब्राह्मण, एक तरीके से समझा जा सकता हैं कि कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।

एक बार, ब्राह्मण, इसी श्रावस्ती की बात है—एक स्त्री की माँ मर गई। तब वह माँ की मौत से पागल होकर बहके चित्त से, इस रास्ते से उस रास्ते, इस चौराहे से उस चौराहे भटकते हुए कहती, “क्या तुमने मेरी माँ को देखा? क्या तुमने मेरी माँ को देखा?” इस तरीके से, ब्राह्मण, समझा जा सकता हैं कि कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।

एक बार, ब्राह्मण, इसी श्रावस्ती की बात है—एक स्त्री के पिता… भाई… बहन… पुत्र… पुत्री… पति मर गया। तब वह पति की मौत से पागल होकर बहके चित्त से, इस रास्ते से उस रास्ते, इस चौराहे से उस चौराहे भटकते हुए कहती, “क्या तुमने मेरे पति को देखा? क्या तुमने मेरे पति को देखा?” इस तरीके से, ब्राह्मण, समझा जा सकता हैं कि कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।

एक बार, ब्राह्मण, इसी श्रावस्ती की बात है—एक पुरुष की माँ मर गई। तब वह माँ की मौत से पागल होकर बहके चित्त से, इस रास्ते से उस रास्ते, इस चौराहे से उस चौराहे भटकते हुए कहता, “क्या तुमने मेरी माँ को देखा? क्या तुमने मेरी माँ को देखा?” इस तरीके से, ब्राह्मण, समझा जा सकता हैं कि कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।

एक बार, ब्राह्मण, इसी श्रावस्ती की बात है—एक पुरुष के पिता… भाई… बहन… पुत्र… पुत्री… पत्नी मर गयी। तब वह पत्नी की मौत से पागल होकर बहके चित्त से, इस रास्ते से उस रास्ते, इस चौराहे से उस चौराहे भटकते हुए कहता, “क्या तुमने मेरी पत्नी को देखा? क्या तुमने मेरी पत्नी को देखा?” इस तरीके से, ब्राह्मण, समझा जा सकता हैं कि कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।

एक बार, ब्राह्मण, इसी श्रावस्ती की बात है—कोई पत्नी अपने मायके आयी। तब परिवार ने उसके पति से रिश्ता तोड़कर उसके न चाहते हुए अन्य पुरुष से ब्याहना चाहा। तब उस स्त्री ने अपने पति से कह दिया, ‘मेरा परिवार तुमसे रिश्ता तोड़कर मेरे न चाहते हुए मुझे अन्य पुरुष से ब्याहना चाहते हैं।’

तब उस पुरुष ने अपनी पत्नी के दो टुकड़े कर दिया और स्वयं को काटकर खोल दिया, [सोचते हुए] ‘मरने पर हम साथ होंगे।’ इस तरीके से, ब्राह्मण, समझा जा सकता हैं कि कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।”

तब, नाळिजङ्घ ब्राह्मण ने भगवान की बात में हर्षित होकर, अभिनंदन कर, आसन से उठकर मल्लिका देवी के पास गया। और जाकर भगवान के साथ हुए पूरे वार्तालाप को मल्लिका देवी को सुना दिया।

मल्लिका की वापसी

तब मल्लिका देवी राजा प्रसेनजित कोसल के पास गयी, और जाकर राजा प्रसेनजित कोसल से कहा, “क्या लगता है, महाराज? क्या आपको राजकुमारी वजिरी प्रिय है?” 2

“हाँ, मल्लिके! राजकुमारी वजिरी मुझे प्रिय है।”

“क्या लगता है, महाराज? यदि राजकुमारी वजिरी के साथ कुछ बुरा (परिवर्तन और विकृति) हो, तो क्या आपको शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा होगी?”

“मल्लिके, यदि राजकुमारी वजिरी के साथ कुछ बुरा हो, तो मेरा जीवन ही विकृत हो जाएगा। तब भला कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा क्यों न होगी?”

“तो, महाराज, इसी के संबंध में भगवान—जो जानते थे, देखते थे, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध थे—ने कहा हैं कि ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’

और, क्या लगता है, महाराज? क्या आपको रानी वासभा क्षत्रिय प्रिय है?”

“हाँ, मल्लिके! रानी वासभा मुझे प्रिय है।”

“क्या लगता है, महाराज? यदि रानी वासभा के साथ कुछ बुरा हो, तो क्या आपको शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा होगी?”

“मल्लिके, यदि रानी वासभा के साथ कुछ बुरा हो, तब भी मेरा जीवन विकृत हो जाएगा। तब भला कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा क्यों न होगी?”

“तो, महाराज, इसी के संबंध में भगवान—जो जानते थे, देखते थे, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध थे—ने कहा हैं कि ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’

और, क्या लगता है, महाराज? क्या आपको (आपका पुत्र राजकुमार) विटटूभ (=विढ़ूढ़भ) सेनापति प्रिय है?”

“हाँ, मल्लिके! विटटूभ सेनापति मुझे प्रिय है।”

“क्या लगता है, महाराज? यदि विटटूभ सेनापति के साथ कुछ बुरा हो, तो क्या आपको शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा होगी?”

“मल्लिके, यदि विटटूभ सेनापति के साथ कुछ बुरा हो, तब भी मेरा जीवन विकृत हो जाएगा। तब भला कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा क्यों न होगी?”

“तो, महाराज, इसी के संबंध में भगवान—जो जानते थे, देखते थे, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध थे—ने कहा हैं कि ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’

और, क्या लगता है, महाराज? क्या आपको मैं प्रिय हूँ?”

“हाँ, मल्लिके! तुम मुझे प्रिय हो।”

“क्या लगता है, महाराज? यदि मेरे साथ कुछ बुरा हो, तो क्या आपको शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा होगी?”

“मल्लिके, यदि तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो, तब भी मेरा जीवन विकृत हो जाएगा। तब भला कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा क्यों न होगी?”

“तो, महाराज, इसी के संबंध में भगवान—जो जानते थे, देखते थे, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध थे—ने कहा हैं कि ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’

और, क्या लगता है, महाराज? क्या आपको (आपके राज्य) काशी और कोशल (“कासिकोसल”) प्रिय हैं?”

“हाँ, मल्लिके! काशी और कोशल मुझे प्रिय हैं। काशी और कोशल की ताकत पर ही हम काशी के चन्दन का उपभोग करते हैं, माला, गंध और लेप लगाते हैं।”

“क्या लगता है, महाराज? यदि काशी और कोशल के साथ कुछ बुरा हो, तो क्या आपको शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा होगी?”

“मल्लिके, यदि काशी और कोशल के साथ कुछ बुरा हो, तब भी मेरा जीवन विकृत हो जाएगा। तब भला कैसे शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा क्यों न होगी?”

“तो, महाराज, इसी के संबंध में भगवान—जो जानते थे, देखते थे, अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध थे—ने कहा हैं कि ‘शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा प्रिय से जन्मते हैं, प्रिय से उत्पन्न होते हैं।’”

“आश्चर्य है, मल्लिके! अद्भुत है, मल्लिके! मानो कितना गहरा देखते हैं भगवान। आओ, मल्लिके, मेरा हाथ धुलवाओ।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल अपने आसन से उठा, अपने बाहरी वस्त्र को एक कंधे पर कर, भगवान की दिशा में हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए तीन बार उद्गार किया—

“नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।”
“नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।
नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।
नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।”

सुत्र समाप्त।


  1. गौर करें कि यहाँ उस गृहस्थ को इतना भी होश न रहा कि वह एक महर्षि की बात को नकार रहा है, जबकि जुवारियों से सहमत होकर संतुष्ट हो रहा है। ↩︎

  2. राजकुमारी वजिरी, संयुक्तनिकाय ३.१६ में आए एक संदर्भ के अनुसार, महारानी मल्लिका देवी और राजा प्रसेनजित कोसल की सुंदर राजकन्या थी। ↩︎

पालि

३५३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तेन खो पन समयेन अञ्ञतरस्स गहपतिस्स एकपुत्तको पियो मनापो कालङ्कतो होति. तस्स कालंकिरियाय नेव कम्मन्ता पटिभन्ति न भत्तं पटिभाति. सो आळाहनं गन्त्वा कन्दति – ‘‘कहं, एकपुत्तक, कहं, एकपुत्तका’’ति! अथ खो सो गहपति येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो तं गहपतिं भगवा एतदवोच – ‘‘न खो ते, गहपति, सके चित्ते ठितस्स इन्द्रियानि, अत्थि ते इन्द्रियानं अञ्ञथत्त’’न्ति. ‘‘किञ्हि मे, भन्ते, इन्द्रियानं नाञ्ञथत्तं भविस्सति; मय्हञ्हि, भन्ते, एकपुत्तो पियो मनापो कालङ्कतो. तस्स कालंकिरियाय नेव कम्मन्ता पटिभन्ति, न भत्तं पटिभाति. सोहं आळाहनं गन्त्वा कन्दामि – ‘कहं, एकपुत्तक, कहं, एकपुत्तका’’’ति! ‘‘एवमेतं, गहपति, एवमेतं, गहपति [एवमेतं गहपति (पी. सकिदेव), एवमेव (सी. सकिदेव)]! पियजातिका हि, गहपति, सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’’ति. ‘‘कस्स खो [किस्स नु खो (सी.)] नामेतं, भन्ते, एवं भविस्सति – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति? पियजातिका हि खो, भन्ते, आनन्दसोमनस्सा पियप्पभविका’’ति. अथ खो सो गहपति भगवतो भासितं अनभिनन्दित्वा पटिक्कोसित्वा उट्ठायासना पक्कामि.

३५४. तेन खो पन समयेन सम्बहुला अक्खधुत्ता भगवतो अविदूरे अक्खेहि दिब्बन्ति. अथ खो सो गहपति येन ते अक्खधुत्ता तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा अक्खधुत्ते एतदवोच – ‘‘इधाहं, भोन्तो, येन समणो गोतमो तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा समणं गोतमं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिं. एकमन्तं निसिन्नं खो मं, भोन्तो, समणो गोतमो एतदवोच – ‘न खो ते, गहपति, सके चित्ते ठितस्स इन्द्रियानि, अत्थि ते इन्द्रियानं अञ्ञथत्त’न्ति. एवं वुत्ते, अहं, भोन्तो, समणं गोतमं एतदवोचं – ‘किञ्हि मे, भन्ते, इन्द्रियानं नाञ्ञथत्तं भविस्सति; मय्हञ्हि, भन्ते, एकपुत्तको पियो मनापो कालङ्कतो. तस्स कालंकिरियाय नेव कम्मन्ता पटिभन्ति, न भत्तं पटिभाति . सोहं आळाहनं गन्त्वा कन्दामि – कहं, एकपुत्तक, कहं, एकपुत्तका’ति! ‘एवमेतं, गहपति, एवमेतं, गहपति! पियजातिका हि, गहपति, सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति. ‘कस्स खो नामेतं, भन्ते, एवं भविस्सति – पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका? पियजातिका हि खो, भन्ते, आनन्दसोमनस्सा पियप्पभविका’ति. अथ ख्वाहं, भोन्तो, समणस्स गोतमस्स भासितं अनभिनन्दित्वा पटिक्कोसित्वा उट्ठायासना पक्कमि’’न्ति. ‘‘एवमेतं, गहपति, एवमेतं, गहपति! पियजातिका हि, गहपति, आनन्दसोमनस्सा पियप्पभविका’’ति . अथ खो सो गहपति ‘‘समेति मे अक्खधुत्तेही’’ति पक्कामि. अथ खो इदं कथावत्थु अनुपुब्बेन राजन्तेपुरं पाविसि.

३५५. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो मल्लिकं देविं आमन्तेसि – ‘‘इदं ते, मल्लिके, समणेन गोतमेन भासितं – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’’’ति. ‘‘सचेतं, महाराज, भगवता भासितं, एवमेत’’न्ति. ‘‘एवमेव पनायं मल्लिका यञ्ञदेव समणो गोतमो भासति तं तदेवस्स अब्भनुमोदति’’. ‘‘सचेतं, महाराज, भगवता भासितं एवमेतन्ति. सेय्यथापि नाम, यञ्ञदेव आचरियो अन्तेवासिस्स भासति तं तदेवस्स अन्तेवासी अब्भनुमोदति – ‘एवमेतं, आचरिय, एवमेतं, आचरिया’’’ति. ‘‘एवमेव खो त्वं, मल्लिके, यञ्ञदेव समणो गोतमो भासति तं तदेवस्स अब्भनुमोदसि’’. ‘‘सचेतं, महाराज , भगवता भासितं एवमेत’’न्ति. ‘‘चरपि, रे मल्लिके, विनस्सा’’ति. अथ खो मल्लिका देवी नाळिजङ्घं ब्राह्मणं आमन्तेसि – ‘‘एहि त्वं, ब्राह्मण, येन भगवा तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा मम वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छ – ‘मल्लिका, भन्ते, देवी भगवतो पादे सिरसा वन्दति, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छती’ति. एवञ्च वदेहि – ‘भासिता नु खो, भन्ते, भगवता एसा वाचा – पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति . यथा ते भगवा ब्याकरोति तं साधुकं उग्गहेत्वा मम आरोचेय्यासि. न हि तथागता वितथं भणन्ती’’ति. ‘‘एवं, भोती’’ति खो नाळिजङ्घो ब्राह्मणो मल्लिकाय देविया पटिस्सुत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो नाळिजङ्घो ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘मल्लिका, भो गोतम, देवी भोतो गोतमस्स पादे सिरसा वन्दति; अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छति; एवञ्च वदेति – ‘भासिता नु खो, भन्ते, भगवता एसा वाचा – पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’’’ति.

३५६. ‘‘एवमेतं, ब्राह्मण, एवमेतं, ब्राह्मण! पियजातिका हि, ब्राह्मण, सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविकाति. तदमिनापेतं, ब्राह्मण, परियायेन वेदितब्बं यथा पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका. भूतपुब्बं, ब्राह्मण, इमिस्सायेव सावत्थिया अञ्ञतरिस्सा इत्थिया माता कालमकासि. सा तस्सा कालकिरियाय उम्मत्तिका खित्तचित्ता रथिकाय रथिकं [रथियाय रथियं (सी. स्या. कं. पी.)] सिङ्घाटकेन सिङ्घाटकं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अपि मे मातरं अद्दस्सथ [अद्दसथ (सी. पी.)], अपि मे मातरं अद्दस्सथा’ति? इमिनापि खो एतं, ब्राह्मण, परियायेन वेदितब्बं यथा पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविकाति.

‘‘भूतपुब्बं , ब्राह्मण, इमिस्सायेव सावत्थिया अञ्ञतरिस्सा इत्थिया पिता कालमकासि… भाता कालमकासि… भगिनी कालमकासि… पुत्तो कालमकासि… धीता कालमकासि… सामिको कालमकासि. सा तस्स कालकिरियाय उम्मत्तिका खित्तचित्ता रथिकाय रथिकं सिङ्घाटकेन सिङ्घाटकं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अपि मे सामिकं अद्दस्सथ, अपि मे सामिकं अद्दस्सथा’ति? इमिनापि खो एतं, ब्राह्मण, परियायेन वेदितब्बं यथा पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविकाति.

‘‘भूतपुब्बं , ब्राह्मण, इमिस्सायेव सावत्थिया अञ्ञतरस्स पुरिसस्स माता कालमकासि. सो तस्सा कालकिरियाय उम्मत्तको खित्तचित्तो रथिकाय रथिकं सिङ्घाटकेन सिङ्घाटकं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अपि मे मातरं अद्दस्सथ, अपि मे मातरं अद्दस्सथा’ति ? इमिनापि खो एतं, ब्राह्मण , परियायेन वेदितब्बं यथा पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविकाति.

‘‘भूतपुब्बं, ब्राह्मण, इमिस्सायेव सावत्थिया अञ्ञतरस्स पुरिसस्स पिता कालमकासि… भाता कालमकासि… भगिनी कालमकासि… पुत्तो कालमकासि… धीता कालमकासि… पजापति कालमकासि. सो तस्सा कालकिरियाय उम्मत्तको खित्तचित्तो रथिकाय रथिकं सिङ्घाटकेन सिङ्घाटकं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अपि मे पजापतिं अद्दस्सथ, अपि मे पजापतिं अद्दस्सथा’ति? इमिनापि खो एतं, ब्राह्मण, परियायेन वेदितब्बं यथा पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविकाति.

‘‘भूतपुब्बं, ब्राह्मण, इमिस्सायेव सावत्थिया अञ्ञतरा इत्थी ञातिकुलं अगमासि. तस्सा ते ञातका सामिकं [सामिका (सी.)] अच्छिन्दित्वा अञ्ञस्स दातुकामा. सा च तं न इच्छति. अथ खो सा इत्थी सामिकं एतदवोच – ‘इमे, मं [मम (स्या. कं. पी.)], अय्यपुत्त, ञातका त्वं [तया (सी.), तं (स्या. कं. पी.)] अच्छिन्दित्वा अञ्ञस्स दातुकामा. अहञ्च तं न इच्छामी’ति. अथ खो सो पुरिसो तं इत्थिं द्विधा छेत्वा अत्तानं उप्फालेसि [उप्पाटेसि (सी. पी.), ओफारेसि (क.)] – ‘उभो पेच्च भविस्सामा’ति. इमिनापि खो एतं, ब्राह्मण, परियायेन वेदितब्बं यथा पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’’ति.

३५७. अथ खो नाळिजङ्घो ब्राह्मणो भगवतो भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना येन मल्लिका देवी तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा यावतको अहोसि भगवता सद्धिं कथासल्लापो तं सब्बं मल्लिकाय देविया आरोचेसि. अथ खो मल्लिका देवी येन राजा पसेनदि कोसलो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा राजानं पसेनदिं कोसलं एतदवोच – ‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, पिया ते वजिरी कुमारी’’ति? ‘‘एवं, मल्लिके, पिया मे वजिरी कुमारी’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, वजिरिया ते कुमारिया विपरिणामञ्ञथाभावा उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘वजिरिया मे, मल्लिके, कुमारिया विपरिणामञ्ञथाभावा जीवितस्सपि सिया अञ्ञथत्तं, किं पन मे न उप्पज्जिस्सन्ति सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘इदं खो तं, महाराज, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सन्धाय भासितं – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति.

‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, पिया ते वासभा खत्तिया’’ति? ‘‘एवं, मल्लिके, पिया मे वासभा खत्तिया’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, वासभाय ते खत्तियाय विपरिणामञ्ञथाभावा उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘वासभाय मे, मल्लिके, खत्तियाय विपरिणामञ्ञथाभावा जीवितस्सपि सिया अञ्ञथत्तं, किं पन मे न उप्पज्जिस्सन्ति सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘इदं खो तं, महाराज, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सन्धाय भासितं – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति.

‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, पियो ते विटटूभो [विडूडभो (सी. स्या. कं. पी.)] सेनापती’’ति? ‘‘एवं , मल्लिके, पियो मे विटटूभो सेनापती’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, विटटूभस्स ते सेनापतिस्स विपरिणामञ्ञथाभावा उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘विटटूभस्स मे, मल्लिके, सेनापतिस्स विपरिणामञ्ञथाभावा जीवितस्सपि सिया अञ्ञथत्तं , किं पन मे न उप्पज्जिस्सन्ति सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘इदं खो तं, महाराज, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सन्धाय भासितं – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति.

‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, पिया ते अह’’न्ति? ‘‘एवं, मल्लिके, पिया मेसि त्व’’न्ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, मय्हं ते विपरिणामञ्ञथाभावा उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘तुय्हञ्हि मे, मल्लिके, विपरिणामञ्ञथाभावा जीवितस्सपि सिया अञ्ञथत्तं, किं पन मे न उप्पज्जिस्सन्ति सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘इदं खो तं, महाराज, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सन्धाय भासितं – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’ति.

‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, पिया ते कासिकोसला’’ति? ‘‘एवं, मल्लिके, पिया मे कासिकोसला. कासिकोसलानं, मल्लिके, आनुभावेन कासिकचन्दनं पच्चनुभोम, मालागन्धविलेपनं धारेमा’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, महाराज, कासिकोसलानं ते विपरिणामञ्ञथाभावा उप्पज्जेय्युं सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘कासिकोसलानञ्हि, मल्लिके , विपरिणामञ्ञथाभावा जीवितस्सपि सिया अञ्ञथत्तं, किं पन मे न उप्पज्जिस्सन्ति सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा’’ति? ‘‘इदं खो तं, महाराज, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन सन्धाय भासितं – ‘पियजातिका सोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा पियप्पभविका’’’ति.

‘‘अच्छरियं, मल्लिके, अब्भुतं, मल्लिके! यावञ्च सो भगवा पञ्ञाय अतिविज्झ मञ्ञे [पटिविज्झ पञ्ञाय (क.)] पस्सति. एहि, मल्लिके, आचमेही’’ति [आचामेहीति (सी. पी.)]. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो उट्ठायासना एकंसं उत्तरासङ्गं करित्वा येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा तिक्खत्तुं उदानं उदानेसि – ‘‘नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स, नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स, नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्सा’’ति.

पियजातिकसुत्तं निट्ठितं सत्तमं.

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