
उदान ८.४ में वर्णित घटना के अनुसार, घुमक्कड़ तपस्वियों ने तपस्विनी सुंदरी को अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान जाने के लिए उकसाया, और फिर रात के अंधेरे में उसकी हत्या कर उसे वहीं दफना दिया। अगले दिन, घुमक्कड़ों ने हंगामा मचाया और राजा प्रसेनजित कोशल से आग्रह किया कि वे जेतवन की तलाशी लें। जब वहाँ उसकी लाश मिली, तो उन्होंने भगवान बुद्ध और भिक्षुसंघ पर यह गंभीर आरोप लगाया कि उन्हीं ने सुंदरी की हत्या की थी। इसके परिणामस्वरूप भिक्षुसंघ की बदनामी हुई और उन्हें भिक्षा प्राप्त करना कठिन हो गया। हालांकि, भगवान के बताएं अनुसार, एक सप्ताह में सभी आरोप धम्म के प्रभाव से समाप्त हो गए और असली अपराधी पकड़े गए।
अट्ठकथा के अनुसार, यह सूत्र उसी सप्ताह में घटित हुआ था, जिसमें राजा प्रसेनजित कोशल भगवान के चरित्र को परखना चाहते थे, क्योंकि उन पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। हालांकि, न तो इस सूत्र में और न ही इसके समानांतर मध्यमआगम २१४ में इस घटना का कोई उल्लेख, संदर्भ, या समर्थन पाया जाता है। और मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि यह सूत्र मात्र संयोगवश घटित हुआ, और इसका उस घटना से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। क्योंकि, मुझे विश्वास है कि राजा प्रसेनजित इतने बुद्धिमान थे कि वे ऐसे गंभीर आरोप की पुष्टि भगवान के सेवक से और सिर्फ एक वार्तालाप के आधार पर नहीं करते।
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। तब, सुबह होने पर आयुष्मान आनन्द ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिए प्रवेश किया। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर भोजन करने के पश्चात वे दिन बिताने के लिए मिगारमाता (विशाखा) के विहार पूर्वाराम में गए।
उस समय राजा प्रसेनजित (“पसेनदि”) कोशल भरे दिन में ‘एक-कमल’ हाथी पर सवार होकर श्रावस्ती से निकले। तब राजा प्रसेनजित कोशल ने आयुष्मान आनन्द को दूर से आते हुए देखा। देखकर महामंत्री सिरिवड्ढ को आमंत्रित किया, “भले सिरिवड्ढ, ये आयुष्मान आनन्द ही हैं न?”
“हाँ, महाराज! ये आयुष्मान आनन्द ही हैं।”
तब राजा प्रसेनजित कोशल ने किसी पुरुष को आमंत्रित किया, “यहाँ आओ, भले पुरुष। आयुष्मान आनन्द के पास जाओ, और जाकर मेरी ओर से आयुष्मान आनन्द के चरणों में सिर से वंदन कर कहना, ‘भन्ते, राजा प्रसेनजित कोशल आयुष्मान आनन्द के चरणों में सिर से वंदन करते हैं।’ और फिर कहना, ‘यदि आयुष्मान आनन्द को आवश्यक कार्य न हो, तो कृपा कर आयुष्मान आनन्द एक मुहूर्त रुके।’”
“जी, महाराज!” उस पुरुष ने राजा प्रसेनजित कोशल को उत्तर देकर आयुष्मान आनन्द के पास गया। और जाकर आयुष्मान आनन्द के चरणों में सिर से वंदन कर कहा, “भन्ते, राजा प्रसेनजित कोशल आयुष्मान आनन्द के चरणों में सिर से वंदन करते हैं। यदि आयुष्मान आनन्द को आवश्यक कार्य न हो, तो कृपा कर आयुष्मान आनन्द एक मुहूर्त रुके।”
आयुष्मान आनन्द ने मौन रहकर स्वीकृति दी।
तब राजा प्रसेनजित कोशल जहाँ तक हाथी के चलने की भूमि थी, वहाँ तक हाथी से गए, और फिर हाथी से उतर कर पैदल आयुष्मान आनन्द के पास गए। जाकर आयुष्मान आनन्द को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर राजा प्रसेनजित कोशल ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “भन्ते, यदि आयुष्मान आनन्द को आवश्यक कार्य न हो, तो कृपा कर आयुष्मान आनन्द अचिरवति नदी के किनारे चले।”
आयुष्मान आनन्द ने मौन रहकर स्वीकृति दी।
तब आयुष्मान आनन्द अचिरवति नदी के किनारे गए, और जाकर किसी वृक्ष के तले बिछे आसन पर बैठ गए।
तब राजा प्रसेनजित कोशल जहाँ तक हाथी के चलने की भूमि थी, वहाँ तक हाथी से गए, और फिर हाथी से उतर कर पैदल आयुष्मान आनन्द के पास गए। जाकर आयुष्मान आनन्द को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर राजा प्रसेनजित कोशल ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “भन्ते, आयुष्मान आनन्द इस हाथी के गलीचे पर बैठिए।”
“पर्याप्त है, महाराज। आप ही बैठिए। मैं अपने आसन पर बैठा हूँ।”
तब आसन बिछा कर राजा प्रसेनजित कोशल बैठ गए। एक ओर बैठकर राजा प्रसेनजित कोशल ने आयुष्मान आनन्द से कहा—
“भन्ते आनन्द, क्या भगवान इस प्रकार के शारीरिक आचरण को करेंगे, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित हो?”
“नहीं, महाराज। भगवान इस प्रकार के शारीरिक आचरण को नहीं करेंगे, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण समझदार श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, क्या भगवान इस प्रकार के शाब्दिक आचरण… (या) इस प्रकार के मानसिक आचरण को करेंगे, जिस प्रकार का आचरण श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित हो?”
“नहीं, महाराज। भगवान इस प्रकार के शाब्दिक आचरण… या इस प्रकार के मानसिक आचरण को नहीं करेंगे, जिस प्रकार का आचरण श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित हो।”
“आश्चर्य है, भन्ते आनन्द! अद्भुत है, भन्ते आनन्द! मैं प्रश्न को पूर्णता से नहीं पूछ पाया, किन्तु आयुष्मान आनन्द ने प्रश्न पर परिपूर्णता से उत्तर दे दिया। 1 भन्ते, जो मूर्ख और अनुभवहीन बिना जाने, बिना गहराई से समझे, दूसरों के बारे में अच्छा या बुरा बोलते हैं, मैं उसे महत्वपूर्ण नहीं मानता हूँ। किन्तु, जो पंडित, ज्ञानी और मेधावी जानते हुए, गहराई से समझते हुए, दूसरों के बारे में अच्छा या बुरा बोलते हैं, उसे ही मैं महत्वपूर्ण मानता हूँ।
किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘अकुशल’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘अकुशल’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘दोषपूर्ण’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘दोषपूर्ण’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘पीड़ादायक’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘पीड़ादायक’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘दुःख-परिणामी’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘दुःख-परिणामी’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार के शारीरिक आचरण से (स्वयं को) आत्म-पीड़ा होती है, (दूसरे को) पर-पीड़ा होती है, (दोनों को) आपसी-पीड़ा होती है, और जो अकुशल स्वभावों को बढ़ाते हैं और कुशल स्वभावों को घटाते हैं। उस प्रकार का शारीरिक आचरण, महाराज, ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित है।”
किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘अकुशल’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘अकुशल’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘दोषपूर्ण’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘दोषपूर्ण’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘पीड़ादायक’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘पीड़ादायक’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘दुःख-परिणामी’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘दुःख-परिणामी’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार के शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार के मानसिक आचरण से आत्म-पीड़ा होती है, पर-पीड़ा होती है, आपसी-पीड़ा होती है, और जो अकुशल स्वभावों को बढ़ाते हैं और कुशल स्वभावों को घटाते हैं। उस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और उस प्रकार का मानसिक आचरण, महाराज, ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित है।”
“तब, भन्ते आनन्द, क्या भगवान उन सभी अकुशल स्वभावों को त्यागने की प्रशंसा करते हैं?”
“महाराज, तथागत सभी अकुशल स्वभावों को त्याग कर, कुशल स्वभावों से युक्त हैं।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित नहीं है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘कुशल’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘कुशल’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘दोषरहित’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘दोषरहित’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘पीड़ारहित’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘पीड़ारहित’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘सुख-परिणामी’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शारीरिक आचरण ‘सुख-परिणामी’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार के शारीरिक आचरण से न आत्म-पीड़ा होती है, न पर-पीड़ा होती है, और न ही आपसी-पीड़ा होती है, और जो अकुशल स्वभावों को घटाते हैं और कुशल स्वभावों को बढ़ाते हैं। उस प्रकार का शारीरिक आचरण, महाराज, ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित नहीं है।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित नहीं है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘कुशल’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘कुशल’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘दोषरहित’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘दोषरहित’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘पीड़ारहित’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘पीड़ारहित’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार का मानसिक आचरण ‘सुख-परिणामी’ हो।”
“किन्तु, भन्ते आनन्द, किस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और किस प्रकार का मानसिक आचरण ‘सुख-परिणामी’ होता है?”
“महाराज, जिस प्रकार के शाब्दिक आचरण… और जिस प्रकार के मानसिक आचरण से न आत्म-पीड़ा होती है, न पर-पीड़ा होती है, और न ही आपसी-पीड़ा होती है, और जो अकुशल स्वभावों को घटाते हैं और कुशल स्वभावों को बढ़ाते हैं। उस प्रकार का शाब्दिक आचरण… और उस प्रकार का मानसिक आचरण, महाराज, ‘समझदार’ श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा आलोचित नहीं है।”
“तब, भन्ते आनन्द, क्या भगवान उन सभी कुशल स्वभावों को आत्मसात करने की प्रशंसा करते हैं?”
“महाराज, तथागत सभी अकुशल स्वभावों को त्याग कर, कुशल स्वभावों से युक्त हैं।” 2
“आश्चर्य है, भन्ते! अद्भुत है, भन्ते! कितना अच्छा बोला आयुष्मान आनन्द ने! भन्ते, मैं आयुष्मान आनन्द के इतना अच्छा बोलने से बहुत प्रसन्न हुआ, बहुत संतुष्ट हुआ।
भन्ते, मैं आयुष्मान आनन्द के इतना अच्छा बोलने से इतना प्रसन्न हुआ, इतना संतुष्ट हुआ कि यदि आयुष्मान आनन्द को हाथी-रत्न स्वीकार होता, तो अभी मैं आयुष्मान आनन्द को हाथी-रत्न दे देता। यदि आयुष्मान आनन्द को अश्व-रत्न स्वीकार होता, तो अभी मैं आयुष्मान आनन्द को अश्व-रत्न दे देता। यदि आयुष्मान आनन्द को गाँव-ईनाम स्वीकार होता, तो अभी मैं आयुष्मान आनन्द को गाँव दे देता। किन्तु, भन्ते, मैं यह जानता हूँ कि ‘आयुष्मान आनन्द को (यह सब) स्वीकार नहीं।
मेरे पास, भन्ते, मगध के राजा अजातशत्रु वेदेहिपुत्त ने (चिकने) वस्त्र में लपेट कर (उपहार-स्वरूप) यह ‘विदेशी’ वस्त्र भेजा है, जो ठीक सोलह हाथ लंबा और आठ हाथ चौड़ा है। उसे, भन्ते, आयुष्मान आनन्द कृपा कर के स्वीकार लें।”
“पर्याप्त हुआ, महाराज। मेरे पास चीवर पूरे हैं।”
“भन्ते, हम दोनों ने ही इस अचिरवति नदी को देखा हैं। जब ऊपर पर्वत पर महामेघ बहुत वर्षा कराते हैं, तब यह अचिरवति नदी अपने दोनों किनारों से बह निकलती है।
उसी तरह, भन्ते, आयुष्मान आनन्द इस विदेशी कपड़े से अपने तीन चीवर बना सकते हैं। और आयुष्मान आनन्द के पुराने तीन चीवर उनके सब्रह्मचारियों में संविभाग हो सकते हैं। इस तरह मेरी दक्षिणा भी, भन्ते, मानो दोनों किनारों से बह निकलेगी।
भन्ते, आयुष्मान आनन्द कृपा कर के इस विदेशी कपड़े का स्वीकार करें।”
तब, आयुष्मान आनन्द ने उस विदेशी कपड़े का स्वीकार किया।
तब, राजा प्रसेनजित कोशल ने आयुष्मान आनन्द से कहा, “ठीक है, भन्ते! तब अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं मेरे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”
“तब, महाराज, जिसका समय उचित समझे!”
तब राजा प्रसेनजित कोशल ने आयुष्मान आनन्द की बातों का अभिनन्दन करते हुए, अनुमोदन करते हुए, आसन से उठा। और आयुष्मान आनन्द को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया।
जब राजा प्रसेनजित कोशल को जाकर अधिक देर नहीं हुई थी, तब आयुष्मान आनन्द भगवान के पास गए। और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर आयुष्मान आनन्द ने राजा प्रसेनजित कोशल के साथ हुए वार्तालाप को भगवान को पूरा सुनाया। और उस विदेशी कपड़े को भगवान के सुपुर्द कर दिया।
तब भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं, राजा प्रसेनजित कोशल भाग्यशाली हैं! राजा प्रसेनजित कोशल सौभाग्यशाली हैं, जो उसे आनन्द का दर्शन लाभ हुआ, सत्संग लाभ मिला।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
आयुष्मान आनन्द ने राजा के वाक्य को “समझदार” (“विञ्ञूही”) शब्द से पूरा किया, क्योंकि भगवान बुद्ध का आचरण वास्तव में मूर्ख तपस्वियों और ब्राह्मणों द्वारा आलोचित था। ↩︎
यहाँ भन्ते आनन्द का यह कहना है कि भगवान केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में उस कुशलता को अपनाया और आत्मसात किया है। अर्थात, भगवान के आचरण में वह कुशल स्वभाव पूरी तरह से अवतरित हो गए हैं, इसलिए अब उन्हें ‘कुशलता का अवतार’ कहा जा सकता है। ↩︎
३५८. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. अथ खो आयस्मा आनन्दो पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थियं पिण्डाय पाविसि. सावत्थियं पिण्डाय चरित्वा पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो येन पुब्बारामो मिगारमातुपासादो तेनुपसङ्कमि दिवाविहाराय. तेन खो पन समयेन राजा पसेनदि कोसलो एकपुण्डरीकं नागं अभिरुहित्वा सावत्थिया निय्याति दिवा दिवस्स. अद्दसा खो राजा पसेनदि कोसलो आयस्मन्तं आनन्दं दूरतोव आगच्छन्तं. दिस्वान सिरिवड्ढं महामत्तं आमन्तेसि – ‘‘आयस्मा नो एसो, सम्म सिरिवड्ढ, आनन्दो’’ति . ‘‘एवं, महाराज, आयस्मा एसो आनन्दो’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो अञ्ञतरं पुरिसं आमन्तेसि – ‘‘एहि त्वं, अम्भो पुरिस, येनायस्मा आनन्दो तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा मम वचनेन आयस्मतो आनन्दस्स पादे सिरसा वन्दाहि – ‘राजा, भन्ते, पसेनदि कोसलो आयस्मतो आनन्दस्स पादे सिरसा वन्दती’ति. एवञ्च वदेहि – ‘सचे किर, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स न किञ्चि अच्चायिकं करणीयं, आगमेतु किर, भन्ते, आयस्मा आनन्दो मुहुत्तं अनुकम्पं उपादाया’’’ति. ‘‘एवं, देवा’’ति खो सो पुरिसो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिस्सुत्वा येनायस्मा आनन्दो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्ठासि. एकमन्तं ठितो खो सो पुरिसो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘राजा, भन्ते, पसेनदि कोसलो आयस्मतो आनन्दस्स पादे सिरसा वन्दति; एवञ्च वदेति – ‘सचे किर, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स न किञ्चि अच्चायिकं करणीयं, आगमेतु किर, भन्ते, आयस्मा आनन्दो मुहुत्तं अनुकम्पं उपादाया’’’ति. अधिवासेसि खो आयस्मा आनन्दो तुण्हीभावेन. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो यावतिका नागस्स भूमि नागेन गन्त्वा नागा पच्चोरोहित्वा पत्तिकोव येनायस्मा आनन्दो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्ठासि. एकमन्तं ठितो खो राजा पसेनदि कोसलो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘सचे, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स न किञ्चि अच्चायिकं करणीयं , साधु, भन्ते, आयस्मा आनन्दो येन अचिरवतिया नदिया तीरं तेनुपसङ्कमतु अनुकम्पं उपादाया’’ति. अधिवासेसि खो आयस्मा आनन्दो तुण्हीभावेन.
३५९. अथ खो आयस्मा आनन्दो येन अचिरवतिया नदिया तीरं तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा अञ्ञतरस्मिं रुक्खमूले पञ्ञत्ते आसने निसीदि. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो यावतिका नागस्स भूमि नागेन गन्त्वा नागा पच्चोरोहित्वा पत्तिकोव येनायस्मा आनन्दो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं आनन्दं अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्ठासि. एकमन्तं ठितो खो राजा पसेनदि कोसलो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘इध, भन्ते, आयस्मा आनन्दो हत्थत्थरे निसीदतू’’ति. ‘‘अलं, महाराज. निसीद त्वं; निसिन्नो अहं सके आसने’’ति. निसीदि खो राजा पसेनदि कोसलो पञ्ञत्ते आसने. निसज्ज खो राजा पसेनदि कोसलो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘किं नु खो, भन्ते आनन्द, सो भगवा तथारूपं कायसमाचारं समाचरेय्य, य्वास्स कायसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेही’’ति [ब्राह्मणेहि विञ्ञूहीति (सब्बत्थ) अट्ठकथा टीका ओलोकेतब्बा]? ‘‘न खो, महाराज, सो भगवा तथारूपं कायसमाचारं समाचरेय्य, य्वास्स कायसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति.
‘‘किं पन, भन्ते आनन्द, सो भगवा तथारूपं वचीसमाचारं…पे… मनोसमाचारं समाचरेय्य, य्वास्स मनोसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेही’’ति [ब्राह्मणेहि विञ्ञूहीति (सब्बत्थ) अट्ठकथा टीका ओलोकेतब्बा]? ‘‘न खो, महाराज, सो भगवा तथारूपं मनोसमाचारं समाचरेय्य, य्वास्स मनोसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति.
‘‘अच्छरियं, भन्ते, अब्भुतं, भन्ते! यञ्हि मयं, भन्ते, नासक्खिम्हा पञ्हेन परिपूरेतुं तं, भन्ते, आयस्मता आनन्देन पञ्हस्स वेय्याकरणेन परिपूरितं. ये ते, भन्ते, बाला अब्यत्ता अननुविच्च अपरियोगाहेत्वा परेसं वण्णं वा अवण्णं वा भासन्ति, न मयं तं सारतो पच्चागच्छाम; ये पन [ये च खो (सी. स्या. कं. पी.)] ते, भन्ते , पण्डिता वियत्ता [ब्यत्ता (सी. स्या. कं. पी.)] मेधाविनो अनुविच्च परियोगाहेत्वा परेसं वण्णं वा अवण्णं वा भासन्ति, मयं तं सारतो पच्चागच्छाम’’.
३६०. ‘‘कतमो पन, भन्ते आनन्द, कायसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो अकुसलो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो अकुसलो’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो सावज्जो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो सावज्जो’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो सब्याबज्झो’’ [सब्यापज्झो (सी. स्या. कं. पी.), सब्यापज्जो (क.)].
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो सब्याबज्झो’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो दुक्खविपाको’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो दुक्खविपाको’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो अत्तब्याबाधायपि संवत्तति, परब्याबाधायपि संवत्तति, उभयब्याबाधायपि संवत्तति तस्स अकुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति, कुसला धम्मा परिहायन्ति; एवरूपो खो, महाराज, कायसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति.
‘‘कतमो पन, भन्ते आनन्द, वचीसमाचारो…पे… मनोसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो अकुसलो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो अकुसलो’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो सावज्जो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो सावज्जो’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो सब्याबज्झो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो सब्याबज्झो’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो दुक्खविपाको’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो दुक्खविपाको’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो अत्तब्याबाधायपि संवत्तति, परब्याबाधायपि संवत्तति, उभयब्याबाधायपि संवत्तति तस्स अकुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति, कुसला धम्मा परिहायन्ति; एवरूपो खो, महाराज, मनोसमाचारो ओपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति.
‘‘किं नु खो, भन्ते आनन्द, सो भगवा सब्बेसंयेव अकुसलानं धम्मानं पहानं वण्णेती’’ति? ‘‘सब्बाकुसलधम्मपहीनो खो, महाराज, तथागतो कुसलधम्मसमन्नागतो’’ति.
३६१. ‘‘कतमो पन, भन्ते आनन्द, कायसमाचारो अनोपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो कुसलो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो कुसलो’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो अनवज्जो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो अनवज्जो’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो अब्याबज्झो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो अब्याबज्झो’’? ‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो सुखविपाको’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, कायसमाचारो सुखविपाको’’?
‘‘यो खो, महाराज, कायसमाचारो नेवत्तब्याबाधायपि संवत्तति, न परब्याबाधायपि संवत्तति, न उभयब्याबाधायपि संवत्तति तस्स अकुसला धम्मा परिहायन्ति, कुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति; एवरूपो खो, महाराज, कायसमाचारो अनोपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति.
‘‘कतमो पन, भन्ते आनन्द, वचीसमाचारो…पे… मनोसमाचारो अनोपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो कुसलो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो कुसलो’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो अनवज्जो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो अनवज्जो’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो अब्याबज्झो’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो अब्याबज्झो’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो सुखविपाको’’.
‘‘कतमो पन, भन्ते, मनोसमाचारो सुखविपाको’’? ‘‘यो खो, महाराज, मनोसमाचारो नेवत्तब्याबाधायपि संवत्तति, न परब्याबाधायपि संवत्तति, न उभयब्याबाधायपि संवत्तति. तस्स अकुसला धम्मा परिहायन्ति, कुसला धम्मा अभिवड्ढन्ति. एवरूपो खो, महाराज, मनोसमाचारो अनोपारम्भो समणेहि ब्राह्मणेहि विञ्ञूही’’ति.
‘‘किं पन, भन्ते आनन्द, सो भगवा सब्बेसंयेव कुसलानं धम्मानं उपसम्पदं वण्णेती’’ति? ‘‘सब्बाकुसलधम्मपहीनो खो, महाराज, तथागतो कुसलधम्मसमन्नागतो’’ति.
३६२. ‘‘अच्छरियं , भन्ते, अब्भुतं, भन्ते! याव सुभासितं चिदं [सुभासितमिदं (सी.)], भन्ते, आयस्मता आनन्देन. इमिना च मयं, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स सुभासितेन अत्तमनाभिरद्धा. एवं अत्तमनाभिरद्धा च मयं , भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स सुभासितेन. सचे, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स हत्थिरतनं कप्पेय्य, हत्थिरतनम्पि मयं आयस्मतो आनन्दस्स ददेय्याम. सचे, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स अस्सरतनं कप्पेय्य, अस्सरतनम्पि मयं आयस्मतो आनन्दस्स ददेय्याम. सचे, भन्ते, आयस्मतो आनन्दस्स गामवरं कप्पेय्य, गामवरम्पि मयं आयस्मतो आनन्दस्स ददेय्याम. अपि च, भन्ते, मयम्पेतं [मयमेव तं (सी.), मयम्पनेतं (स्या. कं.)] जानाम – ‘नेतं आयस्मतो आनन्दस्स कप्पती’ति. अयं मे, भन्ते, बाहितिका रञ्ञा मागधेन अजातसत्तुना वेदेहिपुत्तेन वत्थनाळिया [छत्तनाळिया (स्या. कं. पी.)] पक्खिपित्वा पहिता सोळससमा आयामेन, अट्ठसमा वित्थारेन . तं, भन्ते, आयस्मा आनन्दो पटिग्गण्हातु अनुकम्पं उपादाया’’ति. ‘‘अलं, महाराज, परिपुण्णं मे तिचीवर’’न्ति.
‘‘अयं , भन्ते, अचिरवती नदी दिट्ठा आयस्मता चेव आनन्देन अम्हेहि च. यदा उपरिपब्बते महामेघो अभिप्पवुट्ठो होति, अथायं अचिरवती नदी उभतो कूलानि संविस्सन्दन्ती गच्छति; एवमेव खो, भन्ते, आयस्मा आनन्दो इमाय बाहितिकाय अत्तनो तिचीवरं करिस्सति. यं पनायस्मतो आनन्दस्स पुराणं तिचीवरं तं सब्रह्मचारीहि संविभजिस्सति. एवायं अम्हाकं दक्खिणा संविस्सन्दन्ती मञ्ञे गमिस्सति. पटिग्गण्हातु, भन्ते, आयस्मा आनन्दो बाहितिक’’न्ति. पटिग्गहेसि खो आयस्मा आनन्दो बाहितिकं.
अथ खो राजा पसेनदि कोसलो आयस्मन्तं आनन्दं एतदवोच – ‘‘हन्द च दानि मयं, भन्ते आनन्द, गच्छाम; बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’ति. ‘‘यस्सदानि त्वं, महाराज, कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो आयस्मतो आनन्दस्स भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना आयस्मन्तं आनन्दं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामि.
३६३. अथ खो आयस्मा आनन्दो अचिरपक्कन्तस्स रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो आयस्मा आनन्दो यावतको अहोसि रञ्ञा पसेनदिना कोसलेन सद्धिं कथासल्लापो तं सब्बं भगवतो आरोचेसि. तञ्च बाहितिकं भगवतो पादासि. अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘लाभा, भिक्खवे, रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स, सुलद्धलाभा, भिक्खवे, रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स; यं राजा पसेनदि कोसलो लभति आनन्दं दस्सनाय, लभति पयिरुपासनाया’’ति.
इदमवोच भगवा. अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति.
बाहितिकसुत्तं निट्ठितं अट्ठमं.