✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

धम्म-चैत्य

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १५ मिनट

हिन्दी

भगवान की याद

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान शाक्यों के साथ मेदाळुप नामक शाक्य नगर में विहार कर रहे थे। उस समय राजा प्रसेनजित (“पसेनदि”) कोशल किसी कार्य से छोटे नगर में पहुँचा था। वहाँ राजा प्रसेनजित कोशल ने दीघ कारायन को आमंत्रित किया, “भले कारायन, अच्छे अच्छे रथ तैयार करो। हम उद्यानभूमि में सुभूमि का दर्शन करने जाएँगे।”

“ठीक है, देव!” दीघ कारायन ने राजा प्रसेनजित कोशल को उत्तर देकर अच्छे अच्छे रथ तैयार किए, और राजा प्रसेनजित कोशल को सूचित किया, “अच्छे अच्छे रथ तैयार हैं, देव। जिस समय आप उचित समझें।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल सबसे अच्छे रथ पर सवार होकर, अच्छे-अच्छे रथों को साथ लेकर, पूर्ण राजसी अंदाज में, छोटे नगर से उद्यान भूमि की ओर निकल पड़ा। जहाँ तक रथ जाने की भूमि थी, वहाँ तक रथ से गया, और फिर रथ से उतर कर पैदल उद्यान भूमि में प्रवेश किया।

तब, राजा प्रसेनजित कोशल चहलकदमी कर घूमते हुए, टहलते हुए, ऐसे वृक्षों के तल देखे—जो आश्वस्त करने वाले, प्रेरित करने वाले, बिलकुल शान्त, निशब्द, निर्जन, मनुष्यों की बस्ती से दूर, निर्लिप्त एकांतवास के लिए उपयुक्त हो।

देखकर उसे तुरंत भगवान की याद आयी, “ये वृक्षों के तल—जो आश्वस्त करने वाले, प्रेरित करने वाले, बिलकुल शान्त, निशब्द, निर्जन, मनुष्यों की बस्ती से दूर, निर्लिप्त एकांतवास के लिए उपयुक्त हैं—ठीक वैसे ही हैं, जहाँ पर हम भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का सत्संग करते थे।” 1

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने दीघ कारायन को आमंत्रित किया, “भले कारायन, ये वृक्षों के तल—जो आश्वस्त करने वाले, प्रेरित करने वाले, बिलकुल शान्त, निशब्द, निर्जन, मनुष्यों की बस्ती से दूर, निर्लिप्त एकांतवास के लिए उपयुक्त हैं—ठीक वैसे ही हैं, जहाँ पर हम भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का सत्संग करते थे। भले कारायन, इस समय भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध कहाँ विहार कर रहे हैं?”

“महाराज, मेदाळुप नामक शाक्य नगर है। वहीं भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध इस समय विहार कर रहे हैं।”

“किन्तु, वह मेदाळुप नामक शाक्य नगर यहाँ से कितना दूर है?”

“अधिक दूर नहीं है, महाराज। तीन योजन (=लगभग ४२ किमी) है। दिन रहते हुए ही पहुँच सकते हैं।”

“ठीक है तब, भले कारायन! अच्छे अच्छे रथ तैयार करो। हम भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का दर्शन करते जाएँगे।”

“ठीक है, देव!” दीघ कारायन ने राजा प्रसेनजित कोशल को उत्तर देकर अच्छे अच्छे रथ तैयार किए, और राजा प्रसेनजित कोशल को सूचित किया, “अच्छे अच्छे रथ तैयार हैं, देव। जिस समय आप उचित समझें।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल सबसे अच्छे रथ पर सवार होकर, अच्छे-अच्छे रथों को साथ लेकर, पूर्ण राजसी अंदाज में, छोटे नगर से मेदाळुप नामक शाक्य नगर की ओर निकल पड़ा। दिन रहते हुए ही मेदाळुप नामक शाक्य नगर में पहुँच गया। वहाँ से विहार की ओर निकल पड़ा। जहाँ तक रथ जाने की भूमि थी, वहाँ तक रथ से गया, और फिर रथ से उतर कर पैदल विहार में प्रवेश किया।

उस समय बहुत से भिक्षुगण खुले आकाश के नीचे चक्रमण (=चलते हुए ध्यान) कर रहे थे। राजा प्रसेनजित कोशल उन भिक्षुओं के पास गया, और जाकर उन भिक्षुओं से कहा, “इस समय भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध कहाँ हैं? मैं उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का दर्शन करना चाहता हूँ।”

“महाराज, वह द्वारा लगा हुआ आवास उनका है। वहाँ बड़ी शांति से धीमे-धीमे जाईये, और बरामदे में खड़े होकर, खाँस कर, चिटकनी खटखटाईये। तब भगवान का द्वार खुलेगा।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने वहीं अपनी तलवार और राजमुकुट दीघ कारायन को सौपा। तब, दीघ कारायन को लगा, “अब राजा को एकान्त चाहिए। मुझे यहीं रुकना चाहिए।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल उस द्वार लगे हुए आवास की ओर बड़ी शांति से धीमे-धीमे गया, और बरामदे में खड़े होकर, खाँस कर, चिटकनी खटखटाई। भगवान ने द्वार खोल दिया।

राजा प्रसेनजित कोशल ने भीतर आवास से प्रवेश किया और भगवान के चरणों में अपना सिर रखा, और भगवान के पैरों को मुख से चूमने लगा, हाथों से दबाने लगा, अपना नाम घोषित करते हुए, “भन्ते, मैं राजा प्रसेनजित कोशल हूँ। भन्ते, मैं राजा प्रसेनजित कोशल हूँ।” 2

“किन्तु, महाराज, आप किस अर्थ से इस काया के प्रति इस प्रकार का परम-समर्पण प्रकट कर रहे हैं, स्नेहभाव का प्रदर्शन कर रहे हैं?”

“भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

पहला कारण

ऐसा होता है, भन्ते, मैं किसी किसी श्रमण-ब्राह्मण को सीमित समय के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए देखता हूँ—जैसे दस वर्ष, बीस वर्ष, तीस वर्ष, चालीस वर्ष। उतने समय के बाद वे अच्छे से नहाकर, अच्छे से चुपड़ कर, केश कर, दाढ़ी बना कर, पाँच कामभोग में डूब कर, लिप्त होकर, मजा लेते हैं।

किन्तु यहाँ, भन्ते, मैं भिक्षुओं को देखता हूँ—जो आजीवन, अंतिम साँस तक, परिपूर्णता और परिशुद्धता से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। भन्ते, मैंने बाहर (पराए धम्म में) किसी को इतनी परिपूर्णता और परिशुद्धता से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए नहीं देखा।

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

दूसरा कारण

और आगे, भन्ते, राजा राजा से लड़ता है, क्षत्रिय क्षत्रिय से लड़ता है, ब्राह्मण ब्राह्मण से लड़ता है, (वैश्य) गृहस्थ गृहस्थ से लड़ता है, माँ पुत्र से लड़ती है, पुत्र माँ से लड़ता है, बाप पुत्र से लड़ता है, पुत्र बाप से लड़ता है, भाई भाई से लड़ता है, भाई बहन से लड़ता है, बहन भाई से लड़ती है, बहन बहन से लड़ती है, और मित्र मित्र से लड़ता है।

किन्तु यहाँ, भन्ते, मैं भिक्षुओं को देखता हूँ—जो सब मिल-जुलकर प्रसन्न रहकर, विवाद न कर, दूध में पानी जैसे होकर, एक दूसरे को स्नेहभरी आँखों से देखते हुए विहार करते हैं। भन्ते, मैंने बाहर किसी भी परिषद को इतना मिल-जुलकर रहते हुए नहीं देखा।

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

तीसरा कारण

और आगे, भन्ते, मैं एक आश्रम से दूसरे आश्रम, एक उद्यान से दूसरे उद्यान घूमते हुए, टहलते हुए गया। वहाँ मैंने किसी-किसी श्रमण-ब्राह्मण को देखा—जो दुबले-पतले, रूखे, कुरूप, पीले पड़ चुके, नसें बाहर निकली हुई। मानो, जनता को उनका दर्शन करने का कोई आकर्षण न हो।

तब, भन्ते, मुझे लगता है, ‘अवश्य, ये आयुष्मान अप्रसन्न होकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, अथवा वे किसी किए पाप कर्म को छिपा रहे हैं। इसीलिए वे इतने दुबले-पतले, रूखे, कुरूप, पीले पड़ चुके, नसें बाहर निकली हुई हैं। मानो, जनता को उनका दर्शन करने का कोई आकर्षण न हो।’

तब मैं उनके पास गया और कहा, ‘क्यों आप आयुष्मान इतने दुबले-पतले, रूखे, कुरूप, पीले पड़ चुके, नसें बाहर निकली हुई हैं? मानो, जनता को आपका दर्शन करने का कोई आकर्षण न हो?’

तब वे कहते हैं, ‘हमें आनुवांशिक बीमारी है, महाराज।’

किन्तु यहाँ, भन्ते, मैं भिक्षुओं को देखता हूँ—प्रफुल्लित और खुश, बहुत हर्षित, प्रसन्न रूप, खिले हुए चेहरे, निश्चिंत, अनुत्तेजित, पराए दान पर यापन कर, जंगली हिरण जैसे मुक्त चित्त से विहार करते हैं।

तब, भन्ते, मुझे लगता है, ‘अवश्य, इन आयुष्मानों ने भगवान के शासन में पहले से बड़ी कोई ऊँची और विशेष अवस्था को जान लिया हैं। इसीलिए ये इतने प्रफुल्लित और खुश, बहुत हर्षित, प्रसन्न रूप, खिले हुए चेहरे, निश्चिंत, अनुत्तेजित, पराए दान पर यापन कर, जंगली हिरण जैसे मुक्त चित्त से विहार करते हैं।

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

चौथा कारण

और आगे, भन्ते, मैं राजतिलक हुआ एक क्षत्रिय राजा हूँ। मैं जिसे चाहूँ उसे मृत्युदण्ड दे सकता हूँ, जिसे चाहूँ उसे कारावास दे सकता हूँ, जिसे चाहूँ उसे तड़ीपार कर सकता हूँ। तब भी, भन्ते, जब मैं दरबार में बैठकर न्याय करता हूँ, वे मेरी बात के बीच में टोकते रहते हैं। और मुझे ऐसा नहीं मिलता कि ‘जब मैं दरबार में बैठकर न्याय करूँ, तो वे मेरी बात के बीच में न टोके, और मेरी बात पूरी होने पर ही बोले।’ 3

किन्तु यहाँ, भन्ते, मैं भिक्षुओं को देखता हूँ—जिस समय भगवान कई सैकड़ों की परिषद को धम्म बताते हैं, उस समय भगवान के श्रावकों में न खाँसने का आवाज होता है, न गला साफ करने का आवाज होता है।

भन्ते, एक बार की बात है—भगवान कई सैकड़ों की परिषद को धम्म बता रहा था। तब भगवान के किसी श्रावक ने गला साफ किया। तभी उसके किसी सब्रह्मचारी ने उसे जाँघ से दबाया, “चुप रहो, आयुष्मान, आवाज मत करो। शास्ता, हमारे भगवान धम्म बता रहे हैं।”

तब, भन्ते, मुझे लगा, ‘आश्चर्य है, श्रीमान! अद्भुत है, श्रीमान! कैसे यह परिषद बिना दण्ड के, बिना शस्त्र के, इतनी अच्छे से अनुशासित हो सकती है!’

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

पाँचवा कारण

और आगे, भन्ते, मैं ऐसे क्षत्रियों को देखता हूँ, जो पण्डित हैं, निपुण हैं, शास्त्रार्थ में माहिर हैं, बाल की खाल निकालने वाले हैं, और अन्तर्ज्ञान से दूसरे की धारणाओं की चीर-फाड़ करते घूमते हैं। वे सुनते हैं, ‘ओह श्रीमान, सुना हैं कि श्रमण गौतम अमुक गाँव या नगर में पधारने वाले हैं।’ तब वे (तरह-तरह के) प्रश्न बुनते हैं, ‘हम जाकर श्रमण गौतम से ये प्रश्न पूछेंगे! यदि वे उस प्रश्न का उत्तर इस तरह दे, तो हम इस तरह उसका खण्डन करेंगे। और यदि वे उस प्रश्न का उत्तर उस तरह दे, तो हम उस तरह उसका खण्डन करेंगे।’ 4

और वे सुनते हैं, ‘ओह श्रीमान, श्रमण गौतम अमुक गाँव या नगर में पधार चुके हैं।’

तब वे भगवान के पास जाते हैं। और उन्हें भगवान अपने धम्म-कथन से निर्देशित करते हैं, उत्प्रेरित करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं, हर्षित करते हैं। तब भगवान के धम्म-कथन से निर्देशित, उत्प्रेरित, प्रोत्साहित, हर्षित होकर, वे भगवान को प्रश्न तक नहीं पूछ पाते हैं, तो भला खण्डन क्या करेंगे? बल्कि, बिना अपवाद के वे भगवान के श्रावक होकर रह जाते हैं।

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

छठा, सातवा और आठवा कारण

और आगे, भन्ते, मैं ऐसे ब्राह्मणों को…

और आगे, भन्ते, मैं ऐसे गृहस्थों (=वैश्य) को…

और आगे, भन्ते, मैं ऐसे श्रमणों को देखता हूँ, जो पण्डित हैं, निपुण हैं, शास्त्रार्थ में माहिर हैं, बाल की खाल निकालने वाले हैं, और अन्तर्ज्ञान से दूसरे की धारणाओं की चीर-फाड़ करते घूमते हैं।

वे सुनते हैं, ‘ओह श्रीमान, सुना हैं कि श्रमण गौतम अमुक गाँव या नगर में पधारने वाले हैं।’ तब वे प्रश्न बुनते हैं, ‘हम जाकर श्रमण गौतम से ये प्रश्न पूछेंगे! यदि वे उस प्रश्न का उत्तर इस तरह दे, तो हम इस तरह उसका खण्डन करेंगे। और यदि वे उस प्रश्न का उत्तर उस तरह दे, तो हम उस तरह उसका खण्डन करेंगे।’

और वे सुनते हैं, ‘ओह श्रीमान, श्रमण गौतम अमुक गाँव या नगर में पधार चुके हैं।’

तब वे भगवान के पास जाते हैं। और उन्हें भगवान अपने धम्म-कथन से निर्देशित करते हैं, उत्प्रेरित करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं, हर्षित करते हैं। तब भगवान के धम्म-कथन से निर्देशित, उत्प्रेरित, प्रोत्साहित, हर्षित होकर, वे भगवान को प्रश्न तक नहीं पूछ पाते हैं, तो भला खण्डन क्या करेंगे? बल्कि, बिना अपवाद के वे घर से बेघर होकर भगवान से प्रवज्या की याचना करते हैं। और भगवान उन्हें प्रवज्या देते हैं।

तब प्रव्रज्यित होकर अधिक समय नहीं बीतता है, जब वे निर्लिप्त-एकांतवास लेकर फ़िक्रमन्द, सचेत और दृढ़निश्चयी होकर रहते हुए, जिस ध्येय से कोई कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होता है, वे उस ब्रह्मचर्य की सर्वोच्च मंज़िल पर पहुँचकर, इसी जीवन में स्वयं जान कर, साक्षात्कार कर विहार करते हैं।

वे कहते हैं, ‘ओह भाई, हम तो मानो खोए हुए थे! हम तो मानो बर्बाद ही थे! हम पहले श्रमण न होकर भी खुद को श्रमण समझते थे! ब्राह्मण न होकर भी खुद को ब्राह्मण समझते थे! अरहंत न होकर भी खुद को अरहंत समझते थे! किन्तु, अब हम वाकई श्रमण है! अब हम वाकई ब्राह्मण है! अब हम वाकई अरहंत है!’

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

नौवा कारण

और आगे, भन्ते, मेरे राज-अधिकारी इसिदत्त और पुराण मेरा दिया खाते हैं, मेरे दिए यान की सवारी करते हैं, मैंने ही उन्हें जीविका दी है, उन्हें यशस्वी बनाया है। किन्तु, तब भी उन्हें मेरे प्रति समर्पण-भाव नहीं है, जैसा भगवान के लिए है।

भन्ते, एक बार की बात है—मैं सेना को हमले में आगे बढ़ा रहा था। तब मैंने राज-अधिकारी इसिदत्त और पुराण की जाँच-पड़ताल करने के लिए किसी भीड़-भरे आवास में उनके साथ वास किया। तब, भन्ते, राज-अधिकारी इसिदत्त और पुराण ने अधिकांश रात धम्म-चर्चा में बिता दी, और फिर भगवान की दिशा में सिर कर के, और मेरी दिशा में पैर कर के सो गए।

तब, भन्ते, मुझे लगा, ‘आश्चर्य है, श्रीमान! अद्भुत है, श्रीमान! ये मेरे राज-अधिकारी इसिदत्त और पुराण मेरा दिया खाते हैं, मेरे दिए यान की सवारी करते हैं, मैंने ही उन्हें जीविका दी है, उन्हें यशस्वी बनाया है। किन्तु, तब भी उन्हें मेरे प्रति समर्पण-भाव नहीं है, जैसा भगवान के लिए है। अवश्य, इन आयुष्मानों ने भगवान के शासन में पहले से बड़ी कोई ऊँची और विशेष अवस्था को जान लिया हैं।’ 5

इसलिए, भन्ते, मैं भगवान के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि—‘भगवान ही सम्यक-सम्बुद्ध हैं! भगवान का धम्म स्पष्ट बताया है! भगवान का श्रावकसंघ सुमार्ग पर चलता है!’

दसवा कारण

और आगे, भन्ते, भगवान क्षत्रिय हैं, मैं भी क्षत्रिय हूँ। भगवान कोसल देश के हैं 6, मैं भी कोसल देश का हूँ। भगवान अस्सी वर्ष के हैं, मैं भी अस्सी वर्ष का हूँ। 7

चूंकि भगवान क्षत्रिय हैं, मैं भी क्षत्रिय हूँ। भगवान कोसल देश के हैं, मैं भी कोसल देश का हूँ। भगवान अस्सी वर्ष के हैं, मैं भी अस्सी वर्ष का हूँ। इसीलिए, भन्ते, ये उपयुक्त है कि मैं भगवान के प्रति इस प्रकार का परम-समर्पण प्रकट करूँ, स्नेहभाव का प्रदर्शन करूँ।

ठीक है, भन्ते! तब अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं मेरे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”

“तब, महाराज, जिसका समय उचित समझे!”

तब राजा प्रसेनजित कोशल उठकर भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया। 8

तब राजा प्रसेनजित कोशल को जाकर अधिक देर नहीं हुई थी, तब भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं, राजा प्रसेनजित कोशल ने उठकर जाने से पहले धम्म-चैत्य (=धम्म के प्रति श्रद्धांजलि) कहा। भिक्षुओं, इस धम्म-चैत्य को अच्छे से ग्रहण करो। इस धम्म-चैत्य को अच्छे से याद करो। इस धम्म-चैत्य को अच्छे से धारण करो। ये धम्म-चैत्य ब्रह्मचर्य के मूल सार और ध्येय के साथ है।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. इसी जगह पर राजा प्रसेनजित कोशल को भगवान की याद क्यों आयी? क्योंकि, मज्झिमनिकाय १२१ के अनुसार, भगवान ने इसी जगह और इन्हीं वृक्षों के तले शून्यता की साधना की थी। कई जगहों पर भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का अहसास तब भी होता था, और आज भी होता है। ↩︎

  2. इसी प्रकार के परम समर्पण-भाव के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं, जैसे संयुक्तनिकाय ८.९ में कोण्‍डञ्ञ का, संयुक्तनिकाय ७.१५ में ब्राह्मण मानत्थद्ध का, मज्झिमनिकाय ९१ में ब्राह्मण ब्रह्मायु का, और अंगुत्तरनिकाय १०.३० में फिर से राजा प्रसेनजित कोशल का। ↩︎

  3. राजा प्रसेनजित को न्याय करते समय कठिनाई का सामना करना पड़ता था, विशेष रूप से जब वह देखता कि संपन्न ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग के लोग भी झूठ बोलने में कोई संकोच नहीं करते थे। इस कारण उन्होंने न्याय का कार्य छोड़ दिया था। इसका उल्लेख संयुक्तनिकाय ३.७ में किया गया है। ↩︎

  4. ये और अगली बातें मज्झिमनिकाय २७ में भी पायी जाती हैं। ↩︎

  5. इसिदत्त और पुराण दोनों ही, संयुक्तनिकाय ५५.६ और अंगुत्तरनिकाय ६.१२०–१३९ के अनुसार, कम-से-कम श्रोतापति थे। और अंगुत्तरनिकाय ६.४४ और १०.७५ के अनुसार, दोनों ने अनागामी होकर देह त्यागा। और राजा प्रसेनजित का अपने कनिष्ठ अधिकारियों के लिए ‘आयुष्मान’ शब्द का उपयोग करना, यह संकेत करता है कि वह उनके लिए उसी आदर और सम्मान के साथ पात्र थे, जैसा कि आर्यफल प्राप्त भिक्षु हो। ↩︎

  6. सुत्तनिपात ३.१ के अनुसार शाक्य गणराज्य राजनीतिक रूप से कोसल देश के अधीन था। शाक्य लोग भले ही अपने आंतरिक मामलों में स्वायत्त थे, परंतु वे कोसल राजा की सर्वोच्च सत्ता को मानते थे। यह संबंध उस समय की जनपदीय-सामंती संसंस्कार को भी स्पष्ट करता है। ↩︎

  7. अर्थात, यह सूत्र भगवान के महापरिनिर्वाण के अंतिम वर्ष घटित हुआ होगा। ↩︎

  8. इस सूत्र और इसके समानान्तर स्रोतों में राजा प्रसेनजित कोशल का भगवान से केवल भक्तिभावपूर्वक मिलने का ही संकेत मिलता है। लेकिन एक परंपरा कहती है कि इसी घटना के बाद राजा प्रसेनजित का पतन आरम्भ हुआ। कथानुसार, राजा को ले जाने वाले ‘दीघ कारायन’ ने प्रसेनजित को इस बात के लिए दोषी ठहराया कि उनके चाचा—पूर्व सेनापति बन्धुल—की मृत्यु का कारण वही थे। प्रतिशोधवश उसने राजचिह्न चुरा लिया और प्रसेनजित के लहरी राजकुमार ‘विडूढभ’ को सिंहासन पर बिठा दिया।

    एकाकी और निराश राजा प्रसेनजित फिर शरण की आशा में अपने भतीजे अजातशत्रु के पास राजगृह की ओर निकले, किन्तु देर से पहुँचे और नगर-द्वार के बाहर ही रात्रि बिताते हुए उनका वहीं निधन हो गया। इस कथा के विवरण कई प्रश्न उठाते हैं—वे अपने विश्वसनीय शाक्य मित्रों के पास जाने के बजाय अविश्वसनीय अजातशत्रु की ओर, वह भी लगभग पाँच सौ किलोमीटर दूर, क्यों गए? और तत्पश्चात एक पहरेदार ने सहायता करने के स्थान पर उन्हें नगर के बाहर ही क्यों रोक दिया?

    फिर भी, इन विसंगतियों के बावजूद, इस विचित्र कथा का मूल रूप केवल पालि साहित्य में ही नहीं, बल्कि अनेक अन्य परम्पराओं में भी समान रूप से विद्यमान है। ↩︎

पालि

३६४. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सक्केसु विहरति मेदाळुपं [मेतळूपं (सी.), मेदळुम्पं (पी.)] नाम सक्यानं निगमो. तेन खो पन समयेन राजा पसेनदि कोसलो नगरकं अनुप्पत्तो होति केनचिदेव करणीयेन. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो दीघं कारायनं आमन्तेसि – ‘‘योजेहि, सम्म कारायन, भद्रानि भद्रानि यानानि, उय्यानभूमिं गच्छाम सुभूमिं दस्सनाया’’ति [सुभूमिदस्सनायाति (दी. नि. २.४३)]. ‘‘एवं, देवा’’ति खो दीघो कारायनो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिस्सुत्वा भद्रानि भद्रानि यानानि योजापेत्वा रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिवेदेसि – ‘‘युत्तानि खो ते, देव, भद्रानि भद्रानि यानानि. यस्सदानि कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भद्रं यानं अभिरुहित्वा भद्रेहि भद्रेहि यानेहि नगरकम्हा निय्यासि महच्चा राजानुभावेन. येन आरामो तेन पायासि. यावतिका यानस्स भूमि यानेन गन्त्वा याना पच्चोरोहित्वा पत्तिकोव आरामं पाविसि. अद्दसा खो राजा पसेनदि कोसलो आरामे जङ्घाविहारं अनुचङ्कममानो अनुविचरमानो रुक्खमूलानि पासादिकानि पसादनीयानि अप्पसद्दानि अप्पनिग्घोसानि विजनवातानि मनुस्सराहस्सेय्यकानि [मनुस्सराहसेय्यकानि (सी. पी.)] पटिसल्लानसारुप्पानि. दिस्वान भगवन्तंयेव आरब्भ सति उदपादि – ‘‘इमानि खो तानि रुक्खमूलानि पासादिकानि पसादनीयानि अप्पसद्दानि अप्पनिग्घोसानि विजनवातानि मनुस्सराहस्सेय्यकानि पटिसल्लानसारुप्पानि, यत्थ सुदं मयं तं भगवन्तं पयिरुपासाम अरहन्तं सम्मासम्बुद्ध’’न्ति.

३६५. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो दीघं कारायनं आमन्तेसि – ‘‘इमानि खो, सम्म कारायन, तानि रुक्खमूलानि पासादिकानि पसादनीयानि अप्पसद्दानि अप्पनिग्घोसानि विजनवातानि मनुस्सराहस्सेय्यकानि पटिसल्लानसारुप्पानि, यत्थ सुदं मयं तं भगवन्तं पयिरुपासाम अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं. कहं नु खो, सम्म कारायन, एतरहि सो भगवा विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति? ‘‘अत्थि, महाराज, मेदाळुपं नाम सक्यानं निगमो. तत्थ सो भगवा एतरहि विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति. ‘‘कीवदूरे [कीवदूरो (सी. स्या. कं. पी.)] पन, सम्म कारायन , नगरकम्हा मेदाळुपं नाम सक्यानं निगमो होती’’ति? ‘‘न दूरे, महाराज; तीणि योजनानि; सक्का दिवसावसेसेन गन्तु’’न्ति. ‘‘तेन हि, सम्म कारायन, योजेहि भद्रानि भद्रानि यानानि, गमिस्साम मयं तं भगवन्तं दस्सनाय अरहन्तं सम्मासम्बुद्ध’’न्ति. ‘‘एवं, देवा’’ति खो दीघो कारायनो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिस्सुत्वा भद्रानि भद्रानि यानानि योजापेत्वा रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिवेदेसि – ‘‘युत्तानि खो ते, देव, भद्रानि भद्रानि यानानि. यस्सदानि कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भद्रं यानं अभिरुहित्वा भद्रेहि भद्रेहि यानेहि नगरकम्हा येन मेदाळुपं नाम सक्यानं निगमो तेन पायासि. तेनेव दिवसावसेसेन मेदाळुपं नाम सक्यानं निगमं सम्पापुणि. येन आरामो तेन पायासि. यावतिका यानस्स भूमि यानेन गन्त्वा याना पच्चोरोहित्वा पत्तिकोव आरामं पाविसि.

३६६. तेन खो पन समयेन सम्बहुला भिक्खू अब्भोकासे चङ्कमन्ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो येन ते भिक्खू तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा ते भिक्खू एतदवोच – ‘‘कहं नु खो, भन्ते, एतरहि सो भगवा विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो? दस्सनकामा हि मयं तं भगवन्तं अरहन्तं सम्मासम्बुद्ध’’न्ति. ‘‘एसो, महाराज, विहारो संवुतद्वारो. तेन अप्पसद्दो उपसङ्कमित्वा अतरमानो आळिन्दं पविसित्वा उक्कासित्वा अग्गळं आकोटेहि. विवरिस्सति भगवा ते द्वार’’न्ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो तत्थेव खग्गञ्च उण्हीसञ्च दीघस्स कारायनस्स पादासि. अथ खो दीघस्स कारायनस्स एतदहोसि – ‘‘रहायति खो दानि राजा [महाराजा (सी. स्या. कं. पी.)], इधेव [तेनिधेव (सी.)] दानि मया ठातब्ब’’न्ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो येन सो विहारो संवुतद्वारो तेन अप्पसद्दो उपसङ्कमित्वा अतरमानो आळिन्दं पविसित्वा उक्कासित्वा अग्गळं आकोटेसि. विवरि भगवा द्वारं. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो विहारं पविसित्वा भगवतो पादेसु सिरसा निपतित्वा भगवतो पादानि मुखेन च परिचुम्बति, पाणीहि च परिसम्बाहति, नामञ्च सावेति – ‘‘राजाहं, भन्ते, पसेनदि कोसलो; राजाहं, भन्ते, पसेनदि कोसलो’’ति.

३६७. ‘‘किं पन त्वं, महाराज, अत्थवसं सम्पस्समानो इमस्मिं सरीरे एवरूपं परमनिपच्चकारं करोसि, मित्तूपहारं [चित्तूपहारं (सी.)] उपदंसेसी’’ति? ‘‘अत्थि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो – ‘होति सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति. इधाहं, भन्ते, पस्सामि एके समणब्राह्मणे परियन्तकतं ब्रह्मचरियं चरन्ते दसपि वस्सानि, वीसम्पि वस्सानि, तिंसम्पि वस्सानि, चत्तारीसम्पि वस्सानि. ते अपरेन समयेन सुन्हाता सुविलित्ता कप्पितकेसमस्सू पञ्चहि कामगुणेहि समप्पिता समङ्गीभूता परिचारेन्ति. इध पनाहं, भन्ते, भिक्खू पस्सामि यावजीवं आपाणकोटिकं परिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं चरन्ते. न खो पनाहं, भन्ते, इतो बहिद्धा अञ्ञं एवं परिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं समनुपस्सामि. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’’ति.

३६८. ‘‘पुन चपरं, भन्ते, राजानोपि राजूहि विवदन्ति, खत्तियापि खत्तियेहि विवदन्ति, ब्राह्मणापि ब्राह्मणेहि विवदन्ति, गहपतयोपि गहपतीहि विवदन्ति, मातापि पुत्तेन विवदति, पुत्तोपि मातरा विवदति, पितापि पुत्तेन विवदति, पुत्तोपि पितरा विवदति, भातापि भगिनिया विवदति , भगिनीपि भातरा विवदति, सहायोपि सहायेन विवदति. इध पनाहं, भन्ते, भिक्खू पस्सामि समग्गे सम्मोदमाने अविवदमाने खीरोदकीभूते अञ्ञमञ्ञं पियचक्खूहि सम्पस्सन्ते विहरन्ते. न खो पनाहं, भन्ते, इतो बहिद्धा अञ्ञं एवं समग्गं परिसं समनुपस्सामि. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति.

३६९. ‘‘पुन चपराहं, भन्ते, आरामेन आरामं, उय्यानेन उय्यानं अनुचङ्कमामि अनुविचरामि. सोहं तत्थ पस्सामि एके समणब्राह्मणे किसे लूखे दुब्बण्णे उप्पण्डुप्पण्डुकजाते धमनिसन्थतगत्ते, न विय मञ्ञे चक्खुं बन्धन्ते जनस्स दस्सनाय. तस्स मय्हं, भन्ते, एतदहोसि – ‘अद्धा इमे आयस्मन्तो अनभिरता वा ब्रह्मचरियं चरन्ति, अत्थि वा तेसं किञ्चि पापं कम्मं कतं पटिच्छन्नं; तथा हि इमे आयस्मन्तो किसा लूखा दुब्बण्णा उप्पण्डुप्पण्डुकजाता धमनिसन्थतगत्ता, न विय मञ्ञे चक्खुं बन्धन्ति जनस्स दस्सनाया’ति. त्याहं उपसङ्कमित्वा एवं वदामि – ‘किं नु खो तुम्हे आयस्मन्तो किसा लूखा दुब्बण्णा उप्पण्डुप्पण्डुकजाता धमनिसन्थतगत्ता, न विय मञ्ञे चक्खुं बन्धथ जनस्स दस्सनाया’ति? ते एवमाहंसु – ‘बन्धुकरोगो नो [पण्डुकरोगिनो (क.)], महाराजा’ति. इध पनाहं, भन्ते, भिक्खू पस्सामि हट्ठपहट्ठे उदग्गुदग्गे अभिरतरूपे पीणिन्द्रिये [पीणितिन्द्रिये (सी. पी.)] अप्पोस्सुक्के पन्नलोमे परदत्तवुत्ते मिगभूतेन चेतसा विहरन्ते. तस्स मय्हं, भन्ते, एतदहोसि – ‘अद्धा इमे आयस्मन्तो तस्स भगवतो सासने उळारं पुब्बेनापरं विसेसं जानन्ति; तथा हि इमे आयस्मन्तो हट्ठपहट्ठा उदग्गुदग्गा अभिरतरूपा पीणिन्द्रिया अप्पोस्सुक्का पन्नलोमा परदत्तवुत्ता मिगभूतेन चेतसा विहरन्ती’ति. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति.

३७०. ‘‘पुन चपराहं, भन्ते, राजा खत्तियो मुद्धावसित्तो; पहोमि घातेतायं वा घातेतुं, जापेतायं वा जापेतुं, पब्बाजेतायं वा पब्बाजेतुं . तस्स मय्हं, भन्ते, अड्डकरणे निसिन्नस्स अन्तरन्तरा कथं ओपातेन्ति. सोहं न लभामि – ‘मा मे भोन्तो अड्डकरणे निसिन्नस्स अन्तरन्तरा कथं ओपातेथ [ओपातेन्तु (सी.) उपरिसेलसुत्ते पन ‘‘ओपातेथा’’तियेव दिस्सति], कथापरियोसानं मे भोन्तो आगमेन्तू’ति. तस्स मय्हं, भन्ते, अन्तरन्तरा कथं ओपातेन्ति. इध पनाहं, भन्ते, भिक्खू पस्सामि; यस्मिं समये भगवा अनेकसताय परिसाय धम्मं देसेति, नेव तस्मिं समये भगवतो सावकानं खिपितसद्दो वा होति उक्कासितसद्दो वा. भूतपुब्बं, भन्ते, भगवा अनेकसताय परिसाय धम्मं देसेति. तत्रञ्ञतरो भगवतो सावको उक्कासि. तमेनं अञ्ञतरो सब्रह्मचारी जण्णुकेन घट्टेसि – ‘अप्पसद्दो आयस्मा होतु, मायस्मा सद्दमकासि; सत्था नो भगवा धम्मं देसेती’ति. तस्स मय्हं, भन्ते, एतदहोसि – ‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो! अदण्डेन वत किर, भो, असत्थेन एवं सुविनीता परिसा भविस्सती’ति! न खो पनाहं, भन्ते, इतो बहिद्धा अञ्ञं एवं सुविनीतं परिसं समनुपस्सामि. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति.

३७१. ‘‘पुन चपराहं, भन्ते, पस्सामि इधेकच्चे खत्तियपण्डिते निपुणे कतपरप्पवादे वालवेधिरूपे. ते भिन्दन्ता [वोभिन्दन्ता (सी.)] मञ्ञे चरन्ति पञ्ञागतेन दिट्ठिगतानि. ते सुणन्ति – ‘समणो खलु, भो, गोतमो अमुकं नाम गामं वा निगमं वा ओसरिस्सती’ति. ते पञ्हं अभिसङ्खरोन्ति – ‘इमं मयं पञ्हं समणं गोतमं उपसङ्कमित्वा पुच्छिस्साम. एवं चे नो पुट्ठो एवं ब्याकरिस्सति, एवमस्स मयं वादं आरोपेस्साम; एवं चेपि नो पुट्ठो एवं ब्याकरिस्सति, एवम्पिस्स मयं वादं आरोपेस्सामा’ति. ते सुणन्ति – ‘समणो खलु, भो, गोतमो अमुकं नाम गामं वा निगमं वा ओसटो’ति. ते येन भगवा तेनुपसङ्कमन्ति. ते भगवा धम्मिया कथाय सन्दस्सेति समादपेति समुत्तेजेति सम्पहंसेति . ते भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सिता समादपिता समुत्तेजिता सम्पहंसिता न चेव भगवन्तं पञ्हं पुच्छन्ति, कुतो वादं आरोपेस्सन्ति? अञ्ञदत्थु भगवतो सावका सम्पज्जन्ति. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति.

३७२. ‘‘पुन चपराहं, भन्ते, पस्सामि इधेकच्चे ब्राह्मणपण्डिते…पे… गहपतिपण्डिते…पे… समणपण्डिते निपुणे कतपरप्पवादे वालवेधिरूपे. ते भिन्दन्ता मञ्ञे चरन्ति पञ्ञागतेन दिट्ठिगतानि. ते सुणन्ति – ‘समणो खलु, भो, गोतमो अमुकं नाम गामं वा निगमं वा ओसरिस्सती’ति. ते पञ्हं अभिसङ्खरोन्ति – ‘इमं मयं पञ्हं समणं गोतमं उपसङ्कमित्वा पुच्छिस्साम. एवं चे नो पुट्ठो एवं ब्याकरिस्सति, एवमस्स मयं वादं आरोपेस्साम; एवं चेपि नो पुट्ठो एवं ब्याकरिस्सति, एवम्पिस्स मयं वादं आरोपेस्सामा’ति. ते सुणन्ति – ‘समणो खलु, भो, गोतमो अमुकं नाम गामं वा निगमं वा ओसटो’ति. ते येन भगवा तेनुपसङ्कमन्ति. ते भगवा धम्मिया कथाय सन्दस्सेति समादपेति समुत्तेजेति सम्पहंसेति. ते भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सिता समादपिता समुत्तेजिता सम्पहंसिता न चेव भगवन्तं पञ्हं पुच्छन्ति, कुतो वादं आरोपेस्सन्ति? अञ्ञदत्थु भगवन्तंयेव ओकासं याचन्ति अगारस्मा अनगारियं पब्बज्जाय. ते भगवा पब्बाजेति. ते तथापब्बजिता समाना एका वूपकट्ठा अप्पमत्ता आतापिनो पहितत्ता विहरन्ता नचिरस्सेव – यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति तदनुत्तरं – ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरन्ति. ते एवमाहंसु – ‘मनं वत, भो, अनस्साम; मनं वत, भो, पनस्साम’. मयञ्हि पुब्बे अस्समणाव समाना समणाम्हाति पटिजानिम्हा, अब्राह्मणाव समाना ब्राह्मणाम्हाति पटिजानिम्हा, अनरहन्तोव समाना अरहन्ताम्हाति पटिजानिम्हा. ‘इदानि खोम्ह समणा, इदानि खोम्ह ब्राह्मणा, इदानि खोम्ह अरहन्तो’ति. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति.

३७३. ‘‘पुन चपराहं, भन्ते, इमे इसिदत्तपुराणा थपतयो ममभत्ता ममयाना, अहं नेसं जीविकाय [जीवितस्स (सी.), जीविकं (सी. अट्ठ.), जीवितं (स्या. कं. पी. क.)] दाता, यसस्स आहत्ता; अथ च पन नो तथा मयि निपच्चकारं करोन्ति यथा भगवति. भूतपुब्बाहं, भन्ते, सेनं अब्भुय्यातो समानो इमे च इसिदत्तपुराणा थपतयो वीमंसमानो अञ्ञतरस्मिं सम्बाधे आवसथे वासं उपगच्छिं. अथ खो, भन्ते, इमे इसिदत्तपुराणा थपतयो बहुदेव रत्तिं धम्मिया कथाय वीतिनामेत्वा, यतो अहोसि भगवा [अस्सोसुं खो भगवन्तं (सी. स्या. कं. पी.)] ततो सीसं कत्वा मं पादतो करित्वा निपज्जिंसु. तस्स मय्हं, भन्ते, एतदहोसि – ‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो! इमे इसिदत्तपुराणा थपतयो ममभत्ता ममयाना, अहं नेसं जीविकाय दाता, यसस्स आहत्ता; अथ च पन नो तथा मयि निपच्चकारं करोन्ति यथा भगवति. अद्धा इमे आयस्मन्तो तस्स भगवतो सासने उळारं पुब्बेनापरं विसेसं जानन्ती’ति. अयम्पि खो मे, भन्ते, भगवति धम्मन्वयो होति – ‘सम्मासम्बुद्धो भगवा, स्वाक्खातो भगवता धम्मो, सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो’ति.

३७४. ‘‘पुन चपरं, भन्ते, भगवापि खत्तियो, अहम्पि खत्तियो; भगवापि कोसलो, अहम्पि कोसलो; भगवापि आसीतिको, अहम्पि आसीतिको. यम्पि, भन्ते, भगवापि खत्तियो अहम्पि खत्तियो, भगवापि कोसलो अहम्पि कोसलो, भगवापि आसीतिको अहम्पि आसीतिको; इमिनावारहामेवाहं [इमिनापाहं (क.)], भन्ते, भगवति परमनिपच्चकारं कातुं, मित्तूपहारं उपदंसेतुं. हन्द, च दानि मयं, भन्ते, गच्छाम; बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’ति. ‘‘यस्सदानि त्वं, महाराज, कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो उट्ठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामि. अथ खो भगवा अचिरपक्कन्तस्स रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘एसो, भिक्खवे, राजा पसेनदि कोसलो धम्मचेतियानि भासित्वा उट्ठायासना पक्कन्तो. उग्गण्हथ, भिक्खवे, धम्मचेतियानि; परियापुणाथ, भिक्खवे , धम्मचेतियानि; धारेथ, भिक्खवे, धम्मचेतियानि. अत्थसंहितानि, भिक्खवे, धम्मचेतियानि आदिब्रह्मचरियकानी’’ति.

इदमवोच भगवा. अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति.

धम्मचेतियसुत्तं निट्ठितं नवमं.

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