✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

कर्णकत्थल में

सूत्र परिचय

यह सूत्र कुछ असंयोजित प्रतीत होता है। इसके ऐतिहासिक पात्र अचानक प्रकट होते हैं और फिर ओझल हो जाते हैं। कई व्यक्तियों का उल्लेख अत्यंत संक्षेप में मिलता है। यही कारण है कि सूत्र का प्रवाह वास्तविक जीवन का आभास कराता है जहाँ निरंतर आवक-जावक के बीच सार्थक संवाद बनाए रखना सरल न हो। कथा का मुख्य केंद्र राजा प्रसेनजित कोशल हैं, परंतु सूत्र में उनके पुत्र विडूढभ सेनापति की भूमिका भी पर्याप्त महत्त्व रखती है।

विडूढभ ने आगे चलकर अपने पिता को छलपूर्वक सत्ता से हटाकर कोसल राज्य पर अधिकार कर लिया। उसकी कठोर नीतियों के कारण बाद में शाक्यों का विनाश हुआ और कोशल राज्य का भी पतन आरंभ हुआ। इस सूत्र में उसका संक्षिप्त परिचय ही उसकी कपटशील और धोखेबाज़ प्रवृत्ति को स्पष्ट कर देता है, जहाँ वह एक असुरक्षित, असंतुलित और अपने पिता तक से असत्य बोलने वाले उत्तराधिकारी के रूप में उभरता है। राजमहल के अंतःपुर में फैली अफ़वाहों के स्रोत के विषय में उसका झूठ बोलना इसी वृत्ति को प्रमाणित करता है।

सूत्र में सोमा और सकुला नामक दो बहनें भी आती हैं, जिनके विषय में उपलब्ध जानकारी अत्यंत सीमित है। अट्ठकथा में बताया गया है कि दोनों का विवाह राजा प्रसेनजित से हुआ था और वे रानियाँ थीं। तथापि, उन्हें ‘देवी’ संबोधन न दिया जाना इस विवरण को संदिग्ध बनाता है। फिर भी, प्रमुख महारानी मल्लिका देवी की भांति वे दोनों भी भगवान बुद्ध के प्रति श्रद्धाभाव रखती थीं।

इस सूत्र की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसी प्रसंग में राजा प्रसेनजित की आयुष्मान आनंद से पहली प्रत्यक्ष भेंट होती है। इससे पूर्व के सूत्र—मज्झिमनिकाय ८८—में राजा प्रसेनजित भन्ते आनंद को केवल दूर से पहचानते हैं और उनसे संवाद करने की इच्छा प्रकट करते हैं। यह संकेत देता है कि आयुष्मान आनंद के प्रति उनके परिचय और सम्मान का आरंभ इसी प्रारंभिक साक्षात्कार से हुआ।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान उरुञ्ञा के कण्णकत्थल मृगवन में विहार कर रहे थे। उस समय राजा प्रसेनजित कोशल उरुञ्ञा में किसी कार्य से उरुञ्ञा में पहुँचा था।

तब राजा प्रसेनजित (“पसेनदि”) कोशल ने किसी पुरुष को आमंत्रित किया, “यहाँ आओ, भले पुरुष, भगवान के पास जाओ, और जाकर मेरी ओर से भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछना, ‘भन्ते, राजा प्रसेनजित कोशल भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछते हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?’

और तब कहना, ‘भन्ते, आज राजा प्रसेनजित कोशल सुबह नाश्ता करने के पश्चात भगवान के दर्शन के लिए आएँगे।'"

“ठीक है, देव!” उस पुरुष ने राजा प्रसेनजित कोशल को उत्तर दिया, और भगवान के पास गया, और जाकर भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर कहा, “भन्ते, राजा प्रसेनजित कोशल भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछते हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?" और कहा, “भन्ते, आज राजा प्रसेनजित कोशल सुबह नाश्ता करने के पश्चात भगवान के दर्शन के लिए आएँगे।”

तब ये सोमा और सकुला बहनों ने सुना, ‘आज राजा प्रसेनजित कोशल सुबह नाश्ता करने के पश्चात भगवान के दर्शन के लिए जाएँगे।’ तब वे सोमा और सकुला, दोनों बहने राजा प्रसेनजित कोशल के पास गयी, जब उन्हें सुबह का नाश्ता दिया जा रहा था, और कहा, “महाराज, हमारी ओर से भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछना, ‘भन्ते, सोमा और सकुला बहने भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछती हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?’”

तब, राजा प्रसेनजित कोशल सुबह नाश्ता करने के पश्चात भगवान के पास गया, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर राजा प्रसेनजित कोशल ने भगवान से कहा, “भन्ते, सोमा और सकुला बहने भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछती हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?”

“किन्तु, महाराज, क्या सोमा और सकुला बहनों को कोई अन्य दूत नहीं मिला?”

“भन्ते, ऐसा हुआ कि सोमा और सकुला बहनों ने सुना, ‘आज राजा प्रसेनजित कोशल सुबह नाश्ता करने के पश्चात भगवान के दर्शन के लिए जाएँगे।’ तब, सोमा और सकुला, दोनों बहने मेरे पास आयी, जब मुझे सुबह का नाश्ता दिया जा रहा था, और कहा, “महाराज, हमारी ओर से भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछना, ‘भन्ते, सोमा और सकुला बहने भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर हालचाल पूछती हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?’”

“सोमा और सकुला बहने सुखी रहें, महाराज!”

सर्वज्ञ सर्वदर्शी

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने भगवान से कहा, “भन्ते, मैंने सुना कि श्रमण गोतम कहते हैं—‘कोई भी श्रमण या ब्राह्मण सर्वज्ञ, सर्वदर्शी होने, बिना किसी अपवाद के ज्ञान-दर्शन का दावा करे, यह संभव नहीं है।’ भन्ते, जो ऐसा कहते हैं, क्या वे भगवान के ही शब्द दोहराते हैं? कहीं तथ्यहीन बातों से भगवान का मिथ्यावर्णन तो नहीं करते? क्या वे धम्मानुरूप ही बोलते हैं, ताकि कोई सहधार्मिक व्यक्ति के पास आलोचना की गुंजाइश न रहे?”

“महाराज, जो ऐसा कहते हैं—‘श्रमण गोतम कहते हैं कि कोई भी श्रमण या ब्राह्मण सर्वज्ञ, सर्वदर्शी होने, बिना किसी अपवाद के ज्ञान-दर्शन का दावा करे, यह संभव नहीं है’—वे मेरे शब्द नहीं दोहराते हैं, बल्कि तथ्यहीन और झूठे शब्दों से मेरा मिथ्यावर्णन करते हैं।”

तब, राजा प्रसेनजित कोशल ने विडूढभ (“विटटूभ”) सेनापति को आमंत्रित किया, “सेनापति, किसने इस चर्चा को राजमहल के अंतःपुर में आरंभ किया?”

“महाराज, सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र ने।”

तब, राजा प्रसेनजित कोशल ने किसी पुरुष को आमंत्रित किया, “यहाँ आओ, भले पुरुष, मेरे नाम से सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र को आमंत्रित करो, ‘आदरणीय, राजा प्रसेनजित कोशल आपको आमंत्रित करते हैं।’”

“ठीक है, देव।” उस पुरुष ने राजा प्रसेनजित कोशल को उत्तर देकर सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र के पास गया, और जाकर सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र से कहा, “आदरणीय, राजा प्रसेनजित कोशल आपको आमंत्रित करते हैं।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने भगवान से कहा, “भन्ते, क्या ऐसा हुआ होगा कि भगवान ने किसी दूसरे विषय पर कुछ कहा होगा, और उस व्यक्ति ने कुछ दूसरा समझ लिया। तब, भन्ते, भगवान को क्या कहना याद हैं?”

“महाराज, मुझे यह कहना याद है, ‘कोई श्रमण या ब्राह्मण एक बार में सब जान लेगा, सब देख लेगा, यह संभव नहीं।’”

“भगवान का कहना कारण-संगत लगता है, भन्ते। भगवान का कहना तर्क-संगत लगता है—‘कोई श्रमण या ब्राह्मण एक बार में सब जान लेगा, सब देख लेगा, यह संभव नहीं।’ भन्ते, चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, और शूद्र। क्या इन चार वर्णों में कोई विशेष फर्क है?”

चार वर्ण

“महाराज, जो चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, और शूद्र। उन चार वर्णों में दो वर्ण अग्र कहे जाते हैं—क्षत्रिय और ब्राह्मण—केवल अभिवादन करने में, दूसरों के लिए उठने में, हाथ जोड़कर प्रणाम करने में, उचित प्रकार का शिष्टाचार करने में।”

“नहीं, भन्ते, मैं भगवान से इस जीवन के बारे में नहीं पूछ रहा हूँ। बल्कि मैं भगवान से अगले जीवन के बारे में पूछ रहा हूँ कि, भन्ते, चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, और शूद्र। क्या इन चार वर्णों में कोई विशेष फर्क है?”

परिश्रम के पाँच अंग

“महाराज, परिश्रम करने के पाँच अंग हैं। कौन से पाँच?

  • किसी भिक्षु को श्रद्धा होती है। वह तथागत के बोधि के प्रति आश्वस्त होता है, ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’
  • वह निरोगी होता है—बिना पीड़ा के, जिसकी पाचनक्रिया सम रहती है, न बहुत शीतल, न बहुत उष्ण, परिश्रम करने के लिए उपयुक्त!
  • वह सच्चा और ईमानदार होता है—वह जैसा यथास्वरूप हो, वैसा ही स्वयं को शास्ता या समझदार सब्रह्मचारी के सामने उजागर करता है।
  • वह वीर्य जगाकर रहता है—अकुशल स्वभाव को त्यागने के लिए, और कुशल स्वभाव को धारण करने के लिए। वह निश्चयबद्ध, दृढ़, और पराक्रमी होता है। कुशल स्वभाव के प्रति कर्तव्य से जी नहीं चुराता।
  • वह प्रज्ञावान होता है—आर्य और भेदक अन्तर्ज्ञान, उदय-व्यय पता लगने योग्य, दुःखों का सम्यक अंतकर्ता।

—ये परिश्रम करने के पाँच अंग हैं, महाराज। और, महाराज, ये जो चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, और शूद्र। यदि चारों इन पाँच परिश्रम करने के गुणों से युक्त हो, तो वह उनके दीर्घकाल के लिए हितकारक और सुखदायी होगा।”

“भन्ते, ये जो चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, और शूद्र। यदि चारों इन पाँच परिश्रम करने के गुणों से युक्त हो, तब क्या उनमें कोई विशेष फर्क होगा?”

उपमा

“तब, महाराज, मैं कहता हूँ कि वह फर्क उनके परिश्रम करने में होगा। जैसे, महाराज, दो दमनशील हाथी, दो दमनशील घोड़े, या दो दमनशील बैल की जोड़ी हो, जो अच्छे से काबू हो चुकी, अच्छे से अभ्यस्त हो चुकी हो। और दूसरी ओर, दो दमनशील हाथी, दो दमनशील घोड़े, या दो दमनशील बैलों की जोड़ी हो, जो अच्छे से काबू न हुई, अच्छे से अभ्यस्त न हुई हो।

तब क्या लगता है, महाराज? जो दो दमनशील हाथी, दो दमनशील घोड़े, या दो दमनशील बैलों की जोड़ी, जो अच्छे से काबू हो चुकी, अच्छे से अभ्यस्त हो चुकी हो, क्या वे दमनशील कार्यों को पूरा करेंगे, दमनशीलता की अवस्था प्राप्त करेंगे?”

“हाँ, भन्ते।”

“किन्तु, जो दो दमनशील हाथी, दो दमनशील घोड़े, या दो दमनशील बैलों की जोड़ी हो, जो अच्छे से काबू न हुई, अच्छे से अभ्यस्त न हुई हो, क्या वे दमनशील कार्यों को उसी तरह पूरा करेंगे, दमनशीलता की उसी अवस्था को प्राप्त करेंगे, जिस तरह जो जोड़ी अच्छे से काबू हो चुकी, अच्छे से अभ्यस्त हो चुकी हो?”

“नहीं, भन्ते।”

“उसी तरह, महाराज, जो बात श्रद्धा से, निरोगी होकर, सच्चाई और ईमानदारी से, वीर्य जगाकर, प्रज्ञावान होकर प्राप्त की जाती हैं, उसे बिना श्रद्धा से, बहुरोगी होकर, ठग और धोखेबाज़ी से, निट्ठला और दुष्प्रज्ञ होकर प्राप्त हो—यह असंभव है।”

“भन्ते, भगवान का कहना कारण-संगत लगता है। भन्ते, भगवान का कहना तर्क-संगत लगता है। भन्ते, ये जो चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, और शूद्र। यदि चारों इन पाँच परिश्रम करने के गुणों से युक्त हो, और वे सम्यक परिश्रम भी करें, तब क्या उनमें कोई विशेष फर्क होगा?”

“तब, महाराज, मैं कहता हूँ कि उनकी विमुक्ति में कोई फर्क नहीं होगा। जैसे, महाराज, कोई पुरुष सागौन की सूखी लकड़ी लेकर आग जलाकर अग्नि उत्पन्न करता है। कोई दूसरा पुरुष शाल की सूखी लकड़ी लेकर आग जलाकर अग्नि उत्पन्न करता है। कोई दूसरा पुरुष आम की सूखी लकड़ी लेकर आग जलाकर अग्नि उत्पन्न करता है। कोई दूसरा पुरुष गुच्छेदार अंजीर की सूखी लकड़ी लेकर आग जलाकर अग्नि उत्पन्न करता है। तब क्या लगता है, महाराज? क्या उन भिन्न-भिन्न लकड़ियों की आँच में कोई फर्क होगा, रंग-रूप में कोई फर्क होगा, आभा में कोई फर्क होगा?”

“नहीं, भन्ते।”

“उसी तरह, महाराज, जैसे वीर्य से जलाकर परिश्रम करने पर अग्नि पैदा होती है, उसी तरह उनकी विमुक्ति-विमुक्ति में कोई फर्क नहीं होता है।”

देवता

“भन्ते, भगवान का कहना कारण-संगत लगता है। भन्ते, भगवान का कहना तर्क-संगत लगता है। किन्तु, भन्ते, क्या देवता होते हैं?”

“क्यों, महाराज, ऐसा क्यों पूछा, ‘किन्तु, भन्ते, क्या देवता होते हैं?’”

“भन्ते, क्या देवता यहाँ (इस लोक में) लौटते हैं, या नहीं लौटते?”

“जो देवता पीड़ित हो, महाराज, वे देवता लौटते हैं। और जो देवता पीड़ित न हो, वे देवता नहीं लौटते हैं।”

जब ऐसा कहा गया, तब विडूढभ सेनापति ने भगवान से कहा, “भन्ते, जो पीड़ित देवता यहाँ लौटते हैं, क्या वे उन पीड़ारहित, न लौटने वाले देवताओं को उनके स्थान से च्युत करते, या निष्कासित करते हैं?”

तब आयुष्मान आनन्द को लगा, “यह विडूढभ सेनापति राजा प्रसेनजित कोशल का पुत्र है। मैं भगवान का पुत्र हूँ। यही समय है जब पुत्र पुत्र की मंत्रणा करे।”

तब आयुष्मान आनन्द ने विडूढभ सेनापति को आमंत्रित किया, “ठीक है, सेनापति, मैं तुमसे प्रतिप्रश्न करता हूँ। जैसा तुम्हें लगे, वैसा उत्तर दो। क्या लगता है, सेनापति? जहाँ तक राजा प्रसेनजित कोशल का राजशासन फैला है, जहाँ तक राजा प्रसेनजित कोशल ऐश्वर्य और आधिपत्य चलता है, क्या वहाँ तक राजा प्रसेनजित कोशल किसी भी श्रमण या ब्राह्मण को, चाहे वह पुण्यवान हो या अपुण्यवान, चाहे ब्रह्मचर्य पालन करता हो, या अब्रह्मचर्य पालन करता हो, उसके स्थान से च्युत कर सकते हैं, या निष्कासित कर सकते हैं?”

“हाँ, श्रीमान! जहाँ तक राजा प्रसेनजित कोशल का राजशासन फैला है, जहाँ तक राजा प्रसेनजित कोशल ऐश्वर्य और आधिपत्य चलता है, वहाँ तक राजा प्रसेनजित कोशल किसी भी श्रमण या ब्राह्मण को, चाहे वह पुण्यवान हो या अपुण्यवान, चाहे ब्रह्मचर्य पालन करता हो, या अब्रह्मचर्य पालन करता हो, उसके स्थान से च्युत कर सकते हैं, या निष्कासित कर सकते हैं।”

“और, क्या लगता है, सेनापति? जहाँ राजा प्रसेनजित कोशल का राजशासन नहीं फैला है, जहाँ राजा प्रसेनजित कोशल ऐश्वर्य और आधिपत्य नहीं चलता है, क्या वहाँ भी राजा प्रसेनजित कोशल किसी भी श्रमण या ब्राह्मण को, चाहे वह पुण्यवान हो या अपुण्यवान, चाहे ब्रह्मचर्य पालन करता हो, या अब्रह्मचर्य पालन करता हो, उसके स्थान से च्युत कर सकते हैं, या निष्कासित कर सकते हैं?”

“नहीं, श्रीमान! जहाँ राजा प्रसेनजित कोशल का राजशासन नहीं फैला है, जहाँ राजा प्रसेनजित कोशल ऐश्वर्य और आधिपत्य नहीं चलता है, वहाँ राजा प्रसेनजित कोशल किसी भी श्रमण या ब्राह्मण को, चाहे वह पुण्यवान हो या अपुण्यवान, चाहे ब्रह्मचर्य पालन करता हो, या अब्रह्मचर्य पालन करता हो, उसके स्थान से च्युत नहीं कर सकते हैं, या निष्कासित नहीं कर सकते हैं।”

“और, क्या लगता है, सेनापति? क्या तुमने तैतीस देवताओं के बारे में सुना है?”

“हाँ, श्रीमान। मैंने तैतीस देवताओं के बारे में सुना है। और राजा प्रसेनजित कोशल ने भी तैतीस देवताओं के बारे में सुना है।”

“तो, क्या लगता है, सेनापति? क्या राजा प्रसेनजित कोशल तैतीस देवताओं को उनके स्थान से च्युत कर सकते हैं, या निष्कासित कर सकते हैं?”

“श्रीमान, जब राजा प्रसेनजित कोशल तैतीस देवताओं को देख तक नहीं सकते, तो भला उन्हें उनके स्थान से कैसे च्युत कर सकते हैं, या कैसे निष्कासित कर सकते हैं?”

“उसी तरह, सेनापति, जो पीड़ित देवता यहाँ लौटते हैं, वे उन पीड़ारहित, न लौटने वाले देवताओं को देख तक नहीं सकते, तो भला उन्हें उनके स्थान से कैसे च्युत कर सकते हैं, या कैसे निष्कासित कर सकते हैं?”

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने भगवान से कहा, “भन्ते, इस भिक्षु का क्या नाम है?”

“आनन्द नाम है, महाराज।”

“श्रीमान आनन्द ही है! श्रीमान का आनन्द रूप ही है! आयुष्मान आनन्द का कहना कारण-संगत लगता है, भन्ते। आयुष्मान आनन्द का कहना तर्क-संगत लगता है, भन्ते। किन्तु, भन्ते, क्या ब्रह्मा होते हैं?”

ब्रह्मा

“क्यों, महाराज, ऐसा क्यों पूछा, ‘किन्तु, भन्ते, क्या ब्रह्मा होते हैं?’”

“भन्ते, क्या ब्रह्मा यहाँ (इस लोक में) लौटते हैं, या नहीं लौटते?”

“जो ब्रह्मा पीड़ित हो, महाराज, वे ब्रह्मा लौटते हैं। और जो ब्रह्मा पीड़ित न हो, वे ब्रह्मा नहीं लौटते हैं।”

तब किसी पुरुष ने राजा प्रसेनजित कोशल से कहा, “महाराज, सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र आ गए।”

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र से कहा, “किसने इस चर्चा को, ब्राह्मण, राजमहल के अंतःपुर में आरंभ किया?”

“महाराज, विडूढभ सेनापति ने।”

विडूढभ सेनापति ने कहा, “महाराज, सञ्जय ब्राह्मण आकाशगोत्र ने।”

तब किसी पुरुष ने राजा प्रसेनजित कोशल को कहा, “महाराज, जाने का समय हुआ!”

तब, राजा प्रसेनजित कोशल ने भगवान से कहा, “भन्ते, मैंने भगवान से सर्वज्ञता के बारे में पूछा, भगवान ने सर्वज्ञता पर उत्तर दिया। जो मुझे अच्छा लगा, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ। मैंने भगवान से चार वर्णों के बारे में पूछा, भगवान ने चार वर्णों पर उत्तर दिया। जो मुझे अच्छा लगा, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ। मैंने भगवान से ऊँचे देवताओं के बारे में पूछा, भगवान ने ऊँचे देवताओं पर उत्तर दिया। जो मुझे अच्छा लगा, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ। मैंने भगवान से ऊँचे ब्रह्मा के बारे में पूछा, भगवान ने ऊँचे ब्रह्मा पर उत्तर दिया। जो मुझे अच्छा लगा, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ। भन्ते, मैंने भगवान से जो भी कुछ पूछा, भगवान ने उन सबका उत्तर दिया। मुझे सब अच्छा लगा, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ। ठीक है, भन्ते! तब अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं मेरे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”

“तब, महाराज, जिसका समय उचित समझें!”

तब राजा प्रसेनजित कोशल ने भगवान की बातों का अभिनन्दन करते हुए, अनुमोदन करते हुए, आसन से उठकर भगवान को अभिवादन करते हुए, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया।

सुत्र समाप्त।

पालि

३७५. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा उरुञ्ञायं [उजुञ्ञायं (सी. पी.), उदञ्ञायं (स्या. कं.)] विहरति कण्णकत्थले मिगदाये. तेन खो पन समयेन राजा पसेनदि कोसलो उरुञ्ञं अनुप्पत्तो होति केनचिदेव करणीयेन. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो अञ्ञतरं पुरिसं आमन्तेसि – ‘‘एहि त्वं, अम्भो पुरिस, येन भगवा तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा मम वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छ – ‘राजा, भन्ते, पसेनदि कोसलो भगवतो पादे सिरसा वन्दति, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छती’ति. एवञ्च वदेहि – ‘अज्ज किर, भन्ते, राजा पसेनदि कोसलो पच्छाभत्तं भुत्तपातरासो भगवन्तं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’’ति. ‘‘एवं, देवा’’ति खो सो पुरिसो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिस्सुत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो सो पुरिसो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘राजा, भन्ते, पसेनदि कोसलो भगवतो पादे सिरसा वन्दति, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छति; एवञ्च वदेति – ‘अज्ज किर भन्ते, राजा पसेनदि कोसलो पच्छाभत्तं भुत्तपातरासो भगवन्तं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’’ति. अस्सोसुं खो सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी – ‘‘अज्ज किर राजा पसेनदि कोसलो पच्छाभत्तं भुत्तपातरासो भगवन्तं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’ति. अथ खो सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी राजानं पसेनदिं कोसलं भत्ताभिहारे उपसङ्कमित्वा एतदवोचुं – ‘‘तेन हि, महाराज, अम्हाकम्पि वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छ – ‘सोमा च, भन्ते, भगिनी सकुला च भगिनी भगवतो पादे सिरसा वन्दति, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छती’’’ति.

३७६. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो पच्छाभत्तं भुत्तपातरासो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो राजा पसेनदि कोसलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सोमा च, भन्ते, भगिनी सकुला च भगिनी भगवतो पादे सिरसा वन्दति [वन्दन्ति (सी. स्या. कं. पी.)], अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छती’’ति [पुच्छन्तीति (सी. स्या. कं. पी.)]. ‘‘किं पन, महाराज, सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी अञ्ञं दूतं नालत्थु’’न्ति? ‘‘अस्सोसुं खो, भन्ते, सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी – ‘अज्ज किर राजा पसेनदि कोसलो पच्छाभत्तं भुत्तपातरासो भगवन्तं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’ति. अथ खो, भन्ते, सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी मं भत्ताभिहारे उपसङ्कमित्वा एतदवोचुं – ‘तेन हि, महाराज, अम्हाकम्पि वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छ – सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी भगवतो पादे सिरसा वन्दति, अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छती’’’ति. ‘‘सुखिनियो होन्तु ता, महाराज, सोमा च भगिनी सकुला च भगिनी’’ति.

३७७. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सुतं मेतं, भन्ते, समणो गोतमो एवमाह – ‘नत्थि सो समणो वा ब्राह्मणो वा यो सब्बञ्ञू सब्बदस्सावी अपरिसेसं ञाणदस्सनं पटिजानिस्सति, नेतं ठानं विज्जती’ति. ये ते, भन्ते, एवमाहंसु – ‘समणो गोतमो एवमाह – नत्थि सो समणो वा ब्राह्मणो वा यो सब्बञ्ञू सब्बदस्सावी अपरिसेसं ञाणदस्सनं पटिजानिस्सति, नेतं ठानं विज्जती’ति; कच्चि ते, भन्ते, भगवतो वुत्तवादिनो, न च भगवन्तं अभूतेन अब्भाचिक्खन्ति, धम्मस्स चानुधम्मं ब्याकरोन्ति, न च कोचि सहधम्मिको वादानुवादो गारय्हं ठानं आगच्छती’’ति? ‘‘ये ते, महाराज, एवमाहंसु – ‘समणो गोतमो एवमाह – नत्थि सो समणो वा ब्राह्मणो वा यो सब्बञ्ञू सब्बदस्सावी अपरिसेसं ञाणदस्सनं पटिजानिस्सति, नेतं ठानं विज्जती’ति; न मे ते वुत्तवादिनो, अब्भाचिक्खन्ति च पन मं ते असता अभूतेना’’ति.

३७८. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो विडूढभं सेनापतिं आमन्तेसि – ‘‘को नु खो, सेनापति, इमं कथावत्थुं राजन्तेपुरे अब्भुदाहासी’’ति? ‘‘सञ्जयो, महाराज, ब्राह्मणो आकासगोत्तो’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो अञ्ञतरं पुरिसं आमन्तेसि – ‘‘एहि त्वं , अम्भो पुरिस, मम वचनेन सञ्जयं ब्राह्मणं आकासगोत्तं आमन्तेहि – ‘राजा तं, भन्ते, पसेनदि कोसलो आमन्तेती’’’ति. ‘‘एवं, देवा’’ति खो सो पुरिसो रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पटिस्सुत्वा येन सञ्जयो ब्राह्मणो आकासगोत्तो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा सञ्जयं ब्राह्मणं आकासगोत्तं एतदवोच – ‘‘राजा तं, भन्ते, पसेनदि कोसलो आमन्तेती’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सिया नु खो, भन्ते, भगवता अञ्ञदेव किञ्चि सन्धाय भासितं, तञ्च जनो अञ्ञथापि पच्चागच्छेय्य [पच्चागच्छेय्याति, अभिजानामि महाराज वाचं भासिताति (सी.)]. यथा कथं पन, भन्ते, भगवा अभिजानाति वाचं भासिता’’ति? ‘‘एवं खो अहं, महाराज, अभिजानामि वाचं भासिता – ‘नत्थि सो समणो वा ब्राह्मणो वा यो सकिदेव सब्बं ञस्सति, सब्बं दक्खिति, नेतं ठानं विज्जती’’’ति. ‘‘हेतुरूपं, भन्ते, भगवा आह; सहेतुरूपं, भन्ते, भगवा आह – ‘नत्थि सो समणो वा ब्राह्मणो वा यो सकिदेव सब्बं ञस्सति, सब्बं दक्खिति, नेतं ठानं विज्जती’’’ति. ‘‘चत्तारोमे, भन्ते, वण्णा – खत्तिया, ब्राह्मणा, वेस्सा, सुद्दा. इमेसं नु खो, भन्ते, चतुन्नं वण्णानं सिया विसेसो सिया नानाकरण’’न्ति? ‘‘चत्तारोमे, महाराज, वण्णा – खत्तिया, ब्राह्मणा, वेस्सा, सुद्दा. इमेसं खो, महाराज, चतुन्नं वण्णानं द्वे वण्णा अग्गमक्खायन्ति – खत्तिया च ब्राह्मणा च – यदिदं अभिवादनपच्चुट्ठानअञ्जलिकम्मसामीचिकम्मानी’’ति [सामिचिकम्मानन्ति (सी.)]. ‘‘नाहं, भन्ते, भगवन्तं दिट्ठधम्मिकं पुच्छामि; सम्परायिकाहं, भन्ते, भगवन्तं पुच्छामि. चत्तारोमे, भन्ते, वण्णा – खत्तिया, ब्राह्मणा, वेस्सा, सुद्दा. इमेसं नु खो, भन्ते, चतुन्नं वण्णानं सिया विसेसो सिया नानाकरण’’न्ति?

३७९. ‘‘पञ्चिमानि, महाराज, पधानियङ्गानि. कतमानि पञ्च? इध, महाराज, भिक्खु सद्धो होति, सद्दहति तथागतस्स बोधिं – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति; अप्पाबाधो होति अप्पातङ्को समवेपाकिनिया गहणिया समन्नागतो नातिसीताय नाच्चुण्हाय मज्झिमाय पधानक्खमाय; असठो होति अमायावी यथाभूतं अत्तानं आविकत्ता सत्थरि वा विञ्ञूसु वा सब्रह्मचारीसु; आरद्धवीरियो विहरति अकुसलानं धम्मानं पहानाय, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदाय, थामवा दळ्हपरक्कमो अनिक्खित्तधुरो कुसलेसु धम्मेसु; पञ्ञवा होति उदयत्थगामिनिया पञ्ञाय समन्नागतो अरियाय निब्बेधिकाय सम्मादुक्खक्खयगामिनिया – इमानि खो, महाराज, पञ्च पधानियङ्गानि. चत्तारोमे, महाराज, वण्णा – खत्तिया, ब्राह्मणा, वेस्सा, सुद्दा. ते चस्सु इमेहि पञ्चहि पधानियङ्गेहि समन्नागता ; एत्थ पन नेसं अस्स दीघरत्तं हिताय सुखाया’’ति. ‘‘चत्तारोमे, भन्ते, वण्णा – खत्तिया, ब्राह्मणा, वेस्सा, सुद्दा . ते चस्सु इमेहि पञ्चहि पधानियङ्गेहि समन्नागता; एत्थ पन नेसं, भन्ते, सिया विसेसो सिया नानाकरण’’न्ति? ‘‘एत्थ खो नेसाहं, महाराज, पधानवेमत्ततं वदामि. सेय्यथापिस्सु, महाराज, द्वे हत्थिदम्मा वा अस्सदम्मा वा गोदम्मा वा सुदन्ता सुविनीता, द्वे हत्थिदम्मा वा अस्सदम्मा वा गोदम्मा वा अदन्ता अविनीता. तं किं मञ्ञसि, महाराज, ये ते द्वे हत्थिदम्मा वा अस्सदम्मा वा गोदम्मा वा सुदन्ता सुविनीता, अपि नु ते दन्ताव दन्तकारणं गच्छेय्युं, दन्ताव दन्तभूमिं सम्पापुणेय्यु’’न्ति? ‘‘एवं, भन्ते’’. ‘‘ये पन ते द्वे हत्थिदम्मा वा अस्सदम्मा वा गोदम्मा वा अदन्ता अविनीता, अपि नु ते अदन्ताव दन्तकारणं गच्छेय्युं, अदन्ताव दन्तभूमिं सम्पापुणेय्युं, सेय्यथापि ते द्वे हत्थिदम्मा वा अस्सदम्मा वा गोदम्मा वा सुदन्ता सुविनीता’’ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’. ‘‘एवमेव खो, महाराज, यं तं सद्धेन पत्तब्बं अप्पाबाधेन असठेन अमायाविना आरद्धवीरियेन पञ्ञवता तं वत [तं तथा सो (क.)] अस्सद्धो बह्वाबाधो सठो मायावी कुसीतो दुप्पञ्ञो पापुणिस्सतीति – नेतं ठानं विज्जती’’ति.

३८०. ‘‘हेतुरूपं, भन्ते, भगवा आह; सहेतुरूपं, भन्ते, भगवा आह. चत्तारोमे, भन्ते, वण्णा – खत्तिया, ब्राह्मणा, वेस्सा , सुद्दा. ते चस्सु इमेहि पञ्चहि पधानियङ्गेहि समन्नागता ते चस्सु सम्मप्पधाना; एत्थ पन नेसं, भन्ते, सिया विसेसो सिया नानाकरण’’न्ति? ‘‘एत्थ खो [एत्थ खो पन (सी.)] नेसाहं, महाराज, न किञ्चि नानाकरणं वदामि – यदिदं विमुत्तिया विमुत्तिं. सेय्यथापि, महाराज, पुरिसो सुक्खं साककट्ठं आदाय अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्य ; अथापरो पुरिसो सुक्खं सालकट्ठं आदाय अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्य; अथापरो पुरिसो सुक्खं अम्बकट्ठं आदाय अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्य; अथापरो पुरिसो सुक्खं उदुम्बरकट्ठं आदाय अग्गिं अभिनिब्बत्तेय्य, तेजो पातुकरेय्य. तं किं मञ्ञसि, महाराज, सिया नु खो तेसं अग्गीनं नानादारुतो अभिनिब्बत्तानं किञ्चि नानाकरणं अच्चिया वा अच्चिं, वण्णेन वा वण्णं, आभाय वा आभ’’न्ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते’’. ‘‘एवमेव खो, महाराज, यं तं तेजं वीरिया निम्मथितं पधानाभिनिब्बत्तं [विरियं निप्फरति, तं पच्छाभिनिब्बत्तं (सी.)], नाहं तत्थ किञ्चि नानाकरणं वदामि – यदिदं विमुत्तिया विमुत्ति’’न्ति. ‘‘हेतुरूपं, भन्ते, भगवा आह; सहेतुरूपं, भन्ते, भगवा आह. किं पन, भन्ते, अत्थि देवा’’ति? ‘‘किं पन त्वं, महाराज, एवं वदेसि – ‘किं पन, भन्ते, अत्थि देवा’’’ति? ‘‘यदि वा ते, भन्ते, देवा आगन्तारो इत्थत्तं यदि वा अनागन्तारो इत्थत्तं’’? ‘‘ये ते, महाराज, देवा सब्याबज्झा ते देवा आगन्तारो इत्थत्तं, ये ते देवा अब्याबज्झा ते देवा अनागन्तारो इत्थत्त’’न्ति.

३८१. एवं वुत्ते, विट्टूभो सेनापति भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ये ते, भन्ते, देवा सब्याबज्झा आगन्तारो इत्थत्तं ते देवा, ये ते देवा अब्याबज्झा अनागन्तारो इत्थत्तं ते देवे तम्हा ठाना चावेस्सन्ति वा पब्बाजेस्सन्ति वा’’ति?

अथ खो आयस्मतो आनन्दस्स एतदहोसि – ‘‘अयं खो विडूढभो सेनापति रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स पुत्तो; अहं भगवतो पुत्तो. अयं खो कालो यं पुत्तो पुत्तेन मन्तेय्या’’ति. अथ खो आयस्मा आनन्दो विडूढभं सेनापतिं आमन्तेसि – ‘‘तेन हि, सेनापति, तं येवेत्थ पटिपुच्छिस्सामि; यथा ते खमेय्य तथा नं ब्याकरेय्यासि. तं किं मञ्ञसि, सेनापति, यावता रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स विजितं यत्थ च राजा पसेनदि कोसलो इस्सरियाधिपच्चं रज्जं कारेति, पहोति तत्थ राजा पसेनदि कोसलो समणं वा ब्राह्मणं वा पुञ्ञवन्तं वा अपुञ्ञवन्तं वा ब्रह्मचरियवन्तं वा अब्रह्मचरियवन्तं वा तम्हा ठाना चावेतुं वा पब्बाजेतुं वा’’ति? ‘‘यावता, भो, रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स विजितं यत्थ च राजा पसेनदि कोसलो इस्सरियाधिपच्चं रज्जं कारेति, पहोति तत्थ राजा पसेनदि कोसलो समणं वा ब्राह्मणं वा पुञ्ञवन्तं वा अपुञ्ञवन्तं वा ब्रह्मचरियवन्तं वा अब्रह्मचरियवन्तं वा तम्हा ठाना चावेतुं वा पब्बाजेतुं वा’’ति.

‘‘तं किं मञ्ञसि, सेनापति, यावता रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स अविजितं यत्थ च राजा पसेनदि कोसलो न इस्सरियाधिपच्चं रज्जं कारेति, तत्थ पहोति राजा पसेनदि कोसलो समणं वा ब्राह्मणं वा पुञ्ञवन्तं वा अपुञ्ञवन्तं वा ब्रह्मचरियवन्तं वा अब्रह्मचरियवन्तं वा तम्हा ठाना चावेतुं वा पब्बाजेतुं वा’’ति? ‘‘यावता, भो, रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स अविजितं यत्थ च राजा पसेनदि कोसलो न इस्सरियाधिपच्चं रज्जं कारेति, न तत्थ पहोति राजा पसेनदि कोसलो समणं वा ब्राह्मणं वा पुञ्ञवन्तं वा अपुञ्ञवन्तं वा ब्रह्मचरियवन्तं वा अब्रह्मचरियवन्तं वा तम्हा ठाना चावेतुं वा पब्बाजेतुं वा’’ति.

‘‘तं किं मञ्ञसि, सेनापति, सुता ते देवा तावतिंसा’’ति? ‘‘एवं, भो. सुता मे देवा तावतिंसा. इधापि भोता रञ्ञा पसेनदिना कोसलेन सुता देवा तावतिंसा’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, सेनापति, पहोति राजा पसेनदि कोसलो देवे तावतिंसे तम्हा ठाना चावेतुं वा पब्बाजेतुं वा’’ति? ‘‘दस्सनम्पि, भो, राजा पसेनदि कोसलो देवे तावतिंसे नप्पहोति, कुतो पन तम्हा ठाना चावेस्सति वा पब्बाजेस्सति वा’’ति? ‘‘एवमेव खो, सेनापति, ये ते देवा सब्याबज्झा आगन्तारो इत्थत्तं ते देवा, ये ते देवा अब्याबज्झा अनागन्तारो इत्थत्तं ते देवे दस्सनायपि नप्पहोन्ति; कुतो पन तम्हा ठाना चावेस्सन्ति वा पब्बाजेस्सन्ति वा’’ति?

३८२. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘कोनामो अयं, भन्ते, भिक्खू’’ति? ‘‘आनन्दो नाम, महाराजा’’ति. ‘‘आनन्दो वत, भो, आनन्दरूपो वत, भो! हेतुरूपं, भन्ते , आयस्मा आनन्दो आह; सहेतुरूपं, भन्ते, आयस्मा आनन्दो आह. किं पन, भन्ते, अत्थि ब्रह्मा’’ति? ‘‘किं पन त्वं, महाराज, एवं वदेसि – ‘किं पन, भन्ते, अत्थि ब्रह्मा’’’ति? ‘‘यदि वा सो, भन्ते, ब्रह्मा आगन्ता इत्थत्तं, यदि वा अनागन्ता इत्थत्त’’न्ति? ‘‘यो सो, महाराज, ब्रह्मा सब्याबज्झो सो ब्रह्मा आगन्ता इत्थत्तं, यो सो ब्रह्मा अब्याबज्झो सो ब्रह्मा अनागन्ता इत्थत्त’’न्ति. अथ खो अञ्ञतरो पुरिसो राजानं पसेनदिं कोसलं एतदवोच – ‘‘सञ्जयो, महाराज, ब्राह्मणो आकासगोत्तो आगतो’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो सञ्जयं ब्राह्मणं आकासगोत्तं एतदवोच – ‘‘को नु खो, ब्राह्मण, इमं कथावत्थुं राजन्तेपुरे अब्भुदाहासी’’ति? ‘‘विडूढभो, महाराज, सेनापती’’ति. विडूढभो सेनापति एवमाह – ‘‘सञ्जयो, महाराज, ब्राह्मणो आकासगोत्तो’’ति. अथ खो अञ्ञतरो पुरिसो राजानं पसेनदिं कोसलं एतदवोच – ‘‘यानकालो, महाराजा’’ति.

अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सब्बञ्ञुतं मयं, भन्ते, भगवन्तं अपुच्छिम्हा, सब्बञ्ञुतं भगवा ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च, तेन चम्हा अत्तमना. चातुवण्णिसुद्धिं मयं, भन्ते, भगवन्तं अपुच्छिम्हा, चातुवण्णिसुद्धिं भगवा ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च, तेन चम्हा अत्तमना. अधिदेवे मयं, भन्ते, भगवन्तं अपुच्छिम्हा, अधिदेवे भगवा ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च, तेन चम्हा अत्तमना. अधिब्रह्मानं मयं, भन्ते, भगवन्तं अपुच्छिम्हा, अधिब्रह्मानं भगवा ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च, तेन चम्हा अत्तमना. यं यदेव च मयं भगवन्तं अपुच्छिम्हा तं तदेव भगवा ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च, तेन चम्हा अत्तमना. हन्द, च दानि मयं, भन्ते, गच्छाम; बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’ति. ‘‘यस्सदानि त्वं, महाराज, कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो राजा पसेनदि कोसलो भगवतो भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामीति.

कण्णकत्थलसुत्तं निट्ठितं दसमं.

राजवग्गो निट्ठितो चतुत्थो.

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