
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान पाँच सौ भिक्षुओं के विशाल भिक्षुसंघ के साथ विदेहा में भ्रमण कर रहे थे।
उस समय ब्रह्मायु ब्राह्मण मिथिला में वास करता था—जो जीर्ण हो चुका, वृद्ध हो चुका, बूढ़ा हो चुका, पकी उम्र का, जीवन के अंतिम चरण को प्राप्त, एक सौ बीस वर्ष की उम्र का था, जो वेदों का अभ्यस्त, मंत्रों का जानकार, तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों का निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ का भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, (संस्कृत) पदों का वक्ता, (संस्कृत) व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत था।
उस ब्रह्मायु ब्राह्मण ने सुना, “यह सच है, श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रजित हैं, वे पाँच-सौ भिक्षुओं के विशाल संघ के साथ विदेहा में भ्रमण कर रहे हैं। उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान! वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो। और ऐसे अर्हन्तों का दर्शन वाकई शुभ होता है।”
उस समय ब्रह्मायु ब्राह्मण का शिष्य ‘उत्तर’ नामक युवा-ब्राह्मण था—जो वेदों का अभ्यस्त, मंत्रों का जानकार, तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों का निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ का भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, पदों का वक्ता, व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत था, जिसे उसके आचार्य ने यह कहकर तीनों वेदों में प्रविष्ट और स्वीकृत किया था, “जो मैं जानता हूँ, वही तुम जानते हो। जो तुम जानते हो, वही मैं जानता हूँ।”
तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने उत्तर युवा-ब्राह्मण को कहा, “मेरे पुत्र, उत्तर! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रजित हैं, वे पाँच-सौ भिक्षुओं के विशाल संघ के साथ विदेहा में भ्रमण कर रहे हैं। उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!
वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो। और ऐसे अर्हन्तों का दर्शन वाकई शुभ होता है।’
तो जाओ, मेरे पुत्र उत्तर। जाकर श्रमण गौतम को देखो और पता लगाओ कि क्या वाकई उनकी यशकीर्ति यथार्थ है अथवा नहीं। पता लगाओ कि श्रमण गोतम क्या वाकई वैसे ही है, जैसे कहा जा रहा है, अथवा नहीं। ताकि हम श्रमण गोतम को परख पाएँ।”
“किन्तु, गुरुजी, मैं कैसे पता लगाऊँगा कि श्रमण गोतम की यशकीर्ति यथार्थ है अथवा नहीं? और श्रमण गोतम वाकई वैसे ही है, जैसे कहा जा रहा है, अथवा नहीं?”
“मेरे पुत्र उत्तर, हमारे मंत्रों में ‘महापुरूष के बत्तीस लक्षण’ का उल्लेख आया है, जिनसे युक्त महापुरुष की दो ही गति होती है, तीसरी नहीं।
(१) यदि गृहस्थी में रहे तो वह राजा चक्रवर्ती सम्राट बनता है—धार्मिक धम्मराज, चारों दिशाओं का विजेता, देहातों तक स्थिर शासन, सप्तरत्नों से संपन्न। और उसके लिए सात रत्न प्रादुर्भूत होते हैं—चक्ररत्न, हाथीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहस्थरत्न, और सातवाँ सलाहकाररत्न। उसके एक हज़ार से अधिक पुत्र होते हैं, जो शूर होते हैं, वीर गुणों से युक्त होते हैं, और पराई सेना की धज्जियाँ उड़ाते हैं। तब भी वह महासागरों से घिरी इस पृथ्वी को बिना लट्ठ, बिना शस्त्र के, धम्म से ही जीत लेता है।
(२) किन्तु यदि वह घर से बेघर होकर प्रव्रजित होता हो, तब वह ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ बनता है, जो इस लोक से (अविद्या का) पर्दाफाश करता है।
और मेरे पुत्र उत्तर, मैं मंत्रों का दाता (गुरु) हूँ, और तुम मंत्रों के ग्रहणकर्ता (शिष्य) हो।”
“ठीक है, गुरुजी।” उत्तर युवा-ब्राह्मण ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को उत्तर दिया, और आसन से उठकर ब्रह्मायु ब्राह्मण को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा करते हुए विदेहा से भ्रमण करते भगवान की ओर निकला। क्रमशः भ्रमण करते हुए वह भगवान के पास गया, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया।
एक ओर बैठकर उत्तर युवा-ब्राह्मण ने भगवान की काया में बत्तीस महापुरुष लक्षण ढूँढने लगा। अंततः उत्तर युवा-ब्राह्मण ने भगवान के शरीर में दो छोड़कर बचे सभी ३२ महापुरूष-लक्षण देख लिए। उसे बचे २ लक्षणों के बारे में शंका हुई, उलझन हुई: यौन-अंग का आवरण में होना, और जीभ की लंबाई। वह उन दो के बारे में शंका और उलझन को न मिटा पा रहा था, न आश्वस्त हो पा रहा था।
तब भगवान ने अपने ऋद्धिबल की संस्कार से ऐसे रचा कि भगवान का अदृश्य यौन-अंग, आवरण में ढका हुआ, उत्तर युवा-ब्राह्मण के लिए दृश्यमान हो जाए। फिर उन्होने अपनी जीभ निकाली और उसे कान के द्वारों पर उल्टा-सीधा लगाई, नाक के द्वारों पर उल्टा-सीधा लगाई, और माथे के मण्डल पर लगाई।
तब उत्तर युवा-ब्राह्मण को लगा, “श्रमण गौतम ३२ महापुरूष-लक्षणों से युक्त हैं। क्यों न मैं श्रीमान गोतम के पीछे लग जाऊँ, और उनका चाल-चलन देखूँ।”
तब उत्तर युवा-ब्राह्मण ने सात महीनों तक छाया की तरह भगवान का पीछा किया। सात महीने बीतने पर उत्तर युवा-ब्राह्मण विदेहा से मिथिला की ओर भ्रमण के लिए निकला। क्रमशः भ्रमण करते हुए वह मिथिला में ब्रह्मायु ब्राह्मण के पास गया, और जाकर ब्रह्मायु ब्राह्मण को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे उत्तर युवा-ब्राह्मण से ब्रह्मायु ब्राह्मण ने कहा, “तो, मेरे पुत्र, क्या उनकी यशकीर्ति वाकई यथार्थ है अथवा नहीं? क्या श्रमण गोतम वाकई वैसे ही है, जैसे कहा जा रहा है, अथवा नहीं?”
“हाँ गुरुजी। श्रमण गोतम की यशकीर्ति वाकई यथार्थ हैं, झूठी नहीं हैं। श्रीमान गोतम वाकई वैसे ही हैं, जैसे कहा जा रहा है, भिन्न नहीं हैं। और श्रीमान गोतम ३२ महापुरुष लक्षणों से युक्त हैं। 1
(१) श्रीमान गोतम के समतल पैर हैं। गुरुजी, यह श्रीमान गोतम के महापुरुष लक्षणों में से एक हैं। (२) श्रीमान गोतम के पैरों के तलवे में चक्र मौजूद हैं—हजार तीली के साथ, नेमी के साथ, नाभी के साथ, अपने सम्पूर्ण आकार की परिपूर्णता के साथ। (३) श्रीमान गोतम की लंबी एड़ी है।… (४) श्रीमान गोतम की लंबी उँगलियाँ हैं।… (५) श्रीमान गोतम के हाथ-पैर मृदु हैं।… (६) श्रीमान गोतम के हाथ-पैर जालीदार हैं।… (७) श्रीमान गोतम के पैर (ऊपर से) वक्राकार हैं।… (८) श्रीमान गोतम की मृग-जाँघें हैं।…
(९) श्रीमान गोतम की हथेलियाँ बिना झुके सीधा खड़ा होने पर भी घुटनों को छूती हैं।… (१०) श्रीमान गोतम की पुरुष-इंद्रिय चमड़े से ढकी है।… (११) श्रीमान गोतम स्वर्ण-रंग के है, त्वचा स्वर्ण जैसी चमकती है।… (१२) श्रीमान गोतम की सूक्ष्म त्वचा है, इतनी सूक्ष्म कि उस पर मैल और धूल भी जमती नहीं है।… (१३) श्रीमान गोतम एकेकलोमो है, अर्थात, उनके एक-एक रोमछिद्र में केवल एक-एक रोम उगते हैं।… (१४) श्रीमान गोतम उद्धग्गलोमो है, अर्थात, उनके रोम खड़े होते हैं, अंजन जैसे नीले हैं, और घूमकर दायी-ओर से कुंडली (clockwise) मारते हैं।… (१५) श्रीमान गोतम की काया लंबी और अंग सीधे है।… (१६) श्रीमान गोतम सात अंगों से उभरी हुई है (=मांसल काया?)…
(१७) श्रीमान गोतम की ऊपरी काया (छाती, गला इत्यादि) सिंह जैसे है।… (१८) श्रीमान गोतम के कंधे भरे हुए हैं।… (१९) श्रीमान गोतम वटवृक्ष-परिमंडल जैसे है, जितनी शरीर की ऊँचाई उतनी ही (हाथ फैलाने पर) चौड़ाई है, जितनी शरीर की चौड़ाई उतनी ही लंबाई है।… (२०) श्रीमान गोतम का धड़ बेलनाकार है।… (२१) श्रीमान गोतम की स्वाद कलिकाएँ शिराओं वाली हैं।… (२२) श्रीमान गोतम का जबड़ा सिंह के जैसा है।… (२३) श्रीमान गोतम के चालीस दाँत हैं।… (२४) श्रीमान गोतम के दाँत सम हैं।…
(२५) श्रीमान गोतम के अविरल दाँत (=दाँतों के बीच गैप न होना) हैं।… (२६) श्रीमान गोतम के दाँत शुभ्र सफ़ेद हैं।… (२७) श्रीमान गोतम की जीभ लंबी है।… (२८) श्रीमान गोतम की आवाज ब्रह्मस्वर है, कोयल पक्षी की तरह।… (२९) श्रीमान गोतम की आँखें नीली हैं।… (३०) श्रीमान गोतम की पलकें गाय के जैसी हैं।… (३१) श्रीमान गोतम की भौहों के बीच श्वेत और मृदु कपास के जैसे बाल उगते हैं। और, (३२) श्रीमान गोतम का सिर पगड़ी जैसा उभरा है। गुरुजी, यह भी श्रीमान गोतम के महापुरुष लक्षणों में से एक हैं।
इन ३२ महापुरुष लक्षणों से, गुरुजी, श्रीमान गोतम युक्त हैं।
चलते समय, श्रीमान गोतम पहले दाहिना पैर उठाकर चलते हैं। वे पैरों को न बहुत दूर उठाते हैं, न बहुत समीप रखते हैं। वे न बहुत जल्दी-जल्दी चलते हैं, न बहुत धीमे-धीमे। वे न घुटने से घुटना रगड़कर चलते हैं, न एड़ी से एड़ी रगड़कर। वे न जाँघों को उठाकर चलते हैं, न जाँघों को गिराकर। वे न जाँघों को चिपकाकर चलते हैं, न जाँघों को फैलाकर।
चलते समय, श्रीमान गोतम का केवल निचला शरीर हिलता हैं, बिना शारीरिक-बल से (सहज)। मुड़कर देखते हुए, श्रीमान गोतम पूरी काया को मोड़कर देखते हैं (=तिरछी नजर से नहीं)। वे न (आँखें) ऊपर उठाकर देखते हैं, न नीचे गिराकर। चलते समय, वे चारों ओर नहीं देखते हैं, बल्कि केवल चार कदम तक देखते हैं; जिसके आगे उनका ज्ञान-दर्शन खुला होता हैं।
घरों के भीतर प्रवेश करते समय, वे शरीर को न अकड़ाते हैं, न झुकाते हैं, न सिकुड़ाते हैं, न फैलाते हैं। वे आसन के लिए न बहुत दूर से मुड़ते हैं, न बहुत समीप से। आसन पर बैठते समय, वे न हाथों के सहारे बैठते हैं, न शरीर को गिराकर बैठते हैं।
घरों के भीतर बैठकर, वे न हाथ (हिलाने) की व्याकुलता प्रकट करते हैं, न पैर (हिलाने) की व्याकुलता। वे न घुटने पर घुटना रखकर बैठते हैं, न एड़ी पर एड़ी रखकर, न हाथों पर ठुड्डी रखकर बैठते हैं। घरों के भीतर बैठकर, वे न हिलते हैं, न डुलते हैं, न कपकपाते हैं, न व्याकुल दिखते हैं, बिना हिले-डुले-कपकपाएँ-व्याकुल हुए-रोंगटे खड़े किए। घरों के भीतर बैठकर भी श्रीमान गोतम निर्लिप्त होते हैं।
पात्र में जल ग्रहण करते समय, वे पात्र को न (ऊपर) उठाते हैं, न (नीचे) झुकाते हैं, न (अपनी ओर) मोड़ते हैं, न (आगे) फैलाते हैं। वे पात्र में न बहुत कम जल ग्रहण करते हैं, न बहुत अधिक। वे पात्र को बिना (“खुलुखुलु”) आवाज किए धोते हैं, न पात्र को घूमा-घुमाकर धोते हैं, न पात्र को भूमि पर रखकर उसमें हाथ धोते हैं। बल्कि हाथ धोते हुए उनका पात्र धुलता है, और पात्र धोते हुए उनका हाथ धुलता है। पात्र के जल को न बहुत दूर उड़ेलते हैं, न बहुत समीप गिराते हैं, 2 न उछाल कर फेंकते हैं।
पात्र में चावल ग्रहण करते समय, वे पात्र को न (ऊपर) उठाते हैं, न (नीचे) झुकाते हैं, न (अपनी ओर) मोड़ते हैं, न (आगे) फैलाते हैं। वे न बहुत कम चावल ग्रहण करते हैं, न बहुत अधिक। किन्तु, सब्जियों को श्रीमान गोतम मात्रा में खाते हैं, निवाले को बहुत सब्जी से नहीं भर देते हैं। दो-तीन बार चबाकर, श्रीमान गोतम निवाला निगलते हैं। बिना चबाए चावल का कोई निवाला उनके गले से प्रवेश नहीं करता है, न ही कोई चावल के दाने उनके मुख में बचते हैं। और तभी वे दूसरा निवाला उठाते हैं। श्रीमान गोतम स्वाद चखते हुए आहार करते हैं, किन्तु स्वाद के प्रति बिना राग (=दिलचस्पी) के।
आठ अंगों से युक्त होकर श्रीमान गोतम आहार करते हैं—न मज़े के लिए, न मदहोशी के लिए, न सुडौलता के लिए, न ही सौंदर्य के लिए; बल्कि काया को मात्र टिकाने के लिए। उसकी [भूख] पीड़ाएँ समाप्त करने के लिए; ब्रह्मचर्य के लिए। [सोचते हुए,] ‘पुरानी पीड़ा ख़त्म करूँगा! [अधिक खाकर] नई पीड़ा नहीं उत्पन्न करूँगा! मेरी जीवनयात्रा निर्दोष रहेगी, और राहत से रहूँगा!’ 3
भोजन समाप्त कर पात्र में जल ग्रहण करते समय, वे पात्र को न (ऊपर) उठाते हैं, न (नीचे) झुकाते हैं, न (अपनी ओर) मोड़ते हैं, न (आगे) फैलाते हैं। वे पात्र में न बहुत कम जल ग्रहण करते हैं, न बहुत अधिक। वे पात्र को बिना आवाज किए धोते हैं, न पात्र को घूमा-घुमाकर धोते हैं, न पात्र को भूमि पर रखकर उसमें हाथ धोते हैं। बल्कि हाथ धोते हुए उनका पात्र धुलता है, और पात्र धोते हुए उनका हाथ धुलता है। पात्र के जल को न बहुत दूर उड़ेलते हैं, न बहुत समीप गिराते हैं, न उछाल कर फेंकते हैं।
भोजन समाप्त कर, वे भूमि पर पात्र को न बहुत दूर रखते हैं, न बहुत समीप। वे पात्र के प्रति न लापरवाह होते हैं, न बहुत देर पात्र की सुरक्षा में बिताते हैं। भोजन समाप्त कर, वे कुछ देर मौन बैठते हैं, किन्तु अनुमोदन करने के लिए बहुत देर नहीं रुकते हैं। भोजन समाप्त कर, अनुमोदन कर, वे भोजन में खामी नहीं बताते हैं, न ही फिर से भोजन की अपेक्षा रखते हैं।
वे परिषद को बिना चुके धम्म-कथन से निर्देशित करते हैं, उत्प्रेरित करते हैं, उत्साहित करते हैं, हर्षित करते हैं। परिषद को धम्म-कथन से निर्देशित कर, उत्प्रेरित कर, उत्साहित कर, हर्षित कर, वे आसन से उठकर चले जाते हैं। वे न बहुत जल्दी जाते हैं, न बहुत धीमे, न ही छूटने की कामना से।
श्रीमान गोतम चीवर को काया पर न ऊपर उठा कर पहनते हैं, न नीचे झुका कर, न चिपका कर, न ढीला कर। पवन से श्रीमान गोतम की काया से चीवर नहीं उड़ता है। श्रीमान गोतम की काया पर धूल और मल नहीं जमती है। विहार में जाकर वे बिछे आसन पर बैठते हैं। बैठकर पैर धोते हैं, किन्तु श्रीमान गोतम पैर को अच्छा रखने के लिए समर्पित भाव नहीं रखते हैं।
पैर धोने पर, वे पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठते हैं और स्मृति को आगे उपस्थित करते हैं। वे न आत्म-पीड़ा की चेतना रखते हैं, न पर-पीड़ा की चेतना रखते हैं, न आपसी-पीड़ा की चेतना रखते हैं। बल्कि, आत्महित, परहित, आपसी-हित, पूरे विश्व के हित की चेतना रखते हुए, श्रीमान गोतम बैठते हैं।
विहार में परिषद को धम्म बताते समय, वे परिषद को (मिथ्या प्रशंसा से) न चढ़ाते हैं, न (डांट देकर) उतारते हैं। बल्कि, बिना चुके, वे परिषद को धम्म-कथन से निर्देशित करते हैं, उत्प्रेरित करते हैं, उत्साहित करते हैं, हर्षित करते हैं।
श्रीमान गोतम के मुख से निकला (ब्रह्म) स्वर आठ अंगों से संपन्न होता है—(१) स्पष्ट, (२) समझने में सरल, (३) आकर्षक, (४) सुनने योग्य, (५) ठोस, (६) अविकृत, (७) गहरा, और (८) गूँजने वाला। श्रीमान गोतम का स्वर परिषद की ठीक सीमा तक समझा जाता है, किन्तु उनका घोष परिषद के बाहर नहीं जाता है।
और वे श्रमण गोतम के धम्म-कथन से निर्देशित होकर, उत्प्रेरित होकर, उत्साहित होकर, हर्षित होकर, आसन से उठकर जाते हैं—मात्र उन्हें ही देखते हुए, बताया हुआ न भूले।
मैंने, गुरुजी, श्रीमान गोतम को चलते हुए देखा, खड़े होते हुए देखा, घरों के भीतर प्रवेश करते हुए देखा, घरों के भीतर मौन होकर बैठते हुए देखा, घरों के भीतर भोजन करते हुए देखा, भोजन समाप्त कर मौन होकर बैठे हुए देखा, भोजन कर अनुमोदन करते हुए देखा, विहार में जाते हुए देखा, विहार में मौन होकर बैठे हुए देखा, विहार में परिषद को धम्म बताते हुए देखा। ऐसे हैं श्रीमान गोतम! ऐसे हैं और बहुत कुछ हैं।"
जब ऐसा कहा गया, तब ब्रह्मायु ब्राह्मण अपने आसन से उठा, और अपने बाहरी वस्त्र को एक कंधे पर रख, भगवान की दिशा में हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए, तीन बार उद्गार किया—
“नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।
नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।
नमन है उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को ।"
काश, मैं भी कभी, किसी समय श्रीमान गौतम के साथ भेट करूँ! काश, हमारा भी कभी वार्तालाप हो!”
तब भगवान विदेहा में क्रमशः भ्रमण करते हुए मिथिला में आ पहुँचे। वहाँ मिथिला में भगवान ने मघदेव आम्रवन में विहार किया। 4
तब मिथिला के ब्राह्मणों और (वैश्य) गृहस्थों ने सुना—“यह सच है, श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रज्यित हैं, वे पाँच सौ भिक्षुओं के विशाल भिक्षुसंघ के साथ विदेहा में भ्रमण करते हुए मिथिला आ पहुँचे हैं। मिथिला में श्रीमान गोतम मघदेव आम्रवन में विहार कर रहे हैं।
उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान! वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो। और ऐसे अर्हन्तों का दर्शन वाकई शुभ होता है।”
तब मिथिला के ब्राह्मण और गृहस्थ भगवान के पास गए। जाकर कुछ लोग भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। कुछ लोग भगवान को नम्रतापूर्ण हालचाल पूछ कर एक ओर बैठ गए। कुछ लोग हाथ जोड़, अंजलिबद्ध वंदन कर एक ओर बैठ गए। कोई अपना नाम-गोत्र बता कर एक ओर बैठ गए। तथा कोई चुपचाप ही एक ओर बैठ गए।
ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भी सुना—“यह सच है, श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रज्यित हैं, वे पाँच सौ भिक्षुओं के विशाल भिक्षुसंघ के साथ विदेहा में भ्रमण करते हुए मिथिला आ पहुँचे हैं। मिथिला में श्रीमान गोतम मघदेव आम्रवन में विहार कर रहे हैं।”
तब, ब्रह्मायु ब्राह्मण बहुत से शिष्यों के साथ मघदेव आम्रवन की ओर निकल पड़ा। आम्रवन के पास पहुँचने पर, ब्रह्मायु ब्राह्मण को लगा, “यह मेरे लिए उचित नहीं होगा कि मैं श्रीमान गोतम को बिना पूर्व-सूचित किए, उनके दर्शन के लिए जाऊँ!”
तब, ब्रह्मायु ब्राह्मण ने अपने किसी शिष्य युवा-ब्राह्मण को आमंत्रित किया, “यहाँ आओ, युवा-ब्राह्मण! श्रीमान गोतम के पास जाओ, और मेरे नाम से श्रमण गोतम का हालचाल पूछना, ‘श्रीमान गोतम, ब्रह्मायु ब्राह्मण श्रीमान गोतम का हालचाल पूछते हैं, क्या आप बिना रोग बिना पीड़ा के, हल्का महसूस कर, शक्ति और राहत से विहार कर रहे हैं?’
और फिर कहना, “श्रीमान, ब्रह्मायु ब्राह्मण—जीर्ण हो चुके, वृद्ध हो चुके, बूढ़ा हो चुके, पकी उम्र के, जीवन के अंतिम चरण को प्राप्त, एक सौ बीस वर्ष की उम्र के हैं, जो वेदों के अभ्यस्त, मंत्रों के जानकार, तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों के निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ के भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, (संस्कृत) पदों के वक्ता, (संस्कृत) व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत हैं।
और, श्रीमान, मिथिला में जितने ब्राह्मण और गृहस्थ वास करते हैं, उनमें ब्रह्मायु ब्राह्मण ही अग्र कहे जाते हैं। चाहे भोगसंपदा हो, उसमें ब्रह्मायु ब्राह्मण ही अग्र कहे जाते हैं। चाहे वेदमंत्र हो, उसमें ब्रह्मायु ब्राह्मण ही अग्र कहे जाते हैं। चाहे आयु और यश हो, उसमें ब्रह्मायु ब्राह्मण ही अग्र कहे जाते हैं। वे श्रीमान गोतम का दर्शन करना चाहते हैं।”
“ठीक है, गुरुजी।” उस युवा-ब्राह्मण ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को उत्तर दिया, और भगवान के पास गया। जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर खड़ा हुआ। एक ओर खड़े होकर उस युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, ब्रह्मायु ब्राह्मण श्रीमान गोतम का हालचाल पूछते हैं… वे जीर्ण हो चुके, वृद्ध हो चुके… वे श्रीमान गोतम का दर्शन करना चाहते हैं।”
“ठीक है, युवा-ब्राह्मण, ब्रह्मायु ब्राह्मण जो समय उचित समझे।”
तब वह युवा-ब्राह्मण ब्रह्मायु ब्राह्मण के पास गया, और जाकर कहा, “श्रीमान गोतम ने गुरुजी की विनंती स्वीकार ली हैं। गुरुजी जो समय उचित समझें।”
तब ब्रह्मायु ब्राह्मण भगवान के पास गया। परिषद ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को दूर से आते हुए देखा। देखकर सभी (आजू-बाजू होकर) उसके आगे आने के लिए मार्ग बनाने लगे, जिस प्रकार वह प्रसिद्ध और यशस्वी था।
तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने उस परिषद से कहा, “नहीं, श्रीमानों, पर्याप्त है। तुम अपने आसन पर बैठ जाओ। मैं श्रीमान गोतम के पास यहाँ बैठूँगा।”
तब ब्रह्मायु ब्राह्मण भगवान के पास गया। जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भगवान की काया में बत्तीस महापुरुष लक्षण ढूँढने लगा। अंततः उत्तर युवा-ब्राह्मण ने भगवान के शरीर में दो छोड़कर बचे सभी ३२ महापुरूष-लक्षण देख लिए। उसे बचे २ लक्षणों के बारे में शंका हुई, उलझन हुई: यौन-अंग का आवरण में होना, और जीभ की लंबाई।
तब, ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भगवान को गाथाओं में कहा—
तब भगवान को लगा, “इस ब्रह्मायु ब्राह्मण ने मेरी काया में दो छोड़कर बचे सभी ३२ महापुरूष-लक्षण देख लिए हैं। वह बचे दो के बारे में शंका और उलझन को न मिटा पा रहा है, न आश्वस्त हो पा रहा है: यौन-अंग का आवरण में होना, और जीभ की लंबाई।”
तब भगवान ने अपने ऋद्धिबल की संस्कार से ऐसे रचा कि भगवान का अदृश्य यौन-अंग, आवरण में ढका हुआ, उत्तर युवा-ब्राह्मण के लिए दृश्यमान हो जाए। फिर उन्होने अपनी जीभ निकाली और उसे कान के द्वारों पर उल्टा-सीधा लगाई, नाक के द्वारों पर उल्टा-सीधा लगाई, और माथे के मण्डल पर लगाई।
तब भगवान ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को गाथाओं में कहा—
तब ब्रह्मायु ब्राह्मण को लगा, “श्रमण गोतम ने मेरी विनंती स्वीकार ली हैं। क्यों न मैं श्रमण गोतम से पूछूं, ‘इस जीवन में हितकारक, और भविष्य में सुखकारक!’ किन्तु, ब्रह्मायु ब्राह्मण को लगा, “मैं इस जीवन के हित के बारे में तो कुशल हूँ। दूसरे भी मुझसे इस जीवन के हित के बारे में पूछते हैं। क्यों न मैं श्रमण गोतम को केवल भविष्य के सुख के बारे में ही पूछूं।”
तब, ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भगवान को गाथाओं में कहा—
तब भगवान ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को गाथाओं में कहा 5—
जब ऐसा कहा गया, तब ब्रह्मायु ब्राह्मण अपने आसन से उठा, और अपने बाहरी वस्त्र को एक कंधे पर रख, भगवान के चरणों में अपना सिर रखा, और भगवान के पैरों को मुख से चूमने लगा, हाथों से दबाने लगा, अपना नाम घोषित करते हुए, “श्रीमान गोतम, मैं ब्रह्मायु ब्राह्मण हूँ। श्रीमान गोतम, मैं ब्रह्मायु ब्राह्मण हूँ।” 6
तब उस परिषद में आश्चर्य-अद्भुत चित्त जागकर, उन्हें लगा, “ओ श्रीमान, आश्चर्य है! ओ श्रीमान, अद्भुत है! ये ब्रह्मायु ब्राह्मण इतने प्रसिद्ध, इतने यशस्वी होने पर भी इस प्रकार का परम-समर्पण प्रकट कर रहे हैं!”
तब भगवान ने ब्रह्मायु ब्राह्मण से कहा, “पर्याप्त हुआ, ब्राह्मण! अब उठकर अपने आसन पर बैठ जाओ, जो तुम्हारा चित्त मेरे प्रति इतना आश्वस्त है!”
ब्रह्मायु ब्राह्मण उठकर अपने आसन पर बैठ गया। तब भगवान ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को अनुक्रम से धम्म बताया—जैसे, दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि ब्रह्मायु ब्राह्मण का तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।
जैसे कोई स्वच्छ, बेदाग वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह ब्रह्मायु ब्राह्मण को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”
तब धम्म देख चुका, धम्म पा चुका, धम्म जान चुका, धम्म में गहरे उतर चुका ब्रह्मायु ब्राह्मण संदेह लाँघकर परे चला गया। तब उसे कोई सवाल न बचे। उसे निडरता प्राप्त हुई, तथा वह शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुआ।
तब उसने भगवान से कहा, “अतिउत्तम, श्रीमान गौतम! अतिउत्तम, श्रीमान गौतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि अच्छी आँखोंवाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह गुरु गौतम ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं गुरु गोतम की शरण जाता हूँ! धम्म और संघ की! गुरु गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें! कृपा कर श्रीमान गोतम कल का भोजन भिक्षुसंघ के साथ मेरे द्वारा स्वीकार करें।”
भगवान ने मौन रहकर स्वीकृति दी। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भगवान की स्वीकृति जान कर अपने आसन से उठे, और भगवान को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चले गए।
रात बीतने पर ब्रह्मायु ब्राह्मण ने अपने आश्रम में उत्तम खाद्य और भोजन बनवाकर भगवान को समय सूचित किया, “उचित समय है, गुरु गोतम! भोजन तैयार है।”
तब सुबह होने पर भगवान ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर, भिक्षुसंघ के साथ ब्रह्मायु ब्राह्मण के निवास-स्थान गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गये। तब एक सप्ताह तक ब्रह्मायु ब्राह्मण ने बुद्ध प्रमुख भिक्षुसंघ को अपने हाथों से उत्तम खाद्य और भोजन परोस कर संतृप्त किया, संतुष्ट किया। सात दिन बीतने पर भगवान विदेहा में भ्रमण के लिए निकले। भगवान को जाकर अधिक समय नहीं हुआ, जब ब्रह्मायु ब्राह्मण गुजर गया।
तब बहुत से भिक्षु भगवान के पास गए। जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर उन भिक्षुओं ने भगवान से कहा, “भन्ते, ब्रह्मायु ब्राह्मण गुजर गया। उसकी क्या गति हुई, क्या भविष्य की अवस्था हुई?”
“भिक्षुओं, ब्रह्मायु ब्राह्मण पण्डित था, जिसने धम्म के अनुसार धम्म का प्रतिपादन किया, और मुझे धम्म की (व्यर्थ) बातों से परेशान नहीं किया। भिक्षुओं, ब्रह्मायु ब्राह्मण ने निचले पाँच संयोजन तोड़ कर (शुद्धवास ब्रह्मलोक में) स्वप्रकट हुआ है, और वही परिनिर्वाण प्राप्त करेगा, अब इस लोक में नहीं लौटेगा।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
ऐसा माना जाता है कि पूर्वकाल में वेदों में बत्तीस महापुरुष-लक्षणों का विस्तारपूर्वक वर्णन उपलब्ध था; किन्तु भगवान बुद्ध के आगमन के उपरान्त उन्हें वेदों से लुप्त कर दिया गया। तथापि, प्रख्यात ग्रन्थ बृहत्संहिता के अध्याय ६९, श्लोक १७ में अनेक शुभ लक्षणों का उल्लेख मिलता है, जिनमें चक्र सहित अन्य चिह्न भी सम्मिलित हैं। ↩︎
पहले अधिकांश घरों में फ़र्श मिट्टी का होता था, और कुछ ऊँचे बने घरों में बाँस की फ़र्श होती थी, जिन पर जल गिराना सामान्य और व्यावहारिक माना जाता था। परंतु आजकल शहरों में अधिकांश घरों की फ़र्श टाइल्स, मार्बल या प्लास्टर की होती है, जिन पर सीधे जल नहीं गिराया जा सकता। इसलिए ऐसे स्थानों पर बाल्टी, बर्तन या बड़े कटोरे में जल एकत्र करना ही उचित और सामान्य समझा जाता है। ↩︎
भिक्षुओं को भोजन से पूर्व इन आठ अंगों का स्मरण करना आवश्यक होता है, और भोजन करते समय भी उन्हीं आठ अंगों के प्रति सतत् स्मृतिमान रहकर भोजन ग्रहण करना होता है। भगवान ने सब्बासव सुत्त में बताए अनुसार, इन आठ अंगों से युक्त होकर भोजन करने से आस्रवों की निरोध प्रक्रिया सशक्त होती है और यह दुःखमुक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण सहायक बनता है। ↩︎
मघदेव आम्रवन में रहते हुए, भगवान ने मघदेव की एक बेहद रोचक जातक-कथा सुनाई थी। उसके बारे में और जानने के लिए यह मघदेव-सूत्र पढ़ें। ↩︎
किसी कारणवश भगवान इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देते हैं, अन्तिम दो—ऋषि और बुद्ध—के अतिरिक्त। शेष अधिकांश प्रश्न ब्राह्मण परम्परा के तकनीकी पद हैं, और अन्यत्र भगवान बुद्ध ने उन्हें अपने ढंग से परिभाषित किया है (जैसे महाअस्सपुर सुत्त)। चीनी समानान्तर ग्रन्थ मध्यम आगम १६१ में पालि की तुलना में कम गाथाएँ हैं, लेकिन वे प्रश्न और उत्तर के मेल को अधिक सुगठित रूप में प्रस्तुत करते हैं। ↩︎
इसी प्रकार का परम-समर्पण कोशल देश के राजा प्रसेनजित ने भी धम्म-चैत्य सूत्र में भगवान के प्रति प्रकट किया था। वे भी अपनी पकी हुई लगभग अस्सी वर्ष की आयु में ऐसी ही विनम्रता दिखाते हैं, जैसी इस सूत्र में एक सौ बीस वर्ष का ब्राह्मण प्रकट करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यौवन के अहंकार में लोग प्रायः आसानी से नहीं झुकते। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ, जब अहंकार कुछ ढीला पड़ने लगता है और अनुभव प्रगल्भ होता है, तब मनुष्य स्वभावतः अधिक विनम्र बन जाता है। ↩︎
३८३. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा विदेहेसु चारिकं चरति महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं पञ्चमत्तेहि भिक्खुसतेहि. तेन खो पन समयेन ब्रह्मायु ब्राह्मणो मिथिलायं पटिवसति जिण्णो वुड्ढो महल्लको अद्धगतो वयोअनुप्पत्तो, वीसवस्ससतिको जातिया, तिण्णं वेदानं [बेदानं (क.)] पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो. अस्सोसि खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो – ‘‘समणो खलु भो, गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो विदेहेसु चारिकं चरति महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं पञ्चमत्तेहि भिक्खुसतेहि. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवाति. सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति. सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं, केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति. साधु खो पन तथारूपानं अरहतं दस्सनं होती’’’ति.
३८४. तेन खो पन समयेन ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स उत्तरो नाम माणवो अन्तेवासी होति तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो उत्तरं माणवं आमन्तेसि – ‘‘अयं, तात उत्तर, समणो गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो विदेहेसु चारिकं चरति महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं पञ्चमत्तेहि भिक्खुसतेहि. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो…पे… साधु खो पन तथारूपानं अरहतं दस्सनं होती’ति. एहि त्वं, तात उत्तर, येन समणो गोतमो तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा समणं गोतमं जानाहि यदि वा तं भवन्तं गोतमं तथा सन्तंयेव सद्दो अब्भुग्गतो, यदि वा नो तथा; यदि वा सो भवं गोतमो तादिसो, यदि वा न तादिसो. तथा मयं तं भवन्तं गोतमं वेदिस्सामा’’ति. ‘‘यथा कथं पनाहं, भो, तं भवन्तं गोतमं जानिस्सामि यदि वा तं भवन्तं गोतमं तथा सन्तंयेव सद्दो अब्भुग्गतो, यदि वा नो तथा; यदि वा सो भवं गोतमो तादिसो, यदि वा न तादिसो’’ति. ‘‘आगतानि खो, तात उत्तर, अम्हाकं मन्तेसु द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येहि समन्नागतस्स महापुरिसस्स द्वेयेव गतियो भवन्ति अनञ्ञा . सचे अगारं अज्झावसति, राजा होति चक्कवत्ती धम्मिको धम्मराजा चातुरन्तो विजितावी जनपदत्थावरियप्पत्तो सत्तरतनसमन्नागतो. तस्सिमानि सत्त रतनानि भवन्ति, सेय्यथिदं – चक्करतनं, हत्थिरतनं, अस्सरतनं, मणिरतनं, इत्थिरतनं, गहपतिरतनं, परिणायकरतनमेव सत्तमं. परोसहस्सं खो पनस्स पुत्ता भवन्ति सूरा वीरङ्गरूपा परसेनप्पमद्दना. सो इमं पथविं सागरपरियन्तं अदण्डेन असत्थेन धम्मेन [धम्मेन समेन (क.)] अभिविजिय अज्झावसति. सचे खो पन अगारस्मा अनगारियं पब्बजति, अरहं होति सम्मासम्बुद्धो लोके विवट्टच्छदो. अहं खो पन, तात उत्तर, मन्तानं दाता; त्वं मन्तानं पटिग्गहेता’’ति.
३८५. ‘‘एवं, भो’’ति खो उत्तरो माणवो ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स पटिस्सुत्वा उट्ठायासना ब्रह्मायुं ब्राह्मणं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा विदेहेसु येन भगवा तेन चारिकं पक्कामि. अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो उत्तरो माणवो भगवतो काये द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि समन्नेसि. अद्दसा खो उत्तरो माणवो भगवतो काये द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येभुय्येन थपेत्वा द्वे. द्वीसु महापुरिसलक्खणेसु कङ्खति विचिकिच्छति नाधिमुच्चति न सम्पसीदति – कोसोहिते च वत्थगुय्हे, पहूतजिव्हताय च. अथ खो भगवतो एतदहोसि – ‘‘पस्सति खो मे अयं उत्तरो माणवो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि , येभुय्येन थपेत्वा द्वे. द्वीसु महापुरिसलक्खणेसु कङ्खति विचिकिच्छति नाधिमुच्चति न सम्पसीदति – कोसोहिते च वत्थगुय्हे, पहूतजिव्हताय चा’’ति. अथ खो भगवा तथारूपं इद्धाभिसङ्खारं अभिसङ्खासि यथा अद्दस उत्तरो माणवो भगवतो कोसोहितं वत्थगुय्हं. अथ खो भगवा जिव्हं निन्नामेत्वा उभोपि कण्णसोतानि अनुमसि पटिमसि [परिमसि (सी. क.)]; उभोपि नासिकसोतानि [नासिकासोतानि (सी.)] अनुमसि पटिमसि; केवलम्पि नलाटमण्डलं जिव्हाय छादेसि. अथ खो उत्तरस्स माणवस्स एतदहोसि – ‘‘समन्नागतो खो समणो गोतमो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि. यंनूनाहं समणं गोतमं अनुबन्धेय्यं, इरियापथमस्स पस्सेय्य’’न्ति. अथ खो उत्तरो माणवो सत्तमासानि भगवन्तं अनुबन्धि छायाव अनपायिनी [अनुपायिनी (स्या. कं. क.)].
३८६. अथ खो उत्तरो माणवो सत्तन्नं मासानं अच्चयेन विदेहेसु येन मिथिला तेन चारिकं पक्कामि. अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन मिथिला येन ब्रह्मायु ब्राह्मणो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा ब्रह्मायुं ब्राह्मणं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो उत्तरं माणवं ब्रह्मायु ब्राह्मणो एतदवोच – ‘‘कच्चि, तात उत्तर, तं भवन्तं गोतमं तथा सन्तंयेव सद्दो अब्भुग्गतो , नो अञ्ञथा? कच्चि पन सो भवं गोतमो तादिसो, नो अञ्ञादिसो’’ति? ‘‘तथा सन्तंयेव, भो, तं भवन्तं गोतमं सद्दो अब्भुग्गतो, नो अञ्ञथा; तादिसोव [तादिसोव भो (सी. पी.), तादिसो च खो (स्या. कं. क.)] सो भवं गोतमो, नो अञ्ञादिसो. समन्नागतो च [समन्नागतो च भो (सब्बत्थ)] सो भवं गोतमो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि.
‘‘सुप्पतिट्ठितपादो खो पन भवं गोतमो; इदम्पि तस्स भोतो गोतमस्स महापुरिसस्स महापुरिसलक्खणं भवति.
‘‘हेट्ठा खो पन तस्स भोतो गोतमस्स पादतलेसु चक्कानि जातानि सहस्सारानि सनेमिकानि सनाभिकानि सब्बाकारपरिपूरानि…
‘‘आयतपण्हि खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘दीघङ्गुलि खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘मुदुतलुनहत्थपादो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘जालहत्थपादो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘उस्सङ्खपादो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘एणिजङ्घो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘ठितको खो पन सो भवं गोतमो अनोनमन्तो उभोहि पाणितलेहि जण्णुकानि परिमसति परिमज्जति…
‘‘कोसोहितवत्थगुय्हो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘सुवण्णवण्णो खो पन सो भवं गोतमो कञ्चनसन्निभत्तचो…
‘‘सुखुमच्छवि खो पन सो भवं गोतमो. सुखुमत्ता छविया रजोजल्लं काये न उपलिम्पति…
‘‘एकेकलोमो खो पन सो भवं गोतमो; एकेकानि लोमानि लोमकूपेसु जातानि…
‘‘उद्धग्गलोमो खो पन सो भवं गोतमो; उद्धग्गानि लोमानि जातानि नीलानि अञ्जनवण्णानि कुण्डलावट्टानि दक्खिणावट्टकजातानि…
‘‘ब्रह्मुजुगत्तो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘सत्तुस्सदो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘सीहपुब्बद्धकायो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘चितन्तरंसो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘निग्रोधपरिमण्डलो खो पन सो भवं गोतमो; यावतक्वस्स कायो तावतक्वस्स ब्यामो, यावतक्वस्स ब्यामो तावतक्वस्स कायो…
‘‘समवट्टक्खन्धो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘रसग्गसग्गी खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘सीहहनु खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘चत्तालीसदन्तो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘समदन्तो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘अविरळदन्तो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘सुसुक्कदाठो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘पहूतजिव्हो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘ब्रह्मस्सरो खो पन सो भवं गोतमो करविकभाणी…
‘‘अभिनीलनेत्तो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘गोपखुमो खो पन सो भवं गोतमो…
‘‘उण्णा खो पनस्स भोतो गोतमस्स भमुकन्तरे जाता ओदाता मुदुतूलसन्निभा…
‘‘उण्हीससीसो खो पन सो भवं गोतमो; इदम्पि तस्स भोतो गोतमस्स महापुरिसस्स महापुरिसलक्खणं भवति.
‘‘इमेहि खो, भो, सो भवं गोतमो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि समन्नागतो.
३८७. ‘‘गच्छन्तो खो पन सो भवं गोतमो दक्खिणेनेव पादेन पठमं पक्कमति. सो नातिदूरे पादं उद्धरति, नाच्चासन्ने पादं निक्खिपति; सो नातिसीघं गच्छति, नातिसणिकं गच्छति; न च अद्दुवेन अद्दुवं सङ्घट्टेन्तो गच्छति, न च गोप्फकेन गोप्फकं सङ्घट्टेन्तो गच्छति. सो गच्छन्तो न सत्थिं उन्नामेति, न सत्थिं ओनामेति; न सत्थिं सन्नामेति, न सत्थिं विनामेति. गच्छतो खो पन तस्स भोतो गोतमस्स अधरकायोव [अड्ढकायोव (क.), आरद्धकायोव (स्या. कं.)] इञ्जति, न च कायबलेन गच्छति. अपलोकेन्तो खो पन सो भवं गोतमो सब्बकायेनेव अपलोकेति; सो न उद्धं उल्लोकेति, न अधो ओलोकेति; न च विपेक्खमानो गच्छति, युगमत्तञ्च पेक्खति; ततो चस्स उत्तरि अनावटं ञाणदस्सनं भवति. सो अन्तरघरं पविसन्तो न कायं उन्नामेति , न कायं ओनामेति; न कायं सन्नामेति, न कायं विनामेति. सो नातिदूरे नाच्चासन्ने आसनस्स परिवत्तति, न च पाणिना आलम्बित्वा आसने निसीदति, न च आसनस्मिं कायं पक्खिपति. सो अन्तरघरे निसिन्नो समानो न हत्थकुक्कुच्चं आपज्जति, न पादकुक्कुच्चं आपज्जति; न अद्दुवेन अद्दुवं आरोपेत्वा निसीदति; न च गोप्फकेन गोप्फकं आरोपेत्वा निसीदति; न च पाणिना हनुकं उपदहित्वा [उपादियित्वा (सी. पी.)] निसीदति. सो अन्तरघरे निसिन्नो समानो न छम्भति न कम्पति न वेधति न परितस्सति. सो अछम्भी अकम्पी अवेधी अपरितस्सी विगतलोमहंसो. विवेकवत्तो च सो भवं गोतमो अन्तरघरे निसिन्नो होति. सो पत्तोदकं पटिग्गण्हन्तो न पत्तं उन्नामेति, न पत्तं ओनामेति; न पत्तं सन्नामेति, न पत्तं विनामेति. सो पत्तोदकं पटिग्गण्हाति नातिथोकं नातिबहुं. सो न खुलुखुलुकारकं [बुलुबुलुकारकं (सी.)] पत्तं धोवति, न सम्परिवत्तकं पत्तं धोवति, न पत्तं भूमियं निक्खिपित्वा हत्थे धोवति; हत्थेसु धोतेसु पत्तो धोतो होति, पत्ते धोते हत्था धोता होन्ति. सो पत्तोदकं छड्डेति नातिदूरे नाच्चासन्ने, न च विच्छड्डयमानो. सो ओदनं पटिग्गण्हन्तो न पत्तं उन्नामेति, न पत्तं ओनामेति; न पत्तं सन्नामेति, न पत्तं विनामेति. सो ओदनं पटिग्गण्हाति नातिथोकं नातिबहुं. ब्यञ्जनं खो पन भवं गोतमो ब्यञ्जनमत्ताय आहारेति, न च ब्यञ्जनेन आलोपं अतिनामेति. द्वत्तिक्खत्तुं खो भवं गोतमो मुखे आलोपं सम्परिवत्तेत्वा अज्झोहरति; न चस्स काचि ओदनमिञ्जा असम्भिन्ना कायं पविसति, न चस्स काचि ओदनमिञ्जा मुखे अवसिट्ठा होति; अथापरं आलोपं उपनामेति. रसपटिसंवेदी खो पन सो भवं गोतमो आहारं आहारेति, नो च रसरागपटिसंवेदी.
‘‘अट्ठङ्गसमन्नागतं [अट्ठङ्गसमन्नागतो (क.)] खो पन सो भवं गोतमो आहारं आहारेति – नेव दवाय, न मदाय न मण्डनाय न विभूसनाय, यावदेव इमस्स कायस्स ठितिया यापनाय, विहिंसूपरतिया ब्रह्मचरियानुग्गहाय – ‘इति पुराणञ्च वेदनं पटिहङ्खामि नवञ्च वेदनं न उप्पादेस्सामि, यात्रा च मे भविस्सति अनवज्जता च फासुविहारो चा’ति . सो भुत्तावी पत्तोदकं पटिग्गण्हन्तो न पत्तं उन्नामेति, न पत्तं ओनामेति; न पत्तं सन्नामेति, न पत्तं विनामेति. सो पत्तोदकं पटिग्गण्हाति नातिथोकं नातिबहुं. सो न खुलुखुलुकारकं पत्तं धोवति, न सम्परिवत्तकं पत्तं धोवति, न पत्तं भूमियं निक्खिपित्वा हत्थे धोवति; हत्थेसु धोतेसु पत्तो धोतो होति, पत्ते धोते हत्था धोता होन्ति. सो पत्तोदकं छड्डेति नातिदूरे नाच्चासन्ने, न च विच्छड्डयमानो. सो भुत्तावी न पत्तं भूमियं निक्खिपति नातिदूरे नाच्चासन्ने, न च अनत्थिको पत्तेन होति, न च अतिवेलानुरक्खी पत्तस्मिं. सो भुत्तावी मुहुत्तं तुण्ही निसीदति, न च अनुमोदनस्स कालमतिनामेति. सो भुत्तावी अनुमोदति, न तं भत्तं गरहति, न अञ्ञं भत्तं पटिकङ्खति; अञ्ञदत्थु धम्मिया कथाय तं परिसं सन्दस्सेति समादपेति समुत्तेजेति सम्पहंसेति. सो तं परिसं धम्मिया कथाय सन्दस्सेत्वा समादपेत्वा समुत्तेजेत्वा सम्पहंसेत्वा उट्ठायासना पक्कमति. सो नातिसीघं गच्छति, नातिसणिकं गच्छति, न च मुच्चितुकामो गच्छति; न च तस्स भोतो गोतमस्स काये चीवरं अच्चुक्कट्ठं होति न च अच्चोक्कट्ठं, न च कायस्मिं अल्लीनं न च कायस्मा अपकट्ठं; न च तस्स भोतो गोतमस्स कायम्हा वातो चीवरं अपवहति; न च तस्स भोतो गोतमस्स काये रजोजल्लं उपलिम्पति . सो आरामगतो निसीदति पञ्ञत्ते आसने. निसज्ज पादे पक्खालेति; न च सो भवं गोतमो पादमण्डनानुयोगमनुयुत्तो विहरति. सो पादे पक्खालेत्वा निसीदति पल्लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा. सो नेव अत्तब्याबाधाय चेतेति, न परब्याबाधाय चेतेति, न उभयब्याबाधाय चेतेति; अत्तहितपरहितउभयहितसब्बलोकहितमेव सो भवं गोतमो चिन्तेन्तो निसिन्नो होति. सो आरामगतो परिसति धम्मं देसेति, न तं परिसं उस्सादेति, न तं परिसं अपसादेति; अञ्ञदत्थु धम्मिया कथाय तं परिसं सन्दस्सेति समादपेति समुत्तेजेति सम्पहंसेति.
‘‘अट्ठङ्गसमन्नागतो खो पनस्स भोतो गोतमस्स मुखतो घोसो निच्छरति – विस्सट्ठो च, विञ्ञेय्यो च, मञ्जु च, सवनीयो च, बिन्दु च, अविसारी च, गम्भीरो च, निन्नादी च. यथापरिसं खो पन सो भवं गोतमो सरेन विञ्ञापेति, न चस्स बहिद्धा परिसाय घोसो निच्छरति. ते तेन भोता गोतमेन धम्मिया कथाय सन्दस्सिता समादपिता समुत्तेजिता सम्पहंसिता उट्ठायासना पक्कमन्ति अवलोकयमानायेव [अपलोकयमानायेव (सी. क.)] अविजहितत्ता [अविजहन्ताभावेन (सी. स्या. कं. पी.)]. अद्दसाम खो मयं, भो, तं भवन्तं गोतमं गच्छन्तं, अद्दसाम ठितं, अद्दसाम अन्तरघरं पविसन्तं, अद्दसाम अन्तरघरे निसिन्नं तुण्हीभूतं, अद्दसाम अन्तरघरे भुञ्जन्तं, अद्दसाम भुत्ताविं निसिन्नं तुण्हीभूतं, अद्दसाम भुत्ताविं अनुमोदन्तं, अद्दसाम आरामं गच्छन्तं, अद्दसाम आरामगतं निसिन्नं तुण्हीभूतं, अद्दसाम आरामगतं परिसति धम्मं देसेन्तं. एदिसो च एदिसो च सो भवं गोतमो, ततो च भिय्यो’’ति.
३८८. एवं वुत्ते, ब्रह्मायु ब्राह्मणो उट्ठायासना एकंसं उत्तरासङ्गं करित्वा येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा तिक्खत्तुं उदानं उदानेति –
‘‘नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स.
‘‘नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स.
‘‘नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्सा’’ति.
‘‘अप्पेव नाम मयं कदाचि करहचि तेन भोता गोतमेन समागच्छेय्याम? अप्पेव नाम सिया कोचिदेव कथासल्लापो’’ति!
३८९. अथ खो भगवा विदेहेसु अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन मिथिला तदवसरि. तत्र सुदं भगवा मिथिलायं विहरति मघदेवम्बवने. अस्सोसुं खो मिथिलेय्यका [मेथिलेय्यका (सी. पी.)] ब्राह्मणगहपतिका – ‘‘समणो खलु, भो, गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो विदेहेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं पञ्चमत्तेहि भिक्खुसतेहि मिथिलं अनुप्पत्तो, मिथिलायं विहरति मघदेवम्बवने. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवाति. सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति . सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं, केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति. साधु खो पन तथारूपानं अरहतं दस्सनं होती’’’ति.
अथ खो मिथिलेय्यका ब्राह्मणगहपतिका येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा अप्पेकच्चे भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु; अप्पेकच्चे भगवता सद्धिं सम्मोदिंसु, सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु; अप्पेकच्चे येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु; अप्पेकच्चे भगवतो सन्तिके नामगोत्तं सावेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु; अप्पेकच्चे तुण्हीभूता एकमन्तं निसीदिंसु.
३९०. अस्सोसि खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो – ‘‘समणो खलु, भो, गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो मिथिलं अनुप्पत्तो, मिथिलायं विहरति मघदेवम्बवने’’ति. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो सम्बहुलेहि सावकेहि सद्धिं येन मघदेवम्बवनं तेनुपसङ्कमि. अथ खो ब्रह्मायुनो ब्राह्मणस्स अविदूरे अम्बवनस्स एतदहोसि – ‘‘न खो मेतं पतिरूपं योहं पुब्बे अप्पटिसंविदितो समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमेय्य’’न्ति. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो अञ्ञतरं माणवकं आमन्तेसि – ‘‘एहि त्वं, माणवक, येन समणो गोतमो तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा मम वचनेन समणं गोतमं अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छ – ‘ब्रह्मायु, भो गोतम, ब्राह्मणो भवन्तं गोतमं अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छती’ति. एवञ्च वदेहि – ‘ब्रह्मायु, भो गोतम, ब्राह्मणो जिण्णो वुड्ढो महल्लको अद्धगतो वयोअनुप्पत्तो, वीसवस्ससतिको जातिया, तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो. यावता, भो, ब्राह्मणगहपतिका मिथिलायं पटिवसन्ति, ब्रह्मायु तेसं ब्राह्मणो अग्गमक्खायति – यदिदं भोगेहि; ब्रह्मायु तेसं ब्राह्मणो अग्गमक्खायति – यदिदं मन्तेहि; ब्रह्मायु तेसं ब्राह्मणो अग्गमक्खायति – यदिदं आयुना चेव यससा च. सो भोतो गोतमस्स दस्सनकामो’’’ति.
‘‘एवं , भो’’ति खो सो माणवको ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स पटिस्सुत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं अट्ठासि. एकमन्तं ठितो खो सो माणवको भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ब्रह्मायु, भो गोतम, ब्राह्मणो भवन्तं गोतमं अप्पाबाधं अप्पातङ्कं लहुट्ठानं बलं फासुविहारं पुच्छति; एवञ्च वदेति – ‘ब्रह्मायु, भो गोतम, ब्राह्मणो जिण्णो वुड्ढो महल्लको अद्धगतो वयोअनुप्पत्तो, वीसवस्ससतिको जातिया, तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो. यावता, भो, ब्राह्मणगहपतिका मिथिलायं पटिवसन्ति, ब्रह्मायु तेसं ब्राह्मणो अग्गमक्खायति – यदिदं भोगेहि; ब्रह्मायु तेसं ब्राह्मणो अग्गमक्खायति – यदिदं मन्तेहि; ब्रह्मायु तेसं ब्राह्मणो अग्गमक्खायति – यदिदं आयुना चेव यससा च. सो भोतो गोतमस्स दस्सनकामो’’’ति. ‘‘यस्सदानि, माणव, ब्रह्मायु ब्राह्मणो कालं मञ्ञती’’ति. अथ खो सो माणवको येन ब्रह्मायु ब्राह्मणो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा ब्रह्मायुं ब्राह्मणं एतदवोच – ‘‘कतावकासो खोम्हि भवता समणेन गोतमेन. यस्सदानि भवं कालं मञ्ञती’’ति.
३९१. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो येन भगवा तेनुपसङ्कमि. अद्दसा खो सा परिसा ब्रह्मायुं ब्राह्मणं दूरतोव आगच्छन्तं. दिस्वान ओरमिय [ओरमत्थ (स्या. कं. पी.), ओरमथ, ओरमति (क.), अथ नं (सी.), ओरमियाति पन त्वापच्चयन्ततथसंवण्णनानुरूपं विसोधितपदं] ओकासमकासि यथा तं ञातस्स यसस्सिनो. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो तं परिसं एतदवोच – ‘‘अलं, भो! निसीदथ तुम्हे सके आसने. इधाहं समणस्स गोतमस्स सन्तिके निसीदिस्सामी’’ति.
अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो भगवतो काये द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि समन्नेसि. अद्दसा खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो भगवतो काये द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येभुय्येन ठपेत्वा द्वे. द्वीसु महापुरिसलक्खणेसु कङ्खति विचिकिच्छति नाधिमुच्चति न सम्पसीदति – कोसोहिते च वत्थगुय्हे, पहूतजिव्हताय च. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो भगवन्तं गाथाहि अज्झभासि –
‘‘ये मे द्वत्तिंसाति सुता, महापुरिसलक्खणा;
दुवे तेसं न पस्सामि, भोतो कायस्मिं गोतम.
‘‘कच्चि कोसोहितं भोतो, वत्थगुय्हं नरुत्तम;
नारीसमानसव्हया, कच्चि जिव्हा न दस्सका [नारीसहनाम सव्हया, कच्चि जिव्हा नरस्सिका; (सी. स्या. कं. पी.)].
‘‘कच्चि पहूतजिव्होसि, यथा तं जानियामसे;
निन्नामयेतं पहूतं, कङ्खं विनय नो इसे.
‘‘दिट्ठधम्महितत्थाय, सम्परायसुखाय च;
कतावकासा पुच्छाम, यं किञ्चि अभिपत्थित’’न्ति.
३९२. अथ खो भगवतो एतदहोसि – ‘‘पस्सति खो मे अयं ब्रह्मायु ब्राह्मणो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येभुय्येन ठपेत्वा द्वे. द्वीसु महापुरिसलक्खणेसु कङ्खति विचिकिच्छति नाधिमुच्चति न सम्पसीदति – कोसोहिते च वत्थगुय्हे, पहूतजिव्हताय चा’’ति . अथ खो भगवा तथारूपं इद्धाभिसङ्खारं अभिसङ्खासि यथा अद्दस ब्रह्मायु ब्राह्मणो भगवतो कोसोहितं वत्थगुय्हं. अथ खो भगवा जिव्हं निन्नामेत्वा उभोपि कण्णसोतानि अनुमसि पटिमसि; उभोपि नासिकसोतानि अनुमसि पटिमसि; केवलम्पि नलाटमण्डलं जिव्हाय छादेसि. अथ खो भगवा ब्रह्मायुं ब्राह्मणं गाथाहि पच्चभासि –
‘‘ये ते द्वत्तिंसाति सुता, महापुरिसलक्खणा;
सब्बे ते मम कायस्मिं, मा ते [मा वो (क.)] कङ्खाहु ब्राह्मण.
‘‘अभिञ्ञेय्यं अभिञ्ञातं, भावेतब्बञ्च भावितं;
पहातब्बं पहीनं मे, तस्मा बुद्धोस्मि ब्राह्मण.
‘‘दिट्ठधम्महितत्थाय , सम्परायसुखाय च;
कतावकासो पुच्छस्सु, यं किञ्चि अभिपत्थित’’न्ति.
३९३. अथ खो ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स एतदहोसि – ‘‘कतावकासो खोम्हि समणेन गोतमेन. किं नु खो अहं समणं गोतमं पुच्छेय्यं – ‘दिट्ठधम्मिकं वा अत्थं सम्परायिकं वा’’’ति. अथ खो ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स एतदहोसि – ‘‘कुसलो खो अहं दिट्ठधम्मिकानं अत्थानं. अञ्ञेपि मं दिट्ठधम्मिकं अत्थं पुच्छन्ति. यंनूनाहं समणं गोतमं सम्परायिकंयेव अत्थं पुच्छेय्य’’न्ति. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो भगवन्तं गाथाहि अज्झभासि –
‘‘कथं खो ब्राह्मणो होति, कथं भवति वेदगू;
तेविज्जो भो कथं होति, सोत्थियो किन्ति वुच्चति.
‘‘अरहं भो कथं होति, कथं भवति केवली;
मुनि च भो कथं होति, बुद्धो किन्ति पवुच्चती’’ति.
३९४. अथ खो भगवा ब्रह्मायुं ब्राह्मणं गाथाहि पच्चभासि –
‘‘पुब्बेनिवासं यो वेदि, सग्गापायञ्च पस्सति;
अथो जातिक्खयं पत्तो, अभिञ्ञा वोसितो मुनि.
‘‘चित्तं विसुद्धं जानाति, मुत्तं रागेहि सब्बसो;
पहीनजातिमरणो, ब्रह्मचरियस्स केवली;
पारगू सब्बधम्मानं, बुद्धो तादी पवुच्चती’’ति.
एवं वुत्ते, ब्रह्मायु ब्राह्मणो उट्ठायासना एकंसं उत्तरासङ्गं करित्वा भगवतो पादेसु सिरसा निपतित्वा भगवतो पादानि मुखेन च परिचुम्बति, पाणीहि च परिसम्बाहति, नामञ्च सावेति – ‘‘ब्रह्मायु अहं, भो गोतम, ब्राह्मणो; ब्रह्मायु अहं, भो गोतम, ब्राह्मणो’’ति. अथ खो सा परिसा अच्छरियब्भुतचित्तजाता अहोसि – ‘‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो! यत्र हि नामायं ब्रह्मायु ब्राह्मणो ञातो यसस्सी एवरूपं परमनिपच्चकारं करिस्सती’’ति. अथ खो भगवा ब्रह्मायुं ब्राह्मणं एतदवोच – ‘‘अलं, ब्राह्मण, उट्ठह निसीद त्वं सके आसने यतो ते मयि चित्तं पसन्न’’न्ति. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो उट्ठहित्वा सके आसने निसीदि.
३९५. अथ खो भगवा ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स अनुपुब्बिं कथं कथेसि, सेय्यथिदं – दानकथं, सीलकथं, सग्गकथं; कामानं आदीनवं ओकारं संकिलेसं नेक्खम्मे आनिसंसं पकासेसि. यदा भगवा अञ्ञासि ब्रह्मायुं ब्राह्मणं कल्लचित्तं मुदुचित्तं विनीवरणचित्तं उदग्गचित्तं पसन्नचित्तं, अथ या बुद्धानं सामुक्कंसिका धम्मदेसना तं पकासेसि – दुक्खं, समुदयं, निरोधं, मग्गं. सेय्यथापि नाम सुद्धं वत्थं अपगतकाळकं सम्मदेव रजनं पटिग्गण्हेय्य, एवमेव ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स तस्मिंयेव आसने विरजं वीतमलं धम्मचक्खुं उदपादि – ‘‘यं किञ्चि समुदयधम्मं सब्बं तं निरोधधम्म’’न्ति. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो दिट्ठधम्मो पत्तधम्मो विदितधम्मो परियोगाळ्हधम्मो तिण्णविचिकिच्छो विगतकथंकथो वेसारज्जप्पत्तो अपरप्पच्चयो सत्थुसासने भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम! सेय्यथापि, भो गोतम, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्तीति – एवमेवं भोता गोतमेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो. एसाहं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गतं. अधिवासेतु च मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसङ्घेना’’ति. अधिवासेसि भगवा तुण्हीभावेन. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो भगवतो अधिवासनं विदित्वा उट्ठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामि . अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो तस्सा रत्तिया अच्चयेन सके निवेसने पणीतं खादनीयं भोजनीयं पटियादापेत्वा भगवतो कालं आरोचापेसि – ‘‘कालो, भो गोतम, निट्ठितं भत्त’’न्ति.
अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय येन ब्रह्मायुस्स ब्राह्मणस्स निवेसनं तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्ञत्ते आसने निसीदि सद्धिं भिक्खुसङ्घेन. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो सत्ताहं बुद्धप्पमुखं भिक्खुसङ्घं पणीतेन खादनीयेन भोजनीयेन सहत्था सन्तप्पेसि सम्पवारेसि. अथ खो भगवा तस्स सत्ताहस्स अच्चयेन विदेहेसु चारिकं पक्कामि. अथ खो ब्रह्मायु ब्राह्मणो अचिरपक्कन्तस्स भगवतो कालमकासि. अथ खो सम्बहुला भिक्खू येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु. एकमन्तं निसिन्ना खो ते भिक्खू भगवन्तं एतदवोचुं – ‘‘ब्रह्मायु, भन्ते, ब्राह्मणो कालङ्कतो. तस्स का गति, को अभिसम्परायो’’ति? ‘‘पण्डितो, भिक्खवे, ब्रह्मायु ब्राह्मणो पच्चपादि धम्मस्सानुधम्मं, न च मं धम्माधिकरणं विहेसेसि. ब्रह्मायु, भिक्खवे, ब्राह्मणो पञ्चन्नं ओरम्भागियानं संयोजनानं परिक्खया ओपपातिको होति, तत्थ परिनिब्बायी, अनावत्तिधम्मो तस्मा लोका’’ति.
इदमवोच भगवा. अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति.
ब्रह्मायुसुत्तं निट्ठितं पठमं.