
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान १२५० भिक्षुओं के विशाल भिक्षुसंघ के साथ अङ्गुत्तराप (देश) में भ्रमण करते हुए ‘आपण’ नामक अङ्गुत्तराप नगर में पहुँचे। 1
उस जटाधारी केणिय ने सुना, “यह सच है, श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रजित हैं, वे १२५० भिक्षुओं के विशाल भिक्षुसंघ के साथ अङ्गुत्तराप में भ्रमण करते हुए ‘आपण’ नामक अङ्गुत्तराप नगर में आ पहुँचे हैं। उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!
वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो। और ऐसे अर्हन्तों का दर्शन वाकई शुभ होता है।”
तब जटाधारी केणिय भगवान के पास गया। जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। 2 एक ओर बैठे जटाधारी केणिय को भगवान ने धम्म-चर्चा से निर्देशित किया, उत्प्रेरित किया, उत्साहित किया, हर्षित किया।
तब, जटाधारी केणिय ने भगवान के द्वारा धम्म-चर्चा से निर्देशित होकर, उत्प्रेरित होकर, उत्साहित होकर, हर्षित होकर, भगवान से कहा, “कृपा कर श्रीमान गोतम कल का भोजन भिक्षुसंघ के साथ मेरे द्वारा स्वीकार करें।”
जब ऐसा कहा गया, तब भगवान ने जटाधारी केणिय से कहा, “केणिय, भिक्षुसंघ १२५० भिक्षुओं का विशाल संघ है, जबकि तुम ब्राह्मणों के प्रति समर्पित हो।”
दूसरी बार, जटाधारी केणिय ने भगवान से कहा, “क्या हुआ, जो भिक्षुसंघ १२५० भिक्षुओं का विशाल संघ है, जबकि मैं ब्राह्मणों के प्रति समर्पित हूँ? कृपा कर श्रीमान गोतम कल का भोजन भिक्षुसंघ के साथ मेरे द्वारा स्वीकार करें।”
दूसरी बार, भगवान ने जटाधारी केणिय से कहा, “केणिय, भिक्षुसंघ १२५० भिक्षुओं का विशाल संघ है, जबकि तुम ब्राह्मणों के प्रति समर्पित हो।”
तब तीसरी बार, जटाधारी केणिय ने भगवान से कहा, “क्या हुआ, जो भिक्षुसंघ १२५० भिक्षुओं का विशाल संघ है, जबकि मैं ब्राह्मणों के प्रति समर्पित हूँ? कृपा कर श्रीमान गोतम कल का भोजन भिक्षुसंघ के साथ मेरे द्वारा स्वीकार करें।”
भगवान ने मौन रहकर स्वीकृति दी। तब जटाधारी केणिय ने भगवान की स्वीकृति जान कर अपने आसन से उठा, और अपने आश्रम गया। जाकर अपने मित्र-सहचारियों और परिजन-रिश्तेदारों को आमंत्रित किया, “सुनो, मेरे मित्रों-सहचारियों, परिजन-रिश्तेदारों! मैंने श्रमण गोतम को भिक्षुसंघ के साथ कल भोजन के लिए निमंत्रित किया है। मुझे शारीरिक रूप से सहायता करिए।”
“ठीक है, श्रीमान!” जटाधारी केणिय के मित्र-सहचारियों और परिजन-रिश्तेदारों ने जटाधारी केणिय को उत्तर दिया। तब, कुछ लोग चूल्हा खोदने लगे, कुछ लोग लकड़ियाँ फाड़ने लगे, कुछ लोग बर्तन माँजने लगे, कुछ लोग जल के घड़े रखने लगे, तो कुछ लोग आसन बिछाने लगे। स्वयं जटाधारी केणिय ने मंडप तैयार किया।
किन्तु उस समय सेल ब्राह्मण आपण गाँव में वास करता था—जो तीन वेदों का अभ्यस्त, मंत्रों का जानकार, तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों का निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ का भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, पदों का वक्ता, व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत था, जो तीन सौ युवा-ब्राह्मणों को मंत्र रटाता था। और उस समय जटाधारी केणिय सेल ब्राह्मण के प्रति आस्था रखता था।
तब सेल ब्राह्मण, तीन सौ युवा-ब्राह्मण शिष्यों के घिरकर, चहलकदमी कर घूमते हुए, टहलते हुए, जटाधारी केणिय के आश्रम के पास गया। तब सेल ब्राह्मण ने जटाधारी केणिय के आश्रम में कुछ लोगों को चूल्हा खोदते हुए देखा, तो कुछ लोगों को लकड़ियाँ फाड़ते हुए देखा, तो कुछ लोगों को बर्तन माँजते हुए देखा, तो कुछ लोगों को जल के घड़े रखते हुए देखा, तो कुछ लोगों को आसन बिछाते हुए देखा। जबकि स्वयं जटाधारी केणिय को मंडप तैयार करते हुए देखा। देखकर उसने जटाधारी केणिय से कहा, “क्या श्रीमान केणिय के यहाँ आवाह-विवाह हो रहा है, या महायज्ञ का आयोजन, या मगध के राजा सेनिय बिम्बिसार को उसकी सेना के साथ भोजन का निमंत्रण दिया है?”
“नहीं, श्रीमान सेल! यहाँ न आवाह-विवाह हो रहा है, न ही मगध के राजा सेनिय बिम्बिसार को उसकी सेना के साथ भोजन का निमंत्रण दिया है। बल्कि मैंने महायज्ञ का आयोजन किया है। यह सच है, श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रजित हैं, वे १२५० भिक्षुओं के विशाल भिक्षुसंघ के साथ अङ्गुत्तराप में भ्रमण करते हुए आपण में आ पहुँचे हैं। उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान! उन्हें ही भिक्षुसंघ के साथ मैंने कल भोजन के लिए निमंत्रित किया है।”
“‘बुद्ध’ कह रहे हो, श्रीमान केणिय?”
“‘बुद्ध’ कह रहा हूँ, श्रीमान सेल!”
“‘बुद्ध’ कह रहे हो, श्रीमान केणिय?”
“‘बुद्ध’ कह रहा हूँ, श्रीमान सेल!”
“‘बुद्ध’ कह रहे हो, श्रीमान केणिय?”
“‘बुद्ध’ कह रहा हूँ, श्रीमान सेल!”
तब सेल ब्राह्मण को लगा, “‘बुद्ध’ का शब्द इस दुनिया में कितना दुर्लभ है! हमारे मंत्रों में ‘महापुरूष के बत्तीस लक्षण’ का उल्लेख आता है, जिनसे युक्त महापुरुष की दो ही गति होती है, तीसरी नहीं।
(१) यदि गृहस्थी में रहे तो वह राजा चक्रवर्ती सम्राट बनता है—धार्मिक धम्मराज, चारों दिशाओं का विजेता, देहातों तक स्थिर शासन, सप्तरत्नों से संपन्न। और उसके लिए सात रत्न प्रादुर्भूत होते हैं—चक्ररत्न, हाथीरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहस्थरत्न, और सातवाँ सलाहकाररत्न। उसके एक हज़ार से अधिक पुत्र होते हैं, जो शूर होते हैं, वीर गुणों से युक्त होते हैं, और पराई सेना की धज्जियाँ उड़ाते हैं। तब भी वह महासागरों से घिरी इस पृथ्वी को बिना लट्ठ, बिना शस्त्र के, धम्म से ही जीत लेता है।
(२) किन्तु यदि वह घर से बेघर होकर प्रव्रजित होता हो, तब वह ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ बनता है, जो इस लोक से (अविद्या का) पर्दाफाश करता है।”
“किन्तु, श्रीमान केणिय, इस समय श्रीमान गोतम अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध कहाँ विहार कर रहे हैं?”
जब ऐसा कहा गया, तब जटाधारी केणिय ने दाहिना बाहु उठाकर (इशारा करते हुए) सेल ब्राह्मण से कहा, “वहाँ, श्रीमान सेल, नील-वन के क्षितिज पर।”
तब, सेल ब्राह्मण अपने तीन सौ युवा-ब्राह्मण शिष्यों के साथ भगवान के पास गया। जाकर सेल ब्राह्मण ने अपने शिष्यों से कहा, “आवाज मत करो, श्रीमानों, धीमे-धीमे पैर रखों। भगवान के पास जाना कठिन है, वे सिंह के जैसे अकेले विचरण करते हैं। और यदि, श्रीमानों, मैं श्रमण गोतम के साथ विचार-विमर्श करूँ, तब वार्तालाप के बीच में खलल मत डालना। पूरा वार्तालाप होने की प्रतीक्षा करना।”
तब, सेल ब्राह्मण भगवान के पास गया, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर सेल ब्राह्मण ने भगवान की काया में बत्तीस महापुरुष लक्षण ढूँढने लगा। अंततः सेल ब्राह्मण ने भगवान के शरीर में दो छोड़कर बचे सभी ३२ महापुरूष-लक्षण देख लिए। उसे बचे २ लक्षणों के बारे में शंका हुई, उलझन हुई: यौन-अंग का आवरण में होना, और जीभ की लंबाई।
तब भगवान को लगा, “इस सेल ब्राह्मण ने मेरी काया में दो छोड़कर बचे सभी ३२ महापुरूष-लक्षण देख लिए हैं। वह बचे दो के बारे में शंका और उलझन को न मिटा पा रहा है, न आश्वस्त हो पा रहा है: यौन-अंग का आवरण में होना, और जीभ की लंबाई।”
तब भगवान ने अपने ऋद्धिबल की संस्कार से ऐसे रचा कि भगवान का अदृश्य यौन-अंग, आवरण में ढका हुआ, सेल ब्राह्मण के लिए दृश्यमान हो जाए। फिर उन्होने अपनी जीभ निकाली और उसे कान के द्वारों पर उल्टा-सीधा लगाई, नाक के द्वारों पर उल्टा-सीधा लगाई, और माथे के मण्डल पर लगाई।
तब सेल ब्राह्मण को लगा, “श्रमण गौतम महापुरूष के संपूर्ण ३२ लक्षणों से युक्त हैं, अधूरे नहीं। किन्तु, मैं नहीं जानता कि क्या वे बुद्ध ही हैं, अथवा नहीं। अब मैंने अपने वरिष्ठ और वृद्ध ब्राह्मण आचार्यों-प्राचार्यों को कहते हुए सुना है कि ‘जब किसी अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध की प्रशंसा हो, तो वे स्वयं को प्रकट करते हैं।’ क्यों न मैं श्रमण गोतम के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति करूँ?”
तब, सेल ब्राह्मण ने भगवान के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति 3 करने लगा—
और तब, सेल ब्राह्मण को उसकी परिषद के साथ भगवान के पास प्रव्रज्या मिली, और उपसंपदा भी मिल गयी।
रात बीतने पर जटाधारी केणिय ने अपने आश्रम में उत्तम खाद्य और भोजन बनवाकर भगवान को समय सूचित किया, “उचित समय है, गुरु गोतम! भोजन तैयार है।”
तब सुबह होने पर भगवान ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर, भिक्षुसंघ के साथ जटाधारी केणिय के आश्रम गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गये। तब जटाधारी केणिय ने बुद्ध प्रमुख भिक्षुसंघ को अपने हाथों से उत्तम खाद्य और भोजन परोस कर संतृप्त किया, संतुष्ट किया। 4 भगवान के भोजन कर पात्र से हाथ हटाने के पश्चात, जटाधारी केणिय ने स्वयं का आसन नीचे लगाया और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे जटाधारी केणिय का भगवान ने इन गाथाओं से अनुमोदन किया—
भगवान ने जटाधारी केणिय का इन गाथाओं से अनुमोदन किया, और आसन से उठकर चले गए।
तब, आयुष्मान सेल और (पूर्व-शिष्यों की) परिषद अकेले एकांतवास लेकर अप्रमत्त, तत्पर और समर्पित होकर विहार करने लगे। तब उन्होंने जल्द ही इसी जीवन में स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर, ब्रह्मचर्य की उस सर्वोच्च मंजिल पर पहुँचकर स्थित हुए, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रजित होते हैं। उन्हें पता चला—‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’
इस तरह, आयुष्मान सेल और परिषद (अनेक) अर्हन्तों में एक हुए।
तब आयुष्मान सेल परिषद के साथ भगवान के पास गए, और जाकर चीवर को एक कंधे पर रख भगवान को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए भगवान से गाथाओं में कहा—
अङ्ग वह इलाका था जो गंगा नदी के किनारे, मगध और वैशाली के पूरब की तरफ पड़ता था। गंगा और मही नदी के उत्तर वाले हिस्से को “अंगुत्तराप” कहा जाता था, जिसका मतलब है—“पानी के उत्तर वाला अंग।” इस क्षेत्र का मुख्य व्यावसायिक शहर आपण था, जो वहाँ की सबसे महत्वपूर्ण बस्ती माना जाता था। अंग राज्य असल में मगध के अधीन था, यानी मगध के राजा सेनिय बिम्बिसार ही उस पर अधिकार रखते थे। इसलिए आगे के विवरण में भी उसका जिक्र आता है। ↩︎
इस जटाधारी केणिय का उल्लेख विनयपिटक (महावग्ग ६: भेसज्जक्खन्धक) में भी मिलता है, जहाँ इस प्रसंग में वह भगवान बुद्ध और भिक्षुसंघ को सायंकाल में पेय अर्पित करता है। उसका तर्क यह था कि प्राचीन ब्राह्मण ऋषि भी ऐसा ही करते थे। परिणामस्वरूप, भगवान बुद्ध ने भी भिक्षुसंघ को सायंकाल के समय फल-रस तथा अन्य पेयों के सेवन की अनुमति प्रदान की। ↩︎
सेल ब्राह्मण की यही गाथाएँ आगे चलकर थेरगाथा १६.६ में भी मिलती हैं, जब वह अरहंत आयुष्मान सेल भन्ते के रूप में प्रतिष्ठित होता है। परंतु यह कथन—“जब किसी अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध की प्रशंसा होती है, तो वे स्वयं प्रकट हो जाते हैं”—अन्य कहीं उल्लेखित नहीं मिलता। यह तथ्य है या नहीं, इसे निश्चित रूप से कह पाना कठिन है; फिर भी प्रतीत होता है कि इस विशेष जानकारी से केवल सेल ब्राह्मण ही परिचित था। ↩︎
यद्यपि यहाँ यह स्पष्ट नहीं कहा गया कि उस समय भिक्षुसंघ पहले से ही १२५० भिक्षुओं का एक विशाल समुदाय था, जिन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया गया था, परन्तु जब सेल और उसके ३०० पूर्व शिष्य भी उपसंम्पदा प्राप्त कर लेते हैं, तो स्वाभाविक रूप से संघ की संख्या लगभग १५५१ भिक्षुओं तक पहुँच जाती है। अपने ही पूर्व गुरु सेल ब्राह्मण को अब भिक्षु-रूप में देखकर और स्वयं उन्हें भोजन अर्पित करते हुए जटाधारी केणिय के मन में क्या चलता होगा—यह पाठकों की कल्पना के लिए छोड़ दिया गया है। ↩︎
३९६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा अङ्गुत्तरापेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं अड्ढतेळसेहि भिक्खुसतेहि येन आपणं नाम अङ्गुत्तरापानं निगमो तदवसरि. अस्सोसि खो केणियो जटिलो – ‘‘समणो खलु, भो, गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो अङ्गुत्तरापेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं अड्ढतेळसेहि भिक्खुसतेहि आपणं अनुप्पत्तो. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवाति. सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति. सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं, केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति. साधु खो पन तथारूपानं अरहतं दस्सनं होती’’’ति.
अथ खो केणियो जटिलो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो केणियं जटिलं भगवा धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि सम्पहंसेसि . अथ खो केणियो जटिलो भगवता धम्मिया कथाय सन्दस्सितो समादपितो समुत्तेजितो सम्पहंसितो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अधिवासेतु मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसङ्घेना’’ति. एवं वुत्ते, भगवा केणियं जटिलं एतदवोच – ‘‘महा खो, केणिय, भिक्खुसङ्घो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, त्वञ्च ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो’’ति. दुतियम्पि खो केणियो जटिलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘किञ्चापि खो, भो गोतम, महा भिक्खुसङ्घो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, अहञ्च ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो; अधिवासेतु मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसङ्घेना’’ति. दुतियम्पि खो भगवा केणियं जटिलं एतदवोच – ‘‘महा खो, केणिय, भिक्खुसङ्घो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, त्वञ्च ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो’’ति. ततियम्पि खो केणियो जटिलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘किञ्चापि खो, भो गोतम, महा भिक्खुसङ्घो अड्ढतेळसानि भिक्खुसतानि, अहञ्च ब्राह्मणेसु अभिप्पसन्नो; अधिवासेतु मे भवं गोतमो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसङ्घेना’’ति . अधिवासेसि भगवा तुण्हीभावेन. अथ खो केणियो जटिलो भगवतो अधिवासनं विदित्वा उट्ठायासना येन सको अस्समो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा मित्तामच्चे ञातिसालोहिते आमन्तेसि – ‘‘सुणन्तु मे भोन्तो, मित्तामच्चा ञातिसालोहिता; समणो मे गोतमो निमन्तितो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसङ्घेन. येन मे कायवेय्यावटिकं [कायवेयावट्टिकं (सी. स्या. कं.), कायवेय्यावतिकं (क.)] करेय्याथा’’ति. ‘‘एवं, भो’’ति खो केणियस्स जटिलस्स मित्तामच्चा ञातिसालोहिता केणियस्स जटिलस्स पटिस्सुत्वा अप्पेकच्चे उद्धनानि खणन्ति, अप्पेकच्चे कट्ठानि फालेन्ति, अप्पेकच्चे भाजनानि धोवन्ति, अप्पेकच्चे उदकमणिकं पतिट्ठापेन्ति, अप्पेकच्चे आसनानि पञ्ञपेन्ति. केणियो पन जटिलो सामंयेव मण्डलमालं पटियादेति.
३९७. तेन खो पन समयेन सेलो ब्राह्मणो आपणे पटिवसति तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं , पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो, तीणि च माणवकसतानि मन्ते वाचेति. तेन खो पन समयेन केणियो जटिलो सेले ब्राह्मणे अभिप्पसन्नो होति. अथ खो सेलो ब्राह्मणो तीहि माणवकसतेहि परिवुतो जङ्घाविहारं अनुचङ्कममानो अनुविचरमानो येन केणियस्स जटिलस्स अस्समो तेनुपसङ्कमि. अद्दसा खो सेलो ब्राह्मणो केणियस्स जटिलस्स अस्समे अप्पेकच्चे उद्धनानि खणन्ते, अप्पेकच्चे कट्ठानि फालेन्ते, अप्पेकच्चे भाजनानि धोवन्ते, अप्पेकच्चे उदकमणिकं पतिट्ठापेन्ते, अप्पेकच्चे आसनानि पञ्ञपेन्ते, केणियं पन जटिलं सामंयेव मण्डलमालं पटियादेन्तं. दिस्वान केणियं जटिलं एतदवोच – ‘‘किं नु भोतो केणियस्स आवाहो वा भविस्सति विवाहो वा भविस्सति महायञ्ञो वा पच्चुपट्ठितो, राजा वा मागधो सेनियो बिम्बिसारो निमन्तितो स्वातनाय सद्धिं बलकायेना’’ति? ‘‘न मे, भो सेल, आवाहो भविस्सति नपि विवाहो भविस्सति नपि राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो निमन्तितो स्वातनाय सद्धिं बलकायेन; अपि च खो मे महायञ्ञो पच्चुपट्ठितो. अत्थि, भो, समणो गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो अङ्गुत्तरापेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं अड्ढतेळसेहि भिक्खुसतेहि आपणं अनुप्पत्तो. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति. सो मे निमन्तितो स्वातनाय भत्तं सद्धिं भिक्खुसङ्घेना’’ति.
‘‘बुद्धोति – भो केणिय, वदेसि’’?
‘‘बुद्धोति – भो सेल, वदामि’’.
‘‘बुद्धोति – भो केणिय, वदेसि’’?
‘‘बुद्धोति – भो सेल, वदामी’’ति.
३९८. अथ खो सेलस्स ब्राह्मणस्स एतदहोसि – ‘‘घोसोपि खो एसो दुल्लभो लोकस्मिं – यदिदं ‘बुद्धो’ति [यदिदं बुद्धो बुद्धोति (क.)]. आगतानि खो पनम्हाकं मन्तेसु द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येहि समन्नागतस्स महापुरिसस्स द्वेयेव गतियो भवन्ति अनञ्ञा. सचे अगारं अज्झावसति, राजा होति चक्कवत्ती धम्मिको धम्मराजा चातुरन्तो विजितावी जनपदत्थावरियप्पत्तो सत्तरतनसमन्नागतो. तस्सिमानि सत्त रतनानि भवन्ति, सेय्यथिदं – चक्करतनं, हत्थिरतनं, अस्सरतनं, मणिरतनं, इत्थिरतनं, गहपतिरतनं, परिणायकरतनमेव सत्तमं. परोसहस्सं खो पनस्स पुत्ता भवन्ति सूरा वीरङ्गरूपा परसेनप्पमद्दना. सो इमं पथविं सागरपरियन्तं अदण्डेन असत्थेन धम्मेन अभिविजिय अज्झावसति. सचे पन अगारस्मा अनगारियं पब्बजति, अरहं होति सम्मासम्बुद्धो लोके विवट्टच्छदो’’.
‘‘कहं पन, भो केणिय, एतरहि सो भवं गोतमो विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति? एवं वुत्ते, केणियो जटिलो दक्खिणं बाहुं पग्गहेत्वा सेलं ब्राह्मणं एतदवोच – ‘‘येनेसा, भो सेल, नीलवनराजी’’ति. अथ खो सेलो ब्राह्मणो तीहि माणवकसतेहि सद्धिं येन भगवा तेनुपसङ्कमि. अथ खो सेलो ब्राह्मणो ते माणवके आमन्तेसि – ‘‘अप्पसद्दा भोन्तो आगच्छन्तु पदे पदं [पादे पादं (सी.)] निक्खिपन्ता; दुरासदा [दूरसद्दा (क.)] हि ते भगवन्तो सीहाव एकचरा. यदा चाहं, भो, समणेन गोतमेन सद्धिं मन्तेय्यं, मा मे भोन्तो अन्तरन्तरा कथं ओपातेथ. कथापरियोसानं मे भवन्तो आगमेन्तू’’ति. अथ खो सेलो ब्राह्मणो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो सेलो ब्राह्मणो भगवतो काये द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि समन्नेसि.
अद्दसा खो सेलो ब्राह्मणो भगवतो काये द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येभुय्येन ठपेत्वा द्वे. द्वीसु महापुरिसलक्खणेसु कङ्खति विचिकिच्छति नाधिमुच्चति न सम्पसीदति – कोसोहिते च वत्थगुय्हे, पहूतजिव्हताय च. अथ खो भगवतो एतदहोसि – ‘‘पस्सति खो मे अयं सेलो ब्राह्मणो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणानि, येभुय्येन ठपेत्वा द्वे. द्वीसु महापुरिसलक्खणेसु कङ्खति विचिकिच्छति नाधिमुच्चति न सम्पसीदति – कोसोहिते च वत्थगुय्हे, पहूतजिव्हताय चा’’ति. अथ खो भगवा तथारूपं इद्धाभिसङ्खारं अभिसङ्खासि, यथा अद्दस सेलो ब्राह्मणो भगवतो कोसोहितं वत्थगुय्हं. अथ खो भगवा जिव्हं निन्नामेत्वा उभोपि कण्णसोतानि अनुमसि पटिमसि; उभोपि नासिकसोतानि अनुमसि पटिमसि; केवलम्पि नलाटमण्डलं जिव्हाय छादेसि. अथ खो सेलस्स ब्राह्मणस्स एतदहोसि – ‘‘समन्नागतो खो समणो गोतमो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि परिपुण्णेहि, नो अपरिपुण्णेहि; नो च खो नं जानामि बुद्धो वा नो वा. सुतं खो पन मेतं ब्राह्मणानं वुद्धानं महल्लकानं आचरियपाचरियानं भासमानानं – ‘ये ते भवन्ति अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा ते सके वण्णे भञ्ञमाने अत्तानं पातुकरोन्ती’ति. यंनूनाहं समणं गोतमं सम्मुखा सारुप्पाहि गाथाहि अभित्थवेय्य’’न्ति.
३९९. अथ खो सेलो ब्राह्मणो भगवन्तं सम्मुखा सारुप्पाहि गाथाहि अभित्थवि –
‘‘परिपुण्णकायो सुरुचि, सुजातो चारुदस्सनो;
सुवण्णवण्णोसि भगवा, सुसुक्कदाठोसि वीरियवा [विरियवा (सी. स्या. कं. पी.)].
‘‘नरस्स हि सुजातस्स, ये भवन्ति वियञ्जना;
सब्बे ते तव कायस्मिं, महापुरिसलक्खणा.
‘‘पसन्ननेत्तो सुमुखो, ब्रहा [ब्रह्मा (स्या. कं. क.)] उजु पतापवा;
मज्झे समणसङ्घस्स, आदिच्चोव विरोचसि.
‘‘कल्याणदस्सनो भिक्खु, कञ्चनसन्निभत्तचो;
किं ते समणभावेन, एवं उत्तमवण्णिनो.
‘‘राजा अरहसि भवितुं, चक्कवत्ती रथेसभो;
चातुरन्तो विजितावी, जम्बुसण्डस्स [जम्बुमण्डस्स (क.)] इस्सरो.
‘‘खत्तिया भोगिराजानो, अनुयन्ता [अनुयुत्ता (सी. स्या. कं. पी.)] भवन्तु ते;
राजाभिराजा मनुजिन्दो, रज्जं कारेहि गोतम’’.
‘‘राजाहमस्मि सेलाति, धम्मराजा अनुत्तरो;
धम्मेन चक्कं वत्तेमि, चक्कं अप्पटिवत्तियं’’.
‘‘सम्बुद्धो पटिजानासि, धम्मराजा अनुत्तरो;
‘धम्मेन चक्कं वत्तेमि’, इति भाससि गोतम.
‘‘को नु सेनापति भोतो, सावको सत्थुरन्वयो;
को ते तमनुवत्तेति, धम्मचक्कं पवत्तितं’’.
‘‘मया पवत्तितं चक्कं, (सेलाति भगवा धम्मचक्कं अनुत्तरं;
सारिपुत्तो अनुवत्तेति, अनुजातो तथागतं.
‘‘अभिञ्ञेय्यं अभिञ्ञातं, भावेतब्बञ्च भावितं;
पहातब्बं पहीनं मे, तस्मा बुद्धोस्मि ब्राह्मण.
‘‘विनयस्सु मयि कङ्खं, अधिमुच्चस्सु ब्राह्मण;
दुल्लभं दस्सनं होति, सम्बुद्धानं अभिण्हसो.
‘‘येसं वे दुल्लभो लोके, पातुभावो अभिण्हसो;
सोहं ब्राह्मण सम्बुद्धो, सल्लकत्तो अनुत्तरो.
‘‘ब्रह्मभूतो अतितुलो, मारसेनप्पमद्दनो;
सब्बामित्ते वसी कत्वा, मोदामि अकुतोभयो’’.
‘‘इमं भोन्तो निसामेथ, यथा भासति चक्खुमा;
सल्लकत्तो महावीरो, सीहोव नदती वने.
‘‘ब्रह्मभूतं अतितुलं, मारसेनप्पमद्दनं;
को दिस्वा नप्पसीदेय्य, अपि कण्हाभिजातिको.
‘‘यो मं इच्छति अन्वेतु, यो वा निच्छति गच्छतु;
इधाहं पब्बजिस्सामि, वरपञ्ञस्स सन्तिके’’.
‘‘एतञ्चे [एवञ्चे (स्या. कं.)] रुच्चति भोतो, सम्मासम्बुद्धसासनं [सम्मासम्बुद्धसासने (कत्थचि सुत्तनिपाते)];
मयम्पि पब्बजिस्साम, वरपञ्ञस्स सन्तिके’’.
‘‘ब्राह्मणा तिसता इमे, याचन्ति पञ्जलीकता;
ब्रह्मचरियं चरिस्साम, भगवा तव सन्तिके’’.
‘‘स्वाक्खातं ब्रह्मचरियं, (सेलाति भगवा सन्दिट्ठिकमकालिकं;
यत्थ अमोघा पब्बज्जा, अप्पमत्तस्स सिक्खतो’’ति.
अलत्थ खो सेलो ब्राह्मणो सपरिसो भगवतो सन्तिके पब्बज्जं, अलत्थ उपसम्पदं.
४००. अथ खो केणियो जटिलो तस्सा रत्तिया अच्चयेन सके अस्समे पणीतं खादनीयं भोजनीयं पटियादापेत्वा भगवतो कालं आरोचापेसि – ‘‘कालो, भो गोतम, निट्ठितं भत्त’’न्ति. अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय येन केणियस्स जटिलस्स अस्समो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्ञत्ते आसने निसीदि सद्धिं भिक्खुसङ्घेन. अथ खो केणियो जटिलो बुद्धप्पमुखं भिक्खुसङ्घं पणीतेन खादनीयेन भोजनीयेन सहत्था सन्तप्पेसि, सम्पवारेसि. अथ खो केणियो जटिलो भगवन्तं भुत्ताविं ओनीतपत्तपाणिं अञ्ञतरं नीचं आसनं गहेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो केणियं जटिलं भगवा इमाहि गाथाहि अनुमोदि –
‘‘अग्गिहुत्तमुखा यञ्ञा, सावित्ती छन्दसो मुखं;
राजा मुखं मनुस्सानं, नदीनं सागरो मुखं.
‘‘नक्खत्तानं मुखं चन्दो, आदिच्चो तपतं मुखं;
पुञ्ञं आकङ्खमानानं, सङ्घो वे यजतं मुख’’न्ति.
अथ खो भगवा केणियं जटिलं इमाहि गाथाहि अनुमोदित्वा उट्ठायासना पक्कामि.
अथ खो आयस्मा सेलो सपरिसो एको वूपकट्ठो अप्पमत्तो आतापी पहितत्तो विहरन्तो नचिरस्सेव – यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति तदनुत्तरं – ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहासि. ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति अब्भञ्ञासि. अञ्ञतरो खो पनायस्मा सेलो सपरिसो अरहतं अहोसि. अथ खो आयस्मा सेलो सपरिसो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा एकंसं चीवरं कत्वा येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा भगवन्तं गाथाहि अज्झभासि –
‘‘यं तं सरणमागम्म, इतो अट्ठमि चक्खुमा;
सत्तरत्तेन [अनुत्तरेन (क.)] भगवा, दन्तम्ह तव सासने.
‘‘तुवं बुद्धो तुवं सत्था, तुवं माराभिभू मुनि;
तुवं अनुसये छेत्वा, तिण्णो तारेसिमं पजं.
‘‘उपधी ते समतिक्कन्ता, आसवा ते पदालिता;
सीहोव अनुपादानो, पहीनभयभेरवो.
‘‘भिक्खवो तिसता इमे, तिट्ठन्ति पञ्जलीकता;
पादे वीर पसारेहि, नागा वन्दन्तु सत्थुनो’’ति.
सेलसुत्तं निट्ठितं दुतियं.