
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। उस समय विविध देशों से पाँच सौ ब्राह्मण आकर श्रावस्ती में किसी कार्य से रह रहे थे।
तब उन ब्राह्मणों को लगा, “ये श्रमण गोतम चातुर्वर्णीय शुद्धि (=चारों वर्ण के लोगों की शुद्धि) बताते हैं। कौन है, जो इस बारे में श्रमण गोतम के साथ बहस कर सकता है?”
उस समय अस्सलायन नामक युवा-ब्राह्मण श्रावस्ती में वास करता था—जो बहुत तरुण, सिर मुंडा हुआ, सोलह वर्ष का लड़का था, जो वेदों का अभ्यस्त, मंत्रों का जानकार, तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों का निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ का भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, पदों का वक्ता, व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत था।
तब उन ब्राह्मणों को लगा, “यह अस्सलायन नामक युवा-ब्राह्मण श्रावस्ती में वास करता है—जो बहुत तरुण, सिर मुंडा हुआ, सोलह वर्ष का लड़का है… वह है, जो इस बारे में श्रमण गोतम के साथ बहस कर सकता है।”
तब वे ब्राह्मण अस्सलायन युवा-ब्राह्मण के पास गए, और जाकर अस्सलायन युवा-ब्राह्मण से कहा, “श्रीमान अस्सलायन, ये श्रमण गोतम चातुर्वर्णीय शुद्धि बताते हैं। कृपा कर इस बारे में श्रीमान अस्सलायन श्रमण गोतम के साथ बहस करे।”
जब ऐसा कहा गया, तब अस्सलायन युवा-ब्राह्मण ने उन ब्राह्मणों से कहा, “श्रीमानों, सुना है श्रमण गोतम धम्मवादी (=धम्म बताने वाले) है। धम्मवादियों से बहस करना कठिन है। मैं इस बारे में श्रमण गोतम के साथ बहस नहीं कर सकता।”
तब दूसरी बार, उन ब्राह्मणों ने अस्सलायन युवा-ब्राह्मण से कहा, “श्रीमान अस्सलायन, ये श्रमण गोतम चातुर्वर्णीय शुद्धि बताते हैं। कृपा कर इस बारे में श्रीमान अस्सलायन श्रमण गोतम के साथ बहस करे। श्रीमान अस्सलायन ने घुमक्कड़ चर्या का भी पालन किया है।”
तब दूसरी बार, अस्सलायन युवा-ब्राह्मण ने उन ब्राह्मणों से कहा, “श्रीमानों, सुना है श्रमण गोतम धम्मवादी है। धम्मवादियों से बहस करना कठिन है। मैं इस बारे में श्रमण गोतम के साथ बहस नहीं कर सकता।”
तब तीसरी बार, उन ब्राह्मणों ने अस्सलायन युवा-ब्राह्मण से कहा, “श्रीमान अस्सलायन, ये श्रमण गोतम चातुर्वर्णीय शुद्धि बताते हैं। कृपा कर इस बारे में श्रीमान अस्सलायन श्रमण गोतम के साथ बहस करे। श्रीमान अस्सलायन ने घुमक्कड़ चर्या का भी पालन किया है। बिना युद्ध किए ही, श्रीमान अस्सलायन, पराजित मत होईये।”
जब ऐसा कहा गया, तब अस्सलायन युवा-ब्राह्मण ने उन ब्राह्मणों से कहा, “ऐसा लगता है कि आप श्रीमानों को कहने से कोई लाभ नहीं मिलेगा कि श्रमण गोतम धम्मवादी है। धम्मवादियों से बहस करना कठिन है। मैं इस बारे में श्रमण गोतम के साथ बहस नहीं कर सकता। तब भी मैं आप श्रीमानों की बात पर जाऊँगा।”
तब अस्सलायन युवा-ब्राह्मण विशाल ब्राह्मण-गणों से साथ भगवान के पास गया, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर अस्सलायन युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, ब्राह्मण कहते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुक्ल (=उजला) वर्ण है, बाकी कृष्ण (=काला) वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुद्ध हैं, बाकी नहीं। ब्राह्मण ही ब्रह्मा के पुत्र, ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए, ब्रह्मा से जन्में, ब्रह्मा से निर्मित, ब्रह्मा के (असली) वारिस हैं।’ इस पर श्रीमान गोतम को क्या कहना है?”
“किन्तु, अस्सलायन, ब्राह्मणों की ब्राह्मणिया ऋतुमती होते, गर्भिणी होते, जन्म देते, और दूध पिलाते हुए देखी जाती हैं। वे ब्राह्मणियों के गर्भ से जन्म लेने पर भी कहते हैं, ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुक्ल वर्ण है, बाकी कृष्ण वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुद्ध हैं, बाकी नहीं। ब्राह्मण ही ब्रह्मा के पुत्र, ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए, ब्रह्मा से जन्में, ब्रह्मा से निर्मित, ब्रह्मा के वारिस हैं।’”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन, क्या तुमने सुना है कि ‘योन (=वर्तमान ग्रीस), कम्बोज (=वर्तमान ईरान), और अन्य देशों में केवल दो वर्ण हैं—स्वामी और गुलाम। जहाँ स्वामी भी दास बन सकते हैं, और दास भी स्वामी बन सकते हैं’?”
“हाँ, श्रीमान गोतम, मैंने सुना है कि ‘योन, कम्बोज और अन्य देशों में केवल दो वर्ण हैं—स्वामी और गुलाम। जहाँ स्वामी भी दास बन सकते हैं, और दास भी स्वामी बन सकते हैं।’”
“जब ऐसा है, अस्सलायन, तब भला ब्राह्मणों के ऐसा कहने का क्या बल, क्या आश्वासन है कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’?”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन? यदि कोई क्षत्रिय जीवहत्या, चोरी या व्यभिचार करता हो; झूठ, फूट डालने वाली, कटु, या व्यर्थ बातें करता हो; लालची, दुर्भावनापूर्ण, या मिथ्यादृष्टि का हो—तो क्या केवल वही मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजेगा, कोई ब्राह्मण नहीं?”
अथवा, यदि कोई वैश्य… या कोई शूद्र जीवहत्या, चोरी या व्यभिचार करता हो; झूठ, फूट डालने वाली, कटु, या व्यर्थ बातें करता हो; लालची, दुर्भावनापूर्ण, या मिथ्यादृष्टि का हो—तो क्या केवल वही मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजेगा, कोई ब्राह्मण नहीं?"
“नहीं, श्रीमान गोतम। चाहे कोई क्षत्रिय… या ब्राह्मण… या वैश्य… या शूद्र जीवहत्या, चोरी या व्यभिचार करता हो; झूठ, फूट डालने वाली, कटु, या व्यर्थ बातें करता हो; लालची, दुर्भावनापूर्ण, या मिथ्यादृष्टि का हो—तो वह मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजेगा। सभी चारों वर्ण, श्रीमान गोतम, जीवहत्या, चोरी… (इत्यादि) करने पर… नर्क में उपजेंगे।”
“जब ऐसा है, अस्सलायन, तब भला ब्राह्मणों के ऐसा कहने का क्या बल, क्या आश्वासन है कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’?”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन? यदि कोई ब्राह्मण जीवहत्या, चोरी और व्यभिचार से विरत रहता हो; झूठ, फूट डालने वाली, कटु और व्यर्थ बातों से विरत रहता हो; न लालची, न दुर्भावनापूर्ण हो, बल्कि सम्यक-दृष्टि वाला हो—क्या केवल वही मरणोपरांत काया छूटने पर सद्गति होकर स्वर्ग में उपजेगा, कोई क्षत्रिय नहीं, या वैश्य नहीं, या शूद्र नहीं?”
“नहीं, श्रीमान गोतम। यदि कोई क्षत्रिय… या ब्राह्मण… या वैश्य… या शूद्र भी जीवहत्या, चोरी और व्यभिचार से विरत रहता हो; झूठ, फूट डालने वाली, कटु और व्यर्थ बातों से विरत रहता हो; न लालची, न दुर्भावनापूर्ण हो, बल्कि सम्यक-दृष्टि वाला हो—तो वह मरणोपरांत काया छूटने पर सद्गति होकर स्वर्ग में उपजेगा। सभी चारों वर्ण, श्रीमान गोतम, जीवहत्या, चोरी… (इत्यादि से) विरत रहने पर… स्वर्ग में उपजेंगे।”
“जब ऐसा है, अस्सलायन, तब भला ब्राह्मणों के ऐसा कहने का क्या बल, क्या आश्वासन है कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’?”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन? क्या केवल कोई ब्राह्मण ही इस प्रदेश के लिए निर्बैर, निर्द्वेष, सद्भावपूर्ण (“मेत्ता”) चित्त विकसित कर सकता है, कोई क्षत्रिय नहीं, या वैश्य नहीं, या शूद्र नहीं?”
“नहीं, श्रीमान गोतम। कोई क्षत्रिय… या कोई ब्राह्मण… या कोई वैश्य… या कोई शूद्र भी इस प्रदेश के लिए निर्बैर, निर्द्वेष, मेत्ता चित्त विकसित कर सकता है। सभी चारों वर्ण, श्रीमान गोतम, इस प्रदेश के लिए निर्बैर, निर्द्वेष, मेत्ता चित्त विकसित कर सकते हैं।”
“जब ऐसा है, अस्सलायन, तब भला ब्राह्मणों के ऐसा कहने का क्या बल, क्या आश्वासन है कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’?”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन? क्या केवल कोई ब्राह्मण ही नहाने का चूर्ण (=साबुन) नदी में ले जाकर (नहाकर अपना) धूल-मल साफ कर सकता है, कोई क्षत्रिय नहीं, या वैश्य नहीं, या शूद्र नहीं?”
“नहीं, श्रीमान गोतम। यदि कोई क्षत्रिय… या ब्राह्मण… या वैश्य… या शूद्र भी नहाने का चूर्ण नदी में ले जाकर धूल-मल साफ कर सकता है। सभी चारों वर्ण, श्रीमान गोतम, नहाने का चूर्ण नदी में ले जाकर धूल-मल साफ कर सकते हैं।”
“जब ऐसा है, अस्सलायन, तब भला ब्राह्मणों के ऐसा कहने का क्या बल, क्या आश्वासन है कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’?”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन? यदि कोई राजतिलक हुआ क्षत्रिय राजा विभिन्न जातियों के सौ पुरुषों को इकट्ठा करे, ‘आओ, श्रीमानो। आप में से जो क्षत्रिय-कुल, ब्राह्मण-कुल, या राजसी-कुल में उत्पन्न हुए हो, वे इस सागौन, शाल, सरल, चन्दन या पद्म की उत्तरारणि 1 लेकर अग्नि जलाएँ, गर्मी उत्पन्न करें। और, आप में से जो चण्डाल-कुल (मृतदेह का काम करने वाले), निषाद-कुल (शिकार करने वाले), वेन-कुल (बांस का काम करने वाले), रथकार-कुल (बढई का काम करने वाले), या पुक्कुस-कुल (मैला उठाने वाले) में उत्पन्न हुए हो, वे इस कुत्तों के नाली से, सूअरों की नाली से, कूड़े की नाली से, या ऐरण्ड की काष्ठ से उत्तरारणि लेकर अग्नि जलाएँ, गर्मी उत्पन्न करें।’
तब क्या लगता है, अस्सलायन? क्या केवल क्षत्रिय-कुल, ब्राह्मण-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की ही आँच होगी, तेज रंग होगा, प्रकाशमान होगा, और कुछ अग्नि से अग्नि जलाने का काम हो सकेगा? किन्तु, जो चण्डाल-कुल, निषाद-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की न आँच होगी, न तेज रंग होगा, न प्रकाशमान होगा, और न ही कुछ अग्नि से अग्नि जलाने का काम हो सकेगा?”
“नहीं, श्रीमान गोतम। क्षत्रिय-कुल, ब्राह्मण-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की आँच, तेज रंग, प्रकाशमान… अग्नि जलाने का काम हो सकेगा। और साथ ही, जो चण्डाल-कुल, निषाद-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की भी आँच, तेज रंग, प्रकाशमान… अग्नि जलाने का काम हो सकेगा। क्योंकि सभी प्रकार से आग की आँच होती है, तेज रंग होता है, प्रकाशमान होता है… अग्नि जलाने का काम होता है।”
“जब ऐसा है, अस्सलायन, तब भला ब्राह्मणों के ऐसा कहने का क्या बल, क्या आश्वासन है कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’?”
“भले ही श्रीमान गोतम ऐसा कहे, तब भी ब्राह्मण ऐसा ही मानते हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’”
“क्या लगता है, अस्सलायन? यदि क्षत्रिय कुमार ब्राह्मण कन्या के साथ संवास करे, और उस संवास से पुत्र पैदा हो। क्या क्षत्रिय कुमार और ब्राह्मण कन्या के संवास से पैदा पुत्र माता पर जाएगा या पिता पर जाएगा? क्या उसे ‘क्षत्रिय’ कहेंगे, या ‘ब्राह्मण’ कहेंगे?”
“श्रीमान गोतम, क्षत्रिय कुमार और ब्राह्मण कन्या के संवास से पैदा पुत्र माता पर भी जा सकता है, या पिता पर जा सकता है। उसे ‘क्षत्रिय’ कह सकते हैं, या ‘ब्राह्मण’ भी कह सकते हैं।”
“और, क्या लगता है, अस्सलायन? यदि ब्राह्मण कुमार क्षत्रिय कन्या के साथ संवास करे, और उस संवास से पुत्र पैदा हो। क्या ब्राह्मण कुमार और क्षत्रिय कन्या के संवास से पैदा पुत्र माता पर जाएगा या पिता पर जाएगा? क्या उसे ‘क्षत्रिय’ कहेंगे, या ‘ब्राह्मण’ कहेंगे?”
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण कुमार और क्षत्रिय कन्या के संवास से पैदा पुत्र भी माता पर जा सकता है, या पिता पर जा सकता है। उसे भी ‘क्षत्रिय’ कह सकते हैं, या ‘ब्राह्मण’ भी कह सकते हैं।”
“और, आगे क्या लगता है, अस्सलायन? यदि घोड़ी गधे से संगम करे, और उस संगम से खच्चर पैदा हो, तो घोड़ी और गधे के संगम के पैदा खच्चर माता पर जाएगा या पिता पर जाएगा? क्या उसे ‘अश्व’ कहेंगे, या ‘गधा’ कहेंगे?”
“श्रीमान गोतम, वह संकर होने पर खच्चर होगा। मैं इस मामले में तो फर्क देखता हूँ, श्रीमान गोतम। किन्तु, पिछले मामलों में फर्क नहीं देखता।”
“और, आगे क्या लगता है, अस्सलायन? यदि दो युवा-ब्राह्मण एक कोख से जन्में भाई हो, जिनमें एक पढ़ा-लिखा (=मंत्र-जाप कर्ता) अध्यापक हो, और दूसरा अनपढ़ हो, अध्यापक नहीं। तब ब्राह्मण श्राद्ध, थाली-पाक, यज्ञ, या अतिथि-सत्कार का भोजन पहले किसे देंगे?”
“तब श्रीमान गोतम, जो युवा-ब्राह्मण पढ़ा-लिखा अध्यापक हैं, उसे ब्राह्मण श्राद्ध, थाली-पाक, यज्ञ, या अतिथि-सत्कार का भोजन पहले देंगे। क्योंकि, श्रीमान गोतम, जो अनपढ़ है, अध्यापक नहीं, भला उसे देने से क्या महाफल होगा?”
“और, आगे क्या लगता है, अस्सलायन? यदि दो युवा-ब्राह्मण एक कोख से जन्में भाई हो। उनमें एक पढ़ा-लिखा अध्यापक पापी-स्वभाव का दुष्शील हो। और दूसरा, अनपढ़ हो, अध्यापक नहीं, किन्तु कल्याणकारी स्वभाव का शीलवान हो। तब ब्राह्मण श्राद्ध, थाली-पाक, यज्ञ, या अतिथि-सत्कार का भोजन पहले किसे देंगे?”
“तब श्रीमान गोतम, जो युवा-ब्राह्मण अनपढ़ है, अध्यापक नहीं, किन्तु कल्याणकारी स्वभाव के शीलवान है, उसे ब्राह्मण श्राद्ध, थाली-पाक, यज्ञ, या अतिथि-सत्कार का भोजन पहले देंगे। क्योंकि, श्रीमान गोतम, भला किसी पढ़े-लिखे अध्यापक, किन्तु पापी-स्वभाव का दुष्शील को देने से क्या महाफल होगा?”
“अस्सलायन, पहले तुम जाति पर आए। फिर जाति को छोड़कर मंत्र (पढ़ने-लिखने) पर आए, फिर मंत्र को छोड़कर (शील की) तपस्या पर आए। जिस तरह मैं चातुर्वर्णीय शुद्धि बताता हूँ, तुम भी उसी तपस्या पर आ गए।”
जब ऐसा कहा गया, तब अस्सलायन युवा-ब्राह्मण चुप हो गया। और लज्जित होकर, कंधे झुका कर, सिर नीचे कर, उदास मन से निशब्द होकर बैठा रहा।
तब भगवान ने अस्सलायन युवा-ब्राह्मण को चुप होकर, लज्जित होकर, कंधे झुकाए, सिर नीचे किए, उदास मन से, निशब्द होकर बैठा जान कर कहा—
“पहले की बात है, अस्सलायन। सात ब्राह्मण ऋषि, जो अरण्य जाकर पर्णकुटी (=घास-पत्तियों की कुटी) में रहते थे, उन्हें ऐसी पापी दृष्टि उत्पन्न हुई—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुक्ल वर्ण है, बाकी कृष्ण वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुद्ध हैं, बाकी नहीं। ब्राह्मण ही ब्रह्मा के पुत्र, ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए, ब्रह्मा से जन्में, ब्रह्मा से निर्मित, ब्रह्मा के वारिस हैं।’
तब, अस्सलायन, असित देवल ऋषि ने सुना—‘सात ब्राह्मण ऋषि, जो अरण्य जाकर पर्णकुटी में रहते हैं, उन्हें ऐसी पापी दृष्टि उत्पन्न हुई हैं कि ‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन…’
तब, अस्सलायन, असित देवल ऋषि ने केश-दाढ़ी बनाकर, मंजिष्ठा (=मजेंटा) रंग का वस्त्र ओढ़कर, ऊँची सोल वाली चप्पल पर चढ़कर, स्वर्ण-चाँदी (की मूठ) वाले डंडे को पकड़कर, सप्तर्षि ब्राह्मण के आँगन में प्रकट हुआ। और, आँगन में टहलते हुए ऐसा कहने लगा, ‘अरे, कहाँ चले गए ये श्रीमान ब्राह्मण ऋषि? अरे, कहाँ चले गए ये श्रीमान ब्राह्मण ऋषि?’
तब, अस्सलायन, सात ब्राह्मण ऋषियों को लगा, ‘यह कौन गँवार देहाती के जैसे हम सप्तर्षि ब्राह्मण के आँगन में टहलते हुए ऐसा कह रहा है, ‘अरे, कहाँ चले गए ये श्रीमान ब्राह्मण ऋषि? अरे, कहाँ चले गए ये श्रीमान ब्राह्मण ऋषि?’ क्यों न इसे श्राप दें?’”
तब, अस्सलायन, सात ब्राह्मण ऋषियों ने असित देवल ऋषि को श्राप दे दिया, ‘भस्म हो जाओ, नीच कहीं के! भस्म हो जाओ, नीच कहीं के!’
किन्तु, अस्सलायन, जैसे-जैसे सात ब्राह्मण ऋषियों ने असित देवल ऋषि को श्राप दिया, वैसे-वैसे असित देवल ऋषि अधिक रूपवान, आकर्षक और विश्वसनीय दिखने लगे।
तब, अस्सलायन, सात ब्राह्मण ऋषियों को लगा, ‘हाय, हमारी तपस्या फालतू गयी! हमारा ब्रह्मचर्य निष्फल हुआ! पहले हम श्राप देते थे—‘भस्म हो जाओ, नीच कहीं के!’ तो भस्म हो जाता था नीच कहीं का। किन्तु यहाँ हम जैसे-जैसे श्राप दे रहे हैं, वैसे-वैसे वह अधिक रूपवान, आकर्षक और विश्वसनीय दिख रहा है।’
‘श्रीमानों की तपस्या फालतू नहीं गयी, ब्रह्मचर्य निष्फल नहीं हुआ। केवल, श्रीमानों, मेरे प्रति जो मानसिक द्वेष है, उसे त्यागो।’
‘हमें जो आपके प्रति मानसिक द्वेष हैं, हम उसे त्यागते हैं। श्रीमान, आप कौन है?’
‘क्या तुमने ‘असित देवल ऋषि’ के बारे में सुना है?’
‘हाँ, श्रीमान!’
‘श्रीमानों, मैं वही हूँ।’
तब, अस्सलायन, ब्राह्मण सप्तर्षियों ने असित देवल ऋषि को जाकर अभिवादन किया। तब असित देवल ऋषि ने उन ब्राह्मण सप्तर्षियों से कहा, ‘श्रीमानों, मैंने सुना कि ‘सात ब्राह्मण ऋषि, जो अरण्य जाकर पर्णकुटी में रहते हैं, उन्हें ऐसी पापी दृष्टि उत्पन्न हुई—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है, बाकी हीन वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुक्ल वर्ण है, बाकी कृष्ण वर्ण हैं। ब्राह्मण ही शुद्ध हैं, बाकी नहीं। ब्राह्मण ही ब्रह्मा के पुत्र, ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए, ब्रह्मा से जन्में, ब्रह्मा से निर्मित, ब्रह्मा के वारिस हैं।’’
‘हाँ, श्रीमान!’
‘किन्तु, श्रीमानों, क्या आप (निश्चित तौर पर) जानते हैं कि आपकी जन्मदाती माता ने केवल ब्राह्मण से ही संवास किया, किसी अ-ब्राह्मण से नहीं?’
‘हम नहीं जानते, श्रीमान!’
‘और, श्रीमानों, क्या आप जानते हैं कि आपकी जन्मदाती माता की सात पीढ़ियों की माताओं ने केवल ब्राह्मण से ही संवास किया, किसी अ-ब्राह्मण से नहीं?’
‘हम नहीं जानते, श्रीमान!’
‘और, श्रीमानों, क्या आप जानते हैं कि आपके जन्मदाता पिता ने केवल ब्राह्मणी से ही संवास किया, किसी अ-ब्राह्मणी से नहीं?’
‘हम नहीं जानते, श्रीमान!’
‘और, श्रीमानों, क्या आप जानते हैं कि आपके जन्मदाता पिता की सात पीढ़ियों के पिताओं ने केवल ब्राह्मणी से ही संवास किया, किसी अ-ब्राह्मणी से नहीं?’
‘हम नहीं जानते, श्रीमान!’
‘और, श्रीमानों, क्या आप जानते हैं कि गर्भ कैसे धारण होता है?’
‘हाँ, श्रीमान, हम जानते हैं कि गर्भ कैसे धारण होता है। जब माता-पिता का मिलन हो, माता ऋतुमती हो, और गंधब्ब 2 उपस्थित हो, तब इन तीन परिस्थितियों के मिलने से गर्भ धारण होता है।’
‘किन्तु, श्रीमानों, क्या आप जानते हैं कि वह गंधब्ब क्षत्रिय है, या ब्राह्मण है, या वैश्य है, या शूद्र है?’
‘हम नहीं जानते, श्रीमान, कि वह गंधब्ब क्षत्रिय है, या ब्राह्मण है, या वैश्य है, या शूद्र है।’
‘जब ऐसा हो, श्रीमानों, तो क्या आप (वाकई) जानते भी हैं कि आप कौन हैं?’
‘नहीं, श्रीमान! जब ऐसा हो तो हम नहीं जानते हैं कि हम कौन हैं।’
इस तरह, अस्सलायन, जब ब्राह्मण सप्तर्षि स्वयं, असित देवल ऋषि के जाँचने, परखने और पूछताछ करने पर, अपने जातिवाद पर बहस न जीत सकें, तब भला तुम, मेरे जाँचने, परखने और पूछताछ करने पर, अपने जातिवाद पर बहस कैसे जीतोगे?—जब तुम, अपने पूरे आचार्य-गुरुओं के साथ, ठीक से चम्मच तक नहीं उठा सकते!" 3
जब ऐसा कहा गया, तब अस्सलायन युवा-ब्राह्मण कह पड़ा, “अतिउत्तम, श्रीमान गौतम! अतिउत्तम, श्रीमान गौतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि अच्छी आँखोंवाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह श्रीमान गौतम ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं श्रीमान गोतम की शरण जाता हूँ! धम्म और संघ की! श्रीमान गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
पुराने समय में, जब माचिस जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी, लोग विशेष प्रकार की “उत्तरारणि” लकड़ियों को आपस में रगड़कर अरणि-मंथन के माध्यम से अग्नि उत्पन्न करते थे। अग्नि प्रज्वलन की इस प्रक्रिया को भगवान ने अनेक प्रसंगों में उपमा के रूप में प्रस्तुत किया है। ↩︎
गंधब्ब के बारे में अधिक जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎
यहाँ बात को समझने के लिए धम्मपद की वह उपमा जान लेना आवश्यक है, जो इस प्रसंग पर चुभन के साथ बिल्कुल फिट बैठती है: “चमचा भोजन परोसता है, पर उसका स्वाद नहीं जानता।” भगवान संकेत करते हैं कि ब्राह्मणवाद की दशा उससे भी अधिक दयनीय है। चमचा तो कम से कम अपना काम ठीक से करता है—दूसरे को परोसने का। पर यहाँ, वह न्यूनतम कार्य भी ठीक से नहीं हो पाता।
ब्राह्मणवाद अहंकार को पोषित करते हुए, स्वयं को जन्मजात ऊँचा और दूसरों को नीच ठहराने जैसी घोर पापी प्रवृत्तियों को हृदय में गहरे बैठा तो देता है, पर इनके समर्थन में कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं कर पाता। परिणाम यह कि ब्राह्मणों को न अपने ऊँचे दावों का आधार समझ आता है, न अपने ही सिद्धान्तों के अर्थ का बोध होता है, न सारगर्भित धम्म की कोई वेदना। दावों के नाम पर अंततः जो बचता है, वह केवल धुएँ का एक फूला हुआ गुब्बारा है। ↩︎
४०१. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तेन खो पन समयेन नानावेरज्जकानं ब्राह्मणानं पञ्चमत्तानि ब्राह्मणसतानि सावत्थियं पटिवसन्ति केनचिदेव करणीयेन. अथ खो तेसं ब्राह्मणानं एतदहोसि – ‘‘अयं खो समणो गोतमो चातुवण्णिं सुद्धिं पञ्ञपेति. को नु खो पहोति समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु’’न्ति? तेन खो पन समयेन अस्सलायनो नाम माणवो सावत्थियं पटिवसति दहरो, वुत्तसिरो, सोळसवस्सुद्देसिको जातिया, तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो. अथ खो तेसं ब्राह्मणानं एतदहोसि – ‘‘अयं खो अस्सलायनो माणवो सावत्थियं पटिवसति दहरो, वुत्तसिरो, सोळसवस्सुद्देसिको जातिया, तिण्णं वेदानं पारगू…पे… अनवयो. सो खो पहोति समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु’’न्ति.
अथ खो ते ब्राह्मणा येन अस्सलायनो माणवो तेनुपङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा अस्सलायनं माणवं एतदवोचुं – ‘‘अयं, भो अस्सलायन , समणो गोतमो चातुवण्णिं सुद्धिं पञ्ञपेति. एतु भवं अस्सलायनो समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतू’’ति [पटिमन्तेतुन्ति (पी. क.)].
एवं वुत्ते, अस्सलायनो माणवो ते ब्राह्मणे एतदवोच – ‘‘समणो खलु, भो, गोतमो धम्मवादी; धम्मवादिनो च पन दुप्पटिमन्तिया भवन्ति. नाहं सक्कोमि समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु’’न्ति. दुतियम्पि खो ते ब्राह्मणा अस्सलायनं माणवं एतदवोचुं – ‘‘अयं, भो अस्सलायन, समणो गोतमो चातुवण्णिं सुद्धिं पञ्ञपेति. एतु भवं अस्सलायनो समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु [पटिमन्तेतुं (सी. पी. क.)]. चरितं खो पन भोता अस्सलायनेन परिब्बाजक’’न्ति. दुतियम्पि खो अस्सलायनो माणवो ते ब्राह्मणे एतदवोच – ‘‘समणो खलु, भो, गोतमो धम्मवादी; धम्मवादिनो च पन दुप्पटिमन्तिया भवन्ति . नाहं सक्कोमि समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु’’न्ति. ततियम्पि खो ते ब्राह्मणा अस्सलायनं माणवं एतदवोचुं – ‘‘अयं, भो अस्सलायन, समणो गोतमो चातुवण्णिं सुद्धिं पञ्ञपेति. एतु भवं अस्सलायनो समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु [पटिमन्तेतुं (सी. पी. क.)]. चरितं खो पन भोता अस्सलायनेन परिब्बाजकं. मा भवं अस्सलायनो अयुद्धपराजितं पराजयी’’ति.
एवं वुत्ते, अस्सलायनो माणवो ते ब्राह्मणे एतदवोच – ‘‘अद्धा खो अहं भवन्तो न लभामि. समणो खलु, भो, गोतमो धम्मवादी; धम्मवादिनो च पन दुप्पटिमन्तिया भवन्ति. नाहं सक्कोमि समणेन गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतुन्ति. अपि चाहं भवन्तानं वचनेन गमिस्सामी’’ति.
४०२. अथ खो अस्सलायनो माणवो महता ब्राह्मणगणेन सद्धिं येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो अस्सलायनो माणवो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ब्राह्मणा, भो गोतम, एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणोव सुक्को वण्णो, कण्हो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणोव सुज्झन्ति, नो अब्राह्मणा; ब्राह्मणाव ब्रह्मुनो पुत्ता ओरसा मुखतो जाता ब्रह्मजा ब्रह्मनिम्मिता ब्रह्मदायादा’ति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति? ‘‘दिस्सन्ति [दिस्सन्ते (सी. स्या. कं. पी.)] खो पन, अस्सलायन, ब्राह्मणानं ब्राह्मणियो उतुनियोपि गब्भिनियोपि विजायमानापि पायमानापि. ते च ब्राह्मणियोनिजाव समाना एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणोव सुक्को वण्णो, कण्हो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणाव सुज्झन्ति, नो अब्राह्मणा; ब्राह्मणाव ब्रह्मुनो पुत्ता ओरसा मुखतो जाता ब्रह्मजा ब्रह्मनिम्मिता ब्रह्मदायादा’’’ति. ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०३. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, सुतं ते – ‘योनकम्बोजेसु अञ्ञेसु च पच्चन्तिमेसु जनपदेसु द्वेव वण्णा – अय्यो चेव दासो च; अय्यो हुत्वा दासो होति, दासो हुत्वा अय्यो होती’’’ति ? ‘‘एवं, भो, सुतं तं मे – ‘योनकम्बोजेसु अञ्ञेसु च पच्चन्तिमेसु जनपदेसु द्वेव वण्णा – अय्यो चेव दासो च; अय्यो हुत्वा दासो होति, दासो हुत्वा अय्यो होती’’’ति. ‘‘एत्थ, अस्सलायन, ब्राह्मणानं किं बलं, को अस्सासो यदेत्थ ब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति? ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०४. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, खत्तियोव नु खो पाणातिपाती अदिन्नादायी कामेसुमिच्छाचारी मुसावादी पिसुणवाचो फरुसवाचो सम्फप्पलापी अभिज्झालु ब्यापन्नचित्तो मिच्छादिट्ठि कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जेय्य, नो ब्राह्मणो? वेस्सोव नु खो…पे… सुद्दोव नु खो पाणातिपाती अदिन्नादायी कामेसुमिच्छाचारी मुसावादी पिसुणवाचो फरुसवाचो सम्फप्पलापी अभिज्झालु ब्यापन्नचित्तो मिच्छादिट्ठि कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जेय्य, नो ब्राह्मणो’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम. खत्तियोपि हि, भो गोतम, पाणातिपाती अदिन्नादायी कामेसुमिच्छाचारी मुसावादी पिसुणवाचो फरुसवाचो सम्फप्पलापी अभिज्झालु ब्यापन्नचित्तो मिच्छादिट्ठि कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जेय्य. ब्राह्मणोपि हि, भो गोतम…पे… वेस्सोपि हि, भो गोतम…पे… सुद्दोपि हि, भो गोतम…पे… सब्बेपि हि, भो गोतम, चत्तारो वण्णा पाणातिपातिनो अदिन्नादायिनो कामेसुमिच्छाचारिनो मुसावादिनो पिसुणवाचा फरुसवाचा सम्फप्पलापिनो अभिज्झालू ब्यापन्नचित्ता मिच्छादिट्ठी कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जेय्यु’’न्ति. ‘‘एत्थ, अस्सलायन, ब्राह्मणानं किं बलं, को अस्सासो यदेत्थ ब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति? ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०५. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, ब्राह्मणोव नु खो पाणातिपाता पटिविरतो अदिन्नादाना पटिविरतो कामेसुमिच्छाचारा पटिविरतो मुसावादा पटिविरतो पिसुणाय वाचाय पटिविरतो फरुसाय वाचाय पटिविरतो सम्फप्पलापा पटिविरतो अनभिज्झालु अब्यापन्नचित्तो सम्मादिट्ठि कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जेय्य, नो [नो च (क.)] खत्तियो नो वेस्सो, नो सुद्दो’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम! खत्तियोपि हि, भो गोतम, पाणातिपाता पटिविरतो अदिन्नादाना पटिविरतो कामेसुमिच्छाचारा पटिविरतो मुसावादा पटिविरतो पिसुणाय वाचाय पटिविरतो फरुसाय वाचाय पटिविरतो सम्फप्पलापा पटिविरतो अनभिज्झालु अब्यापन्नचित्तो सम्मादिट्ठि कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जेय्य. ब्राह्मणोपि हि, भो गोतम…पे… वेस्सोपि हि, भो गोतम…पे… सुद्दोपि हि, भो गोतम…पे… सब्बेपि हि, भो गोतम, चत्तारो वण्णा पाणातिपाता पटिविरता अदिन्नादाना पटिविरता कामेसुमिच्छाचारा पटिविरता मुसावादा पटिविरता पिसुणाय वाचाय पटिविरता फरुसाय वाचाय पटिविरता सम्फप्पलापा पटिविरता अनभिज्झालू अब्यापन्नचित्ता सम्मादिट्ठी कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जेय्यु’’न्ति. ‘‘एत्थ, अस्सलायन , ब्राह्मणानं किं बलं, को अस्सासो यदेत्थ ब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति? ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०६. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, ब्राह्मणोव नु खो पहोति अस्मिं पदेसे अवेरं अब्याबज्झं मेत्तचित्तं भावेतुं, नो खत्तियो, नो वेस्सो नो सुद्दो’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम! खत्तियोपि हि, भो गोतम, पहोति अस्मिं पदेसे अवेरं अब्याबज्झं मेत्तचित्तं भावेतुं; ब्राह्मणोपि हि, भो गोतम… वेस्सोपि हि , भो गोतम… सुद्दोपि हि, भो गोतम… सब्बेपि हि, भो गोतम, चत्तारो वण्णा पहोन्ति अस्मिं पदेसे अवेरं अब्याबज्झं मेत्तचित्तं भावेतु’’न्ति. ‘‘एत्थ, अस्सलायन, ब्राह्मणानं किं बलं, को अस्सासो यदेत्थ ब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति? ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०७. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, ब्राह्मणोव नु खो पहोति सोत्तिसिनानिं आदाय नदिं गन्त्वा रजोजल्लं पवाहेतुं, नो खत्तियो, नो वेस्सो, नो सुद्दो’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम! खत्तियोपि हि, भो गोतम, पहोति सोत्तिसिनानिं आदाय नदिं गन्त्वा रजोजल्लं पवाहेतुं, ब्राह्मणोपि हि, भो गोतम… वेस्सोपि हि, भो गोतम… सुद्दोपि हि, भो गोतम… सब्बेपि हि, भो गोतम, चत्तारो वण्णा पहोन्ति सोत्तिसिनानिं आदाय नदिं गन्त्वा रजोजल्लं पवाहेतु’’न्ति. ‘‘एत्थ, अस्सलायन, ब्राह्मणानं किं बलं, को अस्सासो यदेत्थ ब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति? ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०८. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, इध राजा खत्तियो मुद्धावसित्तो नानाजच्चानं पुरिसानं पुरिससतं सन्निपातेय्य – ‘आयन्तु भोन्तो ये तत्थ खत्तियकुला ब्राह्मणकुला राजञ्ञकुला उप्पन्ना, साकस्स वा सालस्स वा [उप्पन्ना सालस्स वा (सी. पी.)] सलळस्स वा चन्दनस्स वा पदुमकस्स वा उत्तरारणिं आदाय, अग्गिं अभिनिब्बत्तेन्तु, तेजो पातुकरोन्तु. आयन्तु पन भोन्तो ये तत्थ चण्डालकुला नेसादकुला वेनकुला [वेणकुला (सी. पी.), वेणुकुला (स्या. कं.)] रथकारकुला पुक्कुसकुला उप्पन्ना, सापानदोणिया वा सूकरदोणिया वा रजकदोणिया वा एरण्डकट्ठस्स वा उत्तरारणिं आदाय, अग्गिं अभिनिब्बत्तेन्तु, तेजो पातुकरोन्तू’ति.
‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, यो एवं नु खो सो [यो च नु खो (स्या. कं. क.)] खत्तियकुला ब्राह्मणकुला राजञ्ञकुला उप्पन्नेहि साकस्स वा सालस्स वा सलळस्स वा चन्दनस्स वा पदुमकस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो, तेजो पातुकतो, सो एव नु ख्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव [च (सी. पी.)] वण्णवा [वण्णिमा (स्या. कं. पी. क.)] च पभस्सरो च, तेन च सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातुं; यो पन सो चण्डालकुला नेसादकुला वेनकुला रथकारकुला पुक्कुसकुला उप्पन्नेहि सापानदोणिया वा सूकरदोणिया वा रजकदोणिया वा एरण्डकट्ठस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो, तेजो पातुकतो स्वास्स अग्गि न चेव अच्चिमा न च वण्णवा न च पभस्सरो, न च तेन सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातु’’न्ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम! योपि हि सो [यो सो (सी. पी.)], भो गोतम, खत्तियकुला ब्राह्मणकुला राजञ्ञकुला उप्पन्नेहि साकस्स वा सालस्स वा सलळस्स वा चन्दनस्स वा पदुमकस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो, तेजो पातुकतो स्वास्स [सो चस्स (सी. पी.), सोपिस्स (स्या. कं.)] अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च, तेन च सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातुं; योपि सो चण्डालकुला नेसादकुला वेनकुला रथकारकुला पुक्कुसकुला उप्पन्नेहि सापानदोणिया वा सूकरदोणिया वा रजकदोणिया वा एरण्डकट्ठस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो, तेजो पातुकतो, स्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च, तेन च सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातुं. सब्बोपि हि, भो गोतम, अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च, सब्बेनपि सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातु’’न्ति. ‘‘एत्थ, अस्सलायन, ब्राह्मणानं किं बलं, को अस्सासो यदेत्थ ब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणोव सुक्को वण्णो, कण्हो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणाव सुज्झन्ति, नो अब्राह्मणा; ब्राह्मणाव ब्रह्मुनो पुत्ता ओरसा मुखतो जाता ब्रह्मजा ब्रह्मनिम्मिता ब्रह्मदायादा’’’ति? ‘‘किञ्चापि भवं गोतमो एवमाह, अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा एवमेतं मञ्ञन्ति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’’’ति.
४०९. ‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, इध खत्तियकुमारो ब्राह्मणकञ्ञाय सद्धिं संवासं कप्पेय्य, तेसं संवासमन्वाय पुत्तो जायेथ; यो सो खत्तियकुमारेन ब्राह्मणकञ्ञाय पुत्तो उप्पन्नो, सिया सो मातुपि सदिसो पितुपि सदिसो, ‘खत्तियो’तिपि वत्तब्बो ‘ब्राह्मणो’तिपि वत्तब्बो’’ति? ‘‘यो सो, भो गोतम, खत्तियकुमारेन ब्राह्मणकञ्ञाय पुत्तो उप्पन्नो, सिया सो मातुपि सदिसो पितुपि सदिसो, ‘खत्तियो’तिपि वत्तब्बो ‘ब्राह्मणो’तिपि वत्तब्बो’’ति.
‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, इध ब्राह्मणकुमारो खत्तियकञ्ञाय सद्धिं संवासं कप्पेय्य, तेसं संवासमन्वाय पुत्तो जायेथ; यो सो ब्राह्मणकुमारेन खत्तियकञ्ञाय पुत्तो उप्पन्नो, सिया सो मातुपि सदिसो पितुपि सदिसो, ‘खत्तियो’तिपि वत्तब्बो ‘ब्राह्मणो’तिपि वत्तब्बो’’ति? ‘‘यो सो, भो गोतम, ब्राह्मणकुमारेन खत्तियकञ्ञाय पुत्तो उप्पन्नो, सिया सो मातुपि सदिसो पितुपि सदिसो, ‘खत्तियो’तिपि वत्तब्बो ‘ब्राह्मणो’तिपि वत्तब्बो’’ति.
‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन इध वळवं गद्रभेन सम्पयोजेय्युं [संयोजेय्य (क.)], तेसं सम्पयोगमन्वाय किसोरो जायेथ; यो सो वळवाय गद्रभेन किसोरो उप्पन्नो, सिया सो मातुपि सदिसो पितुपि सदिसो, ‘अस्सो’तिपि वत्तब्बो ‘गद्रभो’तिपि वत्तब्बो’’ति? ‘‘कुण्डञ्हि सो [वेकुरञ्जाय हि सो (सी. पी.), सो कुमारण्डुपि सो (स्या. कं.), वेकुलजो हि सो (?)], भो गोतम, अस्सतरो होति. इदं हिस्स , भो गोतम, नानाकरणं पस्सामि; अमुत्र च पनेसानं न किञ्चि नानाकरणं पस्सामी’’ति.
‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, इधास्सु द्वे माणवका भातरो सउदरिया, एको अज्झायको उपनीतो एको अनज्झायको अनुपनीतो. कमेत्थ ब्राह्मणा पठमं भोजेय्युं सद्धे वा थालिपाके वा यञ्ञे वा पाहुने वा’’ति? ‘‘यो सो, भो गोतम, माणवको अज्झायको उपनीतो तमेत्थ ब्राह्मणा पठमं भोजेय्युं सद्धे वा थालिपाके वा यञ्ञे वा पाहुने वा. किञ्हि, भो गोतम, अनज्झायके अनुपनीते दिन्नं महप्फलं भविस्सती’’ति?
‘‘तं किं मञ्ञसि, अस्सलायन, इधास्सु द्वे माणवका भातरो सउदरिया, एको अज्झायको उपनीतो दुस्सीलो पापधम्मो, एको अनज्झायको अनुपनीतो सीलवा कल्याणधम्मो. कमेत्थ ब्राह्मणा पठमं भोजेय्युं सद्धे वा थालिपाके वा यञ्ञे वा पाहुने वा’’ति? ‘‘यो सो, भो गोतम, माणवको अनज्झायको अनुपनीतो सीलवा कल्याणधम्मो तमेत्थ ब्राह्मणा पठमं भोजेय्युं सद्धे वा थालिपाके वा यञ्ञे वा पाहुने वा. किञ्हि, भो गोतम, दुस्सीले पापधम्मे दिन्नं महप्फलं भविस्सती’’ति?
‘‘पुब्बे खो त्वं, अस्सलायन, जातिं अगमासि; जातिं गन्त्वा मन्ते अगमासि; मन्ते गन्त्वा तपे अगमासि; तपे गन्त्वा [मन्ते गन्त्वा तमेतं त्वं (सी. पी.), मन्ते गन्त्वा तमेव ठपेत्वा (स्या. कं.)] चातुवण्णिं सुद्धिं पच्चागतो, यमहं पञ्ञपेमी’’ति. एवं वुत्ते, अस्सलायनो माणवो तुण्हीभूतो मङ्कुभूतो पत्तक्खन्धो अधोमुखो पज्झायन्तो अप्पटिभानो निसीदि.
४१०. अथ खो भगवा अस्सलायनं माणवं तुण्हीभूतं मङ्कुभूतं पत्तक्खन्धं अधोमुखं पज्झायन्तं अप्पटिभानं विदित्वा अस्सलायनं माणवं एतदवोच – ‘‘भूतपुब्बं, अस्सलायन, सत्तन्नं ब्राह्मणिसीनं अरञ्ञायतने पण्णकुटीसु सम्मन्तानं [वसन्तानं (सी.)] एवरूपं पापकं दिट्ठिगतं उप्पन्नं होति – ‘ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’ति. अस्सोसि खो , अस्सलायन, असितो देवलो इसि – ‘सत्तन्नं किर ब्राह्मणिसीनं अरञ्ञायतने पण्णकुटीसु सम्मन्तानं एवरूपं पापकं दिट्ठिगतं उप्पन्नं – ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो…पे… ब्रह्मदायादा’ति. अथ खो, अस्सलायन, असितो देवलो इसि केसमस्सुं कप्पेत्वा मञ्जिट्ठवण्णानि दुस्सानि निवासेत्वा पटलियो [अटलियो (सी. पी.), अगलियो (स्या. कं.)] उपाहना आरुहित्वा जातरूपमयं दण्डं गहेत्वा सत्तन्नं ब्राह्मणिसीनं पत्थण्डिले पातुरहोसि. अथ खो, अस्सलायन, असितो देवलो इसि सत्तन्नं ब्राह्मणिसीनं पत्थण्डिले चङ्कममानो एवमाह – ‘हन्द, को नु खो इमे भवन्तो ब्राह्मणिसयो गता [गन्ता (स्या. कं. क.)]; हन्द, को नु खो इमे भवन्तो ब्राह्मणिसयो गता’ति? अथ खो, अस्सलायन, सत्तन्नं ब्राह्मणिसीनं एतदहोसि – ‘को नायं गामण्डलरूपो विय सत्तन्नं ब्राह्मणिसीनं पत्थण्डिले चङ्कममानो एवमाह – ‘हन्द, को नु खो इमे भवन्तो ब्राह्मणिसयो गता; हन्द, को नु खो इमे भवन्तो ब्राह्मणिसयो गताति? हन्द, नं अभिसपामा’ति. अथ खो, अस्सलायन, सत्त ब्राह्मणिसयो असितं देवलं इसिं अभिसपिंसु – ‘भस्मा, वसल [वसली (पी.), वसलि (क.), चपली (स्या. कं.)], होहि; भस्मा, वसल, होही’ति [भस्मा वसल होहीति अभिसपवचनं सी. पी. पोत्थकेसु सकिदेव आगतं]. यथा यथा खो, अस्सलायन, सत्त ब्राह्मणिसयो असितं देवलं इसिं अभिसपिंसु तथा तथा असितो देवलो इसि अभिरूपतरो चेव होति दस्सनीयतरो च पासादिकतरो च. अथ खो, अस्सलायन, सत्तन्नं ब्राह्मणिसीनं एतदहोसि – ‘मोघं वत नो तपो, अफलं ब्रह्मचरियं. मयञ्हि पुब्बे यं अभिसपाम – भस्मा, वसल, होहि; भस्मा, वसल, होहीति भस्माव भवति एकच्चो. इमं पन मयं यथा यथा अभिसपाम तथा तथा अभिरूपतरो चेव होति दस्सनीयतरो च पासादिकतरो चा’ति. ‘न भवन्तानं मोघं तपो, नाफलं ब्रह्मचरियं. इङ्घ भवन्तो, यो मयि मनोपदोसो तं पजहथा’ति. ‘यो भवति मनोपदोसो तं पजहाम. को नु भवं होती’ति? ‘सुतो नु भवतं – असितो देवलो इसी’ति? ‘एवं, भो’. ‘सो ख्वाहं, भो, होमी’ति. अथ खो, अस्सलायन, सत्त ब्राह्मणिसयो असितं देवलं इसिं अभिवादेतुं उपक्कमिंसु.
४११. ‘‘अथ खो, अस्सलायन, असितो देवलो इसि सत्त ब्राह्मणिसयो एतदवोच – ‘सुतं मेतं, भो, सत्तन्नं किर ब्राह्मणिसीनं अरञ्ञायतने पण्णकुटीसु सम्मन्तानं एवरूपं पापकं दिट्ठिगतं उप्पन्नं – ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणोव सुक्को वण्णो , कण्हो अञ्ञो वण्णो; ब्राह्मणाव सुज्झन्ति, नो अब्राह्मणा; ब्राह्मणाव ब्रह्मुनो पुत्ता ओरसा मुखतो जाता ब्रह्मजा ब्रह्मनिम्मिता ब्रह्मदायादा’ति. ‘एवं, भो’.
‘‘‘जानन्ति पन भोन्तो – या जनिका माता [जनिमाता (सी. स्या. कं. पी.)] ब्राह्मणंयेव अगमासि, नो अब्राह्मण’न्ति? ‘नो हिदं, भो’.
‘‘‘जानन्ति पन भोन्तो – या जनिकामातु [जनिमातु (सी. स्या. कं. पी.)] माता याव सत्तमा मातुमातामहयुगा ब्राह्मणंयेव अगमासि, नो अब्राह्मण’न्ति? ‘नो हिदं, भो’.
‘‘‘जानन्ति पन भोन्तो – यो जनको पिता [जनिपिता (सी. स्या. कं. पी.)] ब्राह्मणिंयेव अगमासि, नो अब्राह्मणि’न्ति? ‘नो हिदं, भो’.
‘‘‘जानन्ति पन भोन्तो – यो जनकपितु [जनिपितु (सी. स्या. कं. पी.)] पिता याव सत्तमा पितुपितामहयुगा ब्राह्मणिंयेव अगमासि, नो अब्राह्मणि’न्ति? ‘नो हिदं, भो’.
‘‘‘जानन्ति पन भोन्तो – यथा गब्भस्स अवक्कन्ति होती’ति [न मयं जानाम भो यथा गब्भस्स अवक्कन्ति होतीति. यथा कथं पन भो गब्भस्स अवक्कन्ति होतीति. (क.)]? ‘जानाम मयं, भो – यथा गब्भस्स अवक्कन्ति होति [न मयं जानाम भो यथा गब्भस्स अवक्कन्ति होतीति. यथा कथं पन भो गब्भस्स अवक्कन्ति होतीति. (क.)]. इध मातापितरो च सन्निपतिता होन्ति, माता च उतुनी होति, गन्धब्बो च पच्चुपट्ठितो होति; एवं तिण्णं सन्निपाता गब्भस्स अवक्कन्ति होती’ति.
‘‘‘जानन्ति पन भोन्तो – तग्घ [यग्घे (सी. स्या. कं. पी.)], सो गन्धब्बो खत्तियो वा ब्राह्मणो वा वेस्सो वा सुद्दो वा’ति? ‘न मयं, भो, जानाम – तग्घ सो गन्धब्बो खत्तियो वा ब्राह्मणो वा वेस्सो वा सुद्दो वा’ति. ‘एवं सन्ते, भो, जानाथ – के तुम्हे होथा’ति? ‘एवं सन्ते, भो , न मयं जानाम – के मयं होमा’ति. ते हि नाम, अस्सलायन, सत्त ब्राह्मणिसयो असितेन देवलेन इसिना सके जातिवादे समनुयुञ्जीयमाना समनुग्गाहीयमाना समनुभासीयमाना न सम्पायिस्सन्ति; किं पन त्वं एतरहि मया सकस्मिं जातिवादे समनुयुञ्जीयमानो समनुग्गाहीयमानो समनुभासीयमानो सम्पायिस्ससि, येसं त्वं साचरियको न पुण्णो दब्बिगाहो’’ति.
एवं वुत्ते, अस्सलायनो माणवो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम…पे… उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति.
अस्सलायनसुत्तं निट्ठितं ततियं.