✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

घोटमुख ब्राह्मण से चर्चा

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १५ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय आयुष्मान उदेन वाराणसी के खेमिय आम्रवन में विहार कर रहे थे। 1 उस समय घोटमुख (=घोड़े जैसा मुँहवाला) ब्राह्मण किसी कार्य से वाराणसी पहुँचा था।

तब, घोटमुख ब्राह्मण चहलकदमी कर घूमते हुए, टहलते हुए, खेमिय आम्रवन गया। उस समय आयुष्मान उदेन खुले आकाश के तले चङ्क्रमण (=चलते हुए ध्यान) कर रहे थे। तब घोटमुख ब्राह्मण आयुष्मान उदेन के पास गया, और जाकर आयुष्मान उदेन से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप करने पर आयुष्मान उदेन के चङ्क्रमण के साथ-साथ चलते हुए कहा, “अरे श्रमण, मुझे लगता है—‘प्रव्रज्या अधार्मिक है।’ अब मेरा ऐसा मानना आप जैसे श्रीमान का न दिखने से है, या उस धम्म के।”

जब ऐसा कहा गया, तब आयुष्मान उदेन चङ्क्रमण पथ से उतर कर, विहार में प्रवेश कर, बिछे आसन पर बैठ गए। तब घोटमुख ब्राह्मण चङ्क्रमण पथ से उतरकर विहार में प्रवेश कर एक ओर खड़ा हुआ। एक ओर खड़े घोटमुख ब्राह्मण से आयुष्मान उदेन ने कहा, “यहाँ आसन बिछे हैं, ब्राह्मण। यदि आकांक्षा हो तो बैठो।”

“मैं बैठने के लिए श्रीमान उदेन की प्रतीक्षा में था। भला मेरे जैसा कोई आमंत्रित होने से पहले ही आसन पर बैठने की कैसे सोच सकता है?”

तब घोटमुख ब्राह्मण ने अपना आसन नीचे लगाया, और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर घोटमुख ब्राह्मण ने आयुष्मान उदेन से कहा, “अरे श्रमण, मुझे लगता है—‘प्रव्रज्या अधार्मिक है।’ अब मेरा ऐसा मानना आप जैसे श्रीमान का न दिखने से है, या उस धम्म के।”

“ब्राह्मण, यदि तुम मेरी स्वीकार्य बात को मानो और अस्वीकार्य को मत मानो, और यदि बताए का अर्थ न पता हो तो पश्चात पुछो, ‘यह क्या है, श्रीमान उदेन, इसका क्या अर्थ है?’ यदि ऐसा करते हो तो यहाँ हमारा चर्चा हो सकती है।” 2

“ठीक है, मैं स्वीकार्य बात को मानूँगा और अस्वीकार्य को नहीं मानूँगा, और यदि बताए का अर्थ न पता हो तो पश्चात पूछूंगा, ‘यह क्या है, श्रीमान उदेन, इसका क्या अर्थ है?’ यहाँ हमारी चर्चा हो।”

चार प्रकार के पुरुष

“ब्राह्मण, इस दुनिया में चार तरह के लोग पाए जाते हैं। कौन से चार?

  • कोई व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करता है, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है।
  • कोई व्यक्ति दूसरे को उत्पीड़ित करता है, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है।
  • कोई व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करता है, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है, और दूसरे को उत्पीड़ित करता है, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है।
  • कोई व्यक्ति न स्वयं को पीड़ित करता है, न आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है, और न ही दूसरे को उत्पीड़ित करता है, न परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है। वे इस जीवन में न आत्मपीड़न कर, न परउत्पीड़न कर, शीतल हो चुके, ब्रह्म हो चुके, इच्छारहित और निर्वृत आत्म से सुख की वेदना करते हुए विहार करते हैं।

ब्राह्मण, तुम्हें इन चार व्यक्तियों में कौन से व्यक्ति का चित्त भाता (=अच्छा लगता) है?”

“श्रीमान उदेन—

  • जो व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करता है, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है—मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त नहीं भाता है।
  • जो व्यक्ति दूसरे को उत्पीड़ित करता है, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है—मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त नहीं भाता है।
  • जो व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करता है, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है, और दूसरे को उत्पीड़ित करता है, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है—मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त नहीं भाता है।
  • बल्कि, जो व्यक्ति न स्वयं को पीड़ित करता है, न आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है, और न ही दूसरे को उत्पीड़ित करता है, न परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है। वे इस जीवन में न आत्मपीड़न कर, न परउत्पीड़न कर, शीतल हो चुके, ब्रह्म हो चुके, इच्छारहित और निर्वृत आत्म से सुख की वेदना करते हुए विहार करते हैं—मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त भाता है।”

“किन्तु, ब्राह्मण, तुम्हें उन तीन व्यक्तियों का चित्त क्यों नहीं भाता है?”

“श्रीमान उदेन—

  • जो व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करता है, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है—वह सुख की कामना करने वाले, दुःख से पीछे हटने वाले “स्वयं” को पीड़ित करता है, यातना देता है। इसलिए मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त नहीं भाता है।
  • जो व्यक्ति दूसरे को उत्पीड़ित करता है, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है—वह सुख की कामना करने वाले, दुःख से पीछे हटने वाले “दूसरे” को पीड़ित करता है, यातना देता है। इसलिए मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त नहीं भाता है।
  • जो व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करता है, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है, और दूसरे को उत्पीड़ित करता है, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है—वह सुख की कामना करने वाले, दुःख से पीछे हटने वाले “स्वयं” को पीड़ित करता है, यातना देता है, और सुख की कामना करने वाले, दुःख से पीछे हटने वाले “दूसरे” को भी पीड़ित करता है, यातना देता है। इसलिए मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त नहीं भाता है।
  • बल्कि जो व्यक्ति न स्वयं को पीड़ित करता है, न आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है, और न ही दूसरे को उत्पीड़ित करता है, न परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होता है। जो इस जीवन में न आत्मपीड़न कर, न परउत्पीड़न कर, शीतल हो चुके, ब्रह्म हो चुके, इच्छारहित और निर्वृत आत्म से सुख की वेदना करते हुए विहार करते हैं—वह सुख की कामना करने वाले, दुःख से पीछे हटने वाले “स्वयं” और “दूसरे” को न पीड़ित करता है, न ही यातना देता है। इसलिए मुझे उस तरह के व्यक्ति का चित्त भाता है।”

दो गुट

“और, ब्राह्मण, दो प्रकार के गुट होते हैं। कौन से दो?

  • एक गुट के लोग गहनों-झुमकों में आसक्त होते हैं, पत्नी और संतान ढूँढते हैं, दास और दासी ढूँढते हैं, खेत और जमीन ढूँढते हैं, स्वर्ण और रुपया ढूँढते हैं।
  • दूसरे गुट के लोग गहनों-झुमकों में आसक्त न होकर, पत्नी और संतान का त्याग कर, दास और दासी का त्याग कर, खेत और जमीन का त्याग कर, स्वर्ण और रुपया का त्याग कर, घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं।

अब, ब्राह्मण, जो (चौथे प्रकार के) व्यक्ति न स्वयं को पीड़ित… न ही दूसरे को उत्पीड़ित करता है…—तुम उस व्यक्ति को इन दो गुटों में से किस गुट में अधिक देखते हो?”

“श्रीमान उदेन, जो व्यक्ति न स्वयं को पीड़ित… न ही दूसरे को उत्पीड़ित करता है…—मैं उस व्यक्ति को दूसरे गुट के लोगों में अधिक देखता हूँ, जो गहनों-झुमकों में आसक्त न होकर, पत्नी और संतान का त्याग कर… घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं।”

“अब, ब्राह्मण, तुम तो कह रहे थे कि “अरे श्रमण, मुझे लगता है—‘प्रव्रज्या अधार्मिक है।’ अब मेरा ऐसा मानना आप जैसे श्रीमान का न दिखने से है, या उस धम्म के।”

“जाहिर है, श्रीमान उदेन, मैं ऐसा किसी कारण से कहता था। किन्तु, अब मुझे लगता है—‘प्रव्रज्या धार्मिक है।’ और अब श्रीमान उदेन मुझे इस तरह याद रखे। श्रीमान उदेन ने चार प्रकार के व्यक्तियों को संक्षिप्त में बताया, विस्तारपूर्वक विश्लेषण नहीं किया। अच्छा होगा, जो श्रीमान उदेन मुझ पर अनुकंपा करते हुए, उन चार प्रकार के व्यक्तियों को विस्तार से विश्लेषण कर बताएँ।”

“ठीक है, ब्राह्मण, ध्यान देकर गौर से सुनों। मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, श्रीमान उदेन!” घोटमुख ब्राह्मण ने आयुष्मान उदेन को उत्तर दिया।

१. आत्मपीड़ा

आयुष्मान उदेन ने कहा—

“ब्राह्मण, किस तरह के व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करते हैं, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं?

ब्राह्मण, कोई निर्वस्त्र रहते हैं, (सामाजिक आचरण से) मुक्त रहते हैं, हाथ चाटते हैं, बुलाने पर नहीं जाते हैं, रोकने पर नहीं रुकते हैं, अपने लिए लायी भिक्षा को नहीं लेते हैं, अपने लिए पकाये भोज को नहीं लेते हैं, निमंत्रण भोज पर नहीं जाते हैं। (भोजन पकाये) हाँडी से भिक्षा नहीं लेते हैं, (भोजन पकाये) बर्तन से भिक्षा नहीं लेते हैं, द्वार के अंतराल से भिक्षा नहीं लेते हैं, डंडे के अंतराल से भिक्षा नहीं लेते हैं, मूसल के अंतराल से भिक्षा नहीं लेते हैं।

और, ब्राह्मण, वे दो भोजन साथ करने वालों से भिक्षा नहीं लेते हैं, गर्भिणी स्त्री से भिक्षा नहीं लेते हैं, दूध पिलाती स्त्री से भिक्षा नहीं लेते हैं, पुरुष के पास गयी स्त्री से भिक्षा नहीं लेते हैं, संग्रहीत किए भिक्षा को नहीं लेते हैं, कुत्ता खड़े स्थान से भिक्षा नहीं लेते हैं, भिनभिनाती मक्खियों के स्थान से भिक्षा नहीं लेते हैं, माँस नहीं लेते हैं, मछली नहीं लेते हैं, कच्ची शराब नहीं लेते हैं, पक्की शराब नहीं लेते हैं, चावल की शराब नहीं पीते हैं।

और, ब्राह्मण, वे भिक्षाटन के लिए केवल एक घर जाकर एक निवाला लेते हैं, अथवा दो घर जाकर दो निवाले लेते हैं… अथवा सात घर जाकर सात निवाले लेते हैं। केवल एक ही कलछी पर यापन करते हैं, अथवा दो कलछी पर यापन करते हैं… अथवा सात कलछी पर यापन करते हैं। दिन में एक बार आहार लेते हैं, दो दिनों में एक बार आहार लेते हैं… एक सप्ताह में एक बार आहार लेते हैं। और ऐसे ही आधे-आधे महीने के स्थिर अंतराल में एक ही बार आहार लेते हुए विहार करते हैं।

और, ब्राह्मण, वे (केवल) साग खाकर रहते हैं, जंगली बाजरा खाकर रहते हैं, लाल चावल खाकर रहते हैं, चमड़े के टुकड़े खाकर रहते हैं, शैवाल (=जल के पौधे) खाकर रहते हैं, कणिक (=टूटा चावल) खाकर रहते हैं, काँजी (=उबले चावल का पानी) पीकर रहते हैं, तिल खाकर रहते हैं, घास खाकर रहते हैं, गोबर खाकर रहते हैं, जंगल के कन्द-मूल या गिरे हुए फल खाकर यापन करते हैं।

और, ब्राह्मण, वे (केवल) सन के रूखे वस्त्र पहनते हैं, सन में मिलावट किए रूखे वस्त्र पहनते हैं, फेंके लाश के वस्त्र पहनते हैं, चिथड़े सिला वस्त्र पहनते हैं, लोध्र के वस्त्र पहनते हैं, हिरण-खाल पूर्ण पहनते हैं, हिरण-खाल के टुकड़े पहनते हैं, कुशघास के वस्त्र पहनते हैं, वृक्षछाल के वस्त्र पहनते हैं, लकड़ी के छिलके का वस्त्र पहनते हैं, (मनुष्य के) केश का कंबल पहनते हैं, घोड़े की पूँछ के बाल का कंबल पहनते हैं, उल्लू के पंखों का वस्त्र पहनते हैं।

और, ब्राह्मण, वे सिर-दाढ़ी के बाल नोचकर निकालते हैं, बाल नोचकर निकालने के प्रति संकल्पबद्ध रहते हैं। बैठना त्यागकर सदा खड़े ही रहते हैं, उकड़ूँ बैठकर सदा उकड़ूँ ही बैठते हैं, काँटों की चटाई पर लेटते हैं और काँटों की चटाई को ही अपना बिस्तर बनाते हैं, सदा तख़्ते पर सोते हैं, सदा जमीन पर सोते हैं, सदा एक ही करवट सोते हैं, शरीर पर धूल और गंदगी लपेटे रहते हैं, सदा खुले आकाश के तले रहते हैं, जहाँ चटाई बिछाएँ वही सोते हैं, गंदगी खाते हैं और गंदगी खाने के प्रति संकल्पबद्ध रहते हैं, कभी पानी नहीं पीते हैं और पानी नहीं पीने के प्रति संकल्पबद्ध रहते हैं, शरीर को सुबह-दोपहर-शाम तीन बार जल में डुबोते हैं, और तीन बार डुबोने के प्रति संकल्पबद्ध रहते हैं।

इस तरह के व्यक्ति को कहते हैं, ब्राह्मण, कि वे स्वयं को पीड़ित करते हैं और आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

२. परपीड़ा

आगे, ब्राह्मण, किस तरह के व्यक्ति दूसरे को उत्पीड़ित करते हैं, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं?

ब्राह्मण, कोई व्यक्ति कसाई होता है, बकरी-कसाई होता है, सुवर-कसाई होता है, मुर्गी-कसाई होता है, शिकारी होता है, मछुआरा होता है, लुटेरा होता है, जल्लाद होता है, गाय-कसाई होता है, कारावास-कर्ता (=जेलर) होता है, या ऐसा ही कोई अन्य क्रूर कार्य (=जीविका) करने वाला होता है।

इस तरह के व्यक्ति को कहते हैं, ब्राह्मण, कि वे दूसरे को पीड़ित करते हैं और परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

३. आत्मपीड़ा और परपीड़ा

आगे, ब्राह्मण, किस तरह के व्यक्ति स्वयं को पीड़ित करते हैं, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, और दूसरे को उत्पीड़ित करते हैं, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं?

ब्राह्मण, कोई व्यक्ति राजतिलक हुआ क्षत्रिय राजा होता है, या महासंपत्तिशाली ब्राह्मण होता है। वह नगर के पूर्व दिशा में सभागृह बनवाता है, और सिर-दाढ़ी मुंडन कर, हिरण का खुरदुरा चमड़ा ओढ़ कर, शरीर पर घी और तेल से मालिश कर, मृग के सिंग से पीठ खुजाते हुए, नए सभागृह में महारानी, ब्राह्मण पुरोहितों के साथ प्रवेश करता है। वहाँ वह घास और पत्तियाँ बिछायी हुई भूमि पर लेट जाता है।

तब समान रंग के बछड़े वाली गाय के एक थन से राजा दूध पीते हुए यापन करता है। उसके दूसरे थन से महारानी दूध पीते हुए यापन करती है। उसके तीसरे थन से ब्राह्मण पुरोहित दूध पीते हुए यापन करते हैं। उसके चौथे थन के दूध को अग्नि ज्वालाओं को दिया जाता है। बचे हुआ दूध पर बछड़ा यापन करता है।

वह कहता है, “इस यज्ञ के लिए इतने वृषभ (तगड़े बैल) की बलि दी जाएँ… इतने (तरुण) बैलों की बलि दी जाएँ… इतने (नन्हें) बछड़ों की बलि दी जाएँ… इतने बकरियों की बलि दी जाएँ… इतने भेड़ों की बलि दी जाएँ… इतने घोड़ों की बलि दी जाएँ। यज्ञ स्तंभ के लिए इतने वृक्ष काटे जाएँ। यज्ञ में चढ़ाने के लिए इतनी घास काटी जाएँ।” तब जो उसके दास होते हैं, नौकर होते हैं, कर्मचारी होते हैं, वे दंड के खतरे से, भय के मारे, अश्रुपूर्ण मुख से रोते हुए उस कार्य को अंजाम देते हैं।

इस तरह के व्यक्ति को कहते हैं, ब्राह्मण, कि स्वयं को पीड़ित करते हैं, आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, और दूसरे को उत्पीड़ित करते हैं, परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

४. न आत्मपीड़ा न परपीड़ा

आगे, ब्राह्मण, किस तरह के व्यक्ति न स्वयं को पीड़ित करते हैं, न आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, और न ही दूसरे को उत्पीड़ित करते हैं, न परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, जो इस जीवन में न आत्मपीड़न कर, न परउत्पीड़न कर, शीतल हो चुके, ब्रह्म हो चुके, इच्छारहित और निर्वृत आत्म से सुख की वेदना करते हुए विहार करते हैं?

यहाँ कभी इस लोक में ‘तथागत अरहंत सम्यकसम्बुद्ध’ प्रकट होते हैं—जो विद्या और आचरण से संपन्न होते हैं, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो।

ऐसा धम्म सुनकर किसी गृहस्थ या कुलपुत्र को तथागत के प्रति श्रद्धा जागती है। उसे लगता है, “गृहस्थ जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु प्रवज्या, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य निभाना कठिन है, जो शुद्ध शंख जैसा उज्ज्वल हो! क्यों न मैं सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रजित हो जाऊँ?’

फिर वह समय पाकर, थोड़ी या अधिक धन-संपत्ति त्यागकर, छोटा या बड़ा परिवार त्यागकर, सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रजित होता है।

शील

• प्रव्रजित होकर ऐसा भिक्षु शिक्षा और आजीविका से संपन्न होकर हिंसा त्यागकर जीवहत्या से विरत रहता है—डंडा और शस्त्र फेंक चुका, शर्मिला और दयावान, समस्त जीवहित के प्रति करुणामयी।

• वह ‘न सौपी चीज़ें’ त्यागकर चोरी से विरत रहता है—मात्र सौपी चीज़ें ही उठाता, स्वीकारता है। पावन जीवन जीता है, चोरी-चुपके नहीं।

• वह ब्रह्मचर्य धारणकर अब्रह्मचर्य से विरत रहता है—‘देहाती’ मैथुनधम्म से विरत!

• वह झूठ बोलना त्यागकर असत्यवचन से विरत रहता है। वह सत्यवादी, सत्य का पक्षधर, दृढ़ और भरोसेमंद बनता है; दुनिया को ठगता नहीं।

• वह विभाजित करनेवाली बातें त्यागकर फूट डालनेवाले वचन से विरत रहता है। यहाँ सुनकर वहाँ नहीं बताता, ताकि वहाँ दरार पड़े। वहाँ सुनकर यहाँ नहीं बताता, ताकि यहाँ दरार पड़े। बल्कि वह बटे हुए लोगों का मेल कराता है, साथ रहते लोगों को जोड़ता है, एकता चाहता है, आपसी भाईचारे में प्रसन्न और ख़ुश होता है; ‘सामंजस्यता बढ़े’ ऐसे बोल बोलता है।

• वह तीखा बोलना त्यागकर कटु वचन से विरत रहता है। वह ऐसे मीठे बोल बोलता है—जो राहत दे, कर्णमधुर लगे, हृदय छू ले, स्नेहपूर्ण हो, सौम्य हो, अधिकांश लोगों को अनुकूल और स्वीकार्य लगे।

• वह बक़वास त्यागकर व्यर्थ वचन से विरत रहता है। वह समयानुकूल बोलता है, तथ्यात्मक बोलता है, अर्थपूर्ण बोलता है, धम्मानुकूल बोलता है, विनयानुकूल बोलता है; ‘बहुमूल्य लगे’ ऐसे सटीक वचन वह बोलता है—तर्क के साथ, नपे-तुले शब्दों में, सही समय पर, सही दिशा में, ध्येय के साथ।

• वह बीज और पौधों का जीवनाश करना त्यागता है।…

• वह दिन में एक-बार भोजन करता है—रात्रिभोज व विकालभोज से विरत।…

• वह नृत्य, गीत, वाद्यसंगीत तथा मनोरंजन से विरत रहता है।…

• वह मालाएँ, गन्ध, लेप, सुडौलता-लानेवाले तथा अन्य सौंदर्य-प्रसाधन से विरत रहता है।…

• वह बड़े विलासी आसन और पलंग का उपयोग करने से विरत रहता है।…

• वह स्वर्ण व रुपये स्वीकारने से विरत रहते है।…

• वह कच्चा अनाज… कच्चा माँस… स्त्री व कुमारी… दासी व दास… भेड़ व बकरी… मुर्गी व सूवर… हाथी, गाय, घोड़ा, खच्चर… ख़ेत व संपत्ति स्वीकारने से विरत रहता है।…

• वह दूत [=संदेशवाहक] का काम… ख़रीद-बिक्री… भ्रामक तराज़ू, नाप, मानदंडों द्वारा ठगना… घूसख़ोरी, ठगना, ज़ाली काम, छलकपट… हाथपैर काटने, पीटने बाँधने, लूट डाका व हिंसा करने से विरत रहता है।

संतुष्टि

वह शरीर ढकने के लिए चीवर और पेट भरने के लिए भिक्षा पर संतुष्ट रहता है। वह जहाँ भी जाता है, अपनी सभी मूल आवश्यकताओं को साथ लेकर जाता है। जैसे पक्षी जहाँ भी जाता है, मात्र अपने पंखों को लेकर उड़ता है। उसी तरह, कोई भिक्षु शरीर ढकने के लिए चीवर और पेट भरने के लिए भिक्षा पर संतुष्ट रहता है। वह ऐसे आर्य शीलस्कन्ध से संपन्न होकर भीतर निष्पाप सुख का अनुभव करता है।

इंद्रिय सँवर

  • वह आँखों से कोई रूप देखता है, तो न वह उसकी छाप [“निमित्त”] पकड़ता है, न ही उसकी आकर्षक विशेषताओं [“अनुव्यंजन”] को ग्रहण करता है। यदि वह चक्षु-इंद्रिय पर संयम न रखे, तो लालसा या निराशा जैसे पाप-अकुशल स्वभाव उसे घेर सकते हैं। इसलिए वह संयम का मार्ग अपनाता है, चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करता है, और उस पर संयम करता है।
  • कान से कोई ध्वनि सुनता है…
  • नाक से कोई गंध सूँघता है…
  • जीभ से कोई स्वाद चखता है…
  • शरीर से कोई संस्पर्श अनुभव करता है…
  • मन से कोई विचार करता है, तो न वह उसकी छाप पकड़ता है, न ही उसकी आकर्षक विशेषताओं को ग्रहण करता है। यदि वह मन-इंद्रिय पर संयम न रखे, तो लालसा या निराशा जैसे पाप-अकुशल स्वभाव उसे घेर सकते हैं। इसलिए वह संयम का मार्ग अपनाता है, मन-इंद्रिय की रक्षा करता है, और उस पर संयम करता है।

वह ऐसे आर्यसँवर से संपन्न होकर भीतर निष्पाप सुख का अनुभव करता है।

स्मृति सचेतता

वह आगे बढ़ते और लौट आते सचेत होता है। वह नज़र टिकाते और नज़र हटाते सचेत होता है। वह [अंग] सिकोड़ते और पसारते हुए सचेत होता है। वह संघाटी, पात्र और चीवर धारण करते हुए सचेत होता है। वह खाते, पीते, चबाते, स्वाद लेते हुए सचेत होता है। वह पेशाब और शौच करते हुए सचेत होता है। वह चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, मौन होते हुए सचेत होता है।

इस तरह वह आर्य शीलस्कन्ध से संपन्न होकर, आर्य संतुष्टि से संपन्न होकर, इंद्रियों पर आर्य सँवर से संपन्न होकर, आर्य स्मृति और सचेतता से संपन्न होकर एकांतवास ढूँढता है—जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर। भिक्षाटन से लौटकर भोजन के पश्चात, वह पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठता है और स्मृति आगे लाता है।

नीवरण त्याग

  • वह लोक के प्रति लालसा [“अभिज्झा”] हटाकर लालसाविहीन चित्त से रहता है। अपने चित्त से लालसा को साफ़ करता है।
  • वह भीतर से दुर्भावना और द्वेष [“ब्यापादपदोस”] हटाकर दुर्भावनाविहीन चित्त से रहता है—समस्त जीवहित के लिए करुणामयी। अपने चित्त से दुर्भावना और द्वेष को साफ़ करता है।
  • वह भीतर से सुस्ती और तंद्रा [“थिनमिद्धा”] हटाकर सुस्ती और तंद्राविहीन चित्त से रहता है—उजाला देखने वाला, स्मृतिमान और सचेत। अपने चित्त से सुस्ती और तंद्रा को साफ़ करता है।
  • वह भीतर से बेचैनी और पश्चाताप [“उद्धच्चकुक्कुच्च”] हटाकर बिना व्याकुलता के रहता है; भीतर से शान्त चित्त। अपने चित्त से बेचैनी और पश्चाताप को साफ़ करता है।
  • वह अनिश्चितता [“विचिकिच्छा”] हटाकर उलझन को लाँघता है; कुशल स्वभावों के प्रति संभ्रमता के बिना। अपने चित्त से अनिश्चितता को साफ़ करता है।

वह इन पाँच व्यवधानों (“नीवरण”) को हटाता है, ऐसे चित्त के उपक्लेश जो प्रज्ञा को दुर्बल बनाते हैं।

समाधि

(१) तब, ब्राह्मण, वह कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।

(२) आगे, ब्राह्मण, वह वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।

(३) आगे, ब्राह्मण, वह प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—वह उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।

(४) आगे, ब्राह्मण, वह सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार करता है।

प्रज्ञा

आगे, ब्राह्मण, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को पूर्वजन्मों का अनुस्मरण करने की ओर झुकाता है। तो उसे विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण होने लगते है—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त [=ब्रह्मांडिय सिकुड़न], कई कल्पों का लोक-विवर्त [=ब्रह्मांडिय विस्तार], कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है।

आगे, ब्राह्मण, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को सत्वों की गति जानने [“चुतूपपात ञाण”] की ओर झुकाता है। तब विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं। कैसे ये सत्व—काया दुराचार में संपन्न, वाणी दुराचार में संपन्न, एवं मन दुराचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की, और मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजे।’ किन्तु कैसे ये सत्व—काया सदाचार में संपन्न, वाणी सदाचार में संपन्न, एवं मन सदाचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, सम्यक-दृष्टि धारण की, और सम्यक-दृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजे। इस तरह विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।

आगे, ब्राह्मण, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाता है। तब ‘दुःख ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख की उत्पत्ति ऐसी है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख का निरोध ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख का निरोध-मार्ग ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव की उत्पत्ति ऐसी है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव का निरोध ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव का निरोध-मार्ग ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है।

इस तरह जानने से, देखने से, उसका चित्त काम-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, भव-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, अविद्या-आस्रव से विमुक्त हो जाता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है, ‘विमुक्त हुआ!’ उसे पता चलता है, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’

इस तरह के व्यक्ति को कहते हैं, भिक्षुओं, कि वे न स्वयं को पीड़ित करते हैं, न आत्मपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, और न ही दूसरे को उत्पीड़ित करते हैं, न परपीड़ा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। वे इस जीवन में न आत्मपीड़न कर, न परउत्पीड़न कर, शीतल हो चुके, ब्रह्म हो चुके, इच्छारहित और निर्वृत आत्म से सुख की वेदना करते हुए विहार करते हैं।”

घोटमुखी

जब ऐसा कहा गया, तब घोटमुख ब्राह्मण ने आयुष्मान उदेन से कहा, “अतिउत्तम, श्रीमान उदेन! अतिउत्तम, श्रीमान उदेन! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह श्रीमान उदेन ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। मैं श्रीमान उदेन की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! श्रीमान उदेन मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”

“ब्राह्मण, मेरी शरण मत जाओ। बल्कि उस भगवान की शरण जाओ, जिसकी शरण मैं स्वयं गया हूँ।”

“किन्तु, श्रीमान उदेन, वे भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध इस समय कहाँ विहार कर रहे हैं?”

“ब्राह्मण, वे भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध परिनिर्वृत हो चुके हैं।”

“श्रीमान उदेन, यदि मैं सुनता कि भगवान दस योजन (१ योजन = १२-१६ किमी) दूर हैं, तो मैं उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का दर्शन लेने के लिए दस योजन दूर जाता। यदि मैं सुनता कि भगवान बीस योजन दूर हैं… तीस योजन दूर हैं… चालीस योजन दूर हैं… पचास योजन दूर हैं… सौ योजन दूर हैं, तो मैं उन भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध का दर्शन लेने के लिए सौ योजन दूर भी जाता।

किन्तु, श्रीमान उदेन, चूँकि वे भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध परिनिर्वृत हो चुके हैं, इसलिए मैं परिनिर्वृत भगवान की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! श्रीमान उदेन मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!

श्रीमान उदेन, अङ्ग देश के राजा मुझे नित्य भिक्षा देते हैं। मैं श्रीमान उदेन को एक भिक्षा दूँगा।”

“किन्तु, ब्राह्मण, अङ्ग के राजा तुम्हें नित्य भिक्षा क्या देते हैं?”

“पाँच सौ कहापण 3, श्रीमान उदेन।”

“हमारे लिए, ब्राह्मण, स्वर्ण और रुपया ग्रहण करना वर्जित है।”

“यदि श्रीमान उदेन के लिए विहार वर्जित न हो, तो मैं श्रीमान उदेन के लिए विहार बनाकर दूँगा।”

“ब्राह्मण, यदि तुम मेरे लिए विहार बनाने की कामना करते हो, तो संघ के लिए पाटलिपुत्र (=वर्तमान में बिहार की राजधानी पटना) में सभागृह बना दो।”

“अब श्रीमान उदेन पर मैं और अधिक मात्रा में हर्षित और संतुष्ट हुआ, जो श्रीमान उदेन मुझे संघ-दान के लिए प्रोत्साहित करते हैं। तब, श्रीमान उदेन, मैं इस नित्य-भिक्षा और अगली नित्य-भिक्षा से संघ के लिए पाटलिपुत्र में सभागृह बना दूँगा।”

और तब, घोटमुख ब्राह्मण ने उसकी वर्तमान की नित्य-भिक्षा और अगली नित्य-भिक्षा से संघ के लिए पाटलिपुत्र में सभागृह बना दिया। और, अब उसे “घोटमुखी” कहते हैं।

सुत्र समाप्त।


  1. जब सूत्र के पहले वाक्य में भगवान का उल्लेख न हो, तो जाहिर होता है कि यह सूत्र भगवान के महापरिनिर्वाण के पश्चात घटित हुआ होगा। संपूर्ण पालि साहित्य में न आयुष्मान उदेन का कहीं और उल्लेख मिलता है, न ही वाराणसी के खेमिय आम्रवन का। ↩︎

  2. घोटमुख ब्राह्मण का “अरे श्रमण” (“अम्भो समण”) कहना एक असामान्य और विचित्र संबोधन है, जो स्पष्ट करता है कि उसे किसी भिक्षु को उचित रीति से कैसे आमंत्रित किया जाए, इसका ज्ञान नहीं था। वह स्वयं मानता है कि उसने कभी किसी भिक्षु को देखा तक नहीं; आयुष्मान उदेन से वह उसी समय वार्ता आरम्भ करता है जब भन्ते चङ्क्रमण में संलग्न हैं। और यह भी नहीं जानता कि उसे कब बैठना उचित होगा। उदेन भन्ते उसकी इस झिझक, असहजता और अनभिज्ञता को भाँपकर उसे आश्वस्त करते हैं कि चर्चा के उपयुक्त नियम समझ लेकर वह बिना किसी अनुचितता के उनसे संवाद कर सकता है। ↩︎

  3. उस समय कहापण नामक मुद्रा का जम्बूद्वीप में प्रचलन था, जो स्वर्ण-मुद्राएँ थीं। अंगुत्तरनिकाय १०.४६ के अनुसार, ईमानदारी से किए गए एक दिन के श्रम का पारिश्रमिक प्रायः “आधा कहापण” होता था। किन्तु जो व्यक्ति अत्यन्त दुर्लभ कौशल का धनी हो और जिसकी असाधारण माँग हो, उसके बारे में यह भी उल्लेख मिलता है कि उसे एक ही दिन में हज़ार कहापण तक दिए जाते थे। और वह स्वाभाविक ही राजसी ठाठ में जीवन बिताता था। ↩︎

पालि

४१२. एवं मे सुतं – एकं समयं आयस्मा उदेनो बाराणसियं विहरति खेमियम्बवने. तेन खो पन समयेन घोटमुखो ब्राह्मणो बाराणसिं अनुप्पत्तो होति केनचिदेव करणीयेन. अथ खो घोटमुखो ब्राह्मणो जङ्घाविहारं अनुचङ्कममानो अनुविचरमानो येन खेमियम्बवनं तेनुपसङ्कमि. तेन खो पन समयेन आयस्मा उदेनो अब्भोकासे चङ्कमति. अथ खो घोटमुखो ब्राह्मणो येनायस्मा उदेनो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मता उदेनेन सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा आयस्मन्तं उदेनं चङ्कमन्तं अनुचङ्कममानो एवमाह – ‘‘अम्भो समण, ‘नत्थि धम्मिको परिब्बजो’ [परिब्बाजो (सी. पी.)] – एवं मे एत्थ होति. तञ्च खो भवन्तरूपानं वा अदस्सना, यो वा पनेत्थ धम्मो’’ति.

एवं वुत्ते, आयस्मा उदेनो चङ्कमा ओरोहित्वा विहारं पविसित्वा पञ्ञत्ते आसने निसीदि. घोटमुखोपि खो ब्राह्मणो चङ्कमा ओरोहित्वा विहारं पविसित्वा एकमन्तं अट्ठासि. एकमन्तं ठितं खो घोटमुखं ब्राह्मणं आयस्मा उदेनो एतदवोच – ‘‘संविज्जन्ति [संविज्जन्ते (बहूसु)] खो, ब्राह्मण, आसनानि. सचे आकङ्खसि, निसीदा’’ति. ‘‘एतदेव खो पन मयं भोतो उदेनस्स आगमयमाना (न) निसीदाम. कथञ्हि नाम मादिसो पुब्बे अनिमन्तितो आसने निसीदितब्बं मञ्ञेय्या’’ति? अथ खो घोटमुखो ब्राह्मणो अञ्ञतरं नीचं आसनं गहेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो घोटमुखो ब्राह्मणो आयस्मन्तं उदेनं एतदवोच – ‘‘अम्भो समण, ‘नत्थि धम्मिको परिब्बजो’ – एवं मे एत्थ होति. तञ्च खो भवन्तरूपानं वा अदस्सना, यो वा पनेत्थ धम्मो’’ति. ‘‘सचे खो पन मे त्वं, ब्राह्मण, अनुञ्ञेय्यं अनुजानेय्यासि, पटिक्कोसितब्बञ्च पटिक्कोसेय्यासि; यस्स च पन मे भासितस्स अत्थं न जानेय्यासि, ममंयेव तत्थ उत्तरि पटिपुच्छेय्यासि – ‘इदं, भो उदेन, कथं, इमस्स क्वत्थो’ति? एवं कत्वा सिया नो एत्थ कथासल्लापो’’ति. ‘‘अनुञ्ञेय्यं ख्वाहं भोतो उदेनस्स अनुजानिस्सामि, पटिक्कोसितब्बञ्च पटिक्कोसिस्सामि; यस्स च पनाहं भोतो उदेनस्स भासितस्स अत्थं न जानिस्सामि, भवन्तंयेव तत्थ उदेनं उत्तरि पटिपुच्छिस्सामि – ‘इदं, भो उदेन, कथं, इमस्स क्वत्थो’ति? एवं कत्वा होतु नो एत्थ कथासल्लापो’’ति.

४१३. ‘‘चत्तारोमे, ब्राह्मण, पुग्गला सन्तो संविज्जमाना लोकस्मिं. कतमे चत्तारो? इध, ब्राह्मण, एकच्चो पुग्गलो अत्तन्तपो होति अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो. इध पन, ब्राह्मण, एकच्चो पुग्गलो परन्तपो होति परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो. इध पन, ब्राह्मण, एकच्चो पुग्गलो अत्तन्तपो च होति अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो परन्तपो च परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो. इध पन, ब्राह्मण , एकच्चो पुग्गलो नेवत्तन्तपो होति नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो, न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो. सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरति. इमेसं, ब्राह्मण, चतुन्नं पुग्गलानं कतमो ते पुग्गलो चित्तं आराधेती’’ति?

‘‘य्वायं, भो उदेन, पुग्गलो अत्तन्तपो अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो अयं मे पुग्गलो चित्तं नाराधेति; योपायं, भो उदेन, पुग्गलो परन्तपो परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो अयम्पि मे पुग्गलो चित्तं नाराधेति; योपायं, भो उदेन, पुग्गलो अत्तन्तपो च अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो परन्तपो च परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो अयम्पि मे पुग्गलो चित्तं नाराधेति; यो च खो अयं, भो उदेन, पुग्गलो नेवत्तन्तपो नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरति. अयमेव मे पुग्गलो चित्तं आराधेती’’ति.

‘‘कस्मा पन ते, ब्राह्मण, इमे तयो पुग्गला चित्तं नाराधेन्ती’’ति? ‘‘य्वायं, भो उदेन, पुग्गलो अत्तन्तपो अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो सो अत्तानं सुखकामं दुक्खपटिक्कूलं आतापेति परितापेति; इमिना मे अयं पुग्गलो चित्तं नाराधेति. योपायं , भो उदेन, पुग्गलो परन्तपो परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो सो परं सुखकामं दुक्खपटिक्कूलं आतापेति परितापेति; इमिना मे अयं पुग्गलो चित्तं नाराधेति. योपायं, भो उदेन, पुग्गलो अत्तन्तपो च अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो परन्तपो च परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो सो अत्तानञ्च परञ्च सुखकामं दुक्खपटिक्कूलं आतापेति परितापेति; इमिना मे अयं पुग्गलो चित्तं नाराधेति. यो च खो अयं, भो उदेन, पुग्गलो नेवत्तन्तपो नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरति, सो अत्तानञ्च परञ्च सुखकामं दुक्खपटिक्कूलं नेव आतापेति न परितापेति; इमिना मे अयं पुग्गलो चित्तं आराधेती’’ति.

४१४. ‘‘द्वेमा, ब्राह्मण, परिसा. कतमा द्वे? इध, ब्राह्मण, एकच्चा परिसा सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तभरियं परियेसति, दासिदासं परियेसति, खेत्तवत्थुं परियेसति, जातरूपरजतं परियेसति.

‘‘इध पन, ब्राह्मण, एकच्चा परिसा असारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तभरियं पहाय, दासिदासं पहाय, खेत्तवत्थुं पहाय, जातरूपरजतं पहाय, अगारस्मा अनगारियं पब्बजिता. स्वायं, ब्राह्मण, पुग्गलो नेवत्तन्तपो नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो. सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरति. इध कतमं त्वं, ब्राह्मण, पुग्गलं कतमाय परिसाय बहुलं समनुपस्ससि – या चायं परिसा सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तभरियं परियेसति दासिदासं परियेसति खेत्तवत्थुं परियेसति जातरूपरजतं परियेसति, या चायं परिसा असारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तभरियं पहाय दासिदासं पहाय खेत्तवत्थुं पहाय जातरूपरजतं पहाय अगारस्मा अनगारियं पब्बजिता’’ति?

‘‘य्वायं , भो उदेन, पुग्गलो नेवत्तन्तपो नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरति; इमाहं पुग्गलं यायं परिसा असारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तभरियं पहाय दासिदासं पहाय खेत्तवत्थुं पहाय जातरूपरजतं पहाय अगारस्मा अनगारियं पब्बजिता इमिस्सं परिसायं बहुलं समनुपस्सामी’’ति.

‘‘इदानेव खो पन ते, ब्राह्मण, भासितं – ‘मयं एवं आजानाम – अम्भो समण, नत्थि धम्मिको परिब्बजो, एवं मे एत्थ होति. तञ्च खो भवन्तरूपानं वा अदस्सना, यो वा पनेत्थ धम्मो’’’ति. ‘‘अद्धा मेसा, भो उदेन, सानुग्गहा वाचा भासिता. ‘अत्थि धम्मिको परिब्बजो’ – एवं मे एत्थ होति. एवञ्च पन मं भवं उदेनो धारेतु. ये च मे भोता उदेनेन चत्तारो पुग्गला संखित्तेन वुत्ता वित्थारेन अविभत्ता, साधु मे भवं, उदेनो इमे चत्तारो पुग्गले वित्थारेन विभजतु अनुकम्पं उपादाया’’ति. ‘‘तेन हि, ब्राह्मण, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि, भासिस्सामी’’ति. ‘‘एवं, भो’’ति खो घोटमुखो ब्राह्मणो आयस्मतो उदेनस्स पच्चस्सोसि. आयस्मा उदेनो एतदवोच –

४१५. ‘‘कतमो च, ब्राह्मण, पुग्गलो अत्तन्तपो अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो? इध, ब्राह्मण, एकच्चो पुग्गलो अचेलको होति मुत्ताचारो हत्थापलेखनो नएहिभद्दन्तिको नतिट्ठभद्दन्तिको, नाभिहटं न उद्दिस्सकतं न निमन्तनं सादियति. सो न कुम्भिमुखा पटिग्गण्हाति, न कळोपिमुखा पटिग्गण्हाति, न एळकमन्तरं, न दण्डमन्तरं, न मुसलमन्तरं, न द्विन्नं भुञ्जमानानं, न गब्भिनिया, न पायमानाय , न पुरिसन्तरगताय, न सङ्कित्तीसु, न यत्थ सा उपट्ठितो होति, न यत्थ मक्खिका सण्डसण्डचारिनी, न मच्छं न मंसं, न सुरं न मेरयं न थुसोदकं पिवति. सो एकागारिको वा होति एकालोपिको, द्वागारिको वा होति द्वालोपिको…पे… सत्तागारिको वा होति सत्तालोपिको; एकिस्सापि दत्तिया यापेति, द्वीहिपि दत्तीहि यापेति…पे… सत्तहिपि दत्तीहि यापेति; एकाहिकम्पि आहारं आहारेति, द्वीहिकम्पि आहारं आहारेति…पे… सत्ताहिकम्पि आहारं आहारेति – इति एवरूपं अद्धमासिकं परियायभत्तभोजनानुयोगमनुयुत्तो विहरति. सो साकभक्खो वा होति, सामाकभक्खो वा होति, नीवारभक्खो वा होति, दद्दुलभक्खो वा होति , हटभक्खो वा होति, कणभक्खो वा होति, आचामभक्खो वा होति, पिञ्ञाकभक्खो वा होति, तिणभक्खो वा होति, गोमयभक्खो वा होति, वनमूलफलाहारो यापेति पवत्तफलभोजी. सो साणानिपि धारेति, मसाणानिपि धारेति, छवदुस्सानिपि धारेति, पंसुकूलानिपि धारेति, तिरीटानिपि धारेति, अजिनम्पि धारेति, अजिनक्खिपम्पि धारेति, कुसचीरम्पि धारेति, वाकचीरम्पि धारेति, फलकचीरम्पि धारेति, केसकम्बलम्पि धारेति, वाळकम्बलम्पि धारेति, उलूकपक्खम्पि धारेति; केसमस्सुलोचकोपि होति केसमस्सुलोचनानुयोगमनुयुत्तो , उब्भट्ठकोपि होति आसनपटिक्खित्तो, उक्कुटिकोपि होति उक्कुटिकप्पधानमनुयुत्तो, कण्टकापस्सयिकोपि होति कण्टकापस्सये सेय्यं कप्पेति; सायततियकम्पि उदकोरोहनानुयोगमनुयुत्तो विहरति – इति एवरूपं अनेकविहितं कायस्स आतापनपरितापनानुयोगमनुयुत्तो विहरति. अयं वुच्चति, ब्राह्मण, पुग्गलो अत्तन्तपो अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो.

४१६. ‘‘कतमो च, ब्राह्मण, पुग्गलो परन्तपो परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो? इध, ब्राह्मण, एकच्चो पुग्गलो ओरब्भिको होति सूकरिको साकुणिको मागविको लुद्दो मच्छघातको चोरो चोरघातको गोघातको बन्धनागारिको – ये वा पनञ्ञेपि केचि कुरूरकम्मन्ता. अयं वुच्चति, ब्राह्मण, पुग्गलो परन्तपो परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो.

४१७. ‘‘कतमो च, ब्राह्मण, पुग्गलो अत्तन्तपो च अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो, परन्तपो च परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो? इध, ब्राह्मण, एकच्चो पुग्गलो राजा वा होति खत्तियो मुद्धावसित्तो, ब्राह्मणो वा महासालो. सो पुरत्थिमेन नगरस्स नवं सन्थागारं कारापेत्वा केसमस्सुं ओहारेत्वा खराजिनं निवासेत्वा सप्पितेलेन कायं अब्भञ्जित्वा मगविसाणेन पिट्ठिं कण्डुवमानो नवं सन्थागारं पविसति सद्धिं महेसिया ब्राह्मणेन च पुरोहितेन. सो तत्थ अनन्तरहिताय भूमिया हरितुपलित्ताय सेय्यं कप्पेति. एकिस्साय गाविया सरूपवच्छाय यं एकस्मिं थने खीरं होति तेन राजा यापेति, यं दुतियस्मिं थने खीरं होति तेन महेसी यापेति, यं ततियस्मिं थने खीरं होति तेन ब्राह्मणो पुरोहितो यापेति, यं चतुत्थस्मिं थने खीरं होति तेन अग्गिं जुहति, अवसेसेन वच्छको यापेति. सो एवमाह – ‘एत्तका उसभा हञ्ञन्तु यञ्ञत्थाय, एत्तका वच्छतरा हञ्ञन्तु यञ्ञत्थाय, एत्तका वच्छतरियो हञ्ञन्तु यञ्ञत्थाय, एत्तका अजा हञ्ञन्तु यञ्ञत्थाय’, एत्तका उरब्भा हञ्ञन्तु यञ्ञत्थाय, एत्तका अस्सा हञ्ञन्तु यञ्ञत्थाय, एत्तका रुक्खा छिज्जन्तु यूपत्थाय, एत्तका दब्भा लूयन्तु बरिहिसत्थाया’ति. येपिस्स ते होन्ति ‘दासा’ति वा ‘ब्राह्मणा’ति वा ‘कम्मकरा’ति वा तेपि दण्डतज्जिता भयतज्जिता अस्सुमुखा रुदमाना परिकम्मानि करोन्ति. अयं वुच्चति, ब्राह्मण, पुग्गलो अत्तन्तपो च अत्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो , परन्तपो च परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो.

४१८. ‘‘कतमो च, ब्राह्मण, पुग्गलो नेवत्तन्तपो नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो, न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो; सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरति? इध, ब्राह्मण, तथागतो लोके उप्पज्जति अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा. सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति. सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं, केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति. तं धम्मं सुणाति गहपति वा गहपतिपुत्तो वा अञ्ञतरस्मिं वा कुले पच्चाजातो. सो तं धम्मं सुत्वा तथागते सद्धं पटिलभति. सो तेन सद्धापटिलाभेन समन्नागतो इति पटिसञ्चिक्खति – ‘सम्बाधो घरावासो रजोपथो अब्भोकासो पब्बज्जा. नयिदं सुकरं अगारं अज्झावसता एकन्तपरिपुण्णं एकन्तपरिसुद्धं सङ्खलिखितं ब्रह्मचरियं चरितुं. यंनूनाहं केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजेय्य’न्ति. सो अपरेन समयेन अप्पं वा भोगक्खन्धं पहाय महन्तं वा भोगक्खन्धं पहाय, अप्पं वा ञातिपरिवट्टं पहाय महन्तं वा ञातिपरिवट्टं पहाय, केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजति. सो एवं पब्बजितो समानो भिक्खूनं सिक्खासाजीवसमापन्नो पाणातिपातं पहाय पाणातिपाता पटिविरतो होति, निहितदण्डो निहितसत्थो लज्जी दयापन्नो सब्बपाणभूतहितानुकम्पी विहरति.

‘‘अदिन्नादानं पहाय अदिन्नादाना पटिविरतो होति दिन्नादायी दिन्नपाटिकङ्खी. अथेनेन सुचिभूतेन अत्तना विहरति.

‘‘अब्रह्मचरियं पहाय ब्रह्मचारी होति आराचारी विरतो मेथुना गामधम्मा.

‘‘मुसावादं पहाय मुसावादा पटिविरतो होति सच्चवादी सच्चसन्धो थेतो पच्चयिको अविसंवादको लोकस्स.

‘‘पिसुणं वाचं पहाय पिसुणाय वाचाय पटिविरतो होति; इतो सुत्वा न अमुत्र अक्खाता इमेसं भेदाय, अमुत्र वा सुत्वा न इमेसं अक्खाता अमूसं भेदाय. इति भिन्नानं वा सन्धाता सहितानं वा अनुप्पदाता, समग्गारामो समग्गरतो समग्गनन्दी समग्गकरणिं वाचं भासिता होति.

‘‘फरुसं वाचं पहाय फरुसाय वाचाय पटिविरतो होति. या सा वाचा नेला कण्णसुखा पेमनीया हदयङ्गमा पोरी बहुजनकन्ता बहुजनमनापा तथारूपिं वाचं भासिता होति.

‘‘सम्फप्पलापं पहाय सम्फप्पलापा पटिविरतो होति, कालवादी भूतवादी अत्थवादी धम्मवादी विनयवादी, निधानवतिं वाचं भासिता कालेन सापदेसं परियन्तवतिं अत्थसंहितं.

‘‘सो बीजगामभूतगामसमारम्भा पटिविरतो होति . एकभत्तिको होति रत्तूपरतो विरतो विकालभोजना. नच्चगीतवादितविसूकदस्सना पटिविरतो होति. मालागन्धविलेपनधारणमण्डनविभूसनट्ठाना पटिविरतो होति. उच्चासयनमहासयना पटिविरतो होति. जातरूपरजतपटिग्गहणा पटिविरतो होति. आमकधञ्ञपटिग्गहणा पटिविरतो होति. आमकमंसपटिग्गहणा पटिविरतो होति. इत्थिकुमारिकपटिग्गहणा पटिविरतो होति. दासिदासपटिग्गहणा पटिविरतो होति. अजेळकपटिग्गहणा पटिविरतो होति. कुक्कुटसूकरपटिग्गहणा पटिविरतो होति. हत्थिगवस्सवळवपटिग्गहणा पटिविरतो होति. खेत्तवत्थुपटिग्गहणा पटिविरतो होति. दूतेय्यपहिणगमनानुयोगा पटिविरतो होति. कयविक्कया पटिविरतो होति. तुलाकूटकंसकूटमानकूटा पटिविरतो होति. उक्कोटनवञ्चननिकतिसाचियोगा पटिविरतो होति. छेदनवधबन्धनविपरामोसआलोपसहसाकारा पटिविरतो होति.

‘‘सो सन्तुट्ठो होति कायपरिहारिकेन चीवरेन, कुच्छिपरिहारिकेन पिण्डपातेन. सो येन येनेव पक्कमति समादायेव पक्कमति. सेय्यथापि नाम पक्खी सकुणो येन येनेव डेति सपत्तभारोव डेति, एवमेव भिक्खु सन्तुट्ठो होति कायपरिहारिकेन चीवरेन, कुच्छिपरिहारिकेन पिण्डपातेन. सो येन येनेव पक्कमति समादायेव पक्कमति. सो इमिना अरियेन सीलक्खन्धेन समन्नागतो अज्झत्तं अनवज्जसुखं पटिसंवेदेति.

४१९. ‘‘सो चक्खुना रूपं दिस्वा न निमित्तग्गाही होति नानुब्यञ्जनग्गाही. यत्वाधिकरणमेनं चक्खुन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं तस्स संवराय पटिपज्जति, रक्खति चक्खुन्द्रियं, चक्खुन्द्रिये संवरं आपज्जति. सोतेन सद्दं सुत्वा…पे… घानेन गन्धं घायित्वा… जिव्हाय रसं सायित्वा… कायेन फोट्ठब्बं फुसित्वा… मनसा धम्मं विञ्ञायन न निमित्तग्गाही होति नानुब्यञ्जनग्गाही . यत्वाधिकरणमेनं मनिन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं अभिज्झादोमनस्सा पापका अकुसला धम्मा अन्वास्सवेय्युं तस्स संवराय पटिपज्जति, रक्खति मनिन्द्रियं, मनिन्द्रिये संवरं आपज्जति. सो इमिना अरियेन इन्द्रियसंवरेन समन्नागतो अज्झत्तं अब्यासेकसुखं पटिसंवेदेति.

‘‘सो अभिक्कन्ते पटिक्कन्ते सम्पजानकारी होति, आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होति, समिञ्जिते पसारिते सम्पजानकारी होति, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी होति, असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी होति, उच्चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी होति, गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी होति.

‘‘सो इमिना च अरियेन सीलक्खन्धेन समन्नागतो, (इमाय च अरियाय सन्तुट्ठिया समन्नागतो,) [पस्स म. नि. १.२९६] इमिना च अरियेन इन्द्रियसंवरेन समन्नागतो, इमिना च अरियेन सतिसम्पजञ्ञेन समन्नागतो विवित्तं सेनासनं भजति अरञ्ञं रुक्खमूलं पब्बतं कन्दरं गिरिगुहं सुसानं वनपत्थं अब्भोकासं पलालपुञ्जं. सो पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो निसीदति पल्लङ्कं आभुजित्वा, उजुं कायं पणिधाय, परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा. सो अभिज्झं लोके पहाय विगताभिज्झेन चेतसा विहरति, अभिज्झाय चित्तं परिसोधेति; ब्यापादपदोसं पहाय अब्यापन्नचित्तो विहरति सब्बपाणभूतहितानुकम्पी, ब्यापादपदोसा चित्तं परिसोधेति; थिनमिद्धं पहाय विगतथीनमिद्धो विहरति आलोकसञ्ञी सतो सम्पजानो, थीनमिद्धा चित्तं परिसोधेति; उद्धच्चकुक्कुच्चं पहाय अनुद्धतो विहरति अज्झत्तं वूपसन्तचित्तो, उद्धच्चकुक्कुच्चा चित्तं परिसोधेति; विचिकिच्छं पहाय तिण्णविचिकिच्छो विहरति अकथंकथी कुसलेसु धम्मेसु, विचिकिच्छाय चित्तं परिसोधेति.

‘‘सो इमे पञ्च नीवरणे पहाय चेतसो उपक्किलेसे पञ्ञाय दुब्बलीकरणे विविच्चेव कामेहि विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति. वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं उपसम्पज्ज विहरति. पीतिया च विरागा उपेक्खको च विहरति सतो च सम्पजानो, सुखञ्च कायेन पटिसंवेदेति , यं तं अरिया आचिक्खन्ति – ‘उपेक्खको सतिमा सुखविहारी’ति ततियं झानं उपसम्पज्ज विहरति. सुखस्स च पहाना दुक्खस्स च पहाना, पुब्बेव सोमनस्सदोमनस्सानं अत्थङ्गमा, अदुक्खमसुखं उपेक्खासतिपारिसुद्धिं चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति.

४२०. ‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते पुब्बेनिवासानुस्सतिञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेति. सो अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति, सेय्यथिदं – एकम्पि जातिं द्वेपि जातियो तिस्सोपि जातियो चतस्सोपि जातियो पञ्चपि जातियो दसपि जातियो वीसम्पि जातियो तिंसम्पि जातियो चत्तालीसम्पि जातियो पञ्ञासम्पि जातियो जातिसतम्पि जातिसहस्सम्पि जातिसतसहस्सम्पि, अनेकेपि संवट्टकप्पे अनेकेपि विवट्टकप्पे अनेकेपि संवट्टविवट्टकप्पे – ‘अमुत्रासिं एवंनामो एवंगोत्तो एवंवण्णो एवमाहारो एवंसुखदुक्खप्पटिसंवेदी एवमायुपरियन्तो; सो ततो चुतो अमुत्र उदपादिं; तत्रापासिं एवंनामो एवंगोत्तो एवंवण्णो एवमाहारो एवंसुखदुक्खप्पटिसंवेदी एवमायुपरियन्तो; सो ततो चुतो इधूपपन्नो’ति. इति साकारं सउद्देसं अनेकविहितं पुब्बेनिवासं अनुस्सरति.

‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते सत्तानं चुतूपपातञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेति. सो दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति – ‘इमे वत भोन्तो सत्ता कायदुच्चरितेन समन्नागता…पे… अरियानं उपवादका मिच्छादिट्ठिका मिच्छादिट्ठिकम्मसमादाना , ते कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपन्ना. इमे वा पन भोन्तो सत्ता कायसुचरितेन समन्नागता…पे… अरियानं अनुपवादका सम्मादिट्ठिका सम्मादिट्ठिकम्मसमादाना, ते कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपन्ना’ति. इति दिब्बेन चक्खुना विसुद्धेन अतिक्कन्तमानुसकेन सत्ते पस्सति चवमाने उपपज्जमाने हीने पणीते सुवण्णे दुब्बण्णे सुगते दुग्गते यथाकम्मूपगे सत्ते पजानाति.

‘‘सो एवं समाहिते चित्ते परिसुद्धे परियोदाते अनङ्गणे विगतूपक्किलेसे मुदुभूते कम्मनिये ठिते आनेञ्जप्पत्ते आसवानं खयञाणाय चित्तं अभिनिन्नामेति. सो ‘इदं दुक्ख’न्ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खसमुदयो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खनिरोधो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं पजानाति; ‘इमे आसवा’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं आसवसमुदयो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं आसवनिरोधो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं आसवनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं पजानाति. तस्स एवं जानतो एवं पस्सतो कामासवापि चित्तं विमुच्चति, भवासवापि चित्तं विमुच्चति, अविज्जासवापि चित्तं विमुच्चति. विमुत्तस्मिं विमुत्तमिति ञाणं होति. ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानाति.

‘‘अयं वुच्चति, ब्राह्मण, पुग्गलो नेवत्तन्तपो नात्तपरितापनानुयोगमनुयुत्तो, न परन्तपो न परपरितापनानुयोगमनुयुत्तो. सो अनत्तन्तपो अपरन्तपो दिट्ठेव धम्मे निच्छातो निब्बुतो सीतीभूतो सुखप्पटिसंवेदी ब्रह्मभूतेन अत्तना विहरती’’ति.

४२१. एवं वुत्ते, घोटमुखो ब्राह्मणो आयस्मन्तं उदेनं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो उदेन, अभिक्कन्तं, भो उदेन! सेय्यथापि, भो उदेन, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्तीति – एवमेवं भोता उदेनेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो. एसाहं भवन्तं उदेनं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासकं मं भवं उदेनो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति. ‘‘मा खो मं त्वं, ब्राह्मण, सरणं अगमासि. तमेव भगवन्तं सरणं गच्छाहि यमहं सरणं गतो’’ति. ‘‘कहं पन, भो उदेन, एतरहि सो भवं गोतमो विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति? ‘‘परिनिब्बुतो खो, ब्राह्मण, एतरहि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति.

‘‘सचेपि [सचे हि (सी. स्या. कं. पी.)] मयं, भो उदेन, सुणेय्याम तं भवन्तं गोतमं दससु योजनेसु, दसपि मयं योजनानि गच्छेय्याम तं भवन्तं गोतमं दस्सनाय अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं. सचेपि [सचे (सी. पी.), सचे हि (स्या. कं.)] मयं, भो उदेन, सुणेय्याम तं भवन्तं गोतमं वीसतिया योजनेसु… तिंसाय योजनेसु… चत्तारीसाय योजनेसु… पञ्ञासाय योजनेसु, पञ्ञासम्पि मयं योजनानि गच्छेय्याम तं भवन्तं गोतमं दस्सनाय अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं. योजनसते चेपि [योजनसतेपि (सी. स्या. कं. पी.)] मयं , भो उदेन, सुणेय्याम तं भवन्तं गोतमं, योजनसतम्पि मयं गच्छेय्याम तं भवन्तं गोतमं दस्सनाय अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं.

‘‘यतो च खो, भो उदेन, परिनिब्बुतो सो भवं गोतमो, परिनिब्बुतम्पि मयं तं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छाम धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासकं मं भवं उदेनो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गतं. अत्थि च मे, भो उदेन, अङ्गराजा देवसिकं निच्चभिक्खं ददाति , ततो अहं भोतो उदेनस्स एकं निच्चभिक्खं ददामी’’ति. ‘‘किं पन ते, ब्राह्मण, अङ्गराजा देवसिकं निच्चभिक्खं ददाती’’ति? ‘‘पञ्च, भो उदेन, कहापणसतानी’’ति. ‘‘न खो नो, ब्राह्मण, कप्पति जातरूपरजतं पटिग्गहेतु’’न्ति. ‘‘सचे तं भोतो उदेनस्स न कप्पति विहारं भोतो उदेनस्स काराब्राह्मणामी’’ति. ‘‘सचे खो मे त्वं, ब्राह्मण, विहारं, कारापेतुकामो, पाटलिपुत्ते सङ्घस्स उपट्ठानसालं कारापेही’’ति. ‘‘इमिनापाहं भोतो उदेनस्स भिय्योसोमत्ताय अत्तमनो अभिरद्धो यं मं भवं उदेनो सङ्घे दाने समादपेति. एसाहं, भो उदेन, एतिस्सा च निच्चभिक्खाय अपराय च निच्चभिक्खाय पाटलिपुत्ते सङ्घस्स उपट्ठानसालं काराब्राह्मणामी’’ति. अथ खो घोटमुखो ब्राह्मणो एतिस्सा च निच्चभिक्खाय अपराय च निच्चभिक्खाय पाटलिपुत्ते सङ्घस्स उपट्ठानसालं कारापेसि. सा एतरहि ‘घोटमुखी’ति वुच्चतीति.

घोटमुखसुत्तं निट्ठितं चतुत्थं.

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