
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान कोसल देश में विशाल भिक्षुसंघ के साथ भ्रमण करते हुए ओपासाद नामक कोसल के ब्राह्मण गाँव में पहुँचे। वहाँ भगवान ने ओपासाद की उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन में विहार किया।
उस समय चङ्की ब्राह्मण ओपासाद में रहता था, जो एक घनी आबादी वाला इलाका था, और घास, लकड़ी, जल और धन-धान्य से संपन्न था। कौशल के राजा प्रसेनजित ने राज-उपहार के तौर पर ओपासाद की राजसत्ता चङ्की ब्राह्मण को सौंपी हुई थी। 1
और ओपासाद के ब्राह्मणों और (वैश्य) गृहस्थों ने सुना, “यह सच है, श्रीमान! शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रजित हैं, वे कोसल देश में विशाल भिक्षुसंघ के साथ भ्रमण करते हुए ओपासाद में आ पहुँचे हैं। वहाँ वे ओपासाद की उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन में विहार कर रहे हैं।
और उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान! वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो। और ऐसे अर्हन्तों का दर्शन वाकई शुभ होता है।”
तब ओपासादवासी ब्राह्मण और गृहस्थ, अलग-अलग गुटों में झुंड बनाकर, ओपासाद से निकलकर उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन की ओर चल पड़े।
उस समय चङ्की ब्राह्मण, दिन में झपकी लेने के लिए महल के ऊपरी कक्ष में गया था। उसने ओपासादवासी ब्राह्मणों और गृहस्थों को, अलग-अलग गुटों में झुंड बनाकर, ओपासाद से निकलकर उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन की ओर जाते देखा। ऐसा देखकर उसने सचिव से कहा, “सचिव जी, ये ओपासादवासी ब्राह्मण और गृहस्थ, अलग-अलग गुटों में झुंड बनाकर, ओपासाद से निकलकर उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन की ओर क्यों जा रहे हैं?”
“ऐसा है, श्रीमान, कि शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रजित हैं, वे कोसल देश में विशाल भिक्षुसंघ के साथ भ्रमण करते हुए ओपासाद में आ पहुँचे हैं। वहाँ वे ओपासाद की उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन में विहार कर रहे हैं। और उनके बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ उन्ही गुरु गौतम का दर्शन लेने के लिए ओपासादवासी ब्राह्मण और गृहस्थ, अलग-अलग गुटों में झुंड बनाकर, ओपासाद से निकलकर उत्तर दिशा में शालवृक्षों के देववन की ओर जा रहे हैं।”
“तब सचिव जी, उन ब्राह्मणों और गृहस्थों के पास जाओ, और उन्हें कहो—‘श्रीमानों, थोड़ा ठहर जाएँ, ताकि चङ्की ब्राह्मण भी श्रमण गौतम का दर्शन लेने के लिए साथ आ पाएँ।’”
“ठीक है, श्रीमान!” सचिव ने उत्तर दिया, और उन ब्राह्मणों और गृहस्थों के पास गया। और उन्हें कहा—“श्रीमानों, थोड़ा ठहर जाएँ, ताकि चङ्की ब्राह्मण भी श्रमण गौतम का दर्शन लेने के लिए साथ आ पाएँ।”
उस समय विभिन्न देशो से पाँच-सौ ब्राह्मण किसी कार्य से ओपासाद में आकर रह रहे थे। उन ब्राह्मणों ने सुना कि चङ्की ब्राह्मण भी श्रमण गौतम का दर्शन लेने के लिए जाएँगे। तब वे सभी ब्राह्मण चङ्की ब्राह्मण के पास गए, और उन्होंने जाकर कहा, “क्या यह सच है, चङ्की जी, कि आप श्रमण गौतम का दर्शन लेने के लिए जा रहे हैं?”
“हाँ, श्रीमानों! यह सच है कि श्रमण गौतम का दर्शन लेने के लिए जा रहा हूँ।”
“मत जाईयें, चङ्की जी, श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए! यह उचित नहीं है कि श्रीमान चङ्की श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए जाएँ। क्योंकि यदि चङ्की जी श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए जाएँगे, तो चङ्की जी की यशकिर्ति घट जाएगी और श्रमण गौतम की यशकिर्ति अत्याधिक बढ़ जाएगी। इसलिए यह उचित नहीं है कि श्रीमान चङ्की श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए जाएँ। बल्कि उचित यह होगा कि श्रमण गौतम श्रीमान चङ्की का दर्शन करने के लिए आएँ।
जब उन ब्राह्मणों ने चङ्की ब्राह्मण से ऐसा कहा, तब चङ्की ब्राह्मण ने उन्हें कहा, “अच्छा, श्रीमानों, तब मुझे भी सुन लें कि क्यों श्रमण गौतम को मेरा दर्शन करने के लिए आना उचित नहीं है? बल्कि मुझे ही श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए जाना उचित है।
और श्रमण गौतम हमारे नगर ओपासाद में आकर, शालवृक्षों के देववन में विहार कर रहे हैं। जो भी श्रमण और ब्राह्मण हमारे राज्य में आते हैं, वे हमारे अतिथि हैं। और हमें उनका सत्कार करना चाहिए, सम्मान करना चाहिए, मानना चाहिए, पूजना चाहिए। हमारे शालवृक्षों के देववन में विहार करने वाले श्रमण गौतम ऐसे अतिथि है, और उनसे ऐसे व्यवहार करना चाहिए। इसलिए यह उचित नहीं है कि श्रमण गौतम मेरा दर्शन करने के लिए आएँ। बल्कि उचित यह होगा कि हम श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए जाएँ। श्रमण गौतम की जितनी भी प्रशंसा करें, वह प्रशंसा अपर्याप्त ही होगी। श्रमण गौतम प्रशंसा के परे है।”
ऐसा कहे जाने पर, उन ब्राह्मणों ने चङ्की ब्राह्मण से कहा, “श्रीमान, जब आप श्रमण गौतम की इतनी प्रशंसा कर रहे है, तो भले ही वे यहाँ से सौ योजन दूर भी विहार कर रहे होते, तब भी किसी श्रद्धावान कुलपुत्र को कंधे पर झोला उठाकर उनका दर्शन करने के लिए जाना उचित होता।”
“ठीक है तब, श्रीमानों! हम सभी श्रमण गौतम का दर्शन करने के लिए चलते हैं।”
और इस तरह, चङ्की ब्राह्मण, बहुत बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को साथ लेकर, भगवान के पास गए, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वे एक ओर बैठ गए। उस समय भगवान बहुत वृद्ध और वरिष्ठ ब्राह्मणों के साथ किसी-किसी बात पर मैत्रीपूर्ण वार्तालाप करते हुए बैठे।
उस समय कापटिक युवा-ब्राह्मण—जो बहुत तरुण, सिर मुंडा हुआ, सोलह वर्ष का लड़का था, जो वेदों का अभ्यस्त, मंत्रों का जानकार, तीनों वेदों में पारंगत, विधि और कर्मकाण्डों का निपुण व्याख्याकार, शब्द और अर्थ का भेदी, पाँचवे इतिहास में पारंगत, पदों का वक्ता, व्याकरण में निपुण, भौतिक-दर्शनशास्त्र और महापुरूष-लक्षणों में पारंगत था, जो उस परिषद में बैठा हुआ था, उसने बहुत वृद्ध और वरिष्ठ ब्राह्मणों के साथ भगवान के वार्तालाप को बीच में टोका।
तब भगवान ने कापटिक युवा-ब्राह्मण को फटकारा, “आयुष्मान भारद्वाज, वृद्ध और वरिष्ठ ब्राह्मणों के वार्तालाप को बीच में ना टोके। जब उनकी बात हो जाए, तब आयुष्मान भारद्वाज बोले।” 5
जब ऐसा कहा गया, तब चङ्की ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, कापटिक युवा-ब्राह्मण को मत फटकारो। कापटिक युवा-ब्राह्मण अच्छे कुल-परिवार का है। कापटिक युवा-ब्राह्मण बहुत पढ़ा-लिखा है। कापटिक युवा-ब्राह्मण पंडित है। कापटिक युवा-ब्राह्मण अच्छा वक्ता है। कापटिक युवा-ब्राह्मण श्रीमान गोतम के साथ बहस करने में सक्षम है।”
तब भगवान को लगा, “स्पष्ट है कि कापटिक युवा-ब्राह्मण त्रैविद्य (=तीन वेद) शास्त्र पर बात कर सकता है। इसलिए ब्राह्मण उसे आगे रखते हैं।”
तब कापटिक युवा-ब्राह्मण को लगा, “जब श्रमण गोतम की नजर मुझपर पड़ेगी, तब मैं श्रमण गोतम से प्रश्न पूछूंगा।”
तब भगवान ने अपना मानस फैलाकर कापटिक युवा-ब्राह्मण के चित्त में चल रहे विचारों को जान लिया, और अपनी नजर कापटिक युवा-ब्राह्मण पर टिका दी। तब कापटिक युवा-ब्राह्मण को लगा, “श्रमण गोतम मुझ पर ध्यान दे रहे हैं। क्यों न मैं अब श्रमण गोतम से प्रश्न पूछूं?”
तब कापटिक युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, ब्राह्मणों के जो पौराणिक मंत्रपद (=वेद) हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरा है, और शास्त्र-संपदा है, उसके आधार पर ब्राह्मण निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ‘बस यही सच है, बाकी सब फालतू।’ इस पर श्रीमान गोतम का क्या कहना है?”
“किन्तु, भारद्वाज, क्या ब्राह्मणों में कोई एक भी ब्राह्मण है, जो कहता हो, ‘मैं इसे (प्रत्यक्ष) जानता हूँ, मैं इसे देखता हूँ। (वाकई) यही सच है, बाकी सब फालतू!’?”
“नहीं, श्रीमान गोतम।”
“और, भारद्वाज, क्या ब्राह्मणों के आचार्य-गुरुओं की सात पीढ़ियों में कोई एक भी आचार्य-गुरु हुआ, जिसने कहा हो, ‘मैं इसे जानता हूँ, मैं इसे देखता हूँ। यही सच है, बाकी सब फालतू!’?”
“नहीं, श्रीमान गोतम।”
“और, भारद्वाज, ब्राह्मणों के जिन पूर्वज ऋषियों ने मंत्र रचे थे, जो मंत्र-प्रवक्ता थे—जैसे अष्टक, व्यमक, व्यामदेव, विश्वामित्र, यमदर्गी, अङगीरस, भारद्वाज, वासेष्ठ, कश्यप और भगू—जिनके पौराणिक मंत्रपद, गीत और भाष्य को इकट्ठा कर, आजकल के ब्राह्मण पाठ करते हैं और जाप करते हैं, बोले जाने वाले को रटकर बोलते हैं, पाठ किए जाने वाले रटकर पाठ करते हैं, क्या उन्होंने कहा था, ‘हम इसे जानते हैं, हम इसे देखते हैं। यही सच है, बाकी सब फालतू!’?”
“नहीं, श्रीमान गोतम।”
“तो लगता है, भारद्वाज, कि ब्राह्मणों में कोई एक भी ब्राह्मण नहीं है, जो कहता हो… ब्राह्मणों के आचार्य-गुरुओं की सात पीढ़ियों में कोई एक भी आचार्य-गुरु नहीं हुआ, जिसने कहा हो… ब्राह्मणों के जिन पूर्वज ऋषियों ने मंत्र रचे थे, जो मंत्र-प्रवक्ता थे—जैसे अष्टक, व्यमक… उन्होंने तक नहीं कहा, ‘हम इसे जानते हैं, हम इसे देखते हैं। यही सच है, बाकी सब फालतू!’
जैसे, भारद्वाज, एक-दूसरे को परस्पर पकड़ी हुई अन्धों की कतार हो, जिनमें न आरंभ के अन्धे कुछ देखते हैं, न मध्य के अन्धे कुछ देखते हैं, और न ही अन्त के अन्धे कुछ देखते हैं। उसी अन्धों की कतार की तरह, भारद्वाज, ब्राह्मण लगते हैं, जिनमें न आरंभ के ब्राह्मण कुछ देखते हैं, न मध्य के ब्राह्मण कुछ देखते हैं, और न ही अन्त के ब्राह्मण कुछ देखते हैं। तुम्हें क्या लगता है, भारद्वाज, क्या ब्राह्मणों की ऐसी श्रद्धा निराधार साबित नहीं होती?”
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण केवल श्रद्धा से उपासना नहीं करते, बल्कि परंपरागत श्रुति (=पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनते आना) से भी उपासना करते हैं।”
“पहले, भारद्वाज, तुम श्रद्धा पर आए, अब परंपरागत श्रुति की बात करते हो। पाँच बातें हैं, भारद्वाज, जो वर्तमान जीवन में दो तरह से फलश्रुत हो सकती हैं। कौन-सी पाँच?
—ये पाँच बातें हैं, भारद्वाज, जो वर्तमान जीवन में दो तरह से फलश्रुत हो सकती हैं।
(१) किसी बात पर, भारद्वाज, पूर्ण श्रद्धा स्थापित होती है, पर वह व्यर्थ, खोखली और मिथ्या होती है। जबकि किसी बात पर ठीक से श्रद्धा नहीं आती, पर वह वास्तविक, यथार्थ और सच्ची होती है।
(२) कोई बात, भारद्वाज, बहुत पसंद की जाती है, पर वह व्यर्थ, खोखली और मिथ्या होती है। जबकि कोई बात थोड़ी भी पसंद नहीं की जाती, पर वह वास्तविक, यथार्थ और सच्ची होती है।
(३) कोई बात, भारद्वाज, परंपरागत रूप से सुनी जाती है, पर वह व्यर्थ, खोखली और मिथ्या होती है। जबकि कोई बात परंपरागत रूप से सुनी नहीं जाती, पर वह वास्तविक, यथार्थ और सच्ची होती है।
(४) कोई बात, भारद्वाज, बहुत तर्कसंगत और विचारशील होती है, पर वह व्यर्थ, खोखली और मिथ्या होती है। जबकि कोई बात तर्कसंगत और विचारशील नहीं होती, पर वह वास्तविक, यथार्थ और सच्ची होती है। 6
(५) कोई मान्यता, भारद्वाज, सोचने-समझने पर स्वीकार होती है, पर वह व्यर्थ, खोखली और मिथ्या होती है। जबकि कोई मान्यता सोचने-समझने पर स्वीकार नहीं होती, पर वह वास्तविक, यथार्थ और सच्ची होती है।
तब, भारद्वाज, कोई सच्चाई की रक्षा करने वाला समझदार पुरुष किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता है कि ‘केवल यही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।’”
“किन्तु तब, श्रीमान गोतम, सच्चाई की रक्षा क्या होती है, कोई सच्चाई की रक्षा कैसे करता है? मैं श्रीमान गोतम को सच्चाई की रक्षा के बारे में पूछता हूँ।”
“भारद्वाज, जब किसी पुरुष को (किसी बात पर) श्रद्धा होती है, तो वह ऐसा कहता है कि ‘ऐसी मेरी श्रद्धा है’, किन्तु, सच्चाई की रक्षा करते हुए, वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता कि ‘केवल यही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।’
और, भारद्वाज, जब किसी पुरुष को (कोई बात) पसंद होती है, तो वह ऐसा कहता है कि ‘यह मुझे पसंद है’, किन्तु, सच्चाई की रक्षा करते हुए, वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता कि ‘केवल यही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।’
और, भारद्वाज, जब कोई पुरुष (कोई बात) परंपरागत रूप से सुनता है, तो वह ऐसा कहता है कि ‘ऐसा मैंने परंपरागत रूप से सुना है’, किन्तु, सच्चाई की रक्षा करते हुए, वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता कि ‘केवल यही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।’
और, भारद्वाज, जब कोई पुरुष (किसी बात पर) तर्कसंगत विचार करता है, तो वह ऐसा कहता है कि ‘ऐसा मेरा तर्कसंगत विचार है’, किन्तु, सच्चाई की रक्षा करते हुए, वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता कि ‘केवल यही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।’
और, भारद्वाज, जब कोई पुरुष (कोई बात) सोच-समझकर स्वीकार करता है, तो वह ऐसा कहता है कि ‘ऐसा मैंने सोच-समझकर स्वीकार किया है’, किन्तु, सच्चाई की रक्षा करते हुए, वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता कि ‘केवल यही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।’
इस तरह, भारद्वाज, सच्चाई की रक्षा होती है। इस तरह कोई सच्चाई की रक्षा करता है। इस तरह मैं सच्चाई की रक्षा बताता हूँ। किन्तु यह सच्चाई का बोध नहीं है।”
“ऐसे ही, श्रीमान गोतम, सच्चाई की रक्षा होती है। इसी तरह कोई सच्चाई की रक्षा करता है। हम इस तरह सच्चाई की रक्षा को मानते हैं । किन्तु, श्रीमान गोतम, यह सच्चाई का बोध क्या होता है? कोई सच्चाई का बोध कैसे करता है? मैं श्रीमान गोतम से सच्चाई के बोध के बारे में पूछता हूँ।”
“ऐसा होता है, भारद्वाज, कोई भिक्षु किसी गाँव या नगर पर निर्भर रहकर विहार करता है। तब कोई गृहस्थ या गृहस्थ का पुत्र जाकर उसके तीन स्वभावों को परखते हैं—लोभ जागने की प्रवृत्ति, द्वेष जागने की प्रवृत्ति, और मोह जागने की प्रवृत्ति।
(१) ‘क्या इस आयुष्मान में कोई लोभ जागने की ऐसी प्रवृत्ति है, जिससे प्रभावित होने पर वह न जानते हुए भी कहे, ‘जानता हूँ’, और न देखते हुए भी कहे, ‘देखता हूँ’, या किसी पराए को ऐसा प्रोत्साहित करे जो उसके दीर्घकाल के लिए अहितकारक और दुःखदायी हो?
अथवा, उस आयुष्मान का ऐसा शारीरिक आचरण है, ऐसा शाब्दिक (वाणी) आचरण है, जैसा किसी अ-लोभी (=लोभ-विहीन) का हो? और क्या वह आयुष्मान ऐसा धम्म बताता है, जो गहरा, दुर्दर्शी (=मुश्किल से दिखने वाला), दुर्ज्ञेय (=मुश्किल से पता चलने वाला), शांतिमय, सर्वोत्तम, तर्क-वितर्क से प्राप्त न होने वाला, निपुण और ज्ञानियों द्वारा अनुभव करने योग्य है। ऐसा धम्म जो कोई लोभी ठीक से न बता सके?’
जब इस तरह परखने पर, वह लोभ जागने की प्रवृत्ति से विशुद्ध दिखता है, तब आगे वे उसके द्वेष जागने की प्रवृत्ति को परखते हैं।
(२) ‘क्या इस आयुष्मान में कोई द्वेष जागने की ऐसी प्रवृत्ति है, जिससे प्रभावित होने पर वह न जानते हुए भी कहे, ‘जानता हूँ’, और न देखते हुए भी कहे, ‘देखता हूँ’, या किसी पराए को ऐसा प्रोत्साहित करे जो उसके दीर्घकाल के लिए अहितकारक और दुःखदायी हो?
अथवा, उस आयुष्मान का ऐसा शारीरिक आचरण है, ऐसा शाब्दिक आचरण है, जैसा किसी अ-द्वेषी (=द्वेष-विहीन) का हो? और क्या वह आयुष्मान ऐसा धम्म बताता है, जो गहरा, दुर्दर्शी, दुर्ज्ञेय, शांतिमय, सर्वोत्तम, तर्क-वितर्क से प्राप्त न होने वाला, निपुण और ज्ञानियों द्वारा अनुभव करने योग्य है। ऐसा धम्म जो कोई द्वेषी ठीक से न बता सके?’
जब इस तरह परखने पर, वह द्वेष जागने की प्रवृत्ति से विशुद्ध दिखता है, तब आगे वे उसके मोह जागने की प्रवृत्ति को परखते हैं।
(३) ‘क्या इस आयुष्मान में कोई मोह जागने की ऐसी प्रवृत्ति है, जिससे प्रभावित होने पर वह न जानते हुए भी कहे, ‘जानता हूँ’, और न देखते हुए भी कहे, ‘देखता हूँ’, या किसी पराए को ऐसा प्रोत्साहित करे जो उसके दीर्घकाल के लिए अहितकारक और दुःखदायी हो?
अथवा, उस आयुष्मान का ऐसा शारीरिक आचरण है, ऐसा शाब्दिक आचरण है, जैसा किसी अ-मोही (=भ्रम-विहीन) का हो? और क्या वह आयुष्मान ऐसा धम्म बताता है, जो गहरा, दुर्दर्शी, दुर्ज्ञेय, शांतिमय, सर्वोत्तम, तर्क-वितर्क से प्राप्त न होने वाला, निपुण और ज्ञानियों द्वारा अनुभव करने योग्य है। ऐसा धम्म जो कोई भ्रमित ठीक से न बता सके?’
जब इस तरह परखने पर, वह मोह जागने की प्रवृत्ति से विशुद्ध दिखता है, तब वे उस पर श्रद्धा स्थापित करते हैं। श्रद्धा जागने पर वे (उसके) पास जाते हैं। पास जाने पर समीप बैठते हैं। समीप बैठने पर सुनना चाहते हैं। सुनना चाहने पर धम्म को सुनते हैं। धम्म को सुनने पर धम्म को याद रखते हैं। धम्म को याद रखने पर उसके अर्थ को जाँचते हैं। अर्थ को जाँचने पर धार्मिक तर्क को स्वीकार करते हैं। धार्मिक तर्क को स्वीकार करने पर इच्छा जागती है। इच्छा जागने पर रुचि जागती है। रुचि जागने पर उत्साह करते हैं। उत्साहित होने पर विकल्प चुनते हैं। विकल्प चुनने पर जुटते हैं। जुटने पर अपनी काया से परमसत्य का साक्षात्कार करते हैं, प्रज्ञा से गहरा देखते हैं।
इस तरह, भारद्वाज, सच्चाई का बोध होता है। इस तरह कोई सच्चाई का बोध करता है। इस तरह मैं सच्चाई का बोध बताता हूँ। किन्तु यह सच्चाई की प्राप्ति नहीं है।”
“ऐसे ही, श्रीमान गोतम, सच्चाई का बोध होता है। इस तरह कोई सच्चाई का बोध करता है। हम इस तरह सच्चाई का बोध मानते हैं । किन्तु, श्रीमान गोतम, यह सच्चाई की प्राप्ति क्या होती है? कोई सच्चाई को प्राप्त कैसे करता है? मैं श्रीमान गोतम से सच्चाई की प्राप्ति के बारे में पूछता हूँ।”
“भारद्वाज, उन्हीं धम्म-स्वभावों को अंगीकार करने, उनकी साधना करने, और उन्हें विकसित करने से सच्चाई की प्राप्ति होती है।
इस तरह, भारद्वाज, सच्चाई की प्राप्ति होती है। इस तरह कोई सच्चाई को प्राप्त करता है। इस तरह मैं सच्चाई की प्राप्ति बताता हूँ।”
“ऐसे ही, श्रीमान गोतम, सच्चाई की प्राप्ति होती है। इस तरह कोई सच्चाई को प्राप्त करता है। हम इस तरह सच्चाई की प्राप्ति मानते हैं । किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन-से गुण (=धम्म-स्वभाव) को बढ़ाने से सच्चाई की प्राप्ति होती है? मैं श्रीमान गोतम से सच्चाई की प्राप्ति के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“सच्चाई की प्राप्ति के लिए, भारद्वाज, जुटना (“पधान” =परिश्रम करना) होता है। जुटने का मन न हो, तो सच्चाई की प्राप्ति नहीं होती। कोई जुटने से ही सच्चाई को प्राप्त करता है। इसलिए सच्चाई की प्राप्ति के लिए जुटना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से जुटना होता है? मैं श्रीमान गोतम से जुटने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“जुटने के लिए, भारद्वाज, विकल्प चुनना (=तुलना करना) होता है। विकल्प चुनने का मन न हो, तो कोई जुटता नहीं। इसलिए जुटने के लिए विकल्प चुनना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से विकल्प चुनना होता है? मैं श्रीमान गोतम से विकल्प चुनने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“विकल्प चुनने के लिए, भारद्वाज, उत्साह बढ़ाना होता है। उत्साह करने का मन न हो, तो कोई विकल्प नहीं चुनता। इसलिए विकल्प चुनने के लिए उत्साह बढ़ाना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से उत्साह होता है? मैं श्रीमान गोतम से उत्साह करने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“उत्साह के लिए, भारद्वाज, रुचि जगानी होती है। रुचि जगाने का मन न हो, तो कोई उत्साह नहीं करता। इसलिए उत्साह के लिए रुचि जगानी होती है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से रुचि जागती है? मैं श्रीमान गोतम से रुचि जगाने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“रुचि जगाने के लिए, भारद्वाज, इच्छा जगानी होती है। इच्छा जगाने का मन न हो, तो रुचि नहीं जागती। इसलिए रुचि जगाने के लिए इच्छा जगानी होती है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से इच्छा जागती है? मैं श्रीमान गोतम से इच्छा जगाने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“इच्छा जगाने के लिए, भारद्वाज, धार्मिक तर्क को स्वीकार करना होता है। धार्मिक तर्क स्वीकार करने का मन न हो, तो इच्छा नहीं जागती। इसलिए इच्छा जगाने के लिए धार्मिक तर्क को स्वीकार करना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से धार्मिक तर्क स्वीकार होता है? मैं श्रीमान गोतम से धार्मिक तर्क स्वीकार करने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“धार्मिक तर्क स्वीकार करने के लिए, भारद्वाज, अर्थ जाँचना होता है। अर्थ जाँचने का मन न हो, तो धार्मिक तर्क स्वीकार नहीं होता। इसलिए धार्मिक तर्क स्वीकार करने के लिए अर्थ जाँचना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से अर्थ जाँचना होता है? मैं श्रीमान गोतम से अर्थ जाँचने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“अर्थ जाँचने के लिए, भारद्वाज, धम्म को याद रखना होता है। धम्म को याद रखने का मन न हो, तो अर्थ जाँचना नहीं होता। इसलिए अर्थ जाँचने के लिए याद रखना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से धम्म को याद रखना होता है? मैं श्रीमान गोतम से धम्म को याद रखने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“धम्म को याद रखने के लिए, भारद्वाज, धम्म को सुनना होता है। धम्म को सुनने का मन न हो, तो धम्म को याद रखना नहीं होता। इसलिए धम्म को याद रखने के लिए धम्म को सुनना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से धम्म को सुनना होता है? मैं श्रीमान गोतम से धम्म को सुनने के लिए बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“धम्म को सुनने के लिए, भारद्वाज, सुनने की इच्छा करना होती है। सुनने की इच्छा न हो, तो धम्म को सुनना नहीं होता। इसलिए धम्म को सुनने के लिए सुनने की इच्छा करना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से सुनने की इच्छा होती है? मैं श्रीमान गोतम से सुनने की इच्छा को बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“सुनने की इच्छा के लिए, भारद्वाज, (भिक्षु के) समीप बैठना होता है। समीप बैठने का मन न हो, तो सुनने की इच्छा नहीं होती। इसलिए सुनने की इच्छा के लिए समीप बैठना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से समीप बैठना होता है? मैं श्रीमान गोतम से समीप बैठने को बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“समीप बैठने के लिए, भारद्वाज, (भिक्षु के) पास जाना होता है। पास जाने का मन न हो, तो समीप बैठना नहीं होता। इसलिए समीप बैठने के लिए पास जाना होता है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन से गुण को बढ़ाने से पास जाना होता है? मैं श्रीमान गोतम से पास जाने को बढ़ाए जाने वाले गुण के बारे में पूछता हूँ।”
“पास जाने के लिए, भारद्वाज, (भिक्षु पर) श्रद्धा बढ़ानी होती है। मन में श्रद्धा न जागे, तो पास जाना नहीं होता। इसलिए पास जाने के लिए श्रद्धा बढ़ानी होती है।”
“मैंने श्रीमान गोतम से सच्चाई की रक्षा पर प्रश्न पूछा, और श्रीमान गोतम ने सच्चाई की रक्षा पर उत्तर दिया। वह मुझे पसंद आया, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ।
मैंने श्रीमान गोतम से सच्चाई के बोध पर प्रश्न पूछा, और श्रीमान गोतम ने सच्चाई के बोध पर उत्तर दिया। वह मुझे पसंद आया, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ।
मैंने श्रीमान गोतम से सच्चाई की प्राप्ति पर प्रश्न पूछा, और श्रीमान गोतम ने सच्चाई की प्राप्ति पर उत्तर दिया। वह मुझे पसंद आया, स्वीकार हुआ, मैं उससे संतुष्ट हूँ।
मैंने श्रीमान गोतम से सच्चाई की प्राप्ति के लिए जिन गुणों को बढ़ाना होता है, उन पर प्रश्न पूछा, और श्रीमान गोतम ने उन पर उत्तर दिया। वे मुझे पसंद आए, स्वीकार हुए, मैं उनसे संतुष्ट हूँ।
मैंने श्रीमान गोतम से जो-जो कुछ पूछा, श्रीमान गोतम ने उन सबका उत्तर दिया। वे मुझे सभी पसंद आए, स्वीकार हुए, मैं उनसे संतुष्ट हूँ।
श्रीमान गोतम, पहले हम इस तरह जानते थे—‘क्या ये मथमुण्डे, तुच्छ श्रमण, नीच जाति के, काले, हमारे रिश्तेदार (ब्रह्मा) के पैर से उपजने वाले, भला क्या ये धम्म जानते होंगे?’
किन्तु श्रीमान गोतम ने मुझे श्रमणों के प्रति प्रेम, श्रमणों के प्रति विश्वास, श्रमणों के प्रति सम्मान के लिए प्रेरित किया। अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह श्रीमान गोतम ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। मैं श्रीमान गोतम की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! श्रीमान गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
चङ्की ब्राह्मण का उल्लेख प्रायः तत्कालीन प्रमुख वरिष्ठ ब्राह्मणों—तारुक्ख, पोक्खरसाति, जाणुस्सोणि और तोदेय्य—के साथ एक समूह में मिलता है; संदर्भ दीघनिकाय १३, मज्झिमनिकाय ९८ व ९९, तथा सुत्तनिपात ३.९ आदि में उपलब्ध हैं। ↩︎
विनयपिटक महावग्ग १.२२ में मगध के राजा सेनिय बिम्बिसार के शरण जाने का उल्लेख मिलता है। उसे पढ़ने हेतु हमारी मार्गदर्शिका देखें। ↩︎
संयुक्तनिकाय ३.१ में कोसल देश के राजा प्रसेनजित के भगवान को शरण जाने का उल्लेख हुआ है। ↩︎
पोक्खरसाति ब्राह्मण की शरण-गमन की कथा अत्यंत रोचक है। इसमें भगवान उसके सबसे प्रतिभाशाली किंतु घमंडी शिष्य अम्बट्ठ का अहंकार चूर-चूर कर देते हैं; और जब यह बात पोक्खरसाति को ज्ञात होती है, तो वह पहले अम्बट्ठ को लताड़ता है और तत्पश्चात स्वयं भगवान की शरण जाता है। दीघनिकाय ३ पढ़ें।
मज्झिमनिकाय ९९ के अनुसार पोक्खरसाति “ओपमञ्ञ” वंश से थे, और अपने समय के सबसे प्रभावशाली एवं प्रतिष्ठित ब्राह्मण आचार्यों में उनकी गणना होती थी। उनका भगवान की शरण जाना उस काल के ब्राह्मणिक जगत को लगभग हिला देने जैसा था। इसके पश्चात आने वाले कई सूत्र इस एक शरण के प्रभाव से भरे प्रतीत होते हैं।
ब्राह्मण ग्रंथों में भी उनका उल्लेख ठीक इसी गरिमा के साथ मिलता है। संस्कृत में उनका नाम “पौष्करसादि” दिया गया है। व्याकरण-परंपरा में उनका उल्लेख कात्यायन और पतञ्जलि करते हैं; तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य में भी उनका संदर्भ मिलता है। आहारेय–अनाहारेय तथा चोरी के प्रसंग में उनका उद्धरण आपस्तम्ब-धम्मसूत्र में है, और वैदिक अनुष्ठान-संबंधी चर्चाओं में शाङ्खायन-आरण्यक भी उनका नाम दर्ज करता है। ↩︎
यहाँ भगवान किसी ब्राह्मण, वह भी सोलह वर्ष के युवा-ब्राह्मण, जो बीच-बीच में टोक रहा हो, को इतने सम्मान के साथ “आयुष्मान” इत्यादि बोलकर फटकार रहे हैं, यह देखना बहुत असामान्य है। इतने सौम्यता से भगवान की फटकार पहले नहीं सुनी गयी। ↩︎
इस विषय पर हमारी मार्गदर्शिका का विचारोत्तेजक लेख पढ़ें—क्या धम्म का तार्किक होना अनिवार्य है? ↩︎
४२२. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा कोसलेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं येन ओपासादं नाम कोसलानं ब्राह्मणगामो तदवसरि. तत्र सुदं भगवा ओपासादे विहरति उत्तरेन ओपासादं देववने सालवने. तेन खो पन समयेन चङ्की ब्राह्मणो ओपासादं अज्झावसति सत्तुस्सदं सतिणकट्ठोदकं सधञ्ञं राजभोग्गं रञ्ञा पसेनदिना कोसलेन दिन्नं राजदायं ब्रह्मदेय्यं. अस्सोसुं खो ओपासादका ब्राह्मणगहपतिका – ‘‘समणो खलु, भो, गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो कोसलेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं ओपासादं अनुप्पत्तो, ओपासादे विहरति उत्तरेन ओपासादं देववने सालवने. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति. सो इमं लोकं सदेवकं समारकं सब्रह्मकं सस्समणब्राह्मणिं पजं सदेवमनुस्सं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति. सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सात्थं सब्यञ्जनं, केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति. साधु खो पन तथारूपानं अरहतं दस्सनं होती’’ति.
४२३. अथ खो ओपासादका ब्राह्मणगहपतिका ओपासादा निक्खमित्वा सङ्घसङ्घी गणीभूता उत्तरेनमुखा गच्छन्ति येन देववनं सालवनं. तेन खो पन समयेन चङ्की ब्राह्मणो उपरिपासादे दिवासेय्यं उपगतो. अद्दसा खो चङ्की ब्राह्मणो ओपासादके ब्राह्मणगहपतिके ओपासादा निक्खमित्वा सङ्घसङ्घी गणीभूते उत्तरेन मुखं येन देववनं सालवनं तेनुपसङ्कमन्ते. दिस्वा खत्तं आमन्तेसि – ‘‘किं नु खो, भो खत्ते, ओपासादका ब्राह्मणगहपतिका ओपासादा निक्खमित्वा सङ्घसङ्घी गणीभूता उत्तरेनमुखा गच्छन्ति येन देववनं सालवन’’न्ति? ‘‘अत्थि, भो चङ्की, समणो गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो कोसलेसु चारिकं चरमानो महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं ओपासादं अनुप्पत्तो, ओपासादे विहरति उत्तरेन ओपासादं देववने सालवने. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति. तमेते भवन्तं गोतमं दस्सनाय गच्छन्ती’’ति. ‘‘तेन हि, भो खत्ते, येन ओपासादका ब्राह्मणगहपतिका तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा ओपासादके ब्राह्मणगहपतिके एवं वदेहि – ‘चङ्की, भो, ब्राह्मणो एवमाह – आगमेन्तु किर भोन्तो, चङ्कीपि ब्राह्मणो समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’’ति. ‘‘एवं, भो’’ति खो सो खत्तो चङ्किस्स ब्राह्मणस्स पटिस्सुत्वा येन ओपासादका ब्राह्मणगहपतिका तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा ओपासादके ब्राह्मणगहपतिके एतदवोच – ‘‘चङ्की, भो, ब्राह्मणो एवमाह – ‘आगमेन्तु किर भोन्तो, चङ्कीपि ब्राह्मणो समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’’ति.
४२४. तेन खो पन समयेन नानावेरज्जकानं ब्राह्मणानं पञ्चमत्तानि ब्राह्मणसतानि ओपासादे पटिवसन्ति केनचिदेव करणीयेन. अस्सोसुं खो ते ब्राह्मणा – ‘‘चङ्की किर ब्राह्मणो समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’ति. अथ खो ते ब्राह्मणा येन चङ्की ब्राह्मणो तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा चङ्किं ब्राह्मणं एतदवोचुं – ‘‘सच्चं किर भवं चङ्की समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सती’’ति? ‘‘एवं खो मे, भो, होति – ‘अहं समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सामी’’’ति. ‘‘मा भवं चङ्की समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमि. न अरहति भवं चङ्की समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; समणोत्वेव गोतमो अरहति भवन्तं चङ्किं दस्सनाय उपसङ्कमितुं. भवञ्हि चङ्की उभतो सुजातो मातितो च पितितो च संसुद्धगहणिको याव सत्तमा पितामहयुगा अक्खित्तो अनुपक्कुट्ठो जातिवादेन. यम्पि भवं चङ्की उभतो सुजातो मातितो च पितितो च संसुद्धगहणिको याव सत्तमा पितामहयुगा अक्खित्तो अनुपक्कुट्ठो जातिवादेन, इमिनापङ्गेन न अरहति भवं चङ्की समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; समणोत्वेव गोतमो अरहति भवन्तं चङ्किं दस्सनाय उपसङ्कमितुं. भवञ्हि चङ्की अड्ढो महद्धनो महाभोगो…पे… भवञ्हि चङ्की तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो…पे… भवञ्हि चङ्की अभिरूपो दस्सनीयो पासादिको परमाय वण्णपोक्खरताय समन्नागतो ब्रह्मवण्णी ब्रह्मवच्छसी [ब्रह्मवच्चसी (सी. पी.)] अखुद्दावकासो दस्सनाय…पे… भवञ्हि चङ्की सीलवा वुद्धसीली वुद्धसीलेन समन्नागतो…पे… भवञ्हि चङ्की कल्याणवाचो कल्याणवाक्करणो पोरिया वाचाय समन्नागतो विस्सट्ठाय अनेलगलाय अत्थस्स विञ्ञापनिया…पे… भवञ्हि चङ्की बहूनं आचरियपाचरियो, तीणि माणवकसतानि मन्ते वाचेति…पे… भवञ्हि चङ्की रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स सक्कतो गरुकतो मानितो पूजितो अपचितो…पे… भवञ्हि चङ्की ब्राह्मणस्स पोक्खरसातिस्स सक्कतो गरुकतो मानितो पूजितो अपचितो…पे… भवञ्हि चङ्की ओपासादं अज्झावसति सत्तुस्सदं सतिणकट्ठोदकं सधञ्ञं राजभोग्गं रञ्ञा पसेनदिना कोसलेन दिन्नं राजदायं ब्रह्मदेय्यं. यम्पि भवं चङ्की ओपासादं अज्झावसति सत्तुस्सदं सतिणकट्ठोदकं सधञ्ञं राजभोग्गं रञ्ञा पसेनदिना कोसलेन दिन्नं राजदायं ब्रह्मदेय्यं, इमिनापङ्गेन न अरहति भवं चङ्की समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; समणोत्वेव गोतमो अरहति भवन्तं चङ्किं दस्सनाय उपसङ्कमितु’’न्ति.
४२५. एवं वुत्ते, चङ्की ब्राह्मणो ते ब्राह्मणे एतदवोच – ‘‘तेन हि, भो, ममपि सुणाथ, यथा मयमेव अरहाम तं समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; नत्वेव अरहति सो भवं गोतमो अम्हाकं दस्सनाय उपसङ्कमितुं. समणो खलु, भो, गोतमो उभतो सुजातो मातितो च पितितो च संसुद्धगहणिको याव सत्तमा पितामहयुगा अक्खित्तो अनुपक्कुट्ठो जातिवादेन. यम्पि, भो, समणो गोतमो उभतो सुजातो मातितो च पितितो च संसुद्धगहणिको याव सत्तमा पितामहयुगा अक्खित्तो अनुपक्कुट्ठो जातिवादेन, इमिनापङ्गेन न अरहति सो भवं गोतमो अम्हाकं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; अथ खो मयमेव अरहाम तं भवन्तं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुं [एत्थ दी. नि. १.३०४ अञ्ञम्पि गुणपदं दिस्सति]. समणो खलु, भो, गोतमो पहूतं हिरञ्ञसुवण्णं ओहाय पब्बजितो भूमिगतञ्च वेहासट्ठञ्च…पे… समणो खलु, भो, गोतमो दहरोव समानो युवा सुसुकाळकेसो भद्रेन योब्बनेन समन्नागतो पठमेन वयसा अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो…पे… समणो खलु, भो, गोतमो अकामकानं मातापितूनं अस्सुमुखानं रुदन्तानं केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो…पे… समणो खलु, भो, गोतमो अभिरूपो दस्सनीयो पासादिको परमाय वण्णपोक्खरताय समन्नागतो ब्रह्मवण्णी ब्रह्मवच्छसी अखुद्दावकासो दस्सनाय…पे… समणो खलु, भो, गोतमो सीलवा अरियसीली कुसलसीली कुसलेन सीलेन समन्नागतो…पे… समणो खलु, भो, गोतमो कल्याणवाचो कल्याणवाक्करणो पोरिया वाचाय समन्नागतो विस्सट्ठाय अनेलगलाय अत्थस्स विञ्ञापनिया…पे… समणो खलु, भो, गोतमो बहूनं आचरियपाचरियो…पे… समणो खलु, भो, गोतमो खीणकामरागो विगतचापल्लो…पे… समणो खलु, भो, गोतमो कम्मवादी किरियवादी अपापपुरेक्खारो ब्रह्मञ्ञाय पजाय…पे… समणो खलु, भो, गोतमो उच्चा कुला पब्बजितो असम्भिन्ना खत्तियकुला…पे… समणो खलु, भो, गोतमो अड्ढा कुला पब्बजितो महद्धना महाभोगा…पे… समणं खलु, भो, गोतमं तिरोरट्ठा तिरोजनपदा संपुच्छितुं आगच्छन्ति…पे… समणं खलु, भो, गोतमं अनेकानि देवतासहस्सानि पाणेहि सरणं गतानि…पे… समणं खलु, भो, गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति…पे… समणो खलु, भो, गोतमो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि समन्नागतो…पे… [एत्थापि दी. नि. १.३०४ अञ्ञानिपि गुणपदानं दिस्सन्ति] समणं खलु, भो, गोतमं राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सपुत्तदारो पाणेहि सरणं गतो…पे… समणं खलु, भो, गोतमं राजा पसेनदि कोसलो सपुत्तदारो पाणेहि सरणं गतो…पे… समणं खलु, भो, गोतमं ब्राह्मणो पोक्खरसाति सपुत्तदारो पाणेहि सरणं गतो…पे… समणो खलु, भो, गोतमो ओपासादं अनुप्पत्तो ओपासादे विहरति उत्तरेन ओपासादं देववने सालवने. ये खो ते समणा वा ब्राह्मणा वा अम्हाकं गामक्खेत्तं आगच्छन्ति, अतिथी नो ते होन्ति. अतिथी खो पनम्हेहि सक्कातब्बा गरुकातब्बा मानेतब्बा पूजेतब्बा. यम्पि समणो गोतमो ओपासादं अनुप्पत्तो ओपासादे विहरति उत्तरेन ओपासादं देववने सालवने, अतिथिम्हाकं समणो गोतमो. अतिथि खो पनम्हेहि सक्कातब्बो गरुकातब्बो मानेतब्बो पूजेतब्बो. इमिनापङ्गेन न अरहति सो भवं गोतमो अम्हाकं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; अथ खो मयमेव अरहाम तं भवन्तं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुं. एत्तके खो अहं, भो, तस्स भोतो गोतमस्स वण्णे परियापुणामि, नो च खो सो भवं गोतमो एत्तकवण्णो; अपरिमाणवण्णो हि सो भवं गोतमो. एकमेकेनपि तेन [एकमेकेनपि भो (सी. स्या. कं. पी.)] अङ्गेन समन्नागतो न अरहति, सो, भवं गोतमो अम्हाकं दस्सनाय उपसङ्कमितुं; अथ खो मयमेव अरहाम तं भवन्तं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमितुन्ति. तेन हि, भो, सब्बेव मयं समणं गोतमं दस्सनाय उपसङ्कमिस्सामा’’ति.
४२६. अथ खो चङ्की ब्राह्मणो महता ब्राह्मणगणेन सद्धिं येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. तेन खो पन समयेन भगवा वुद्धेहि वुद्धेहि ब्राह्मणेहि सद्धिं किञ्चि किञ्चि कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा निसिन्नो होति. तेन खो पन समयेन कापटिको [कापठिको (सी. पी.), कापदिको (स्या. कं.)] नाम माणवो दहरो वुत्तसिरो सोळसवस्सुद्देसिको जातिया, तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्चमानं, पदको, वेय्याकरणो, लोकायतमहापुरिसलक्खणेसु अनवयो तस्सं परिसायं निसिन्नो होति. सो वुद्धानं वुद्धानं ब्राह्मणानं भगवता सद्धिं मन्तयमानानं अन्तरन्तरा कथं ओपातेति. अथ खो भगवा कापटिकं माणवं अपसादेति – ‘‘मायस्मा भारद्वाजो वुद्धानं वुद्धानं ब्राह्मणानं मन्तयमानानं अन्तरन्तरा कथं ओपातेतु. कथापरियोसानं आयस्मा भारद्वाजो आगमेतू’’ति. एवं वुत्ते, चङ्की ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘मा भवं गोतमो कापटिकं माणवं अपसादेसि. कुलपुत्तो च कापटिको माणवो, बहुस्सुतो च कापटिको माणवो, पण्डितो च कापटिको माणवो, कल्याणवाक्करणो च कापटिको माणवो, पहोति च कापटिको माणवो भोता गोतमेन सद्धिं अस्मिं वचने पटिमन्तेतु’’न्ति. अथ खो भगवतो एतदहोसि – ‘‘अद्धा खो कापटिकस्स [एतदहोसि ‘‘कापटिकस्स (क.)] माणवस्स तेविज्जके पावचने कथा [कथं (सी. क.), कथं (स्या. कं. पी.)] भविस्सति. तथा हि नं ब्राह्मणा संपुरेक्खरोन्ती’’ति. अथ खो कापटिकस्स माणवस्स एतदहोसि – ‘‘यदा मे समणो गोतमो चक्खुं उपसंहरिस्सति, अथाहं समणं गोतमं पञ्हं पुच्छिस्सामी’’ति. अथ खो भगवा कापटिकस्स माणवस्स चेतसा चेतोपरिवितक्कमञ्ञाय येन कापटिको माणवो तेन चक्खूनि उपसंहासि.
४२७. अथ खो कापटिकस्स माणवस्स एतदहोसि – ‘‘समन्नाहरति खो मं समणो गोतमो. यंनूनाहं समणं गोतमं पञ्हं पुच्छेय्य’’न्ति. अथ खो कापटिको माणवो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘यदिदं, भो गोतम, ब्राह्मणानं पोराणं मन्तपदं इतिहितिहपरम्पराय पिटकसम्पदाय, तत्थ च ब्राह्मणा एकंसेन निट्ठं गच्छन्ति – ‘इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’न्ति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति? ‘‘किं पन, भारद्वाज, अत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकब्राह्मणोपि यो एवमाह – ‘अहमेतं जानामि, अहमेतं पस्सामि. इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’’’न्ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’. ‘‘किं पन, भारद्वाज, अत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकाचरियोपि , एकाचरियपाचरियोपि, याव सत्तमा आचरियमहयुगापि, यो एवमाह – ‘अहमेतं जानामि, अहमेतं पस्सामि. इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’’’न्ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’. ‘‘किं पन, भारद्वाज, येपि ते ब्राह्मणानं पुब्बका इसयो मन्तानं कत्तारो मन्तानं पवत्तारो येसमिदं एतरहि ब्राह्मणा पोराणं मन्तपदं गीतं पवुत्तं समिहितं तदनुगायन्ति तदनुभासन्ति भासितमनुभासन्ति वाचितमनुवाचेन्ति सेय्यथिदं – अट्ठको वामको वामदेवो वेस्सामित्तो यमतग्गि अङ्गीरसो भारद्वाजो वासेट्ठो कस्सपो भगु, तेपि एवमाहंसु – ‘मयमेतं जानाम, मयमेतं पस्साम. इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’’’न्ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’.
‘‘इति किर, भारद्वाज, नत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकब्राह्मणोपि यो एवमाह – ‘अहमेतं जानामि, अहमेतं पस्सामि. इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’न्ति; नत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकाचरियोपि एकाचरियपाचरियोपि, याव सत्तमा आचरियमहयुगापि, यो एवमाह – ‘अहमेतं जानामि, अहमेतं पस्सामि. इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’न्ति; येपि ते ब्राह्मणानं पुब्बका इसयो मन्तानं कत्तारो मन्तानं पवत्तारो येसमिदं एतरहि ब्राह्मणा पोराणं मन्तपदं गीतं पवुत्तं समिहितं तदनुगायन्ति तदनुभासन्ति भासितमनुभासन्ति वाचितमनुवाचेन्ति सेय्यथिदं – अट्ठको वामको वामदेवो वेस्सामित्तो यमतग्गि अङ्गीरसो भारद्वाजो वासेट्ठो कस्सपो भगु, तेपि न एवमाहंसु – ‘मयमेतं जानाम, मयमेतं पस्साम. इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’न्ति.
४२८. ‘‘सेय्यथापि, भारद्वाज, अन्धवेणि परम्परासंसत्ता पुरिमोपि न पस्सति मज्झिमोपि न पस्सति पच्छिमोपि न पस्सति; एवमेव खो, भारद्वाज, अन्धवेणूपमं मञ्ञे ब्राह्मणानं भासितं सम्पज्जति – पुरिमोपि न पस्सति मज्झिमोपि न पस्सति पच्छिमोपि न पस्सति. तं किं मञ्ञसि, भारद्वाज , ननु एवं सन्ते ब्राह्मणानं अमूलिका सद्धा सम्पज्जती’’ति? ‘‘न ख्वेत्थ, भो गोतम, ब्राह्मणा सद्धायेव पयिरुपासन्ति, अनुस्सवापेत्थ ब्राह्मणा पयिरुपासन्ती’’ति. ‘‘पुब्बेव खो त्वं, भारद्वाज, सद्धं अगमासि, अनुस्सवं इदानि वदेसि. पञ्च खो इमे, भारद्वाज, धम्मा दिट्ठेव धम्मे द्वेधा विपाका. कतमे पञ्च? सद्धा, रुचि, अनुस्सवो, आकारपरिवितक्को, दिट्ठिनिज्झानक्खन्ति – इमे खो, भारद्वाज , पञ्च धम्मा दिट्ठेव धम्मे द्वेधा विपाका. अपि च, भारद्वाज, सुसद्दहितंयेव होति, तञ्च होति रित्तं तुच्छं मुसा; नो चेपि सुसद्दहितं होति, तञ्च होति भूतं तच्छं अनञ्ञथा. अपि च, भारद्वाज , सुरुचितंयेव होति…पे… स्वानुस्सुतंयेव होति…पे… सुपरिवितक्कितंयेव होति…पे… सुनिज्झायितंयेव होति, तञ्च होति रित्तं तुच्छं मुसा; नो चेपि सुनिज्झायितं होति, तञ्च होति भूतं तच्छं अनञ्ञथा. सच्चमनुरक्खता, भारद्वाज, विञ्ञुना पुरिसेन नालमेत्थ एकंसेन निट्ठं गन्तुं – ‘इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’’’न्ति.
४२९. ‘‘कित्तावता पन, भो गोतम, सच्चानुरक्खणा होति, कित्तावता सच्चमनुरक्खति? सच्चानुरक्खणं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘सद्धा चेपि, भारद्वाज, पुरिसस्स होति; ‘एवं मे सद्धा’ति – इति वदं सच्चमनुरक्खति [एवमेव सिज्झतीति इति वा, तं सच्चमनुरक्खति (क.)], नत्वेव ताव एकंसेन निट्ठं गच्छति – ‘इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’न्ति ( ) [(एत्तावता खो भारद्वाज सच्चानुरक्खणा होति, एत्तावता सच्चमनुरक्खति, एत्तावता च मयं सच्चानुरक्खणं पञ्ञापेम, न त्वेव ताव सच्चानुबोधो होति) (सी. स्या. कं. पी.)]. रुचि चेपि, भारद्वाज, पुरिसस्स होति…पे… अनुस्सवो चेपि, भारद्वाज, पुरिसस्स होति…पे… आकारपरिवितक्को चेपि, भारद्वाज, पुरिसस्स होति…पे… दिट्ठिनिज्झानक्खन्ति चेपि, भारद्वाज, पुरिसस्स होति; ‘एवं मे दिट्ठिनिज्झानक्खन्ती’ति – इति वदं सच्चमनुरक्खति, नत्वेव ताव एकंसेन निट्ठं गच्छति – ‘इदमेव सच्चं, मोघमञ्ञ’न्ति. एत्तावता खो, भारद्वाज, सच्चानुरक्खणा होति, एत्तावता सच्चमनुरक्खति, एत्तावता च मयं सच्चानुरक्खणं पञ्ञपेम; न त्वेव ताव सच्चानुबोधो होती’’ति.
४३०. ‘‘एत्तावता, भो गोतम, सच्चानुरक्खणा होति, एत्तावता सच्चमनुरक्खति, एत्तावता च मयं सच्चानुरक्खणं पेक्खाम. कित्तावता पन, भो गोतम, सच्चानुबोधो होति, कित्तावता सच्चमनुबुज्झति? सच्चानुबोधं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘इध [इध किर (स्या. कं. क.)], भारद्वाज, भिक्खु अञ्ञतरं गामं वा निगमं वा उपनिस्साय विहरति. तमेनं गहपति वा गहपतिपुत्तो वा उपसङ्कमित्वा तीसु धम्मेसु समन्नेसति – लोभनीयेसु धम्मेसु, दोसनीयेसु धम्मेसु, मोहनीयेसु धम्मेसु. अत्थि नु खो इमस्सायस्मतो तथारूपा लोभनीया धम्मा यथारूपेहि लोभनीयेहि धम्मेहि परियादिन्नचित्तो अजानं वा वदेय्य – जानामीति, अपस्सं वा वदेय्य – पस्सामीति, परं वा तदत्थाय समादपेय्य यं परेसं अस्स दीघरत्तं अहिताय दुक्खायाति? तमेनं समन्नेसमानो एवं जानाति – ‘नत्थि खो इमस्सायस्मतो तथारूपा लोभनीया धम्मा यथारूपेहि लोभनीयेहि धम्मेहि परियादिन्नचित्तो अजानं वा वदेय्य – जानामीति, अपस्सं वा वदेय्य – पस्सामीति, परं वा तदत्थाय समादपेय्य यं परेसं अस्स दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय [दुक्खायाति (सब्बत्थ)]. तथारूपो [तथा (सी. स्या. कं. पी.)] खो पनिमस्सायस्मतो कायसमाचारो तथारूपो [तथा (सी. स्या. कं. पी.)] वचीसमाचारो यथा तं अलुद्धस्स. यं खो पन अयमायस्मा धम्मं देसेति, गम्भीरो सो धम्मो दुद्दसो दुरनुबोधो सन्तो पणीतो अतक्कावचरो निपुणो पण्डितवेदनीयो; न सो धम्मो सुदेसियो लुद्धेना’’’ति.
४३१. ‘‘यतो नं समन्नेसमानो विसुद्धं लोभनीयेहि धम्मेहि समनुपस्सति ततो नं उत्तरि समन्नेसति दोसनीयेसु धम्मेसु. अत्थि नु खो इमस्सायस्मतो तथारूपा दोसनीया धम्मा यथारूपेहि दोसनीयेहि धम्मेहि परियादिन्नचित्तो अजानं वा वदेय्य – जानामीति, अपस्सं वा वदेय्य – पस्सामीति, परं वा तदत्थाय समादपेय्य यं परेसं अस्स दीघरत्तं अहिताय दुक्खायाति? तमेनं समन्नेसमानो एवं जानाति – ‘नत्थि खो इमस्सायस्मतो तथारूपा दोसनीया धम्मा यथारूपेहि दोसनीयेहि धम्मेहि परियादिन्नचित्तो अजानं वा वदेय्य – जानामीति, अपस्सं वा वदेय्य – पस्सामीति, परं वा तदत्थाय समादपेय्य यं परेसं अस्स दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय. तथारूपो खो पनिमस्सायस्मतो कायसमाचारो तथारूपो वचीसमाचारो यथा तं अदुट्ठस्स. यं खो पन अयमायस्मा धम्मं देसेति, गम्भीरो सो धम्मो दुद्दसो दुरनुबोधो सन्तो पणीतो अतक्कावचरो निपुणो पण्डितवेदनीयो; न सो धम्मो सुदेसियो दुट्ठेना’’’ति.
४३२. ‘‘यतो नं समन्नेसमानो विसुद्धं दोसनीयेहि धम्मेहि समनुपस्सति , ततो नं उत्तरि समन्नेसति मोहनीयेसु धम्मेसु. अत्थि नु खो इमस्सायस्मतो तथारूपा मोहनीया धम्मा यथारूपेहि मोहनीयेहि धम्मेहि परियादिन्नचित्तो अजानं वा वदेय्य – जानामीति, अपस्सं वा वदेय्य – पस्सामीति, परं वा तदत्थाय समादपेय्य यं परेसं अस्स दीघरत्तं अहिताय दुक्खायाति? तमेनं समन्नेसमानो एवं जानाति – ‘नत्थि खो इमस्सायस्मतो तथारूपा मोहनीया धम्मा यथारूपेहि मोहनीयेहि धम्मेहि परियादिन्नचित्तो अजानं वा वदेय्य – जानामीति, अपस्सं वा वदेय्य – पस्सामीति, परं वा तदत्थाय समादपेय्य यं परेसं अस्स दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय. तथारूपो खो पनिमस्सायस्मतो कायसमाचारो तथारूपो वचीसमाचारो यथा तं अमूळ्हस्स. यं खो पन अयमायस्मा धम्मं देसेति, गम्भीरो सो धम्मो दुद्दसो दुरनुबोधो सन्तो पणीतो अतक्कावचरो निपुणो पण्डितवेदनीयो; न सो धम्मो सुदेसियो मूळ्हेना’’’ति.
‘‘यतो नं समन्नेसमानो विसुद्धं मोहनीयेहि धम्मेहि समनुपस्सति ; अथ तम्हि सद्धं निवेसेति, सद्धाजातो उपसङ्कमति, उपसङ्कमन्तो पयिरुपासति, पयिरुपासन्तो सोतं ओदहति, ओहितसोतो धम्मं सुणाति, सुत्वा धम्मं धारेति, धतानं [धारितानं (क.)] धम्मानं अत्थं उपपरिक्खति, अत्थं उपपरिक्खतो धम्मा निज्झानं खमन्ति, धम्मनिज्झानक्खन्तिया सति छन्दो जायति, छन्दजातो उस्सहति, उस्सहित्वा तुलेति, तुलयित्वा पदहति, पहितत्तो समानो कायेन चेव परमसच्चं सच्छिकरोति पञ्ञाय च नं अतिविज्झ पस्सति. एत्तावता खो, भारद्वाज, सच्चानुबोधो होति, एत्तावता सच्चमनुबुज्झति, एत्तावता च मयं सच्चानुबोधं पञ्ञपेम; न त्वेव ताव सच्चानुप्पत्ति होती’’ति.
४३३. ‘‘एत्तावत्ता, भो गोतम, सच्चानुबोधो होति, एत्तावता सच्चमनुबुज्झति, एत्तावता च मयं सच्चानुबोधं पेक्खाम. कित्तावता पन, भो गोतम, सच्चानुप्पत्ति होति, कित्तावता सच्चमनुपापुणाति? सच्चानुप्पत्तिं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘तेसंये , भारद्वाज, धम्मानं आसेवना भावना बहुलीकम्मं सच्चानुप्पत्ति होति. एत्तावता खो, भारद्वाज, सच्चानुप्पत्ति होति, एत्तावता सच्चमनुपापुणाति, एत्तावता च मयं सच्चानुप्पत्तिं पञ्ञपेमा’’ति.
४३४. ‘‘एत्तावता, भो गोतम, सच्चानुप्पत्ति होति, एत्तावता सच्चमनुपापुणाति, एत्तावता च मयं सच्चानुप्पत्तिं पेक्खाम. सच्चानुप्पत्तिया पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? सच्चानुप्पत्तिया बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘सच्चानुप्पत्तिया खो, भारद्वाज, पधानं बहुकारं. नो चेतं पदहेय्य, नयिदं सच्चमनुपापुणेय्य. यस्मा च खो पदहति तस्मा सच्चमनुपापुणाति. तस्मा सच्चानुप्पत्तिया पधानं बहुकार’’न्ति.
‘‘पधानस्स पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? पधानस्स बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘पधानस्स खो, भारद्वाज, तुलना बहुकारा. नो चेतं तुलेय्य, नयिदं पदहेय्य. यस्मा च खो तुलेति तस्मा पदहति. तस्मा पधानस्स तुलना बहुकारा’’ति.
‘‘तुलनाय पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? तुलनाय बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘तुलनाय खो, भारद्वाज, उस्साहो बहुकारो. नो चेतं उस्सहेय्य, नयिदं तुलेय्य. यस्मा च खो उस्सहति तस्मा तुलेति. तस्मा तुलनाय उस्साहो बहुकारो’’ति.
‘‘उस्साहस्स पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? उस्साहस्स बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘उस्साहस्स खो, भारद्वाज, छन्दो बहुकारो. नो चेतं छन्दो जायेथ, नयिदं उस्सहेय्य. यस्मा च खो छन्दो जायति तस्मा उस्सहति. तस्मा उस्साहस्स छन्दो बहुकारो’’ति.
‘‘छन्दस्स पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो ? छन्दस्स बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘छन्दस्स खो, भारद्वाज, धम्मनिज्झानक्खन्ति बहुकारा. नो चेते धम्मा निज्झानं खमेय्युं, नयिदं छन्दो जायेथ. यस्मा च खो धम्मा निज्झानं खमन्ति तस्मा छन्दो जायति. तस्मा छन्दस्स धम्मनिज्झानक्खन्ति बहुकारा’’ति.
‘‘धम्मनिज्झानक्खन्तिया पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? धम्मनिज्झानक्खन्तिया बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘धम्मनिज्झानक्खन्तिया खो, भारद्वाज, अत्थूपपरिक्खा बहुकारा. नो चेतं अत्थं उपपरिक्खेय्य, नयिदं धम्मा निज्झानं खमेय्युं. यस्मा च खो अत्थं उपपरिक्खति तस्मा धम्मा निज्झानं खमन्ति. तस्मा धम्मनिज्झानक्खन्तिया अत्थूपपरिक्खा बहुकारा’’ति.
‘‘अत्थूपपरिक्खाय पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? अत्थूपपरिक्खाय बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘अत्थूपपरिक्खाय खो, भारद्वाज, धम्मधारणा बहुकारा. नो चेतं धम्मं धारेय्य, नयिदं अत्थं उपपरिक्खेय्य. यस्मा च खो धम्मं धारेति तस्मा अत्थं उपपरिक्खति. तस्मा अत्थूपपरिक्खाय धम्मधारणा बहुकारा’’ति.
‘‘धम्मधारणाय पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? धम्मधारणाय बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘धम्मधारणाय खो, भारद्वाज, धम्मस्सवनं बहुकारं. नो चेतं धम्मं सुणेय्य, नयिदं धम्मं धारेय्य. यस्मा च खो धम्मं सुणाति तस्मा धम्मं धारेति. तस्मा धम्मधारणाय धम्मस्सवनं बहुकार’’न्ति.
‘‘धम्मस्सवनस्स पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? धम्मस्सवनस्स बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति . ‘‘धम्मस्सवनस्स खो, भारद्वाज, सोतावधानं बहुकारं . नो चेतं सोतं ओदहेय्य, नयिदं धम्मं सुणेय्य. यस्मा च खो सोतं ओदहति तस्मा धम्मं सुणाति. तस्मा धम्मस्सवनस्स सोतावधानं बहुकार’’न्ति.
‘‘सोतावधानस्स पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? सोतावधानस्स बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘सोतावधानस्स खो, भारद्वाज, पयिरुपासना बहुकारा. नो चेतं पयिरुपासेय्य, नयिदं सोतं ओदहेय्य. यस्मा च खो पयिरुपासति तस्मा सोतं ओदहति. तस्मा सोतावधानस्स पयिरुपासना बहुकारा’’ति.
‘‘पयिरुपासनाय पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? पयिरुपासनाय बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘पयिरुपासनाय खो, भारद्वाज, उपसङ्कमनं बहुकारं. नो चेतं उपसङ्कमेय्य, नयिदं पयिरुपासेय्य. यस्मा च खो उपसङ्कमति तस्मा पयिरुपासति. तस्मा पयिरुपासनाय उपसङ्कमनं बहुकार’’न्ति.
‘‘उपसङ्कमनस्स पन, भो गोतम, कतमो धम्मो बहुकारो? उपसङ्कमनस्स बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं पुच्छामा’’ति. ‘‘उपसङ्कमनस्स खो, भारद्वाज, सद्धा बहुकारा. नो चेतं सद्धा जायेथ, नयिदं उपसङ्कमेय्य. यस्मा च खो सद्धा जायति तस्मा उपसङ्कमति. तस्मा उपसङ्कमनस्स सद्धा बहुकारा’’ति.
४३५. ‘‘सच्चानुरक्खणं मयं भवन्तं गोतमं अपुच्छिम्ह, सच्चानुरक्खणं भवं गोतमो ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च तेन चम्ह अत्तमना. सच्चानुबोधं मयं भवन्तं गोतमं अपुच्छिम्ह, सच्चानुबोधं भवं गोतमो ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च तेन चम्ह अत्तमना. सच्चानुप्पत्तिं मयं भवन्तं गोतमं अपुच्छिम्ह, सच्चानुप्पत्तिं भवं गोतमो ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च तेन चम्ह अत्तमना . सच्चानुप्पत्तिया बहुकारं धम्मं मयं भवन्तं गोतमं अपुच्छिम्ह, सच्चानुप्पत्तिया बहुकारं धम्मं भवं गोतमो ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च तेन चम्ह अत्तमना. यंयदेव च मयं भवन्तं गोतमं अपुच्छिम्ह तंतदेव भवं गोतमो ब्याकासि; तञ्च पनम्हाकं रुच्चति चेव खमति च तेन चम्ह अत्तमना. मयञ्हि, भो गोतम, पुब्बे एवं जानाम – ‘के च मुण्डका समणका इब्भा कण्हा बन्धुपादापच्चा, के च धम्मस्स अञ्ञातारो’ति? अजनेसि वत मे भवं गोतमो समणेसु समणपेमं, समणेसु समणपसादं, समणेसु समणगारवं. अभिक्कन्तं, भो गोतम…पे… उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति.
चङ्कीसुत्तं निट्ठितं पञ्चमं.