✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

ब्राह्मण व्यवस्था पर बुद्ध

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १५ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। तब एसुकारी ब्राह्मण भगवान के पास गया, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर एसुकारी ब्राह्मण ने भगवान से कहा—

सेवा पर ब्राह्मणों का सुझाव

“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण चार प्रकार की सेवाएँ बताते हैं—

  • ब्राह्मणों की सेवा,
  • क्षत्रियों की सेवा,
  • वैश्यों की सेवा,
  • शूद्रों की सेवा।

आगे, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण ब्राह्मणों की सेवा इस प्रकार बताते हैं—

  • ब्राह्मण ब्राह्मणों की सेवा करें,
  • क्षत्रिय ब्राह्मणों की सेवा करें,
  • वैश्य ब्राह्मणों की सेवा करें,
  • शूद्र ब्राह्मणों की सेवा करें।

आगे, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण क्षत्रियों की सेवा इस प्रकार बताते हैं—

  • क्षत्रिय क्षत्रियों की सेवा करें,
  • वैश्य क्षत्रियों की सेवा करें,
  • शूद्र क्षत्रियों की सेवा करें।

आगे, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण वैश्यों की सेवा इस प्रकार बताते हैं—

  • वैश्य वैश्यों की सेवा करें,
  • शूद्र वैश्यों की सेवा करें।

आगे, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण शूद्रों की सेवा इस प्रकार बताते हैं—

  • शूद्र ही शूद्र की सेवा करें। क्योंकि, शूद्रों की सेवा भला कौन करेगा? 1

इस प्रकार, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण चार प्रकार की सेवाएँ बताते हैं। इस पर श्रीमान गोतम का क्या कहना हैं?”

बुद्ध का उत्तर

“किन्तु, ब्राह्मण, क्या संपूर्ण विश्व ने ब्राह्मणों को नियुक्त (या अधिकृत) किया कि ‘चार प्रकार की सेवा बताओ!’?”

“नहीं, श्रीमान गोतम।”

“जैसे, ब्राह्मण, कोई पुरुष हो—गरीब, धनहीन और कंगाल। बिना कामना किए उसे कोई एक टुकड़ा जबरदस्ती थमा दे, ‘ये लो, भले पुरुष, मांस खाओ। और मूल्य चुकाओ।’ उसी तरह, ब्राह्मण, ब्राह्मण उन श्रमण-ब्राह्मणों को बिना सहमत किए ये चार प्रकार की सेवाएँ बताते हैं।

मैं ऐसा नहीं कहता हूँ, ब्राह्मण, कि ‘सभी की सेवा करनी चाहिए।’ मैं ऐसा भी नहीं कहता हूँ कि ‘सभी की सेवा नहीं करनी चाहिए।’

बल्कि, जिसकी सेवा करने से बुरा होता है, भला नहीं होता, मैं कहता हूँ उसकी सेवा नहीं करनी चाहिए। जबकि, जिसकी सेवा करने से भला होता है, बुरा नहीं होता, मैं कहता हूँ उसकी सेवा करनी चाहिए।

यदि, ब्राह्मण, कोई क्षत्रियों से पूछे, ‘किसकी सेवा करोगे?—जिसकी सेवा करने से बुरा होता है, भला नहीं? अथवा, जिसकी सेवा करने से भला होता है, बुरा नहीं?’ तब क्षत्रिय भी ठीक से उत्तर देने पर ऐसा उत्तर देंगे, ‘जिसकी सेवा करने से बुरा होता है, भला नहीं, हम उसकी सेवा नहीं करेंगे। बल्कि, जिसकी सेवा करने से भला होता है, बुरा नहीं, हम उसकी सेवा करेंगे।’

यदि, ब्राह्मण, कोई ब्राह्मणों से पूछे… या वैश्यों से पूछे… या शूद्रों से पूछे, ‘किसकी सेवा करोगे?—जिसकी सेवा करने से बुरा होता है, भला नहीं? अथवा, जिसकी सेवा करने से भला होता है, बुरा नहीं?’ तब शूद्र भी ठीक से उत्तर देने पर ऐसा उत्तर देंगे, ‘जिसकी सेवा करने से बुरा होता है, भला नहीं, हम उसकी सेवा नहीं करेंगे। बल्कि, जिसकी सेवा करने से भला होता है, बुरा नहीं, हम उसकी सेवा करेंगे।’

कुल/वर्ण/संपत्ति की अप्रासंगिकता

ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-कुलीनता से भला होता है।’ मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-कुलीनता से बुरा होता है।’ और, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-वर्णता से भला होता है।’ मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-वर्णता से बुरा होता है।’ और, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-भोगसंपत्ति होने से भला होता है।’ मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-भोगसंपत्ति होने से बुरा होता है।’

क्योंकि, ब्राह्मण, ऊँचे कुल के भी कुछ लोग—जीवहत्या करते हैं, चोरी करते हैं, व्यभिचार करते हैं, झूठ बोलते हैं, फूट डालने वाली बात करते हैं, कटु बोलते हैं, व्यर्थ बातें करते हैं, लालची होते हैं, दुर्भावनापूर्ण होते हैं, मिथ्या दृष्टि वाले होते हैं। इसलिए, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-कुलीनता से भला होता है।’

जबकि, ब्राह्मण, ऊँचे कुल के भी कुछ लोग—जीवहत्या से विरत रहते हैं, चोरी से विरत रहते हैं, व्यभिचार से विरत रहते हैं, झूठ बोलने से विरत रहते हैं, फूट डालने वाली बात से विरत रहते हैं, कटु बोलने से विरत रहते हैं, व्यर्थ बातें से विरत रहते हैं, लालच-विहीन होते हैं, दुर्भावना-विहीन होते हैं, सम्यक दृष्टि वाले होते हैं। इसलिए, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-कुलीनता से बुरा होता है।’

उसी तरह, ब्राह्मण, ऊँचे वर्ण के भी कुछ लोग—जीवहत्या करते हैं, चोरी करते हैं, व्यभिचार करते हैं, झूठ बोलते हैं, फूट डालने वाली बात करते हैं, कटु बोलते हैं, व्यर्थ बातें करते हैं, लालची होते हैं, दुर्भावनापूर्ण होते हैं, मिथ्या दृष्टि वाले होते हैं। इसलिए, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-वर्णता से भला होता है।’

जबकि, ब्राह्मण, ऊँचे वर्ण के भी कुछ लोग—जीवहत्या से विरत रहते हैं, चोरी से विरत रहते हैं, व्यभिचार से विरत रहते हैं, झूठ बोलने से विरत रहते हैं, फूट डालने वाली बात से विरत रहते हैं, कटु बोलने से विरत रहते हैं, व्यर्थ बातें से विरत रहते हैं, लालच-विहीन होते हैं, दुर्भावना-विहीन होते हैं, सम्यक दृष्टि वाले होते हैं। इसलिए, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-वर्णता से बुरा होता है।’

और, ब्राह्मण, ऊँचे भोगसंपत्ति वाले भी कुछ लोग—जीवहत्या करते हैं, चोरी करते हैं, व्यभिचार करते हैं, झूठ बोलते हैं, फूट डालने वाली बात करते हैं, कटु बोलते हैं, व्यर्थ बातें करते हैं, लालची होते हैं, दुर्भावनापूर्ण होते हैं, मिथ्या दृष्टि वाले होते हैं। इसलिए, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-भोगता से भला होता है।’

जबकि, ब्राह्मण, ऊँचे भोगसंपत्ति वाले भी कुछ लोग—जीवहत्या से विरत रहते हैं, चोरी से विरत रहते हैं, व्यभिचार से विरत रहते हैं, झूठ बोलने से विरत रहते हैं, फूट डालने वाली बात से विरत रहते हैं, कटु बोलने से विरत रहते हैं, व्यर्थ बातें से विरत रहते हैं, लालच-विहीन होते हैं, दुर्भावना-विहीन होते हैं, सम्यक दृष्टि वाले होते हैं। इसलिए, ब्राह्मण, मैं नहीं कहता हूँ कि ‘उच्च-भोगता से बुरा होता है।’

सेवा पर बुद्ध का सुझाव

मैं ऐसा नहीं कहता हूँ, ब्राह्मण, कि ‘सभी की सेवा करनी चाहिए।’ मैं ऐसा भी नहीं कहता हूँ कि ‘सभी की सेवा नहीं करनी चाहिए।’

बल्कि, ब्राह्मण, जिसकी सेवा करने से श्रद्धा बढ़ती हो, शील बढ़ता हो, (धम्म की) जानकारी बढ़ती हो, उदारता (=त्याग) बढ़ती हो, प्रज्ञा (=अंतर्ज्ञान) बढ़ती हो, मैं कहता हूँ—‘उसकी सेवा करनी चाहिए’।

जबकि, जिसकी सेवा करने से न श्रद्धा बढ़ती हो, न शील बढ़ता हो, न जानकारी बढ़ती हो, न उदारता बढ़ती हो, न प्रज्ञा बढ़ती हो, मैं कहता हूँ—‘उसकी सेवा नहीं करनी चाहिए।’”

धनसंपत्ति पर ब्राह्मणों का सुझाव

जब ऐसा कहा गया, तब एसुकारी ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, ब्राह्मण चार प्रकार की धनसंपत्ति बताते हैं—

  • ब्राह्मणों की अपनी धनसंपत्ति,
  • क्षत्रियों की अपनी धनसंपत्ति,
  • वैश्यों की अपनी धनसंपत्ति,
  • शूद्रों की अपनी धनसंपत्ति।

(१) श्रीमान गोतम, ब्राह्मण ब्राह्मणों की अपनी धनसंपत्ति ‘भिक्षाचर्या’ को बताते हैं। जो ब्राह्मण अपनी भिक्षाचर्या की धनसंपत्ति का तिरस्कार करता है, वह अपना कर्तव्य पूरा न कर किसी चौकीदार चोर की तरह चुराता है। इस तरह, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण ब्राह्मणों की अपनी धनसंपत्ति बताते हैं। 2

(२) श्रीमान गोतम, ब्राह्मण क्षत्रियों की अपनी धनसंपत्ति ‘धनुष-तरकश’ (=शस्त्र चलाना) को बताते हैं। 3 जो क्षत्रिय अपनी धनुष-तरकश की धनसंपत्ति का तिरस्कार करता है, वह भी अपना कर्तव्य पूरा न कर किसी चौकीदार चोर की तरह चुराता है। इस तरह, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण क्षत्रियों की अपनी धनसंपत्ति बताते हैं।

(३) श्रीमान गोतम, ब्राह्मण वैश्यों की अपनी धनसंपत्ति ‘कृषि और पशुपालन’ को बताते हैं। 4 जो वैश्य अपनी कृषि और पशुपालन की धनसंपत्ति का तिरस्कार करता है, वह भी अपना कर्तव्य पूरा न कर किसी चौकीदार चोर की तरह चुराता है। इस तरह, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण वैश्यों की अपनी धनसंपत्ति बताते हैं।

(४) श्रीमान गोतम, ब्राह्मण शूद्रों की अपनी धनसंपत्ति ‘(घास काटने का) हँसिया और (कूटने का) मूसल को बताते हैं। 5 जो शूद्र अपनी हँसिया और मूसल की धनसंपत्ति का तिरस्कार करता है, वह भी अपना कर्तव्य पूरा न कर किसी चौकीदार चोर की तरह चुराता है। इस तरह, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण क्षत्रियों की अपनी धनसंपत्ति बताते हैं।

इस तरह, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण चार प्रकार की धनसंपत्ति बताते हैं। इस पर श्रीमान गोतम का क्या कहना हैं?”

बुद्ध का उत्तर

“किन्तु, ब्राह्मण, क्या संपूर्ण विश्व ने ब्राह्मणों को नियुक्त (या अधिकृत) किया कि ‘चार प्रकार की धनसंपत्ति बताओ!’?”

“नहीं, श्रीमान गोतम।”

“जैसे, ब्राह्मण, कोई पुरुष हो—गरीब, धनहीन और कंगाल। बिना कामना किए उसे कोई एक टुकड़ा जबरदस्ती थमा दे, ‘ये लो, भले पुरुष, मांस खाओ। और मूल्य चुकाओ।’ उसी तरह, ब्राह्मण, ब्राह्मण उन श्रमण-ब्राह्मणों को बिना सहमत किए ये चार प्रकार की धनसंपत्ति बताते हैं।

ब्राह्मण, मैं कहता हूँ कि पुरुष की अपनी धनसंपत्ति ‘आर्य लोकुत्तर धम्म’ होता है। किन्तु, कोई माता-पिता के पुराने कुलवंश का अनुस्मरण कर, जैसा-जैसा व्यक्तित्व (“आत्मभाव”) निर्मित करता है, वैसा-वैसा पहचाना जाता है।

क्षत्रिय-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘क्षत्रिय’ पहचाना जाता है। ब्राह्मण-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘ब्राह्मण’ पहचाना जाता है। वैश्य-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘वैश्य’ पहचाना जाता है। शूद्र-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘शूद्र’ पहचाना जाता है।

जैसे, ब्राह्मण, कोई अग्नि जैसे-जैसे आधार पर जलती हो, वैसे-वैसे पहचानी जाती है। जो अग्नि काष्ठ के आधार पर जलती है, वह ‘काष्ठ की अग्नि’ (के रूप पर) पहचानी जाती है। जो अग्नि टहनी के आधार पर जलती है, वह ‘टहनी की अग्नि’ पहचानी जाती है। जो अग्नि घास के आधार पर जलती है, वह ‘घास की अग्नि’ पहचानी जाती है। जो अग्नि गोबर के आधार पर जलती है, वह ‘गोबर की अग्नि’ पहचानी जाती है।

उसी तरह, ब्राह्मण, मैं कहता हूँ कि पुरुष की अपनी धनसंपत्ति ‘आर्य लोकुत्तर धम्म’ होता है। किन्तु, कोई माता-पिता के पुराने कुलवंश का अनुस्मरण कर, जैसा-जैसा व्यक्तित्व निर्मित करता है, वैसा-वैसा पहचाना जाता है।

क्षत्रिय-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘क्षत्रिय’ पहचाना जाता है। ब्राह्मण-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘ब्राह्मण’ पहचाना जाता है। वैश्य-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘वैश्य’ पहचाना जाता है। शूद्र-कुल में व्यक्तित्व निर्मित करता हो, तो ‘शूद्र’ पहचाना जाता है।

यशस्वी होने की क्षमता

ब्राह्मण, कोई क्षत्रिय-कुल से घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होता है, और तथागत के द्वारा विदित धम्म-विनय में आकर—जीवहत्या से विरत होता है, चोरी से विरत होता है, व्यभिचार से विरत होता है, झूठ बोलने से विरत होता है, फूट डालने वाली बात से विरत होता है, कटु बोलने से विरत होता है, व्यर्थ बातों से विरत होता है, लालच-विहीन होता है, दुर्भावना-विहीन होता है, सम्यक दृष्टि वाले होता है। और, वह इस न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी होता है।

कोई ब्राह्मण-कुल से… कोई वैश्य-कुल से… कोई शूद्र-कुल से घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होता है, और तथागत के द्वारा विदित धम्म-विनय में आकर—जीवहत्या से विरत होता है, चोरी से विरत होता है, व्यभिचार से विरत होता है, झूठ बोलने से विरत होता है, फूट डालने वाली बात से विरत होता है, कटु बोलने से विरत होता है, व्यर्थ बातों से विरत होता है, लालच-विहीन होता है, दुर्भावना-विहीन होता है, सम्यक दृष्टि वाले होता है। और, वह इस न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी होता है।

साधना करने की क्षमता

क्या लगता है, ब्राह्मण? क्या केवल कोई ब्राह्मण ही इस प्रदेश के लिए निर्बैर, निर्द्वेष, मेत्ता (=सद्भावपूर्ण) चित्त विकसित कर सकता है, कोई क्षत्रिय नहीं, या वैश्य नहीं, या शूद्र नहीं?”

“नहीं, श्रीमान गोतम। कोई क्षत्रिय… या कोई ब्राह्मण… या कोई वैश्य… या कोई शूद्र भी इस प्रदेश के लिए निर्बैर, निर्द्वेष, मेत्ता चित्त विकसित कर सकता है। सभी चारों वर्ण, श्रीमान गोतम, इस प्रदेश के लिए निर्बैर, निर्द्वेष, मेत्ता चित्त विकसित कर सकते हैं।”

“उसी तरह, ब्राह्मण, कोई क्षत्रिय-कुल से… कोई ब्राह्मण-कुल से… कोई वैश्य-कुल से… कोई शूद्र-कुल से घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होता है, और तथागत के द्वारा विदित धम्म-विनय में आकर… इस न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी होता है।

शुद्ध होने की क्षमता

क्या लगता है, ब्राह्मण? क्या केवल कोई ब्राह्मण ही नहाने का चूर्ण (=साबुन) नदी में ले जाकर (नहाकर अपना) धूल-मल साफ कर सकता है, कोई क्षत्रिय नहीं, या वैश्य नहीं, या शूद्र नहीं?”

“नहीं, श्रीमान गोतम। यदि कोई क्षत्रिय… या ब्राह्मण… या वैश्य… या शूद्र भी नहाने का चूर्ण नदी में ले जाकर धूल-मल साफ कर सकता है। सभी चारों वर्ण, श्रीमान गोतम, नहाने का चूर्ण नदी में ले जाकर धूल-मल साफ कर सकते हैं।”

“उसी तरह, ब्राह्मण, कोई क्षत्रिय-कुल से… कोई ब्राह्मण-कुल से… कोई वैश्य-कुल से… कोई शूद्र-कुल से घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होता है, और तथागत के द्वारा विदित धम्म-विनय में आकर… इस न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी होता है।

ज्वलंत करने की क्षमता

“क्या लगता है, ब्राह्मण? यदि कोई राजतिलक हुआ क्षत्रिय राजा विभिन्न जातियों के सौ पुरुषों को इकट्ठा करे, ‘आओ, श्रीमानो। आप में से जो क्षत्रिय-कुल, ब्राह्मण-कुल, या राजसी-कुल में उत्पन्न हुए हो, वे इस सागौन, शाल, सरल, चन्दन या पद्म की उत्तरारणि 6 लेकर अग्नि जलाएँ, गर्मी उत्पन्न करें। और, आप में से जो चण्डाल-कुल (मृतदेह का काम करने वाले), निषाद-कुल (शिकार करने वाले), वेन-कुल (बांस का काम करने वाले), रथकार-कुल (बढई का काम करने वाले), या पुक्कुस-कुल (मैला उठाने वाले) में उत्पन्न हुए हो, वे इस कुत्तों के नाली से, सूअरों की नाली से, कूड़े की नाली से, या ऐरण्ड की काष्ठ से उत्तरारणि लेकर अग्नि जलाएँ, गर्मी उत्पन्न करें।’

तब क्या लगता है, ब्राह्मण? क्या केवल क्षत्रिय-कुल, ब्राह्मण-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की ही आँच होगी, तेज रंग होगा, प्रकाशमान होगा, और कुछ अग्नि से अग्नि जलाने का काम हो सकेगा? किन्तु, जो चण्डाल-कुल, निषाद-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की न आँच होगी, न तेज रंग होगा, न प्रकाशमान होगा, और न ही कुछ अग्नि से अग्नि जलाने का काम हो सकेगा?”

“नहीं, श्रीमान गोतम। क्षत्रिय-कुल, ब्राह्मण-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की आँच, तेज रंग, प्रकाशमान… अग्नि जलाने का काम हो सकेगा। और साथ ही, जो चण्डाल-कुल, निषाद-कुल (इत्यादि)… की उत्पन्न आग की भी आँच, तेज रंग, प्रकाशमान… अग्नि जलाने का काम हो सकेगा। क्योंकि सभी प्रकार से आग की आँच होती है, तेज रंग होता है, प्रकाशमान होता है… अग्नि जलाने का काम होता है।”

“उसी तरह, ब्राह्मण, कोई क्षत्रिय-कुल से… कोई ब्राह्मण-कुल से… कोई वैश्य-कुल से… कोई शूद्र-कुल से घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होता है, और तथागत के द्वारा विदित धम्म-विनय में आकर—जीवहत्या से विरत होता है, चोरी से विरत होता है, व्यभिचार से विरत होता है, झूठ बोलने से विरत होता है, फूट डालने वाली बात से विरत होता है, कटु बोलने से विरत होता है, व्यर्थ बातों से विरत होता है, लालच-विहीन होता है, दुर्भावना-विहीन होता है, सम्यक दृष्टि वाले होता है। और, वह इस न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी होता है।”

जब ऐसा कहा गया, तब एसुकारी ब्राह्मण कह पड़ा, “अतिउत्तम, श्रीमान गौतम! अतिउत्तम, श्रीमान गौतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि अच्छी आँखोंवाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह श्रीमान गौतम ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।

मैं श्रीमान गोतम की शरण जाता हूँ! धम्म और संघ की! श्रीमान गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”

सुत्र समाप्त।


  1. ब्राह्मणों का प्रमुख आचार-ग्रंथ मनुस्मृति, जो धम्म के आवरण में कठोर सामाजिक संसंस्कार थोपता है, वह अपने आप में पचासों भिन्न संस्करणों में उपलब्ध है, जिनके अनेक अंश आपस में तक नहीं मिलते। यहाँ तक कि अधिकांश प्रतियों में ग्रंथ का पूर्वार्ध और उत्तरार्ध परस्पर विरोधी दिशा में चलते प्रतीत होते हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि इसे समय-समय पर भिन्न समूहों ने अपनी-अपनी आवश्यकताओं और मंशाओं के अनुरूप संशोधित किया, और इस प्रकार ‘अपरिवर्तनशील’ या ‘सनातन’ होने का दावा स्वयं ही निरस्त हो जाता है।

    इसी मनुस्मृति के एक प्रचलित संस्करण में (अध्याय २.२३८) यह कहा गया है कि कोई ब्राह्मण विपरीत परिस्थितियों में निचले वर्णों से शिक्षण ग्रहण कर सकता है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में शूद्र से नहीं। ↩︎

  2. वेदों से इतर ब्राह्मणी शास्त्र, जैसे वासिष्ठ धम्मसूत्र २.२२-३, यह व्यवस्था देते हैं कि उच्च-वर्णीय व्यक्ति कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में निम्न-वर्ण की जीविका अपना सकता है; परन्तु निम्न वर्ण को किसी भी दशा में उच्च वर्ण की आजीविका ग्रहण करने का अधिकार नहीं दिया गया है।

    भिक्षाचर्या को प्राचीन ब्राह्मण ऋषियों का श्रेष्ठतम जीवनचर्या माना गया है, जैसे बृहदारण्यक उपनिषद ३.५.१ और ४.४.२२ में इसका स्पष्ट निर्देश मिलता है। बाद के ग्रंथ वासिष्ठ धम्मसूत्र २.१३ में कहा गया है कि ब्राह्मण के लिए छः विध आजीविकाएँ हैं—अध्ययन, पठन, अपने लिए यज्ञ करना, दूसरों के लिए यज्ञ करना, दान देना, और दक्षिणा ग्रहण करना। इसी प्रकार मनुस्मृति १.८८ भी लगभग यही बात प्रस्तुत करती है। ↩︎

  3. वासिष्ठ धम्मसूत्र २.१६ और २.१८ के अनुसार, क्षत्रिय और वैश्य भी ब्राह्मणों की तरह पठन, यज्ञ, और दान कर सकते हैं, किन्तु (वेद और अन्य धम्मशास्त्र का) अध्ययन और दक्षिणा ग्रहण करना नहीं। मनुस्मृति १.८९ के अनुसार, उनकी जीविका प्रजा की रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग से चलनी चाहिए। ↩︎

  4. मनुस्मृति १.९० और वासिष्ठ धम्मसूत्र २.१९ के अनुसार, वैश्य का काम कृषि, पशुपालन और पैसों का लेन–देन (यानी साहूकारी) माना गया है। कृषि और पशुपालन के साथ साहूकारी को जोड़ना यह दिखाता है कि जब ये ग्रंथ रचे गए, तब तक अर्थव्यवस्था उतनी विकसित हो चुकी थी। ↩︎

  5. मनुस्मृति १.९१ और वासिष्ठ धम्मसूत्र २.२० के अनुसार, शूद्रों का काम केवल दूसरे वर्णों की सेवा करना बताया गया है। बस, और कुछ नहीं। मनुस्मृति ज़ोर देकर कहती है कि यह सेवा “शुश्रूषा मनसूयया” हो—यानी मन में न कोई शिकायत, न कोई भीतर की खीझ; बस बिना आपत्ति के आज्ञापालन करते रहें। ↩︎

  6. पुराने समय में, जब माचिस जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी, लोग विशेष प्रकार की “उत्तरारणि” लकड़ियों को आपस में रगड़कर अरणि-मंथन के माध्यम से अग्नि उत्पन्न करते थे। अग्नि प्रज्वलन की इस प्रक्रिया को भगवान ने अनेक प्रसंगों में उपमा के रूप में प्रस्तुत किया है। ↩︎

पालि

४३६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. अथ खो एसुकारी ब्राह्मणो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो एसुकारी ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ब्राह्मणा, भो गोतम, चतस्सो पारिचरिया पञ्ञपेन्ति – ब्राह्मणस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति, खत्तियस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति, वेस्सस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति, सुद्दस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा ब्राह्मणस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति – ‘ब्राह्मणो वा ब्राह्मणं परिचरेय्य, खत्तियो वा ब्राह्मणं परिचरेय्य, वेस्सो वा ब्राह्मणं परिचरेय्य, सुद्दो वा ब्राह्मणं परिचरेय्या’ति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा ब्राह्मणस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा खत्तियस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति – ‘खत्तियो वा खत्तियं परिचरेय्य, वेस्सो वा खत्तियं परिचरेय्य, सुद्दो वा खत्तियं परिचरेय्या’ति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा खत्तियस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा वेस्सस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति – ‘वेस्सो वा वेस्सं परिचरेय्य, सुद्दो वा वेस्सं परिचरेय्या’ति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा वेस्सस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति . तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा सुद्दस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति – ‘सुद्दोव सुद्दं परिचरेय्य. को पनञ्ञो सुद्दं परिचरिस्सती’ति? इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा सुद्दस्स पारिचरियं पञ्ञपेन्ति. ब्राह्मणा, भो गोतम, इमा चतस्सो पारिचरिया पञ्ञपेन्ति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति?

४३७. ‘‘किं पन, ब्राह्मण, सब्बो लोको ब्राह्मणानं एतदब्भनुजानाति – ‘इमा चतस्सो पारिचरिया पञ्ञपेन्तू’’’ति [पञ्ञपेन्तीति (सी. क.)]? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’. ‘‘सेय्यथापि, ब्राह्मण, पुरिसो दलिद्दो [दळिद्दो (सी. स्या. कं. पी.)] अस्सको अनाळ्हियो. तस्स अकामस्स बिलं ओलग्गेय्युं – ‘इदं ते, अम्भो पुरिस, मंसं खादितब्बं, मूलञ्च अनुप्पदातब्ब’न्ति. एवमेव खो, ब्राह्मण, ब्राह्मणा अप्पटिञ्ञाय तेसं समणब्राह्मणानं, अथ च पनिमा चतस्सो पारिचरिया पञ्ञपेन्ति. नाहं, ब्राह्मण, ‘सब्बं परिचरितब्ब’न्ति वदामि; नाहं, ब्राह्मण, ‘सब्बं न परिचरितब्ब’न्ति वदामि. यं हिस्स, ब्राह्मण, परिचरतो पारिचरियाहेतु पापियो अस्स न सेय्यो, नाहं तं ‘परिचरितब्ब’न्ति वदामि; यञ्च ख्वास्स, ब्राह्मण, परिचरतो पारिचरियाहेतु सेय्यो अस्स न पापियो तमहं ‘परिचरितब्ब’न्ति वदामि. खत्तियं चेपि, ब्राह्मण, एवं पुच्छेय्युं – ‘यं वा ते परिचरतो पारिचरियाहेतु पापियो अस्स न सेय्यो, यं वा ते परिचरतो पारिचरियाहेतु सेय्यो अस्स न पापियो; कमेत्थ परिचरेय्यासी’ति, खत्तियोपि हि, ब्राह्मण , सम्मा ब्याकरमानो एवं ब्याकरेय्य – ‘यञ्हि मे परिचरतो पारिचरियाहेतु पापियो अस्स न सेय्यो, नाहं तं परिचरेय्यं; यञ्च खो मे परिचरतो पारिचरियाहेतु सेय्यो अस्स न पापियो तमहं परिचरेय्य’न्ति. ब्राह्मणं चेपि, ब्राह्मण…पे… वेस्सं चेपि, ब्राह्मण…पे… सुद्दं चेपि, ब्राह्मण, एवं पुच्छेय्युं – ‘यं वा ते परिचरतो पारिचरियाहेतु पापियो अस्स न सेय्यो, यं वा ते परिचरतो पारिचरियाहेतु सेय्यो अस्स न पापियो; कमेत्थ परिचरेय्यासी’ति, सुद्दोपि हि, ब्राह्मण, सम्मा ब्याकरमानो एवं ब्याकरेय्य – ‘यञ्हि मे परिचरतो पारिचरियाहेतु पापियो अस्स न सेय्यो, नाहं तं परिचरेय्यं; यञ्च खो मे परिचरतो पारिचरियाहेतु सेय्यो अस्स न पापियो तमहं परिचरेय्य’न्ति. नाहं, ब्राह्मण, ‘उच्चाकुलीनता सेय्यंसो’ति वदामि, न पनाहं, ब्राह्मण, ‘उच्चाकुलीनता पापियंसो’ति वदामि; नाहं, ब्राह्मण, ‘उळारवण्णता सेय्यंसो’ति वदामि, न पनाहं, ब्राह्मण, ‘उळारवण्णता पापियंसो’ति वदामि; नाहं, ब्राह्मण, ‘उळारभोगता सेय्यंसो’ति वदामि, न पनाहं, ब्राह्मण, ‘उळारभोगता पापियंसो’ति वदामि.

४३८. ‘‘उच्चाकुलीनोपि हि, ब्राह्मण, इधेकच्चो पाणातिपाती होति, अदिन्नादायी होति, कामेसुमिच्छाचारी होति, मुसावादी होति, पिसुणावाचो होति, फरुसावाचो होति, सम्फप्पलापी होति, अभिज्झालु होति , ब्यापन्नचित्तो होति, मिच्छादिट्ठि होति. तस्मा ‘न उच्चाकुलीनता सेय्यंसो’ति वदामि. उच्चाकुलीनोपि हि, ब्राह्मण, इधेकच्चो पाणातिपाता पटिविरतो होति, अदिन्नादाना पटिविरतो होति, कामेसुमिच्छाचारा पटिविरतो होति, मुसावादा पटिविरतो होति, पिसुणाय वाचाय पटिविरतो होति, फरुसाय वाचाय पटिविरतो होति, सम्फप्पलापा पटिविरतो होति, अनभिज्झालु होति, अब्यापन्नचित्तो होति, सम्मादिट्ठि होति. तस्मा ‘न उच्चाकुलीनता पापियंसो’ति वदामि.

४३९. ‘‘उळारवण्णोपि हि, ब्राह्मण…पे… उळारभोगोपि हि, ब्राह्मण, इधेकच्चो पाणातिपाती होति…पे… मिच्छादिट्ठि होति. तस्मा ‘न उळारभोगता सेय्यंसो’ति वदामि. उळारभोगोपि हि, ब्राह्मण, इधेकच्चो पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति. तस्मा ‘न उळारभोगता पापियंसो’ति वदामि. नाहं, ब्राह्मण, ‘सब्बं परिचरितब्ब’न्ति वदामि, न पनाहं, ब्राह्मण, ‘सब्बं न परिचरितब्ब’न्ति वदामि. यं हिस्स, ब्राह्मण, परिचरतो पारिचरियाहेतु सद्धा वड्ढति, सीलं वड्ढति, सुतं वड्ढति, चागो वड्ढति, पञ्ञा वड्ढति, तमहं ‘परिचरितब्ब’न्ति (वदामि. यं हिस्स, ब्राह्मण, परिचरतो पारिचरियाहेतु न सद्धा वड्ढति, न सीलं वड्ढति, न सुतं वड्ढति, न चागो वड्ढति, न पञ्ञा वड्ढति, नाहं तं ‘परिचरितब्ब’न्ति) [( ) एत्थन्तरे पाठो सी. स्या. कं. पी. पोत्थकेसु नत्थि] वदामी’’ति.

४४०. एवं वुत्ते, एसुकारी ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ब्राह्मणा, भो गोतम, चत्तारि धनानि पञ्ञपेन्ति – ब्राह्मणस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति, खत्तियस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति, वेस्सस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति, सुद्दस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा ब्राह्मणस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति भिक्खाचरियं; भिक्खाचरियञ्च पन ब्राह्मणो सन्धनं अतिमञ्ञमानो अकिच्चकारी होति गोपोव अदिन्नं आदियमानोति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा ब्राह्मणस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा खत्तियस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति धनुकलापं; धनुकलापञ्च पन खत्तियो सन्धनं अतिमञ्ञमानो अकिच्चकारी होति गोपोव अदिन्नं आदियमानोति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा खत्तियस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा वेस्सस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति कसिगोरक्खं; कसिगोरक्खञ्च पन वेस्सो सन्धनं अतिमञ्ञमानो अकिच्चकारी होति गोपोव अदिन्नं आदियमानोति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा वेस्सस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति. तत्रिदं, भो गोतम, ब्राह्मणा सुद्दस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति असितब्याभङ्गिं; असितब्याभङ्गिञ्च पन सुद्दो सन्धनं अतिमञ्ञमानो अकिच्चकारी होति गोपोव अदिन्नं आदियमानोति. इदं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा सुद्दस्स सन्धनं पञ्ञपेन्ति. ब्राह्मणा, भो गोतम, इमानि चत्तारि धनानि पञ्ञपेन्ति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति?

४४१. ‘‘किं पन, ब्राह्मण, सब्बो लोको ब्राह्मणानं एतदब्भनुजानाति – ‘इमानि चत्तारि धनानि पञ्ञपेन्तू’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’. ‘‘सेय्यथापि, ब्राह्मण, पुरिसो दलिद्दो अस्सको अनाळ्हियो. तस्स अकामस्स बिलं ओलग्गेय्युं – ‘इदं ते, अम्भो पुरिस, मंसं खादितब्बं, मूलञ्च अनुप्पदातब्ब’न्ति. एवमेव खो, ब्राह्मण, ब्राह्मणा अप्पटिञ्ञाय तेसं समणब्राह्मणानं, अथ च पनिमानि चत्तारि धनानि पञ्ञपेन्ति. अरियं खो अहं, ब्राह्मण, लोकुत्तरं धम्मं पुरिसस्स सन्धनं पञ्ञपेमि. पोराणं खो पनस्स मातापेत्तिकं कुलवंसं अनुस्सरतो यत्थ यत्थेव अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति तेन तेनेव सङ्ख्यं गच्छति. खत्तियकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘खत्तियो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; ब्राह्मणकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘ब्राह्मणो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; वेस्सकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘वेस्सो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; सुद्दकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘सुद्दो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति. सेय्यथापि, ब्राह्मण, यंयदेव पच्चयं पटिच्च अग्गि जलति तेन तेनेव सङ्ख्यं गच्छति. कट्ठञ्चे पटिच्च अग्गि जलति ‘कट्ठग्गि’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; सकलिकञ्चे पटिच्च अग्गि जलति ‘सकलिकग्गि’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; तिणञ्चे पटिच्च अग्गि जलति ‘तिणग्गि’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; गोमयञ्चे पटिच्च अग्गि जलति ‘गोमयग्गि’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति. एवमेव खो अहं, ब्राह्मण, अरियं लोकुत्तरं धम्मं पुरिसस्स सन्धनं पञ्ञपेमि. पोराणं खो पनस्स मातापेत्तिकं कुलवंसं अनुस्सरतो यत्थ यत्थेव अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति तेन तेनेव सङ्ख्यं गच्छति.

‘‘खत्तियकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘खत्तियो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; ब्राह्मणकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘ब्राह्मणो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; वेस्सकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘वेस्सो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति; सुद्दकुले चे अत्तभावस्स अभिनिब्बत्ति होति ‘सुद्दो’त्वेव सङ्ख्यं गच्छति.

‘‘खत्तियकुला चेपि, ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति, अदिन्नादाना पटिविरतो होति, अब्रह्मचरिया पटिविरतो होति, मुसावादा पटिविरतो होति, पिसुणाय वाचाय पटिविरतो होति, फरुसाय वाचाय पटिविरतो होति, सम्फप्पलापा पटिविरतो होति, अनभिज्झालु होति, अब्यापन्नचित्तो होति, सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

‘‘ब्राह्मणकुला चेपि, ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

‘‘वेस्सकुला चेपि, ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

‘‘सुद्दकुला चेपि, ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

४४२. ‘‘तं किं मञ्ञसि, ब्राह्मण, ब्राह्मणोव नु खो पहोति अस्मिं पदेसे अवेरं अब्याबज्झं मेत्तचित्तं भावेतुं, नो खत्तियो नो वेस्सो नो सुद्दो’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम. खत्तियोपि हि, भो गोतम, पहोति अस्मिं पदेसे अवेरं अब्याबज्झं मेत्तचित्तं भावेतुं; ब्राह्मणोपि हि, भो गोतम… वेस्सोपि हि, भो गोतम… सुद्दोपि हि, भो गोतम… सब्बेपि हि, भो गोतम, चत्तारो वण्णा पहोन्ति अस्मिं पदेसे अवेरं अब्याबज्झं मेत्तचित्तं भावेतु’’न्ति. ‘‘एवमेव खो, ब्राह्मण, खत्तियकुला चेपि अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

‘‘ब्राह्मणकुला चेपि, ब्राह्मण… वेस्सकुला चेपि, ब्राह्मण… सुद्दकुला चेपि, ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

४४३. ‘‘तं किं मञ्ञसि, ब्राह्मण, ब्राह्मणोव नु खो पहोति सोत्तिसिनानिं आदाय नदिं गन्त्वा रजोजल्लं पवाहेतुं, नो खत्तियो नो वेस्सो नो सुद्दो’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम . खत्तियोपि हि, भो गोतम, पहोति सोत्तिसिनानिं आदाय नदिं गन्त्वा रजोजल्लं पवाहेतुं; ब्राह्मणोपि हि, भो गोतम… वेस्सोपि हि, भो गोतम … सुद्दोपि हि, भो गोतम… सब्बेपि हि, भो गोतम, चत्तारो वण्णा पहोन्ति सोत्तिसिनानिं आदाय नदिं गन्त्वा रजोजल्लं पवाहेतु’’न्ति. ‘‘एवमेव खो, ब्राह्मण, खत्तियकुला चेपि अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

‘‘ब्राह्मणकुला चेपि, ब्राह्मण… वेस्सकुला चेपि, ब्राह्मण… सुद्दकुला चेपि , ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं.

४४४. ‘‘तं किं मञ्ञसि, ब्राह्मण, इध राजा खत्तियो मुद्धावसित्तो नानाजच्चानं पुरिसानं पुरिससतं सन्निपातेय्य – ‘आयन्तु भोन्तो ये तत्थ खत्तियकुला ब्राह्मणकुला राजञ्ञकुला उप्पन्ना साकस्स वा सालस्स वा सलळस्स वा चन्दनस्स वा पदुमकस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गिं अभिनिब्बत्तेन्तु, तेजो पातुकरोन्तु; आयन्तु पन भोन्तो ये तत्थ चण्डालकुला नेसादकुला वेनकुला रथकारकुला पुक्कुसकुला उप्पन्ना सापानदोणिया वा सूकरदोणिया वा रजकदोणिया वा एरण्डकट्ठस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गिं अभिनिब्बत्तेन्तु, तेजो पातुकरोन्तू’’’ति?

‘‘तं किं मञ्ञसि, ब्राह्मण, यो एवं नु खो सो खत्तियकुला ब्राह्मणकुला राजञ्ञकुला उप्पन्नेहि साकस्स वा सालस्स वा सलळस्स वा चन्दनस्स वा पदुमकस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो तेजो पातुकतो सो एव नु ख्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च तेन च सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातुं; यो पन सो चण्डालकुला नेसादकुला वेनकुला रथकारकुला पुक्कुसकुला उप्पन्नेहि सापानदोणिया वा सूकरदोणिया वा रजकदोणिया वा एरण्डकट्ठस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो तेजो पातुकतो स्वास्स अग्गि न चेव अच्चिमा न च वण्णवा न च पभस्सरो न च तेन सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातु’’न्ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम. योपि हि सो, भो गोतम, खत्तियकुला ब्राह्मणकुला राजञ्ञकुला उप्पन्नेहि साकस्स वा सालस्स वा सलळस्स वा चन्दनस्स वा पदुमकस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो तेजो पातुकतो स्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च तेन च सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातुं; योपि सो चण्डालकुला नेसादकुला वेनकुला रथकारकुला पुक्कुसकुला उप्पन्नेहि सापानदोणिया वा सूकरदोणिया वा रजकदोणिया वा एरण्डकट्ठस्स वा उत्तरारणिं आदाय अग्गि अभिनिब्बत्तो तेजो पातुकतो स्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च तेन च सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातुं. सब्बोपि हि, भो गोतम, अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो च सब्बेनपि सक्का अग्गिना अग्गिकरणीयं कातु’’न्ति.

‘‘एवमेव खो, ब्राह्मण, खत्तियकुला चेपि अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति…पे… सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं. ब्राह्मणकुला चेपि, ब्राह्मण… वेस्सकुला चेपि, ब्राह्मण… सुद्दकुला चेपि, ब्राह्मण, अगारस्मा अनगारियं पब्बजितो होति, सो च तथागतप्पवेदितं धम्मविनयं आगम्म पाणातिपाता पटिविरतो होति, अदिन्नादाना पटिविरतो होति, अब्रह्मचरिया पटिविरतो होति, मुसावादा पटिविरतो होति, पिसुणाय वाचाय पटिविरतो होति, फरुसाय वाचाय पटिविरतो होति, सम्फप्पलापा पटिविरतो होति, अनभिज्झालु होति, अब्यापन्नचित्तो होति, सम्मादिट्ठि होति, आराधको होति ञायं धम्मं कुसल’’न्ति.

एवं वुत्ते, एसुकारी ब्राह्मणो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम…पे… उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति.

एसुकारीसुत्तं निट्ठितं छट्ठं.

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