✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

धनञ्जानि की कथा

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १५ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन में गिलहरियों के भोजन स्थान पर विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान सारिपुत्त विशाल भिक्षुसंघ के साथ दक्षिण की पहाड़ियों में 1 भ्रमण कर रहे थे।

धनञ्जानि की खबर

उस समय कोई भिक्षु राजगृह में वर्षावास कर दक्षिणागिरी में आयुष्मान सारिपुत्त के पास गया, और जाकर आयुष्मान सारिपुत्त से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे उस भिक्षु से आयुष्मान सारिपुत्त ने कहा, “मित्र, भगवान निरोगी तो हैं न? बलपूर्वक तो हैं न?”

“हाँ, मित्र, भगवान निरोगी और बलपूर्वक हैं।”

“और, मित्र, भिक्षुसंघ भी निरोगी और बलपूर्वक हैं न?”

“हाँ, मित्र, भिक्षुसंघ भी निरोगी और बलपूर्वक हैं।”

“मित्र, (राजगृह के) चावल नाके के द्वार पर धनञ्जानि नामक ब्राह्मण रहता है। क्या वह धनञ्जानि ब्राह्मण निरोगी और बलपूर्वक है?”

“हाँ, मित्र, धनञ्जानि ब्राह्मण भी निरोगी और बलपूर्वक है।”

“किन्तु, मित्र, क्या धनञ्जानि ब्राह्मण अप्रमादी (=मदहोश नहीं) तो है?”

“धनञ्जानि ब्राह्मण भला कहाँ से अप्रमादी होगा, मित्र? धनञ्जानि ब्राह्मण तो राजा के सहारे ब्राह्मणों और (वैश्य) गृहस्थों को लूटता है, तो ब्राह्मणों और गृहस्थों के सहारे, राजा को लूटता है। उसकी श्रद्धावान पत्नी, जो श्रद्धावान कुल-परिवार से आई थी, वह गुजर गयी। तो (पुनर्विवाह कर) वह ऐसी पत्नी ले आया, जो न श्रद्धावान है, न श्रद्धावान कुल-परिवार से है।”

“अरे, बुरी खबर सुना! बुरी खबर सुना! जो धनञ्जानि ब्राह्मण को प्रमादी (=मदहोश) सुना। काश, कभी ऐसा हो कि मैं धनञ्जानि ब्राह्मण से मिल पाऊँ, और काश हमारा वार्तालाप हो!”

धनञ्जानि से मुलाक़ात

तब, आयुष्मान सारिपुत्त दक्षिणागिरी में जितना रुकना चाहते थे, उतना रुके और फिर राजगृह की ओर चल पड़ें, और अनुक्रम से भ्रमण करते हुए राजगृह पहुँचे। वहाँ जाकर आयुष्मान सारिपुत्त ने राजगृह के वेणुवन में गिलहरियों के भोजन स्थान पर विहार किया।

सुबह होने पर आयुष्मान सारिपुत्त ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर भिक्षाटन के लिए राजगृह में प्रवेश किया। उस समय धनञ्जानि ब्राह्मण नगर के बाहर गोशाला में गाये दुहा रहा था। तब आयुष्मान सारिपुत्त राजगृह में भिक्षाटन कर भोजन करने के पश्चात धनञ्जानि ब्राह्मण के पास गए। धनञ्जानि ब्राह्मण ने आयुष्मान सारिपुत्त को दूर से आते हुए देखा, और देखकर वह आयुष्मान सारिपुत्त के पास गया, और जाकर कहा, “श्रीमान सारिपुत्त, भोजनकाल खत्म होने से पहले ये दूध पी लो।”

“बस, ब्राह्मण। आज मैं भोजन कर चुका। मैं उस अमुक वृक्ष के नीचे दिन का विहार करूँगा। वहाँ आना।”

“ठीक है, श्रीमान!” धनञ्जानि ब्राह्मण ने आयुष्मान सारिपुत्त को उत्तर दिया।

जब धनञ्जानि ब्राह्मण ने सुबह का नाश्ता करने के पश्चात आयुष्मान सारिपुत्त के पास गया, और जाकर आयुष्मान सारिपुत्त से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठा। एक ओर बैठे धनञ्जानि ब्राह्मण से आयुष्मान सारिपुत्त ने कहा—

“धनञ्जानि, आजकल अप्रमादी तो रहते हो?” 2

“हमें कहाँ से अप्रमादी रहेंगे, श्रीमान सारिपुत्त? जब माता-पिता को पालना हैं, पत्नी और संतानों को पालना हैं, दास-नौकरों को पालना हैं, मित्र-सहचारियों के प्रति जिम्मेदारी हैं, रिश्तेदार-संबन्धियों के प्रति जिम्मेदारी हैं, अतिथियों के प्रति जिम्मेदारी हैं, मृत-पूर्वजों के प्रति जिम्मेदारी हैं, देवताओं के प्रति जिम्मेदारी हैं, राजा के प्रति जिम्मेदारी हैं, और इस काया को भी राहत और पोषण देना हैं।”

धनञ्जानि को चेताना

“क्या लगता है, धनञ्जानि? जब कोई पुरुष अपने माता-पिता के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करे, और उस अधम्मचर्या विषमचर्या के कारण (मरणोपरांत) नर्कपाल आकर उसे नर्क घसीटकर ले जाएँ।

तब, क्या उसके ऐसा कहने पर लाभ होगा—‘अरे, मैंने अपने माता-पिता के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या की! मुझे नर्क मत ले जाओ, नर्कपालों!’ अथवा, क्या उसके माता-पिता के ऐसा कहने पर लाभ होगा—‘अरे, उसने हमारे लिए अधम्मचर्या विषमचर्या की! उसे नर्क मत ले जाओ, नर्कपालों!’”

“नहीं, श्रीमान सारिपुत्त! भले ही वे चीखते रहें, तब भी नर्कपाल उसे नर्क ले जाकर पटक देंगे।”

“और, क्या लगता है, धनञ्जानि? जब कोई पुरुष—

  • अपने पत्नी और संतान के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करे…
  • दास-नौकरों के लिए…
  • मित्र-सहचारियों के लिए…
  • रिश्तेदार-संबन्धियों के लिए…
  • अतिथियों के लिए…
  • मृतपूर्वजों के लिए…
  • देवताओं के लिए…
  • राजा के लिए…
  • इस काया को राहत और पोषण देने के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करे, और उस अधम्मचर्या विषमचर्या के कारण (मरणोपरांत) नर्कपाल आकर उसे नर्क घसीटकर ले जाएँ।

तब, क्या उसके ऐसा कहने पर लाभ होगा—‘अरे, मैंने अपने पत्नी और संतान के लिए… राजा के लिए… अथवा इस काया को राहत और पोषण देने के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या की! मुझे नर्क मत ले जाओ, नर्कपालों!’ अथवा, क्या उसके पत्नी और संतान… राजा के ऐसा कहने पर लाभ होगा—‘अरे, उसने हमारे लिए अधम्मचर्या विषमचर्या की! उसे नर्क मत ले जाओ, नर्कपालों!’”

“नहीं, श्रीमान सारिपुत्त! भले ही वे चीखते रहें, तब भी नर्कपाल उसे नर्क ले जाकर पटक देंगे।”

“तब, क्या लगता है, धनञ्जानि? इनमें क्या बेहतर है—अपने माता-पिता के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करना, अथवा अपने माता-पिता के लिए धम्मचर्या समचर्या करना?”

“अपने माता-पिता के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करना बेहतर नहीं है, श्रीमान सारिपुत्त। बल्कि, अपने माता-पिता के लिए धम्मचर्या समचर्या करना बेहतर है! अधम्मचर्या विषमचर्या से धम्मचर्या समचर्या बेहतर है।”

“धनञ्जानि, (कमाने के) दूसरे भी अर्थपूर्ण और धम्मपूर्ण कार्य हैं, जिनसे माता-पिता को पालना हो सकता है—बिना पाप किए, पुण्यमार्ग पर चलते हुए।

और, क्या लगता है, धनञ्जानि? इनमें क्या बेहतर है—

  • अपने पत्नी और संतान के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करना, अथवा अपने पत्नी और संतान के लिए धम्मचर्या समचर्या करना?"
  • दास-नौकरों के लिए…
  • मित्र-सहचारियों के लिए…
  • रिश्तेदार-संबन्धियों के लिए…
  • अतिथियों के लिए…
  • मृतपूर्वजों के लिए…
  • देवताओं के लिए…
  • राजा के लिए…
  • इस काया को राहत और पोषण देने के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करना, अथवा अपने पत्नी और संतान के लिए धम्मचर्या समचर्या करना?”

“अपने पत्नी और संतान के लिए… (इत्यादि)… इस काया को राहत और पोषण देने के लिए अधम्मचर्या विषमचर्या करना बेहतर नहीं है, श्रीमान सारिपुत्त। बल्कि, उनके लिए धम्मचर्या समचर्या करना बेहतर है! अधम्मचर्या विषमचर्या से धम्मचर्या समचर्या बेहतर है।”

“धनञ्जानि, दूसरे भी अर्थपूर्ण और धम्मपूर्ण कार्य हैं, जिनसे पत्नी और संतान… (इत्यादि)… इस काया को राहत और पोषण देना हो सकता है—बिना पाप किए, पुण्यमार्ग पर चलते हुए।”

तब, हर्षित होकर धनञ्जानि ब्राह्मण ने आयुष्मान सारिपुत्त की बात का अभिनंदन किया, और अनुमोदन कर आसन से उठकर चला गया।

धनञ्जानि का अन्त

धनञ्जानि ब्राह्मण कुछ समय पश्चात बीमार पड़ा, गंभीर रोग से पीड़ित हुआ। उसने किसी पुरुष को आमंत्रित किया, “यहाँ आओ, भले पुरुष। भगवान के पास जाओ, और जाकर मेरी ओर से भगवान के चरणों में सिर से वंदन कर कहना, ‘भन्ते, धनञ्जानि ब्राह्मण बीमार, गंभीर रोग से पीड़ित है। वह भगवान के चरणों में सिर से वंदन करता है।’ और फिर आयुष्मान सारिपुत्त के पास जाओ, और जाकर मेरी ओर से आयुष्मान सारिपुत्त के चरणों में सिर से वंदन कर कहना, ‘भन्ते, धनञ्जानि ब्राह्मण बीमार, गंभीर रोग से पीड़ित है। वह आयुष्मान सारिपुत्त के चरणों में सिर से वंदन करता है।’ और फिर कहना, ‘भन्ते, अच्छा होगा जो आयुष्मान सारिपुत्त धनञ्जानि ब्राह्मण पर अनुकम्पा कर उसके निवास आएँ।’"

“ठीक है, स्वामी।” उस पुरुष ने धनञ्जानि ब्राह्मण को उत्तर देकर भगवान के पास गया, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठकर उस पुरुष ने भगवान से कहा, “भन्ते, धनञ्जानि ब्राह्मण बीमार, गंभीर रोग से पीड़ित है। वह भगवान के चरणों में सिर से वंदन करता है।”

फिर वह पुरुष आयुष्मान सारिपुत्त के पास गया, और जाकर आयुष्मान सारिपुत्त को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठकर उस पुरुष ने आयुष्मान सारिपुत्त से कहा, “भन्ते, धनञ्जानि ब्राह्मण बीमार, गंभीर रोग से पीड़ित है। वह आयुष्मान सारिपुत्त के चरणों में सिर से वंदन करता है।” और फिर उसने कहा, “भन्ते, अच्छा होगा जो आयुष्मान सारिपुत्त धनञ्जानि ब्राह्मण पर अनुकम्पा कर उसके निवास आएँ।”

आयुष्मान सारिपुत्त ने मौन रहकर स्वीकृति दी।

तब आयुष्मान सारिपुत्त चीवर ओढ़, पात्र और संघाटी लेकर धनञ्जानि ब्राह्मण के निवास गए, जाकर बिछे आसन पर बैठ गए। बैठकर आयुष्मान सारिपुत्त ने धनञ्जानि ब्राह्मण से कहा, “कैसे हो, धनञ्जानि, ठीक हो? राहत से हो? आशा है, पीड़ा शान्त होगी, वेदना नहीं होगी। आशा है, पीड़ा का शान्त होना पता चल रहा होगा, बढ़ना नहीं।”

“मैं ठीक नहीं हूँ, श्रीमान सारिपुत्त, राहत से नहीं हूँ। मेरी पीड़ा बढ़ रही है, शान्त नहीं हो रही। पीड़ा का बढ़ते जाना पता चल रहा हैं, शान्त होना नहीं।

लगता है, मानो कोई बलवान पुरुष तीक्ष्ण कील मेरे माथे पर ठोक रहा हो। उस तरह, श्रीमान सारिपुत्त, रुद्र वात मेरे माथे को पीट रही है। मैं ठीक नहीं हूँ, श्रीमान सारिपुत्त, राहत से नहीं हूँ। मेरी पीड़ा बढ़ रही है, शान्त नहीं हो रही। पीड़ा का बढ़ते जाना पता चल रहा हैं, शान्त होना नहीं।

लगता है, मानो कोई बलवान पुरुष चमड़े के कड़े पट्टे से मेरे सिर को कस रहा हो। उस तरह, श्रीमान सारिपुत्त, मेरे सीट में अत्याधिक दर्द हो रहा है। मैं ठीक नहीं हूँ…

लगता है, मानो कोई गाय को काटने वाला कसाई या उसका सहायक, गाय को काटने की तीक्ष्ण छुरी से, गाय के पेट को चीरते हुए खोल रहा हो। उस तरह, श्रीमान सारिपुत्त, रुद्र वात मेरे पेट को चीर रही है। मैं ठीक नहीं हूँ…

लगता है, मानो दो बलवान पुरुष किसी दुर्बल पुरुष को, बाहों से पकड़ कर घसीटते हुए, जलते हुए अंगारों के गड्ढे में डालकर जलाने-भूनने लगे। उस तरह, श्रीमान सारिपुत्त, मेरे शरीर में जलन हो रही है। मैं ठीक नहीं हूँ, श्रीमान सारिपुत्त, राहत से नहीं हूँ। मेरी पीड़ा बढ़ रही है, शान्त नहीं हो रही। पीड़ा का बढ़ते जाना पता चल रहा हैं, शान्त होना नहीं।”

अनुक्रम से चित्त उठाना

“क्या लगता है, धनञ्जानि? क्या बेहतर है—नर्क अथवा पशुयोनी?”

“नर्क से तो पशुयोनी बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—पशुयोनी अथवा प्रेतलोक?”

“पशुयोनि से तो प्रेतलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—प्रेतलोक अथवा मनुष्यलोक?”

“प्रेतलोक से तो मनुष्यलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—मनुष्यलोक अथवा चार महाराजा देवताओं का स्वर्गलोक?”

“मनुष्यलोक से तो चार-महाराज देवताओं का स्वर्गलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—चार महाराजा देवताओं का स्वर्गलोक अथवा तैतीस देवताओं का स्वर्गलोक?”

“चार महाराजा देवताओं के स्वर्गलोक से तो तैतीस देवताओं का स्वर्गलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—तैतीस देवताओं का स्वर्गलोक अथवा याम देवताओं का स्वर्गलोक?”

“तैतीस देवताओं के स्वर्गलोक से तो याम देवताओं का स्वर्गलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—याम देवताओं का स्वर्गलोक अथवा तुषित देवताओं का स्वर्गलोक?”

“याम देवताओं के स्वर्गलोक से तो तुषित देवताओं का स्वर्गलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—तुषित देवताओं का स्वर्गलोक अथवा निर्माणरति देवताओं का स्वर्गलोक?”

“तुषित देवताओं के स्वर्गलोक से तो निर्माणरति देवताओं का स्वर्गलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—निर्माणरति देवताओं का स्वर्गलोक अथवा परनिर्मित वशवर्ती देवताओं का स्वर्गलोक?”

“निर्माणरति देवताओं के स्वर्गलोक से तो परनिर्मित वशवर्ती देवताओं का स्वर्गलोक बेहतर है, श्रीमान सारिपुत्त!”

“और क्या बेहतर लगता है—परनिर्मित वशवर्ती देवताओं का स्वर्गलोक अथवा ब्रह्मलोक?”

“‘ब्रह्मलोक’ कहा श्रीमान सारिपुत्त ने! ‘ब्रह्मलोक’ कहा, श्रीमान सारिपुत्त ने!”

तब आयुष्मान सारिपुत्त ने सोचा, “ये ब्राह्मण ब्रह्मलोक के प्रति समर्पित होते हैं। क्यों न मैं धनञ्जानि ब्राह्मण को ब्रह्मलोक जाने का मार्ग बताऊँ?”

“ठीक है, धनञ्जानि, मैं तुम्हें ब्रह्मलोक जाने का मार्ग बताता हूँ! ध्यान देकर गौर से सुनो, मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, श्रीमान सारिपुत्त!” धनञ्जानि ब्राह्मण ने आयुष्मान सारिपुत्त को उत्तर दिया।

ब्रह्मलोक जाने का मार्ग

आयुष्मान सारिपुत्त ने कहा—

“क्या मार्ग है, धनञ्जानि, ब्रह्मलोक जाने का? कोई भिक्षु मेत्ता (=सद्भावपूर्ण) चित्त को एक दिशा में फैलाकर व्याप्त करता है। उसी तरह दूसरी दिशा में… तीसरी दिशा में… चौथी दिशा में। उसी तरह, वह ऊपर… नीचे… तत्र सर्वत्र… सभी ओर संपूर्ण ब्रह्मांड में निर्बैर, निर्द्वेष, विस्तृत, विराट और असीम मेत्ता चित्त को फैलाकर परिपूर्णतः व्याप्त करता है। धनञ्जानि, यह ब्रह्मलोक जाने का मार्ग है।

आगे, वह करुणा चित्त… प्रसन्न (“मुदिता”) चित्त… तटस्थ (“उपेक्खा”) चित्त को एक दिशा में फैलाकर व्याप्त करता है। उसी तरह दूसरी दिशा में… तीसरी दिशा में… चौथी दिशा में। उसी तरह, वह ऊपर… नीचे… तत्र सर्वत्र… सभी ओर संपूर्ण ब्रह्मांड में निर्बैर, निर्द्वेष, विस्तृत, विराट और असीम करुण… प्रसन्न… उपेक्षा चित्त को फैलाकर परिपूर्णतः व्याप्त करता है। धनञ्जानि, यह ब्रह्मलोक जाने का मार्ग है।”

“ठीक है तब, श्रीमान सारिपुत्त, मेरे नाम से भगवान के चरणों पर सिर से वंदन कर कहना, ‘भन्ते, धनञ्जानि ब्राह्मण बीमार, गंभीर रोग से पीड़ित है। वह भगवान के चरणों में सिर से वंदन करता है।’”

तब आयुष्मान सारिपुत्त ने अगला कर्तव्य छोड़कर 3 धनञ्जानि ब्राह्मण को हीन ब्रह्मलोक 4 में प्रतिष्ठित किया और आसन से उठकर चले गए। आयुष्मान सारिपुत्त को जाकर अधिक समय नहीं हुआ, जब धनञ्जानि ब्राह्मण गुजर कर ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुआ।

तब, भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं, सारिपुत्त ने अगला कर्तव्य छोड़कर धनञ्जानि ब्राह्मण को हीन ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित किया और आसन से उठकर चला गया।”

तब आयुष्मान सारिपुत्त भगवान के पास गए। जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठे। एक ओर बैठकर आयुष्मान सारिपुत्त ने भगवान से कहा, “भन्ते, धनञ्जानि ब्राह्मण बीमार, गंभीर रोग से पीड़ित है। वह भगवान के चरणों में सिर से वंदन करता है।”

“किन्तु, सारिपुत्त, तुमने अगला कर्तव्य छोड़कर धनञ्जानि ब्राह्मण को हीन ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित कर आसन से उठकर क्यों चले आए?”

“भन्ते, मुझे लगा, ‘ये ब्राह्मण ब्रह्मलोक के प्रति समर्पित होते हैं। क्यों न मैं धनञ्जानि ब्राह्मण को ब्रह्मलोक जाने का मार्ग बताऊँ?’”

“सारिपुत्त, धनञ्जानि ब्राह्मण मर चुका है, और ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुआ है।”

सुत्र समाप्त।


  1. दक्खिणागिरि, यानी दक्षिण के पर्वत को आज “विंध्य पर्वत श्रृंखला” कहते हैं, जो मुख्यतः मध्यप्रदेश और आस-पास के इलाकों में फैली हैं। यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक भौगोलोक विभाजन की तरह मौजूद है, जो गंगा के मैदानी इलाकों को पुरातन दक्खन पठार से विभाजित करती हैं। उस समय यह मगध देश की दक्षिणी सीमा पर स्थित थीं और वहाँ से दक्षिण-पश्चिम दिशा में अवंति देश की ओर रास्ता जाता था। भगवान बुद्ध और उनके भिक्षु वहाँ बहुत कम जाते थे, इतना कम कि लोग शिकायत करने लगे थे (विनयपिटक: महावग्ग: १. महाखन्धक)। फिर भी, इस कथा से पता चलता है कि सारिपुत्त भन्ते वहाँ काफी समय तक रहे, इतना कि अपने घर के मित्रों से उनका संपर्क भी टूट गया था। ↩︎

  2. राजगृह-निवासी और ब्राह्मण-कुल के होने के कारण आयुष्मान सारिपुत्त और महामोग्गल्लान का वहाँ के ब्राह्मण परिवारों से स्वाभाविक परिचय रहा होगा। इसी क्रम में देखें तो सारिपुत्त धनञ्जानि को पहली भेंट में मात्र औपचारिक रूप से ‘ब्राह्मण’ कहते हैं, पर पूरे संवाद में उसे उसके निजी नाम से पुकारते रहते हैं—जो सामान्य परिचय से आगे बढ़कर किसी पुराने, आत्मीय या दीर्घकालिक संबंध की ओर संकेत करता है। ↩︎

  3. भगवान ने अपने चचेरे भाई महानाम शाक्य को संयुक्तनिकाय ५५.५४ (गिलानसुत्त) में क्रमिक रूप से चित्त-उत्त्थान के स्पष्ट निर्देश दिए थे, ताकि किसी मरणासन्न उपासक की पूर्ण मुक्ति या कम-से-कम उत्तम सद्गति की अधिकतम संभावना बन सके। जब किसी मरणासन्न उपासक का चित्त परनिर्मित-वशवर्ती देवताओं से उठकर ब्रह्मलोक पर स्थिर हो जाए, तो अगला कर्तव्य यह बताया गया है कि उससे कहा जाए, “मेरे प्रिय मित्र, ब्रह्मलोक भी अनित्य होता है! सदा बना नहीं रहता! तादात्म्य में ही सम्मिलित रहता है। अच्छा होगा जो अब चित्त को ब्रह्मलोक से उठाकर तादात्म्य निरोध करा दो!”

    इस आर्य-मरण-कला को और गहराई से समझने के लिए पुण्य पुस्तक का अंतिम, नौवां अध्याय—“मरण” अवश्य पढ़ें। ↩︎

  4. ब्रह्मलोक को यहाँ केवल इस अर्थ में “हीन” कहा गया है कि वह आर्यफल के सम्मुख हीन है; अन्यथा वह संपूर्ण कामलोक से परे एक अत्यन्त ऊँची अवस्था है, जिसे प्राप्त करना सहज नहीं। ब्रह्मलोक की प्राप्ति के लिए या तो प्रथम से चतुर्थ ध्यान तक की उच्च मानसिक अवस्थाएँ उपलब्ध हों, अथवा, जैसे इस सूत्र में भी मार्ग बताया है—ब्रह्मविहार की अच्छे से साधना हुई हो। ↩︎

पालि

४४५. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा राजगहे विहरति वेळुवने कलन्दकनिवापे. तेन खो पन समयेन आयस्मा सारिपुत्तो दक्खिणागिरिस्मिं चारिकं चरति महता भिक्खुसङ्घेन सद्धिं. अथ खो अञ्ञतरो भिक्खु राजगहे वस्संवुट्ठो [वस्संवुत्थो (सी. स्या. कं. पी.)] येन दक्खिणागिरि येनायस्मा सारिपुत्तो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मता सारिपुत्तेन सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो तं भिक्खुं आयस्मा सारिपुत्तो एतदवोच – ‘‘कच्चावुसो, भगवा अरोगो च बलवा चा’’ति? ‘‘अरोगो चावुसो, भगवा बलवा चा’’ति. ‘‘कच्चि पनावुसो, भिक्खुसङ्घो अरोगो च बलवा चा’’ति? ‘‘भिक्खुसङ्घोपि खो, आवुसो, अरोगो च बलवा चा’’ति. ‘‘एत्थ, आवुसो, तण्डुलपालिद्वाराय धनञ्जानि [धानञ्जानि (सी. पी.)] नाम ब्राह्मणो अत्थि. कच्चावुसो , धनञ्जानि ब्राह्मणो अरोगो च बलवा चा’’ति? ‘‘धनञ्जानिपि खो, आवुसो, ब्राह्मणो अरोगो च बलवा चा’’ति. ‘‘कच्चि पनावुसो, धनञ्जानि ब्राह्मणो अप्पमत्तो’’ति? ‘‘कुतो पनावुसो, धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स अप्पमादो? धनञ्जानि, आवुसो, ब्राह्मणो राजानं निस्साय ब्राह्मणगहपतिके विलुम्पति, ब्राह्मणगहपतिके निस्साय राजानं विलुम्पति . यापिस्स भरिया सद्धा सद्धकुला आनीता सापि कालङ्कता; अञ्ञास्स भरिया अस्सद्धा अस्सद्धकुला आनीता’’. ‘‘दुस्सुतं वतावुसो, अस्सुम्ह, दुस्सुतं वतावुसो, अस्सुम्ह; ये मयं धनञ्जानिं ब्राह्मणं पमत्तं अस्सुम्ह. अप्पेव च नाम मयं कदाचि करहचि धनञ्जानिना ब्राह्मणेन सद्धिं समागच्छेय्याम, अप्पेव नाम सिया कोचिदेव कथासल्लापो’’ति?

४४६. अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो दक्खिणागिरिस्मिं यथाभिरन्तं विहरित्वा येन राजगहं तेन चारिकं पक्कामि. अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन राजगहं तदवसरि. तत्र सुदं आयस्मा सारिपुत्तो राजगहे विहरति वेळुवने कलन्दकनिवापे. अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय राजगहं पिण्डाय पाविसि . तेन खो पन समयेन धनञ्जानि ब्राह्मणो बहिनगरे गावो गोट्ठे दुहापेति. अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो राजगहे पिण्डाय चरित्वा पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्कन्तो येन धनञ्जानि ब्राह्मणो तेनुपसङ्कमि. अद्दसा खो धनञ्जानि ब्राह्मणो आयस्मन्तं सारिपुत्तं दूरतोव आगच्छन्तं. दिस्वान येनायस्मा सारिपुत्तो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं सारिपुत्तं एतदवोच – ‘‘इतो, भो सारिपुत्त, पयो, पीयतं ताव भत्तस्स कालो भविस्सती’’ति. ‘‘अलं, ब्राह्मण. कतं मे अज्ज भत्तकिच्चं. अमुकस्मिं मे रुक्खमूले दिवाविहारो भविस्सति. तत्थ आगच्छेय्यासी’’ति. ‘‘एवं, भो’’ति खो धनञ्जानि ब्राह्मणो आयस्मतो सारिपुत्तस्स पच्चस्सोसि. अथ खो धनञ्जानि ब्राह्मणो पच्छाभत्तं भुत्तपातरासो येनायस्मा सारिपुत्तो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मता सारिपुत्तेन सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नं खो धनञ्जानिं ब्राह्मणं आयस्मा सारिपुत्तो एतदवोच – ‘‘कच्चासि, धनञ्जानि, अप्पमत्तो’’ति? ‘‘कुतो, भो सारिपुत्त, अम्हाकं अप्पमादो येसं नो मातापितरो पोसेतब्बा, पुत्तदारो पोसेतब्बो, दासकम्मकरा पोसेतब्बा, मित्तामच्चानं मित्तामच्चकरणीयं कातब्बं, ञातिसालोहितानं ञातिसालोहितकरणीयं कातब्बं, अतिथीनं अतिथिकरणीयं कातब्बं, पुब्बपेतानं पुब्बपेतकरणीयं कातब्बं, देवतानं देवताकरणीयं कातब्बं, रञ्ञो राजकरणीयं कातब्बं, अयम्पि कायो पीणेतब्बो ब्रूहेतब्बो’’ति?

४४७. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो मातापितूनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो मातापितूनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति , मातापितरो वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो पुत्तदारस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो पुत्तदारस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, पुत्तदारो वा पनस्स लभेय्य ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो दासकम्मकरपोरिसस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो दासकम्मकरपोरिसस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, दासकम्मकरपोरिसा वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो मित्तामच्चानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो मित्तामच्चानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, मित्तामच्चा वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो ञातिसालोहितानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो ञातिसालोहितानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, ञातिसालोहिता वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो अतिथीनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो अतिथीनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, अतिथी वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो पुब्बपेतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो पुब्बपेतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, पुब्बपेता वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो देवतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो देवतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, देवता वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो रञ्ञो हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो रञ्ञो हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, राजा वा पनस्स लभेय्य ‘एसो खो अम्हाकं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, इधेकच्चो कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, तमेनं अधम्मचरियाविसमचरियाहेतु निरयं निरयपाला उपकड्ढेय्युं. लभेय्य नु खो सो ‘अहं खो कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसिं, मा मं निरयं निरयपाला’ति, परे वा पनस्स लभेय्युं ‘एसो खो कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु अधम्मचारी विसमचारी अहोसि, मा नं निरयं निरयपाला’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो सारिपुत्त. अथ खो नं विक्कन्दन्तंयेव निरये निरयपाला पक्खिपेय्युं’’.

४४८. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा मातापितूनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा मातापितूनं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, मातापितूनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, मातापितूनं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का मातापितरो चेव पोसेतुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा पुत्तदारस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा पुत्तदारस्स हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, पुत्तदारस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, पुत्तदारस्स हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता येहि सक्का पुत्तदारञ्चेव पोसेतुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा दासकम्मकरपोरिसस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा दासकम्मकरपोरिसस्स हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, दासकम्मकरपोरिसस्स हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, दासकम्मकरपोरिसस्स हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का दासकम्मकरपोरिसे चेव पोसेतुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा मित्तामच्चानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा मित्तामच्चानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि , भो सारिपुत्त, मित्तामच्चानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, मित्तामच्चानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का मित्तामच्चानञ्चेव मित्तामच्चकरणीयं कातुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा ञातिसालोहितानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा ञातिसालोहितानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, ञातिसालोहितानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, ञातिसालोहितानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का ञातिसालोहितानञ्चेव ञातिसालोहितकरणीयं कातुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा अतिथीनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा अतिथीनं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, अतिथीनं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, अतिथीनं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का अतिथीनञ्चेव अतिथिकरणीयं कातुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा पुब्बपेतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा पुब्बपेतानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, पुब्बपेतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, पुब्बपेतानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि , भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का पुब्बपेतानञ्चेव पुब्बपेतकरणीयं कातुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा देवतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा देवतानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, देवतानं हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, देवतानं हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो . अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का देवतानञ्चेव देवताकरणीयं कातुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा रञ्ञो हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा रञ्ञो हेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, रञ्ञो हेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, रञ्ञो हेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता, येहि सक्का रञ्ञो चेव राजकरणीयं कातुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितुं.

‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, यो वा कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, यो वा कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु धम्मचारी समचारी अस्स; कतमं सेय्यो’’ति? ‘‘यो हि, भो सारिपुत्त, कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु अधम्मचारी विसमचारी अस्स, न तं सेय्यो; यो च खो, भो सारिपुत्त, कायस्स पीणनाहेतु ब्रूहनाहेतु धम्मचारी समचारी अस्स, तदेवेत्थ सेय्यो. अधम्मचरियाविसमचरियाहि, भो सारिपुत्त, धम्मचरियासमचरिया सेय्यो’’ति. ‘‘अत्थि खो, धनञ्जानि, अञ्ञेसं हेतुका धम्मिका कम्मन्ता , येहि सक्का कायञ्चेव पीणेतुं ब्रूहेतुं, न च पापकम्मं कातुं, पुञ्ञञ्च पटिपदं पटिपज्जितु’’न्ति.

४४९. अथ खो धनञ्जानि ब्राह्मणो आयस्मतो सारिपुत्तस्स भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना पक्कामि. अथ खो धनञ्जानि ब्राह्मणो अपरेन समयेन आबाधिको अहोसि दुक्खितो बाळ्हगिलानो. अथ खो धनञ्जानि ब्राह्मणो अञ्ञतरं पुरिसं आमन्तेसि – ‘‘एहि त्वं, अम्भो पुरिस , येन भगवा तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा मम वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि – ‘धनञ्जानि, भन्ते, ब्राह्मणो आबाधिको दुक्खितो बाळ्हगिलानो. सो भगवतो पादे सिरसा वन्दती’ति. येन चायस्मा सारिपुत्तो तेनुपसङ्कम; उपसङ्कमित्वा मम वचनेन आयस्मतो सारिपुत्तस्स पादे सिरसा वन्दाहि – ‘धनञ्जानि, भन्ते, ब्राह्मणो आबाधिको दुक्खितो बाळ्हगिलानो. सो आयस्मतो सारिपुत्तस्स पादे सिरसा वन्दती’ति. एवञ्च वदेहि – ‘साधु किर, भन्ते, आयस्मा सारिपुत्तो येन धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स निवेसनं तेनुपसङ्कमतु अनुकम्पं उपादाया’’’ति. ‘‘एवं , भन्ते’’ति खो सो पुरिसो धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स पटिस्सुत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो सो पुरिसो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘धनञ्जानि, भन्ते, ब्राह्मणो आबाधिको दुक्खितो बाळ्हगिलानो. सो भगवतो पादे सिरसा वन्दती’’ति. येन चायस्मा सारिपुत्तो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं सारिपुत्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो सो पुरिसो आयस्मन्तं सारिपुत्तं एतदवोच – ‘‘धनञ्जानि, भन्ते, ब्राह्मणो आबाधिको दुक्खितो बाळ्हगिलानो. सो आयस्मतो सारिपुत्तस्स पादे सिरसा वन्दति, एवञ्च वदेति – ‘साधु किर, भन्ते, आयस्मा सारिपुत्तो येन धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स निवेसनं तेनुपसङ्कमतु अनुकम्पं उपादाया’’’ति. अधिवासेसि खो आयस्मा सारिपुत्तो तुण्हीभावेन.

४५०. अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय येन धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स निवेसनं तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्ञत्ते आसने निसीदि. निसज्ज खो आयस्मा सारिपुत्तो धनञ्जानिं ब्राह्मणं एतदवोच – ‘‘कच्चि ते, धनञ्जानि, खमनीयं, कच्चि यापनीयं? कच्चि दुक्खा वेदना पटिक्कमन्ति, नो अभिक्कमन्ति? पटिक्कमोसानं पञ्ञायति , नो अभिक्कमो’’ति? ‘‘न मे, भो सारिपुत्त, खमनीयं न यापनीयं. बाळ्हा मे दुक्खा वेदना अभिक्कमन्ति, नो पटिक्कमन्ति. अभिक्कमोसानं पञ्ञायति, नो पटिक्कमो. सेय्यथापि, भो सारिपुत्त , बलवा पुरिसो तिण्हेन सिखरेन मुद्धनि [मुद्धानं (सी. स्या. कं. पी.)] अभिमत्थेय्य; एवमेव खो , भो सारिपुत्त, अधिमत्ता वाता मुद्धनि च ऊहनन्ति. न मे, भो सारिपुत्त, खमनीयं, न यापनीयं. बाळ्हा मे दुक्खा वेदना अभिक्कमन्ति, नो पटिक्कमन्ति. अभिक्कमोसानं पञ्ञायति, नो पटिक्कमो. सेय्यथापि, भो सारिपुत्त, बलवा पुरिसो दळ्हेन वरत्तक्खण्डेन [वरत्तबन्धनेन (सी. पी.)] सीसे सीसवेठं ददेय्य; एवमेव खो, भो सारिपुत्त, अधिमत्ता सीसे सीसवेदना. न मे, भो सारिपुत्त, खमनीयं न यापनीयं. बाळ्हा मे दुक्खा वेदना अभिक्कमन्ति, नो पटिक्कमन्ति. अभिक्कमोसानं पञ्ञायति, नो पटिक्कमो. सेय्यथापि, भो सारिपुत्त, दक्खो गोघातको वा गोघातकन्तेवासी वा तिण्हेन गोविकन्तनेन कुच्छिं परिकन्तेय्य; एवमेव खो, भो सारिपुत्त, अधिमत्ता वाता कुच्छिं परिकन्तन्ति. न मे, भो सारिपुत्त, खमनीयं, न यापनीयं. बाळ्हा मे दुक्खा वेदना अभिक्कमन्ति, नो पटिक्कमन्ति. अभिक्कमोसानं पञ्ञायति, नो पटिक्कमो. सेय्यथापि, भो सारिपुत्त, द्वे बलवन्तो पुरिसा दुब्बलतरं पुरिसं नानाबाहासु गहेत्वा अङ्गारकासुया सन्तापेय्युं सम्परितापेय्युं; एवमेव खो, भो सारिपुत्त, अधिमत्तो कायस्मिं डाहो. न मे, भो सारिपुत्त, खमनीयं न यापनीयं. बाळ्हा मे दुक्खा वेदना अभिक्कमन्ति, नो पटिक्कमन्ति. अभिक्कमोसानं पञ्ञायति , नो पटिक्कमो’’ति.

४५१. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – निरयो वा तिरच्छानयोनि वा’’ति? ‘‘निरया, भो सारिपुत्त, तिरच्छानयोनि सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – तिरच्छानयोनि वा पेत्तिविसयो वा’’ति? ‘‘तिरच्छानयोनिया, भो सारिपुत्त, पेत्तिविसयो सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – पेत्तिविसयो वा मनुस्सा वा’’ति? ‘‘पेत्तिविसया, भो सारिपुत्त, मनुस्सा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि , कतमं सेय्यो – मनुस्सा वा चातुमहाराजिका [चातुम्महाराजिका (सी. स्या. कं. पी.)] वा देवा’’ति? ‘‘मनुस्सेहि , भो सारिपुत्त, चातुमहाराजिका देवा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – चातुमहाराजिका वा देवा तावतिंसा वा देवा’’ति? ‘‘चातुमहाराजिकेहि, भो सारिपुत्त, देवेहि तावतिंसा देवा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – तावतिंसा वा देवा यामा वा देवा’’ति? ‘‘तावतिंसेहि, भो सारिपुत्त, देवेहि यामा देवा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – यामा वा देवा तुसिता वा देवा’’ति? ‘‘यामेहि, भो सारिपुत्त, देवेहि तुसिता देवा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – तुसिता वा देवा निम्मानरती वा देवा’’ति? ‘‘तुसितेहि, भो सारिपुत्त, देवेहि निम्मानरती देवा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो – निम्मानरती वा देवा परनिम्मितवसवत्ती वा देवा’’ति? ‘‘निम्मानरतीहि , भो सारिपुत्त, देवेहि परनिम्मितवसवत्ती देवा सेय्यो’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, धनञ्जानि, कतमं सेय्यो परनिम्मितवसवत्ती वा देवा ब्रह्मलोको वा’’ति? ‘‘‘ब्रह्मलोको’ति [भवं सारिपुत्तो आहाति, कतमं सारिपुत्तो आह ब्रह्मलोकोति. (क.)] – भवं सारिपुत्तो आह; ‘ब्रह्मलोको’ति – भवं सारिपुत्तो आहा’’ति [भवं सारिपुत्तो आहाति, कतमं सारिपुत्तो आह ब्रह्मलोकोति. (क.)].

अथ खो आयस्मतो सारिपुत्तस्स एतदहोसि – ‘‘इमे खो ब्राह्मणा ब्रह्मलोकाधिमुत्ता. यंनूनाहं धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गं देसेय्य’’न्ति. ‘‘ब्रह्मानं ते, धनञ्जानि, सहब्यताय मग्गं देसेस्सामि; तं सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि, भासिस्सामी’’ति. ‘‘एवं, भो’’ति खो धनञ्जानि ब्राह्मणो आयस्मतो सारिपुत्तस्स पच्चस्सोसि. आयस्मा सारिपुत्तो एतदवोच – ‘‘कतमो च, धनञ्जानि, ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गो? इध, धनञ्जानि, भिक्खु मेत्तासहगतेन चेतसा एकं दिसं फरित्वा विहरति, तथा दुतियं, तथा ततियं, तथा चतुत्थं; इति उद्धमधो तिरियं सब्बधि सब्बत्तताय सब्बावन्तं लोकं मेत्तासहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्याबज्झेन फरित्वा विहरति. अयं खो, धनञ्जानि, ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गो’’.

४५२. ‘‘पुन चपरं, धनञ्जानि, भिक्खु करुणासहगतेन चेतसा…पे… मुदितासहगतेन चेतसा… उपेक्खासहगतेन चेतसा एकं दिसं फरित्वा विहरति, तथा दुतियं, तथा ततियं, तथा चतुत्थं; इति उद्धमधो तिरियं सब्बधि सब्बत्तताय सब्बावन्तं लोकं उपेक्खासहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्याबज्झेन फरित्वा विहरति. अयं खो, धनञ्जानि, ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गो’’ति. तेन हि, भो सारिपुत्त, मम वचनेन भगवतो पादे सिरसा वन्दाहि – ‘धनञ्जानि , भन्ते, ब्राह्मणो आबाधिको दुक्खितो बाळ्हगिलानो. सो भगवतो पादे सिरसा वन्दती’ति. अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो धनञ्जानिं ब्राह्मणं सति उत्तरिकरणीये हीने ब्रह्मलोके पतिट्ठापेत्वा उट्ठायासना पक्कामि. अथ खो धनञ्जानि ब्राह्मणो अचिरपक्कन्ते आयस्मन्ते सारिपुत्ते कालमकासि, ब्रह्मलोकञ्च उपपज्जि.

४५३. अथ खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘एसो, भिक्खवे, सारिपुत्तो धनञ्जानिं ब्राह्मणं सति उत्तरिकरणीये हीने ब्रह्मलोके पतिट्ठापेत्वा उट्ठायासना पक्कन्तो’’ति. अथ खो आयस्मा सारिपुत्तो येन भगवा तेनुपसङ्कमि, उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि, एकमन्तं निसिन्नो खो आयस्मा सारिपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘धनञ्जानि, भन्ते, ब्राह्मणो आबाधिको दुक्खितो बाळ्हगिलानो, सो भगवतो पादे सिरसा वन्दती’’ति. ‘‘किं पन त्वं सारिपुत्त धनञ्जानिं ब्राह्मणं सति उत्तरिकरणीये हीने ब्रह्मलोके पतिट्ठापेत्वा उट्ठायासना पक्कन्तो’’ति? ‘‘मय्हं खो, भन्ते, एवं अहोसि – ‘इमे खो ब्राह्मणा ब्रह्मलोकाधिमुत्ता, यंनूनाहं धनञ्जानिस्स ब्राह्मणस्स ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गं देसेय्य’न्ति. ‘‘कालङ्कतोच [कालङ्कतोव (स्या. कं. क.)], सारिपुत्त, धनञ्जानि ब्राह्मणो, ब्रह्मलोकञ्च उपपन्नो’’ति.

धनञ्जानिसुत्तं निट्ठितं सत्तमं.

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