✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

अनुपूर्वीशिक्षा

  • भिक्षु का क्रमिक प्रशिक्षण

    भिक्षु का क्रमिक प्रशिक्षण

    📂 लेख

    आध्यात्मिक विकास कोई जोशीला और आवेगजन्य निर्णय नहीं, बल्कि जागरूक, क्रमबद्ध, और सूझबूझ से भरी एक यात्रा है। 'अनुपुब्बिसिक्खा', यानी क्रमिक प्रशिक्षण, वह साधना-पथ है जिसे स्वयं बुद्ध ने गढ़ा।

  • २. सामञ्ञफलसुत्तं

    २. सामञ्ञफलसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

  • ३. अम्बट्ठसुत्तं

    ३. अम्बट्ठसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इस तीखी बहस में भगवान घमंडी ब्राह्मण युवक की जाति पुछकर उसकी स्वघोषित श्रेष्ठता को सीधी चुनौती देते है, और अहंकार चूर कर देते है।

  • ४. सोणदण्डसुत्तं

    ४. सोणदण्डसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।

  • ५. कूटदन्तसुत्तं

    ५. कूटदन्तसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    महायज्ञ की अभिलाषा लिए सैकड़ों ब्राह्मणों संग आए कूटदंत को भगवान सबसे प्राचीन और सबसे फलदायी यज्ञ-पद्धति उजागर कर बताते हैं—एक ऐसा यज्ञ, जिसमें हिंसा त्यागकर जरूरतमंदों की सहायता की जाए।

  • ६. महालिसुत्तं

    ६. महालिसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।

  • ७. जालियसुत्तं

    ७. जालियसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या जीव और शरीर एक ही है, अथवा भिन्न-भिन्न हैं? परिव्राजक के द्वारा पूछे जाने पर भगवान अनुपूर्वीशिक्षा के माध्यम से उस प्रश्न की निरर्थकता सिद्ध करते हैं।

  • ८. महासीहनादसुत्तं

    ८. महासीहनादसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही दिलचस्पी है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

  • ९. पोट्ठपादसुत्तं

    ९. पोट्ठपादसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

  • १०. सुभसुत्तं

    १०. सुभसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात, आनन्द भन्ते को भगवान की शिक्षाओं को स्पष्ट करने के लिए बुलाया गया।

  • ११. केवट्टसुत्तं

    ११. केवट्टसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या भिक्षुओं के द्वारा चमत्कार दिखाना उचित है, ताकि लोगों में श्रद्धा बढ़ जाएँ? भगवान का इस पर अविस्मरणीय उत्तर।

  • १२. लोहिच्चसुत्तं

    १२. लोहिच्चसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या किसी की अध्यात्मिक सहायता नहीं करनी चाहिए? एक ब्राह्मण की दृष्टि का भगवान निवारण करते हैं।

  • १३. तेविज्जसुत्तं

    १३. तेविज्जसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    कुछ सच्चे त्रिवेदी ब्राह्मण युवक ब्रह्मा के साथ समागम करने के मार्ग पर उलझन में हैं। किन्तु वे भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान पास ही रहते हैं।