इसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।
क्या जीव और शरीर एक ही है, अथवा भिन्न-भिन्न हैं? परिव्राजक के द्वारा पूछे जाने पर भगवान अनुपूर्वीशिक्षा के माध्यम से उस प्रश्न की निरर्थकता सिद्ध करते हैं।
एक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।
आयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होने प्रतीत्य समुत्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।
यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।
राजा पायासि जिद्दी, भौतिकवादी और नास्तिक था। उसने ‘मरणोपरांत परलोक-वरलोक नहीं होता’ यह साबित करने के लिए बहुत अजीब प्रयोग किए थे। अंततः वह आकर अरहंत भिक्षु कुमार कश्यप से एक मनोरंजन-पूर्ण और यादगार बहस करता है।
महावीर जैन के निधन होने पर उनके संघ में ‘कत्लेआम’ मचा। उसे सुनकर, बुद्ध अपने संघ में स्थिरता और प्रौढ़ता का भाव व्यक्त करते है। और, भिक्षुओं को संगीति के लिए प्रेरित भी करते है।