दुनिया के अधिकतर धर्म 'विश्वास' पर टिके हैं। वे कहते हैं—'इस किताब पर भरोसा करो,' या 'ईश्वर पर भरोसा करो।' लेकिन बुद्ध का धम्म 'खोज' पर टिका है।
बुद्ध के समय का जम्बूद्वीप (भारत) केवल ऋषियों की भूमि नहीं थी, बल्कि एक 'बौद्धिक युद्धक्षेत्र' था। गणित और खगोलशास्त्र की नई खोजों ने लोगों की नींद उड़ा दी थी।
भारत के इतिहास ने हमें कई राजा दिए, कई योद्धा दिए, और कई दार्शनिक दिए। किन्तु 'तथागत' केवल एक ही दिया...
कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन और रानी महामाया के घर जिस बालक का जन्म हुआ, वह कोई साधारण संयोग नहीं था। प्रारंभिक सूत्र इस जन्म को एक सामान्य मानवीय घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक 'अच्छरियब्भुत' (आश्चर्यजनक अद्भुत घटना) के रूप में याद करते हैं।
आइए, अब उस राजमहल के भीतर चलते हैं जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ का युवावन खिल रहा है—सुखों के सागर में, लेकिन एक अजीब सी प्यास के साथ।
राजकुमार सिद्धार्थ का अब मखमल छूट गया था, और सामने थी अनजानी राह। न कोई गुरु, न कोई नक्शा, केवल एक धधकती हुई जिज्ञासा। आइए, देखते हैं उस महात्याग के बाद के पहले कदम।
इतिहास का सबसे कठिन अध्याय—जहाँ एक मनुष्य ने अपने शरीर को मिटा देने की हद तक जाकर सत्य को ललकारा।
शरीर के दमन का मार्ग व्यर्थ सिद्ध हो चुका था। अब सिद्धार्थ ने एक नई दिशा पकड़ी। यह दिशा थी—चित्त की साधना। अब उनका संघर्ष 'शरीर' से नहीं, बल्कि 'मन' की गहराइयों से था।
उरुवेला की उस रात, नेरञ्जरा नदी के तट पर इतिहास बदलने वाला था। सिद्धार्थ गौतम 'मध्यम मार्ग' को पा चुके थे, शरीर में बल लौट आया था, और मन एक धारदार हथियार की तरह तैयार था।
युगों से चला आ रहा महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जिस 'मार' ने देवताओं तक को अपने पाश में बांध रखा था, वह परास्त हो चुका था। अविद्या का घना कोहरा छंट चुका था और उरुवेला के वनों में अब केवल एक ही स्वर गूँज रहा था—परम शांति।
बुद्ध ने कभी धर्म को एक ही साँचे में नहीं ढाला। वे श्रोता की क्षमता, उसकी जिज्ञासा और उसके मन की स्थिति को ध्यान में रखकर ही, क्रमबद्ध रूप से, धर्म को प्रकट करते—इसी को 'अनुपुब्बिकथा' कहा गया है।
आध्यात्मिक विकास कोई जोशीला और आवेगजन्य निर्णय नहीं, बल्कि जागरूक, क्रमबद्ध, और सूझबूझ से भरी एक यात्रा है। 'अनुपुब्बिसिक्खा', यानी क्रमिक प्रशिक्षण, वह साधना-पथ है जिसे स्वयं बुद्ध ने गढ़ा।
दुर्लभ ही होता है कि जब भगवान भिक्षुसंघ को बैठकर कोई कथा सुनाए। यह कथा पिछले सात सम्यक-सम्बुद्धों की महाकथा हैं। किन्तु, प्रश्न उठता है कि भगवान को यह महाकथा भला कैसे पता है?
यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।
दुनिया का पतन भी अनेक चरणों में होता है, और दुनिया का उद्धार भी। पतन और उद्धार के इस प्रक्रिया के बीच बुद्ध अवतरित होते हैं। आगे, मेत्तेय बुद्ध भी आएंगे।
पहले ब्राह्मणों के वेदों में ‘बत्तीस महापुरुष लक्षण’ का लंबा विवरण दर्ज था, जो आज दिखाई नहीं देता। यह सूत्र बताता है कि बुद्ध के पूर्वजन्म में किस कर्म के परिणामस्वरूप आज कौन-सा लक्षण उपजा।