✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

श्रमण्यता

  • २. सामञ्ञफलसुत्तं

    २. सामञ्ञफलसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

  • ८. महासीहनादसुत्तं

    ८. महासीहनादसुत्तं

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही दिलचस्पी है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

  • २४. पाथिक सुत्त

    २४. पाथिक सुत्त

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    सुनक्खत भिक्षु को तमाशेबाज निर्वस्त्र तपस्वियों से आकर्षण है। किन्तु, तप का ऐसा तमाशा न भगवान करते है, न ही उनका भिक्षुसंघ। उसके भिक्षुत्व छोड़ने की बात पर, भगवान उसकी अक्ल ठिकाने लगाने की नाकाम कोशिश करते है।

  • २५. उदुम्बरिक सुत्त

    २५. उदुम्बरिक सुत्त

    📂 सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह सूत्र विभिन्न धर्मों के बीच होने वाले संवाद का एक बेहतरीन उदाहरण है। बुद्ध का आशय किसी को ‘बौद्ध’ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें दुःखों से मुक्त करना है।