भारत में जब कोई धम्म की शरण में आता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक दुविधा भोजन को लेकर खड़ी होती है। एक तरफ हमारे मन में हज़ारों सालों का 'शाकाहार ही पवित्रता है' वाला गहरा भारतीय संस्कार है, तो दूसरी तरफ बुद्ध का अहिंसा का सन्देश है।
आज १५०० साल बाद, हमारे पास 'बुद्ध के नाम पर खिचड़ी पक चुकी है। थेरवाद, महायान, वज्रयान—सब दावा करते हैं कि वे सही हैं। एक आम साधक कैसे पहचाने कि शुद्ध घी कौन सा है और डालडा कौन सा?