✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

द्विशरण उपासक ➡️ धम्म याचना ➡️ चुनाव ➡️ पञ्चवर्गीय भिक्षू ➡️ धम्मचक्र-प्रवर्तन ➡️ ६ अरहंत ➡️ यश कथा ➡️ त्रिशरण उपासक ➡️ प्रथम उपासिकाएँ ➡️ ११ अरहंत ➡️ ६१ अरहंत

संघ कथा - भाग १

(स्त्रोत: विनयपिटक - महावग्ग - ०१. महाक्खंदक)

🔄 अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ६१ मिनट
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कल्पना कीजिए उस क्षण की… अमृत की खोज समाप्त हो चुकी थी। अविद्या का अंधकार मिट चुका था। नेरञ्जरा (या आज की निरंजना) नदी का बहाव शांत हो चुका था। और बोधिवृक्ष की शीतल छाँव में एक अलौकिक शान्ति फैली थी।

यह केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, यह समस्त मानव जाति के लिए अमृत के द्वार खुलने का क्षण था। सिद्धार्थ अब सिद्धार्थ नहीं रहे थे; बुद्ध हो चुके थे। जिस अमृत सत्य को उन्होंने पाया था, वह इतना सुखदायी और राहतपूर्ण था कि वे हफ्तों तक उसी विमुक्ति के सुख में डूबे बैठे रहे।

आइए, उन शुरुआती सप्ताहों के साक्षी बनें…

उस समय भगवान बुद्ध उरुवेला में नेरञ्जरा नदी के किनारे बोधिवृक्ष (पीपल के पेड़) के नीचे, बस अभी बुद्धत्व प्राप्त किए हुए थे। वहाँ भगवान उस बोधिवृक्ष के नीचे (पहले) एक सप्ताह तक एक ही आसन में बैठकर विमुक्ति सुख की निरंतर अनुभूति करते रहे…

(पहला) सप्ताह बीतने पर, भगवान उस समाधि से उठकर, बोधिवृक्ष के नीचे से ‘अजपाल’ नामक बरगद वृक्ष के नीचे गए। वहाँ जाकर, वे अजपाल बरगद के तले (दूसरे) एक सप्ताह तक एक ही आसन में बैठकर विमुक्ति सुख की निरंतर अनुभूति करते रहे…

(दूसरा) सप्ताह बीतने पर, भगवान उस समाधि से उठकर, ‘अजपाल’ बरगद के नीचे से मुचलिन्द वृक्ष के नीचे गए। वहाँ जाकर, वे मुचलिन्द के तले (तीसरे) एक सप्ताह तक एक ही आसन में बैठकर विमुक्ति सुख की निरंतर अनुभूति करते रहे। तब उस समय, बेमौसम महामेघ घिर आया, और एक सप्ताह तक शीतल पवन और बादलों के साथ बारिश होती रही।

तब, नागराज मुचलिन्द अपने निवास से निकलकर भगवान के शरीर को अपनी सर्पकाया से सात बार लपेट कर, सिर पर विशाल फ़न तान कर खड़ा हुआ, ताकि “भगवान को ठंडी, गर्मी, मक्खी, मच्छर, पवन, धूप, और रेंगने वाले जीव-जन्तु न छू पाएँ।”

(तीसरा) सप्ताह बीतने पर, जब नागराज मुचलिन्द को लगा कि देवताओं ने वर्षा रोक दी है, तब उसने भगवान के शरीर से अपनी सर्पकाया की लपेट को खोल दिया। उसने स्वयं को एक युवा-ब्राह्मण के रूप में प्रकट कर, भगवान को हाथ जोड़कर नमन किया…

वह (तीसरा) सप्ताह बीतने पर, भगवान उस समाधि से उठकर, मुचलिन्द के नीचे से राजायतन वृक्ष के नीचे गए। वहाँ जाकर, वे राजायतन के तले (चौथे) एक सप्ताह तक एक ही आसन में बैठकर विमुक्ति सुख की निरंतर अनुभूति करते रहे।

द्विशरण उपासक

इस महान घटना से मानव अभी भी पूरी तरह अनजान थे, लेकिन देवता नहीं। वन के सन्नाटे में भी अदृश्य आँखें जाग रही थीं। ऐसे में, उस देव-प्रेरणा और नियति ने दो बंजारों को चुना—तपुस्स और भल्लिक

यहाँ एक ऐतिहासिक संदर्भ जानना आवश्यक है। बर्मी मान्यताओं में अक्सर यह कहा जाता है कि वे बर्मा (म्यांमार) के थे। यह उनकी अगाध श्रद्धा है कि वे इस दुर्लभ घटना से अपना संबंध जोड़ते हैं। किन्तु, ऐतिहासिक और भौगोलिक प्रमाण भारत की माटी की ओर इशारा करते हैं।

‘उक्कला’ जनपद, जहाँ से वे आ रहे थे, वह आज का ओड़िशा (प्राचीन उत्कल या कलिंग) है। यह क्षेत्र अपने समय का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। ये दोनों ओड़िया व्यापारी अपनी ५०० गाड़ियों के काफिले के साथ सुदूर ‘उत्तरापथ’ (कुरु देश, आज की दिल्ली) के मार्ग पर थे, और अनजाने ही वे बुद्ध के सबसे पहले उपासक बनने जा रहे थे—बुद्ध के एक भी शब्द घोषित करने से पहले।

तब उस समय, तपुस्स (=तपस्सु) और भल्लिक नामक दो व्यापारी, उक्कला (देश) से मार्ग पर चलते हुए, वहाँ उस स्थान पर पहुँचे। तब उनके एक (पूर्व) परिजन देवता ने उनसे कहा:

“हे श्रीमानों! भगवान को अभी संबोधि प्राप्त हुई है, और वे राजायतन के तले विहार कर रहे हैं। उन भगवान के पास जाओ, और उन्हें अपना ‘सत्तू-मधु’ (चिवड़ा और लड्डू) अर्पण करो! ऐसा करना तुम्हारे लिए दीर्घकाल तक हितकारक और सुखदायी होगा!”

तब तपुस्स और भल्लिक व्यापारी, अपना सत्तू-मधु लेकर, भगवान के पास गए। और भगवान को अभिवादन कर एक ओर खड़े हो गए। एक ओर खड़े होकर उन तपुस्स और भल्लिक व्यापारियों ने भगवान से कहा:

“भन्ते! भगवान हमारा सत्तू-मधु ग्रहण करें! ताकि यह हमारे लिए दीर्घकाल तक हितकारक और सुखदायी हो!”

भगवान को लगा, “तथागत कभी (भिक्षा को) सीधे हाथ में ग्रहण नहीं करते हैं। तब मैं इस सत्तू-मधु को कहाँ ग्रहण करूँ?”

तब, चार महाराज देवताओं ने भगवान के चित्त की बात जान ली। वे चारों दिशाओं से पत्थर के चार भिक्षापात्र लेकर भगवान के पास गए, और कहा:

“भन्ते! भगवान इसमें सत्तू-मधु ग्रहण करें!”

तब भगवान ने उनमें से एक पत्थर के पात्र में सत्तू-मधु को ग्रहण कर उसका भोजन किया।

तपुस्स और भल्लिक व्यापारियों ने जब जान लिया कि भगवान ने उनका दिया भोज खा लिया है, तब उन्होंने भगवान से कहा:

“भन्ते! हम दोनों भगवान की शरण जाते हैं, और धम्म की भी। भगवान हमें आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”

(इस तरह) द्विशरण वचन से बने वे इस लोक के प्रथम उपासक थे।

धम्म की याचना

अब आता है वह भारी क्षण, जिस पर पूरी मानवता का भविष्य टिका था। बुद्ध को आर्य सत्य मिल चुका था, लेकिन वह सत्य इतना सूक्ष्म, इतना गहरा था कि उसे समझाना पहली नजर में असंभव सा लग रहा था।

यह एक यथार्थवादी दृष्टिकोण था, जो उपेक्षा-भाव से भरा था—क्या लोग, जो वासनाओं और आसक्तियों में डूबे पड़े हैं, इस निर्लिप्त शांति के मार्ग को समझ पाएंगे?

(चौथा) सप्ताह बीतने पर, भगवान उस समाधि से उठकर, राजायतन के नीचे से पुनः अजपाल बरगद के नीचे गए। और भगवान उस अजपाल बरगद के नीचे रहने लगे। तब एकान्तवास की तल्लीन अवस्था में भगवान के चित्त में यह विचार उत्पन्न हुआ—

“मैंने ऐसे धम्म को प्राप्त किया है, जो गहरा, दुर्दर्शी (=मुश्किल से दिखने वाला), दुर्ज्ञेय (=मुश्किल से पता चलने वाला), शांतिमय, सर्वोत्तम, तर्क-वितर्क से प्राप्त न होने वाला, निपुण और ज्ञानियों द्वारा अनुभव करने योग्य है। किन्तु, यह जनता आसक्तियों में रमती है, आसक्तियों में रत रहती है, और आसक्तियों में ही प्रसन्न होती है।

और ऐसी जनता, जो आसक्तियों में रमती हो, आसक्तियों में रत रहती हो, और आसक्तियों में ही प्रसन्न होती हो, उनके लिए यह इद-पच्चयता (=कार्य-कारण भाव) और प्रतीत्य-समुत्पाद अत्यंत दुर्दर्शी होगा।

और उनके लिए यह भी बहुत दुर्दर्शी होगा—सभी संस्कारों का रुक जाना, सभी अर्जित वस्तुओं का त्याग, तृष्णा का अन्त, विराग, निरोध, निर्वाण! यदि मैं उन्हें ऐसा धम्म दूँ, जो उन्हें समझ में न आए, तो वह मेरे लिए थकाऊ और परेशानी से भरा होगा।”

और तब अचानक, भगवान को पहले कभी न सुनी गयी गाथाएँ सूझ पड़ीं:

“मैंने जिस धम्म को पाया है,
उसे उजागर करना सार्थक नहीं होगा।
राग-द्वेष में ये जो पड़े हुए हैं,
उन्हें इस धम्म का बोध नहीं होगा।

विपरीत प्रवाह में तैरने का जो कौशल है,
बड़ा गहरा, दुर्दर्शी और सूक्ष्म है।
नहीं दिखेगा उन्हें जो राग में रत रहते हैं,
जो घोर अंधकार में घिरे पड़े हैं।”

जब भगवान ने इस तरह सोच-विचार किया, तो भगवान का चित्त अल्प उत्सुकता (=उदासीन और निष्क्रिय भाव) और धम्म न सिखाने की ओर झुक गया। इस तरह, तब बुद्ध ने धम्म को उजागर करने का विचार त्याग दिया।

इतिहास का खतरनाक मोड़

यहाँ आकर हर किसी को ठिठक कर सोचना चाहिए। यह इतिहास का वह नाजुक मोड़ था जहाँ सबकुछ खत्म हो सकता था—शुरू होने से पहले ही।

चूंकि ‘अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ संपूर्ण रूप से ऋणमुक्त होते हैं। उन पर किसी प्रकार की कोई मजबूरी नहीं होती, वे किसी से बंधे नहीं होते। यहाँ उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता से सोच लिया था कि धम्म प्रकाशित नहीं करना है।

यदि वे उस निर्णय पर अडिग रहते, तो यह दुनिया अविद्या के अंधकार में ही पड़ी रहती। इस तरह, मानवता के इतिहास में यह क्षण सबसे भारी था। और इस संकट को टालने के लिए, किसी का हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया था।

आगे जिस सहम्पति ब्रह्मा का उल्लेख है, वे कोई पौराणिक पात्र नहीं हैं। अट्ठकथा के अनुसार, अपने पिछले जन्म में वे भगवान कश्यप सम्यक-सम्बुद्ध के शासन में एक भिक्षु थे, जिनका नाम सहक था। अपनी कठोर साधना और पाँच इंद्रियों (श्रद्धा, शील, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा) को विकसित कर वे अनागामी बने और ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुए।

इसीलिए, एक पूर्व-भिक्षु होने के नाते, वे धम्म का महत्व जानते थे। बाद के ब्राह्मण साहित्य में जिसे ‘स्वयंभू ब्रह्मा’ कहा गया, बौद्ध इतिहास में वही सहम्पति इस निर्णायक घड़ी में हरकत में आए। वे जानते थे कि यदि यह ‘अमृत-द्वार’ आज नहीं खुला, तो यह कल्प वाकई व्यर्थ चला जाएगा। इसीलिए, जब पूरी दुनिया सो रही थी, यह ‘पूर्व-भिक्षु’ पूरी मानव जाति की ओर से वकील बनकर बुद्ध के सामने आ खड़ा हुआ।

और तब, सहम्पति ब्रह्मा ने भगवान के चित्त में चल रहे तर्क-वितर्क को जान लिया।

उसे लगा, “नाश हो गया इस लोक का! विनाश हो गया इस लोक का! जो तथागत अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध का चित्त अल्प उत्सुकता और धम्म न सिखाने की ओर झुक गया।”

तब, जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी समेटी हुई बाह को पसार दे, या पसारी हुई बाह को समेट ले, उसी तरह, सहम्पति ब्रह्मा ब्रह्मलोक से विलुप्त हुआ और भगवान के समक्ष प्रकट हुआ। उस सहम्पति ब्रह्मा ने बाहरी वस्त्र को एक कंधे पर कर, दाएँ घुटने को भूमि पर टिकाकर, हाथ जोड़कर भगवान से कहा:

“भंते, भगवान धम्म का उपदेश करें! सुगत धम्म का उपदेश करें! ऐसे सत्व मौजूद हैं जिनकी आँखों में कम धूल है, किन्तु जो धम्म न सुनने से बर्बाद हैं। वे अवश्य धम्म को समझ जाएँगे!”

ब्रह्मा सहम्पति ने ऐसा कहा, और ऐसा कह कर उसने आगे कहा:

“मगध में पूर्व प्रकट हुआ,
अशुद्ध धम्म, दुष्टों द्वारा गढ़ा हुआ।
आप खोलें, इस अमृत द्वार को!
सुनने दें उन्हें, निर्मल बुद्ध के धम्म को!

जैसे हो खड़ा कोई,
ऊँचे पर्वत शिखर पर,
उसे दिखे जनता सारी,
फैली कई दिशाओं में।

उसी तरह, सुमेध, धम्म से बने हुए,
सर्वत्र चक्षुमान, शोक को लाँघ चुके।
महल पर चढ़कर, जनता को देखें,
शोक में डूबी, अभिभूत जन्म-बुढ़ापे से!

कृपा कर उठें, हे वीर, संग्राम विजेता!
काफिले के मुखिया, ऋणमुक्त विचरते लोक में,
भगवान, कृपा कर धम्म उपदेश दें,
ऐसे लोग हैं, जो समझ जाएँगे!”

भगवान का इंकार

किन्तु, ऐसा कहे जाने पर भगवान ने (अपने विचार) सहम्पति ब्रह्मा से कह दिए:

“ब्रह्मा! मैंने ऐसे धम्म को प्राप्त किया है, जो गहरा, दुर्दर्शी, दुर्ज्ञेय… किन्तु, यह जनता आसक्तियों में रमती है…

“मैंने जिस धम्म को पाया है,
उसे उजागर करना सार्थक नहीं होगा।
राग-द्वेष में ये जो पड़े हुए हैं,
उन्हें इस धम्म का बोध नहीं होगा।

विपरीत प्रवाह में तैरने का जो कौशल है,
बड़ा गहरा, दुर्दर्शी और सूक्ष्म है।
नहीं दिखेगा उन्हें जो राग में रत रहते हैं,
जो घोर अंधकार में घिरे पड़े हैं।”

दुबारा याचना और इंकार

तब, ब्रह्मा सहम्पति ने भगवान से दुबारा याचना की:

“नहीं, भंते! भगवान कृपा कर धम्म का उपदेश करें! सुगत धम्म का उपदेश करें! ऐसे सत्व मौजूद हैं जिनकी आँखों में कम धूल है, किन्तु जो धम्म न सुनने से बर्बाद हैं, जो अवश्य धम्म को समझ जाएँगे!”…

ऐसा कहे जाने के बाद, भगवान ने सहम्पति ब्रह्मा से फिर वही कहा, “ब्रह्मा! मैंने ऐसे धम्म को प्राप्त किया है, जो गहरा, दुर्दर्शी…"

तीसरी बार याचना

तब, ब्रह्मा सहम्पति ने भगवान से तीसरी बार याचना की:

“नहीं, भंते! भगवान कृपा कर धम्म का उपदेश करें! सुगत धम्म का उपदेश करें! ऐसे सत्व मौजूद हैं जिनकी आँखों में कम धूल है, किन्तु जो धम्म न सुनने से बर्बाद हैं, जो अवश्य धम्म को समझ जाएँगे!…”

तब भगवान ने उस ब्रह्मा की याचना पर गौर किया। और, सत्वों के प्रति करुणा से, बुद्धचक्षु से ब्रह्मांड का अवलोकन किया।

भगवान ने बुद्धचक्षु से ब्रह्मांड का अवलोकन करते हुए ऐसे सत्वों को देखा जिनकी आँखों में कम धूल थी, और जिनकी आँखों में अधिक धूल थी; जिनकी इंद्रियाँ तीक्ष्ण थी, और जिनकी इंद्रियाँ मन्द थी; जो भली वृत्ति के थे, और जो बुरी वृत्ति के थे; जो सरलता से सिखाएँ जाने वाले थे, और जो कठिनाई से सिखाएँ जाने वाले थे। कुछ सत्व परलोक में ख़तरा जान कर रहने वाले थे, तो कुछ सत्व परलोक में कोई ख़तरा न जान कर रहने वाले थे।

जैसे किसी पुष्करणी में कोई कोई नीलकमल, रक्तकमल, या श्वेतकमल होते हैं, जो जल के भीतर जन्म लेते हैं, जल के भीतर बढ़ते हैं, जल के भीतर पनपते हैं, बिना जल से बाहर निकले। जबकि कोई कोई नीलकमल, रक्तकमल, या श्वेतकमल होते हैं, जो जल के भीतर जन्म लेते हैं, जल के भीतर बढ़ते हैं, और ऊपर तक आकर जल की सतह को छू पाते हैं। जबकि कोई कोई नीलकमल, रक्तकमल या श्वेतकमल होते हैं, जो जल के भीतर जन्म लेते हैं, और जल के भीतर बढ़ते हुए सतह से ऊपर आकर, जल से अछूत रहते हैं।

उसी तरह, भगवान ने बुद्धचक्षु से ब्रह्मांड का अवलोकन करते हुए ऐसे सत्वों को देखा जिनकी आँखों में कम धूल थी, और जिनकी आँखों में अधिक धूल थी; जिनकी इंद्रियाँ तीक्ष्ण थी, और जिनकी इंद्रियाँ मन्द थी; जो भली वृत्ति के थे, और जो बुरी वृत्ति के थे; जो सरलता से सिखाएँ जाने वाले थे, और जो कठिनाई से सिखाएँ जाने वाले थे। कुछ सत्व परलोक में ख़तरा जान कर रहने वाले थे, तो कुछ सत्व परलोक में कोई ख़तरा न जान कर रहने वाले थे।

याचना का स्वीकार

ऐसा देख कर, तब भगवान ने सहम्पति ब्रह्मा को गाथाओं में कहा:

“खुले हैं द्वार अमृत के!
जिन्हें कान हो, वे श्रद्धा प्रकट करें!

ब्रह्मा, मैं परेशानी देख, नहीं चाहता था,
मनुष्यों को सद्गुणी उत्कृष्ट धम्म बताना।”


तब ब्रह्मा सहम्पति को लगा, “भगवान ने मेरी याचना को स्वीकार लिया है।”

तब उसने भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, वही अन्तर्धान हो गया।

चुनाव

ब्रह्मा की विनती स्वीकार करने के बाद, अब सबसे बड़ा प्रश्न यह था—इस अमृत का पहला घूँट किसे दिया जाए? यह सत्य इतना सूक्ष्म और गहरा था कि इसे धारण करने के लिए किसी ‘प्रगत प्रज्ञा’ के धनी की ही आवश्यकता थी।

यहाँ एक ऐतिहासिक सत्य उजागर होता है। बुद्ध का सबसे पहले अपने उन्हीं गुरुओं—आळार कालाम और उद्दक रामपुत्त—को याद करना यह सिद्ध करता है कि वे ज्ञान के कितने करीब थे। बुद्ध ने उन्हें ‘अल्प-रज’ (जिनकी आँखों में धूल बहुत कम है) माना।

लेकिन यहाँ कालचक्र ने एक बहुत ही निष्ठुर खेल खेला। इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य, लेकिन सत्य के इतने करीब होकर भी, मात्र कुछ दिनों के अंतर से वे परम-मुक्ति से इतने दूर, ऐसे ‘अरूप आयाम’ में जा चुके थे, जहाँ इंद्रियों के अभाव के कारण बुद्ध-वाणी का एक शब्द सुनना भी असंभव था। यह ‘महाहानि’ हमें यह सिखाती है कि आध्यात्मिक जीवन में ‘सही समय’ का कितना भारी महत्व है।

प्रथम चयन

तब भगवान को लगा, “मैं पहले किसे धम्म का उपदेश करूँ? कौन है, जो इस धम्म को तुरंत समझ लेगा?"

तब भगवान को लगा, “यह आळार कालाम पण्डित है, अनुभवी है, मेधावी है, और दीर्घकाल से आँखों में कम धूल वाला है। मैं पहले उसे धम्म का उपदेश करता हूँ। वही है, जो इस धम्म को तुरंत समझ लेगा।”

तब एक देवता ने भगवान को सूचित किया, “भंते, आळार कालाम की मौत हुए एक सप्ताह बीत चुका है।” और, साथ ही, भगवान को भी स्वयं ज्ञान उत्पन्न हुआ, “आळार कालाम की मौत हुए एक सप्ताह बीत चुका है।”

भगवान को लगा, “बड़ा नुकसान हुआ आळार कालाम का। यदि वह इस धम्म को सुनता, तो तुरंत समझ जाता।”

तब भगवान को पुनः लगा, “अब मैं पहले किसे धम्म का उपदेश करूँ? कौन है, जो इस धम्म को तुरंत समझ लेगा?"

द्वितीय चयन

तब भगवान को लगा, “यह उद्दक रामपुत्त पण्डित है, अनुभवी है, मेधावी है, और दीर्घकाल से आँखों में कम धूल वाला है। मैं पहले उसे धम्म का उपदेश करता हूँ। वही है, जो इस धम्म को तुरंत समझ लेगा।”

तब एक देवता ने भगवान को फिर सूचित किया, “भंते, उद्दक रामपुत्त की मौत कल रात हुई।” और साथ ही भगवान को भी स्वयं ज्ञान उत्पन्न हुआ, “उद्दक रामपुत्त की मौत कल रात हुई।”

भगवान को लगा, “बड़ा नुकसान हुआ उद्दक रामपुत्त का। यदि वह भी इस धम्म को सुनता, तो तुरंत समझ जाता।”

तब भगवान को पुनः लगा, “अब मैं पहले किसे धम्म का उपदेश करूँ? कौन है, जो इस धम्म को तुरंत समझ लेगा?"

तृतीय चयन

तब भगवान को लगा, “ये पञ्चवर्गीय भिक्षुगण बहुत उपयोगी थे, जब मैं कठोर तप कर रहा था। मैं उन पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को पहले धम्म का उपदेश करूँगा।”

तब भगवान को लगा, “किन्तु इस समय पञ्चवर्गीय भिक्षुगण कहाँ रह रहे हैं?”

तब भगवान ने अपने मनुष्योत्तर दिव्यचक्षु से पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को वाराणसी में ऋषिपतन के मृगवन में रहते हुए देखा।

तब, भगवान ने उरुवेला में इच्छानुसार जितना रुकना था, उतना रुके, और वाराणसी के भ्रमण पर निकल पड़े।

सात सप्ताह और एक मजेदार मुलाकात

वाराणसी की ओर प्रस्थान करने से पहले, एक ऐतिहासिक तथ्य को स्पष्ट करना आवश्यक है। सूत्रों के अनुसार, सम्बोधि प्राप्त करने के पश्चात भगवान ने कुल सात सप्ताह (४९ दिन) उरुवेला में ही ‘विमुक्ति-सुख’ का अनुभव करते हुए बिताए थे। बाद के कुछ ग्रन्थों में यह भ्रांति फैल गई कि बोधिसत्व ने बुद्ध बनने से पूर्व सात सप्ताह निरंतर ध्यान किया था, जो सही नहीं है।

खैर, अब भगवान वाराणसी के रास्ते पर हैं। और यहीं रास्ते में एक बड़ी ही दिलचस्प और कुछ हद तक हास्यास्पद घटना घटती है।

सोचिए, ब्रह्मांड के सबसे ज्ञानी और तेजस्वी महापुरुष—स्वयं बुद्ध—रास्ते से जा रहे हैं। उनका तेज सूर्य की तरह चमक रहा है। उन्हें सामने से एक ‘उपक’ नाम का साधु (आजीवक) मिलता है। वह बुद्ध के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित होता है कि पूछ बैठता है—“भाई, तुम्हारे गुरु कौन हैं?”

बुद्ध उसे एक जोरदार ‘सिंहनाद’ में उत्तर देते हैं कि “मैं ही इस ब्रह्मांड का विजेता हूँ, मेरा कोई गुरु नहीं!”

अब आप उम्मीद करेंगे कि वह साधु तुरंत चरणों में गिर पड़ेगा। लेकिन उपक की प्रतिक्रिया इतिहास की सबसे ‘एंटी-क्लाइमेक्स’ घटनाओं में से एक है।

तब उपक आजीवक ने भगवान को गया से बोधि उत्पन्न होने वाले स्थान (=बोधगया के बोधिवृक्ष) के मार्ग में यात्रा करते देखा। उसने भगवान को कहा:

“तुम्हारे इंद्रिय प्रसन्न हैं, मित्र, और तुम्हारी त्वचा परिशुद्ध और तेजस्वी है। तुम किसे उद्देश्य कर प्रव्रज्यित हुए हो, मित्र? तुम्हारे शास्ता कौन हैं? तुम्हें किसके धम्म में रुचि है?”

ऐसा कहे जाने पर, भगवान ने उपक आजीवक को गाथाओं में कहा:

“सभी में, मैं अभिभू हूँ,
सब कुछ का जानकार हूँ।
सभी धम्मों को त्याग कर,
मैं न किसी से मलिन हूँ।

सर्वस्व का त्याग कर,
तृष्णा मिटाकर विमुक्त हूँ।
स्वयं से प्राप्त प्रत्यक्ष-ज्ञान को
किसे भला उद्देश्य करूँ?

न मेरा कोई आचार्य है,
न मुझ जैसा कोई दिखता है।
देवताओं से भरे इस लोक में,
न कोई मेरे जैसा है!

अर्हंत हूँ इस लोक में,
शास्ता हूँ मैं सर्वोपरि।
सम्यक-सम्बुद्ध एकमेव मैं,
शीतल होकर परिनिवृत्त हूँ!

इस अंधकारमय लोक में,
धम्मचक्र का प्रवर्तन करने,
जा रहा हूँ काशी में,
अमृत का बिगुल बजाने!”

उसने कहा:

“तुम्हारे दावे से लगता है, मित्र, जैसे तुम कोई काबिल ‘अनन्त-विजेता’ हो!”

भगवान ने कहा:

“विजेता वाकई मुझ जैसे हो।
आस्रवों का अन्त करते जो।
हरा चुका सब पाप धम्मों को,
विजेता हूँ इसलिए ही तो!”

ऐसा कहे जाने पर, उपक आजीवक ने अपना सिर हिलाते हुए कहा:

“ऐसा ही होगा, मित्र!” ऐसा कहते हुए, वह उल्टे रास्ते से चला गया।

पाँच भिक्षुओं से भेंट

खैर, उपक तो अपना उल्टा रास्ता नाप गया। लेकिन जाते-जाते अनजाने में ही वह बुद्ध को ‘अनन्तजिन’ (अनंत-विजेता) की उपाधि दे गया।

विडंबना देखिए—जिस शब्द का प्रयोग उसने शायद हल्केपन में या केवल बात टालने के लिए किया था, वही आगे चलकर बौद्ध जगत में भगवान का एक अत्यंत प्रसिद्ध और गौरवशाली विशेषण बन गया। सचमुच, इतिहास भी कभी-कभी बड़े अजीब ढंग से रचा जाता है!

अब आइए, वाराणसी के ऋषिपतन (सारनाथ) की ओर चलते हैं, जहाँ एक और मनोरंजक दृश्य हमारा इंतज़ार कर रहा है।

वे पाँच तपस्वी, जो कभी सिद्धार्थ के साथी थे, उन्हें दूर से आते हुए देखते हैं। उनके मन में अभी भी वही पुरानी खटास है—‘अरे, यह तो वही गौतम है जो पथभ्रष्ट और विलासी हो गया है।’ वे आपस में (किसी प्यारे हठी बच्चे की तरह) एक ‘पक्की संधि’ कर लेते हैं—‘देखो, कोई इसका सम्मान नहीं करेगा, कोई इसके लिए खड़ा नहीं होगा, बस एक आसन रख देंगे।’

लेकिन आगे जो घटता है, वह किसी श्रद्धापूर्ण हास्य से कम नहीं। जैसे-जैसे ‘मैत्री’ और ‘तेज’ की वह साक्षात मूर्ति पास आती है, उन तपस्वियों की सारी अकड़ मोम की तरह पिघलने लगती है। वे न चाहते हुए भी—जैसे किसी अदृश्य चुंबकीय शक्ति से खिंचे हों—अपने ही बनाए नियमों को तोड़ने लगते हैं। कोई हड़बड़ा कर चीवर लेने दौड़ता है, तो कोई पैर धोने का पानी लाता है। उनकी वह ‘कठोर संधि’ पल भर में हवा हो जाती है!

तब भगवान ने अनुक्रम से वाराणसी में ऋषिपतन के मृगवन की ओर भ्रमण करते हुए पञ्चवर्गीय भिक्षुओं के पास गए। पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान को दूर से आते हुए देखा। और, उन्हें देखते ही एक-दूसरे से सहमति बनायी—

“मित्रों, ये श्रमण गौतम आ रहा है—विलासी, तपस्या से भटका, विलासी जीवन में लौटा हुआ। हमें उसका न अभिवादन करना चाहिए, न उसके लिए खड़े होना चाहिए, न उसका पात्र और चीवर ही उठाना चाहिए। किन्तु, बैठने का आसन रख देना चाहिए। उसे बैठने की इच्छा हो तो बैठेगा।"

किन्तु, जैसे-जैसे भगवान पञ्चवर्गीय भिक्षुओं के पास आए, वैसे-वैसे पञ्चवर्गीय भिक्षुगण बनी आम-सहमति पर टिक नहीं पाएँ। एक ने आगे बढ़कर उनका पात्र और चीवर ग्रहण किया, एक ने आसन लगाया, एक ने पैर धोने का जल रखा, एक ने पैर रखने का पीठ रखा, और एक ने पैर रगड़ने का पत्थर रखा।

शारीरिक सेवा तो शुरू हो गई, लेकिन हृदय के द्वार अभी भी बंद थे। वे अभी भी भगवान को बराबरी के संबोधन ‘मित्र’ (आवुसो) से बुला रहे थे।

यहाँ भगवान की भूमिका एक ऐसे करुणामयी पिता की दिखाई पड़ती है जो अपने रूठे हुए बच्चों को मनाने का प्रयास कर रहा है। उनके पास ‘अमृत’ का कलश है, वे उसे उन पर उंडेलना चाहते हैं, लेकिन ये ‘बच्चे’ हैं कि अपनी पुरानी शिकायतों (“तुमने तो तपस्या छोड़ दी थी!”) में ही उलझे हैं।

भगवान की करुणा देखिए। वे बार-बार, बड़े प्रेम और अधिकार के साथ उन्हें विश्वास दिलाते हैं, इसलिए ताकि वे अपनी जिद छोड़कर उस अमृत की घूँट को पी सकें।

भगवान बिछे आसन पर बैठ गए और बैठकर अपने पैर धोएँ।

हालाँकि, वे तब भी भगवान को नाम से और ‘मित्र’ कहकर पुकार रहे थे। ऐसा कहे जाने पर भगवान ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा:

“भिक्षुओं, तथागत को नाम से और ‘मित्र’ कह कर ना पुकारें। तथागत ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ हैं। सुनों, भिक्षुओं, अमृत की ओर बढ़ती धारा मिल चुकी है। मैं तुम्हें अनुशासित करूँगा और धम्म का उपदेश करूँगा। बताएँ अनुसार चलोगे तो इसी जीवन में जल्द ही ब्रह्मचर्य की उस सर्वोच्च मंज़िल पर पहुँचकर स्थित हो जाओगे, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं।”

ऐसा कहे जाने पर, पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान से कहा, “मित्र गौतम, जब तुम्हें इतनी दुष्कर तपस्या से कोई मनुष्योत्तर अवस्था, विशेष आर्य-ज्ञानदर्शन प्राप्त नहीं हुआ, तब विलासी होकर, तपस्या से भटक कर, विलासी जीवन में लौटने से, भला कैसे ये सब प्राप्त हो गया?”

ऐसा कहे जाने पर भगवान ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं, तथागत न विलासी हैं, न तपस्या से भटके हैं, और न ही विलासी जीवन में लौटे हैं। बल्कि तथागत ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ हैं। सुनों, भिक्षुओं, अमृत की ओर बढ़ती धारा मिल चुकी है। मैं तुम्हें अनुशासित करूँगा और धम्म का उपदेश करूँगा। बताएँ अनुसार चलोगे तो इसी जीवन में जल्द ही ब्रह्मचर्य की उस सर्वोच्च मंज़िल पर पहुँचकर स्थित हो जाओगे, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं।”

तब पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने दूसरी बार भगवान से कहा, “किन्तु, मित्र गौतम, जब तुम्हें इतनी दुष्कर तपस्या से कोई मनुष्योत्तर अवस्था, विशेष आर्य-ज्ञानदर्शन प्राप्त नहीं हुआ, तब विलासी होकर, तपस्या से भटक कर, विलासी जीवन में लौटने से, भला कैसे ये सब प्राप्त हो गया?”

तब भगवान ने दूसरी बार पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं, तथागत न विलासी हैं, न तपस्या से भटके हैं, और न ही विलासी जीवन में लौटे हैं… सुनों, भिक्षुओं, अमृत की ओर बढ़ती धारा मिल चुकी है…”

तब पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने तीसरी बार भगवान से वही कहा, “किन्तु, मित्र गौतम, जब तुम्हें इतनी दुष्कर तपस्या से कोई मनुष्योत्तर अवस्था, विशेष आर्य-ज्ञानदर्शन प्राप्त नहीं हुआ, तब विलासी होकर, तपस्या से भटक कर, विलासी जीवन में लौटने से, भला कैसे ये सब प्राप्त हो गया?”

तब भगवान ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा:

“भिक्षुओं, क्या तुमने पहले मुझे ऐसा कभी कहते हुए सुना है?”

“नहीं, भंते!”

“तब सुनों, भिक्षुओं! तथागत ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ हैं। अमृत की ओर बढ़ती धारा मिल चुकी है। मैं तुम्हें अनुशासित करूँगा और धम्म का उपदेश करूँगा। बताएँ अनुसार चलोगे तो इसी जीवन में जल्द ही ब्रह्मचर्य की उस सर्वोच्च मंज़िल पर पहुँचकर स्थित हो जाओगे, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं।”

इस प्रकार, भगवान पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को समझाने में सफल हुए। तब पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान की बात को ठीक से सुना, कान दिया, और समझने के लिए मन लगाया।

धम्मचक्र प्रवर्तन

आखिरकार, भिक्षु सुनने को तैयार हुए। लेकिन उनके मन की स्लेट अभी भी साफ नहीं थी। उनके भीतर यह धारणा गहरे तक पैठ बना चुकी थी कि ‘आत्म-पीड़ा’ (शरीर को कष्ट देना) ही मुक्ति का एकमात्र द्वार है, और किसी भी प्रकार का ‘सुख’ साधना का शत्रु है।

भगवान जानते थे कि जब तक यह गाँठ नहीं खुलेगी, अमृत भीतर नहीं उतरेगा। इसलिए, अपने पहले ही शब्दों में उन्होंने अपने जीवन के दो चरम अनुभवों—राजमहलों के ‘काम-सुख’ और उरुवेला के भयानक ‘आत्म-क्लेश’—को निचोड़कर रख दिया। उन्होंने घोषित किया कि ये दोनों ही किनारे ‘अनार्य’ और व्यर्थ हैं।

यहीं पर उन्होंने वह क्रांतिकारी सिद्धांत दिया जिसे दुनिया ‘मध्यम-मार्ग’ के नाम से जानती है।

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ी भ्रांति को दूर करना आवश्यक है। बुद्ध ने समझाया कि ‘मध्यम मार्ग’ का अर्थ सुख का पूर्ण त्याग नहीं है। उन्होंने सुख को दो स्पष्ट भागों में बांटा:

  • एक ‘काम-सुख’ (इंद्रिय भोग), जो हीन है और जिसे त्यागना है;
  • दूसरा ‘आध्यात्मिक सुख’ (समाधि), जो चित्त की एकाग्रता से उपजता है।

बुद्ध ने जोर देकर कहा कि इस ‘समाधि-सुख’ से डरने की आवश्यकता नहीं है। यह सुख भटकाता नहीं, बल्कि निर्वाण की यात्रा में आवश्यक ईंधन का काम करता है। अतः मध्यम मार्ग का असली रहस्य यही है—इंद्रिय सुखों का त्याग, किन्तु भीतरी ध्यान सुख का आलिंगन।

तब भगवान ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को संबोधित किया:

“दो छोर (या अतियाँ) हैं, भिक्षुओं, जिन्हें प्रव्रज्यित ने ग्रहण नहीं करना चाहिए। कौन-से दो?

  • ये कामुकता के मारे कामसुख से जुड़ने का (“कामेकामसुखल्लिकानुयोग”) जो हीन, देहाती, जन-साधारण, अनार्य, और अनर्थकारी छोर है।
  • और, ये आत्मपीड़ा से जुड़ने का (“अत्तकिलमथानुयोग”) जो दुखदायी, अनार्य, और अनर्थकारी छोर है।

ये दोनों ही छोर को टालकर, भिक्षुओं, तथागत ने मध्यम-मार्ग के द्वारा संबोधि प्राप्त की, जो चक्षु देता है, ज्ञान देता है, जो प्रशान्ति, प्रत्यक्ष-ज्ञान, संबोधि, और निर्वाण की ओर बढ़ता है। और, ये मध्यम-मार्ग क्या है, जिसके द्वारा तथागत ने संबोधि प्राप्त की, जो चक्षु देता है, ज्ञान देता है, जो प्रशान्ति, प्रत्यक्ष-ज्ञान, संबोधि, और निर्वाण की ओर बढ़ता है?

बस, यही आर्य अष्टांगिक मार्ग। अर्थात, सम्यक-दृष्टि, सम्यक-संकल्प, सम्यक-वचन, सम्यक-कार्य, सम्यक-जीविका, सम्यक-व्यायाम, सम्यक-स्मृति, और सम्यक-समाधि। ये ही मध्यम-मार्ग है, जिसके द्वारा तथागत ने संबोधि प्राप्त की, जो चक्षु देता है, ज्ञान देता है, जो प्रशान्ति, प्रत्यक्ष-ज्ञान, संबोधि, और निर्वाण की ओर बढ़ता है।

और, भिक्षुओं, यह दुःख आर्यसत्य है—

  • जन्म दुःख है, बुढ़ापा दुःख है, बीमारी दुःख है, मौत दुःख है;
  • अप्रिय से जुड़ाव दुःख है, प्रिय से अलगाव दुःख है; इच्छापूर्ति न होना दुःख है।
  • संक्षिप्त में, पाँच उपादान स्कंध (आसक्ति संग्रह) दुःख हैं।

और, भिक्षुओं, यह दुःख की उत्पत्ति आर्यसत्य है—यह तृष्णा, जो पुनः पुनः बनाती है, मज़ा और दिलचस्पी के साथ आती है, यहाँ-वहाँ लुत्फ़ उठाती है। अर्थात—

  • काम तृष्णा,
  • भव तृष्णा,
  • विभव तृष्णा।

और, भिक्षुओं, यह दुःख का अन्त आर्यसत्य है—उस तृष्णा का अशेष विराग होना, निरोध होना, त्याग दिया जाना, संन्यास लिया जाना, मुक्ति होना, आश्रय छूट जाना।

और, भिक्षुओं, यह दुःख का अन्तकर्ता मार्ग आर्यसत्य है—बस यही, आर्य अष्टांगिक मार्ग। अर्थात, सम्यक-दृष्टि, सम्यक-संकल्प, सम्यक-वचन, सम्यक-कार्य, सम्यक-जीविका, सम्यक-व्यायाम, सम्यक-स्मृति, और सम्यक-समाधि।

तीन चरण और बारह आयाम

अब भगवान बुद्धत्व के उस निर्णायक रहस्य को खोलते हैं। ‘आर्य सत्य’ को केवल बौद्धिक रूप से जान लेना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके प्रति हमारा कर्तव्य क्या है, और क्या वह कर्तव्य पूरा हुआ—यह सबसे महत्वपूर्ण है।

यहाँ भगवान बताते हैं कि उन्होंने चारों सत्यों को तीन कसौटियों पर परखा:

  • सत्य ज्ञान: यह जानना कि दुःख की वास्तविकता क्या है? (जैसे: दुःख क्यों उपजता है, कब और किस तरीके से निरुद्ध होता है।)
  • कर्तव्य ज्ञान: यह जानना कि इसके साथ करना क्या है? (जैसे: दुःख को पूर्णतः ‘जानना’ है, कारण को ‘त्यागना’ है, निरोध का ‘साक्षात्कार’ करना है, और मार्ग को ‘विकसित’ करना है)।
  • कृत-ज्ञान: यह मोहर लगाना कि काम पूरा हो गया। (जैसे: क्या दुःख जान लिया गया? क्या कारण त्याग दिया गया? क्या निरोध साक्षात् हो गया? क्या मार्ग पूर्ण हो गया?)

चारों आर्य सत्यों को जब इन तीन चरणों से गुजारते हैं, तो १२ प्रकार (४ x ३ = १२) का ‘ज्ञान-दर्शन’ बनता है।

यह आध्यात्मिक जगत का सबसे महान ‘सिंहनाद’ है। भगवान स्पष्ट करते हैं कि जब तक उन्होंने इस चेकलिस्ट के बारहों खानों पर ‘पूर्णता’ की मुहर नहीं लगा दी, तब तक उन्होंने खुद को ‘बुद्ध’ घोषित नहीं किया। लेकिन अब, चूँकि यह कार्य सिद्ध हो चुका है, वे घोषणा करते हैं—“मेरी विमुक्ति अचल है!”

प्रथम आर्य सत्य

  • ‘यह दुःख (पाँच उपादान स्कंध) है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली, मुझे बोध हुआ, अन्तर्ज्ञान उपजा, विद्या प्रकट हुई, उजाला हुआ।
  • ‘इस दुःख को पूर्णतः (उसके अंतिम छोर तक) पता करना है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख को पूर्णतः जान लिया गया’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…

द्वितीय आर्य सत्य

  • ‘यह दुःख उत्पत्ति (तीन तृष्णाओं के कारण) है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख उत्पत्ति को पूर्णतः त्याग देना है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख की उत्पत्ति को पूर्णतः त्याग दिया गया’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…

तृतीय आर्य सत्य

  • ‘यह दुःख निरोध (तीन तृष्णाओं का अंत) है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख निरोध का साक्षात्कार करना है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख निरोध का साक्षात्कार कर लिया गया’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…

चतुर्थ आर्य सत्य

  • ‘यह दुःख निरोधकर्ता मार्ग (आर्य अष्टांगिक मार्ग) है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख निरोधकर्ता मार्ग की साधना करना है’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली…
  • ‘इस दुःख निरोधकर्ता मार्ग की साधना कर ली गई’—इस पहले कभी न सुने धम्म के प्रति मेरी आँखें खुली, मुझे बोध हुआ, अन्तर्ज्ञान उपजा, विद्या प्रकट हुई, उजाला हुआ।

आर्य चेकलिस्ट

जब तक, भिक्षुओं, मैंने इन चार आर्यसत्यों को तीन चरणों में बारह प्रकारों से अपने ज्ञान-दर्शन को शुद्ध नहीं किया, तब तक मैंने—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—सर्वोत्तर सम्यक-सम्बोधि का दावा नहीं किया।

किन्तु, जब मैंने इन चार आर्यसत्यों को तीन चरणों में बारह प्रकारों से अपने ज्ञान-दर्शन को शुद्ध कर लिया, तब तक मैंने—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—सर्वोत्तर सम्यक-सम्बोधि का दावा किया।

और मुझे ज्ञान और दर्शन उत्पन्न हुआ—‘मेरी विमुक्ति अविचल है! यह मेरा अंतिम जन्म है! अब पुनर्भव नहीं होगा!’

भगवान ने ऐसा कहा। प्रसन्न होकर, पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान के उपदेश का अभिनन्दन किया।

धम्मचक्षु और देवताओं का शंखनाद

उपदेश समाप्त हुआ। वातावरण में फिर से शांति छा गई। लेकिन यह शांति पहले जैसी नहीं थी। एक चिंगारी से दूसरी मोमबत्ती जल चुकी थी।

पाँचों में से सबसे वृद्ध, कोण्डञ्ञ, ने उस सत्य को पकड़ लिया। उन्हें ‘धम्मचक्षु’ प्राप्त हुआ—यह कोई जादुई आँख नहीं, बल्कि वह निर्मल अंतर्दृष्टि है जो साफ-साफ देखती है कि “जो कुछ भी पैदा होता है, वह मिटने वाला है।” यह सुनने में सरल लगता है, लेकिन इसे अनुभव करना ही ‘श्रोतापन्न’ बनना है—मुक्ति की धारा में पहला कदम।

बुद्ध की करुणा सफल हुई। सत्य हस्तांतरित हो चुका था। बुद्ध के मुख से अनायास ही हर्ष-वाक्य फूट पड़ा—“कोण्डञ्ञ समझ गया! (अञ्ञा कोण्डञ्ञ!)”

और इधर पृथ्वी पर यह घटना घटी, उधर ब्रह्मांड में हलचल मच गई। यह खबर किसी जंगल की आग की तरह—भूमि के देवताओं से लेकर सर्वोच्च ब्रह्मलोक तक—फैल गई। यह उद्घोषणा थी कि सत्य का पहिया (धम्मचक्र) घूम चुका है, और अब इस ब्रह्मांड में कोई भी शक्ति इसे रोक नहीं सकती, इसे पीछे नहीं घुमा सकती।

और जब यह स्पष्टीकरण दिया जा रहा था, तब आयुष्मान कोण्डञ्ञ को धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

जब भगवान ने धम्मचक्र प्रवर्तित किया, तब भूमि के देवताओं ने आवेश में घोषणाएँ दी:

“यहाँ भगवान ने वाराणसी के ऋषिपतन मृगवन में अनुत्तर धम्मचक्र का प्रवर्तन कर दिया है, जो अब किसी श्रमण, या ब्राह्मण, या देवता, या मार, या ब्रह्मा, या इस ब्रह्मांड में किसी से भी रोका नहीं जा सकता!”

भूमि देवताओं की घोषणाएँ सुनकर चार महाराज देवताओं ने आवेश में आकर घोषणाएँ दी:

“यहाँ भगवान ने वाराणसी के ऋषिपतन मृगवन में अनुत्तर धम्मचक्र का प्रवर्तन कर दिया है, जो अब किसी श्रमण, या ब्राह्मण, या देवता, या मार, या ब्रह्मा, या इस ब्रह्मांड में किसी से भी रोका नहीं जा सकता!”

(और उसी तरह) चार महाराज देवताओं की घोषणाएँ सुनकर तैतीस देवताओं ने… याम देवताओं ने… तुषित देवताओं ने… निर्माणरति देवताओं ने… परनिर्मित वशवर्ती देवताओं ने… ब्रह्मकायिक देवताओं ने आवेश में घोषणाएँ दी:

“यहाँ भगवान ने वाराणसी के ऋषिपतन मृगवन में अनुत्तर धम्मचक्र का प्रवर्तन कर दिया है, जो अब किसी श्रमण से, या ब्राह्मण से, या देवता से, या मार से, या ब्रह्मा से, या इस ब्रह्मांड में किसी से भी रोका नहीं जा सकता!”

उसी क्षण, उसी पल, उसी मुहूर्त में यह ख़बर ब्रह्मलोक तक फैल गयी। तब दस हजार ब्रह्मांड कंपित हुए, प्रकंपित हुए, थरथराएँ। और, एक असीम और शानदार उजाला इस लोक में प्रकट हुआ, जो देवताओं की शक्तिशाली प्रभा से आगे निकल गया।

तब भगवान यह उदात्त बोल पड़े, “ओ श्रीमान! कोण्डञ्ञ समझ गया! वाकई, कोण्डञ्ञ समझ गया!”

और इस तरह, कोण्डञ्ञ का नाम ‘कोण्डञ्ञ समझ गया’ ही पड़ गया।

और धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके आयुष्मान ‘कोण्डञ्ञ समझ गया’ संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।

तब उन्होंने भगवान से कहा, “भंते, मुझे भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, (भिक्षु) उपसंपदा मिले।”

“आओ, भिक्षु!” कह कर भगवान ने उत्तर दिया, “यह धम्म स्पष्ट बताया है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।”

इस तरह, (संघ के प्रथम भिक्षु) आयुष्मान कोण्डञ्ञ की उपसंपदा संपन्न हुई।

तब भगवान ने बचे हुए भिक्षुओं को धम्म की बातों से उपदेशित किया, अनुशासित किया।

और भगवान के द्वारा धम्म की बातों से उपदेशित होते हुए, अनुशासित होते हुए आयुष्मान वप्प और आयुष्मान भद्दिय को धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

तब धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके आयुष्मान वप्प और आयुष्मान भद्दिय संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।

तब उन्होंने भगवान से कहा, “भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”

“आओ, भिक्षु!” कह कर, फिर भगवान ने उत्तर दिया, “यह धम्म स्पष्ट बताया है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।”

और इस तरह, उन आयुष्मानों की उपसंपदा संपन्न हुई।

तब भगवान ने भिक्षुओं के द्वारा लायी गयी भिक्षा पर यापन करते हुए, बचे हुए भिक्षुओं को धम्म की बातों से उपदेशित किया, अनुशासित किया।

और भगवान के द्वारा धम्म की बातों से उपदेशित होते हुए, अनुशासित होते हुए आयुष्मान महानाम और आयुष्मान अस्सजि को धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

तब धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके आयुष्मान महानाम और आयुष्मान अस्सजि संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।

तब उन्होंने भगवान से कहा, “भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”

“आओ, भिक्षु!” कह कर, फिर भगवान ने उत्तर दिया, “यह धम्म स्पष्ट बताया है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।”

और इस तरह, उन सभी (पाँचों) आयुष्मानों की उपसंपदा संपन्न हुई।

भिक्षुओं का अर्हत्व लाभ

उस समय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया कितनी सरल थी! कोई जटिल कर्मकांड नहीं, कोई लंबी-चौड़ी विधि नहीं। बस तथागत का एक स्नेहपूर्ण आह्वान—“एहि भिक्खु!” (आओ भिक्षु!)—और वह व्यक्ति तत्क्षण संघ में शामिल भिक्षु बन जाता था। यह केवल बुद्ध के शब्दों का जादू नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की पात्रता का भी संगम था।

अब स्थिति यह थी कि पाँचों शिष्यों को ‘धर्मचक्षु’ प्राप्त हो चुका था। वे ‘श्रोतापन्न’ बन चुके थे, यानी मुक्ति की धारा में उतर चुके थे। अब उनका निर्वाण निश्चित था, वे भटक नहीं सकते थे।

लेकिन एक कुशल ‘शास्ता’ (शिक्षक) अपने शिष्यों को बीच मझधार में नहीं छोड़ता। बुद्ध जानते थे कि ‘अनित्यता’ को देखने के बाद भी सूक्ष्म बंधन बाकी रह जाते हैं। जिनमें से ‘मैं हूँ’ (“अस्मिमान”) का वह सूक्ष्म अहंभाव, जो चित्त के गहरी जड़ों में छिपा रहता है।

इसलिए, अब भगवान ने अविद्या के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की तैयारी की। उन्होंने अपना दूसरा महान उपदेश दिया—‘अनत्तलक्खण सुत्त’ (अनात्म लक्षण सूत्र)।

यह उपदेश ‘आत्म-वाद’ की जड़ (पाँच उपादान स्कन्ध) पर वह अंतिम प्रहार था, जिसके बाद ‘मैं’ और ‘मेरा’ बचने की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। यह वह अंतिम शल्य-क्रिया थी, जिसके बाद शिष्य प्रयास-रहित होकर, सहज ही निर्वाण के तट पर जा लगता है। बड़े गौर से सुनिए।

तब, भगवान ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा:

“भिक्षुओं, रूप आत्म (आत्मा या स्व) नहीं है।

यदि रूप आत्म होता तो हमें पीड़ित न करता। और हम उसे (मनचाहा) बदल पाते, ‘मेरा रूप ऐसा हो, वैसा न हो।’

किन्तु वाकई रूप आत्म नहीं है, इसलिए हमें पीड़ित करता है। और हम उसे बदल नहीं पाते हैं, ‘मेरा रूप ऐसा हो, वैसा न हो।’

(उसी तरह) वेदना आत्म नहीं है। यदि वेदना आत्म होती तो हमें पीड़ित न करती। और हम उसे बदल पाते, ‘मेरी वेदना ऐसी हो, वैसी न हो।’ किन्तु वाकई वेदना आत्म नहीं है, इसलिए हमें पीड़ित करती है। और हम उसे बदल नहीं पाते हैं, ‘मेरी वेदना ऐसी हो, वैसी न हो।’

संज्ञा आत्म नहीं है। यदि संज्ञा आत्म होती तो हमें पीड़ित न करती। और हम उसे बदल पाते, ‘मेरी संज्ञा ऐसी हो, वैसी न हो।’ किन्तु वाकई संज्ञा आत्म नहीं है, इसलिए हमें पीड़ित करती है। और हम उसे बदल नहीं पाते हैं, ‘मेरी संज्ञा ऐसी हो, वैसी न हो।’

संस्कार आत्म नहीं है। यदि संस्कार आत्म होता तो हमें पीड़ित न करता। और हम उसे बदल पाते, ‘मेरी संस्कार ऐसा हो, वैसा न हो।’ किन्तु वाकई संस्कार आत्म नहीं है, इसलिए हमें पीड़ित करता है। और हम उसे बदल नहीं पाते हैं, ‘मेरा संस्कार ऐसा हो, वैसा न हो।’

विज्ञान आत्म नहीं है। यदि विज्ञान आत्म होता तो हमें पीड़ित न करता। और हम उसे बदल पाते, ‘मेरा विज्ञान ऐसा हो, वैसे न हो।’ किन्तु वाकई विज्ञान आत्म नहीं है, इसलिए हमें पीड़ित करता है। और हम उसे बदल नहीं पाते हैं, ‘मेरा विज्ञान ऐसा हो, वैसा न हो।’

प्रतिप्रश्न से धम्म

क्या मानते हो, भिक्षुओं? रूप नित्य है या अनित्य?”

(उन्होंने उत्तर दिया) “अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, वह कष्टदायी है या सुखदायी?”

“कष्टदायी, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, कष्टदायी है, परिवर्तनशील है, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि ‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

वेदना नित्य है या अनित्य?”

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, वह कष्टदायी है या सुखदायी?”

“कष्टदायी, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, कष्टदायी है, परिवर्तनशील है, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि ‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

संज्ञा नित्य है या अनित्य?”

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, वह कष्टदायी है या सुखदायी?”

“कष्टदायी, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, कष्टदायी है, परिवर्तनशील है, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि ‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

संस्कार नित्य है या अनित्य?”

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, वह कष्टदायी है या सुखदायी?”

“कष्टदायी, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, कष्टदायी है, परिवर्तनशील है, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि ‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

विज्ञान नित्य है या अनित्य?”

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, वह कष्टदायी है या सुखदायी?”

“कष्टदायी, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं, कष्टदायी है, परिवर्तनशील है, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि ‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

“इसलिए, भिक्षुओं, जो भी रूप हो—भूत, भविष्य या वर्तमान के, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या उत्तम, दूर या समीप का। सभी रूपों को यह ‘मेरे नहीं हैं, मेरा आत्म नहीं हैं, मैं यह नहीं हूँ’, इस तरह, सही अन्तर्ज्ञान से यथास्वरूप देखना है।

जो भी वेदना हो—भूत, भविष्य या वर्तमान की, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या उत्तम, दूर या समीप की। सभी वेदनाओं को यह ‘मेरी नहीं हैं, मेरा आत्म नहीं हैं, मैं यह नहीं हूँ’, इस तरह, सही अन्तर्ज्ञान से यथास्वरूप देखना है।

जो भी संज्ञा हो—भूत, भविष्य या वर्तमान का, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या उत्तम, दूर या समीप की। सभी संज्ञाओं को यह ‘मेरे नहीं हैं, मेरा आत्म नहीं हैं, मैं यह नहीं हूँ’, इस तरह, सही अन्तर्ज्ञान से यथास्वरूप देखना है।

जो भी संस्कार हो—भूत, भविष्य या वर्तमान की, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या उत्तम, दूर या समीप की। सभी संस्कारों को यह ‘मेरी नहीं हैं, मेरा आत्म नहीं हैं, मैं यह नहीं हूँ’, इस तरह, सही अन्तर्ज्ञान से यथास्वरूप देखना है।

जो भी विज्ञान हो—भूत, भविष्य या वर्तमान का, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या उत्तम, दूर या समीप का। सभी विज्ञान को यह ‘मेरे नहीं हैं, मेरा आत्म नहीं हैं, मैं यह नहीं हूँ’, इस तरह, सही अन्तर्ज्ञान से यथास्वरूप देखना है।

भिक्षुओं, इस तरह देखने से धम्म-सुने आर्यश्रावक का रूप के प्रति मोहभंग होता है, वेदना के प्रति मोहभंग होता है, संज्ञा के प्रति मोहभंग होता है, संस्कार के प्रति मोहभंग होता है, विज्ञान के प्रति मोहभंग होता है।

मोहभंग होने से विराग होता है। विराग होने से विमुक्त होता है। विमुक्ति से ज्ञात होता है, ‘विमुक्त हुआ!’ और पता चलता है, ‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’

ऐसा भगवान ने कहा। प्रसन्न होकर, पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया। और जब यह स्पष्टीकरण दिया जा रहा था, तब पञ्चवर्गीय भिक्षुओं का चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ।

और तब, इस दुनिया में छह अर्हंत हुए।

यश की कथा

धर्मचक्र प्रवर्तित हो चुका था। सत्य का वह महान पहिया घूम चुका था। अब इस धरा पर केवल एक नहीं, बल्कि छह अर्हंत विचर रहे थे।

बुद्ध के अलावा भी, कल तक अविद्या के अंधकार में पड़े वे पाँच साधारण मनुष्य अब पूर्णतः मुक्त हो चुके थे। यह इस बात का जीवंत प्रमाण था कि निर्वाण केवल बुद्ध का निजी खजाना नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए साध्य है जो सही मार्ग पर चले।

यद्यपि आम दुनिया अपनी गहरी नींद में थी, लेकिन इस आध्यात्मिक क्रांति की सूक्ष्म तरंगें हवाओं में घुल चुकी थीं और उन ‘तैयार आत्माओं’ तक पहुँचने लगी थीं जो जागने के कगार पर थीं।

जब बुद्धत्व का सूर्य उदित होता है, तो उसका प्रभाव केवल एक वन या आश्रम तक सीमित नहीं रहता। वातावरण में एक ऐसा आध्यात्मिक परिवर्तन आता है कि कई पुण्यशाली सत्वों को अपने सजे-सजाए घरों में अचानक घुटन महसूस होने लगती है। जिसे दुनिया ‘सुख’ और ‘विलास’ कहती है, वह उन्हें ‘आग’ और ‘श्मशान’ की तरह वीभत्स लगने लगता है।

बौद्ध शब्दावली में इसे ‘संवेग’ कहते हैं—वह गहरा आध्यात्मिक झटका जो इंसान को मोह की नींद से झकझोर कर जगा देता है।

यह कोई संयोग नहीं होता। यह उन सत्वों के पूर्व-जन्मों के संचित पुण्यों का ही प्रताप होता है, जो उन्हें ठीक ‘सही समय’ पर और ‘सही स्थान’ पर बुद्ध के चरणों तक खींच लाता है। बनारस का एक बेहद रईस नौजवान, यश, इसी कतार में अगला था, जिसे अपनी मखमली सेज अब काटों की तरह चुभने वाली थी। और उधर, अदृश्य देवता भी पूरी सज्जता के साथ द्वार पर खड़े थे, ताकि इस पुण्यशाली को भगवान के चरणों तक पहुँचाने में कोई बाधा न आए।

उस समय यश नामक कुलपुत्र, बनारस में श्रेष्ठी का पुत्र था, जिसे बहुत सुखों को पाला गया था। उसके लिए तीन महल बने थे—एक शीतकाल के लिए; एक ग्रीष्मकाल के लिए; और एक वर्षाकाल के लिए। वर्षाकाल के चारों महीने वर्षामहल में रहते हुए, उसे गायकी-नर्तकियों द्वारा बहलाया जाता, बिना अन्य पुरुष की उपस्थिति के। उसे महल से नीचे एक बार भी उतरना न पड़ता।

एक बार यश कुलपुत्र, पाँच कामभोग की समग्रताओं से लिप्त होकर, अपने सेविकाओं से पूर्व, अपने परिजनों से पूर्व निद्रा में चला गया। रात भर तेल का दीया जलता रहा।

तब अचानक, यश कुलपुत्र ने उठकर अपने परिजनों को सोते हुए देखा—किसी की बगल में वीणा थी, किसी के गले में मृदंग था, तो किसी के बगल में ढ़ोल था, किसी के केश बिखरे थे, तो किसी की लार गिर रही थी, तो कोई निद्रा में बड़बड़ा रही थी—साक्षात श्मशान जैसा लग रहा था।

यश का संन्यास

ऐसा दिखने पर, उसे (कामुकता में) ख़ामी (“आदीनव”) प्रकट हुई, और मोहभंगिमा चित्त में घर कर गयी।

तब यश कुलपुत्र यकायक उदात्त बोल पड़ा, “उफ़, ये अत्याचार! उफ़, ये उत्पीड़न!”

तब यश कुलपुत्र, अपने स्वर्ण पादुका को पहन कर, प्रवेश द्वार की ओर गया। अमनुष्यों ने द्वार खोल दिया, (सोचते हुए), “यश कुलपुत्र का घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होने में कोई बाधा न हो।”

तब यश कुलपुत्र वहाँ से निकलकर नगरद्वार की ओर गया। उसे भी अमनुष्यों ने खोल दिया, (सोचते हुए), “यश कुलपुत्र का घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होने में कोई बाधा न हो।”

और तब, यश कुलपुत्र वहाँ से निकलकर ऋषिपतन मृगवन की ओर चल पड़ा।

भगवान से भेंट

उस समय, भगवान रात के अंतिम पहर में उठकर चंक्रमण कर रहे थे। जब भगवान ने दूर से यश कुलपुत्र को आते देखा, तो चंक्रमण पथ से उतर कर बिछे आसन पर बैठ गए।

तब, यश कुलपुत्र ने भगवान के पास आकार पुनः उदात्त बोल पड़ा, “उफ़, ये अत्याचार! उफ़, ये उत्पीड़न!”

और तब, भगवान ने यश कुलपुत्र से कहा, “यहाँ अत्याचार नहीं है, यश! यहाँ उत्पीड़न नहीं है! आओ, बैठो! मैं तुम्हें धम्म बताता हूँ!”

तब, यश कुलपुत्र को लगा, “यहाँ अत्याचार नहीं है! यहाँ उत्पीड़न नहीं है!” वह, उल्लासित और उत्साहित हो, अपनी स्वर्ण पादुका निकाल, भगवान के पास गया, और अभिवादन कर एक ओर बैठ गया।

तब, एक-ओर बैठे यश कुलपुत्र को भगवान ने अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि यश कुलपुत्र का तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।

जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह यश कुलपुत्र को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

प्रथम त्रिशरण उपासक

यहाँ भगवान की ‘ऋद्धि’ का एक बहुत ही सूक्ष्म प्रयोग देखने को मिलता है। यह कोई चमत्कार दिखाने के लिए नहीं था, बल्कि यह एक ‘कौशल-उपाय’ था। भगवान जानते थे कि यदि पिता ने आते ही अपने पुत्र को देख लिया, तो ‘पिता का मोह’ जाग जाएगा। फिर वह न धर्म सुन पाएगा, न समझ पाएगा।

इसलिए, भगवान ने करुणावश पुत्र को पिता की नजरों से ओझल कर दिया, ताकि पहले पिता के चित्त को शांत किया जा सके।

और यहाँ एक अद्भुत संयोग देखिए। पञ्चवर्गीय भिक्षु तो भगवान के पुराने साथी थे, वे उन्हें वर्षों से जानते थे। लेकिन यश? वह और उसका परिवार भगवान के लिए पूरी तरह अपरिचित और अनजान थे।

लेकिन धर्म किसी परिचय का मोहताज नहीं होता, वह निष्पक्ष रूप से केवल ‘पात्रता’ देखता है। यह यश और उसके पिता के महान पुण्यों का ही प्रताप था कि एक अनजान रईस कुल, जिसने शायद कभी श्रमण गौतम का नाम भी नहीं सुना था, वह अब बुद्ध-शासन का ‘प्रथम गृहस्थ-परिवार’ बनने जा रहा था।

तब उधर, यश कुलपुत्र की माता उसके महल में गयी, और यश कुलपुत्र को न पाकर अपने पति श्रेष्ठी गृहपति के पास गयी, और कहने लगी:

“आपका पुत्र कही दिखायी नहीं दे रहा है।”

तब श्रेष्ठी गृहपति ने चारों दिशाओं में अश्वदूत भेजे, और वह स्वयं ऋषिपतन के मृगवन की ओर चल पड़ा।

वहाँ श्रेष्ठी गृहपति को भूमि पर स्वर्ण पादुका के चिन्ह दिखायी दिए, और उसने पीछा किया।

तब भगवान ने श्रेष्ठी गृहपति को दूर से आते देखा। और उसे देखकर भगवान को लगा, “क्यों न मैं अपनी ऋद्धिबल से ऐसी रचना करूँ कि श्रेष्ठी गृहपति यही बैठे होकर भी यश कुलपुत्र को न देख पाएँ।”

और तब भगवान ने अपने ऋद्धिबल से ऐसी रचना की।

तब श्रेष्ठी गृहपति भगवान के पास गया, और भगवान से कहा, “भंते! क्या भगवान ने यश कुलपुत्र को देखा है?”

“ऐसी बात हो, गृहपति, तो यहाँ बैठो। संभव है यहाँ बैठकर तुम्हें यही बैठा हुआ यश कुलपुत्र दिख जाएँ।”

जब श्रेष्ठी गृहपति ने ऐसा सुना, तो वह उल्लासित और उत्साहित होकर भगवान के पास गया, और अभिवादन कर एक ओर बैठ गया।

तब, एक-ओर बैठे श्रेष्ठी गृहपति को भगवान ने अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि श्रेष्ठी गृहपति का तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।

जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह श्रेष्ठी गृहपति को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

तब धम्म देख चुका, धम्म पा चुका, धम्म जान चुका, धम्म में गहरे उतर चुका श्रेष्ठी गृहपति संदेह लाँघकर परे चला गया। तब उसे कोई सवाल न बचे। उसे निडरता प्राप्त हुई, तथा वह शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुआ।

तब उसने भगवान से कहा:

“अतिउत्तम, भंते ! अतिउत्तम, भंते! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ! धम्म की और भिक्षुसंघ की भी! भगवान मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!"

वह इस लोक में त्रिशरण लेने वाला प्रथम उपासक बना।

और, जब यश कुलपुत्र अपने पिता को धम्म उपदेश दिया जाते देख रहा था, तब उसने पहले देखे, पहले समझे धम्म-आधार पर पुनः चिंतन-मनन किया, और उसका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ।

और भगवान को पता चला, “यश कुलपुत्र ने अपने पिता को धम्म उपदेश दिया जाते देख, पहले देखे, पहले समझे धम्म-आधार पर पुनः चिंतन-मनन किया, और उसका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ। अब यश कुलपुत्र वैसे हीनवृत्ति के कामभोग का सेवन नहीं कर सकता, जैसे गृहस्थ जीवन में करता था। अभी मैं अपने ऋद्धिबल की रचना करना रोक देता हूँ!”

तब भगवान ने अपने ऋद्धिबल की रचना करना रोक दिया।

तब श्रेष्ठी गृहपति को यश कुलपुत्र वही बैठा दिखायी दिया। तब उसने यश कुलपुत्र से कहा:

“पुत्र यश, तुम्हारी माता शोक और विलाप में डूब गयी है। अपनी माता को जीवन दो।”

यश कुलपुत्र ने भगवान की ओर देखा।

भगवान ने श्रेष्ठी गृहपति से कहा, “क्या लगता है तुम्हें, गृहपति? जैसे कोई तुम्हारे ही जैसे इस शिक्षा का ज्ञान, और शिक्षा का दर्शन देख चुका हो, समझ चुका हो। और वह उस देखे और समझे धम्म-आधार पर पुनः चिंतन-मनन करे, और उसका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हो जाएँ। तब, गृहपति, ऐसा कोई पुनः वैसे ही हीनवृत्ति के कामभोग का सेवन कर सकता है, जैसे गृहस्थ जीवन में करता था?”

“नहीं, भंते!”

“गृहपति, यश कुलपुत्र ने अपने पिता को धम्म उपदेश दिया जाते देख, पहले देखे, पहले समझे धम्म-आधार पर पुनः चिंतन-मनन किया, और उसका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ। अब यश कुलपुत्र वैसे हीनवृत्ति के कामभोग का सेवन नहीं कर सकता, जैसे गृहस्थ जीवन में करता था।”

“बहुत लाभ हुआ यश कुलपुत्र का! अत्यंत लाभ हुआ यश कुलपुत्र का, जो उसका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ। भंते, कृपया भगवान आज का भोजन हमसे ग्रहण करें, आपके सेवक श्रमण यश कुलपुत्र के साथ।”

भगवान ने मौन रहकर स्वीकृति दी। तब भगवान की स्वीकृति जान कर, श्रेष्ठी गृहपति आसन से उठकर भगवान को अभिवादन करते हुए, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया।

श्रेष्ठी गृहपति के जाने के तुरंत बाद, यश कुलपुत्र ने भगवान से कहा, “भंते, मुझे भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”

“आओ, भिक्षु!” कह कर, भगवान ने उत्तर दिया, “यह धम्म स्पष्ट बताया है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।” और इस तरह, उस आयुष्मान की उपसंपदा संपन्न हुई।

और तब, इस दुनिया में सात अर्हंत हुए।

प्रथम उपासिकाएँ

पिता ‘स्रोतापन्न’ बन चुके थे, और पुत्र ‘अर्हंत’। लेकिन धर्म का यह प्रवाह केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रहने वाला था।

अब सत्य की यह पावन लहर घर की महिलाओं—यश की माता और पूर्व-पत्नी—तक पहुँचने वाली थी। यह एक ऐतिहासिक क्षण था जब बुद्ध-शासन के द्वार महिलाओं के लिए भी उतने ही खुलने वाले थे।

यह परिवार, जो कल तक विलास और अज्ञान में डूबा था, अब पूर्ण रूप से ‘आर्य-परिवार’ बनने जा रहा था। अब समय आ गया था कि ‘उपासक’ के साथ-साथ ‘उपासिका’ का इतिहास भी रचा जाए, ताकि संघ के चारों स्तंभ (भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका) में से गृहस्थ स्तंभ पूर्ण हो सके।

तब सुबह होने पर भगवान ने चीवर ओढ़, पात्र लेकर, सेवक श्रमण यश के साथ श्रेष्ठी गृहपति के घर गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गये। तब यश की माता और पूर्व पत्नी भगवान के पास गए, और अभिवादन कर एक ओर बैठ गए।

तब, भगवान ने उन्हें अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि उनका तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।

जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह यश की माता और पूर्व पत्नी को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

तब धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके यश की माता और पूर्व पत्नी संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।

तब उन्होंने भगवान से कहा, “अतिउत्तम, भंते! अतिउत्तम, भंते! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। हम बुद्ध की शरण जाते हैं! धम्म की और भिक्षुसंघ की भी! भगवान हमें आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासिकाएँ धारण करें!"

और, वे दोनों इस दुनिया में त्रिशरण लेने वाली प्रथम उपासिकाएँ बनी।

तब, यश के माता, पिता और पूर्व पत्नी ने भगवान और आयुष्मान यश को अपने हाथों से उत्तम खाद्य और भोजन परोस कर संतृप्त किया, संतुष्ट किया। भगवान के भोजन कर पात्र से हाथ हटाने के पश्चात, उन्होंने स्वयं का आसन नीचे लगाया और एक ओर बैठ गए।

तब भगवान ने यश की माता, पिता और पूर्व पत्नी को धम्म-चर्चा से निर्देशित किया, उत्प्रेरित किया, उत्साहित किया, हर्षित किया, और आसन से उठकर चले गए।

चिंगारी बनी ज्वाला

यश के घर के भीतर तो परम-शांति छा गई थी, लेकिन बाहर बनारस के संभ्रांत समाज में एक विस्फोट हो गया था।

“सुना तुमने? यश ने सिर मुंडा लिया! वह भिक्षु बन गया!”

“क्या कहा तुमने?”

यह खबर किसी जंगल की आग की तरह फैली। बनारस के गलियारों, बाज़ारों और महलों में खलबली मच गई। आखिर यश कोई साधारण व्यक्ति नहीं था; वह विलास और ऐश्वर्य का प्रतीक था। उसका यूँ अचानक सब कुछ छोड़ देना लोगों की समझ से परे था।

सबसे गहरा झटका लगा यश के चार जिगरी दोस्तों को—विमल, सुबाहु, पूर्णजि और गवाम्पति। ये वे दोस्त थे जिन्होंने यश के साथ बचपन से जवानी तक हर सुख साझा किया था।

लेकिन उनकी प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। उन्होंने यश को पागल नहीं समझा, बल्कि उनके मन में एक बिजली कौंधी— “यश कच्चा खिलाड़ी नहीं है। वह घाटे का सौदा कभी नहीं करता। यदि उसने सोने के महलों को ठुकरा कर मिट्टी का पात्र उठाया है, और श्रमण गौतम के पीछे चल पड़ा है, तो निश्चित ही वह धर्म साधारण नहीं हो सकता! वहां कुछ ऐसा है जो दुनिया की हर दौलत से बेशकीमती है।”

जिज्ञासा की यह आग अब रोके नहीं रुकने वाली थी। जैसे लोहे के कण चुंबक की ओर खिंचे चले आते हैं, वैसे ही वे चारों दोस्त भागते हुए भगवान के पास आ पहुँचे। यह उस क्रांति की शुरुआत थी जिसे अब कोई नहीं रोक सकता था।

अब, आयुष्मान यश के चार गृहस्थ मित्र थे, जो वाराणसी के बड़े-बड़े श्रेष्टियों के कुलपुत्र थे—विमल, सुबाहु, पुण्णजि, और गवम्पति। उन्होंने सुना कि यश कुलपुत्र ने सिरदाढ़ी मुंडवा, काषायवस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रज्यित हो गया है।

ऐसा सुनने पर, उन्होंने (आपसी वार्तालाप में) कहा, “नहीं! जरूर यह धम्म-विनय तुच्छ नहीं होगा! यह प्रव्रज्या तुच्छ नहीं होगी, जो यश कुलपुत्र ने अपनी सिर-दाढ़ी मुंडवा कर, काषाय-वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रज्यित हो गया है।”

तब वे यश के पास गए, और आयुष्मान यश को अभिवादन कर एक-ओर बैठ गए। तब आयुष्मान यश अपने चारो गृहस्थ मित्रों को भगवान के पास ले गए, और भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए।

एक-ओर बैठकर आयुष्मान यश ने भगवान से कहा:

“भंते, ये मेरे चारो गृहस्थ मित्र वाराणसी के श्रेष्ठियों के कुलपुत्र हैं—विमल, सुबाहु, पुण्णजि, और गवम्पति। भगवान इन्हें उपदेशित करें, अनुशासित करें।”

तब, भगवान ने उन्हें अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि उनका तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।

जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह आयुष्मान यश के चारों गृहस्थ मित्रों को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

तब धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके यश के चारों गृहस्थ मित्र संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।

तब उन्होंने भगवान से कहा, “भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।"

“आओ, भिक्षु!” कह कर, भगवान ने उत्तर दिया, “यह धम्म स्पष्ट बताया है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।” और इस तरह, उन आयुष्मानो की उपसंपदा संपन्न हुई।

तब, भगवान ने उन भिक्षुओं को धम्म कथा से उपदेशित किया, अनुशासित किया। भगवान की धम्म कथा से उपदेशित होकर, अनुशासित होकर उनका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ।

और तब, इस दुनिया में ग्यारह अर्हंत हुए।

जनपद में गूँज

क्रांति की यह आग अब बनारस की ऊंची दीवारों में कैद नहीं रह सकती थी। यह लपटें शहर को लांघकर दूर-दराज के जनपदों (ग्रामीण क्षेत्रों) तक जा पहुँचीं।

यश का दायरा बहुत बड़ा था। केवल शहर में ही नहीं, देहात में भी उसके पचास घनिष्ठ मित्र थे। जब उन पचास मित्रों ने सुना कि उनके सबसे समझदार और रईस दोस्त यश ने, और उसके बाद विमल-सुबाहु जैसे साथियों ने भी सबकुछ त्याग दिया है, तो उनका भी मोहभंग हो गया।

तर्क वही था—“अगर यश ने यह सौदा किया है, तो यह घाटे का नहीं हो सकता!”

तब आयुष्मान यश के पचास गृहस्थ मित्र, जो अन्य नगरों के बड़े-बड़े कुलों के पुत्र थे, उन्होंने सुना कि यश कुलपुत्र ने सिरदाढ़ी मुंडवा, काषायवस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रज्यित हो गया है।

ऐसा सुनने पर, उन्होंने कहा, “नहीं! जरूर यह धम्म-विनय तुच्छ नहीं होगा! यह प्रव्रज्या तुच्छ नहीं होगी, जो यश कुलपुत्र ने अपनी सिर-दाढ़ी मुंडवा कर, काषाय-वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रज्यित हो गया है।”

तब वे यश के पास गए, और आयुष्मान यश को अभिवादन कर एक-ओर बैठ गए। तब आयुष्मान यश अपने पचास गृहस्थ मित्रों को भगवान के पास ले गए, और भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए।

एक-ओर बैठकर आयुष्मान यश ने भगवान से कहा:

“भंते, ये मेरे पचास गृहस्थ मित्र अन्य नगरों के बड़े-बड़े कुलों के पुत्र हैं। भगवान इन्हें उपदेशित करें, अनुशासित करें।”

६१ अर्हंत

देखते ही देखते, एक के बाद एक, पचास और नौजवान भगवान के चरणों में आ गिरे। भगवान ने उन्हें भी उसी करुणा से ‘एहि भिक्खु’ कहकर अपनाया और उन्हें धर्म का उपदेश दिया। और परिणाम वही हुआ—वे सभी पचास मित्र भी आस्रव-हीन होकर अर्हंत बन गए।

तब, भगवान ने उन्हें अनुक्रम से धम्म बताया, जैसे दान कथा, शील कथा, स्वर्ग कथा; फ़िर कामुकता में ख़ामी, दुष्परिणाम और दूषितता, और अंततः संन्यास के लाभ प्रकाशित किए। और जब भगवान ने जान लिया कि उनका तैयार चित्त है, मृदु चित्त है, अवरोध-विहीन चित्त है, प्रसन्न चित्त है, आश्वस्त चित्त है, तब उन्होंने बुद्ध-विशेष धम्मदेशना को उजागर किया—दुःख, उत्पत्ति, निरोध, मार्ग।

जैसे कोई स्वच्छ, दागरहित वस्त्र भली प्रकार रंग पकड़ता है, उसी तरह आयुष्मान यश के पचासों गृहस्थ मित्रों को उसी आसन पर बैठकर धूलरहित, निर्मल धम्मचक्षु उत्पन्न हुए—“जो धम्म उत्पत्ति-स्वभाव के हैं, सब निरोध-स्वभाव के हैं!”

तब धम्म देख चुके, धम्म पा चुके, धम्म जान चुके, धम्म में गहरे उतर चुके यश के पचासों गृहस्थ मित्र संदेह लाँघकर परे चले गए। तब उन्हें कोई सवाल न बचे। उन्हें निडरता प्राप्त हुई, तथा वे शास्ता के शासन में स्वावलंबी हुए।

तब उन्होंने भगवान से कहा, “भंते, हमें भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।"

“आओ, भिक्षु!” कह कर, भगवान ने उत्तर दिया, “यह धम्म स्पष्ट बताया है। दुःखों का सम्यक निरोध करने के लिए इस ब्रह्मचर्य का पालन करो।” और इस तरह, उन आयुष्मानो की उपसंपदा संपन्न हुई।

तब, भगवान ने उन भिक्षुओं को धम्म कथा से उपदेशित किया, अनुशासित किया। भगवान की धम्म कथा से उपदेशित होकर, अनुशासित होकर उनका चित्त अनासक्त हो आस्रव-मुक्त हुआ।

और तब, इस दुनिया में एकसठ अर्हंत हुए।

बुद्ध की ललकार

अब एक चमत्कार हो चुका था। कुछ ही हफ्तों के भीतर, इस धरती पर ६१ (इकसठ) अर्हंत मौजूद थे—बुद्ध स्वयं, ५ पञ्चवर्गीय, यश और उसके ५४ मित्र।

कल्पना कीजिए उस ‘आर्य-ऊर्जा’ की! ६१ ऐसे महामानव, जो पूरी तरह मुक्त थे, निडर थे, और जिनके पास अब दुनिया को देने के लिए ‘अमृत’ के सिवाय कुछ नहीं था। यह इतिहास की पहली ‘शांति की सेना’ तैयार हो चुकी थी, जिसे अब बिना किसी हथियार के ‘विश्व-विजय’ (धर्म-विजय) के लिए निकलना था।

तब, धर्मराज बुद्ध ने अपनी सेना को वह ऐतिहासिक आदेश दिया, जो आज भी गूँज रहा है।

तब भगवान ने उन भिक्षुओं को संबोधित किया:

“भिक्षुओं! मैं दिव्य अथवा मानवीय, सभी जालों से मुक्त हूँ! तुम भी, भिक्षुओं, दिव्य अथवा मानवीय, सभी जालों से मुक्त हो!

विचरण करों, भिक्षुओं (चरथ भिक्खवे चारिकं)—बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित और सुख के लिए!

भिक्षुओं, एक रास्ते से दो मत जाओ। (ताकि धर्म ज्यादा से ज्यादा फैल सके)।

और ऐसा धम्म उपदेश करों—जो प्रारंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, और अन्त में कल्याणकारी हो। ऐसे इस सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को गहरे अर्थ और विवरण के साथ प्रकाशित करों, भिक्षुओं!

ऐसे सत्व हैं, जिनकी आँखों में कम धूल है, किन्तु जो धम्म न सुनने से बर्बाद हो रहे हैं। वे अवश्य धम्म को समझ जाएँगे!

और, भिक्षुओं, मैं स्वयं उरुवेला के सैनिय नगर में धम्म उपदेश करने के लिए जाऊँगा!”

—विनयपिटक : महावग्ग : ०१. महाक्खंदक

॥ संघ कथा - भाग प्रथम समाप्त ॥

धम्म की आग

और तब, मात्र इकसठ अर्हंतों का यह नन्हा-सा, लेकिन महाप्रतापी संघ चारों दिशाओं में फैलने लगा। भगवान बुद्ध की आज्ञा पाकर वे अलग-अलग दिशाओं में ‘आर्य-धम्म’ का शंखनाद करने निकले।

जनता में हलचल मच गई। वे भिक्षुओं के शांत चेहरे देखते, उनसे प्रश्न पूछते और जब धम्म का तर्कसंगत और गहरा अर्थ समझते, तो श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते। भगवान की कीर्ति हवाओं पर सवार होकर जम्बूद्वीप के कोने-कोने में फैलने लगी।

संघ में शामिल होने वालों की बाढ़ आ गई। अर्हंत भिक्षु विभिन्न दिशाओं से विशाल समूहों का नेतृत्व करते हुए भगवान के पास पहुँचने लगे। भीड़ इतनी बढ़ी कि अंततः भगवान को नियम बदलना पड़ा और भिक्षुओं को अनुमति दी गई कि वे अपने क्षेत्रों में ही ‘उपसंपदा’ (दीक्षा) दें।

  • बौद्धिक दिग्गज: पञ्चवर्गीय भिक्षुओं में से एक, आयुष्मान अस्सजि ने, बिना कोई उपदेश दिए, मात्र अपने शांत व्यक्तित्व और ‘आर्य-विनय’ से उस समय के दो महानतम प्रतिभाओं—सारिपुत्त और महामोग्गलान—को जीत लिया, जो अपने सैकड़ों अनुयायियों सहित संघ में आ मिले।
  • आध्यात्मिक विजय: दूसरी ओर, भगवान ने स्वयं उरुवेला में जाकर अपनी महाऋद्धियों से उन एक हजार जटाधारी तपस्वियों (कस्सप बंधु) को नतमस्तक करा दिया, जो अग्नि-पूजा करते थे। एक ही उपदेश (आदित्यपरियाय सुत्त) से वे एक हजार तपस्वी ‘अर्हंत’ बन गए।
  • राजकीय संरक्षण: तब, मगध-सम्राट बिम्बिसार अपने १,२०,००० (सवा लाख) नागरिकों के साथ भगवान के दर्शन को आए और एक ही झटके में वे सब ‘श्रोतापन्न’ हो गए।

किन्तु… जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ परछाई भी होती है। इतनी तेजी से फैलते धम्म ने समाज में ईर्ष्या और भय भी पैदा कर दिया। लोग कहने लगे—“श्रमण गौतम हमारे पतियों को छीनने आया है! यह कुलों का नाश करने आया है!” मगध की गलियों में बुद्ध और संघ के खिलाफ एक भयंकर दुष्प्रचार और जनाक्रोश शुरू हो गया।

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क्या यह नया संघ इस सामाजिक विद्रोह को झेल पाएगा? आगे की इस रोमांचक कथा के लिए पढ़ें:

📽️ संघ कथा - भाग दो